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टैग: दोस्ती

  • करेजा हो करेजा में समा गईलू

    करेजा हो करेजा में समा गईलू

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    करेजा हो करेजा में समा गईलू, तोहरे नयनवा के जादू में, हम त खो गईनी। तूं हो गईलू हमार ,हम तोहके हो गईनी।तोहरे मुस्कान वां से रौशन भइल ई जिनगी, हर साँसन में तोहरे नाम के धुन गुनगुना गईल। दिलवा धड़के ला हर घड़ी तोहरे खातिर।रात‑दिन तोहरे याद में कटेला पल, सपनावां में भी तोहरे से बतियाईले। का बतलाईं कतना तोहके चाहिले।करेजा हो करेजा में समा गईलू, तोहरे प्यार के दरिया में हम त डूब गईनी। गोर गलिया देखते बहुते सुकून पईनी।जग चाहे जेतना दूरी बना दे, दिल‑रूह से तोहरे से जे जुड़ गईल। छूटी ना कवो हांथ उ जुड़ले रही।चाँद‑तारा भी लागे अब फीका, तोहरे रूपवा से जगमगाईल। दिल के बगिया में फूलवा खिलखिला गईल।करेजा हो करेजा में समा गईलू, तोहरे इश्क़ में खुद के भुला गईनी। इ सगरी उमिरिया तोहरे नाम कईनी।साजनी, तोहरे बिना ना मन लागे, हर धड़कन में तोहरे के पुकारी ले।हम का बतलाईं हम कतना तोहके चाहिले।।

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    Manoj Divana Namaste Story World

    नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड के लेखक। पाठकों के लिए मनोरंजक और दिल को छू लेने वाली हिंदी कहानियाँ लिखना पसंद करता हूँ।आपका स्वागत है नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड में धन्यवाद 💐💐🌹🌹

  • दोस्ती जो हादसे से नहीं बदली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दोस्ती जो हादसे के बाद भी नहीं बदली

     

    राघव और समीर बचपन से दोस्त थे। दोनों एक ही छोटे से गांव में पले-बढ़े थे। घर की हालत साधारण थी, लेकिन दोनों के सपने बड़े थे।

     

    राघव हमेशा कहता था, “मैं पुलिस वाला बनूंगा।”

     

    समीर हंसकर कहता, “और मैं बड़ा बिजनेसमैन बनूंगा।”

     

    दोनों घंटों अपने भविष्य की बातें करते।

     

    समय बीता तो राघव ने मेहनत करके पुलिस की नौकरी हासिल कर ली। गांव में उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। समीर ने भी शहर जाकर काम शुरू कर दिया।

     

    नौकरी लगने के बाद राघव ने एक दिन समीर से कहा—

     

    “अब तेरी बारी है। तू भी अपना सपना पूरा कर।”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “मेरा सपना थोड़ा बड़ा है दोस्त, वक्त लगेगा।”

     

    राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “वक्त चाहे जितना लगे, मैं तेरे साथ हूं।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि जिंदगी चाहे जहां ले जाए, उनकी दोस्ती कभी नहीं बदलेगी।

     

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

     

    एक रात समीर अपनी बाइक से शहर से गांव लौट रहा था। रास्ते में एक तेज रफ्तार वाहन से उसकी बाइक की टक्कर हो गई।

     

    हादसा इतना गंभीर था कि समीर कई दिनों तक अस्पताल में रहा।

     

    जब उसे होश आया, तो वह अपने आसपास किसी को पहचान नहीं पा रहा था।

     

    उसकी याददाश्त बुरी तरह प्रभावित हुई थी। इलाज के बाद भी वह पहले जैसा नहीं हो पाया।

     

    परिवार की आर्थिक हालत खराब थी। कुछ समय बाद उसके घरवालों ने उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन समीर अक्सर घर से निकल जाता।

     

    वह शहर की सड़कों पर भटकने लगा।

     

    धीरे-धीरे लोग उसे पागल समझने लगे।

     

    कोई उसे देखकर हंसता, कोई चिढ़ाता और कोई उसे सड़क से हटाने के लिए डांट देता।

     

    समीर को कुछ बातें याद थीं, मगर सब कुछ धुंधला था।

     

    उसे सिर्फ एक नाम याद था—

     

    “राघव…”

     

    एक दिन वह पुलिस थाने के सामने बैठा था।

     

    उसी समय राघव की नजर उस पर पड़ी।

     

    राघव कुछ पल के लिए वहीं खड़ा रह गया।

     

    “समीर?”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में पहचान नहीं थी।

    राघव उसके पास बैठ गया।

     

    “मुझे पहचानता है?”

    समीर चुप रहा।

     

    राघव ने धीरे से कहा

    “हमने बचपन में नदी के किनारे पतंग उड़ाई थी। तू पतंग उड़ाता था और मैं धागा पकड़ता था।”

     

    समीर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    लेकिन अगले ही पल वह फिर चुप हो गया।

     

    राघव की आंखें भर आईं।

     

    उस दिन उसने तय कर लिया कि वह अपने दोस्त को अकेला नहीं छोड़ेगा।

     

    उसने समीर के लिए खाना लाना शुरू किया।

     

    हर दिन ड्यूटी खत्म होने के बाद वह उसे ढूंढने निकलता।

     

    कभी समीर मंदिर के पास मिलता, कभी बस स्टैंड पर और कभी किसी दुकान के बाहर बैठा हुआ।

     

    राघव उसके पास बैठकर घंटों बातें करता।

     

    “आज पता है क्या हुआ?”

    समीर उसकी तरफ देखता।

    “क्या?”

    “आज थाने में एक आदमी अपनी पत्नी से झगड़कर आया था।”

     

    समीर हंसने लगता।

    राघव भी हंस देता।

    कई लोग राघव से कहते

    “साहब, आप इतना समय इस आदमी पर क्यों लगाते हैं?”

     

    राघव जवाब देता

    “क्योंकि ये कोई सड़क पर रहने वाला पागल नहीं है। ये मेरा दोस्त है।”

     

    एक दिन राघव ने समीर के लिए नए कपड़े खरीदे।

    “ले, पहनकर देख।”

    समीर ने कपड़े हाथ में लिए और बोला

    “मेरे पास पैसे नहीं हैं।”राघव मुस्कुराया।

     

    “तूने कब से अपने दोस्त से पैसे देने शुरू कर दिए?”

     

    समीर कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर अचानक बोला

    “दोस्त…”

    राघव के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    “हां, दोस्त।”

    उस दिन समीर ने पहली बार राघव को पुराने दिनों की तरह देखा था।

     

    लेकिन उसकी याद पूरी तरह वापस नहीं आई।

     

    कुछ महीने बाद शहर में एक बड़ा अपराध हुआ। पुलिस अपराधी की तलाश कर रही थी।

    राघव जांच में लगा हुआ था।

    एक दिन समीर अचानक थाने के बाहर आया।

     

    उसने राघव से कहा

    “मुझे एक जगह याद आ रही है।”

    राघव ने पूछा “कहां?”

    समीर ने शहर के पुराने गोदाम का नाम लिया।

    “वहां… कोई मुझे ले गया था।”

    राघव चौंक गया।

    हादसे से पहले समीर ने उसी इलाके में कुछ संदिग्ध लोगों को देखा था। वह शायद किसी महत्वपूर्ण घटना का गवाह था।

     

    राघव ने उसकी बात गंभीरता से ली।

    जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि समीर ने सच में कुछ महत्वपूर्ण देखा था।

     

    उसकी जानकारी से पुलिस को अपराधियों तक पहुंचने में मदद मिली।

    मामला सुलझ गया।

    लेकिन राघव के लिए सबसे बड़ी खुशी यह नहीं थी।

     

    उसके लिए खुशी की बात यह थी कि उसका दोस्त धीरे-धीरे अपनी पुरानी यादें वापस पा रहा था।

     

    एक शाम दोनों उसी नदी के किनारे बैठे थे जहां बचपन में पतंग उड़ाते थे।

     

    समीर ने पानी की तरफ देखते हुए कहा

    “राघव… मुझे सब याद नहीं है।”

    राघव ने कहा“कोई बात नहीं।”

    “मुझे डर लगता है कि मैं कभी पहले जैसा नहीं बन पाऊंगा।”

     

    राघव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

    “तुझे पहले जैसा बनने की जरूरत नहीं है।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

    राघव मुस्कुराया।

    “तू आज भी मेरा वही दोस्त है। बस तेरी जिंदगी ने रास्ता थोड़ा मुश्किल कर दिया है।”

    समीर की आंखों में आंसू आ गए।

    “तूने मेरा साथ क्यों नहीं छोड़ा?”

