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  • ट्रेन में पहली मुलाकात

    ट्रेन में पहली मुलाकात

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है

     

    रात के लगभग नौ बजे थे। प्लेटफॉर्म पर हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। स्टेशन की भीड़, चाय वालों की आवाज़ें, बच्चों का शोर और ट्रेनों की सीटी… सब मिलकर एक अजीब-सा शोर बना रहे थे।

     

    रिया अपने सूटकेस के पास खड़ी बार-बार घड़ी देख रही थी।

     

    “हे भगवान! ट्रेन लेट ना हो बस…” उसने धीरे से खुद से कहा।

     

    उसे दिल्ली से मुंबई जाना था। नई नौकरी, नया शहर और नई जिंदगी उसकी राह देख रही थी। मगर उसके चेहरे पर खुशी से ज्यादा घबराहट थी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई “मैडम, एक तरफ हो जाइए… ट्रेन आ रही है।”

     

    रिया जल्दी से किनारे हुई। सामने से राजधानी एक्सप्रेस धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।

     

    वह अपना बैग संभालते हुए अंदर चढ़ गई।

     

    उसकी सीट खिड़की वाली थी। उसने राहत की सांस ली।

     

    “चलो… कम से कम सफर आराम से कट जाएगा।”

     

    वह बैठी ही थी कि तभी एक लड़का जल्दी-जल्दी डिब्बे में आया। उसके हाथ में बैग था और चेहरे पर हल्की घबराहट।

     

    “Excuse me… सीट नंबर 32?”

     

    रिया ने टिकट देखा। “वो सामने वाली है।”

     

    “ओह… थैंक गॉड! मुझे लगा ट्रेन छूट जाएगी।”

     

    लड़का बैठते हुए मुस्कुराया। रिया ने बस हल्का-सा सिर हिला दिया।

     

    कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही। फिर ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी।

     

    खिड़की के बाहर स्टेशन पीछे छूटता जा रहा था। तभी लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया “वैसे… मैं आरव।”

     

    रिया ने थोड़ी झिझक के साथ हाथ मिलाया।

     

    “रिया।”

     

    आरव मुस्कुरा के बोला, “Nice name.”

     

    “Thanks.” रिया ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया। 

     

    फिर दोनों चुप।

     

    कुछ मिनट बाद चाय वाला आया।

     

    “चाय… चाय…”

     

    आरव ने पूछा, “आप लेंगी चाय?”

     

    “नहीं।” रिया ने मना कर दिया। 

     

    “पक्का?” आरव ने कन्फर्म किया। 

     

    “हम्म।” रिया ने बस सर हा में हिला दिया। 

     

    आरव ने दो चाय ले लीं।

     

    एक कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, “ये भारतीय ट्रेनों का नियम है… सफर में चाय जरूरी होती है।”

     

    रिया हँस पड़ी।“आप हर किसी से ऐसे ही बात करते हैं?”

     

    आरव चाय का एक शिप लेकर “नहीं… सिर्फ उनसे जिनका चेहरा बता देता है कि वो बहुत परेशान हैं।”

     

    रिया थोड़ा चौंकी, “मैं परेशान लग रही हूँ?”

     

    “थोड़ी।” आरव चाय पीते हुए खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

     

    रिया ने नजरें खिड़की की तरफ कर लीं।

     

    कुछ पल बाद बोली, “नई नौकरी है… पहली बार घर से इतनी दूर जा रही हूँ।”

     

    “ओह… इसलिए।” आरव चाय खत्म कर के कागज का ग्लास ट्रेन में रखे dasvin में डालते हुए कहा। 

     

    “और आप?” रिया ने पूछा। 

     

    “मैं मुंबई में ही रहता हूँ। ऑफिस के काम से दिल्ली आया था।”

     

    “मतलब आप मुंबई के बारे में सब जानते होंगे?” रिया खुश होकर पूछा। 

     

    आरव खिड़की से बाहर चांद को देखते हुए कहा, “इतना भी नहीं… लेकिन हाँ, वहाँ की बारिश और ट्रैफिक दोनों बहुत खतरनाक हैं।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुराई। धीरे-धीरे बातचीत शुरू हो गई।

     

    कब दो घंटे गुजर गए, पता ही नहीं चला।

     

    आरव बहुत मजाकिया था। उसकी बातों में एक अजीब-सी गर्माहट थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह सालों से उसे जानती हो।

     

    रात गहरी होने लगी थी। डिब्बे की लाइटें धीमी हो चुकी थीं।

     

    रिया ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ने लगी तभी उसका पैर फिसल गया।

     

    “अरे… संभलिए!” आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड के लिए दोनों की नजरें मिलीं। रिया का दिल अजीब-सी तेजी से धड़कने लगा।

     

    “थ… थैंक यू।”

     

    “इतनी जल्दी गिरने की आदत है क्या?”

