🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

ट्रेन में पहली मुलाकात

पढ़ने का समय : 9 मिनट

 

ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है

 

रात के लगभग नौ बजे थे। प्लेटफॉर्म पर हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। स्टेशन की भीड़, चाय वालों की आवाज़ें, बच्चों का शोर और ट्रेनों की सीटी… सब मिलकर एक अजीब-सा शोर बना रहे थे।

 

रिया अपने सूटकेस के पास खड़ी बार-बार घड़ी देख रही थी।

 

“हे भगवान! ट्रेन लेट ना हो बस…” उसने धीरे से खुद से कहा।

 

उसे दिल्ली से मुंबई जाना था। नई नौकरी, नया शहर और नई जिंदगी उसकी राह देख रही थी। मगर उसके चेहरे पर खुशी से ज्यादा घबराहट थी।

 

तभी पीछे से आवाज आई “मैडम, एक तरफ हो जाइए… ट्रेन आ रही है।”

 

रिया जल्दी से किनारे हुई। सामने से राजधानी एक्सप्रेस धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।

 

वह अपना बैग संभालते हुए अंदर चढ़ गई।

 

उसकी सीट खिड़की वाली थी। उसने राहत की सांस ली।

 

“चलो… कम से कम सफर आराम से कट जाएगा।”

 

वह बैठी ही थी कि तभी एक लड़का जल्दी-जल्दी डिब्बे में आया। उसके हाथ में बैग था और चेहरे पर हल्की घबराहट।

 

“Excuse me… सीट नंबर 32?”

 

रिया ने टिकट देखा। “वो सामने वाली है।”

 

“ओह… थैंक गॉड! मुझे लगा ट्रेन छूट जाएगी।”

 

लड़का बैठते हुए मुस्कुराया। रिया ने बस हल्का-सा सिर हिला दिया।

 

कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही। फिर ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी।

 

खिड़की के बाहर स्टेशन पीछे छूटता जा रहा था। तभी लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया “वैसे… मैं आरव।”

 

रिया ने थोड़ी झिझक के साथ हाथ मिलाया।

 

“रिया।”

 

आरव मुस्कुरा के बोला, “Nice name.”

 

“Thanks.” रिया ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया। 

 

फिर दोनों चुप।

 

कुछ मिनट बाद चाय वाला आया।

 

“चाय… चाय…”

 

आरव ने पूछा, “आप लेंगी चाय?”

 

“नहीं।” रिया ने मना कर दिया। 

 

“पक्का?” आरव ने कन्फर्म किया। 

 

“हम्म।” रिया ने बस सर हा में हिला दिया। 

 

आरव ने दो चाय ले लीं।

 

एक कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, “ये भारतीय ट्रेनों का नियम है… सफर में चाय जरूरी होती है।”

 

रिया हँस पड़ी।“आप हर किसी से ऐसे ही बात करते हैं?”

 

आरव चाय का एक शिप लेकर “नहीं… सिर्फ उनसे जिनका चेहरा बता देता है कि वो बहुत परेशान हैं।”

 

रिया थोड़ा चौंकी, “मैं परेशान लग रही हूँ?”

 

“थोड़ी।” आरव चाय पीते हुए खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

 

रिया ने नजरें खिड़की की तरफ कर लीं।

 

कुछ पल बाद बोली, “नई नौकरी है… पहली बार घर से इतनी दूर जा रही हूँ।”

 

“ओह… इसलिए।” आरव चाय खत्म कर के कागज का ग्लास ट्रेन में रखे dasvin में डालते हुए कहा। 

 

“और आप?” रिया ने पूछा। 

 

“मैं मुंबई में ही रहता हूँ। ऑफिस के काम से दिल्ली आया था।”

 

“मतलब आप मुंबई के बारे में सब जानते होंगे?” रिया खुश होकर पूछा। 

 

आरव खिड़की से बाहर चांद को देखते हुए कहा, “इतना भी नहीं… लेकिन हाँ, वहाँ की बारिश और ट्रैफिक दोनों बहुत खतरनाक हैं।”

 

रिया हल्का-सा मुस्कुराई। धीरे-धीरे बातचीत शुरू हो गई।

 

कब दो घंटे गुजर गए, पता ही नहीं चला।

 

आरव बहुत मजाकिया था। उसकी बातों में एक अजीब-सी गर्माहट थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह सालों से उसे जानती हो।

 

रात गहरी होने लगी थी। डिब्बे की लाइटें धीमी हो चुकी थीं।

 

रिया ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ने लगी तभी उसका पैर फिसल गया।

 

“अरे… संभलिए!” आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

 

कुछ सेकंड के लिए दोनों की नजरें मिलीं। रिया का दिल अजीब-सी तेजी से धड़कने लगा।

 

“थ… थैंक यू।”

 

“इतनी जल्दी गिरने की आदत है क्या?”

