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लेखक: Alka Singh

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(part-2)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जमुना दादी की बात सुनकर अमन और उसके दोस्त चुप हो गए।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “दादी, आखिरी दुल्हन कौन थी?”

     

    दादी ने चारों तरफ देखा और धीमी आवाज में बोलीं—

     

    “कुसुम।”

     

    “वही लड़की जो दस साल पहले पार्लर में बेहोश मिली थी?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    फिर उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनाई।

     

    कुसुम की शादी शहर में रहने वाले एक आदमी से होने वाली थी। शादी के दिन उसे सजने के लिए सजनी के पार्लर में भेजा गया था।

     

    लेकिन सजनी उस दिन बहुत परेशान थी।

     

    कहा जाता है कि कुछ दिन पहले उसने किसी पुराने ग्राहक की तस्वीर में एक अजीब औरत देखी थी।

     

    वह औरत हर तस्वीर में दिखाई देती थी।

     

    लेकिन जब सजनी तस्वीर खींचती तो आसपास कोई नहीं होता।

     

    धीरे-धीरे सजनी को उस औरत के सपने आने लगे।

     

    सपने में वह औरत कहती—

     

    “मुझे भी दुल्हन बनाओ।”

     

    सजनी ने इसे अपना वहम समझा।

     

    लेकिन जिस दिन कुसुम पार्लर आई, वही औरत पहली बार शीशे में दिखाई दी।

     

    सजनी डर गई।

     

    उसने कुसुम से कहा—

     

    “आज श्रृंगार मत करवाओ। घर चली जाओ।”

     

    लेकिन तभी पार्लर का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    शीशे पर धुंध छा गई।

     

    और उसमें एक शब्द लिखा दिखाई दिया—

     

    “दुल्हन…”

     

    इसके बाद क्या हुआ, किसी को पता नहीं चला।

     

    कुसुम बेहोश मिली।

     

    सजनी गायब थी।

     

    और शीशे पर वह डरावना संदेश लिखा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन सजनी की आत्मा हमें क्यों परेशान कर रही है?”

     

    दादी ने कहा—

     

    “शायद वह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती। शायद वह किसी को अपना सच बताना चाहती है।”

     

    उसी शाम अमन ने अपने दोस्तों के साथ पार्लर जाने का फैसला किया।

     

    इस बार वे अकेले नहीं गए।

     

    जमुना दादी भी उनके साथ थीं।

     

    पार्लर का ताला अब भी लगा था।

     

    दादी ने अपनी चाबी निकाली।

     

    अमन हैरान रह गया।

     

    “आपके पास इसकी चाबी?”

     

    दादी बोलीं—

     

    “सजनी ने मरने से पहले नहीं… गायब होने से पहले मुझे दी थी।”

     

    दरवाजा खुला।

     

    अंदर धूल और मकड़ी के जाले थे।

     

    पुरानी कॉस्मेटिक की बोतलें अब भी मेज पर रखी थीं।

     

    एक कोने में टूटा हुआ हेयर ड्रायर पड़ा था।

     

    और सामने वही बड़ा शीशा।

     

    अमन ने शीशे को देखा।

     

    उसमें कमरा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन अचानक…

     

    शीशे में कमरे का दरवाजा बंद दिखाई दिया।

     

    जबकि असली दरवाजा खुला था।

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    फिर शीशे में देखा।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    और उसके सामने…

     

    एक दुल्हन खड़ी थी।

     

    लाल जोड़ा।

     

    भारी घूँघट।

     

    हाथों में लाल चूड़ियाँ।

     

    अमन ने घबराकर पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    दुल्हन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने धीरे-धीरे अपना घूँघट उठाया।

     

    चेहरा कुसुम का था।

     

    लेकिन उसकी आँखें बिल्कुल सफेद थीं।

     

    अचानक पार्लर की सारी लाइटें अपने आप जल गईं।

     

    हेयर ड्रायर चलने लगा।

     

    कंघियाँ अपने आप घूमने लगीं।

     

    और शीशे पर एक के बाद एक शब्द उभरने लगे—

     

    “सजनी ने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर सजनी कहाँ है?”

     

    शीशे पर अगला संदेश आया—

     

    “वह यहाँ है।”

     

    अचानक कमरे के पीछे से किसी के रोने की आवाज आई।

     

    सभी पलटे।

     

    एक पुराने पर्दे के पीछे किसी की परछाईं थी।

     

    अमन ने पर्दा हटाया।

     

    वहाँ एक छोटा कमरा था।

     

    दीवार पर बहुत सारी तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में गाँव की अलग-अलग दुल्हनें थीं।

     

    लेकिन हर तस्वीर के पीछे वही काली औरत दिखाई दे रही थी।

     

    जमुना दादी ने काँपते हुए कहा—

     

    “हे भगवान…”

     

    दीवार के आखिरी हिस्से में एक तस्वीर थी।

     

    उसमें सजनी खड़ी थी।

     

    उसके पीछे वही काली औरत।

     

    और तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “अगली दुल्हन कौन?”

     

    तभी पार्लर का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    चारों तरफ अंधेरा छा गया।

     

    कुसुम की आवाज आई—

     

    “सच बताओ… नहीं तो अगली दुल्हन तुम्हारे गाँव से होगी।”

     

    अमन चिल्लाया—

     

    “क्या सच?”

     

    आवाज आई—

     

    “सजनी को किसने मारा?”

     

    जमुना दादी अचानक जमीन पर बैठ गईं।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “मैं जानती हूँ।”

     

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

     

    दादी ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “सजनी को किसी भूत ने नहीं मारा था।”

     

    “फिर?”

     

    “उसे इंसानों ने मारा था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    दादी ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में गाँव के चार आदमी खड़े थे।

     

    उनमें से एक था…

     

    जमुना दादी का बेटा।

     

    दादी रोते हुए बोलीं—

     

    “सजनी ने देख लिया था कि गाँव का एक आदमी लड़कियों के साथ धोखा करता था। उसने सबको बताने की धमकी दी थी। उन लोगों ने उसे डराने की कोशिश की। झगड़ा हुआ… और सजनी की मौत हो गई।”

     

    “फिर उसकी लाश?”

     

    “उसे इसी पार्लर के पीछे पुराने कुएँ में फेंक दिया गया।”

     

    अचानक जमीन के नीचे से जोरदार आवाज आई।

     

    धम्म!

     

    पार्लर की फर्श में दरार पड़ गई।

     

    और उस दरार के अंदर से…

     

    एक पुराना लाल दुपट्टा दिखाई दिया।

     

    अमन ने दुपट्टा खींचा।

     

    उसके नीचे हड्डियाँ थीं।

     

    जमुना दादी चीख पड़ीं।

     

    तभी शीशे में सजनी दिखाई दी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मेरा सच सामने आएगा…”

     

    और अगले ही पल शीशा पूरी तरह टूट गया।

  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(part-1)

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव रामपुरवा में शाम होते ही लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। गाँव बहुत बड़ा नहीं था। चारों तरफ खेत, आम के पेड़, मिट्टी की सड़कें और दूर तक फैले सरसों के खेत थे।

     

    लेकिन गाँव की सबसे अजीब जगह थी—पुरानी हवेली के सामने बना एक छोटा-सा पार्लर।

     

    उसका नाम था “सजनी ब्यूटी पार्लर”।

     

    करीब दस साल पहले तक वहाँ खूब चहल-पहल रहती थी। गाँव की लड़कियाँ शादी-ब्याह और त्योहारों पर सजने के लिए वहीं जाती थीं।

     

    पार्लर की मालकिन थी सजनी।

     

    सजनी बहुत खूबसूरत और हँसमुख महिला थी। वह गाँव की लड़कियों को मेहंदी लगाती, बाल बनाती और दुल्हनों का श्रृंगार करती थी।

     

    लेकिन एक रात अचानक सजनी गायब हो गई।

     

    पार्लर खुला था।

     

    अंदर कुर्सी पर एक दुल्हन बैठी थी।

     

    लेकिन सजनी कहीं नहीं थी।

     

    दुल्हन का नाम था कुसुम।

     

    जब लोगों ने उसे देखा तो वह बेहोश थी।

     

    उसके सामने शीशे पर लाल रंग से सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “दुल्हन अभी अधूरी है…”

     

    उस दिन के बाद पार्लर हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि रात के समय बंद पार्लर के अंदर से कभी-कभी हेयर ड्रायर चलने की आवाज आती है।

     

    कभी चूड़ियों की खनखनाहट।

     

    और कभी किसी औरत के धीरे-धीरे गुनगुनाने की आवाज।

     

    लेकिन गाँव का 18 साल का लड़का अमन इन बातों को बकवास समझता था।

     

    अमन शहर में पढ़ाई करता था और छुट्टियों में गाँव आया हुआ था।

     

    उसके दोस्त थे—सोनू, दीपक और राकेश।

     

    एक शाम चारों चाय की दुकान पर बैठे थे।

     

    सोनू ने कहा—

     

    “कल रात मैंने पुराने पार्लर की खिड़की में किसी को देखा था।”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “बिल्ली होगी।”

     

    दीपक बोला—

     

    “बिल्ली चूड़ी पहनकर गाना गाती है क्या?”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    राकेश ने कहा—

     

    “मेरे दादा कहते हैं, सजनी की आत्मा अभी भी उस पार्लर में है।”

     

    अमन ने हँसते हुए कहा—

     

    “आज रात चलते हैं। देखते हैं कौन है अंदर।”

     

    तीनों दोस्त पहले तो डर गए, लेकिन अमन के पीछे चल पड़े।

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे चारों गाँव से बाहर निकले।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

     

    पुरानी हवेली के पास पहुँचते ही अमन की टॉर्च अचानक झपकने लगी।

     

    “बैटरी खत्म हो रही है,” उसने कहा।

     

    पार्लर सामने था।

     

    दरवाजे पर मोटा ताला लगा हुआ था।

     

    खिड़कियों पर धूल जमी थी।

     

    अमन ने टॉर्च खिड़की के अंदर डाली।

     

    अंदर एक पुरानी कुर्सी थी।

     

    उसके सामने बड़ा-सा शीशा लगा था।

     

    अचानक…

     

    टक!