     

    रिया मुस्कुराई। “नहीं… पहली बार हुआ।”

     

    “अच्छा है। वरना मुझे हर बार हीरो बनना पड़ता।”

     

    रिया हँस पड़ी। उस रात उसे नींद बहुत देर से आई।

     

    पता नहीं क्यों… मगर बार-बार उसका ध्यान सामने वाली सीट पर सोए आरव की तरफ जा रहा था।

     

    सुबह जब उसकी आंख खुली, तो ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर रुकी हुई थी।

     

    आरव खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था।

     

    उसने रिया को देखा और मुस्कुराया।

     

    “Good morning।”

     

    रिया बैठते हुए कहा, “गुड मॉर्निंग।”

     

    “कॉफी?” आरव ने पूछा

     

    “इतनी सुबह?” रिया खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

     

    “मुंबई वालों की सुबह कॉफी से ही शुरू होती है।” आरव काफी वाले को इशारे किया। 

     

    रिया मुस्कुराई। “ठीक है।”

     

    दोनों कॉफी पीते हुए बातें करने लगे।

     

    “वैसे… आपकी फैमिली में कौन-कौन है?” आरव ने पूछा।

     

    रिया खिड़की से बाहर सुबह की सोर देखते हुए कहा, “मम्मी-पापा और छोटा भाई।”

     

    आरव उसके चेहरे को देखते हुए पूछा, “आप सबसे ज्यादा किसके करीब हैं?”

     

    रिया कुछ पल चुप रही। “पापा।”

     

    आरव थोड़ा मुस्कुरा कर पूछा, “और वो आपको इतनी दूर भेजने के लिए मान गए?”

     

    रिया उसकी तरफ देख कर कहा, “नहीं… बहुत मुश्किल से माने। मैंने कहा… अगर इस बार रोक लिया ना… तो शायद मैं जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगी।”

     

    आरव उसे ध्यान से देखता रहा।

     

    “आप बहुत अलग हैं।”

     

    “अलग?”

     

    “हाँ… ज्यादातर लोग डर के आगे रुक जाते हैं। आप डर के बावजूद आगे बढ़ रही हैं।”

     

    रिया पहली बार किसी अजनबी की बात सुनकर इतना अच्छा महसूस कर रही थी।

     

    दोपहर तक दोनों की दोस्ती काफी अच्छी हो चुकी थी।

     

    वे साथ खाना खा रहे थे, साथ हँस रहे थे।

     

    पास बैठी आंटी तक मुस्कुराकर बोलीं, “लगता है सफर में अच्छी दोस्ती हो गई।”

     

    रिया थोड़ा झेंप गई।

     

    आरव हँसते हुए बोला “जी आंटी… ट्रेन वाली दोस्ती।”

     

    “बेटा… कुछ दोस्तियाँ ट्रेन से शुरू होकर जिंदगी तक चली जाती हैं।”

     

    आंटी की बात सुनकर दोनों कुछ पल चुप हो गए।

     

    शाम होने लगी थी।

     

    खिड़की के बाहर आसमान नारंगी रंग में रंग चुका था।

     

    रिया बाहर देखते हुए धीरे से बोली “मुझे ट्रेन का सफर बहुत पसंद है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इसमें लोग कुछ देर के लिए मिलते हैं… और फिर बिछड़ जाते हैं।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “हर कोई बिछड़ता नहीं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मतलब… कुछ लोग दोबारा भी मिलते हैं।”

     

    “और अगर ना मिले तो?”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर धीरे से बोला “तो याद बन जाते हैं।”

     

    उसकी आवाज में कुछ ऐसा था… जो सीधे रिया के दिल में उतर गया।

     

    मुंबई आने में अब सिर्फ दो घंटे बचे थे। रिया को अचानक अजीब-सी बेचैनी होने लगी।

     

    उसे लग रहा था… यह सफर खत्म नहीं होना चाहिए।

     

    तभी आरव बोला “रिया… एक बात पूछूँ?”