    राघव ने हंसते हुए कहा

    “क्योंकि दोस्ती नौकरी नहीं है कि मन हुआ तो छोड़ दी।”दोनों हंस पड़े।

    कुछ समय बाद समीर का इलाज बेहतर अस्पताल में शुरू हुआ। उसकी हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी।

     

    वह अब सड़क पर नहीं भटकता था। राघव ने उसके परिवार से भी संपर्क किया और उसकी देखभाल का इंतजाम कराया।

     

    समीर की जिंदगी पूरी तरह पहले जैसी नहीं हुई, लेकिन अब उसके पास एक सुरक्षित जगह थी, इलाज था और सबसे बढ़कर उसका दोस्त था।

     

    एक दिन समीर ने राघव से कहा

    “मेरा बिजनेस वाला सपना तो पूरा नहीं हुआ।”

    राघव ने कहा“तो नया सपना बना।”

    समीर ने पूछा“क्या?”

    राघव मुस्कुराया।

    “ऐसे लोगों के लिए कुछ करना जो हादसे के बाद अकेले रह जाते हैं।”

    समीर ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बोला“शायद यही मेरा असली सपना हो।”

    दोनों ने हाथ मिलाया।

     

    कुछ साल बाद समीर ने सड़क पर रहने वाले जरूरतमंद लोगों के लिए एक छोटा-सा सहायता केंद्र शुरू किया।

     

    राघव जब भी ड्यूटी से छुट्टी पाता, वहां जरूर जाता।

     

    लोग अक्सर पूछते“आप दोनों की दोस्ती इतनी मजबूत कैसे है?”

    राघव मुस्कुराकर कहता

    “क्योंकि असली दोस्त वही होता है जो तब भी साथ खड़ा रहे, जब पूरी दुनिया तुम्हें पहचानना बंद कर दे।”

    और समीर हर बार उसकी बात पूरी करता

    “किस्मत ने मुझे सड़क पर ला दिया था… लेकिन मेरे दोस्त ने मुझे फिर से जिंदगी की राह पर खड़ा कर दिया।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं

    अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मोहन और झूमर की अनोखी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    बहुत समय पहले की बात है। पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों से घिरे एक सुंदर से गाँव में मोहन नाम का एक छोटा-सा लड़का रहता था। मोहन बहुत ही चंचल, दयालु और हँसमुख था। पूरे गाँव में उसकी शरारतों और मददगार स्वभाव की चर्चा होती थी। वह हर किसी से प्यार से बात करता और हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार रहता।

    लेकिन मोहन के मन में एक छोटी-सी इच्छा हमेशा रहती थी। वह चाहता था कि उसका कोई ऐसा दोस्त हो, जो हर समय उसके साथ रहे। गाँव के बच्चे स्कूल चले जाते थे और कई बार अपने कामों में व्यस्त हो जाते थे। ऐसे में मोहन अकेला महसूस करता।

    एक दिन सुबह-सुबह वह खेतों की ओर घूमने निकला। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहा रहे थे और तितलियाँ फूलों पर मंडरा रही थीं।

    अचानक उसकी नज़र झाड़ियों के पीछे किसी हलचल पर पड़ी।

    वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।

    उसने देखा कि एक छोटा-सा हिरण काँपता हुआ खड़ा था। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

    मोहन ने धीरे से कहा,

    “डरो मत… मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”

    हिरण कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर धीरे-धीरे उसके पास आ गया।

    मोहन ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।

    “आज से तुम मेरे दोस्त हो। मैं तुम्हारा नाम झूमर रखता हूँ, क्योंकि तुम चलते नहीं, झूमते हुए दौड़ते हो।”

    जैसे ही उसने यह कहा, हिरण खुशी से उछल पड़ा।

    उस दिन से दोनों की दोस्ती शुरू हो गई।

    अब हर सुबह मोहन जंगल जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता।

    दोनों मिलकर पेड़ों के बीच दौड़ लगाते।

    कभी नदी किनारे बैठते।

    कभी तितलियों के पीछे भागते।

    कभी पेड़ों से गिरे मीठे फलों का स्वाद लेते।

    जब भी मोहन उदास होता, झूमर उसके पास आकर अपना सिर उसके कंधे से सटा देता।

    मोहन मुस्कुरा उठता।

    धीरे-धीरे पूरे गाँव को दोनों की दोस्ती के बारे में पता चल गया।

    लोग कहते,

    “ऐसी दोस्ती बहुत कम देखने को मिलती है।”

    कुछ ही दिनों बाद गाँव में साल का सबसे बड़ा मेला लगने वाला था।

    गाँव के बच्चे कई दिनों से उसकी तैयारी कर रहे थे।

    मोहन ने झूमर से कहा,

    “चलो, इस बार तुम्हें भी मेला दिखाता हूँ।”

    झूमर खुशी से उछल पड़ा।

    मेले वाले दिन पूरा गाँव रंग-बिरंगी सजावट से जगमगा रहा था।

    चारों ओर मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी।

    बच्चे झूलों पर झूल रहे थे।

    कोई बाँसुरी बजा रहा था तो कोई कठपुतली का खेल दिखा रहा था।

    मोहन और झूमर भी मेले में घूमने लगे।

    दोनों ने गुड़ की रेवड़ी खाई।

    रंग-बिरंगे गुब्बारे देखे।

    झूलों को देखकर झूमर खुशी से उछलने लगा।

    तभी अचानक मेले में अफरा-तफरी मच गई।

    एक शिकारी वहाँ आ पहुँचा।

    उसकी नज़र जैसे ही झूमर पर पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं।

    वह धीरे-धीरे झूमर की ओर बढ़ने लगा।

    मोहन ने यह देख लिया।

    वह तुरंत झूमर के सामने खड़ा हो गया।

    “रुक जाओ!”

    शिकारी हँसते हुए बोला,

    “हटो बच्चे, यह हिरण अब मेरा है।”

    मोहन ने साहस से कहा,

    “यह कोई सामान नहीं है। यह मेरा दोस्त है।”

    लेकिन शिकारी उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

    उसने जाल निकाल लिया।

    झूमर डरकर पीछे हटने लगा।

    मोहन जल्दी से सोचने लगा कि क्या किया जाए।

    तभी उसकी नज़र पास में बँधी एक बकरी पर पड़ी।

    उसके दिमाग में एक योजना आई।

    उसने झूमर से धीरे से कहा,

    “तुम अभी जंगल की तरफ भागो। मैं सब संभाल लूँगा।”

    झूमर तुरंत दौड़ पड़ा।

    उधर मोहन ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,

    “अरे… बकरी भाग रही है!”

    शिकारी का ध्यान बकरी की ओर चला गया।

    वह उसी के पीछे दौड़ पड़ा।

    इसी बीच मोहन ने गाँव के चौकीदार और पुलिस को सूचना दे दी।

    कुछ ही मिनटों में पुलिस वहाँ पहुँच गई।

    उन्होंने शिकारी को पकड़ लिया।

    शिकारी भागने की कोशिश करता रहा, लेकिन वह बच नहीं पाया।

    गाँव के लोगों ने राहत की साँस ली।

    झूमर धीरे-धीरे जंगल से वापस आया।

    जैसे ही उसने मोहन को सुरक्षित देखा, वह दौड़कर उसके पास आया और अपना सिर उसके सीने से लगा दिया।

    मोहन ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।

    गाँव के मुखिया ने दोनों की बहादुरी की बहुत प्रशंसा की।

    उन्होंने कहा,

    “आज मोहन ने साबित कर दिया कि सच्चा दोस्त वही होता है, जो अपने दोस्त की रक्षा के लिए हर मुश्किल का सामना करे।”

    उस दिन मेले में सभी बच्चों ने मोहन के लिए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं।

    कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने जंगल के जानवरों की सुरक्षा के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया।

    उन्होंने जंगल के बाहर चेतावनी वाले बोर्ड लगाए।

    वन विभाग की मदद से जानवरों की सुरक्षा के लिए गश्त भी बढ़ाई गई।

    मोहन भी इस अभियान का हिस्सा बन गया।

    अब वह गाँव के बच्चों को जानवरों से प्यार करना और उनकी रक्षा करना सिखाने लगा।

    झूमर भी अक्सर दूर खड़ा होकर उसे देखता और जैसे मुस्कुराता हुआ दिखाई देता।

    समय बीतता गया, लेकिन दोनों की दोस्ती पहले से भी ज़्यादा गहरी होती गई।

    हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ मोहन जंगल पहुँच जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता मिलता।

    दोनों फिर उसी तरह दौड़ते, खेलते और हँसते।

    उनकी दोस्ती पूरे गाँव के लिए एक मिसाल बन गई।

    लोग अपने बच्चों से कहते,

    “अगर दोस्ती निभानी है, तो मोहन और झूमर जैसी निभाओ।”

    मोहन ने समझ लिया था कि दोस्ती केवल साथ खेलने का नाम नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ निभाने का नाम है।

    झूमर ने भी अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि प्रेम और विश्वास की कोई भाषा नहीं होती।

    इंसान और जानवर भी सच्चे दोस्त बन सकते हैं, अगर उनके दिल में प्यार और अपनापन हो।

    उस दिन से गाँव के लोग हर साल मेले के दिन “मित्रता दिवस” मनाने लगे, ताकि सभी बच्चों को सच्ची दोस्ती का महत्व याद रहे।

    और जब भी कोई बच्चा जंगल की ओर जाता, उसे अक्सर एक प्यारा-सा हिरण और उसका सबसे अच्छा दोस्त मोहन साथ-साथ खेलते हुए दिखाई देते हैं।

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • नन्हा चाँद चमकीला

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    बहुत समय पहले की बात है। नीले, अनंत आकाश में एक छोटा-सा, प्यारा-सा चाँद रहता था। उसका नाम था चमकीला। वह बाकी चाँदों से थोड़ा अलग था। जहाँ दूसरे चाँद अपनी रोशनी फैलाकर शांत रहते थे, वहीं चमकीला बहुत चंचल और जिज्ञासु था। उसे नई-नई बातें जानना, नए दोस्त बनाना और दूर-दूर तक झाँकना बहुत पसंद था।

     

    हर रात वह अपने सबसे अच्छे दोस्तों—छोटे-छोटे टिमटिमाते तारों और मुलायम सफेद बादलों—के साथ खेलता था। कभी वे लुका-छिपी खेलते, कभी तारों की गिनती करते, तो कभी नीचे धरती पर रहने वाले लोगों को देखकर उनके बारे में बातें करते।

     

    एक रात चमकीला धरती की ओर देख रहा था। उसने देखा कि एक गाँव में बहुत सारे बच्चे चाँदनी रात में खेल रहे थे। कोई कबड्डी खेल रहा था, कोई रस्सी कूद रहा था, तो कोई दादी से कहानी सुन रहा था। बच्चों की हँसी पूरे वातावरण में गूँज रही थी।

     

    चमकीला उन्हें बड़े ध्यान से देखता रहा। उसके मन में एक इच्छा जागी।

     

    “काश… मैं भी उनके साथ खेल पाता!”

     

    उस रात वह यही सोचते-सोचते सो गया।

     

    सपने में उसने देखा कि वह धरती पर उतर गया है। बच्चे उसे देखकर खुशी से चिल्ला रहे हैं।

     

    “देखो… चाँद हमारे पास आ गया!”

     

    सभी बच्चे उसका हाथ पकड़कर उसे अपने खेल में शामिल कर लेते हैं। कोई उसे पतंग उड़ाना सिखाता है, कोई पेड़ पर लगे झूले पर बैठाता है, तो कोई उसे आम खिलाता है।

     

    सपना इतना सुंदर था कि सुबह होने तक भी चमकीला उसी के बारे में सोचता रहा।

     

    अगली रात उसने अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “तारों… बादलों… मुझे तुम सबसे एक ज़रूरी बात कहनी है।”

     

    सब उसके पास आ गए।

     

    एक तारे ने मुस्कुराकर पूछा, “क्या बात है? आज तुम बहुत गंभीर लग रहे हो।”

     

    चमकीला बोला, “मैं धरती पर जाना चाहता हूँ। मैं बच्चों से मिलना चाहता हूँ। उनके साथ खेलना चाहता हूँ।”

     

    सभी तारे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    एक छोटा तारा बोला, “लेकिन तुम तो चाँद हो। अगर तुम धरती पर चले गए, तो रात का क्या होगा?”

     

    चमकीला मुस्कुराया।

     

    “मैं थोड़ी देर के लिए जाऊँगा और सूरज निकलने से पहले वापस आ जाऊँगा।”

     

    तभी एक बड़ा-सा सफेद बादल आगे आया।

     

    “अगर तुम्हारी इच्छा सच्ची है, तो मैं तुम्हारी मदद करूँगा।”

     

    चमकीला खुशी से उछल पड़ा।

     

    “सच? तुम मेरी मदद करोगे?”

     

    “हाँ, लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “सूरज निकलने से पहले तुम्हें वापस लौटना होगा।”

     

    चमकीला तुरंत मान गया।

     

    उस रात जैसे ही पूरा आकाश शांत हुआ, बादल ने अपने नरम-नरम पंख फैलाए और चमकीला को प्यार से अपने ऊपर बैठा लिया।

     

    धीरे-धीरे दोनों धरती की ओर उतरने लगे।

     

    रास्ते में उन्होंने उड़ते हुए पक्षियों को देखा। दूर-दूर तक फैले पहाड़ दिखाई दिए। चमकती नदियाँ चाँदी की तरह बह रही थीं। खेतों में हवा लहरें बना रही थी।

     

    चमकीला पहली बार धरती को इतने करीब से देखकर मंत्रमुग्ध हो गया।

     

    कुछ ही देर में वे एक छोटे-से गाँव के पास उतर गए।

     

    गाँव के बच्चे अभी भी खेल रहे थे।

     

    जैसे ही उन्होंने चमकीला को देखा, वे हैरान रह गए।

     

    एक बच्चा बोला, “अरे… ये तो चाँद है!”

     

    दूसरा बोला, “क्या सचमुच चाँद हमारे गाँव आया है?”

     

    सभी बच्चे उसके चारों ओर इकट्ठा हो गए।

     

    चमकीला मुस्कुराकर बोला,

     

    “हाँ… मैं तुम्हारा दोस्त बनने आया हूँ। क्या तुम मेरे साथ खेलोगे?”

     

    “हाँ…!”

     

    सभी बच्चे एक साथ चिल्लाए।

     

    फिर शुरू हुआ खेलों का मजेदार सिलसिला।

     

    किसी ने उसे पकड़म-पकड़ाई खिलाई।

     

    किसी ने आँख-मिचौली सिखाई।

     

    किसी ने उसे मिट्टी से खिलौने बनाना सिखाया।

     

    एक छोटी-सी बच्ची अपना रंग-बिरंगा गुब्बारा लेकर आई और बोली,

     

    “ये तुम्हारे लिए।”

     

    चमकीला ने पहली बार कोई उपहार पाया था।

     

    उसने गुब्बारे को बहुत प्यार से पकड़ लिया।

     

    थोड़ी देर बाद बच्चों ने उसे आम का मीठा रस चखाया।

     

    “वाह!” चमकीला बोला।

     

    “इतना स्वादिष्ट फल मैंने कभी नहीं खाया।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    फिर वे नदी किनारे गए।

     

    चमकीला ने पानी में अपना चेहरा देखा।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं तो पानी में और भी सुंदर लग रहा हूँ।”

     

    बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    कुछ देर बाद गाँव की दादी माँ वहाँ आईं।

     

    उन्होंने चमकीला को देखकर हाथ जोड़ लिए।

     

    “बेटा, तुम सचमुच चाँद हो?”

     

    चमकीला ने विनम्रता से सिर हिलाया।

     

    दादी माँ बोलीं,

     

    “आज हमारे गाँव का सौभाग्य है कि तुम हमारे बीच आए।”

     

    उन्होंने सभी बच्चों को गुड़ और रोटी खिलाई।

     

    चमकीला ने भी पहली बार गुड़ का स्वाद चखा।

     

    उसे वह बहुत मीठा लगा।

     

    समय कैसे बीत गया, किसी को पता ही नहीं चला।

     

    तभी बादल धीरे से उसके पास आया।

     

    “चमकीला…”

     

    “हाँ?”

     

    “देखो… पूरब की ओर हल्की रोशनी फैलने लगी है। सूरज निकलने वाला है।”

     

    चमकीला का चेहरा उदास हो गया।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    बच्चों ने भी आसमान की ओर देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया कि अब विदा का समय आ गया है।

     

    एक छोटा बच्चा रोते हुए बोला,

     

    “मत जाओ ना…”

     

    एक बच्ची ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या तुम फिर कभी आओगे?”

