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टैग: प्यार

  • आत्मग्लानि भाग 4

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    अब तक आपने पढ़ा :-

    कुछ दिनों की छुट्टी ले ली थी रीया ने स्कूल से क्योंकि मन तो वैसे ही खिन्न हो गया था उसका संजय व्यास जी की अनदेखी से इससे बेहतर उसने घर रहकर खुद को अपने परिवार के साथ रहना सही समझा, 

    अब आगे :

    और जल्दी ही संजय व्यास जी को अपना बनाने की कोशिश करेगी यह सोचकर खुद को शांत किया ।

    इधर संजय जी को फर्क तो नहीं पड़ रहा था रीया के आने या ना जाने से लेकिन स्कूल में एक छात्रा के साथ नाम जुड़ना एक बहुत ही शर्मनाक बात थी जिससे वो परेशान रहने लगे, एक शाम वो थके हुए से घर पहुंचे और सोफे पर टाई ढी़ली करते हुए आंखों को बंद करके बैठे रहे तभी उनके माथे पर उंगलियों के पोरों से हल्की सी मालिश महसूस हुई और संजय जी के होंठों पर मुस्कान आ गई और उन्होंने अपनी आंखों को खोलकर अपने सर के ऊपर गर्दन घुमाकर देखा तो उनकी बीवी होंठों पर मुस्कान सजाये उन्हें ही देखते दिखाई दी और हौले से संजय जी के माथे पर अपने होंठ रख दिए जिससे संजय जी के होंठों पर मुस्कान आ गई और उन्होंने अपनी आंखों को सुकून से बंद कर दिया है कुछ सेकंड बाद खोलकर अपनी बीवी को अपने नजदीक बैठा लिया और उनके कोमल चेहरे को देखने लगे जो प्रेग्नेंसी की वजह से थकान से चूर चूर लग रहा था, उन्होंने अपनी हथेलियों में उनका चेहरा थाम लिया और प्रेम से उसे देखने लगे, और बोले – ” संध्या तुम्हारे बिना मैं अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता “, अगर तुम मेरी जिंदगी में शामिल नहीं होती तो न जाने मैं अपने होशोहवास कब का खोकर दर-बदर भटक रहा होता , “संध्या तुम मेरी जिंदगी में सुनहरी सुबह बनकर आई और मेरी जिंदगी में बहार हो गई ” मैं खुशनसीब हूं जो तुम संग मेरी जिंदगी है और अब हम दो से तीन होने वाले हैं “…।।

    संजय जी की बात सुनकर संध्या मुस्कुरा दी और बोली आप परेशान लग रहें हैं कुछ हुआ है क्या, संजय जी इस बात पर चुप हो गए और बोले ” नहीं ! कुछ नहीं हुआ है। भला क्या होगा, तुम ज्यादा मत सोचो, तुम्हारे और हमारे बच्चे के लिए ठीक नहीं है , और अपने होंठ संध्या के माथे पर रखकर पीछे हो गये, संध्या! जिसे कुछ कहना था उनके हल्के से चुम्बन से शांत हो गई और मुस्कुराते हुए उन्हें देखने लगी और बोली ” मैं जानती इस अवस्था में आपकी परेशानियों की भागीदार नहीं बनाना चाहते आप मुझे, लेकिन याद रखना कोई बात हो जो आपको परेशान कर रही है तो प्लीज़ मुझे बता दीजियेगा, हम साथ मिलकर हल कर सकते हैं हर परिस्थिति का., संजय जी ने स्नेह से संध्या को गले लगा लिया और बोले मैं जानता हूं मेरी अर्धांगिनी, तुम चिंता मत करो सब ठीक है…..।।

  • Dil sabhal ja jara part – 1

    Dil sabhal ja jara part – 1

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 1 khoi Hui pahchan 

    हिमाचल की ऊंची पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा कस्बा था, जहां सर्दियों में कोहरा इतना घना होता कि दिन में भी रात जैसा लगता। इसी कस्बे के बाहरी इलाके में एक पुराना अनाथ आश्रम था – “संत जोसेफ बालिका आश्रम”। इमारत पुरानी थी, दीवारें जगह-जगह से सीलन खा चुकी थीं, और छत पर टपकती बारिश की बूंदें रात-रात भर संगीत बजाती रहतीं।

    उस रात भी बारिश हो रही थी। तेज़ हवा खिड़कियों को हिला रही थी, और बूंदें छत से टप-टप करके नीचे गिर रही थीं। प्रिया अपनी पतली सी कंबल ओढ़े बिस्तर पर लेटी थी। उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। उसके दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था – आज स्कॉलरशिप का रिजल्ट आएगा। अगर मिल गई तो शिमला के बड़े कॉलेज में एडमिशन हो जाएगा। अगर नहीं मिली तो… तो फिर यही आश्रम, यही पुरानी किताबें, यही छोटी सी दुनिया।

    प्रिया अठारह साल की थी। लंबी, पतली, गेहुंआ रंग, और आंखें इतनी बड़ी कि लगता था सारी उदासी उनमें समा गई हो। आश्रम की पचास लड़कियों में वो सबसे स्मार्ट थी। टॉप करती थी हर एग्जाम में, लेकिन सबसे चुप भी थी। वो कभी शोर नहीं मचाती, कभी शिकायत नहीं करती। बस पढ़ती रहती। किताबें उसकी सबसे अच्छी दोस्त थीं।

    “प्रिया… उठ ना बेटी, सुबह की प्रेयर हो रही है,” सुलेखा आंटी की धीमी लेकिन प्यार भरी आवाज़ आई। सुलेखा आंटी आश्रम की वार्डन थीं। पचास के करीब उम्र, लेकिन चेहरा इतना शांत कि देखते ही मन को सुकून मिलता। प्रिया उनके लिए मां थीं – असली मां नहीं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा।

    प्रिया ने धीरे से कंबल हटाई और उठ बैठी। कमरे में दस बिस्तर थे, दस लड़कियां सो रही थीं। वो सबसे कोने वाले बिस्तर पर सोती थी, खिड़की के पास। उसे खिड़की से बाहर देखना अच्छा लगता था। पहाड़, पेड़, कोहरा – सब कुछ इतना शांत।

    वो उठी, जल्दी से चेहरा धोया। ठंडा पानी चेहरे पर पड़ते ही सिहरन हुई। फिर अपनी छोटी सी अलमारी खोली। अलमारी में बस तीन सलवार-कमीज, दो स्वेटर, और एक डायरी थी। वो डायरी निकाली। उसमें सिर्फ एक पेज भरा हुआ था। बाकी पेज खाली थे, जैसे उसकी जिंदगी।

    उस पेज पर एक पुरानी फोटो चिपकी थी। फोटो में एक चार-पांच साल की छोटी लड़की थी, गुलाबी फ्रॉक पहने, किसी बड़े बगीचे में झूला झूल रही थी। बगीचे में फूलों की क्यारियां थीं, दूर एक बड़ा सा बंगला दिख रहा था। लड़की हंस रही थी, लेकिन उसकी आंखें… प्रिया की आंखें। फोटो के नीचे किसी ने पेंसिल से लिखा था – “तेरा नाम प्रिया है, लेकिन ये घर तेरा नहीं रहा।”
    ये फोटो प्रिया को तेरह साल पहले मिली थी। जब वो पांच साल की थी, तब किसी ने आश्रम के गेट पर उसे छोड़ दिया था। साथ में बस ये फोटो और एक छोटा सा सोने का पेंडेंट था – एक अनोखा डिजाइन, जिस पर “P” लिखा था। पेंडेंट अब भी उसके गले में था। वो कभी नहीं उतारती थी।

    प्रिया ने फोटो को छुआ। उंगलियां कांप रही थीं। “मैं कौन हूं?” ये सवाल उसके अंदर इतना गहरा था कि कभी-कभी रातों में नींद उड़ा देता। आश्रम की बाकी लड़कियां भी अनाथ थीं, लेकिन कम से कम उन्हें याद था कि उनके माता-पिता कैसे थे, कैसे मरे। प्रिया को कुछ याद नहीं। बस एक धुंधली सी याद – किसी की गोद, किसी की लोरी, और फिर अंधेरा।

    “प्रिया, देर हो रही है,” सुलेखा आंटी ने फिर पुकारा। प्रिया ने डायरी बंद की और प्रेयर रूम की ओर चल दी। प्रेयर रूम छोटा सा था, दीवार पर यीशु की तस्वीर, और नीचे सब लड़कियां घुटनों पर बैठी थीं। प्रिया भी बैठ गई। प्रेयर शुरू हुई। सुलेखा आंटी ने बाइबिल से एक वचन पढ़ा – “भगवान तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता।”
    प्रिया ने आंखें बंद कीं। मन ही मन प्रार्थना की – “भगवान, आज स्कॉलरशिप मिल जाए। मुझे बाहर की दुनिया देखनी है। मुझे अपनी पहचान ढूंढनी है।”
    प्रेयर के बाद नाश्ता। सादा – रोटी, आलू की सब्जी, और चाय। प्रिया ने जल्दी-जल्दी खाया और स्कूल के लिए निकल पड़ी। स्कूल आधा किलोमीटर दूर था। रास्ते में बारिश रुक चुकी थी, लेकिन कीचड़ था। प्रिया ने अपने पुराने जूते सावधानी से रखे। जूते फटने की कगार पर थे।
    स्कूल में आज आखिरी पेपर था – इंग्लिश। प्रिया ने अच्छा लिखा। पेपर देकर जब बाहर निकली तो दिल तेज़ धड़क रहा था। अब बस रिजल्ट का इंतज़ार। स्कूल से लौटते वक्त वो आश्रम के पुराने लैंडलाइन के पास रुकी। आश्रम में सिर्फ एक फोन था, वो भी वार्डन रूम में।

    लेकिन स्कॉलरशिप का रिजल्ट ईमेल पर आने वाला था। प्रिया ने सुलेखा आंटी से कहा था कि वो चेक कर लें।
    आश्रम पहुंचते ही वो सीधे वार्डन रूम में गई। सुलेखा आंटी कंप्यूटर पर थीं – पुराना कंप्यूटर, जो कभी-कभी हैंग हो जाता।

    “आंटी… रिजल्ट?” प्रिया की आवाज़ कांपी।
    सुलेखा आंटी ने मुस्कुराते हुए स्क्रीन घुमाई। वहां लिखा था – “Congratulations, Priya Sharma. You have been selected for full scholarship at Shimla Women’s College. Admission confirmed.”

    प्रिया की आंखें भर आईं। वो चीखना चाहती थी, कूदना चाहती थी, लेकिन बस खड़ी रह गई। सुलेखा आंटी ने उसे गले लगा लिया। “बधाई हो बेटी। तूने कर दिखाया।”
    प्रिया ने रोते हुए कहा, “आंटी… मैं जा रही हूं ना? सच में?”

    “हां बेटी। अगले हफ्ते से सेशन शुरू। तुझे हॉस्टल मिल जाएगा।”
    शाम को आश्रम में उत्सव सा माहौल था। लड़कियां इकट्ठी हुईं। किसी ने गाना गाया, किसी ने नाच दिखाया। छोटी मीरा – दस साल की नटखट लड़की – प्रिया के पास आई और बोली, “प्रिया दीदी, तुम कॉलेज जाओगी तो हमें भूल मत जाना। तुम तो स्टार बनोगी ना? डॉक्टर या इंजीनियर?”

    प्रिया ने मीरा को गोद में उठाया और कहा, “नहीं भूलूंगी। और स्टार तो तुम सब बनोगी। मैं बस पढ़ने जा रही हूं।”
    लेकिन अंदर से प्रिया उदास थी। आश्रम उसकी दुनिया था। यहां सब उसे जानते थे, प्यार करते थे। बाहर की दुनिया? वो नहीं जानती थी। वहां लोग कैसे होंगे? क्या वो उसे अपनाएंगे? एक अनाथ लड़की को, जिसके पास न फैमिली है, न बैकग्राउंड।

    रात को सब सो गए। प्रिया फिर खिड़की के पास बैठी। उसने पेंडेंट को छुआ। सोने की चेन ठंडी थी। “मां… पापा… तुम कहां हो?” उसने मन ही मन पूछा। फोटो फिर निकाली। उस बगीचे को देखा। वो घर… क्या वो उसका था कभी? क्यों छोड़ा गया उसे?
    सुलेखा आंटी रात को उसके पास आईं। “सो नहीं रही?”
    “नहीं आंटी। डर लग रहा है।”

    “डर तो लगेगा बेटी। नई जगह, नए लोग। लेकिन याद रख, तेरी ताकत तेरे अंदर है। तेरी पहचान बाहर के लोग नहीं बताएंगे। तू खुद ढूंढेगी।”
    प्रिया ने सिर हिलाया। लेकिन दिल में सवाल फिर गूंजा – अगर पहचान ही खो गई तो कैसे ढूंढूंगी?

    अगले कुछ दिन तैयारी में बीते। कपड़े सिले गए – दो नई सलवार-कमीज। किताबें पैक की गईं। सुलेखा आंटी ने कुछ पैसे दिए – अपनी सेविंग से। “खर्चा करना बेटी।”
    आखिरकार वो दिन आया। सुबह-सुबह बस स्टेशन। प्रिया का बैग छोटा सा था – दो जोड़ी कपड़े, एक स्वेटर, कुछ किताबें, डायरी, और वो फोटो। सुलेखा आंटी और सारी लड़कियां छोड़ने आईं। मीरा रो रही थी। “दीदी मत जाओ।”

    प्रिया ने सबको गले लगाया। सुलेखा आंटी की आंखें भी नम थीं। “ज्यादा मत सोचना बेटी। बस पढ़ाई पर ध्यान देना। और हफ्ते में एक फोन जरूर करना।”
    बस आई। प्रिया चढ़ी। खिड़की से हाथ हिलाया। बस चली। आश्रम पीछे छूटता गया। पहाड़ियां आगे बढ़ती गईं। शिमला की ओर। नई जिंदगी की ओर।
    बस में प्रिया खिड़की सीट पर थी। बाहर का नजारा देख रही थी। पेड़, नदियां, गांव। दिल में उत्साह था, लेकिन डर भी। तभी उसका फोन बजा। आश्रम में फोन नहीं था, लेकिन सुलेखा आंटी ने एक पुराना नोकिया दिया था – सिर्फ कॉल के लिए।

    अनजान नंबर से फोन आया, प्रिया ने हेलो कहा।
    दूसरी तरफ से एक भारी, डरी हुई आवाज़ आई – “प्रिया? तुम्हें याद है वो रात? जिस रात तुम्हें छोड़ा गया था? कॉलेज मत जाना। आना मत शिमला। वरना… वरना सब खतरे में पड़ जाएगा।”

    आवाज़ कट गई। प्रिया का फोन हाथ से छूटते-छूटते बचा। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। कौन था वो? कैसे जानता था उसका नाम? वो रात… कौन सी रात?
    बस आगे बढ़ रही थी। शिमला करीब आ रहा था। लेकिन अब प्रिया को लगा – उसका नया सफर खुशी का नहीं, खतरे का शुरुआत है।

     

  • आखिरी कॉल

    आखिरी कॉल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    दिल्ली की तेज़-तर्रार ज़िंदगी में हर रोज़ नए किस्से और कहानियाँ घटित होती हैं। मोहिनी एक साधारण सी लड़की थी, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी। उसकी ज़िंदगी में एक खास इंसान था – सूरज। सूरज उसके कॉलेज का साथी था, जो उसके लिए केवल एक दोस्त नहीं, बल्कि जीवन के हर उतार-चढ़ाव में उसका सहारा था।

     

    दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। मोहिनी को सूरज की मुस्कान और उसकी बातें बेहद पसंद थीं, और सूरज को मोहिनी की समझदारी और उसकी मासूमियत। लेकिन जीवन के ताने-बाने ने उनके रास्ते में कांटे बिखेर दिए। सूरज को विदेश में पढ़ाई के लिए मौके मिले, और इस नए सफर में उसे भारत छोड़ना पड़ा।

     

    मोहिनी और सूरज ने दूरियों के बावजूद अपने रिश्ते को बनाए रखने की कोशिश की। रात में लंबे फोन कॉल, वीडियो चेट और संदेशों के माध्यम से वे एक-दूसरे के साथ जुड़े रहे। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ सूरज की नई ज़िंदगी में बदलाव आने लगे। वह नए लोगों से मिला, नई जगहों पर घूमने लगा, और धीरे-धीरे वह उस प्यार को भूलने लगा, जो कभी उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

     

    एक दिन मोहिनी ने सूरज से फोन पर बातें की। लेकिन सूरज का व्यवहार कुछ बदल गया था। उसके अंदर एक दूरी का एहसास था, जो मोहिनी ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मोहिनी ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की कि प्यार समय और दूरी की सीमाओं से ऊपर है, पर सूरज की आंखों में चिंगारी नहीं थी। मोहिनी का दिल टूट रहा था, पर वह अपनी भावनाओं को छिपाने की कोशिश कर रही थी।

     

    एक दिन, सूरज ने मोहिनी को एक कॉल किया। वह हलका-फुलका था, लेकिन मोहिनी की नज़र में कुछ और ही था। “हाय मोहिनी, कैसे हो?” सूरज ने पूछा। “मैं ठीक हूं, और तुम?” मोहिनी ने मन में अपने डर छिपाते हुए जवाब दिया। “मैं भी ठीक हूँ, लेकिन सुनो, मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।”

     

    आखिरी कॉल की यह स्थिति एक भयानक सपने की तरह थी। सूरज ने कहा, “मोहिनी, मैं तुमसे सच बताना चाहता हूँ।” मोहिनी के दिल की धड़कन तेज़ हो गई। “क्या हुआ सूरज?” उसने पूछा। सूरज ने गहरी सांस ली और कहा, “मैंने एक नई जिंदगी शुरू की है, और मुझे लगता है कि हमें अब अलग हो जाना चाहिए।”

     

    मोहिनी के चेहरे पर एक ठंडी लहर दौड़ गई। उसने महसूस किया कि सूरज ने अपने ज़िंदगी में उसे पीछे छोड़ दिया है। “लेकिन सूरज, क्या तुम मुझे एक मौका नहीं दोगे? हम इसे फिर से ठीक कर सकते हैं,” उसने नम आँखों से कहा। “मैं जानता हूं मोहिनी, लेकिन ये सच है कि मैं अब तुमसे वो एहसास नहीं कर पा रहा हूँ।” सूरज की आवाज़ में कोई सच्चाई जरूर थी, लेकिन वह खुद को किसी मोड़ पर रोक नहीं पाया। 

     

    वह आखिरी कॉल मोहिनी के लिए एक भयानक सच के सामने आने वाला था। सूरज ने उसे कहा, “तुम हमेशा मेरी ज़िंदगी में खास रहोगी, लेकिन मैं तुम्हें तकलीफ नहीं देना चाहता। मैं चाहता हूं कि तुम अपने जीवन में आगे बढ़ो।” मोहिनी की आँखों से आँसू गिरने लगे। जैसे ही सूरज ने कॉल खत्म किया, मोहिनी को लगा जैसे उसका दिल टूट गया हो।

     