     

    “हम्म?” रिया ने सर हिलाया

     

    “क्या हम दोस्त रह सकते हैं?” रिया मुस्कुराई। “इतनी जल्दी परमिशन मांग रहे हो?” 

     

    “क्योंकि कुछ लोग जल्दी अपने लगने लगते हैं।”

     

    रिया का दिल फिर तेज धड़कने लगा।

     

    उसने धीरे से कहा “हाँ… रह सकते हैं।”

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला। “तो नंबर दीजिए।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    “आप बहुत जल्दी करते हैं।”

     

    “ट्रेन में टाइम कम होता है।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    मुंबई स्टेशन आ चुका था।

     

    भीड़ तेजी से उतर रही थी।

     

    रिया अपना सामान संभाल रही थी।

     

    दिल अजीब-सा भारी हो गया था।

     

    स्टेशन पर उतरते ही आरव बोला “कैब बुक कर दूँ?”

     

    “नहीं… मैं कर लूँगी।”

     

    “पक्का?”

     

    “हाँ।”

     

    कुछ सेकंड दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर आरव मुस्कुराया।

     

    “तो… फिर मिलेंगे?”

     

    रिया ने भी मुस्कुराकर कहा “शायद।”

     

    “शायद नहीं… जरूर।”

     

    वह चला गया।

     

    रिया उसे जाते हुए देखती रही।

     

    पता नहीं क्यों… मगर उसकी आंखें उसी भीड़ में बस उसे ही ढूंढ रही थीं।

     

    उस रात नए फ्लैट में बैठी रिया बार-बार फोन देख रही थी।

     

    तभी मैसेज आया “घर पहुँच गई?”

     

    रिया मुस्कुरा दी।

     

    “हाँ।”

     

    “Good. और हाँ… ट्रेन वाली दोस्ती मत भूलना।”

     

    रिया ने जवाब दिया—

     

    “इतनी जल्दी नहीं भूलती मैं।”

     

    उस दिन के बाद दोनों रोज बात करने लगे।

     

    सुबह “Good morning” से शुरू होकर रात “सो जाओ अब” पर खत्म होती।

     

    धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए।

     

    एक दिन बारिश हो रही थी।

     

    रिया ऑफिस से बाहर निकली तो सामने आरव खड़ा था।

     

    “तुम यहाँ?”

     

    “कॉफी पीने चलें?”

     

    “इस बारिश में?”

     

    “मुंबई में बारिश रुकने का इंतजार करोगी तो जिंदगी निकल जाएगी।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    दोनों सड़क किनारे छोटी-सी दुकान पर कॉफी पीने लगे।

     

    बारिश की बूंदें, ठंडी हवा और आरव की बातें…

     

    रिया बस उसे देखती रह गई।

     

    “क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “तुम हर बार कैसे समझ जाते हो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि तुम्हारी आँखें सब बता देती हैं।”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ… वह आरव से प्यार करने लगी है।

     

    मगर उसने कभी कहा नहीं।

     

    उसे डर था।

     

    अगर दोस्ती भी खत्म हो गई तो?

     

    समय गुजरता गया।

     

    एक दिन अचानक आरव का फोन बंद आने लगा।

     

    रिया परेशान हो गई।

     

    पूरा दिन, पूरी रात…

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    तीसरे दिन दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया ने दरवाजा खोला।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    मगर उसके हाथ पर पट्टी बंधी थी।

     

    रिया घबरा गई।

     

    “ये क्या हुआ?!”

     

    आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “छोटा-सा एक्सीडेंट था।”

     

    रिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें अंदाजा है मैं कितनी डर गई थी?!”

     

    आरव उसे बस देखता रहा।

     

    “इतनी फिक्र करती हो मेरी?”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    आरव धीरे से बोला—

     

    “रिया… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

     

    रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “क्या?”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है।”

     

    रिया की सांसें थम गईं।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “उस दिन जब तुम खिड़की के पास बैठी थी ना… तभी समझ गया था… फिर कोई और इस दिल को नहीं भाएगा।”

     

    रिया की आँखें भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    “मैं सच में तुमसे प्यार करता हूँ।”

     

    रिया हँसते हुए रो पड़ी।

     

    “इतना टाइम लगा दिया बोलने में?”

     

    “डर ल

    गता था।”

     

    “मुझे भी।”

     

    “तो अब?”