 

रिया मुस्कुराई। “नहीं… पहली बार हुआ।”

 

“अच्छा है। वरना मुझे हर बार हीरो बनना पड़ता।”

 

रिया हँस पड़ी। उस रात उसे नींद बहुत देर से आई।

 

पता नहीं क्यों… मगर बार-बार उसका ध्यान सामने वाली सीट पर सोए आरव की तरफ जा रहा था।

 

सुबह जब उसकी आंख खुली, तो ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर रुकी हुई थी।

 

आरव खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था।

 

उसने रिया को देखा और मुस्कुराया।

 

“Good morning।”

 

रिया बैठते हुए कहा, “गुड मॉर्निंग।”

 

“कॉफी?” आरव ने पूछा

 

“इतनी सुबह?” रिया खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

 

“मुंबई वालों की सुबह कॉफी से ही शुरू होती है।” आरव काफी वाले को इशारे किया। 

 

रिया मुस्कुराई। “ठीक है।”

 

दोनों कॉफी पीते हुए बातें करने लगे।

 

“वैसे… आपकी फैमिली में कौन-कौन है?” आरव ने पूछा।

 

रिया खिड़की से बाहर सुबह की सोर देखते हुए कहा, “मम्मी-पापा और छोटा भाई।”

 

आरव उसके चेहरे को देखते हुए पूछा, “आप सबसे ज्यादा किसके करीब हैं?”

 

रिया कुछ पल चुप रही। “पापा।”

 

आरव थोड़ा मुस्कुरा कर पूछा, “और वो आपको इतनी दूर भेजने के लिए मान गए?”

 

रिया उसकी तरफ देख कर कहा, “नहीं… बहुत मुश्किल से माने। मैंने कहा… अगर इस बार रोक लिया ना… तो शायद मैं जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगी।”

 

आरव उसे ध्यान से देखता रहा।

 

“आप बहुत अलग हैं।”

 

“अलग?”

 

“हाँ… ज्यादातर लोग डर के आगे रुक जाते हैं। आप डर के बावजूद आगे बढ़ रही हैं।”

 

रिया पहली बार किसी अजनबी की बात सुनकर इतना अच्छा महसूस कर रही थी।

 

दोपहर तक दोनों की दोस्ती काफी अच्छी हो चुकी थी।

 

वे साथ खाना खा रहे थे, साथ हँस रहे थे।

 

पास बैठी आंटी तक मुस्कुराकर बोलीं, “लगता है सफर में अच्छी दोस्ती हो गई।”

 

रिया थोड़ा झेंप गई।

 

आरव हँसते हुए बोला “जी आंटी… ट्रेन वाली दोस्ती।”

 

“बेटा… कुछ दोस्तियाँ ट्रेन से शुरू होकर जिंदगी तक चली जाती हैं।”

 

आंटी की बात सुनकर दोनों कुछ पल चुप हो गए।

 

शाम होने लगी थी।

 

खिड़की के बाहर आसमान नारंगी रंग में रंग चुका था।

 

रिया बाहर देखते हुए धीरे से बोली “मुझे ट्रेन का सफर बहुत पसंद है।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि इसमें लोग कुछ देर के लिए मिलते हैं… और फिर बिछड़ जाते हैं।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“हर कोई बिछड़ता नहीं।”

 

रिया ने उसकी तरफ देखा।

 

“मतलब?”

 

“मतलब… कुछ लोग दोबारा भी मिलते हैं।”

 

“और अगर ना मिले तो?”

 

आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

 

फिर धीरे से बोला “तो याद बन जाते हैं।”

 

उसकी आवाज में कुछ ऐसा था… जो सीधे रिया के दिल में उतर गया।

 

मुंबई आने में अब सिर्फ दो घंटे बचे थे। रिया को अचानक अजीब-सी बेचैनी होने लगी।

 

उसे लग रहा था… यह सफर खत्म नहीं होना चाहिए।

 

तभी आरव बोला “रिया… एक बात पूछूँ?”

 

“हम्म?” रिया ने सर हिलाया

 

“क्या हम दोस्त रह सकते हैं?” रिया मुस्कुराई। “इतनी जल्दी परमिशन मांग रहे हो?” 

 

“क्योंकि कुछ लोग जल्दी अपने लगने लगते हैं।”

 

रिया का दिल फिर तेज धड़कने लगा।

 

उसने धीरे से कहा “हाँ… रह सकते हैं।”

 

आरव ने तुरंत फोन निकाला। “तो नंबर दीजिए।”

 

रिया हँस पड़ी।

 

“आप बहुत जल्दी करते हैं।”

 

“ट्रेन में टाइम कम होता है।”

 

दोनों हँस पड़े।

 

मुंबई स्टेशन आ चुका था।

 

भीड़ तेजी से उतर रही थी।

 

रिया अपना सामान संभाल रही थी।

 

दिल अजीब-सा भारी हो गया था।

 

स्टेशन पर उतरते ही आरव बोला “कैब बुक कर दूँ?”

