🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

बूढ़ी अम्मा

पढ़ने का समय : 6 मिनट

बूढ़ी अम्मा अकेली रहती थी

 

गांव के आखिरी छोर पर एक छोटी-सी मिट्टी की झोपड़ी थी। झोपड़ी के बाहर नीम का पुराना पेड़ और उसके नीचे लकड़ी की एक टूटी हुई चौकी पड़ी रहती थी। उसी झोपड़ी में करीब सत्तर साल की एक बूढ़ी अम्मा अकेली रहती थी।

 

गांव वाले उसे प्यार से जमुना अम्मा कहते थे।

 

अम्मा की जिंदगी बहुत साधारण थी। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना, आंगन में झाड़ू लगाना, चूल्हे पर चाय बनाना और फिर नीम के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान का नाम लेना।

 

लेकिन उसकी जिंदगी में एक चीज बहुत बड़ी थी—अकेलापन।

 

उसका पति कई साल पहले गुजर चुका था। उनका एक बेटा था, मोहन। मोहन नौकरी की तलाश में शहर गया और वहीं शादी करके बस गया। शुरुआत में वह हर महीने अम्मा को पैसे भेजता था और फोन भी करता था।

 

फिर धीरे-धीरे फोन कम हो गए।

 

एक दिन अम्मा ने फोन किया।

 

“बेटा, बहुत दिन हो गए तेरी आवाज नहीं सुनी।”

 

उधर से मोहन ने जल्दी में कहा, “अम्मा, काम बहुत है। बाद में बात करता हूं।”

 

“बेटा… घर कब आएगा?”

 

“जल्दी आऊंगा।”

 

फोन कट गया।

 

अम्मा कुछ देर तक मोबाइल को देखती रही। फिर मुस्कुराकर बोली, “मेरा बेटा बहुत काम करता है… बेचारा।”

 

वह हमेशा अपने बेटे के लिए कोई न कोई बहाना बना लेती थी।

 

गांव के कुछ लोग कहते थे, “अम्मा को मोहन के पास चले जाना चाहिए।”

 

अम्मा बस इतना कहती, “बेटे का अपना घर है। मैं यहां ठीक हूं।”

 

असल में वह ठीक नहीं थी।

 

रात को जब चारों तरफ सन्नाटा छा जाता, तब उसे अपने पति की याद आती। कभी बेटे के बचपन की आवाजें सुनाई देतीं, कभी लगता जैसे मोहन आंगन में दौड़ रहा हो।

 

लेकिन आंखें खोलती तो सामने खाली आंगन होता।

 

एक बरसात की रात बहुत तेज बारिश हो रही थी। अम्मा ने दरवाजा बंद किया और चूल्हे के पास बैठ गई। तभी बाहर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

 

अम्मा चौंक गई।

 

“इतनी रात को कौन बच्चा रो रहा है?”

 

वह छड़ी लेकर बाहर निकली।

 

दरवाजे के पास एक छोटा-सा लड़का बारिश में भीगा हुआ बैठा था।

 

अम्मा ने उसे तुरंत अंदर खींच लिया।

 

“अरे बेटा! कौन हो तुम? यहां कैसे आए?”

 

लड़का कांपते हुए बोला, “मेरा नाम सोनू है… मैं रास्ता भूल गया हूं।”

 

अम्मा ने उसे सूखा कपड़ा दिया और चूल्हे के पास बैठाया।

 

“डर मत। आज रात तू यहीं रहेगा।”

 

उसने गर्म दूध बनाया और बच्चे को पिला दिया।

 

कुछ देर बाद सोनू सो गया।

 

अम्मा उसे देखते हुए देर तक बैठी रही।

 

कई साल बाद उसके घर में किसी बच्चे की सांसों की आवाज गूंज रही थी।

 

उस रात अम्मा को पहली बार अपना घर खाली नहीं लगा।

 

सुबह होते ही सोनू को गांव के लोग पहचान गए। वह पड़ोस के गांव का बच्चा था, जो अपनी मां के साथ मेले में आया था और भीड़ में बिछड़ गया था।

 

उसकी मां रोती हुई अम्मा के घर पहुंची।

 

“अम्मा, आपने मेरे बेटे को बचा लिया। मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी।”

 

अम्मा मुस्कुराई।

 

“अरे इसमें एहसान की क्या बात है? बच्चा था, उसे घर दे दिया।”

 

सोनू जाते-जाते अम्मा के गले लग गया।

 

“अम्मा, मैं फिर आऊंगा।”

 

अम्मा की आंखें भर आईं।

 

“जरूर आना बेटा।”

 

उस दिन के बाद सोनू सच में हर कुछ दिनों में अम्मा से मिलने आने लगा।

 