     

    रिया ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब तो पूरी जिंदगी परेशान करूँगा।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    ठंडी हवा कमरे में आ रही थी।

     

    और रिया बस एक ही बात सोच रही थी—

     

    कुछ मुलाकातें सच में किस्मत लिखती हैं।

     

    क्योंकि ट्रेन में हुई वह पहली मुलाकात…

     

    आज भी उसकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद थी।

     

     

  • तेरी मेरी प्रेम कहानी ❤️❤️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    शुरुआत कुछ यूँ हुई थी,

    जैसे सुबह में पहली किरण उतरती है,

    सूखे मन के आँगन में

    धीरे-धीरे कोई बारिश बिखरती है।

    तेरी हँसी ने छू लिया था

    मेरे खामोश लफ़्ज़ों का जहान,

    और फिर हर धड़कन कहने लगी —

    “तू ही मेरी मंज़िल, तू ही मेरी पहचान।”

    तेरी आँखों में मैंने

    अपने हर ख़्वाब का घर देखा,

    तेरे साथ हर मौसम में

    प्यार का खिलता असर देखा।

    कभी रूठना, कभी मनाना,

    कभी बातों में रात गुज़र जाना,

    तेरी मेरी प्रेम कहानी में

    हर पल था जैसे कोई अफ़साना।

    जब दुनिया ने सवाल किए,

    हमने मुस्कुराकर साथ निभाया,

    हर मुश्किल की धूप में भी

    एक-दूजे को छाँव बनाया।

    और अब जब वक़्त की किताब में

    कई यादों के फूल सजे हैं,

    तेरी मेरी प्रेम कहानी के

    हर लम्हे आज भी ताज़ा खड़े हैं।

    अंत भी ऐसा हो हमारा,

    कि साँसें थम जाएँ मगर प्यार न रुके,

    तेरा हाथ मेरे हाथ में हो

    और दिल आख़िरी धड़कन तक तुझी को पुकारे।

    क्योंकि तेरी मेरी प्रेम कहानी

    सिर्फ़ शब्दों की बात नहीं,

    ये वो एहसास है

    1. जो कभी खत्म होने वाली रात नहीं।
  • कुछ बातें तुम भी कह जाओ न…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अगर बात मोहब्बत की हैं तो बताओ ना

    या फिर कोई गीत हैं तो गुनगुनाओ ना

     

    कब से सब मैं ही कहे जा रहा हूँ

    तुम भी कुछ दिल की बात सुनाओ ना

     

    वहां से कहोगी तो अच्छा नहीं लगेगा 

    दूर क्यों बैठी हो , पास ही आ जाओ ना

     

    मैं कब से बेचैन हूँ जानने को

    दिल में क्या छुपाया हैं , जरा दिखाओ ना

     

    इजहार का सोच कर आई हो , तो कहो

    एक बार मुझे भी अपने सीने से लगाओ ना…

     

     

    कुछ तो कहो यु चुप ना रहो.. मेरी बातो को तो समझ पाओ न…

  • पंसदीदा औरत…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    किसी ने पूछा मुझसे 

    “पसंदीदा औरत कैसी होती है?”

     

    मैंने हँसकर कहा 

    वो,

    जिससे बहस करते-करते भी

    आख़िर में दिल उसी की बात मान ले।

     

    जिसकी नाराज़गी

    दिन भर जेब में रखे किसी पत्थर जैसी लगे…

    हर काम के बीच

    चुभती हुई।

     

    और जिसकी हँसी

    थके हुए दिन पर

    बारिश की पहली बूँद जैसी उतरती हो।

     

    वो,

    जिसके होते हुए

    घर सिर्फ़ घर नहीं रहता,

    एक सुकून बन जाता है।

     

    जिसे दुख दो

    तो सबसे पहले

    अपनी ही आँखें झुक जाएँ।

     

    जिसकी कुछ बातें

    होंठों पर मुस्कान रख जाएँ,

    और कुछ ख़ामोशियाँ

    रात भर जगाए रखें।

     

    पसंदीदा औरत

    सिर्फ़ ख़ूबसूरत नहीं होती…

    वो धीरे-धीरे

    तुम्हारी आदत बन जाती है।

     

    तुम्हारी रूह में

    ऐसे उतरती है

    जैसे चाय में घुली शक्कर 

    दिखती नहीं,

    पर हर घूँट में महसूस होती है।

     