 

“नहीं… मैं कर लूँगी।”

 

“पक्का?”

 

“हाँ।”

 

कुछ सेकंड दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।

 

फिर आरव मुस्कुराया।

 

“तो… फिर मिलेंगे?”

 

रिया ने भी मुस्कुराकर कहा “शायद।”

 

“शायद नहीं… जरूर।”

 

वह चला गया।

 

रिया उसे जाते हुए देखती रही।

 

पता नहीं क्यों… मगर उसकी आंखें उसी भीड़ में बस उसे ही ढूंढ रही थीं।

 

उस रात नए फ्लैट में बैठी रिया बार-बार फोन देख रही थी।

 

तभी मैसेज आया “घर पहुँच गई?”

 

रिया मुस्कुरा दी।

 

“हाँ।”

 

“Good. और हाँ… ट्रेन वाली दोस्ती मत भूलना।”

 

रिया ने जवाब दिया—

 

“इतनी जल्दी नहीं भूलती मैं।”

 

उस दिन के बाद दोनों रोज बात करने लगे।

 

सुबह “Good morning” से शुरू होकर रात “सो जाओ अब” पर खत्म होती।

 

धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए।

 

एक दिन बारिश हो रही थी।

 

रिया ऑफिस से बाहर निकली तो सामने आरव खड़ा था।

 

“तुम यहाँ?”

 

“कॉफी पीने चलें?”

 

“इस बारिश में?”

 

“मुंबई में बारिश रुकने का इंतजार करोगी तो जिंदगी निकल जाएगी।”

 

रिया हँस पड़ी।

 

दोनों सड़क किनारे छोटी-सी दुकान पर कॉफी पीने लगे।

 

बारिश की बूंदें, ठंडी हवा और आरव की बातें…

 

रिया बस उसे देखती रह गई।

 

“क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

 

“कुछ नहीं।”

 

“झूठ।”

 

“तुम हर बार कैसे समझ जाते हो?”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“क्योंकि तुम्हारी आँखें सब बता देती हैं।”

 

रिया चुप हो गई।

 

उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ… वह आरव से प्यार करने लगी है।

 

मगर उसने कभी कहा नहीं।

 

उसे डर था।

 

अगर दोस्ती भी खत्म हो गई तो?

 

समय गुजरता गया।

 

एक दिन अचानक आरव का फोन बंद आने लगा।

 

रिया परेशान हो गई।

 

पूरा दिन, पूरी रात…

 

कोई जवाब नहीं।

 

तीसरे दिन दरवाजे की घंटी बजी।

 

रिया ने दरवाजा खोला।

 

सामने आरव खड़ा था।

 

मगर उसके हाथ पर पट्टी बंधी थी।

 

रिया घबरा गई।

 

“ये क्या हुआ?!”

 

आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

 

“छोटा-सा एक्सीडेंट था।”

 

रिया की आँखों में आँसू आ गए।

 

“तुम्हें अंदाजा है मैं कितनी डर गई थी?!”

 

आरव उसे बस देखता रहा।

 

“इतनी फिक्र करती हो मेरी?”

 

रिया चुप हो गई।

 

आरव धीरे से बोला—

 

“रिया… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

 

रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

“क्या?”

 

आरव उसके करीब आया।

 

“ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है।”

 

रिया की सांसें थम गईं।

 

आरव मुस्कुराया।

 

“उस दिन जब तुम खिड़की के पास बैठी थी ना… तभी समझ गया था… फिर कोई और इस दिल को नहीं भाएगा।”

 

रिया की आँखें भर आईं।

 

“आरव…”

 

“मैं सच में तुमसे प्यार करता हूँ।”

 

रिया हँसते हुए रो पड़ी।

 

“इतना टाइम लगा दिया बोलने में?”

 

“डर ल

गता था।”

 

“मुझे भी।”

 

“तो अब?”

 

रिया ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“अब कहीं मत जाना।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“अब तो पूरी जिंदगी परेशान करूँगा।”

 

रिया हँस पड़ी।

 

बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

 

ठंडी हवा कमरे में आ रही थी।

 

और रिया बस एक ही बात सोच रही थी—

 

कुछ मुलाकातें सच में किस्मत लिखती हैं।

 

क्योंकि ट्रेन में हुई वह पहली मुलाकात…

 

आज भी उसकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद थी।

 

 

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *