पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
राघव ने तुरंत मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
“माँ!”
कोई जवाब नहीं आया।
नंदिनी उसके पीछे खड़ी कांप रही थी।
सीढ़ियों के नीचे माँ नहीं थीं।
वहाँ सिर्फ उनकी चप्पलें पड़ी थीं।
राघव ने चारों तरफ देखा।
“माँ कहाँ गईं?”
तभी ऊपर से आवाज आई।
ठक… ठक… ठक…
वही कदमों की आवाज।
राघव ने धीरे से सिर उठाया।
छत की सीढ़ियों पर कोई खड़ा था।
लंबे बाल।
सफेद कपड़े।
झुका हुआ सिर।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा—
“भैया… वो कौन है?”
राघव ने जवाब नहीं दिया।
वह आकृति धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी।
एक सीढ़ी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
हर कदम के साथ उसकी गर्दन थोड़ी ऊपर उठ रही थी।
राघव ने नंदिनी का हाथ पकड़ा।
“भागो!”
दोनों नीचे की तरफ दौड़े।
पीछे से तेज कदमों की आवाज आने लगी।
ठक-ठक-ठक-ठक!
वे नीचे कमरे में घुसे और दरवाज़ा बंद कर लिया।
राघव ने कुर्सी लगाकर दरवाज़ा रोक दिया।
कुछ सेकंड तक बाहर सन्नाटा रहा।
फिर दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
टक… टक…
राघव और नंदिनी ने एक-दूसरे को देखा।
फिर आवाज आई—
“राघव…”
यह उनकी माँ की आवाज थी।
राघव दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं!”
“माँ हैं!”
“नहीं भैया।”
नंदिनी ने कांपते हुए कहा—
“माँ मुझे हमेशा नंदू कहती हैं। उसने आपका नाम लिया है।”
राघव को पिता की डायरी याद आई।
“जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”
दरवाज़े के बाहर आवाज फिर आई।
इस बार वह नंदिनी की आवाज थी।
“भैया, दरवाज़ा खोलो।”
फिर राघव की अपनी आवाज—
“दरवाज़ा खोलो।”
फिर पिता की आवाज—
“राघव…”
फिर रिया की आवाज—
“भैया…”
राघव के शरीर में कंपकंपी होने लगी।
बाहर खड़ी चीज़ उनके घर के हर सदस्य की आवाज निकाल सकती थी।
लेकिन वह थी कौन?
राघव ने डायरी के आखिरी पन्ने याद किए।
वह दौड़कर स्टोर से लाई डायरी उठाने लगा।
एक पन्ने के कोने में कुछ और लिखा था।
“यह घर बनने से पहले यहाँ एक कुआँ था। उस कुएँ में एक लड़की ने आत्महत्या की थी। गाँव वाले कहते थे कि मरने के बाद उसकी आत्मा पानी में नहीं, बल्कि आईने में रहने लगी।”
अगली लाइन थी—
“रिया ने उस रात छत पर एक पुराना आईना देखा था।”
राघव को अचानक कुछ याद आया।
स्टोर रूम में एक टूटा हुआ आईना था।
वह आईना…
जिसे उसने कमरे के कोने में देखा था।
राघव समझ गया।
“नंदिनी, हमें स्टोर रूम वापस जाना होगा।”
“क्या?”
“उस आईने को तोड़ना होगा।”
दोनों पीछे के रास्ते से छत पर पहुँचे।
आश्चर्य की बात थी कि वहाँ अब कोई नहीं था।
हवा बिल्कुल शांत थी।
राघव स्टोर रूम में गया।
आईना दीवार के सामने रखा था।
उसके शीशे पर धुंध जमी हुई थी।
राघव ने हाथ से धुंध हटाई।
उसमें उसका चेहरा दिखाई दिया।
फिर नंदिनी का।
फिर…
रिया का।
राघव पीछे हट गया।
आईने में रिया मुस्कुरा रही थी।
“भैया…”
उसकी आँखों से काला पानी बह रहा था।
राघव ने पास पड़ी लोहे की रॉड उठाई।
रिया ने आईने के अंदर से हाथ बाहर निकाल दिया।
नंदिनी चीख पड़ी।
राघव ने पूरी ताकत से आईने पर वार किया।
छन्न्न्न्न!