कभी उसके लिए फल लाता, कभी आंगन में झाड़ू लगा देता।

 

धीरे-धीरे गांव के दूसरे बच्चे भी अम्मा के घर आने लगे।

 

कोई कहानी सुनने आता, कोई गुड़ खाने।

 

अम्मा का सूना आंगन बच्चों की हंसी से भरने लगा।

 

लेकिन गांव में एक आदमी ऐसा भी था जिसे यह सब पसंद नहीं था। उसका नाम रघु था। वह अम्मा की जमीन पर नजर रखता था।

 

एक दिन उसने अम्मा से कहा, “अम्मा, तुम्हारी उम्र हो गई है। ये जमीन मुझे दे दो। मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगा।”

 

अम्मा ने साफ मना कर दिया।

 

“मेरी जमीन मेरे पति की आखिरी निशानी है।”

 

रघु नाराज हो गया।

 

“अकेली औरत कब तक संभाल पाएगी इसे?”

 

अम्मा ने उसकी आंखों में देखकर कहा, “जब तक सांस है, अपने घर की रखवाली खुद करूंगी।”

 

कुछ दिनों बाद अम्मा अचानक बीमार पड़ गई।

 

गांव वालों ने डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने कहा कि अम्मा को आराम की जरूरत है।

 

उस रात अम्मा ने अपने पुराने संदूक से बेटे की बचपन की तस्वीर निकाली।

 

तस्वीर को सीने से लगाकर बोली, “मोहन… तू जहां भी है, खुश रहना।”

 

उसी समय बाहर से आवाज आई।

 

“अम्मा!”

 

सोनू दरवाजे पर खड़ा था।

 

उसके साथ उसकी मां भी थी।

 

“अम्मा, आप बीमार हैं और आपने हमें बताया भी नहीं?”

 

अम्मा ने कमजोर आवाज में कहा, “मैं ठीक हूं बेटा।”

 

सोनू की मां बोली, “अब आप अकेली नहीं रहेंगी। हम रोज आपके पास आएंगे।”

 

अम्मा की आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

“मैंने तो सोचा था, बुढ़ापे में किसी को मेरी जरूरत नहीं होगी।”

 

सोनू ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“मुझे आपकी जरूरत है अम्मा।”

 

यह सुनकर अम्मा मुस्कुरा दी।

 

कुछ दिनों बाद मोहन अचानक गांव आया।

 

अम्मा उसे देखते ही दरवाजे तक दौड़ी।

 

“मोहन!”

 

मोहन ने मां को गले लगा लिया।

 

काफी देर तक दोनों चुप रहे।

 

फिर मोहन की आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

“अम्मा, मुझे माफ कर दो।”

 

अम्मा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“बेटा, मां अपने बच्चे से नाराज नहीं रहती।”

 

मोहन बोला, “मैंने सोचा था आप गांव में खुश होंगी। लेकिन मुझे पता नहीं था कि आप इतनी अकेली हो गई हैं।”

 

अम्मा ने मुस्कुराकर कहा, “अब अकेली कहां हूं?”

 

तभी बाहर से सोनू की आवाज आई—

 

“अम्मा! मैं आ गया!”

 

फिर कई बच्चे दौड़ते हुए अंदर आए।

 

मोहन उन्हें देखकर मुस्कुराया।

 

उसने मां की ओर देखा और कहा, “अम्मा, लगता है आपने अपना पूरा परिवार बना लिया।”

 

अम्मा हंस पड़ी।

 

“परिवार खून से नहीं, बेटा… अपनापन से बनता है।”

 

उस दिन मोहन ने फैसला किया कि वह हर महीने गांव आएगा और मां को अपने साथ ले जाने की जिद नहीं करेगा। क्योंकि अब वह समझ चुका था कि अम्मा को सिर्फ छत नहीं चाहिए थी।

 

उसे अपनों की जरूरत थी।

 

उसके बाद अम्मा का घर गांव का सबसे प्यारा घर बन गया।

 

सुबह बच्चे वहां आते, दोपहर में पड़ोस की औरतें बैठतीं और शाम को मोहन फोन करता।

 

नीम के पेड़ के नीचे बैठी अम्मा अक्सर आसमान की ओर देखकर कहती—

 

“भगवान, मैंने सोचा था बुढ़ापे में मेरा घर सूना हो जाएगा… लेकिन आपने तो इसे लोगों के प्यार से भर दिया।”

 

और सच ही तो था।

 

अम्मा पहले अकेली रहती थी।

 

लेकिन अब उसके घर में रहने वाला कोई एक इंसान नहीं था।

 

उसका घर पूरे गांव का घर बन चुका था।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *