दोस्ती जो हादसे के बाद भी नहीं बदली
राघव और समीर बचपन से दोस्त थे। दोनों एक ही छोटे से गांव में पले-बढ़े थे। घर की हालत साधारण थी, लेकिन दोनों के सपने बड़े थे।
राघव हमेशा कहता था, “मैं पुलिस वाला बनूंगा।”
समीर हंसकर कहता, “और मैं बड़ा बिजनेसमैन बनूंगा।”
दोनों घंटों अपने भविष्य की बातें करते।
समय बीता तो राघव ने मेहनत करके पुलिस की नौकरी हासिल कर ली। गांव में उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। समीर ने भी शहर जाकर काम शुरू कर दिया।
नौकरी लगने के बाद राघव ने एक दिन समीर से कहा—
“अब तेरी बारी है। तू भी अपना सपना पूरा कर।”
समीर मुस्कुराया।
“मेरा सपना थोड़ा बड़ा है दोस्त, वक्त लगेगा।”
राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“वक्त चाहे जितना लगे, मैं तेरे साथ हूं।”
दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि जिंदगी चाहे जहां ले जाए, उनकी दोस्ती कभी नहीं बदलेगी।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
एक रात समीर अपनी बाइक से शहर से गांव लौट रहा था। रास्ते में एक तेज रफ्तार वाहन से उसकी बाइक की टक्कर हो गई।
हादसा इतना गंभीर था कि समीर कई दिनों तक अस्पताल में रहा।
जब उसे होश आया, तो वह अपने आसपास किसी को पहचान नहीं पा रहा था।
उसकी याददाश्त बुरी तरह प्रभावित हुई थी। इलाज के बाद भी वह पहले जैसा नहीं हो पाया।
परिवार की आर्थिक हालत खराब थी। कुछ समय बाद उसके घरवालों ने उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन समीर अक्सर घर से निकल जाता।
वह शहर की सड़कों पर भटकने लगा।
धीरे-धीरे लोग उसे पागल समझने लगे।
कोई उसे देखकर हंसता, कोई चिढ़ाता और कोई उसे सड़क से हटाने के लिए डांट देता।
समीर को कुछ बातें याद थीं, मगर सब कुछ धुंधला था।
उसे सिर्फ एक नाम याद था—
“राघव…”
एक दिन वह पुलिस थाने के सामने बैठा था।
उसी समय राघव की नजर उस पर पड़ी।
राघव कुछ पल के लिए वहीं खड़ा रह गया।
“समीर?”
समीर ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में पहचान नहीं थी।
राघव उसके पास बैठ गया।
“मुझे पहचानता है?”
समीर चुप रहा।
राघव ने धीरे से कहा
“हमने बचपन में नदी के किनारे पतंग उड़ाई थी। तू पतंग उड़ाता था और मैं धागा पकड़ता था।”
समीर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
लेकिन अगले ही पल वह फिर चुप हो गया।
राघव की आंखें भर आईं।
उस दिन उसने तय कर लिया कि वह अपने दोस्त को अकेला नहीं छोड़ेगा।
उसने समीर के लिए खाना लाना शुरू किया।
हर दिन ड्यूटी खत्म होने के बाद वह उसे ढूंढने निकलता।
कभी समीर मंदिर के पास मिलता, कभी बस स्टैंड पर और कभी किसी दुकान के बाहर बैठा हुआ।
राघव उसके पास बैठकर घंटों बातें करता।
“आज पता है क्या हुआ?”
समीर उसकी तरफ देखता।
“क्या?”
“आज थाने में एक आदमी अपनी पत्नी से झगड़कर आया था।”
समीर हंसने लगता।
राघव भी हंस देता।
कई लोग राघव से कहते
“साहब, आप इतना समय इस आदमी पर क्यों लगाते हैं?”
राघव जवाब देता
“क्योंकि ये कोई सड़क पर रहने वाला पागल नहीं है। ये मेरा दोस्त है।”
एक दिन राघव ने समीर के लिए नए कपड़े खरीदे।
“ले, पहनकर देख।”
समीर ने कपड़े हाथ में लिए और बोला
“मेरे पास पैसे नहीं हैं।”राघव मुस्कुराया।
“तूने कब से अपने दोस्त से पैसे देने शुरू कर दिए?”
समीर कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर अचानक बोला
“दोस्त…”
राघव के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“हां, दोस्त।”
उस दिन समीर ने पहली बार राघव को पुराने दिनों की तरह देखा था।
लेकिन उसकी याद पूरी तरह वापस नहीं आई।
कुछ महीने बाद शहर में एक बड़ा अपराध हुआ। पुलिस अपराधी की तलाश कर रही थी।
राघव जांच में लगा हुआ था।
एक दिन समीर अचानक थाने के बाहर आया।
उसने राघव से कहा
“मुझे एक जगह याद आ रही है।”
राघव ने पूछा “कहां?”
समीर ने शहर के पुराने गोदाम का नाम लिया।
“वहां… कोई मुझे ले गया था।”
राघव चौंक गया।
हादसे से पहले समीर ने उसी इलाके में कुछ संदिग्ध लोगों को देखा था। वह शायद किसी महत्वपूर्ण घटना का गवाह था।
राघव ने उसकी बात गंभीरता से ली।
जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि समीर ने सच में कुछ महत्वपूर्ण देखा था।
उसकी जानकारी से पुलिस को अपराधियों तक पहुंचने में मदद मिली।
मामला सुलझ गया।
लेकिन राघव के लिए सबसे बड़ी खुशी यह नहीं थी।
उसके लिए खुशी की बात यह थी कि उसका दोस्त धीरे-धीरे अपनी पुरानी यादें वापस पा रहा था।
एक शाम दोनों उसी नदी के किनारे बैठे थे जहां बचपन में पतंग उड़ाते थे।
समीर ने पानी की तरफ देखते हुए कहा
“राघव… मुझे सब याद नहीं है।”
राघव ने कहा“कोई बात नहीं।”
“मुझे डर लगता है कि मैं कभी पहले जैसा नहीं बन पाऊंगा।”
राघव ने उसका कंधा पकड़ लिया।
“तुझे पहले जैसा बनने की जरूरत नहीं है।”
समीर ने उसकी तरफ देखा।
राघव मुस्कुराया।
“तू आज भी मेरा वही दोस्त है। बस तेरी जिंदगी ने रास्ता थोड़ा मुश्किल कर दिया है।”
समीर की आंखों में आंसू आ गए।
“तूने मेरा साथ क्यों नहीं छोड़ा?”
राघव ने हंसते हुए कहा
“क्योंकि दोस्ती नौकरी नहीं है कि मन हुआ तो छोड़ दी।”दोनों हंस पड़े।
कुछ समय बाद समीर का इलाज बेहतर अस्पताल में शुरू हुआ। उसकी हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी।
वह अब सड़क पर नहीं भटकता था। राघव ने उसके परिवार से भी संपर्क किया और उसकी देखभाल का इंतजाम कराया।
समीर की जिंदगी पूरी तरह पहले जैसी नहीं हुई, लेकिन अब उसके पास एक सुरक्षित जगह थी, इलाज था और सबसे बढ़कर उसका दोस्त था।
एक दिन समीर ने राघव से कहा
“मेरा बिजनेस वाला सपना तो पूरा नहीं हुआ।”
राघव ने कहा“तो नया सपना बना।”
समीर ने पूछा“क्या?”
राघव मुस्कुराया।
“ऐसे लोगों के लिए कुछ करना जो हादसे के बाद अकेले रह जाते हैं।”
समीर ने कुछ पल सोचा।
फिर बोला“शायद यही मेरा असली सपना हो।”
दोनों ने हाथ मिलाया।
कुछ साल बाद समीर ने सड़क पर रहने वाले जरूरतमंद लोगों के लिए एक छोटा-सा सहायता केंद्र शुरू किया।
राघव जब भी ड्यूटी से छुट्टी पाता, वहां जरूर जाता।
लोग अक्सर पूछते“आप दोनों की दोस्ती इतनी मजबूत कैसे है?”
राघव मुस्कुराकर कहता
“क्योंकि असली दोस्त वही होता है जो तब भी साथ खड़ा रहे, जब पूरी दुनिया तुम्हें पहचानना बंद कर दे।”
और समीर हर बार उसकी बात पूरी करता
“किस्मत ने मुझे सड़क पर ला दिया था… लेकिन मेरे दोस्त ने मुझे फिर से जिंदगी की राह पर खड़ा कर दिया।”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
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