आईना टूट गया।
एक साथ पूरे घर में चीख गूँज उठी।
इतनी तेज कि खिड़कियाँ कांपने लगीं।
आईने के टुकड़ों से काला धुआँ निकलने लगा।
वह धुआँ छत पर घूमता हुआ एक आकृति में बदल गया।
लंबे बाल।
सफेद चेहरा।
आँखों की जगह सिर्फ काले गड्ढे।
वह आकृति राघव की तरफ बढ़ी।
तभी पीछे से माँ की आवाज आई—
“राघव!”
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।
राघव उनकी तरफ दौड़ा।
“माँ!”
माँ ने उसे गले लगा लिया।
लेकिन उसी क्षण नंदिनी चिल्लाई—
“भैया, पीछे देखो!”
राघव ने पीछे देखा।
वह काली आकृति गायब हो चुकी थी।
सिर्फ आईने का एक टुकड़ा फर्श पर पड़ा था।
राघव ने राहत की सांस ली।
“सब खत्म हो गया।”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आँखों में आँसू थे।
“नहीं बेटा…”
“क्या?”
माँ ने धीरे से कहा—
“वह आईने में नहीं थी।”
राघव का चेहरा सफेद पड़ गया।
“तो कहाँ थी?”
माँ ने छत की तरफ देखा।
“वह हमेशा छत पर थी।”
अचानक नंदिनी ने पीछे मुड़कर देखा।
“भैया…”
“क्या हुआ?”
नंदिनी की आँखें फैल गईं।
“छत पर कोई खड़ा है।”
राघव ने धीरे-धीरे पीछे देखा।
छत की दीवार के पास रिया खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ था।
वह रो रही थी।
“भैया…”
राघव ने कांपती आवाज में पूछा—
“रिया?”
रिया ने सिर हिलाया।
“मुझे उसने नहीं मारा था।”
राघव की आँखों से आँसू निकल आए।
“फिर किसने?”
रिया ने पीछे की तरफ इशारा किया।
वहाँ…
उनके पिता खड़े थे।
लेकिन वह उनके पिता की आत्मा नहीं थी।
उसके चेहरे पर वही काली मुस्कान थी।
रिया ने कहा—
“पापा ने उसे घर में बुलाया था।”
माँ अचानक घुटनों के बल बैठ गईं।
“नहीं…”
राघव ने पिता की डायरी को देखा।
आखिरी पन्ना अचानक अपने आप खुल गया।
उस पर एक नई लाइन लिखी हुई थी—
“मैंने उसे बुलाया नहीं था। मैंने सिर्फ उसे बाहर जाने से रोका था।”
राघव ने सिर उठाया।
काली आकृति अब उसके बिल्कुल सामने थी।
उसने धीरे से कहा—
“दस साल पहले मैंने रिया का चेहरा पहना था…”
वह मुस्कुराई।
“…आज मुझे तुम्हारा चेहरा चाहिए।”
राघव पीछे हटने लगा।
लेकिन तभी रिया उसके सामने आ गई।
उसने उस काली आकृति का हाथ पकड़ लिया।
आसमान में अचानक बिजली चमकी।
एक भयानक चीख सुनाई दी।
और अगले ही पल…
सब कुछ शांत हो गया।
सुबह पड़ोसियों ने शर्मा परिवार के घर का दरवाज़ा खुला पाया।
घर के अंदर राघव, नंदिनी और उनकी माँ बेहोश मिले।
छत पर सिर्फ टूटा हुआ आईना पड़ा था।
और उसके पास…
एक पुरानी चाँदी की पायल।
रिया की।
उस दिन के बाद उस घर की छत पर कभी कोई आवाज नहीं आई।
कहानी यहीं खत्म हो जाती…
अगर छह महीने बाद उस घर को खरीदने वाला नया परिवार वहाँ रहने न आया होता।
पहली ही रात…
नए घर का दस साल का बेटा आधी रात को अपनी माँ के कमरे में दौड़ता हुआ आया।
वह कांप रहा था।
माँ ने पूछा—
“क्या हुआ?”
बच्चे ने छत की तरफ देखते हुए कहा—
“मम्मी…”
“हाँ?”
“छत पर कोई है।”
माँ ने हँसकर कहा—
“बेटा, छत पर तो कोई नहीं है।”
बच्चे ने धीरे से सिर हिलाया।
“नहीं मम्मी…”
फिर उसने फुसफुसाकर कहा—
“वहाँ एक आदमी खड़ा है। वो बिल्कुल मेरे जैसा दिखता है।”
END

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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