    वह उस कॉल के बाद अनिश्चितता में जीने लगी। उसने खुद को अपने रिश्ते की यादों में खो दिया। किसी ने कहा था कि प्यार कभी खत्म नहीं होता, लेकिन वह जानती थी कि यह सच नहीं था। सूरज के बिना, उसका मन उदास रहने लगा। उसकी हर सुबह एक नए दुःख के साथ शुरू होती और हर शाम एक नए अकेलेपन में खत्म होती। 

     

    लेकिन समय चलते-चलते उसे अपनी ताकत का एहसास हुआ। मोहिनी ने खुद को फिर से जुटाने की ठानी। उसने अपने करियर पर ध्यान दिया, नए दोस्त बनाए, और नए शौक भी अपनाए। सूरज को भुलाने की कोशिश की, लेकिन उसकी यादें कभी-कभी उसकी आँखों से आँसू निकाल लेती थीं।

     

    एक साल बाद, जब मोहिनी ने अपनी ज़िंदगी को पटरी पर लाने का पूरा प्रयास किया, तो उसे अपने अंदर एक नई शक्ति का एहसास हुआ। उसने अपने जुनून को फिर से खोजा, जिसमें कला और लेखन शामिल थे। एक दिन, उसे अपने शहर में एक कला प्रदर्शनी में भाग लेने का मौका मिला। यह अवसर न केवल उसके लिए एक नया अनुभव था, बल्कि यह उसके लिए अपनी भावनाओं को उजागर करने का एक साधन भी था।

     

    प्रदर्शनी के दिन, मोहिनी ने अपने दिल की बातें रंगों और चित्रों के माध्यम से व्यक्त करना शुरू किया। उसने सूरज के साथ बिताए पलों, उसके साथ किए गए वादों, और उस प्यार को स्थापित किया, जो अब उस जैसी विनम्रता से दूर हो गया था। जब लोग उसकी पेंटिंग्स को देख रहे थे, उसने महसूस किया कि वह अपने दर्द को अच्छे तरीके से व्यक्त कर रही है। कला का यह माध्यम उसे सुकून का एहसास दे रहा था।

     

    एक दिन, प्रदर्शनी के बाद, उसे एक ज़रूरी फ़ोन कॉल आया। यह कमाल का था! वह उसकी प्रशंसा करने वाले एक कला विशेषज्ञ से था, जिसने उसकी पेंटिंग्स को देखा था। उन्होंने मोहिनी को यह कहते हुए संबोधित किया, “आपकी कला में गहराई है। मैं आपकी प्रदर्शनी में और भी काम देखने के लिए उत्सुक हूँ।”

     

    इस बात ने मोहिनी के अंदर आत्मविश्वास की एक नई किरण जगाई। उसने सोचा, “अगर मैं अपने विचारों और भावनाओं को इस तरह व्यक्त कर सकती हूँ, तो मेरा जीवन क्यों न बदलूं!” उसके साथी कलाकारों ने भी उसे प्रेरित किया और वह कला की दुनिया में आगे बढ़ने लगी। उसने खुद को पूरी तरह से अपने काम में विलीन कर दिया।

     

    समय बीतने के साथ, मोहिनी ने एक आर्ट गैलरी खोली, जहां उसने अपनी पेंटिंग्स प्रदर्शित कीं। उसकी गैलरी में लोग उसकी कला देखने के लिए आते थे। वह अपनी ज़िंदगी के इस नए मोड़ को पूरी तरह से अपनाने लगी। लेकिन अक्सर, सूरज की यादें उसे घेर लेती थीं। वह सोचती थी कि शायद वह आज भी उसके लिए एक अहम हिस्सा होता, अगर उस कॉल से पहले सब कुछ सही होता।

     

    एक दिन, जब वह अपनी गैलरी में बैठी हुई थी, उसे कुछ दिखने की आवाज़ सुनाई दी। उसने देखा कि एक व्यक्ति, जो उसकी पेंटिंग्स को ध्यान से देख रहा था, वह कोई परिचित नजर आया। उसके दिल में थोड़ी धड़कन तेज हुई। जैसे ही वह करीब आया, उसने उसे पहचाना – वह सूरज था।

     

    वह जैसे उसकी नजरों से बचते हुए, अपनी पुरानी यादों में खोने लगी। सूरज ने मुस्कुराते हुए कहा, “मोहिनी, तुमने क्या कमाल कर दिया है। तुम्हारी कला अद्भुत है।” मोहिनी को अपनी आँखों में आँसू आने लगे। उसने अपने दिल की गहराइयों में छिपी भावना को फिर से जीने की कोशिश की। “धन्यवाद, सूरज। मैं बस अपने अंदर के दर्द को व्यक्त कर रही थी,” उसने कहा।

     

    सूरज ने गंभीरता से कहा, “मुझे खेद है कि मैंने तुम्हें छोड़ दिया। मैंने बहुत कुछ सीखा है, और अब मैं समझता हूँ कि प्यार क्या होता है।” मोहिनी को यह सुनकर थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन वह जानती थी कि चीज़ें पहले जैसी नहीं हो सकतीं। “सूरज, मैं अब अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ चुकी हूँ।” उसने भी अपनी सच्चाई को सामने रखा।

     

    इस मुलाकात ने मोहिनी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या यह प्यार फिर से जीवित हो सकता है। लेकिन उसने यह भी महसूस किया कि वह अब पहले जैसी मोहिनी नहीं रही। उसने अपने अंदर एक नया आत्मसम्मान और स्वतंत्रता स्थापित कर ली थी। सूरज की पहल से उन्हें कुछ बातें साझा करने का मौका मिला, लेकिन मोहिनी ने यह सुनिश्चित किया कि वे फिर से एक-दूसरे पर निर्भर न हों।

     

    सूरज की आँखों में मोहिनी के लिए ख़ूब सारा प्यार था, लेकिन मोहिनी ने उस प्यार को उस तरह से नहीं देखा जैसा वह पहले करती थी। वह जानती थी कि उनके बीच का रिश्ता बदल चुका था। वे एक-दूसरे के लिए विशेष थे, लेकिन अब वे केवल अच्छे दोस्त बन सकते थे। मोहिनी ने सूरज को कहा, “हम दोनों के रास्ते अलग हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि प्यार खत्म होता है।”

     

    सूरज ने उसकी बातों को मान लिया। उन्होंने एक दूसरी

    शुरुआत की, लेकिन उस बार एक नई दिशा में।

     

  • पिया बावरे

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    गाँव के लोग कहते थे कि प्रेम अगर हद से ज्यादा हो जाए तो इंसान बावरा हो जाता है। और बावरा प्रेम अगर किसी के हिस्से आ जाए तो वह जिंदगी भर उस पागलपन की मिठास और पीड़ा दोनों को साथ लेकर चलता है। मेरी कहानी भी ऐसी ही है। मेरे पिया बावरे की।

     

    मेरा नाम मीरा है। राजस्थान के एक छोटे से गाँव में मेरा जन्म हुआ था। बालू की मिट्टी, कंटीली झाड़ियाँ, और शाम को डूबते सूरज की लालिमा—यही मेरी दुनिया थी। पिता किसान थे, माँ घर संभालती थीं। तीन भाई और मैं। घर में लड़की होने की खुशी कम, चिंता ज्यादा थी। लेकिन मैं खुश थी। खेतों में दौड़ना, कुएँ पर पानी भरना, और रात को दादी की कहानियाँ सुनना—मेरी जिंदगी बस इतनी थी।

     

    फिर वह आया।

    मेरा पिया।

    बावरा पिया।

     

    नाम था रघुनंदन। लोग उसे रघु कहते थे। गाँव के ही लड़के थे, लेकिन शहर जाकर पढ़ाई की थी। लौटे तो जैसे कोई और ही इंसान बनकर। बाल लंबे, आँखों में एक अजीब सी बेचैनी, और बातें ऐसी कि समझना मुश्किल। वह कविताएँ लिखता था, बाँसुरी बजाता था, और कभी-कभी रात भर गाँव के बाहर रेत पर लेटकर तारे गिनता रहता था। लोग कहते—“रघु बावरा हो गया है। शहर की हवा लग गई।”

     

    पहली बार मैंने उसे कुएँ पर देखा। मैं पानी भर रही थी। वह अचानक आया और बिना कुछ कहे मेरी गागर पकड़ ली।

     

    “तुम्हारे हाथों में चाँद छुपा है,” उसने कहा।

     

    मैं हैरान रह गई। “क्या बकवास कर रहे हो?”

     

    वह हँसा। “बकवास नहीं। सच। तुम्हारे हाथ जब पानी में डूबे तो चाँद भी शर्मा गया।”

     

    मैं मुँह बनाकर चल दी। लेकिन दिल के किसी कोने में उसकी बात अटक गई।

     

    फिर से मुलाकात हुई। खेत की मेड़ पर। वह बाँसुरी बजा रहा था। धुन ऐसी थी कि हवा भी थम सी गई। मैं दूर खड़ी सुनती रही। अचानक उसने बाँसुरी रख दी और बोला, “तुम रोज यहाँ आओ। मैं तुम्हारे लिए नई धुन बनाऊँगा।”

     

    “मैं क्यों आऊँ?” मैंने पूछा।

     

    “क्योंकि तुम मेरे पिया हो। और मैं तुम्हारा बावरा।”

     

    उस दिन के बाद वह सचमुच बावरा हो गया।

     

    सुबह होते ही मेरे घर के बाहर खड़ा मिलता। हाथ में जंगली फूलों का गुलदस्ता। “ये फूल तुम्हारे नाम का इंतजार कर रहे थे,” कहता। माँ गाली देतीं, पिता घूरते, भाई धमकाते—लेकिन वह जाता नहीं था। कभी मेरे लिए नई चुनरी लाता, कभी मिट्टी की छोटी सी मूर्ति बनाकर देता जिसमें मेरा चेहरा होता।

     

    एक दिन उसने कहा, “मीरा, मैं तुमसे शादी करूँगा।”

     

    मैं हँसी। “तुम बावरे हो। बावरे की शादी कौन करता है?”