     

    चमकीला ने प्यार से सबकी ओर देखा।

     

    “मैं हर रात तुमसे मिलने आऊँगा। भले ही धरती पर न उतर सकूँ, लेकिन आसमान से तुम्हें देखूँगा। जब भी तुम मुस्कुराओगे, मैं और ज़्यादा चमकूँगा।”

     

    बच्चों की आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने हाथ हिलाकर उसे विदा किया।

     

    बादल ने फिर से चमकीला को अपने मुलायम पंखों पर बैठाया और धीरे-धीरे आसमान की ओर उड़ चला।

     

    कुछ ही देर में चमकीला फिर अपने स्थान पर पहुँच गया।

     

    तारे खुशी से उसके चारों ओर आ गए।

     

    “बताओ… धरती कैसी लगी?”

     

    चमकीला मुस्कुराया।

     

    “धरती बहुत सुंदर है। लेकिन सबसे सुंदर वहाँ रहने वाले बच्चों के दिल हैं। उनके पास महल नहीं थे, फिर भी वे खुश थे। उनके खिलौने महँगे नहीं थे, फिर भी वे सबसे अमीर थे… क्योंकि उनके पास प्यार था, दोस्ती थी और सच्ची मुस्कान थी।”

     

    तारे उसकी बातें सुनकर मुस्कुराने लगे।

     

    उस दिन के बाद चमकीला हर रात पहले से ज़्यादा चमकने लगा।

     

    धरती के बच्चे भी हर रात सोने से पहले खिड़की से आसमान की ओर देखते।

     

    उन्हें लगता जैसे चमकीला उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा हो।

     

    और सच भी यही था।

     

    जब भी कोई बच्चा उदास होता, चमकीला अपनी रोशनी थोड़ी और बढ़ा देता, ताकि उसे लगे कि उसका दोस्त हमेशा उसके साथ है।

     

    धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह बात फैल गई कि चाँद बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त है। हर बच्चा रात को उसे देखकर मुस्कुराता और अपने सपने उससे साझा करता।

     

    चमकीला भी मन ही मन हर बच्चे की खुशी की दुआ करता।

     

    “शिक्षा”

     

    हमें हमेशा बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। सच्ची दोस्ती, प्यार और खुशियाँ किसी जगह की मोहताज नहीं होतीं। जब हमारा दिल साफ़ होता है, तो पूरी दुनिया हमारे लिए अपने दरवाज़े खोल देती है।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

    दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                          दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

     

     वो जो दूर रहकर भी मेरे पास सदा रहता है,

    हर लम्हा मेरे हिस्से में खुशियां ही आएं

    ऐसी दुआ करता है, ऐसा ही एक अनमोल

    रिश्ता दोस्ती के रूप में मैंने संजो रखा है ,

    रोज छोटी छोटी बातों में मुझसे लड़ पड़ता है, मेरे साथ बिना बोले जिसका दिन नहीं कटता है,

    हां! ऐसे ही एक शख्स को अपना

    दोस्त मैंने बना रखा है , मेरी जिंदगी में

    शामिल हुआ है वह ऐसे जैसे धड़कन

    बनकर बस गया है मुझमें,

    ना जाने कितने आए और साथ निभाने

    का वादा करके निकल गये,

    बस ये एक बिना किसी कारण और

    वादों के मेरे साथ ठहरा है ,

    “दोस्ती ” ये उससे मैंने जानी है 

    सब रिश्ते में सबसे खूबसूरत रिश्ता 

    दोस्ती का है, जो उसने मुझे समझा दिया है ….

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈

    लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।

  • जिन्न की दास्तान

    जिन्न की दास्तान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    चलिए एक जिन्न की कहानी गढ़ते हैं — रहस्यमयी, जादुई और थोड़ी भावनात्मक भी।🌌 जिन्न की कहानी: “नीले धुएँ का रहस्य”पुराने किले की तहख़ाने में एक टूटा हुआ दीया पड़ा था। गाँव के बच्चे अक्सर वहाँ खेलने जाते, लेकिन उस दीये को छूने की हिम्मत किसी ने नहीं की।एक दिन मानव नाम का लड़का जिज्ञासा में दीये को उठाता है। जैसे ही उसने उसे रगड़ा, नीले धुएँ का बादल फैल गया और उसमें से एक जिन्न प्रकट हुआ।जिन्न ने कहा —

    “सदियों से मैं इस दीये में कैद हूँ। जिसने मुझे जगाया है, उसकी एक इच्छा पूरी करना मेरा वचन है।”मानव ने थोड़ी देर सोचा। वह सोना‑चाँदी, ताक़त या अमरता माँग सकता था। लेकिन उसने कहा 

    “मेरी इच्छा है कि हमारे गाँव में कभी कोई भूखा न सोए।”जिन्न मुस्कुराया। उसकी आँखों में चमक थी। उसने हाथ उठाया और आसमान में नीली रोशनी फैल गई। उस दिन से गाँव की ज़मीन इतनी उपजाऊ हो गई कि हर खेत सोने जैसी फसल देने लगा। मानव ने समझा कि असली जादू लालच में नहीं, बल्कि दूसरों की भलाई में है। चलिए इस जिन्न की कहानी को श्रृंखला में आगे बढ़ाते हैं।🌆 जिन्न और खोया हुआ शहर मानव  के गाँव में खुशहाली लौट आई थी। लेकिन जिन्न के दिल में अब भी एक रहस्य छिपा था। उसने मानव  से कहा —

    “मेरी असली ताक़त उस खोए हुए शहर में है, जहाँ से मुझे कैद किया गया था। अगर तुम चाहो तो मेरे साथ चलो।”मानव ने हिम्मत जुटाई और जिन्न के साथ नीले धुएँ की सुरंग से गुज़रा। वे पहुँचे एक वीरान शहर में, जहाँ हर पत्थर पर जादू की छाप थी।लेकिन वहाँ एक शाप भी था —

    “जो भी इस शहर का रहस्य खोलेगा, उसे अपनी सबसे प्यारी चीज़ की क़ुर्बानी देनी होगी।”अब मानव को तय करना था: क्या वह जिन्न को आज़ाद करने के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ छोड़ देगा, या शहर का रहस्य हमेशा के लिए दफ़न रहेगा?🔮जिन्न का आख़िरी वादा खोए हुए शहर की दीवारों पर पुरानी लिपियाँ चमक रही थीं। जिन्न ने मानव  से कहा —

    “यहाँ मेरी असली ताक़त छिपी है। लेकिन इसे पाने के लिए मुझे अपना आख़िरी वादा निभाना होगा।”मानव ने पूछा —

    “कौन‑सा वादा?”जिन्न ने धीमी आवाज़ में बताया —

    “जब मुझे कैद किया गया था, मैंने कसम खाई थी कि अगर कभी आज़ाद हुआ तो इंसानों की सबसे बड़ी कमजोरी — लालच — को मिटाऊँगा। लेकिन इसके लिए मुझे अपनी जादुई शक्ति छोड़नी होगी।”मानव चौंक गया। अगर जिन्न अपनी शक्ति छोड़ देगा तो वह साधारण हो जाएगा। लेकिन जिन्न मुस्कुराया और बोला —

    “दोस्ती का असली मतलब यही है, कि हम अपनी ताक़त दूसरों की भलाई के लिए कुर्बान करें।”जैसे ही जिन्न ने अपना वादा निभाया, शहर की दीवारें टूट गईं और नीली रोशनी आसमान में फैल गई। जिन्न अब साधारण इंसान बन चुका था, लेकिन उसकी आँखों में सुकून था। मानव ने समझा कि असली जादू दोस्ती और त्याग में है।🔮 जिन्न और दोस्ती का इम्तिहान जिन्न अब साधारण इंसान बन चुका था। मानव और वह गाँव लौटे, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।गाँव में अचानक एक रहस्यमयी यात्री आया। उसने लोगों को सोने‑चाँदी का लालच दिया और कहा —

    “जो मेरे साथ चलेगा, उसे अमरता मिलेगी।”गाँव के कई लोग उसकी बातों में आ गए। मानव ने जिन्न की ओर देखा। जिन्न ने कहा —

    “यह वही इम्तिहान है जिसका डर मुझे था। इंसानों का लालच हमारी दोस्ती को तोड़ सकता है।”मानव  ने गाँव वालों को समझाने की कोशिश की —

    “अमरता का क्या फ़ायदा, अगर हम अपनी इंसानियत खो दें?”लेकिन यात्री ने चुनौती दी —

    “अगर तुम सच में दोस्त हो, तो साबित करो। जिन्न को मेरे साथ भेज दो, और मैं तुम्हें अमर कर दूँगा।”अब मानव के सामने सबसे कठिन चुनाव था:जिन्न को खो देना और अमरता पाना।या जिन्न को अपने पास रखना और इंसानियत बचाना। मानव ने गहरी साँस ली और कहा —

    “दोस्ती ही मेरी अमरता है। मैं जिन्न को कभी नहीं छोड़ूँगा।”यात्री की जादुई छवि टूट गई। असल में वह शहर का पुराना शाप था, जो लालच के रूप में सामने आया था। मानव और जिन्न ने मिलकर उसे हराया।गाँव वालों ने भी समझा कि असली ताक़त दोस्ती और भरोसे में है।🔮 जिन्न और समय का दरवाज़ा गाँव में शांति लौट आई थी, लेकिन जिन्न और मानव  को एक नई रहस्यमयी गुफ़ा मिली। गुफ़ा के भीतर एक विशाल दरवाज़ा था, जिस पर लिखा था —

    “यह दरवाज़ा अतीत और भविष्य दोनों खोलता है। लेकिन जो इसे खोलेगा, उसे अपने वर्तमान की क़ुर्बानी देनी होगी।”जिन्न ने कहा —

    “अगर हम इसे खोलें, तो हम जान पाएँगे कि मेरी कैद कैसे हुई और तुम्हारा भविष्य कैसा होगा। लेकिन हमें तय करना होगा कि क्या हम अपने आज को खोने का जोखिम उठाएँगे।”मानव  ने दरवाज़े को छुआ। अचानक दृश्य बदल गया।पहले उसने अतीत देखा: जिन्न को लालच और सत्ता के कारण कैद किया गया था।फिर उसने भविष्य देखा: गाँव में एक बड़ा संकट आने वाला है, जिसे रोकने के लिए उन्हें अभी से तैयारी करनी होगी।दरवाज़ा धीरे‑धीरे बंद होने लगा। मानव और जिन्न ने समझा कि समय का असली रहस्य यह है —

    “अतीत से सीखो, भविष्य की चिंता करो, लेकिन सबसे बड़ा जादू वर्तमान में जीना है।”वे दरवाज़े से बाहर निकले और गाँव लौट आए, अब पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत और समझदार।🌪️ जिन्न और गाँव का संकट समय के दरवाज़े से लौटते वक्त मानव  ने भविष्य का संकट देखा था। कुछ ही दिनों बाद वह संकट सच हो गया।गाँव पर भयानक सूखा पड़ा। नदियाँ सूख गईं, खेत बंजर हो गए। लोग घबराने लगे कि अब उनका जीवन कैसे चलेगा।जिन्न ने कहा —

    “मेरे पास अब जादुई ताक़त नहीं है, लेकिन हम सब मिलकर इस संकट को हरा सकते हैं।”मानव और जिन्न ने गाँव वालों को एकजुट किया। उन्होंने मिलकर:पुराने कुओं को फिर से खोला।वर्षा जल को इकट्ठा करने के लिए तालाब बनाए।खेतों में नई तकनीक से खेती शुरू की।गाँव वालों ने समझा कि असली ताक़त जादू में नहीं, बल्कि एकता और मेहनत में है।धीरे‑धीरे बादल लौटे और बारिश हुई। गाँव फिर से हरा‑भरा हो गया। जिन्न ने मुस्कुराकर कहा —

    “अब मैं जानता हूँ कि इंसानियत ही सबसे बड़ा जादू है।”🔮जिन्न और अंतिम रहस्य गाँव में सब कुछ शांत था, लेकिन समय के दरवाज़े से लौटते वक्त जिन्न और मानव ने एक अजीब आवाज़ सुनी। वह आवाज़ कह रही थी —

    “तुमने अतीत देखा, भविष्य जाना, लेकिन असली रहस्य अभी बाकी है।”गुफ़ा की गहराई में एक चमकता हुआ पत्थर था। जिन्न ने उसे पहचान लिया —

    “यह वही पत्थर है, जिसमें मेरी कैद का असली कारण छिपा है।”।जिन्न और मानव ने पत्थर को छुआ। अचानक नीली रोशनी फैल गई और एक आवाज़ गूँजी —

    “जिन्न की असली आज़ादी तभी होगी जब वह अपने दिल की सच्चाई स्वीकार करेगा।”जिन्न ने गहरी साँस ली और कहा —

    “मेरी सच्चाई यह है कि मैं अब जादूगर नहीं रहना चाहता। मैं इंसान बनकर तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ।”पत्थर टूट गया। आसमान में नीली लहरें फैल गईं। जिन्न पूरी तरह आज़ाद हो गया और इंसान के रूप में गाँव का हिस्सा बन गया।गाँव वालों ने उसे अपनाया। पूरी सच्चाई सभी गांव वालों के सामने आई:जिन्न को कैद करने वाले लोग कभी उसके दोस्त हीं थे, लेकिन उन्होंने लालच और डर के कारण उसे धोखा दिया था। पत्थर में यह शाप था कि जब तक कोई इंसान निस्वार्थ भाव से जिन्न का साथ न दे, वह कभी आज़ाद नहीं होगा। मानव ने जिन्न का हाथ थामा और कहा —

    “अब तुम्हें किसी शाप की ज़रूरत नहीं। तुम्हारी आज़ादी मेरी दोस्ती है।”पत्थर टूट गया, नीली रोशनी आसमान में फैल गई। जिन्न पूरी तरह आज़ाद हो गया। लेकिन उसने इंसान बने रहने का फ़ैसला किया, ताकि वह मानव और गाँव वालों के साथ रह सके।गाँव वालों ने देखा कि असली जादू न सोने‑चाँदी में था, न अमरता में — बल्कि दोस्ती, भरोसे और त्याग में।कहानी यहीं पूरी होती है, लेकिन उसका संदेश हमेशा जीवित रहेगा।✨

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    Manoj Divana Namaste Story World

    नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड के लेखक। पाठकों के लिए मनोरंजक और दिल को छू लेने वाली हिंदी कहानियाँ लिखना पसंद करता हूँ।आपका स्वागत है नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड में धन्यवाद 💐💐🌹🌹

  • ट्रेन में पहली मुलाकात

    ट्रेन में पहली मुलाकात

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है

     

    रात के लगभग नौ बजे थे। प्लेटफॉर्म पर हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। स्टेशन की भीड़, चाय वालों की आवाज़ें, बच्चों का शोर और ट्रेनों की सीटी… सब मिलकर एक अजीब-सा शोर बना रहे थे।

     

    रिया अपने सूटकेस के पास खड़ी बार-बार घड़ी देख रही थी।

     

    “हे भगवान! ट्रेन लेट ना हो बस…” उसने धीरे से खुद से कहा।

     

    उसे दिल्ली से मुंबई जाना था। नई नौकरी, नया शहर और नई जिंदगी उसकी राह देख रही थी। मगर उसके चेहरे पर खुशी से ज्यादा घबराहट थी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई “मैडम, एक तरफ हो जाइए… ट्रेन आ रही है।”

     

    रिया जल्दी से किनारे हुई। सामने से राजधानी एक्सप्रेस धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।

     

    वह अपना बैग संभालते हुए अंदर चढ़ गई।

     

    उसकी सीट खिड़की वाली थी। उसने राहत की सांस ली।

     

    “चलो… कम से कम सफर आराम से कट जाएगा।”

     

    वह बैठी ही थी कि तभी एक लड़का जल्दी-जल्दी डिब्बे में आया। उसके हाथ में बैग था और चेहरे पर हल्की घबराहट।

     

    “Excuse me… सीट नंबर 32?”

     

    रिया ने टिकट देखा। “वो सामने वाली है।”

     

    “ओह… थैंक गॉड! मुझे लगा ट्रेन छूट जाएगी।”

     

    लड़का बैठते हुए मुस्कुराया। रिया ने बस हल्का-सा सिर हिला दिया।

     

    कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही। फिर ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी।

     

    खिड़की के बाहर स्टेशन पीछे छूटता जा रहा था। तभी लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया “वैसे… मैं आरव।”

     

    रिया ने थोड़ी झिझक के साथ हाथ मिलाया।

     

    “रिया।”

     

    आरव मुस्कुरा के बोला, “Nice name.”

     

    “Thanks.” रिया ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया। 

     

    फिर दोनों चुप।

     

    कुछ मिनट बाद चाय वाला आया।

     

    “चाय… चाय…”

     

    आरव ने पूछा, “आप लेंगी चाय?”

     

    “नहीं।” रिया ने मना कर दिया। 

     

    “पक्का?” आरव ने कन्फर्म किया। 

     

    “हम्म।” रिया ने बस सर हा में हिला दिया। 

     

    आरव ने दो चाय ले लीं।

     

    एक कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, “ये भारतीय ट्रेनों का नियम है… सफर में चाय जरूरी होती है।”

     

    रिया हँस पड़ी।“आप हर किसी से ऐसे ही बात करते हैं?”

     

    आरव चाय का एक शिप लेकर “नहीं… सिर्फ उनसे जिनका चेहरा बता देता है कि वो बहुत परेशान हैं।”

     

    रिया थोड़ा चौंकी, “मैं परेशान लग रही हूँ?”

     

    “थोड़ी।” आरव चाय पीते हुए खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

     

    रिया ने नजरें खिड़की की तरफ कर लीं।

     

    कुछ पल बाद बोली, “नई नौकरी है… पहली बार घर से इतनी दूर जा रही हूँ।”

     

    “ओह… इसलिए।” आरव चाय खत्म कर के कागज का ग्लास ट्रेन में रखे dasvin में डालते हुए कहा। 

     

    “और आप?” रिया ने पूछा। 

     

    “मैं मुंबई में ही रहता हूँ। ऑफिस के काम से दिल्ली आया था।”

     

    “मतलब आप मुंबई के बारे में सब जानते होंगे?” रिया खुश होकर पूछा। 

     

    आरव खिड़की से बाहर चांद को देखते हुए कहा, “इतना भी नहीं… लेकिन हाँ, वहाँ की बारिश और ट्रैफिक दोनों बहुत खतरनाक हैं।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुराई। धीरे-धीरे बातचीत शुरू हो गई।

     

    कब दो घंटे गुजर गए, पता ही नहीं चला।

     

    आरव बहुत मजाकिया था। उसकी बातों में एक अजीब-सी गर्माहट थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह सालों से उसे जानती हो।

     

    रात गहरी होने लगी थी। डिब्बे की लाइटें धीमी हो चुकी थीं।

     

    रिया ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ने लगी तभी उसका पैर फिसल गया।

     

    “अरे… संभलिए!” आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड के लिए दोनों की नजरें मिलीं। रिया का दिल अजीब-सी तेजी से धड़कने लगा।

     

    “थ… थैंक यू।”

     

    “इतनी जल्दी गिरने की आदत है क्या?”

     

    रिया मुस्कुराई। “नहीं… पहली बार हुआ।”

     

    “अच्छा है। वरना मुझे हर बार हीरो बनना पड़ता।”

     

    रिया हँस पड़ी। उस रात उसे नींद बहुत देर से आई।

     

    पता नहीं क्यों… मगर बार-बार उसका ध्यान सामने वाली सीट पर सोए आरव की तरफ जा रहा था।

     

    सुबह जब उसकी आंख खुली, तो ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर रुकी हुई थी।

     

    आरव खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था।

     

    उसने रिया को देखा और मुस्कुराया।

     

    “Good morning।”

     

    रिया बैठते हुए कहा, “गुड मॉर्निंग।”

     

    “कॉफी?” आरव ने पूछा

     

    “इतनी सुबह?” रिया खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

     

    “मुंबई वालों की सुबह कॉफी से ही शुरू होती है।” आरव काफी वाले को इशारे किया। 

     

    रिया मुस्कुराई। “ठीक है।”

     

    दोनों कॉफी पीते हुए बातें करने लगे।

     

    “वैसे… आपकी फैमिली में कौन-कौन है?” आरव ने पूछा।

     

    रिया खिड़की से बाहर सुबह की सोर देखते हुए कहा, “मम्मी-पापा और छोटा भाई।”

     

    आरव उसके चेहरे को देखते हुए पूछा, “आप सबसे ज्यादा किसके करीब हैं?”

     

    रिया कुछ पल चुप रही। “पापा।”

     

    आरव थोड़ा मुस्कुरा कर पूछा, “और वो आपको इतनी दूर भेजने के लिए मान गए?”

     

    रिया उसकी तरफ देख कर कहा, “नहीं… बहुत मुश्किल से माने। मैंने कहा… अगर इस बार रोक लिया ना… तो शायद मैं जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगी।”

     

    आरव उसे ध्यान से देखता रहा।

     

    “आप बहुत अलग हैं।”

     

    “अलग?”

     

    “हाँ… ज्यादातर लोग डर के आगे रुक जाते हैं। आप डर के बावजूद आगे बढ़ रही हैं।”

     

    रिया पहली बार किसी अजनबी की बात सुनकर इतना अच्छा महसूस कर रही थी।

     

    दोपहर तक दोनों की दोस्ती काफी अच्छी हो चुकी थी।

     

    वे साथ खाना खा रहे थे, साथ हँस रहे थे।

     

    पास बैठी आंटी तक मुस्कुराकर बोलीं, “लगता है सफर में अच्छी दोस्ती हो गई।”

     

    रिया थोड़ा झेंप गई।

     

    आरव हँसते हुए बोला “जी आंटी… ट्रेन वाली दोस्ती।”

     

    “बेटा… कुछ दोस्तियाँ ट्रेन से शुरू होकर जिंदगी तक चली जाती हैं।”

     

    आंटी की बात सुनकर दोनों कुछ पल चुप हो गए।

     

    शाम होने लगी थी।

     

    खिड़की के बाहर आसमान नारंगी रंग में रंग चुका था।

     

    रिया बाहर देखते हुए धीरे से बोली “मुझे ट्रेन का सफर बहुत पसंद है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इसमें लोग कुछ देर के लिए मिलते हैं… और फिर बिछड़ जाते हैं।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “हर कोई बिछड़ता नहीं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मतलब… कुछ लोग दोबारा भी मिलते हैं।”

     

    “और अगर ना मिले तो?”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर धीरे से बोला “तो याद बन जाते हैं।”

     

    उसकी आवाज में कुछ ऐसा था… जो सीधे रिया के दिल में उतर गया।

     

    मुंबई आने में अब सिर्फ दो घंटे बचे थे। रिया को अचानक अजीब-सी बेचैनी होने लगी।

     

    उसे लग रहा था… यह सफर खत्म नहीं होना चाहिए।

     

    तभी आरव बोला “रिया… एक बात पूछूँ?”

     

    “हम्म?” रिया ने सर हिलाया

     

    “क्या हम दोस्त रह सकते हैं?” रिया मुस्कुराई। “इतनी जल्दी परमिशन मांग रहे हो?” 

     

    “क्योंकि कुछ लोग जल्दी अपने लगने लगते हैं।”

     

    रिया का दिल फिर तेज धड़कने लगा।

     

    उसने धीरे से कहा “हाँ… रह सकते हैं।”

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला। “तो नंबर दीजिए।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    “आप बहुत जल्दी करते हैं।”

     

    “ट्रेन में टाइम कम होता है।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    मुंबई स्टेशन आ चुका था।

     

    भीड़ तेजी से उतर रही थी।

     

    रिया अपना सामान संभाल रही थी।

     

    दिल अजीब-सा भारी हो गया था।

     

    स्टेशन पर उतरते ही आरव बोला “कैब बुक कर दूँ?”

     

    “नहीं… मैं कर लूँगी।”

     

    “पक्का?”

     

    “हाँ।”

     

    कुछ सेकंड दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर आरव मुस्कुराया।

     

    “तो… फिर मिलेंगे?”

     

    रिया ने भी मुस्कुराकर कहा “शायद।”

     

    “शायद नहीं… जरूर।”

     

    वह चला गया।

     

    रिया उसे जाते हुए देखती रही।

     

    पता नहीं क्यों… मगर उसकी आंखें उसी भीड़ में बस उसे ही ढूंढ रही थीं।

     

    उस रात नए फ्लैट में बैठी रिया बार-बार फोन देख रही थी।

     

    तभी मैसेज आया “घर पहुँच गई?”

     

    रिया मुस्कुरा दी।

     

    “हाँ।”

     

    “Good. और हाँ… ट्रेन वाली दोस्ती मत भूलना।”

     

    रिया ने जवाब दिया—

     

    “इतनी जल्दी नहीं भूलती मैं।”

     

    उस दिन के बाद दोनों रोज बात करने लगे।

     

    सुबह “Good morning” से शुरू होकर रात “सो जाओ अब” पर खत्म होती।

     

    धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए।

     

    एक दिन बारिश हो रही थी।

     

    रिया ऑफिस से बाहर निकली तो सामने आरव खड़ा था।

     

    “तुम यहाँ?”

     

    “कॉफी पीने चलें?”

     

    “इस बारिश में?”

     

    “मुंबई में बारिश रुकने का इंतजार करोगी तो जिंदगी निकल जाएगी।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    दोनों सड़क किनारे छोटी-सी दुकान पर कॉफी पीने लगे।

     

    बारिश की बूंदें, ठंडी हवा और आरव की बातें…

     

    रिया बस उसे देखती रह गई।

     

    “क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “तुम हर बार कैसे समझ जाते हो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि तुम्हारी आँखें सब बता देती हैं।”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ… वह आरव से प्यार करने लगी है।

     

    मगर उसने कभी कहा नहीं।

     

    उसे डर था।

     

    अगर दोस्ती भी खत्म हो गई तो?

     

    समय गुजरता गया।

     

    एक दिन अचानक आरव का फोन बंद आने लगा।

     

    रिया परेशान हो गई।

     

    पूरा दिन, पूरी रात…

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    तीसरे दिन दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया ने दरवाजा खोला।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    मगर उसके हाथ पर पट्टी बंधी थी।

     

    रिया घबरा गई।

     

    “ये क्या हुआ?!”

     

    आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “छोटा-सा एक्सीडेंट था।”

     

    रिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें अंदाजा है मैं कितनी डर गई थी?!”

     

    आरव उसे बस देखता रहा।

     

    “इतनी फिक्र करती हो मेरी?”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    आरव धीरे से बोला—

     

    “रिया… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

     

    रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “क्या?”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है।”

     

    रिया की सांसें थम गईं।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “उस दिन जब तुम खिड़की के पास बैठी थी ना… तभी समझ गया था… फिर कोई और इस दिल को नहीं भाएगा।”

     

    रिया की आँखें भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    “मैं सच में तुमसे प्यार करता हूँ।”

     

    रिया हँसते हुए रो पड़ी।

     

    “इतना टाइम लगा दिया बोलने में?”

     

    “डर ल

    गता था।”

     

    “मुझे भी।”

     

    “तो अब?”

     

    रिया ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब तो पूरी जिंदगी परेशान करूँगा।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    ठंडी हवा कमरे में आ रही थी।

     

    और रिया बस एक ही बात सोच रही थी—

     

    कुछ मुलाकातें सच में किस्मत लिखती हैं।

     

    क्योंकि ट्रेन में हुई वह पहली मुलाकात…

     

    आज भी उसकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद थी।

     

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • गलती…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अपने हर गुनाह में सौ पर्दे डालकर,

     

    “वो कहते है,”जमाना खराब है”….

     

     

    इंसानों की फितरत ही ऐसी हो गयी है.. खुद चाहे लाख गलत हो पर जब गलती बतलाने की बात आये तो सामने वाला ही गलत होता है हमेशा… 🥹

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇

    जो हमसे दूर हुए..

    हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • पहली मुलाकात

    पहली मुलाकात

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कुकी ने हिम्मत जुटाई और खरगोशों की ओर बढ़ी। “नमस्कार, मैं कुकी हूँ, क्या मैं आपके साथ खेल सकती हूँ?” उसने शर्माते हुए पूछा। खरगोशों ने उसे घूरा और फिर हंसते हुए कहा, “तुम इतनी धीमी हो, हम तुम्हारे साथ कैसे खेल सकते हैं?”

    कुकी का दिल टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। “मैं धीमी हो सकती हूँ, लेकिन मैं आपके साथ खेल का एक नया तरीका ढूंढ सकती हूँ,” उसने कहा। “क्या आप मुझे मौका देंगे?”

    बंटी और चंचल एक-दूसरे की ओर देखे और लम्बी श्वास लेते हुए बंटी ने कहा, “ठीक है, हम तुम्हें एक मौका देंगे। लेकिन तुम्हें हमें ज़रूर दिखाना होगा कि तुम हमारी तरह खेल सकती हो।” चंचल ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, बस हमें दिखाओ कि तुम खेल में कैसे शामिल हो सकती हो।”

    कुकी ने खुशी से सहमति जताई। “धन्यवाद, दोस्तों! मैं पूरी कोशिश करूँगी!” अब कुकी के मन में उत्साह भर गया था। उसने सोच लिया कि उसे अपनी ताकत दिखाने का सही मौका मिल गया है। उसने तुरंत एक योजना बनाई।

    कुकी ने सोचा कि सबसे पहले उन्हें एक ऐसा खेल खेलना चाहिए जिसमें धैर्य और रणनीति दोनों की आवश्यकता हो। “चलो, हम एक तनावपूर्ण दौड़ का आयोजन करते हैं!” उसने प्रस्ताव रखा। “हम दौड़ते हुए एक दूसरे को कुछ संकेत देंगे और उसके अनुसार खेलेंगे।”

    सभी जानवरों को यह विचार पसंद आया क्योंकि इस खेल में उन्हें अंततः अपनी योग्यताओं का इस्तेमाल करने का मौका मिल रहा था। कुकी ने गेम के नियम स्थापित किए:

    1. सभी प्रतिस्पर्धियों को एक निश्चित बिंदु से दौड़ना होगा, जो पूरे जंगल में होगा।
    2. जहाँ भी रास्ते में रुकावट आएगी, उन्हें बिना भागे सही रास्ता ढूंढना होगा।
    3. अंत में, सभी ko मिलकर सुराग भेड़ने होंगे और अपने-अपने रास्ते पर पहुँचने का प्रयास करना होगा।

    “यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है,” कुकी ने कहा। “हमें धैर्य से काम लेना चाहिए और एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। जो भी पहले पहुंचा, उसे विजेता का नाम मिलेगा, लेकिन सच्चा विजेता वो होगा जो दूसरों की मदद करेगा।”

    खरगोशों ने विचार किया और फिर उनमें से बंटी ने कहा, “अच्छा, यह तो दिलचस्प लग रहा है। चलो देखते हैं कि क्या तुम यह कर सकती हो।” चंचल ने भी उत्साहित होते हुए हंसते हुए कहा, “हमें तुम्हारी मदद से यह देखना होगा कि तुम कितनी अच्छी हो!”

    खेल का आरंभ हुआ और सभी जानवर अपने-अपने स्थानों पर खड़े हो गए। कुकी ने सभी को बताना शुरू किया कि उन्हें शुरुआत में क्या करना है। जैसे ही दौड़ शुरू हुई, बंटी और चंचल तेज़ी से दौड़ने लगे। कुकी अपनी धीमी गति के साथ उनके पीछे चलने लगी।

    दौड़ में पहले ही मोड़ पर ज़मीन में गड्ढे थे। बंटी और चंचल ने सर्किट को चिह्नित किया और पहले ही आगे बढ़ गए। लेकिन कुकी ने देखा कि गड्ढों के पास एक ऐसा रास्ता था जो दोनों जानवरों ने नहीं देखा। वह गड्ढों को चकमा देकर उस रास्ते पर चलने लगी।

    जैसे ही वह गड्ढों को पार कर रही थी, उसके मन में एक विचार आया: “यह मेरी धीमी गति का फायदा है!” इसने उसे यह समझने में मदद की कि कभी-कभी धीमे चलने का मतलब यह नहीं होता कि कोई पीछे रह गया है।

    आखिरकार, उसने मोड़ पर पहुँचकर देखा कि बंटी और चंचल एक साथ में खड़े थे और अपने आगे के रास्ते पर विचार कर रहे थे। कुकी ने खुशी-खुशी वहाँ पर पहुँचकर कहा, “मैंने एक और रास्ता देखा जो हमें ज्यादा तेज़ी से आगे बढ़ा सकता है। हमें वहाँ से चलना चाहिए।”

    बंटी और चंचल ने कुकी की बात सुनी और उसका ध्यानपूर्वक गौर किया। “तुम सच में सोच रही हो, कुकी!” बंटी ने कहा। “हम बस अपनी गति में चलने के चक्कर में इसे देख नहीं पाए।” चंचल ने सहमति जताते हुए कहा, “हाँ, चलो देखते हैं कि यह रास्ता हमें कहाँ ले जाता है।”

    कुकी ने संकेत किया और वे सभी मिलकर उस नए रास्ते पर चलने लगे। यह रास्ता थोड़ा कठिन था, लेकिन कुकी की धारणा और उसके धैर्य ने उन्हें जल्दी ही सही दिशा में पहुँचाने में मदद की। जब वे आगे बढ़ रहे थे, तो कुकी ने ध्यान दिया कि रास्ते में कई ऐसे बाधाएँ थीं, जिनका सामना करना पड़ा।

    “हमें एक बड़ा पत्थर पार करना है,” चंचल ने कहा और तुरंत खुद को दौड़कर पत्थर पर चढ़ा दिया। बंटी ने भी उसका अनुसरण किया। लेकिन कुकी अपने धीमे कदमों से पहले झुक गई और सोचने लगी, “क्या मैं इससे आगे निकलने के लिए कोई और उपाय कर सकती हूँ?”

    उसने पत्थर के पीछे झुककर देखा और पाया कि वहाँ एक जगह थी जहाँ से वे पत्थर के चारों ओर जा सकते थे। “दोस्तों, यहाँ एक और रास्ता है!” उसने शोर नहीं मचाते हुए कहा। “यहाँ से हम पत्थर के चारों ओर जा सकते हैं।”

    बंटी और चंचल ने एक पल के लिए उसे घूरा, लेकिन फिर वे उसके साथ उस हिस्से में गए। धीरे-धीरे और सावधानी पूर्वक वे सभी उस नई रूट से आगे बढ़ने लगे। अब उनमें से कोई भी और तेजी से दौड़ नहीं रहा था, बल्कि सभी कुकी की सुझाई दिशा का अनुसरण कर रहे थे।

    जैसे-जैसे दौड़ आगे बढ़ी, कुकी के द्वारा बताई गई हर छोटी सलाह ने उन्हें और अधिक समर्थ बना दिया। उन्होंने समझा कि कुकी की धीमी गति में भी एक विशेषता थी – साहस, धैर्य और सहानुभूति। कुकी ने न केवल अपनी गति से दूसरों को मदद की, बल्कि उसने उन्हें यह भी बताया कि कैसे सहकारिता सबसे महत्वपूर्ण है।

    अब जंगली कौन सा जानवर सबसे तेज दौड़ रहा था, इस पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन्होंने अपनी ताकतों का सही उपयोग करना शुरू कर दिया। जब भी कोई रुकावट आती, वे मिलकर उसे पार कर जाते। कुकी की बुद्धिमता और सृजनात्मकता ने उन्हें उन बाधाओं को पार करने में मदद की जो पहले कठिन लग रही थीं।

    “धन्यवाद, कुकी, तुमने हमें नई रणनीतियों के बारे में बताया!” चंचल ने चहकते हुए कहा। “तुमने साबित कर दिया कि केवल तेज़ दौड़ने से ही नहीं, दोस्तों को मदद कर के भी हम जीत सकते हैं।”

    आख़िरकार, जब वे दौड़ समाप्त करने के करीब पहुँच गए, एक तेज़ झरने का भाग उनके सामने आया। बंटी और चंचल थोड़े चिंतित दिखे। “हम इसे कैसे पार करेंगे? हम तैर नहीं सकते!” बंटी ने कहा।

    कुकी ने सोचा और फिर कहा, “हम इसे एक-दूसरे की मदद से पार कर सकते हैं। तुम दोनों उस ओर कूदो, मैं तुम्हें एक मजबूत तने से पकड़ने में मदद करूँगी।”

    बंटी और चंचल ने एकजुट होकर काम किया और कुकी की योजना के अनुसार पहुँच गए। कुकी ने धीरे-धीरे तने पर चढ़ाई की और अंत में दोनों को सुरक्षित पार कर दिया। अब उन्हें एक पल के लिए कुकी की योजना के बिना जीत की कोई उम्मीद नहीं

     

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • तारों और जुगनू

    तारों और जुगनू

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

     

     

     

     

    जंगल में एक छोटा सा जुगनू रहता था जिसका नाम था चमकी। चमकी बहुत चंचल था और हमेशा आसमान के तारे देखने की चाह में रहता था। उसे रात में आसमान में चमकते हुए तारे बहुत पसंद थे। चमकी हर रात अपनी छोटी-सी रोशनी के साथ जंगल में उड़ता और तारे देखने का आनंद लेता। लेकिन एक चीज उसे हमेशा परेशान करती थी—क्योंकि वह जानता था कि वह बहुत छोटा आहे, और उसकी चमक तारे के मुकाबले बहुत छोटी थी।

     

    एक रात, चमकी ने शांति से आसमान की ओर देखा। उसने एक तारे को बहुत करीब से देखा और वह बड़ा और चमकीला लग रहा था। उसने सोचा, “कितना अच्छा होगा अगर मैं भी ऐसा चमकदार और बड़ा बना पाऊँ।” लेकिन उसे यह सोचकर बहुत दुःख हुआ कि उसकी रोशनी तो बहुत छोटी है। “मेरी रोशनी किसी को नहीं दिखती,” उसने उदासी से सोचा।

     

    चमकी ने अपनी दुखी मनोदशा को समाप्त करने का निर्णय किया। उसने सोचा, “अगर मैं खुद को बदल नहीं सकता, तो मुझे अपनी चमक को पहचानने की कोशिश करनी पड़ेगी। मुझे अपनी चमक को अधिकतम करने के लिए परिश्रम करना होगा।” ऐसा सोचकर, उसने अपने आप को प्रेरित किया और अपने दोस्तों से बात करने का प्रस्ताव दिया। 

     

    उसने अपने दोस्तों से, जैसे तितली, गेंदे का फूल, और अन्य छोटे जीवों से मदद मांगी। सब उसे हंसते हुए सुन रहे थे, बताने लगे, “तुम तो बस एक जुगनू हो, क्या तुम तारे के समान चमक सकती हो?” हालांकि, चमकी ने अपने भीतर की आशा को नहीं छोड़ा। वह समझता था कि हर कोई अपनी विशेषता के साथ अद्वितीय होता है। 

     

    एक दिन, चांद की रोशनी में, उसने अपने दोस्तों को इकट्ठा किया और कहा, “मैं चाहूँगा कि मैं एक रात में चमकने के लिए अपनी पूरी कोशिश करूँ। मैं आकाश के तारे की तरह चमकने की कोशिश करूंगा।” उसने अपने दोस्तों से समर्थन मांगते हुए कहा कि वह एक शक्तिशाली रोशनी उत्पन्न कर सकता है, अगर वे उसकी सहायता करें।

     

    उसके दोस्तों ने उसकी सहयोग की बात सुनी और उसे प्रेरित किया। रंग-बिरंगी तितलियाँ उसके चारों ओर उड़ने लगीं और गेंदे का फूल भी चमकी को प्रोत्साहित करने लगा। सबने कहा, “हम तुम्हारे साथ हैं, चमकी! तुम कर सकते हो!”

     

    तब चमकी ने अपने एक दोस्त, एक साधारण कागज के फूल से भी मदद मांगी। उसने कहा, “अगर तुम मेरे साथ रहोगे, तो मैं तुम्हारी सहायता से अपनी रोशनी को और तेज़ कर सकूँगा।” फूल ने समझाया, “मैं जुगनू में विश्वास करता हूँ। तुम्हारी रोशनी की उत्तमता तुम्हारे भीतर ही है, बस तुम्हें उसे ढूंढना है।”

     

    उस रात, सबने मिलकर एक योजना बनाई। जुगनू ने सोचा, “यदि मैं अपनी रोशनी को चमकाने के लिए खुले आसमान में उड़ता रहूँगा और अपने दिल की गहराइयों से चमकूँगा, तो शायद मैं सच में चमक सकता हूँ।” उसने अपने दोस्तों के सहयोग से एक बड़े वृक्ष के नीचे एक मंडली बनाई, जहाँ सभी ने अपनी रोशनी और रंग-बिरंगे पंख फैलाए।

     

    चमकी ने पेड़ की शाखाओं पर बैठकर अपनी पूरी ताकत लगाई। वह अपनी पंखों को झपकाने लगा, और धीरे-धीरे उसकी चमक बढ़ने लगी। उसके दोस्तों ने उसका उत्साह बढ़ाया और चारों ओर से उसका समर्थन किया। सभी ने मिलकर एक सुंदर प्रदान दिया, और चमकी की रोशनी आसमान में फैलने लगी। धीरे-धीरे, चमकी ने अपनी रोशनी

    का समर्पण किया,

     

    Lakshmi Kumari 

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    Lakshmi Kumari

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