राघव कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।
ऊपर से फिर वही आवाज आई।
“राघव…”
उसके पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।
यह आवाज वह कैसे भूल सकता था?
यह उसकी छोटी बहन रिया की आवाज थी।
रिया…
जो दस साल पहले मर चुकी थी।
नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।
“भैया, ऊपर मत जाना।”
राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी नजर छत की तरफ थी।
कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई।
पूरा घर फिर शांत हो गया।
राघव ने माँ को जगाया।
माँ कमरे से बाहर आईं और जैसे ही राघव ने उन्हें सारी बात बताई, उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
“रिया का नाम मत लेना,” माँ ने कहा।
“क्यों?”
माँ ने सिर झुका लिया।
“क्योंकि वह मरकर भी इस घर से गई नहीं थी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
राघव ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“मुझे सब सच बताइए।”
माँ बहुत देर तक चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहना शुरू किया।
दस साल पहले रिया सिर्फ तेरह साल की थी।
उसे रात में छत पर जाकर आसमान देखना बहुत पसंद था।
एक रात वह अचानक छत से गायब हो गई थी।
घर में सबने सोचा कि वह शायद सीढ़ियों से नीचे गई होगी।
लेकिन वह कहीं नहीं मिली।
सुबह उसकी लाश…
माँ आगे नहीं बोल पाईं।
राघव ने पूछा, “कहाँ मिली थी?”
माँ ने कांपते हुए छत के स्टोर रूम की तरफ इशारा किया।
“वहीं।”
राघव के चेहरे पर डर उतर आया।
“लेकिन वह कमरा तो हमेशा बंद रहा है।”
माँ बोलीं, “उस रात से।”
राघव ने पूछा, “दरवाज़ा बंद किसने किया था?”
माँ ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारे पिता ने।”
अचानक राघव को अपने पिता की आखिरी बात याद आई।
मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने उसे चेतावनी दी थी—
“अगर कभी रात में छत से किसी के चलने की आवाज आए… तो दरवाज़ा मत खोलना।”
तब राघव ने इसे बीमारी के कारण कही गई बात समझा था।
लेकिन अब…
सब कुछ जुड़ रहा था।
अगली सुबह राघव ने स्टोर रूम का ताला देखने का फैसला किया।
वह छत पर गया।
सूरज निकल चुका था।
दिन की रोशनी में रात का डर थोड़ा कम लग रहा था।
लेकिन स्टोर रूम के सामने पहुँचते ही उसकी सांस रुक गई।
दरवाज़े पर खरोंच के निशान थे।
बहुत सारे।
ऐसे निशान जैसे किसी ने अंदर से बाहर निकलने के लिए लकड़ी को नाखूनों से खुरचा हो।
राघव ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को छुआ।
दरवाज़ा बर्फ जैसा ठंडा था।
उसने ताला देखा।
ताला बाहर से बंद था।
तभी उसकी नजर फर्श पर गई।
वहाँ गीली मिट्टी के छोटे-छोटे पैरों के निशान थे।
वे निशान स्टोर रूम से निकलकर…
पानी की टंकी तक जा रहे थे।
राघव ने टंकी की तरफ देखा।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
वह टंकी के पास गया।
ऊपर ढक्कन लगा था।
उसने धीरे से ढक्कन उठाया।
अंदर पानी बिल्कुल काला दिखाई दे रहा था।
और पानी की सतह पर…
एक लंबे बालों का गुच्छा तैर रहा था।
राघव पीछे हट गया।
उसी समय पीछे से आवाज आई—
“भैया…”
राघव पलटा।
नंदिनी खड़ी थी।
“आप यहाँ क्या कर रहे हो?”
राघव ने तुरंत टंकी का ढक्कन बंद कर दिया।
“कुछ नहीं। नीचे चलो।”
लेकिन नंदिनी की नजर स्टोर रूम पर पड़ी।
“भैया, ये दरवाज़ा तो खुला है।”
राघव ने देखा।
दरवाज़ा सचमुच थोड़ा खुला हुआ था।
उसने तो उसे बंद देखा था।
दोनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे।
फिर अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।
“मुझे बाहर निकालो…”
नंदिनी के होंठ कांपने लगे।
“भैया…”
राघव ने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।
अंदर पूरा अंधेरा था।
टॉर्च जलाकर उसने अंदर देखा।
धूल से भरा कमरा।
पुराना सामान।
टूटी कुर्सी।
एक लकड़ी की पेटी।
और दीवार पर एक पुरानी तस्वीर।
राघव ने तस्वीर उठाई।
उसमें पूरा परिवार था।
माँ।
पिता।
राघव।
नंदिनी।
और रिया।
लेकिन तस्वीर में एक अजीब बात थी।
रिया के चेहरे पर किसी ने काले रंग से गोल घेरा बना दिया था।
राघव ने तस्वीर पलटी।
पीछे कुछ लिखा था।
“यह रिया नहीं है।”
राघव की उंगलियाँ कांपने लगीं।
तभी पेटी के अंदर से आवाज आई।
ठक… ठक… ठक…
नंदिनी पीछे हट गई।
राघव ने पेटी खोली।
अंदर पुराने कपड़े, कुछ खिलौने और एक डायरी थी।
डायरी उसके पिता की थी।
राघव ने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटे।
एक पन्ने पर लिखा था—
“रिया की मौत दुर्घटना नहीं थी।”
अगली लाइन पढ़ते ही राघव के हाथ से डायरी गिर गई।
“उस रात छत पर रिया के साथ कोई और भी था।”
राघव ने डायरी फिर उठाई।
अगला पन्ना खाली था।
उसके बाद एक वाक्य था—
“जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”
राघव की सांस रुक गई।
उसी समय कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
नंदिनी चीख उठी।
अंदर अंधेरा छा गया।
राघव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।
कुंडी हिल नहीं रही थी।
फिर…
अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—
“भैया…”
राघव जम गया।
नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मेरी तरफ मत देखना,” नंदिनी ने कांपते हुए कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि…”
नंदिनी की आवाज टूट गई।
“मेरे पीछे कोई खड़ा है।”
राघव ने आंखें बंद कर लीं।
पीछे से ठंडी सांस उसकी गर्दन पर महसूस हुई।
फिर किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—
“तुमने मुझे दस साल इंतजार कराया।”
अचानक दरवाज़ा खुल गया।
दोनों भागकर बाहर आए।
राघव ने पीछे मुड़कर देखा।
स्टोर रूम खाली था।
लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।
वे निशान कमरे से बाहर निकलकर सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।
और फिर…
सीढ़ियों पर रुक गए।
राघव ने नीचे देखा।
घर के अंदर उसकी माँ खड़ी थीं।
लेकिन उनकी आँखें बंद थीं।
और उनके पीछे…
एक लंबी काली परछाईं खड़ी थी।
राघव चिल्लाया—
“माँ!”
माँ ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
उनके चेहरे पर मुस्कान थी।
लेकिन वह उनकी मुस्कान नहीं थी।
उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“अब वह नीचे आ गई है।”
और उसी पल पूरे घर की सारी लाइटें बंद हो गईं।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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