     

    वह गंभीर हो गया। “बावरा इसलिए हूँ क्योंकि तुम हो। अगर तुम नहीं होतीं तो मैं साधारण आदमी रहता। तुम्हें पाकर मैंने पागल होना चुना।”

     

    गाँव में हलचल मच गई। लड़की वाले घर में शहर से पढ़ा-लिखा लेकिन बावरा लड़का कैसे मंजूर होता? पिता ने साफ मना कर दिया। “हमारी बेटी को कोई पक्का आदमी चाहिए, तारे गिनने वाला नहीं।”

     

    रघु हारा नहीं।

     

    रात के अंधेरे में वह मेरे घर की पीपल वाली खिड़की के नीचे आता। धीरे-धीरे गाता—

     

    “पिया बावरे, मन बावरा,

    तोरे बिन कुछ न सुहावे…

    रेत में लिखूँ तेरा नाम,

    हवा उड़ा ले जाए…”

     

    मैं खिड़की से झाँकती तो वह मुस्कुरा देता। “सो गई क्या रानी? मैं तो जग रहा हूँ तुम्हारे ख्यालों में।”

     

    एक रात पिता ने पकड़ लिया। रघु को खूब मारा। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा, “मार लो। दर्द भी मीरा के नाम का ही लगेगा।”

     

    पिता और गुस्से में आ गए। “गाँव छोड़ दो वरना जेल भेज दूँगा।”

     

    रघु चला गया। लेकिन अगली सुबह फिर से घर के बाहर था। इस बार हाथ में एक पत्र। “यह मेरे बाप का है। उन्होंने कहा है कि अगर मीरा राजी हो तो शादी हो सकती है। जमीन का एक हिस्सा मैं तुम्हारे नाम कर दूँगा।”

     

    मेरे पिता अड़ गए। “नहीं।”

     

    फिर शुरू हुआ इंतजार का समय।

     

    महीनों बीत गए। रघु गाँव में ही रहा। दिन भर मजदूरी करता, शाम को मेरे घर के पास बैठा रहता। कभी-कभी मैं चुपके से उसे पानी देने जाती। वह मुस्कुराता—“आज तो रानी खुद आई। मेरा बावरापन रंग लाया।”

     

    एक दिन उसने कुछ अलग किया। गाँव के बीचों-बीच, चौपाल पर खड़े होकर जोर से बोला, “हे गाँव वालो! मैं रघुनंदन, मीरा का बावरा पिया। आज मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जब तक मीरा मेरी नहीं होती, मैं न तो शादी करूँगा, न कोई और स्त्री की तरफ देखूँगा। और अगर मीरा किसी और की हो गई तो मैं जीवन भर बावरा ही रहूँगा।”

     

    लोग हँसे। कुछ ने ताना मारा—“सच में पागल है।”

     

    लेकिन उसकी आँखों में जो था, वह पागलपन नहीं, एक गहरा प्यार था।

     

    समय बदला। मेरे घर में रिश्ते आने लगे। एक अमीर किसान का लड़का। पिता राजी हो गए। तारीख तय हो गई।

     

    मैं रोई। रात भर। खिड़की से बाहर देखा तो रघु वहीं बैठा था। आँखों में आँसू नहीं, बस एक अजीब सी शांति।

     

    “मत रो मीरा,” उसने धीरे से कहा। “तुम खुश रहो। मेरा बावरापन तुम्हारे साथ रहेगा। तुम जहाँ भी जाओगी, मैं तुम्हारे साये की तरह रहूँगा।”

     

    शादी से एक दिन पहले वह गायब हो गया।

     

    गाँव में अफवाहें उड़ीं—किसी ने कहा वह शहर चला गया, किसी ने कहा बावला होकर जंगल में रह रहा है।

     

    मेरी शादी हो गई। ससुराल में दिन कटने लगे। पति अच्छे थे, घर बड़ा था, लेकिन दिल खाली था। हर रात नींद में रघु की बाँसुरी की धुन सुनाई देती।

     

    तीन साल बीत गए। एक बेटा हुआ। जिंदगी सामान्य लगने लगी थी। तभी एक दिन खबर आई—गाँव में एक बावरा आदमी रहता है। रेत पर चित्र बनाता है, बाँसुरी बजाता है, और एक ही नाम लेता है—मीरा।

     

    मेरा दिल बैठ गया।

     

    मैं बहाने से मायके आई। शाम को खेतों की तरफ गई। दूर, पुरानी पीपल के नीचे वह बैठा था। बाल बिखरे, कपड़े फटे, चेहरा दुबला। लेकिन आँखें वही थीं।

     

    उसने मुझे देखा। उठा। फिर मुस्कुराया।

     

    “आ गई रानी? देर कर दी।”

     

    मैं रो पड़ी। “तुमने ऐसा क्यों किया? क्यों अपना जीवन बर्बाद किया?”

     

    वह पास आया। “बर्बाद नहीं किया। संजोया है। तुम्हें पाकर मैं बावरा बना। तुम्हें खोकर और ज्यादा बावरा। लेकिन पछतावा नहीं। क्योंकि बावरा प्रेम ही तो असली प्रेम होता है।”

     

    उसने अपनी झोली से कुछ निकाला—मेरे बचपन की एक पुरानी चूड़ी, जो सालों पहले टूट गई थी। “यह तुम्हारी है। मैंने रेत में खोजा था। हर चीज जो तुम्हारी रही, मैंने बचाई।”

     

    मैंने उसका हाथ पकड़ा। “चलो मेरे साथ। मैं कुछ करती हूँ।”

     

    वह सिर हिलाया। “नहीं। तुम्हारा घर है, परिवार है। मैं वहाँ नहीं फबूँगा। मैं तो बस तुम्हारा बावरा पिया हूँ। दूर से ही सही, तुम्हारा।”

     

    उस रात मैं लौट आई। लेकिन मन नहीं लौटा।

     

    फिर सालों का सिलसिला चला। मैं कभी-कभी गाँव आती तो वह कहीं न कहीं मिल जाता। कभी खेत की मेड़ पर, कभी कुएँ के पास, कभी बस मुस्कुरा कर चला जाता। बेटा बड़ा हुआ। पति का देहांत हो गया एक दुर्घटना में। मैं अकेली रह गई।

     

    अब कोई रोकने वाला नहीं था।

     

    मैं गाँव लौटी। स्थायी रूप से। लोगों ने बातें बनाईं—“विधवा होकर बावरे के पास जा रही है।” लेकिन मुझे परवाह नहीं थी।

     

    रघु अब बुड्ढा हो चला था। लेकिन जब उसने मुझे देखा तो वैसा ही मुस्कुराया जैसे पहली बार कुएँ पर मुस्कुराया था।

     

    “अब तो रानी हमेशा के लिए आ गई?”

     

    “हाँ,” मैंने कहा। “अब तुम्हारा बावरापन मेरे हिस्से का भी हो गया।”

     

    हमने शादी नहीं की। जरूरत नहीं थी। वह मेरे घर के आँगन में एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहने लगा। दिन भर बाँसुरी बजाता, मैं सुनती। शाम को दोनों रेत पर बैठकर बातें करते। कभी पुरानी यादें, कभी चुप्पी।

     

    एक दिन उसने कहा, “मीरा, जब मैं चल जाऊँ तो मेरे साथ एक बात करना।”

     

    “क्या?”

     

    “यह कहना कि तुम्हारा पिया बावरा सच में बावरा था… लेकिन उसका बावरापन सिर्फ तुम्हारे लिए था।”

     

    मैंने उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया। “तुम कहीं नहीं जाओगे। मैं नहीं जाने दूँगी।”

     

    लेकिन समय किसी की नहीं सुनता।

     

    एक सर्दी की सुबह वह नहीं उठा। बाँसुरी उसके सीने पर रखी थी। चेहरे पर मुस्कान थी। जैसे कोई गहरी नींद में हो।

     

    गाँव वाले आए। कुछ ने कहा—“बावरा आखिर मर ही गया।”

    मैंने जवाब दिया—“नहीं। वह जिंदा है। मेरे साँस में, मेरे खून में, मेरे हर ख्याल में।”

     

    आज सालों बीत गए। मैं बूढ़ी हो गई हूँ। आँगन में उसकी बनाई कुटिया अब भी है। कभी-कभी हवा के साथ बाँसुरी की धुन सी सुनाई देती है।

     

    लोग पूछते हैं—“तुम अकेली कैसे रह लेती हो?”

     

    मैं मुस्कुराती हूँ। “अकेली नहीं हूँ। मेरा पिया बावरा अब भी है।

    जो प्रेम बावरा बना दे, वह कभी खत्म नहीं होता।

    वह बस रूप बदल लेता है।

    कभी फूल बन जाता है, कभी धुन, कभी याद।

    और कभी… बस एक नाम रह जाता है पिया बावरे।”

     

    अब जब शाम होती है और सूरज डूबता है, तो मैं रेत पर बैठ जाती हूँ। उँगली से उसका नाम लिखती हूँ। हवा उड़ा ले जाती है।

    फिर फिर लिखती हूँ।

     

    क्योंकि कुछ प्रेम ऐसे होते हैं जो मिटाने से भी नहीं मिटते।

    वे बस बावरे हो जाते हैं।

    और बावरे प्रेम… अमर हो जाते हैं।  

  • अधूरी इबादत भाग~23

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~23 अधूरे फासले 

     

    अद्वैत हर सुबह की तरह ठीक समय पर उठा। बाथरूम से बाहर निकलकर उसने घड़ी की ओर देखा… 6:45। रोज़ की तरह सिलसिलेवार ढंग से उसने अपनी शर्ट प्रेस की, बालों में हल्का सा जेल लगाया, फिर अपने स्टडी टेबल पर फाइल्स को अच्छे से समेटकर बैग में रख लिया। वो एक ऐसा आदमी था जिसे अपने जीवन में हर चीज़ को अनुशासन में रखना पसंद था….. हर भाव, हर फैसला, हर दिनचर्या।

    लेकिन आज उसकी सुबह में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि घर में अब वो अकेला नहीं था… फिर भी संवाद की कोई उम्मीद नहीं थी।

    बाहर निकलने से पहले स्टडी रूम के ताले की चाबी घुमाकर लॉक किया और फिर अपने कमरे का।

    वह सीढ़ियों से उतर कर मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था तभी उसकी नज़र रूहानी के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा हल्का सटा हुआ था। न कोई हलचल, न कोई आहट।

    कुछ पल के लिए वह वहीं ठिठक गया। उसका हाथ उठे लेकिन दरवाजे तक पहुंच नहीं पाए।

    वह चाहता था कि वो दरवाज़ा खटखटाए। 

    शायद पूछे, “ठीक हो?”

    शायद कहे, “मैं जा रहा हूँ, ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना।”

    लेकिन फिर तो कुछ उसे रोक लेता है….. एक दीवार जो दोनों के बीच अब तक खड़ी है।

    ये रिश्ता, जो सिर्फ कागज़ी है, कहीं वो ये न समझ बैठे कि वह उसके जीवन में कुछ अधिक दखल देने लगा है।

    या फिर ये डर भी था कि अगर उसने दरवाज़ा खटखटाया, और जवाब में खामोशी मिली, तो दिनभर वो खामोशी उसकी सांसों से चिपकी रहेगी।

    उसने खुद को रोका, गहरी सांस ली और दरवाज़े की ओर से मुड़कर सीधे बाहर की ओर बढ़ गया। जूतों की धीमी आवाज़ फर्श पर गूंजती रही और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया…. जहाँ अब दो लोग थे, लेकिन दो अलग-अलग दुनिया में।

    अद्वैत के मन में एक हल्की-सी खटास रह गई…. शायद उस अनकहे संवाद की जो कभी हो नहीं पाया। पर उसने उसे भी अपनी दिनचर्या की तरह तह करके जेब में रख लिया, और चल पड़ा एक और व्यस्त दिन की ओर।

    अद्वैत के जाने के बाद मीना जब अपने नियत समय पर रोज़ की तरह घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई, तो उसे सब कुछ सामान्य लगा…. हॉल में वही हल्की सी धूल, किचन की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर और अद्वैत सर की अनुपस्थिति का शांत एहसास। 

    वो धीरे-धीरे झाड़ू लगाते हुए कमरे दर कमरे बढ़ती चली गई, और आखिर में वह उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँची, जो कल तक खाली रहा करता था…. अब जहाँ रूहानी थी।

    दरवाज़ा आंशिक रूप से खुला था और मीना जैसे ही अंदर गई, उसकी नज़र सीधे बिस्तर पर लेटी रूहानी पर पड़ी। पहले तो वो ठिठक गई।

    रूहानी गहरी नींद में थी, पर उसकी करवटें बेचैनी बयां कर रही थीं। उसके माथे पर हलकी लटें चिपकी थीं, जैसे कोई सपना उसे भीतर से उलझाए हुए हो। 

    मीना की नज़र उसके गले के चारों ओर घूमे मंगलसूत्र पर गई, और फिर मांग में भरे सिंदूर पर टिक गई। उसके चेहरे पर अचानक एक धीमा-सा विस्मय था, फिर उसने खुद को संयत किया और रूहानी के पास आकर धीरे से बोली,

    “मैडम… दिन चढ़ने वाला है… क्या अब उठेंगी आप?”

    रूहानी उस आवाज़ से चौंकी, जो नींद के घने कोहरे में किसी हल्की दस्तक जैसी थी। कुछ पल तो उसे समझ ही नहीं आया कि कौन बोल रहा है। 

    आंखें पूरी तरह खुलीं तो सामने मीना को खड़ा पाया, हल्की मुस्कराहट के साथ, जैसे उसने नींद से किसी सपने को जगा दिया हो।

    “मैडम, दिन चढ़ गया है… उठ जाइए?”

    रूहानी झेंप गई, हड़बड़ा कर उठकर बैठ गई, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा अभी तक नींद और उलझन से भरा था। कुछ देर को वो बस देखती रही मीना की ओर, फिर खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में बोली, “तुम साफ-सफाई कर लो… और मेरे लिए एक कॉफी बना देना। मैं अभी आती हूँ।”

    मीना ने सिर हिलाया, “जी मैडम” और काम में लग गई।

    रूहानी कमरे से बाहर आई तो अब वो पहले जैसी नहीं थी। कल जो तूफान आया था उसकी लहरें अब भी उसकी आंखों में थीं, पर उनमें अब एक संकल्प की परत भी थी। 

    उसने सफेद कुर्ता पहना था, सिंपल, लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता और आंखों की थकान उसे और गहराई देती जा रही थी। जब वो किचन में पहुँची तो मीना वहां झाड़ू लगा रही थी।

    “तुम्हारी बेटी का बर्थडे कब है?” रूहानी ने अचानक पूछा, सोफे पर बैठते हुए।

    मीना ने चौंक कर उसकी ओर देखा, उसे याद आया कि उसने ही रूहानी को बोला था अपनी बेटी के लिए डिज़ाइनर कपड़े बनाने के लिए।

    इसके साथ ही मीना फिर से आंखों में चमक लिए मुस्कुराई, “बस एक हफ्ते में, मैडम।”

    “ठीक है, आज शाम को उसे लेते आना… उसका नाप लेना है।” रूहानी का लहजा स्थिर था, लेकिन उस स्थिरता में अपनापन था।

    मीना अब कॉफी बनाने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अब सवालों की परछाइयाँ उतर आई थीं। वो अब तक खुद को रोक रही थी, पर अब उससे रहा नहीं गया। 

    पहले उसने कॉफी का मग रूहानी को दिया, फिर अपने लिए भी एक पुराना मग निकाल कर उसमें कॉफी डाली और फर्श पर बैठ गई। 

    इस वक्त वो मेड नहीं, एक औरत थी… जो एक दूसरी औरत की उलझनों को समझना चाहती थी।

    “मैडम…” उसने धीरे से पूछा, “आपकी शादी कब हुई? और कहीं हमारे अद्वैत सर से तो नहीं हुई?”

    रूहानी के हाथ ठिठक गए। उसने नजर झुका लिया, जैसे इस सवाल का जवाब किसी भारी अलमारी के पीछे छिपा हो। उसके गले में लटकता मंगलसूत्र हल्की थरथराहट के साथ उसकी सांसों की लय में हिल रहा था।

    “बहुत जल्दी में हो गई… बताने का समय नहीं मिला,” रूहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा।

    मीना के चेहरे पर अब संदेह नहीं, पुष्टि थी। “आपके पति अद्वैत सर ही हैं न?”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके भीतर जैसे कोई सिहरन दौड़ गई थी। 

    ‘पति’ शब्द उसके लिए अब भी अजनबी-सा था। वो अब भी इस रिश्ते को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाई थी…. कागज़ पर नाम जुड़ने से आत्मा का बंधन नहीं बनता, ये बात उसके अंदर गूंज रही थी।

    मीना की आंखों में हल्की चमक उभरी, जैसे कोई पहेली सुलझ गई हो।

    वह एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैडम… माफ कीजिएगा, पर एक बात कहूँ?”

    रूहानी जो अब तक खिड़की की तरफ देखती हुई खोई हुई थी, चौंककर उसकी ओर मुड़ी, “हां, बोलो मीना।”

    मीना ने आंखें नीचे किए हुए धीरे से कहा, “अद्वैत सर को ज़रूर आपसे पहली नज़र में प्यार हो गया होगा… वरना वो तो आज तक किसी औरत को आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। उनकी पहली पत्नी के जाने के बाद तो जैसे उनका दिल पत्थर हो गया था।”

    मीना की आवाज़ में एक भोली सच्चाई थी, जो सीधे रूहानी के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसकी आँखें पलभर को भी झपकी नहीं और न ही वह उसकी बातों पर मुस्कुरा नहीं सकी। 

    वो केवल कॉफी के कप में अपनी उंगलियों को लपेटे बैठी रही। उसकी आंखें थोड़ी दूर, किसी अदृश्य दीवार को घूर रही थीं।

    तभी मीना पूछ बैठी, “लेकिन आप नीचे के कमरे में क्यों सो रही थीं, सर का कमरा तो ऊपर है।”

    रूहानी की उंगलियाँ अचानक कॉफी के मग पर जकड़ गई और उसकी आंखें मीना की तरफ उठी…. चुप, लेकिन कुछ छिपाती हुईं।

    एक पल को कमरे की हवा जैसे ठहर सी गई……..

    ——-

    अब रूहानी मीना को क्या जवाब देगी?

    क्या अद्वैत के दिल में कोई अनकहा दर्द छुपा है, जो रूहानी को नहीं दिखता?

    उस दरवाज़े के पीछे छिपा क्या कोई राज़ है, जिसे खोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा?

  • आत्मग्लानि

    आत्मग्लानि

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

                     आत्मग्लानि …  

    रीया! यहीं नाम है उसका , उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में अपने भरे पूरे परिवार के साथ हंसीं खुशी रहती है, अपने मम्मी पापा की इकलौती संतान, तो जाहिर सी बात है लाड प्यार से भरण पोषण हो रहा था, ताऊ जी और चाचा जी जान छिड़कते थे उसपर क्योंकि अपने परिवार में वही एकमात्र बेटी थी, भाई प्यार बहुत करते थे उससे इसलिए थोड़ी जिद्दी ज्यादा हो गई थी, जो बात ठान लें तो बस…. 

    इसी प्रकार हंसते खेलते उसने अपनी ग्यारहवीं कक्षा पास की और बारहवीं कक्षा में प्रवेश किया, पढ़ाई-लिखाई में भी अव्वल है तो शिक्षकों की भी पसंदीदा विद्यार्थी बनी रही । बारहवीं कक्षा में आने के कुछ दिनों बाद इंग्लिश सब्जेक्ट की माया मैडम का किसी और विद्यालय में ट्रांसफर हो गया । उनकी जगह एक दूसरे शिक्षक आये जिनका हाल -फिलहाल में इस जगह तबादला किया गया था.।।

    संजय व्यास…. विद्यालय में आते ही इनकी खूबसूरती के चर्चे होने लगे, 6.2  लम्बी हाईट , गोरा रंग, आंखों पर पतली फ्रेम का चश्मा लगाए रहते जिससे भी उनकी गहरी आंखों को छुपाना मुश्किल होता था, हंसमुख स्वभाव के धनी, पतली सी गर्दन, पढ़ाते वक्त कभी कभी अपनी शर्ट की आस्तीन की बाज़ू को कोहनी तक फोल्ड कर देते जिससे उनके हाथों की मांसपेशियों का कसाव दिखाई दे जाता, आते ही उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया विद्यार्थी तो विद्यार्थी कुछ मैडम भी उन्हें ठंडी आहें भरकर देखा करती थी., पर वो बिना किसी पर ध्यान दिए अपने पढ़ाने पर ध्यान देते, धीरे धीरे बात फैल गई कि शिक्षक महोदय विवाहित जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जिससे कयी मैडमों के अरमानों पर पानी फिर गया और वो सब अपनी अपनी किस्मत पर रश्क करके रह जाती..।।

    रीया भी उनकी दिवानी हुए बिना नहीं रह सकी, वो जब भी कक्षा में प्रवेश करते रीया की नजरें उनसे हटती ही नहीं, वो चोरी चोरी उनको देखा करती, उनके बोलने का अंदाज, उनके हाथों की कसावट, उनका पढ़ाते समय अपने चश्मे को ठीक करना, चाॅक को पढ़ाते समय हल्के से अपने मुंह में दबाना, ये सब रीया को उनकी ओर आकर्षित कर रहा था जिससे वो एकदम अंजान थे। रीया उनकी सुध – बुध में खोती चली गई और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना बंद कर दिया, टेस्ट पेपर में जब उसने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो उसकी विज्ञान की मैडम को हैरानी हुई क्योंकि ऐसा कोई विषय नहीं था जिसमें रीया अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई हो, मैडम ने उसे बुलाया और पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान केंद्रित करने की , रीया ने चुपचाप उनकी बातें सुन ली और आकर अपनी बैंच पर बैठकर किताब खोलकर पढ़ने लगी लेकिन वो अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रही थी क्योंकि बार बार संजय व्यास जी का जादू उसके दिल दिमाग पर हावी हो गया था, उम्र कितनी है मासूम की, महज़ 19साल, इस उम्र में आकर्षित होना किसी के प्रति आम बात है..। वो सुनहरे सपने सजाती उनके जीवन के साथ अपने, ये न जाने कब उन्हें पाने की ज़िद बन गया खुद उसे पता नहीं चला। धीरे धीरे बात पूरी तरह विद्यालय में फैल गई कि रीया अपने शिक्षक महोदय को पसंद करती है और उनके साथ जीवन बिताना चाहती है, प्रिंसिपल ने संजय व्यास जी को बुलाया और बात की छानबीन की, संजय जी खुद हैरान रह गए ये जानकर कि जिस बच्चे को वो शिक्षा का ज्ञान देते हैं वो उनके लिए ऐसी भावनाएं रखती है, उन्होंने प्रिंसिपल की बात को सिरे से खारिज किया और खुद रीया से मुलाकात करने कक्षा में चले गए, इस समय छुट्टी का समय था तो सभी स्टूडेंट्स निकल गये कक्षा से, रीया भी जा रही थी जब संजय कक्षा में चले आये, उनको अपने सामने देखकर रीया की नजरें झुक गई और होंठों पर हसीन मुस्कान आ गई, इस लड़की की ऐसी हरकतें देखकर संजय जी हैरान रह गए और अपना गला साफ करके बोलें —

    रीया , क्या मैं जो बातें सुन रहा हूं वो सच है?? रीया ने चुपचाप नजरें झुकाई रखी और धीरे धीरे उनकी तरफ अपने कदम बढ़ा दिए जिससे संजय जी डर गये और खुद पीछे हो गये, उनके कदम पीछे लेने से रीया ने नजरें उठाकर उन्हें देखा और अपनी जगह खड़ी रही और बोली –” मुझे नहीं पता आपने किससे क्या सुना है” ” लेकिन मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं आपको चाहने लगी हूं और आपसे शादी करके आपके साथ रहना चाहती हूं, मुझे आप बहुत अच्छे लगते हैं,  मैं आपके गले में हाथ डालकर आपको अपनी सांसों में बसाए रखना चाहती हूं, ” बोलिए करेंगे ना आप मुझसे शादी?? 

    संजय जी हैरान रह गए एक बच्ची के मुंह से अपने लिए ऐसे शब्द सुनकर, उन्होंने रीया को समझाया, ” देखो रीया, अभी तुम बच्ची हो, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए तुम्हें,ना कि इन फिजूल की बातों पर, मैं तुम्हारा अध्यापक हूं शिक्षा देना मेरा काम है, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो और परीक्षा में सफल हो जाओ, मैं समझूंगा मेरी तपस्या सफल हो गयी, प्लीज़ अपने भविष्य को संवारने में जुटी रहो इन सब चक्करों में नहीं पड़ो, और मैं वैसे भी एक शादीशुदा इंसान हूं तो मेरे बारे में सोचना भी तुम्हारे लिए गलत है, अपनी बात कहकर वो कक्षा से बाहर निकल गये, रीया आंखों में आंसू लिए उन्हें जाते देखती रही और चुपचाप अपने घर निकल गई, घर में आकर उसने अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर दिया और घंटों रोती रही, मां चाची ताई जी सबने दरवाजा खटखटाया और उसके व्यवहार से चिंतित हो गई कि क्या बात है जो घर की बेटी दरवाजा बंद करके रो रही है और बोलने से भी दरवाजा नहीं खोल रही,  सब बुलाती रही और हार ग्रीन शाम को पापा चाचा ताऊ जी के आने पर उनको बताया तो वो सब भी चिंता में पड़ गए कि न जाने क्या हुआ होगा 😔, दरवाजा खटखटाया गया और इस बार पापा ने स्नेह से अभिभूत होकर रीया से दरवाजा खोलने को कहा. । दरवाजा खुला….. और….

     

     

     

    आगे क्या हुआ होगा इसके लिए अगले अध्याय का इंतजार करें और हां प्लीज़ मेरी कहानी को लाईक कमेंट शेयर जरुर करें 🙏🙏☺️☺️……

  • बारिश में मिला अजनबी

    बारिश में मिला अजनबी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश में मिला अजनबी

     

    दिल्ली की शामें अक्सर अजीब होती हैं। कभी धूल भरी लू चलती है, कभी अचानक बादल घिर आते हैं और बरसने लगते हैं जैसे सालों का गम उतार रहे हों। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। अनन्या ऑफिस से निकली तो आसमान साफ था। बस स्टॉप तक पहुँचते-पहुँचते बादल इतने घने हो गए कि सूरज गायब हो गया। फिर पहली बूँद गिरी, दूसरी, और फिर झड़ी लग गई।

     

    अनन्या के पास छतरी नहीं थी। सफेद कुर्ती और जींस भीगने लगीं। बाल चेहरे पर चिपक गए। वह भागती हुई एक पेड़ के नीचे रुकी, लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि पेड़ भी बेकार साबित हुआ। चारों तरफ लोग भाग रहे थे, ऑटो वाले दाम बढ़ा-बढ़ाकर चिल्ला रहे थे। अनन्या ने फोन निकाला बैटरी बीस प्रतिशत। कैब ऐप पर गाड़ियाँ नहीं दिख रहीं। वह बस खड़ी रही, ठंड से काँपती हुई।

     

    तभी एक काली छतरी उसके सिर के ऊपर आ गई। अनन्या ने ऊपर देखा। एक लंबा युवक खड़ा था, सफेद शर्ट और काली पैंट में। बाल गीले थे, लेकिन मुस्कान साफ। “लगता है आपको छतरी की जरूरत है,” उसने कहा। आवाज में न कोई दिखावा था, न जल्दबाजी। बस एक साधारण सी पेशकश।

     

    अनन्या ने झिझकते हुए कहा, “नहीं… मैं मैनेज कर लूँगी।”

    “बारिश में भीगकर मैनेज करना कोई खास बात नहीं,” युवक हंसा। “मेरा नाम आरव है। और आप?”

    “अनन्या।”

    “अच्छा नाम है। चलिए, मैं आपको मेट्रो स्टेशन तक छोड़ दूँ। वहाँ से आप घर पहुँच जाएँगी।”

     

    अनन्या ने सोचा—अजनबी है। लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि इंकार करना मुश्किल था। वह छतरी के नीचे आ गई। दोनों साथ चलने लगे। आरव ने छतरी थोड़ी अपनी तरफ झुका रखी थी ताकि अनन्या पूरी तरह सूखी रहे। अनन्या ने नोटिस किया कि उसकी अपनी बाईं बाजू पूरी तरह भीग चुकी है।

     

    “आप ऑफिस से आ रहे हैं?” आरव ने पूछा।

    “हाँ। डिजाइनर हूँ। आप?”

    “आर्किटेक्ट। पुरानी इमारतों को बचाने वाला काम।”

    अनन्या मुस्कुराई। “मतलब आप चीजों को टूटने नहीं देते।”

    आरव ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया, “कोशिश तो करता हूँ। लेकिन कुछ चीजें टूटने के बाद ही सुंदर लगती हैं।”

     

    बातचीत आसान हो गई। अनन्या ने बताया कि वह अकेली रहती है, फ्लैट में। आरव ने कहा कि वह भी किराए के घर में है, लेकिन उसकी माँ अक्सर आती रहती हैं। दोनों ने बारिश की शिकायत की, दिल्ली के ट्रैफिक की, और फिर अचानक चुप हो गए। चुप्पी अजीब नहीं लगी। बस छतरी के नीचे दो अजनबी चल रहे थे, और दुनिया धीमी पड़ गई थी।

     

    मेट्रो स्टेशन पहुँचते-पहुँचते बारिश थमने लगी। आरव ने छतरी बंद की। अनन्या ने कहा, “शुक्रिया। आपने बचा लिया।”

    आरव ने जेब से एक विजिटिंग कार्ड निकाला। “अगर कभी फिर भीग जाओ… या बस बात करनी हो।”

    अनन्या ने कार्ड लिया। उंगलियाँ छू गईं। एक पल के लिए दोनों की नजरें मिलीं। आरव मुस्कुराया और चला गया। अनन्या खड़ी रही, कार्ड को निहारती हुई। बारिश रुक चुकी थी, लेकिन उसके अंदर कुछ नया बरस रहा था।

     

    उस रात अनन्या सो नहीं पाई। आरव का चेहरा बार-बार याद आता। उसकी आवाज, छतरी के नीचे की गरमाहट, और वह एक वाक्य “कुछ चीजें टूटने के बाद ही सुंदर लगती हैं।” उसने कार्ड को टेबल पर रखा और सोचा कॉल करूँ या नहीं?

     

    अगले दिन ऑफिस में काम नहीं बन पाया। शाम को उसने हिम्मत की और मैसेज किया “हाय, मैं अनन्या। कल वाली बारिश वाली। छतरी के लिए फिर से शुक्रिया।”

     

    जवाब तुरंत आया “मुझे उम्मीद थी आप मैसेज करोगी। कैसी हो?”

     

    बातचीत शुरू हुई। पहले सामान्य मौसम, ऑफिस, खाना। फिर धीरे-धीरे गहरी। आरव ने बताया कि उसकी माँ अकेली हैं, पिता की मृत्यु हो चुकी है। अनन्या ने बताया कि उसके माता-पिता छोटे शहर में रहते हैं, और वह दिल्ली आकर अकेली पड़ गई है। दोनों ने रात देर तक चैट की। एक रात आरव ने लिखा

    “कल फिर बारिश का मौका है। छतरी लेकर चलूँ?”

     

    अनन्या हँसी। “छतरी तो तुम्हारे पास है ही। लेकिन कॉफी?”

     

    वे एक छोटी सी कैफे में मिले। बारिश फिर शुरू हो गई थी। खिड़की के बाहर बूँदें गिर रही थीं, अंदर दोनों बातें कर रहे थे। आरव ने अनन्या की ड्राइंग देखी जो उसने फोन में सेव कर रखी थी। “तुम अच्छा बनाती हो,” उसने कहा। अनन्या ने शर्माते हुए जवाब दिया, “तुम पुरानी इमारतें बचाते हो, मैं नई चीजें बनाती हूँ। दोनों का काम एक जैसा है कुछ न कुछ संभालना।”

     

    आरव ने अनन्या का हाथ थाम लिया। हल्के से। “कुछ चीजें संभालने लायक होती हैं।”

    अनन्या का दिल जोर से धड़का। बारिश बाहर तेज हो रही थी, लेकिन कैफे में सिर्फ उनके बीच की गर्माहट थी।

     

    उसके बाद मुलाकातें नियमित हो गईं। कभी पुरानी इमारतों में घूमना, कभी रात को चाट खाना, कभी बस चुपचाप नदी किनारे बैठना। आरव अनन्या को पुरानी दिल्ली की गलियाँ दिखाता, जहाँ घर इतने पास-पास बने होते कि छत से छत जुड़ी लगती। अनन्या आरव को अपने डिजाइन बताती, रंगों की बात करती। दोनों एक-दूसरे के खालीपन को भर रहे थे।

     

    एक शाम आरव ने अनन्या को अपने घर बुलाया। माँ से मिलवाया। माँ ने अनन्या का हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, तुम अच्छी लगती हो। आरव को हँसते हुए देखकर अच्छा लगा।” अनन्या की आँखें भर आईं। इतने दिनों बाद किसी माँ जैसी गर्माहट महसूस हुई।

     

    लेकिन प्रेम हमेशा आसान नहीं होता। एक दिन आरव को मुंबई में एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला। तीन महीने के लिए जाना था। अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा, “जाओ। काम जरूरी है।” लेकिन अंदर से दिल बैठ गया। आरव ने अनन्या का चेहरा दोनों हाथों में लिया। “मैं लौटूँगा। और जब लौटूँगा, तब सिर्फ छतरी नहीं… पूरा आसमान लेकर आऊँगा।”

     

    तीन महीने लंबे लगे। रोज की कॉल, वीडियो चैट, लेकिन दूरी का वजन महसूस होता। एक रात अनन्या बारिश में निकली। बिना छतरी। बस खड़ी रही उसी स्टॉप पर जहाँ पहली मुलाकात हुई थी। फोन बजा। आरव था।

    “बारिश हो रही है न?”

    “हाँ।”

    “मैं भी भीग रहा हूँ। मुंबई में।”

    अनन्या हँसी। “तुम हमेशा बारिश में भीगते हो क्या?”

    आरव ने धीरे से कहा, “जब तक तुम्हें छतरी न दे दूँ, भीगता रहूँगा।”

     

    तीन महीने बाद आरव लौटा। एयरपोर्ट पर अनन्या इंतजार कर रही थी। आरव ने उसे देखा और दौड़कर गले लगा लिया। लोग देख रहे थे, लेकिन दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ा। आरव ने जेब से एक छोटी सी छतरी निकाली बिल्कुल वैसी ही काली, जैसी पहली बार थी।

    “यह तुम्हारी है। अब कभी मत भीगो अकेली।”

    अनन्या ने छतरी ली और आरव के कंधे पर सिर रख दिया। “अब तुम्हारे साथ भीगना है तो भीगूँगी। अकेली नहीं।”

     

    उसके बाद की बारिशें अलग थीं। दोनों साथ छतरी के नीचे चलते, कभी हाथ थामे, कभी चुपचाप। एक दिन आरव ने पुरानी इमारत के छत पर अनन्या को ले जाकर कहा, “यहाँ से शहर अलग लगता है। जैसे सब कुछ धीमा हो गया हो।” अनन्या ने आरव की ओर देखा। “तुम भी धीमे हो। अच्छे अर्थों में।”

    आरव ने अनन्या को गले लगा लिया। बारिश शुरू हो गई। दोनों छतरी के नीचे खड़े रहे, लेकिन इस बार छतरी सिर्फ बारिश से बचाने के लिए नहीं थी। वह उनके बीच की उस जगह को बचा रही थी जहाँ दो अजनबी एक-दूसरे के हो गए थे।

     

    साल बीत गए। अनन्या और आरव ने शादी की। शादी में छतरी थी काली, सादी, लेकिन उनके लिए सबसे खास। मेहमान हैरान थे कि दुल्हन-दूल्हा छतरी लेकर क्यों घूम रहे हैं। आरव ने हँसते हुए बताया, “क्योंकि हमारी कहानी यहीं से शुरू हुई थी।”

     

    अब भी जब बारिश होती है, दोनों कभी-कभी पुराने बस स्टॉप पर चले जाते हैं। खड़े होते हैं, छतरी खोलते हैं, और याद करते हैं वह दिन जब एक अजनबी ने कहा था “लगता है आपको छतरी की जरूरत है।” अनन्या हर बार जवाब देती है, “नहीं… मुझे तुम्हारी जरूरत थी।”

     

     

    बारिश रुक जाती है। शहर फिर से भागने लगता है। लेकिन दो दिलों के बीच वह छतरी हमेशा खुली रहती है नमी से नहीं, बल्कि प्यार से भीगी हुई।

  • Mera pahla pyar

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    मेरा पहला प्यार

    कुछ लोग ज़िंदगी में देर से आते हैं और हमेशा के लिए रह जाते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत जल्दी आकर हमेशा के लिए याद बन जाते हैं। मेरी ज़िंदगी में भी एक ऐसी ही याद थी—मेरा पहला प्यार।

    मेरा नाम आरव है। आज मैं एक सफल इंसान हूँ। अच्छी नौकरी, अच्छा घर, हर वह चीज़ है जिसकी कभी चाहत थी। लेकिन जब भी बारिश की पहली बूंदें धरती पर गिरती हैं, जब भी किसी पुराने गीत की धुन कानों में पड़ती है, तो मेरी यादें सात साल पीछे चली जाती हैं। उस छोटे से शहर में… जहाँ मैंने पहली बार किसी को दिल से चाहा था।

    उसका नाम था नैना

    मैं पहली बार उससे कॉलेज के पहले दिन मिला था। सफेद सलवार-सूट, हल्की-सी मुस्कान और बड़ी-बड़ी आँखें… जैसे किसी ने चाँद का एक टुकड़ा धरती पर भेज दिया हो। वह क्लास में नई थी और घबराई हुई लग रही थी।

    मैंने उसके पास जाकर कहा, “अगर चाहो तो मैं तुम्हें पूरी क्लास दिखा सकता हूँ।”

    वह हल्का-सा मुस्कुराई और बोली, “धन्यवाद… मुझे सच में किसी की मदद की ज़रूरत थी।”

    बस, वहीं से हमारी दोस्ती शुरू हुई।

    दिन बीतते गए। हम साथ पढ़ते, साथ कैंटीन जाते, लाइब्रेरी में घंटों बैठते। वह बहुत समझदार थी। उसे किताबें पढ़ना पसंद था, जबकि मुझे गिटार बजाना। मैं उसके लिए अक्सर कॉलेज के गार्डन में बैठकर धुन बजाता और वह मुस्कुराकर सुनती रहती।

    धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं रही। उसके बिना एक दिन भी अधूरा लगता था। उसकी हँसी मेरी खुशी बन गई थी और उसकी उदासी मेरी बेचैनी।

    लेकिन मैंने कभी अपने दिल की बात नहीं कही। डरता था… कहीं दोस्ती भी न खो दूँ।

    एक दिन कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। मैंने पहली बार स्टेज पर एक गीत गाया। पूरा गीत मैं नैना को देखकर गा रहा था। शायद वह समझ गई थी कि उस गीत के पीछे छिपी हर भावना उसी के लिए थी।

    कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह मेरे पास आई।

    उसने पूछा, “क्या यह गीत… किसी खास के लिए था?”

    मैं कुछ पल चुप रहा। फिर हिम्मत करके कहा, “हाँ… तुम्हारे लिए।”

    कुछ सेकंड तक वह बिना कुछ बोले मुझे देखती रही। फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए।

    मैं घबरा गया।

    “अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो…”

    उसने मेरी बात बीच में ही रोक दी।

    “बुरा नहीं लगा, आरव… लेकिन मैं भी तुम्हें यही बताना चाहती थी।”

    उस दिन पहली बार उसने मेरा हाथ थामा था।

    उस पल ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया थम गई हो।

    हमारा रिश्ता बहुत खूबसूरत था। उसमें दिखावा नहीं था। महंगे तोहफे नहीं थे। बस एक-दूसरे के लिए सच्ची परवाह थी।

    हम छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढ़ लेते थे। कभी सड़क किनारे चाय पीना, कभी बारिश में भीगना, कभी बिना वजह घंटों बातें करना… यही हमारी दुनिया थी।

    कॉलेज का आखिरी साल शुरू हुआ।

    हम दोनों ने अपने-अपने सपनों के लिए मेहनत शुरू कर दी। मैं नौकरी की तैयारी कर रहा था और नैना आगे पढ़ना चाहती थी।

    लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी योजनाओं के हिसाब से नहीं चलती।

    एक शाम नैना ने मुझे मिलने बुलाया।

    वह पहले जैसी खुश नहीं थी।

    उसने धीमी आवाज़ में कहा, “पापा ने मेरी शादी तय कर दी है।”

    मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

    “लेकिन… तुमने उन्हें हमारे बारे में बताया?”

    “बताया था… लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। उनके लिए परिवार की इज़्ज़त सबसे ज़्यादा मायने रखती है।”

    मैंने कहा, “तो चलो… हम दोनों मिलकर उन्हें समझाएँगे।”

    वह मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी थी।

    “कुछ रिश्ते समझाने से नहीं बदलते, आरव।”

    उस दिन हम दोनों बहुत रोए।

    पहली बार मुझे महसूस हुआ कि प्यार करना आसान है, लेकिन उसे निभा पाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।

    अगले कुछ दिनों तक हम रोज़ मिलते रहे। हर मुलाकात आखिरी जैसी लगती थी।

    फिर वह दिन भी आ गया जब नैना हमेशा के लिए चली गई।

    उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा—

    “अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज़ होती है… तो मैं तुम्हें फिर ढूँढ़ लूँगी।”

    मैंने उसे जाते हुए देखा… और पहली बार महसूस किया कि कुछ लोगों का जाना, ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल देता है।

    उसके बाद मैंने खुद को काम में डुबो दिया।

    समय बीतता गया।

    लोग कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है।

    लेकिन सच यह है कि समय सिर्फ दर्द के साथ जीना सिखाता है।

    सात साल बाद मैं एक बिज़नेस कॉन्फ्रेंस के लिए उसी शहर गया।

    सब कुछ बदल चुका था।

    नई इमारतें, नई सड़कें…

    लेकिन कॉलेज के सामने वाली वही छोटी-सी चाय की दुकान आज भी थी।

    मैं वहीं जाकर बैठ गया।

    अचानक किसी ने पीछे से मेरा नाम पुकारा।

    “आरव…”

    मैंने मुड़कर देखा।

    वह नैना थी।

    चेहरे पर पहले जैसी मासूमियत थी, लेकिन आँखों में ज़िंदगी के कई अनुभव उतर आए थे।

    कुछ पल तक हम दोनों कुछ नहीं बोले।

    फिर उसने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे हो?”

    मैंने भी मुस्कुराने की कोशिश की।

    “ठीक हूँ… तुम?”

    “मैं भी ठीक हूँ।”

    हमने साथ बैठकर चाय पी।

    बहुत सारी बातें हुईं।

    उसने बताया कि उसकी शादी हो चुकी है। उसका एक छोटा बेटा भी है।

    मैंने भी अपनी ज़िंदगी के बारे में बताया।

    हम दोनों ने एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं की।

    क्योंकि अब शिकायतों की उम्र बीत चुकी थी।

    जाते-जाते उसने कहा, “जानते हो, पहला प्यार कभी खत्म नहीं होता। बस उसकी जगह बदल जाती है।”

    मैंने पूछा, “कैसी जगह?”

    वह मुस्कुराई।

    “दिल से निकलकर दुआओँ में।”

    मैं उसे दूर जाते हुए देखता रहा।

    इस बार मेरी आँखों में आँसू नहीं थे।

    बस एक सुकून था।

    क्योंकि अब मुझे समझ आ चुका था कि हर प्रेम कहानी का अंत शादी नहीं होती।

    कुछ प्रेम कहानियाँ इसलिए अधूरी रह जाती हैं ताकि इंसान को सिखा सकें कि सच्चा प्यार पाने का नहीं, निभाने का नाम है।

    आज भी जब बारिश होती है, मैं मुस्कुरा देता हूँ।

    क्योंकि मुझे याद आता है कि मेरी ज़िंदगी में भी कभी कोई था, जिसने मुझे बिना किसी शर्त के प्यार किया था।

    वह मेरा पहला प्यार था।

    और शायद… आखिरी भी।

    कहते हैं कि इंसान अपने पहले प्यार को कभी नहीं भूलता।

    मैं भी नहीं भूला।

    मैंने बस उसे यादों की सबसे सुरक्षित जगह पर रख दिया है, जहाँ न समय पहुँच सकता है, न दूरियाँ, न मजबूरियाँ।

    कुछ रिश्ते साथ चलकर पूरे होते हैं, और कुछ दूर होकर भी हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

    नैना अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं है, लेकिन मेरी दुआओँ का हिस्सा आज भी है।

    और शायद यही पहले प्यार की सबसे खूबसूरत पहचान है—वह कभी नफ़रत में नहीं बदलता।

    वह हमेशा एक मीठी याद बनकर दिल के किसी कोने में मुस्कुराता रहता है।

  • मेरी चाहत 💗💗💗

    मेरी चाहत 💗💗💗

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    मेरी चाहत… ❤️

     

    मेरी चाहत कोई शोर नहीं,

    जो हर किसी को सुनाई दे।

    ये तो वो खामोश दुआ है,

    जो हर पल बस तुम्हें ही माँगे।

     

    मेरी चाहत तुम्हें पाना भर नहीं,

    तुम्हारे हर दर्द की वजह बनना भी नहीं।

    मेरी चाहत तो बस इतनी है,

    कि तुम्हारी हर मुस्कान की वजह बन सकूँ।

     

    जब भी ज़िंदगी तुम्हें थका दे,

    मैं तुम्हारा सुकून बन जाऊँ।

    जब भी आँखें नम हो जाएँ,

    मैं तुम्हारी हँसी लौटाने की वजह बन जाऊँ।

     

    मेरी चाहत किसी वादे की मोहताज नहीं,

    न किसी रिश्ते के नाम की ज़रूरत है।

    ये तो दिल की वो इबादत है,

    जिसमें बस तुम्हारी खुशियाँ ही मेरी मन्नत हैं।

     

    अगर किस्मत ने हमें साथ लिखा,

    तो हर जन्म तुम्हारा हाथ थामूँगी।

    और अगर बिछड़ना लिखा भी हुआ,

    तो भी हर दुआ में तुम्हारा नाम ही माँगूँगी।

     

    मेरी चाहत तुम हो…

    और शायद हमेशा रहोगे।

    क्योंकि कुछ मोहब्बतें मुकम्मल होकर नहीं,

    दिल में बसकर 

     हमेशा ज़िंदा रहती हैं…! ❤️

  • कसम से…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    एक प्यारी सी बिंदी…! 

    बिखरी सी….सँवरी सी…ज़ुल्फें…!

     

    एक झुमका बहका हुआ… और ! 

    हल्की सी मुस्कान तुम्हारे होंठों पर…!! 

     

    *तुम समझ नहीं आती लेकिन…!*

    *कसम से.. मुझे, पसंद बहुत आती हो…!!!❤️💞*