    और फिर एक दिन

    उसके बिना सब कुछ तो होता है…

    मगर ज़िंदगी नहीं होती।

     

    …….. ✍️

     

    किसी ने बहुत खूबसूरत कहीं अपनी बातें… जहाँ भर की गहराई समेटी है सारी जज्बाते…

  • पहली मुलाकात

    पहली मुलाकात

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कुकी ने हिम्मत जुटाई और खरगोशों की ओर बढ़ी। “नमस्कार, मैं कुकी हूँ, क्या मैं आपके साथ खेल सकती हूँ?” उसने शर्माते हुए पूछा। खरगोशों ने उसे घूरा और फिर हंसते हुए कहा, “तुम इतनी धीमी हो, हम तुम्हारे साथ कैसे खेल सकते हैं?”

    कुकी का दिल टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। “मैं धीमी हो सकती हूँ, लेकिन मैं आपके साथ खेल का एक नया तरीका ढूंढ सकती हूँ,” उसने कहा। “क्या आप मुझे मौका देंगे?”

    बंटी और चंचल एक-दूसरे की ओर देखे और लम्बी श्वास लेते हुए बंटी ने कहा, “ठीक है, हम तुम्हें एक मौका देंगे। लेकिन तुम्हें हमें ज़रूर दिखाना होगा कि तुम हमारी तरह खेल सकती हो।” चंचल ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, बस हमें दिखाओ कि तुम खेल में कैसे शामिल हो सकती हो।”

    कुकी ने खुशी से सहमति जताई। “धन्यवाद, दोस्तों! मैं पूरी कोशिश करूँगी!” अब कुकी के मन में उत्साह भर गया था। उसने सोच लिया कि उसे अपनी ताकत दिखाने का सही मौका मिल गया है। उसने तुरंत एक योजना बनाई।

    कुकी ने सोचा कि सबसे पहले उन्हें एक ऐसा खेल खेलना चाहिए जिसमें धैर्य और रणनीति दोनों की आवश्यकता हो। “चलो, हम एक तनावपूर्ण दौड़ का आयोजन करते हैं!” उसने प्रस्ताव रखा। “हम दौड़ते हुए एक दूसरे को कुछ संकेत देंगे और उसके अनुसार खेलेंगे।”

    सभी जानवरों को यह विचार पसंद आया क्योंकि इस खेल में उन्हें अंततः अपनी योग्यताओं का इस्तेमाल करने का मौका मिल रहा था। कुकी ने गेम के नियम स्थापित किए:

    1. सभी प्रतिस्पर्धियों को एक निश्चित बिंदु से दौड़ना होगा, जो पूरे जंगल में होगा।
    2. जहाँ भी रास्ते में रुकावट आएगी, उन्हें बिना भागे सही रास्ता ढूंढना होगा।
    3. अंत में, सभी ko मिलकर सुराग भेड़ने होंगे और अपने-अपने रास्ते पर पहुँचने का प्रयास करना होगा।

    “यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है,” कुकी ने कहा। “हमें धैर्य से काम लेना चाहिए और एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। जो भी पहले पहुंचा, उसे विजेता का नाम मिलेगा, लेकिन सच्चा विजेता वो होगा जो दूसरों की मदद करेगा।”

    खरगोशों ने विचार किया और फिर उनमें से बंटी ने कहा, “अच्छा, यह तो दिलचस्प लग रहा है। चलो देखते हैं कि क्या तुम यह कर सकती हो।” चंचल ने भी उत्साहित होते हुए हंसते हुए कहा, “हमें तुम्हारी मदद से यह देखना होगा कि तुम कितनी अच्छी हो!”

    खेल का आरंभ हुआ और सभी जानवर अपने-अपने स्थानों पर खड़े हो गए। कुकी ने सभी को बताना शुरू किया कि उन्हें शुरुआत में क्या करना है। जैसे ही दौड़ शुरू हुई, बंटी और चंचल तेज़ी से दौड़ने लगे। कुकी अपनी धीमी गति के साथ उनके पीछे चलने लगी।

    दौड़ में पहले ही मोड़ पर ज़मीन में गड्ढे थे। बंटी और चंचल ने सर्किट को चिह्नित किया और पहले ही आगे बढ़ गए। लेकिन कुकी ने देखा कि गड्ढों के पास एक ऐसा रास्ता था जो दोनों जानवरों ने नहीं देखा। वह गड्ढों को चकमा देकर उस रास्ते पर चलने लगी।

    जैसे ही वह गड्ढों को पार कर रही थी, उसके मन में एक विचार आया: “यह मेरी धीमी गति का फायदा है!” इसने उसे यह समझने में मदद की कि कभी-कभी धीमे चलने का मतलब यह नहीं होता कि कोई पीछे रह गया है।

    आखिरकार, उसने मोड़ पर पहुँचकर देखा कि बंटी और चंचल एक साथ में खड़े थे और अपने आगे के रास्ते पर विचार कर रहे थे। कुकी ने खुशी-खुशी वहाँ पर पहुँचकर कहा, “मैंने एक और रास्ता देखा जो हमें ज्यादा तेज़ी से आगे बढ़ा सकता है। हमें वहाँ से चलना चाहिए।”

    बंटी और चंचल ने कुकी की बात सुनी और उसका ध्यानपूर्वक गौर किया। “तुम सच में सोच रही हो, कुकी!” बंटी ने कहा। “हम बस अपनी गति में चलने के चक्कर में इसे देख नहीं पाए।” चंचल ने सहमति जताते हुए कहा, “हाँ, चलो देखते हैं कि यह रास्ता हमें कहाँ ले जाता है।”

    कुकी ने संकेत किया और वे सभी मिलकर उस नए रास्ते पर चलने लगे। यह रास्ता थोड़ा कठिन था, लेकिन कुकी की धारणा और उसके धैर्य ने उन्हें जल्दी ही सही दिशा में पहुँचाने में मदद की। जब वे आगे बढ़ रहे थे, तो कुकी ने ध्यान दिया कि रास्ते में कई ऐसे बाधाएँ थीं, जिनका सामना करना पड़ा।

    “हमें एक बड़ा पत्थर पार करना है,” चंचल ने कहा और तुरंत खुद को दौड़कर पत्थर पर चढ़ा दिया। बंटी ने भी उसका अनुसरण किया। लेकिन कुकी अपने धीमे कदमों से पहले झुक गई और सोचने लगी, “क्या मैं इससे आगे निकलने के लिए कोई और उपाय कर सकती हूँ?”

    उसने पत्थर के पीछे झुककर देखा और पाया कि वहाँ एक जगह थी जहाँ से वे पत्थर के चारों ओर जा सकते थे। “दोस्तों, यहाँ एक और रास्ता है!” उसने शोर नहीं मचाते हुए कहा। “यहाँ से हम पत्थर के चारों ओर जा सकते हैं।”

    बंटी और चंचल ने एक पल के लिए उसे घूरा, लेकिन फिर वे उसके साथ उस हिस्से में गए। धीरे-धीरे और सावधानी पूर्वक वे सभी उस नई रूट से आगे बढ़ने लगे। अब उनमें से कोई भी और तेजी से दौड़ नहीं रहा था, बल्कि सभी कुकी की सुझाई दिशा का अनुसरण कर रहे थे।

    जैसे-जैसे दौड़ आगे बढ़ी, कुकी के द्वारा बताई गई हर छोटी सलाह ने उन्हें और अधिक समर्थ बना दिया। उन्होंने समझा कि कुकी की धीमी गति में भी एक विशेषता थी – साहस, धैर्य और सहानुभूति। कुकी ने न केवल अपनी गति से दूसरों को मदद की, बल्कि उसने उन्हें यह भी बताया कि कैसे सहकारिता सबसे महत्वपूर्ण है।

    अब जंगली कौन सा जानवर सबसे तेज दौड़ रहा था, इस पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन्होंने अपनी ताकतों का सही उपयोग करना शुरू कर दिया। जब भी कोई रुकावट आती, वे मिलकर उसे पार कर जाते। कुकी की बुद्धिमता और सृजनात्मकता ने उन्हें उन बाधाओं को पार करने में मदद की जो पहले कठिन लग रही थीं।

    “धन्यवाद, कुकी, तुमने हमें नई रणनीतियों के बारे में बताया!” चंचल ने चहकते हुए कहा। “तुमने साबित कर दिया कि केवल तेज़ दौड़ने से ही नहीं, दोस्तों को मदद कर के भी हम जीत सकते हैं।”

    आख़िरकार, जब वे दौड़ समाप्त करने के करीब पहुँच गए, एक तेज़ झरने का भाग उनके सामने आया। बंटी और चंचल थोड़े चिंतित दिखे। “हम इसे कैसे पार करेंगे? हम तैर नहीं सकते!” बंटी ने कहा।

    कुकी ने सोचा और फिर कहा, “हम इसे एक-दूसरे की मदद से पार कर सकते हैं। तुम दोनों उस ओर कूदो, मैं तुम्हें एक मजबूत तने से पकड़ने में मदद करूँगी।”

    बंटी और चंचल ने एकजुट होकर काम किया और कुकी की योजना के अनुसार पहुँच गए। कुकी ने धीरे-धीरे तने पर चढ़ाई की और अंत में दोनों को सुरक्षित पार कर दिया। अब उन्हें एक पल के लिए कुकी की योजना के बिना जीत की कोई उम्मीद नहीं

     

     

  • माँ…

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    माँ की ममता और बलिदान की एक छोटी और भावुक कहानी:

    ​एक बेटा अपनी माँ से बहुत नफरत करता था क्योंकि उसकी माँ की एक आँख नहीं थी। उसे अपनी माँ के ‘अधूरे चेहरे’ से शर्म आती थी। वह बड़ा हुआ, खूब पढ़ा-लिखा और शहर जाकर एक बड़ा आदमी बन गया। उसने शादी कर ली और अपनी माँ को गाँव में ही अकेला छोड़ दिया।

    ​सालों बाद, जब माँ अपने पोते-पोतियों से मिलने शहर पहुँची, तो बेटे ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया और चिल्लाकर कहा, “तुम यहाँ क्यों आई हो? तुमने मेरे बच्चों को डरा दिया, यहाँ से चली जाओ!”

    ​माँ चुपचाप वापस लौट गई। कुछ महीनों बाद माँ की मृत्यु हो गई। जब बेटा गाँव पहुँचा, तो उसे माँ की एक चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था:

    ​”मेरे प्यारे बेटे, शायद तुम्हें याद नहीं, पर जब तुम बहुत छोटे थे, तब एक एक्सीडेंट में तुम्हारी एक आँख फूट गई थी। एक माँ होने के नाते मैं तुम्हें एक आँख से नहीं देख सकती थी, इसलिए मैंने अपनी एक आँख तुम्हें दे दी। मुझे गर्व है कि तुम मेरी आँख से इस खूबसूरत दुनिया को देख रहे हो।”

    ​बेटा फूट-फूट कर रोने लगा, लेकिन अब माँ वापस आने वाली नहीं थी।

    ​सीख (Moral)

    ​माँ का प्यार निस्वार्थ होता है। हम अक्सर उनकी अहमियत तब समझते हैं जब वो हमसे दूर चली जाती हैं। समय रहते उनके प्यार और बलिदान का सम्मान करें।

  • सबसे हसीन दुनिया है आप. 😊

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    खुद को थोड़ा समय देकर देखो,

    तुम्हारी अपनी ही दुनिया सबसे हसीन लगेगी…

    जो सुकून तुम ढूंढते फिरते हो,

    वो तुम्हारे अंदर ही मुस्कुरा रहा है!!

  • प्रेम का दूसरा नाम ही त्याग है…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    “सच्चा प्रेम शब्दों से नहीं,

    समर्पण और एहसास से दिखाई देता है।

    जिस रिश्ते में सम्मान, विश्वास और अपनापन हो,

    वहीं प्रेम जीवन को खूबसूरत बना देता है।” ❤️

     

    प्यार केवल पाने का नाम नहीं,

    बल्कि किसी की खुशी में खुद को भूल जाने का एहसास है।

  • मे खुद को गिरफ्तार करता हु…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तू बैठ सामने

    *मैं इश्क़ का इज़हार करता हूँ,*

     

    तू माँगे चाँद

    *मैं तारे भी तेरे नाम करता हूँ,*

     

    कभी नाराज़ मत होना मुझसे,

    मैं तेरी चाहत की ज़ंजीरों में 

    *खुद को गिरफ़्तार करता हूँ…!!*

  • जिंदगी निखार देती है…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    *तेरी बातों में वो सुकून है*

    जो दिल को करार देता है,

    *तेरा थोड़ा सा वक्त*

    जैसे बरसों का प्यार देता है।

     

    *सलामती रहे हमेशा तेरे*

    घर-आँगन की खुशियों की,

    *क्योंकि अपनों का साथ ही*

    ज़िन्दगी को निखार देता है।