     

    शीशे पर अंदर से किसी ने हाथ मारा।

     

    चारों पीछे हट गए।

     

    “चलो यहाँ से,” राकेश ने कहा।

     

    लेकिन अमन ने खिड़की के पास जाकर फिर टॉर्च डाली।

     

    इस बार शीशे में चारों लड़कों का प्रतिबिंब दिखाई दिया।

     

    लेकिन उनके पीछे…

     

    एक पाँचवीं औरत खड़ी थी।

     

    लंबे काले बाल।

     

    लाल साड़ी।

     

    और हाथ में कंघी।

     

    अमन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने फिर शीशे की तरफ देखा।

     

    औरत अब भी वहाँ थी।

     

    वह धीरे-धीरे अपने बालों में कंघी कर रही थी।

     

    फिर उसने शीशे के अंदर से अमन की तरफ देखकर मुस्कुराया।

     

    अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

     

    चारों भागकर गाँव की तरफ दौड़े।

     

    घर पहुँचकर अमन ने सोचा कि शायद डर की वजह से उसे भ्रम हुआ होगा।

     

    लेकिन अगली सुबह उसके कमरे में एक चीज पड़ी थी।

     

    एक पुरानी कंघी।

     

    उस कंघी में लंबे काले बाल उलझे हुए थे।

     

    और उसके नीचे एक छोटी-सी चिट्ठी थी—

     

    “कल दुल्हन बनकर आना।”

     

    अमन ने चिट्ठी पढ़ी तो उसके हाथ काँपने लगे।

     

    तभी बाहर से सोनू की आवाज आई—

     

    “अमन! जल्दी बाहर आ!”

     

    अमन बाहर आया।

     

    सोनू की हालत खराब थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरे घर में भी यही कंघी मिली है।”

     

    दीपक और राकेश भी वहाँ पहुँच गए।

     

    तीनों के हाथ में भी वैसी ही कंघियाँ थीं।

     

    और चारों कंघियों में…

     

    एक जैसे लंबे काले बाल उलझे हुए थे।

     

    तभी गाँव की सबसे बुजुर्ग महिला जमुना दादी उनके पास आईं।

     

    उन्होंने कंघी देखते ही अपना चेहरा गंभीर कर लिया।

     

    “तुम लोगों ने पार्लर खोल दिया है क्या?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “नहीं दादी।”

     

    जमुना दादी ने धीरे से कहा—

     

    “तो फिर सजनी ने तुम्हें चुन लिया है।”

     

    चारों लड़कों के चेहरों का रंग उड़ गया।

     

    “किसलिए?”

     

    दादी ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि उस पार्लर की आखिरी दुल्हन आज तक घर नहीं पहुँची थी…”

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    रामसेवक की बात सुनकर पूरा गाँव सन्न रह गया।

     

    उस रात पंचायत बुलाई गई।

     

    रामसेवक ने सबके सामने अपनी कहानी बताई।

     

    पचास साल पहले वह जवान था। उसके साथ गाँव के दो और आदमी—लालमन और जग्गा—भैरव के दोस्त थे।

     

    भैरव ने गौरी को मारने की योजना बनाई थी।

     

    लेकिन जब गौरी ने विरोध किया तो मामला बिगड़ गया।

     

    रामसेवक ने बताया—

     

    “हमने गौरी को डराने के लिए श्मशान तक ले गए थे। हमारा इरादा उसे मारने का नहीं था। लेकिन भैरव ने गुस्से में उसका गला दबा दिया।”

     

    गाँव के लोग स्तब्ध रह गए।

     

    “फिर क्या हुआ?” रघु ने पूछा।

     

    रामसेवक रोते हुए बोला—

     

    “गौरी मर चुकी थी। हम तीनों डर गए। हमने उसे बरगद के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। भैरव ने हमसे कहा कि अगर किसी को बताया तो वह हम सबको बर्बाद कर देगा।”

     

    “फिर भैरव कहाँ गया?”

     

    “वह रातों-रात गाँव छोड़कर चला गया।”

     

    उसके बाद लालमन और जग्गा भी धीरे-धीरे गाँव छोड़ गए।

     

    रामसेवक अकेला रह गया।

     

    उसने इतने वर्षों तक किसी को सच नहीं बताया।

     

    पंडित हरिदास ने कहा—

     

    “शायद गौरी की आत्मा इसी वजह से भटक रही है। उसे न्याय नहीं मिला।”

     

    अगले दिन गाँव वालों ने गौरी की हड्डियों को विधि-विधान से निकाला।

     

    श्मशान घाट की सफाई की गई।

     

    गौरी के नाम से पूजा रखी गई।

     

    लेकिन रात होते ही फिर वही डरावनी घटना शुरू हो गई।

     

    आसमान में अचानक बादल घिर आए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    बरगद का पेड़ बुरी तरह हिलने लगा।

     

    गाँव के लोगों ने देखा कि पेड़ की शाखाओं पर सफेद कपड़े लटक रहे हैं।

     

    और फिर…

     

    एक-एक करके श्मशान की सारी चिताओं की राख हवा में उड़ने लगी।

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    पेड़ के नीचे सफेद साड़ी वाली गौरी दिखाई दी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था।

     

    वह बहुत उदास लग रही थी।

     

    उसने रामसेवक की तरफ देखा।

     

    रामसेवक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

     

    “गौरी… मुझे माफ कर दो।”

     

    गौरी धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाया।

     

    रामसेवक की आँखों के सामने अचानक पचास साल पुराना दृश्य दिखाई देने लगा।

     

    गौरी रो रही थी।

     

    वह मदद के लिए पुकार रही थी।

     

    और रामसेवक खड़ा होकर सब देख रहा था।

     

    रामसेवक जमीन पर गिर पड़ा।

     

    “मुझे माफ कर दो!”

     

    गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    फिर उसने पीछे मुड़कर बरगद के पेड़ को देखा।

     

    अचानक पेड़ की एक बड़ी शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।

     

    शाखा के नीचे से एक पुरानी लोहे की पेटी दिखाई दी।

     

    रघु ने पेटी खोली।

     

    उसमें भैरव की एक चिट्ठी थी।

     

    चिट्ठी में लिखा था—

     

    “गौरी की मौत का जिम्मेदार मैं हूँ। अगर कभी यह चिट्ठी किसी को मिले तो समझ लेना कि रामसेवक, लालमन और जग्गा ने सिर्फ मेरी मदद की थी। असली अपराधी मैं हूँ।”

     

    यह चिट्ठी सबूत बन गई।

     

    गाँव के लोगों ने गौरी के लिए न्याय की प्रार्थना की।

     

    उसी रात पहली बार श्मशान में अजीब शांति थी।

     

    हवा बंद हो गई।

     

    कुत्तों का भौंकना बंद हो गया।

     

    पेड़ की शाखाएँ बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    गौरी की आत्मा आखिरी बार दिखाई दी।

     

    उसने रघु की तरफ देखा।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “अब… मुझे जाने दो।”

     

    रघु ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “तुम्हें न्याय मिलेगा।”

     

    गौरी की आकृति धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    कुछ ही क्षणों में वह धुएँ की तरह हवा में घुल गई।

     

    उस रात के बाद किसी ने श्मशान से रोने की आवाज नहीं सुनी।

     

    लेकिन बरगद का पेड़ फिर भी वहीं खड़ा रहा।

     

    गाँव वालों ने उसे काटने का फैसला किया।

     

    पंडित हरिदास ने मना कर दिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “इसे मत काटो। यह पेड़ अब डर की निशानी नहीं, बल्कि हमें हमारे कर्मों की याद दिलाने वाली निशानी है।”

     

    तब से गाँव वालों ने उस जगह पर एक छोटा-सा पत्थर लगाया।

     

    उस पर लिखा—

     

    “अन्याय को देखकर चुप रहना भी अपराध है।”

     

    कई साल बीत गए।

     

    रघु बड़ा होकर शहर चला गया।

     

    मुन्ना और छोटू भी अपने-अपने काम में लग गए।

     

    लेकिन श्मशान का पेड़ आज भी बरवा गाँव में खड़ा है।

     

    गाँव के बच्चे आज भी उसकी कहानी सुनते हैं।

     

    लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात कभी-कभी पेड़ की शाखाओं के बीच सफेद रोशनी दिखाई देती है।

     

    लेकिन अब किसी को डर नहीं लगता।

     

    क्योंकि गाँव वाले जानते हैं कि वह गौरी की आत्मा नहीं…

     

    बल्कि उस पुराने इतिहास की याद है।

     

    इस कहानी की सीख यह है कि अंधविश्वास और डर के पीछे भागने के बजाय सच को समझना जरूरी है। उससे भी बड़ी बात—अगर हमारे सामने किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तो चुप रहना उस अन्याय को बढ़ावा देना है। गलत काम कितना भी पुराना क्यों न हो, एक दिन उसका सच सामने आता ही है। इसलिए डर से नहीं, बल्कि सच्चाई, इंसानियत और साहस से काम लेना चाहिए।

     

    और बरवा गाँव के लोग आज भी बच्चों से कहते हैं—

     

    “श्मशान के पेड़ से मत डरो… उस गलती से डरो, जो इंसान को इंसान के खिलाफ खड़ा कर दे।”

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अगली सुबह रघु ने दीवार पर बना निशान देखा तो उसके होश उड़ गए।

     

    उसने रात की बात किसी को नहीं बताई।

     

    उसे डर था कि अगर घरवालों को पता चला तो उसकी खूब पिटाई होगी।

     

    लेकिन उसी दिन एक अजीब घटना हुई।

     

    मुन्ना के घर के बाहर भी वही निशान बना था।

     

    फिर छोटू के दरवाजे पर भी।

     

    और कालू के घर की पिछली दीवार पर भी।

     

    चारों दोस्त दोपहर में गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे मिले।

     

    मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

     

    “ये हमारे घरों तक कैसे आया?”

     

    रघु चुप था।

     

    छोटू बोला—

     

    “हमें गाँव के पंडित जी के पास जाना चाहिए।”

     

    चारों पंडित हरिदास के घर पहुँचे।

     

    पंडित जी गाँव के सबसे बुजुर्ग लोगों में से एक थे। उन्होंने चारों की बात ध्यान से सुनी और फिर कुछ देर चुप रहे।

     

    “तुम लोग श्मशान के पेड़ के पास गए थे?”

     

    रघु ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    पंडित जी ने गहरी साँस ली।

     

    “मैंने तुम्हारे दादा-दादियों को भी इस पेड़ की कहानी बताते सुना था। लेकिन उस पेड़ का रहस्य आज तक किसी ने नहीं जाना।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “कौन थी वो औरत?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “उसका नाम गौरी था।”

     

    फिर उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनानी शुरू की।

     

    करीब पचास साल पहले गौरी इसी गाँव में रहती थी। वह बहुत गरीब परिवार की लड़की थी। उसकी शादी गाँव के ही एक आदमी से हुई थी, जिसका नाम भैरव था।

     

    भैरव बहुत लालची और क्रूर आदमी था।

     

    गौरी के पिता ने शादी में अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया था, लेकिन भैरव की लालच खत्म नहीं हुई।

     

    एक दिन उसने गौरी के पिता से और पैसे माँगे।

     

    पैसे नहीं मिले।

     

    कुछ दिनों बाद गौरी अचानक गायब हो गई।

     

    गाँव में खबर फैली कि वह अपने मायके चली गई है।

     

    लेकिन उसके पिता को विश्वास नहीं हुआ।

     

    उन्होंने कई दिनों तक उसे खोजा।

     

    एक रात उन्हें श्मशान के पास गौरी की चप्पल मिली।

     

    अगले दिन भैरव भी गाँव से गायब हो गया।

     

    किसी को कुछ समझ नहीं आया।

     

    कई साल बाद श्मशान के पास खुदाई के दौरान कुछ हड्डियाँ मिलीं।

     

    लेकिन यह साबित नहीं हो पाया कि वे गौरी की थीं।

     

    पंडित जी बोले—

     

    “लोगों का मानना है कि गौरी को उसी बरगद के नीचे मार दिया गया था।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “लेकिन वह हमें क्यों डरा रही है?”

     

    पंडित जी ने उसकी ओर गंभीर नजरों से देखा।

     

    “शायद इसलिए क्योंकि उसके साथ जो हुआ, उसका सच अभी भी दबा हुआ है।”

     

    चारों लड़के एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उस रात रघु के घर फिर अजीब घटना हुई।

     

    रात करीब दो बजे उसकी खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    ठंडी हवा कमरे में भर गई।

     

    रघु की आँख खुली।

     

    उसे लगा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है।

     

    वही सफेद साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    रघु ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    वह आकृति धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    फिर उसके कान में आवाज आई—

     

    “सच… पेड़ के नीचे…”

     

    और वह गायब हो गई।

     

    सुबह रघु ने यह बात मुन्ना को बताई।

     

    दोनों ने तय किया कि उन्हें श्मशान जाकर देखना होगा।

     

    इस बार वे दिन में गए।

     

    पेड़ के पास उन्हें जमीन पर एक पुरानी लोहे की अंगूठी मिली।

     

    अंगूठी पर एक नाम खुदा था—

     

    “भैरव”

     

    रघु के हाथ काँपने लगे।

     

    उन्होंने पेड़ के आसपास जमीन को ध्यान से देखा।

     

    एक जगह मिट्टी बाकी जमीन से अलग थी।

     

    उन्होंने वहाँ खुदाई शुरू की।

     

    कुछ ही देर में फावड़ा किसी लोहे की चीज से टकराया।

     

    खनन!

     

    मिट्टी हटाई गई।

     

    नीचे एक पुराना लकड़ी का संदूक था।

     

    संदूक पर जंग लगा ताला लगा था।

     

    रघु ने ताला तोड़ा।

     

    अंदर एक पुरानी साड़ी, कुछ चूड़ियाँ और एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी थी।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “गौरी की आखिरी बातें।”

     

    रघु ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी में लिखा था कि भैरव गौरी को मारने की धमकी देता था।

     

    गौरी ने अपनी एक सहेली को बताया था कि भैरव ने गाँव के साहूकार से कर्ज लिया था और उस कर्ज को चुकाने के लिए वह गौरी के पिता से पैसे मांग रहा था।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मुझे कुछ हो जाए तो समझ लेना, मुझे श्मशान वाले बरगद के पास ले जाया गया है।”

     

    चारों लड़के डर गए।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    वे पलटे।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर पेड़ की शाखा से एक लाल कपड़ा नीचे गिरा।

     

    रघु ने कपड़ा उठाया।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में गौरी खड़ी थी।

     

    और उसके पीछे भैरव था।

     

    लेकिन तस्वीर का सबसे डरावना हिस्सा यह था कि गौरी के चेहरे पर लाल स्याही से एक बड़ा निशान बना था।

     

    उसी हाथ के निशान जैसा…

     

    जो उनके घरों पर बना था।

     

    अचानक मुन्ना चिल्लाया—

     

    “रघु! पीछे देख!”

     

    पेड़ के पीछे सफेद साड़ी वाली वही औरत खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी आँखों से खून बह रहा था।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ पेड़ की तरफ उठाया।

     

    और फिर जमीन की ओर इशारा किया।

     

    रघु समझ गया।

     

    “उसे कुछ और दिखाना है।”

     

    चारों ने उस जगह खुदाई शुरू कर दी।

     

    कुछ गहराई पर उन्हें इंसानी हड्डियाँ मिलीं।

     

    साथ में एक टूटी हुई चूड़ी थी।

     

    पंडित जी को बुलाया गया।

     

    उन्होंने हड्डियों को देखकर कहा—

     

    “ये शायद गौरी की हैं।”

     

    लेकिन तभी गाँव का एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

     

    उसका नाम था रामसेवक।

     

    उसने हड्डियों को देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

     

    रघु ने पूछा—

     

    “काका, आप कुछ जानते हैं?”

     

    रामसेवक की आँखों में डर था।

     

    वह बोला—

     

    “हाँ… मैं जानता हूँ।”

     

    सब उसकी ओर देखने लगे।

     

    रामसेवक ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “गौरी को भैरव ने नहीं मारा था…”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “तो किसने?”

     

    रामसेवक ने चारों तरफ देखा।

     

    फिर धीमे से बोला—

     

    “उसे गाँव के तीन लोगों ने मिलकर मारा था।”

     

    “कौन लोग?”

     

    रामसेवक कुछ बोल पाता, उससे पहले श्मशान के पेड़ से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    हवा तेज हो गई।

     

    पेड़ की सारी शाखाएँ एक साथ हिलने लगीं।

     

    और जमीन पर मिट्टी से अपने आप तीन शब्द लिखे गए—

     

    “नाम बताओ…”

     

    रामसेवक डर के मारे जमीन पर बैठ गया।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं सब बताऊँगा… लेकिन पहले मुझे अपने पाप का प्रायश्चित करना होगा।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “आप उन लोगों में से एक थे?”

     

    रामसेवक की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उसने सिर झुका दिया।

     

    “हाँ।”

     

    उसी क्षण पेड़ के पीछे से गौरी की आवाज आई—

     

    “सच… सबको सच बताओ…”

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बरवा में चारों तरफ खेत, आम के बाग और कच्ची पगडंडियाँ थीं। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना श्मशान घाट था। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची घास उगी रहती थी और पास में एक सूखी नदी बहती थी, जिसमें साल के ज्यादातर दिनों में सिर्फ थोड़ा-सा पानी रहता था।

     

    लेकिन उस श्मशान घाट की सबसे डरावनी चीज थी—वहाँ खड़ा एक विशाल बरगद का पेड़।

     

    गाँव के लोग उसे “श्मशान का पेड़” कहते थे।

     

    पेड़ इतना पुराना था कि उसकी जड़ें जमीन से बाहर निकलकर साँपों की तरह दूर-दूर तक फैली थीं। उसकी मोटी शाखाएँ पूरे श्मशान घाट पर इस तरह फैली थीं, जैसे कोई विशालकाय हाथ आसमान को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।

     

    गाँव में उस पेड़ को लेकर तरह-तरह की कहानियाँ मशहूर थीं।

     

    बुजुर्ग कहते थे कि करीब पचास साल पहले एक औरत की उसी पेड़ के नीचे मौत हुई थी। किसी ने कहा कि उसने आत्महत्या की थी, तो किसी का कहना था कि उसकी हत्या हुई थी। लेकिन उसकी मौत का सच कभी सामने नहीं आया।

     

    उसके बाद से रात में पेड़ के पास से गुजरने वाले लोगों को किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई देती थी।

     

    “हाय… मुझे बचा लो…”

     

    गाँव के बुजुर्ग हमेशा बच्चों को समझाते थे—

     

    “सूरज डूबने के बाद श्मशान की तरफ मत जाना।”

     

    लेकिन गाँव का एक लड़का था—रघु।

     

    रघु की उम्र लगभग सत्रह साल थी। वह बहुत निडर था और गाँव के लड़कों में सबसे ज्यादा शरारती भी। उसे भूत-प्रेत की कहानियों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।

     

    उसके तीन दोस्त थे—मुन्ना, छोटू और कालू।

     

    एक दिन शाम को चारों लड़के गाँव के बाहर क्रिकेट खेल रहे थे। तभी मुन्ना ने कहा—

     

    “रघु, आज रात तू हमारे साथ श्मशान वाले पेड़ तक चलकर दिखा।”

     

    रघु हँस पड़ा।

     

    “इसमें कौन-सी बड़ी बात है?”

     

    छोटू बोला, “सुना है, जो उस पेड़ को आधी रात में छू ले, उसके पीछे कोई आत्मा घर तक आती है।”

     

    रघु ने मजाक उड़ाते हुए कहा—

     

    “अरे, तुम लोगों ने भूत देखा भी है कभी?”

     

    कालू ने धीरे से कहा—

     

    “मेरे चाचा ने देखा था।”

     

    “क्या देखा था?”

     

    “एक औरत… सफेद साड़ी में। उसका चेहरा नहीं था।”

     

    तीनों लड़के कुछ पल के लिए चुप हो गए।

     

    रघु ने हँसते हुए कहा—

     

    “आज रात मैं उस पेड़ को छूकर वापस आऊँगा। अगर भूत मिला तो उसे भी क्रिकेट खिलाऊँगा।”

     

    चारों ने तय कर लिया कि रात को करीब ग्यारह बजे वे श्मशान जाएँगे।

     

    रात हुई।

     

    गाँव में धीरे-धीरे सन्नाटा फैलने लगा। घरों के दरवाजे बंद हो गए। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। आसमान में बादल थे और चाँद कभी दिखाई देता, कभी बादलों के पीछे छिप जाता।

     

    रघु अपने घर से चुपचाप निकला।

     

    उसके हाथ में एक टॉर्च थी।

     

    मुन्ना, छोटू और कालू पहले से ही गाँव के बाहर उसका इंतजार कर रहे थे।

     

    चारों धीरे-धीरे श्मशान की ओर चल पड़े।

     

    जैसे-जैसे वे श्मशान के पास पहुँचे, हवा ठंडी होती गई।

     

    पेड़ों के पत्ते बिना हवा के ही हिलने लगे।

     

    छोटू ने डरते हुए पूछा—

     

    “रघु… वापस चलें?”

     

    रघु ने कहा—

     

    “डरपोक मत बन।”

     

    कुछ दूर जाने के बाद श्मशान का विशाल बरगद दिखाई देने लगा।

     

    टॉर्च की रोशनी उसकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाओं पर पड़ी तो ऐसा लगा जैसे पेड़ की शाखाएँ किसी बूढ़े आदमी की उंगलियाँ हों।

     

    अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीन बार किसी चीज के जमीन पर गिरने की आवाज आई।

     

    चारों रुक गए।

     

    “ये आवाज कहाँ से आई?” मुन्ना ने फुसफुसाकर पूछा।

     

    रघु ने टॉर्च घुमाई।

     

    कुछ दिखाई नहीं दिया।

     

    फिर अचानक दूर से किसी औरत के रोने की आवाज आई।

     

    “हूँ… हूँ… मुझे बचा लो…”

     

    छोटू का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “रघु… चल यहाँ से।”

     

    रघु ने खुद को संभालते हुए कहा—

     

    “किसी जानवर की आवाज होगी।”

     

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

     

    पेड़ के तने पर एक अजीब निशान बना था। वह निशान किसी हाथ जैसा था।

     

    रघु ने टॉर्च पास की।

     

    तभी उसे लगा कि पेड़ के पीछे कोई खड़ा है।

     

    सफेद कपड़े में एक औरत।

     

    रघु ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह पीछे हटा।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “रघु…”

     

    रघु का शरीर जम गया।

     

    उसने तुरंत पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    “तुम लोगों ने मेरा नाम लिया?”

     

    मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

     

    “नहीं…”

     

    “मैंने भी नहीं,” छोटू बोला।

     

    कालू तो बोल ही नहीं पा रहा था।

     

    तभी पेड़ की सबसे ऊँची शाखा से एक सूखी टहनी टूटकर जमीन पर गिरी।

     

    रघु ने हिम्मत करके पेड़ के तने को छू लिया।

     

    उसी क्षण टॉर्च बंद हो गई।

     

    चारों तरफ घना अंधेरा छा गया।

     

    और फिर…

     

    किसी औरत की जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    “भागोऽऽऽ!”

     

    चारों लड़के चीखते हुए गाँव की ओर भागे।

     

    रघु सबसे आगे था।

     

    लेकिन दौड़ते समय उसे ऐसा महसूस हुआ कि कोई उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा है।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    अंधेरे में एक सफेद साड़ी पहने औरत खड़ी थी।

     

    उसके लंबे बाल जमीन तक लटक रहे थे।

     

    रघु की सांस रुक गई।

     

    वह औरत धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगी।

     

    लेकिन उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    सिर्फ दो चमकती हुई आँखें थीं।

     

    रघु ने आँखें बंद कीं और पूरी ताकत से गाँव की तरफ भागा।

     

    घर पहुँचने के बाद उसने दरवाजा बंद किया और चारपाई पर गिर पड़ा।

     

    उस रात उसे नींद नहीं आई।

     

    सुबह जब वह उठा तो उसके कमरे की दीवार पर मिट्टी से एक निशान बना था।

     

    वही निशान…

     

    जो श्मशान के पेड़ पर बना था।

     

    और उसके नीचे लिखा था—

     

    “तुमने मुझे देखा है… अब मैं तुम्हें देखती रहूँगी।”

  • 😱शिनिगामी 😱 (मौत का संदेशवाहक)😱

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    मंदिर की दीवार पर लिखे शब्दों को देखकर हारुतो की साँस रुक गई।

     

    “हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

     

    उसके सामने खड़ा शिनिगामी बिल्कुल स्थिर था।

     

    उसका चेहरा इंसान जैसा था, लेकिन उस चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

     

    फिर भी हारुतो को महसूस हो रहा था कि वह उसे देख रहा है।

     

    बहुत देर तक मंदिर में कोई आवाज़ नहीं हुई।

     

    अचानक शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली सीधे हारुतो की तरफ थी।

     

    “तुम्हारे पूर्वजों ने मुझे जन्म दिया था।”

     

    उसकी आवाज़ इंसान की आवाज़ नहीं थी।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कई बूढ़े लोग एक साथ बोल रहे हों।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    “मैंने क्या किया है?”

     

    शिनिगामी ने उत्तर दिया,

     

    “तुमने कुछ नहीं किया।”

     

    कुछ पल की खामोशी।

     

    “लेकिन तुम्हारे खून ने बहुत कुछ किया है।”

     

    हारुतो के पिता आगे आए।

     

    “उसे छोड़ दो!”

     

    शिनिगामी ने अपना सिर पिता की तरफ घुमाया।

     

    “तुम पहले ही मर चुके हो।”

     

    पिता ने कहा,

     

    “लेकिन मैं उसका पिता हूँ।”

     

    शिनिगामी हँसा।

     

    “मृत लोग पिता नहीं होते।”

     

    अचानक उसके हाथ में पकड़ी घंटी बज उठी।

     

    टन…

     

    पिता जमीन पर गिर पड़े।

     

    हारुतो चीख पड़ा।

     

    “पापा!”

     

    उसने उन्हें उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उनके शरीर से धुआँ निकल रहा था।

     

    पिता ने कमजोर आवाज़ में कहा,

     

    “हारुतो… मंदिर के पीछे वाला दरवाज़ा…”

     

    “क्या?”

     

    “वहीं से सब शुरू हुआ था।”

     

    शिनिगामी उनकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    पिता ने आखिरी बार कहा,

     

    “अपनी दादी को ढूँढो।”

     

    हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

     

    “दादी तो—”

     

    “वह अभी जिंदा है।”

     

    अगले ही पल पिता का शरीर राख में बदल गया।

     

    हारुतो चीख उठा।

     

    लेकिन शिनिगामी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब केवल तुम बचे हो।”

     

    हारुतो मंदिर के पीछे बने लकड़ी के दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    नीचे जाने वाली पत्थर की सीढ़ियाँ थीं।

     

    वह तेजी से नीचे उतरने लगा।

     

    सीढ़ियाँ इतनी लंबी थीं कि उसे लग रहा था जैसे वह जमीन के अंदर नहीं, बल्कि किसी दूसरी दुनिया में जा रहा हो।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।

     

    एक चित्र में गाँव के लोग एक काले कपड़े पहने आदमी के सामने खड़े थे।

     

    दूसरे चित्र में वही आदमी एक घंटी पकड़े हुए था।

     

    तीसरे चित्र में…

     

    एक बच्चा था।

     

    उस बच्चे के सामने वही शिनिगामी खड़ा था।

     

    हारुतो रुक गया।

     

    चित्र के नीचे पुराने जापानी अक्षरों में कुछ लिखा था।

     

    वह उसे पूरी तरह पढ़ नहीं पा रहा था, लेकिन एक शब्द पहचान गया।

     

    “कुरोमोरी।”

     

    तभी पीछे से कदमों की आवाज़ आई।

     

    हारुतो ने पीछे देखा।

     

    सीढ़ियों के ऊपर कोई खड़ा था।

     

    उसकी दादी।

     

    “हारुतो…”

     

    हारुतो दौड़कर उनके पास गया।

     

    “दादी!”

     

    दादी ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “सच क्या है?”

     

    दादी कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “आज तुम्हें सब जानना होगा।”

     

    वे उसे एक विशाल भूमिगत कमरे में ले गईं।

     

    कमरे के बीचों-बीच पत्थर की एक वेदी थी।

     

    उसके ऊपर वही लोहे की घंटी रखी थी।

     

    दादी ने कहा,

     

    “सौ साल पहले तुम्हारे परदादा ने मौत से बात करने की कोशिश की थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “तुम्हारी परदादी मर रही थीं।”

     

    हारुतो चुप रहा।

     

    “उन्होंने एक पुरानी किताब में एक अनुष्ठान पढ़ा। उस अनुष्ठान के जरिए उन्होंने मृत्यु को रोकने की कोशिश की।”

     

    “और शिनिगामी पैदा हुआ?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। शिनिगामी पहले से था।”

     

    उन्होंने घंटी की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे परदादा ने उसे इंसानों की दुनिया में बुलाया।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “शुरुआत में शिनिगामी ने सौदा किया।”

     

    “कैसा सौदा?”

     

    “वह एक इंसान की जान बचाएगा… बदले में हर पचास साल में उसी परिवार की एक आत्मा उसे देनी होगी।”

     

    हारुतो के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “और अगर परिवार ने मना किया?”

     

    दादी ने कहा,

     

    “तो वह पूरे गाँव की मौत चुनता।”

     

    हारुतो ने चारों तरफ देखा।

     

    “इसलिए गाँव के लोग उसे नहीं रोकते थे?”

     

    “वे डरते थे।”

     

    अचानक कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    हारुतो…

     

    हारुतो…

     

    हारुतो…

     

    दादी ने जल्दी से वेदी के नीचे से एक पुरानी किताब निकाली।

     

    “लेकिन तुम्हारे परदादा ने एक और गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    दादी ने किताब खोली।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस दिन परिवार का अंतिम वंशज जन्म लेगा, उसी दिन शिनिगामी की शक्ति समाप्त की जा सकती है।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “अंतिम वंशज मैं हूँ?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    दादी ने घंटी की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे बजाना होगा।”

     

    हारुतो ने घंटी उठाई।

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    दादी की आँखों में डर था।

     

    “घंटी तभी काम करेगी जब उसे शिनिगामी के सामने बजाया जाए।”

     

    “और फिर?”

     

    “जिस व्यक्ति ने घंटी बजाई… उसे अपनी सबसे प्यारी याद हमेशा के लिए खोनी होगी।”

     

    हारुतो ने किताब नीचे रख दी।

     

    “कौन-सी याद?”

     

    दादी ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई।

     

    “तुम्हारी माँ की।”

     

    हारुतो पलट गया।

     

    शिनिगामी कमरे के प्रवेश द्वार पर खड़ा था।

     

    उसके पीछे अंधेरा फैलता जा रहा था।

     

    दादी ने हारुतो को अपने पीछे कर लिया।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    दादी हवा में उठ गईं।

     

    हारुतो चीख पड़ा।

     

    “दादी!”

     

    शिनिगामी ने कहा,

     

    “तुम्हारे परिवार ने मुझे जन्म दिया।”

     

    फिर उसने दादी को जमीन पर फेंक दिया।

     

    “अब तुम्हारे परिवार का अंत होगा।”

     

    हारुतो ने घंटी उठाई।

     

    शिनिगामी उसकी तरफ बढ़ने लगा।

     

    हर कदम के साथ जमीन काँप रही थी।

     

    हारुतो पीछे हटता गया।

     

    उसके दिमाग में माँ की यादें घूमने लगीं।

     

    माँ का चेहरा।

     

    माँ की हँसी।

     

    बचपन में उसका हाथ पकड़कर चलना।

     

    बारिश में उसके लिए छाता लेकर आना।

     

    और आखिरी दिन…

     

    जब माँ ने मरने से पहले उससे कहा था—

     

    “डरना मत।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    शिनिगामी उसके सामने आ चुका था।

     

    “घंटी बजाओ।”

     

    हारुतो ने उसे देखा।

     

    “अगर मैं बजाऊँगा तो?”

     

    “तुम अपनी माँ को हमेशा के लिए भूल जाओगे।”

     

    हारुतो काँपने लगा।

     

    “और अगर नहीं बजाया?”

     

    शिनिगामी मुस्कुराया।

     

    “तो तुम्हारी दादी मरेंगी।”

     

    हारुतो ने दादी की तरफ देखा।

     

    वह जमीन पर पड़ी थीं।

     

    बहुत कमजोर।

     

    लेकिन उन्होंने आँखें खोलकर कहा,

     

    “बजा दो।”

     

    “दादी…”

     

    “तुम्हारी माँ ने भी यही चाहा होता।”

     

    हारुतो ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने घंटी उठाई।

     

    और पूरी ताकत से बजा दी।

     

    टन————————!

     

    आवाज़ पूरे भूमिगत कमरे में गूँज उठी।

     

    शिनिगामी पीछे हट गया।

     

    उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    उसका चेहरा फटने लगा।

     

    और पहली बार…

     

    उसके चेहरे पर आँखें दिखाई दीं।

     

    सैकड़ों आँखें।

     

    हर आँख में किसी मरे हुए इंसान का चेहरा था।

     

    शिनिगामी चीखने लगा।

     

    “नहीं!!!”

     

    हारुतो ने दूसरी बार घंटी बजाई।

     

    टन————————!

     

    पूरा मंदिर काँपने लगा।

     

    ऊपर गाँव के घरों की खिड़कियाँ टूटने लगीं।

     

    जंगल के पेड़ एक साथ झुक गए।

     

    और फिर तीसरी बार…

     

    हारुतो ने घंटी बजाई।

     

    टन————————!

     

    अचानक सब कुछ शांत हो गया।

     

    शिनिगामी गायब था।

     

    कमरे में सिर्फ हारुतो और उसकी दादी थे।

     

    दादी धीरे-धीरे उठीं।

     

    “खत्म हो गया।”

     

    हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

     

    “सच में?”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “हाँ।”

     

    हारुतो ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल उसने पूछा,

     

    “दादी… मेरी माँ कौन थी?”

     

    दादी का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    हारुतो ने फिर पूछा,

     

    “मेरी माँ कौन थी?”

     

    दादी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    हारुतो अपनी माँ को पूरी तरह भूल चुका था।

     

    उसके चेहरे की कोई तस्वीर उसे याद नहीं थी।

     

    उसकी आवाज़…

     

    उसकी हँसी…

     

    कुछ भी नहीं।

     

    वह रोने लगा।

     

    दादी ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम्हारी माँ बहुत अच्छी औरत थी।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “क्या वह मुझसे प्यार करती थी?”

     

    दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बहुत ज्यादा।”

     

    सुबह होने लगी।

     

    कुरोमोरी के ऊपर पहली बार कई वर्षों बाद साफ सूरज निकला।

     

    जंगल की धुंध गायब हो गई।

     

    गाँव के लोग अपने घरों से बाहर आने लगे।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन उसी शाम…

     

    हारुतो अपने घर में अकेला बैठा था।

     

    उसने पुराने सामान की एक पेटी खोली।

     

    अंदर उसकी माँ की एक तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर उठाई।

     

    वह तस्वीर में मौजूद औरत को देख रहा था।

     

    लेकिन उसके दिल में कोई पहचान नहीं थी।

     

    बस एक अजीब-सी खाली जगह थी।

     

    तभी…

     

    तस्वीर के पीछे कुछ गिरा।

     

    एक छोटी लोहे की घंटी।

     

    हारुतो ने उसे उठाया।

     

    उस पर खून से एक शब्द लिखा था—

     

    “समाप्त नहीं।”

     

    हारुतो के हाथ से घंटी गिर गई।

     

    उसी समय बाहर जंगल से…

     

    टन…

     

    एक घंटी बजी।

     

    हारुतो खिड़की की तरफ मुड़ा।

     

    जंगल के बीच एक काली आकृति खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह शिनिगामी नहीं था।

     

    वह उसकी माँ थी।

     

    वह दूर से उसे देख रही थी।

     

    और उसके होंठों पर एक मुस्कान थी।

     

    हारुतो ने धीरे से खिड़की खोली।

     

    हवा के साथ उसकी माँ की आवाज़ आई—

     

    “बेटा… तुमने मुझे याद तो नहीं रखा… लेकिन मैंने तुम्हें कभी नहीं भुलाया।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    और जंगल के भीतर वह आकृति धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गई।

     

    उस रात के बाद कुरोमोरी में कभी शिनिगामी की घंटी नहीं बजी।

     

    लेकिन गाँव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं—

     

    अगर किसी रात जापान के किसी सुनसान जंगल में आपको आधी रात को घंटी की आवाज़ सुनाई दे…

     

    तो पीछे मुड़कर मत देखना।

     

    क्योंकि हो सकता है…

     

    मौत आपको बुला नहीं रही हो।

     

    हो सकता है…

     

    वह सिर्फ यह देख रही हो कि आपको अब भी कौन याद है।

     

    समाप्त।

  • 😱 शिनिगामी 😱( मौत का संदेशवाहक)😱

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    “हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

     

    तहखाने में खड़ा हारुतो पत्थर की तरह जम गया।

     

    ऊपर से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    धीरे-धीरे वे कदम सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगे।

     

    हारुतो ने अपनी साँस रोक ली।

     

    उसे दादी की बात याद आई—

     

    “जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन तभी ऊपर से उसके पिता की आवाज़ आई।

     

    “हारुतो?”

     

    वह आवाज़ बिल्कुल वैसी ही थी।

     

    गहरी।

     

    शांत।

     

    जैसी आवाज़ वह बचपन से सुनता आया था।

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “पापा…?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ सेकंड बाद आवाज़ फिर आई।

     

    “बेटा, बाहर आओ।”

     

    हारुतो ने तहखाने के दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।

     

    तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।

     

    उसके पिता हमेशा उसे “हारु” कहकर बुलाते थे।

     

    कभी “हारुतो” नहीं।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह दरवाज़े से कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    फिर ऊपर से उसकी दादी की चीख सुनाई दी।

     

    “हारुतो! दरवाज़ा मत खोलना!”

     

    और उसके तुरंत बाद…

     

    एक भारी आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    हारुतो ने काँपते हाथों से दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

     

    उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।

     

    ऊपर का कमरा खाली था।

     

    लालटेन टूटी हुई थी।

     

    फर्श पर दादी की चादर पड़ी थी।

     

    लेकिन दादी कहीं नहीं थीं।

     

    हारुतो ने उन्हें पुकारा।

     

    “दादी?”

     

    कोई उत्तर नहीं।

     

    तभी उसे फर्श पर कुछ दिखाई दिया।

     

    काले रंग की मिट्टी से बने पैरों के निशान।

     

    वे दरवाज़े से शुरू होकर घर के पीछे वाले कमरे तक जा रहे थे।

     

    हारुतो उनके पीछे चल पड़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    अंदर से सड़ी हुई गंध आ रही थी।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    और जो उसने देखा, उसे देखकर उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    कमरे की दीवार पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    गाँव के लोगों की तस्वीरें।

     

    बच्चे।

     

    बूढ़े।

     

    औरतें।

     

    पुरुष।

     

    हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    कुछ तारीखें बहुत पुरानी थीं।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि कई तस्वीरों में लोगों के चेहरों पर लाल निशान बने थे।

     

    हारुतो ने एक तस्वीर उठाई।

     

    वह उसकी माँ की थी।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    12 अक्टूबर 2006

     

    और उसके नीचे एक शब्द था—

     

    “मृत।”

     

    हारुतो का गला सूख गया।

     

    उसकी माँ की मृत्यु भी 12 अक्टूबर 2006 को हुई थी।

     

    उसने अगली तस्वीर उठाई।

     

    उसके पिता की तस्वीर थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “मृत — 3 अगस्त 2014।”

     

    हारुतो के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    उसका पिता जिंदा था।

     

    कम से कम वह यही सोचता आया था।

     

    उसके पिता पिछले बारह वर्षों से शहर में काम कर रहे थे।

     

    हर महीने पैसे भेजते थे।

     

    हर कुछ दिनों में फोन करते थे।

     

    लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

     

    पिछले तीन महीनों से उसके पिता ने उसे फोन नहीं किया था।

     

    उन्होंने सिर्फ संदेश भेजे थे।

     

    छोटे-छोटे संदेश।

     

    “मैं ठीक हूँ।”

     

    “जल्द घर आऊँगा।”

     

    “दरवाज़ा रात में मत खोलना।”

     

    हारुतो के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी कमरे के कोने से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    हारुतो धीरे से मुड़ा।

     

    वहाँ एक छोटी लड़की बैठी थी।

     

    उसके बाल उसके पूरे चेहरे को ढके हुए थे।

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो काले खाली गड्ढे।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे भी यही सवाल पूछा था।”

     

    अचानक कमरे की सारी तस्वीरें अपने-आप हिलने लगीं।

     

    फिर एक साथ गिरने लगीं।

     

    धड़… धड़… धड़…

     

    लड़की गायब हो गई।

     

    हारुतो कमरे से भागकर बाहर आया।

     

    घर का मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    बाहर बारिश रुक चुकी थी।

     

    लेकिन जंगल की तरफ से धुंध गाँव में उतर रही थी।

     

    और उस धुंध के भीतर…

     

    एक आदमी खड़ा था।

     

    लंबा कोट।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    हाथ में पुरानी छतरी।

     

    हारुतो की आँखें फैल गईं।

     

    “पापा?”

     

    आदमी ने सिर उठाया।

     

    वह सचमुच उसका पिता था।

     

    हारुतो दौड़कर उसके पास गया।

     

    “पापा!”

     

    उसके पिता ने उसे गले लगा लिया।

     

    उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था।

     

    हारुतो काँप गया।

     

    “आप इतने साल कहाँ थे?”

     

    पिता ने कुछ नहीं कहा।

     

    हारुतो ने उनका चेहरा देखा।

     

    चेहरा वही था।

     

    लेकिन आँखें…

     

    उनमें कोई भाव नहीं था।

     

    “पापा?”

     

    पिता ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी दादी ने गलती की।”

     

    हारुतो ने घबराकर पूछा,

     

    “दादी कहाँ हैं?”

     

    पिता ने जंगल की तरफ देखा।

     

    “वह उसे रोकने गई है।”

     

    “किसे?”

     

    पिता ने उत्तर नहीं दिया।

     

    तभी जंगल के भीतर से घंटी बजी।

     

    टन…

     

    पिता का चेहरा बदल गया।

     

    “भागो।”

     

    “लेकिन—”

     

    “भागो!”

     

    उनकी आवाज़ अचानक इतनी तेज़ थी कि हारुतो पीछे हट गया।

     

    जंगल से कोई चीज़ उनकी तरफ आ रही थी।

     

    पेड़ों के बीच एक काली आकृति दिखाई दी।

     

    लंबे हाथ।

     

    झुका हुआ शरीर।

     

    और हाथ में वही लोहे की घंटी।

     

    शिनिगामी।

     

    हारुतो के पिता ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे, तो जवाब मत देना।”

     

    दोनों गाँव की तरफ भागने लगे।

     

    पीछे से घंटी लगातार बज रही थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    हर घंटी के साथ गाँव का एक घर अंधेरे में डूबता जा रहा था।

     

    पहले मंदिर की बत्तियाँ बुझीं।

     

    फिर स्कूल।

     

    फिर गाँव के घर।

     

    एक-एक करके पूरा गाँव अंधेरे में डूब गया।

     

    कुछ ही मिनटों में पूरा कुरोमोरी काली धुंध में घिर चुका था।

     

    पिता हारुतो को गाँव के पुराने मंदिर में ले गए।

     

    मंदिर का दरवाज़ा बंद करते हुए उन्होंने कहा,

     

    “यह जगह कुछ समय के लिए उसे रोक सकती है।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “आपको यह सब कैसे पता है?”

     

    पिता चुप रहे।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    पिता ने उसकी ओर देखा।

     

    “मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

     

    “नहीं!”

     

    हारुतो की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “मेरे पिता की मौत 2014 में हो चुकी थी।”

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर उसके पिता ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हें सच पता चल गया।”

     

    मंदिर के अंदर एक पुरानी घंटी लटकी थी।

     

    पिता ने उसे देखा।

     

    “बारह साल पहले मैं मर गया था।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “तो फिर आप…”

     

    “मैं यहाँ अपनी इच्छा से नहीं हूँ।”

     

    “कौन लाया आपको?”

     

    पिता ने धीमे स्वर में कहा,

     

    “शिनिगामी।”

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    “क्यों?”

     

    पिता ने मंदिर के फर्श पर बने एक पुराने निशान की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक गोल घेरा बना था।

     

    उसके चारों ओर जापानी अक्षरों जैसे चिन्ह खुदे थे।

     

    “हर पचास साल में शिनिगामी एक परिवार चुनता है।”

     

    “उस परिवार के किसी एक व्यक्ति को मृत्यु के बाद उसका सेवक बनना पड़ता है।”

     

    हारुतो ने डरते हुए पूछा,

     

    “और हमारा परिवार?”

     

    पिता ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “हमारा परिवार पिछले सौ साल से चुना जा रहा है।”

     

    तभी मंदिर के बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

     

    ठक…

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    फिर दूसरी दस्तक।

     

    ठक… ठक…

     

    पिता ने हारुतो के मुँह पर उंगली रख दी।

     

    बाहर से दादी की आवाज़ आई।

     

    “हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”

     

    हारुतो ने राहत की साँस ली।

     

    “दादी!”

     

    वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “वह दादी हैं!”

     

    पिता ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    बाहर से फिर आवाज़ आई।

     

    “हारुतो… मैं हूँ।”

     

    हारुतो दरवाज़े के पास गया और नीचे की दरार से बाहर देखने लगा।

     

    उसे दादी के पैर दिखाई दिए।

     

    वह वहीं खड़ी थीं।

     

    लेकिन…

     

    उनके पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    बाहर खड़ी चीज़ अचानक हँसने लगी।

     

    फिर दादी की आवाज़ बदल गई।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत कुछ बता दिया।”

     

    दरवाज़े पर एक लंबी काली उँगली दिखाई दी।

     

    “लेकिन एक बात नहीं बताई…”

     

    पिता का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    काली उँगली धीरे-धीरे दरवाज़े पर ऊपर की तरफ चलने लगी।

     

    “तुम्हारे परिवार को शिनिगामी ने क्यों चुना।”

     

    हारुतो ने पिता की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    पिता ने आँखें बंद कर लीं।

     

    बाहर से आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पूर्वजों ने…”

     

    एक लंबी खामोशी हुई।

     

    फिर दरवाज़े के पीछे से फुसफुसाहट आई—

     

    “पहले शिनिगामी को बनाया था।”

     

    मंदिर के अंदर अचानक सारी मोमबत्तियाँ जल उठीं।

     

    और सामने रखी बुद्ध की मूर्ति के पीछे…

     

    एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    हारुतो ने उसे पहले कभी नहीं देखा था।

     

    दरवाज़े पर खून से एक ही वाक्य लिखा था—

     

    “जिसने शिनिगामी को जन्म दिया, उसका अंतिम वंशज ही उसे खत्म कर सकता है।”

     

    हारुतो ने काँपते हुए पूछा,

     

    “अंतिम वंशज कौन है?”

     

    उसके पिता ने उसकी तरफ देखा।

     

    और पहली बार…

     

    उनकी आँखों में डर दिखाई दिया।

     

    “तुम।”

     

    उसी पल मंदिर की घंटी अपने-आप बज उठी।

     

    टन…

     

    और दूर जंगल से किसी ने चीखकर कहा—

     

    “हारुतो!!!”

     

    तीसरी घंटी बजते ही मंदिर की सारी खिड़कियाँ टूट गईं।

     

    काली धुंध अंदर भरने लगी।

     

    और उस धुंध के बीच…

     

    एक बहुत लंबी आकृति धीरे-धीरे मंदिर के अंदर प्रवेश कर गई।

     

    उसके चेहरे पर इस बार कोई आँखें नहीं थीं।

     

    लेकिन वह सीधे हारुतो को देख रही थी।

     

    शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    और उसकी हथेली पर एक नया नाम उभर आया—

     

    “हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

  • 😱 शिनिगामी 😱( मौत का संदेशवाहक )😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    जापान के एक छोटे-से पहाड़ी गाँव कुरोमोरी में सूरज ढलने के बाद कोई घर से बाहर नहीं निकलता था।

     

    गाँव के चारों तरफ घना जंगल था। उस जंगल के पेड़ इतने पुराने थे कि उनकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी जंगल के भीतर अजीब-सी धुंध रहती थी।

     

    लेकिन गाँव की सबसे डरावनी चीज़ जंगल नहीं था।

     

    वह थी…

     

    रात के बारह बजे बजने वाली घंटी।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि अगर किसी ने आधी रात को जंगल की तरफ से घंटी की आवाज़ सुन ली, तो अगले तीन दिनों के भीतर किसी की मौत निश्चित होती है।

     

    और अगर घंटी तीन बार बजे…

     

    तो मरने वाला इंसान नहीं होता।

     

    वह कोई ऐसी चीज़ होती थी, जिसे इंसानों की दुनिया में होना ही नहीं चाहिए।

     

    गाँव में रहने वाला सत्रह वर्षीय हारुโต इन बातों को अंधविश्वास समझता था।

     

    उसका पिता शहर में काम करता था और उसकी माँ की कई साल पहले मृत्यु हो चुकी थी। हारुतो अपनी दादी के साथ रहता था।

     

    एक रात तेज़ बारिश हो रही थी।

     

    हवा खिड़कियों से टकरा रही थी।

     

    दादी ने घर की सारी खिड़कियाँ बंद करते हुए कहा,

     

    “आज रात दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    हारुतो किताब पढ़ते हुए हँसा।

     

    “दादी, फिर वही कहानी?”

     

    दादी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

     

    “यह कहानी नहीं है।”

     

    हारुतो चुप हो गया।

     

    दादी धीरे से उसके पास आईं और बोलीं,

     

    “आज से ठीक पचास साल पहले… इसी रात… गाँव में पहली बार वह घंटी बजी थी।”

     

    “और?”

     

    “उस रात मेरे पिता गायब हुए थे।”

     

    हारुतो ने किताब बंद कर दी।

     

    “गायब?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “उनकी लाश कभी नहीं मिली।”

     

    कुछ पल के लिए कमरे में सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई देती रही।

     

    तभी…

     

    टन…

     

    हारुतो का दिल धक से रह गया।

     

    दादी के हाथ से लालटेन लगभग गिर गई।

     

    दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    फिर…

     

    टन…

     

    दूसरी घंटी।

     

    दादी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उन्होंने फुसफुसाकर कहा,

     

    “खिड़की के पास मत जाना।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “लेकिन घंटी कहाँ से—”

     

    टन…

     

    तीसरी घंटी।

     

    कमरे की लालटेन अचानक बुझ गई।

     

    पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

     

    दादी काँपने लगीं।

     

    “वह आ गया…”

     

    हारुतो ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    “कौन?”

     

    दादी ने काँपते हुए कहा,

     

    “शिनिगामी।”

     

    जापानी लोककथाओं में शिनिगामी को मृत्यु से जुड़ी आत्मिक सत्ता माना जाता है।

     

    लेकिन कुरोमोरी के लोगों के लिए शिनिगामी सिर्फ मौत का देवता नहीं था।

     

    वह मौत का चुनाव करने वाला था।

     

    दादी ने हारुतो का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे… तो जवाब मत देना।”

     

    “और अगर मैं जवाब दे दूँ?”

     

    दादी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो वह तुम्हें देख लेगा।”

     

    अचानक बाहर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छपाक…

     

    बारिश में कोई नंगे पैर चल रहा था।

     

    छपाक… छपाक…

     

    आवाज़ घर के सामने आकर रुक गई।

     

    हारुतो की साँसें तेज़ हो गईं।

     

    फिर दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दादी ने हारुतो का मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया।

     

    बाहर से आवाज़ आई।

     

    “हारुतो…”

     

    उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    वह आवाज़ उसकी माँ की थी।

     

    वही आवाज़…

     

    जो उसने दस साल से नहीं सुनी थी।

     

    “हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”

     

    उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “माँ…?”

     

    दादी ने उसका मुँह और कसकर दबा दिया।

     

    “नहीं!”

     

    बाहर से फिर आवाज़ आई।

     

    “बेटा… मुझे बहुत ठंड लग रही है।”

     

    हारुतो दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा।

     

    दादी ने उसे पीछे खींच लिया।

     

    “वह तुम्हारी माँ नहीं है!”

     

    अचानक बाहर की आवाज़ बदल गई।

     

    अब वह भारी और खुरदरी थी।

     

    “तो तुमने उसे पहचान लिया…”

     

    दरवाज़े के नीचे से काला पानी अंदर आने लगा।

     

    लेकिन वह पानी बारिश का नहीं था।

     

    उसमें से सड़ी हुई मिट्टी और लोहे जैसी गंध आ रही थी।

     

    हारुतो ने मोबाइल नीचे किया।

     

    दरवाज़े के दूसरी तरफ दो लंबे पैर दिखाई दे रहे थे।

     

    लेकिन…

     

    उन पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।

     

    दादी ने फुसफुसाकर मंत्र जैसा कुछ बोलना शुरू किया।

     

    अचानक दरवाज़े पर जोरदार प्रहार हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरा घर हिल गया।

     

    फिर दूसरा प्रहार।

     

    धड़ाम!

     

    तीसरे प्रहार के बाद दरवाज़े पर एक लंबी काली दरार बन गई।

     

    उस दरार के भीतर से एक आँख दिखाई दी।

     

    लाल…

     

    बिल्कुल लाल।

     

    हारुतो चीखने ही वाला था कि दादी ने उसे खींचकर पुराने तहखाने में पहुँचा दिया।

     

    उन्होंने फर्श के नीचे छिपा एक लकड़ी का दरवाज़ा खोला।

     

    “अंदर जाओ!”

     

    “आप?”

     

    “मैं उसके लिए हूँ।”

     

    हारुतो ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं!”

     

    दादी ने उसे धक्का देकर अंदर कर दिया।

     

    “जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”

     

    लकड़ी का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    अंदर घुप्प अंधेरा था।

     

    हारुतो ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    तहखाने की दीवारों पर सैकड़ों नाम लिखे थे।

     

    केंजी।

     

    मासाओ।

     

    युकी।

     

    अकीरा।

     

    कुछ नामों पर लाल निशान बने थे।

     

    सबसे नीचे एक नया नाम लिखा था।

     

    हारुतो।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    “यह… यहाँ किसने लिखा?”

     

    तभी उसके पीछे से किसी ने धीरे से फुसफुसाया,

     

    “तुम्हारी दादी ने।”

     

    हारुतो पलटा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    उसका मोबाइल अपने-आप बंद हो गया।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने के दूसरे छोर से एक आदमी की धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    “हारुतो…”

     

    वह पीछे हटने लगा।

     

    अंधेरे में एक लंबी आकृति खड़ी थी।

     

    काले कपड़े।

     

    बहुत लंबे हाथ।

     

    सफेद चेहरा।

     

    और आँखों की जगह दो गहरे काले गड्ढे।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी लोहे की घंटी थी।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    टन…

     

    घंटी बजी।

     

    हारुतो के कानों में अचानक हजारों लोगों की चीखें सुनाई देने लगीं।

     

    आकृति उसके सामने आकर रुक गई।

     

    फिर उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाया था…”

     

    हारुतो काँपने लगा।

     

    “क्या…?”

     

    शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    “लेकिन अब… तुम्हारी बारी है।”

     

    हारुतो ने पीछे हटते हुए दीवार को छुआ।

     

    तभी उसकी उँगलियाँ किसी ठंडी चीज़ से टकराईं।

     

    एक पुरानी तस्वीर।

     

    उसने मोबाइल दोबारा चालू किया।

     

    तस्वीर में गाँव के लगभग बीस लोग खड़े थे।

     

    बीच में उसकी दादी थीं।

     

    उनके पास एक जवान आदमी खड़ा था।

     

    हारुतो ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    वह आदमी…

     

    उसका पिता था।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

     

    1976

     

    हारुतो के हाथ काँपने लगे।

     

    उसका पिता तो 1989 में पैदा हुआ था।

     

    तभी तस्वीर में खड़ा उसका पिता धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा।

     

    हारुतो ने तस्वीर गिरा दी।

     

    शिनिगामी गायब था।

     

    लेकिन तहखाने की दीवार पर एक नई आवाज़ गूँजी—

     

    टन…

     

    फिर फुसफुसाहट आई।

     

    “भागो, हारुतो…”

     

    “क्योंकि अगली घंटी तुम्हारे लिए नहीं…”

     

    कुछ पल की खामोशी।

     

    फिर…

     

    “तुम्हारे पिता के लिए है।”

     

    उसी क्षण ऊपर से दादी की चीख सुनाई दी।

     

    और उसके बाद…

     

    घर के बाहर किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

  • भूतिया गुड़िया (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    सब कुछ अचानक बदल चुका था।

     

    पुरानी काली हवेली अब नई दिखाई दे रही थी।

     

    दीवारों पर दीपक जल रहे थे।

     

    आँगन में एक बच्ची खेल रही थी।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके पास लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी।

     

    लेकिन कुछ ही दूरी पर एक और बच्ची खड़ी थी।

     

    वह तारा थी।

     

    तारा की आँखों में डर था।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    एक कमरे से किसी आदमी की आवाज़ आ रही थी।

     

    “तुम दोनों में से एक ही इस घर की वारिस होगी।”

     

    यह रुद्र प्रताप की आवाज़ थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़ा।

     

    दरवाज़े के पीछे रुद्र प्रताप खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी काली किताब थी।

     

    वह कुछ मंत्र पढ़ रहा था।

     

    आरव समझ गया कि यह सिर्फ किसी बच्ची की हत्या की कहानी नहीं थी।

     

    इसके पीछे कोई भयानक रहस्य था।

     

    तभी सावित्री कमरे में आई।

     

    “आप ये क्या कर रहे हैं?”

     

    रुद्र ने किताब बंद कर दी।

     

    “जिसे मैंने शुरू किया है, उसे पूरा करना होगा।”

     

    “लेकिन ये हमारी बेटियाँ हैं!”

     

    रुद्र ने ठंडी आवाज़ में कहा, “बेटियाँ नहीं… रास्ता हैं।”

     

    आरव ने किताब के पन्नों पर नजर डाली।

     

    उसमें लिखा था कि हवेली के नीचे एक प्राचीन शक्ति बंद थी। उसे जगाने के लिए एक मासूम बच्चे की आत्मा चाहिए थी।

     

    रुद्र ने मीरा को चुना था।

     

    लेकिन तारा ने उसे देख लिया था।

     

    इसीलिए उसने तारा को कुएँ में धकेल दिया।

     

    लेकिन योजना असफल हो गई।

     

    तारा मरने के बाद भी मीरा के पास लौट आई।

     

    रुद्र ने मीरा को उसी कमरे में बंद कर दिया।

     

    और फिर…

     

    वह रात आई।

     

    मीरा ने अपनी गुड़िया को सीने से लगाया और रोते हुए कहा—

     

    “तारा मुझे लेने आएगी।”

     

    कमरे के अंदर अचानक ठंडी हवा चली।

     

    गुड़िया की आँखें चमक उठीं।

     

    तारा की आत्मा वहाँ प्रकट हुई।

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों बच्चियाँ एक-दूसरे से लिपट गईं।

     

    रुद्र कमरे में पहुँचा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उन्हें छुआ, वह चीख पड़ा।

     

    उसकी त्वचा काली पड़ने लगी।

     

    कमरे की दीवारों से काली परछाइयाँ निकलने लगीं।

     

    रुद्र भागने लगा।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    फिर दोनों बच्चियों की आवाज़ गूँजी—

     

    “अब तुम्हारी बारी है।”

     

    कुछ ही सेकंड में कमरा शांत हो गया।

     

    रुद्र गायब था।

     

    सिर्फ उसकी काली किताब जमीन पर पड़ी थी।

     

    आरव यह सब देख रहा था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “अब तुम समझ गए।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    मीरा और तारा उसके सामने खड़ी थीं।

     

    लेकिन अब वे डरावनी नहीं लग रही थीं।

     

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    “हमें आज़ाद करो।”

     

    आरव ने पूछा, “कैसे?”

     

    तारा ने अपनी गुड़िया की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे तोड़ना होगा।”

     

    आरव ने गुड़िया उठाई।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उसे जमीन पर पटकने की कोशिश की, उसका हाथ रुक गया।

     

    उसकी उँगलियाँ सुन्न हो गईं।

     

    गुड़िया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    फिर एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “उसे मत छूना।”

     

    कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    एक विशाल काली परछाई आरव के सामने खड़ी हो गई।

     

    वह रुद्र की आत्मा थी।

     

    “यह गुड़िया मेरी है।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    रुद्र की आत्मा ने कहा, “मैंने इसे बनाया है। इसमें मीरा की आत्मा कैद है। और तारा उसकी रखवाली करती है।”

     

    आरव ने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    परछाई हँसी।

     

    “तुम्हें लगता है ये दोनों तुम्हें आज़ाद करना चाहती हैं?”

     

    तभी मीरा चीखी—

     

    “आरव! गुड़िया तोड़ दो!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से गुड़िया को जमीन पर दे मारा।

     

    धड़ाम!

     

    गुड़िया का सिर टूट गया।

     

    एक तेज चीख पूरे घर में गूँज गई।

     

    रुद्र की परछाई पीछे हट गई।

     

    लेकिन अगले ही पल गुड़िया के टूटे हुए शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    धुआँ पूरे कमरे में फैल गया।

     

    आरव को लगा कि कोई उसके गले को दबा रहा है।

     

    तभी तारा ने मीरा का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों ने एक साथ कहा—

     

    “आज हमारा खेल खत्म होगा।”

     

    अचानक कमरे में तेज सफेद रोशनी फैल गई।

     

    रुद्र की आत्मा चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    एक पल बाद सब शांत हो गया।

     

    आरव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    जब उसकी आँखें खुलीं, वह हवेली के उसी पुराने कमरे में था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    उसके हाथ में गुड़िया का टूटा हुआ सिर था।

     

    लेकिन अब उसके चेहरे पर कोई डरावनी मुस्कान नहीं थी।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    आरव ने राहत की साँस ली।

     

    वह घर लौट आया।

     

    गाँव वालों को पूरी कहानी बताई।

     

    बूढ़े ने उसकी बात सुनकर कहा—

     

    “अब शायद दोनों बच्चियों को मुक्ति मिल गई है।”

     

    काली हवेली को बाद में पूरी तरह बंद कर दिया गया।

     

    उस कमरे को ईंटों से चुनवा दिया गया।

     

    कुछ दिनों बाद आरव शहर लौट गया।

     

    उसने उस घटना के बारे में किसी से बात नहीं की।

     

    लेकिन एक रात…

     

    लगभग तीन महीने बाद…

     

    आरव अपने कमरे में बैठा था।

     

    अचानक उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

     

    टक… टक… टक…

     

    उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फर्श पर एक छोटी-सी लाल गुड़िया पड़ी थी।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उसने गुड़िया उठाई।

     

    उसके गले में एक नया लॉकेट था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तारा।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी उसके पीछे से एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    उसने धीरे-धीरे पलटकर देखा।

     

    कमरे के कोने में मीरा खड़ी थी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    और उसके पीछे…

     

    तारा खड़ी थी।

     

    दोनों ने एक साथ कहा—

     

    “हमने कहा था ना… खेल अभी खत्म नहीं हुआ।”

     

    अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ दो जोड़ी काली आँखें चमक रही थीं।

     

    फिर एक गुड़िया की हँसी सुनाई दी—

     

    “ही… ही… ही…”

     

    और उसी रात से आरव के घर के सामने रहने वाले लोगों ने एक अजीब चीज़ देखनी शुरू कर दी।

     

    हर रात ठीक तीन बजे आरव की खिड़की में दो छोटी बच्चियाँ दिखाई देती थीं।

     

    एक लाल फ्रॉक पहने हुए।

     

    दूसरी सफेद कपड़ों में।

     

    और उनके बीच में…

     

    एक गुड़िया।

     

    कहते हैं, अगर कोई उस खिड़की की तरफ लगातार देखता रहे…

     

    तो कुछ देर बाद उन दोनों बच्चियों में से एक धीरे-धीरे अपना हाथ उठाती है…

     

    और खिड़की के शीशे पर उँगली से सिर्फ एक शब्द लिखती है—

     

    “खेलोगे?”

     

    उसके बाद वह घर कभी खाली नहीं रहता।

     

    क्योंकि जहाँ वह गुड़िया पहुँचती है…

     

    वहाँ से उसकी कहानी कभी खत्म नहीं होती।

     

    समाप्त… या शायद नहीं।

  • भूतिया गुड़िया (part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव की आँखें खुलीं तो सुबह हो चुकी थी।

     

    उसकी माँ उसके पास बैठी थी और पिता डॉक्टर को बुलाने के लिए बाहर गए थे।

     

    आरव ने घबराकर पूछा, “गुड़िया कहाँ है?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव तुरंत उठकर कमरे में देखने लगा।

     

    मेज खाली थी।

     

    बिस्तर के नीचे कुछ नहीं था।

     

    अलमारी बंद थी।

     

    लेकिन दीवार पर लिखा हुआ वाक्य अब भी मौजूद था—

     

    “मीरा अभी घर नहीं आई है…”

     

    आरव ने काँपती आवाज़ में पूछा, “माँ, आपको ये दिखाई दे रहा है?”

     

    माँ ने सिर हिला दिया।

     

    “हाँ।”

     

    उसी समय बाहर से किसी बच्चे के हँसने की आवाज़ आई।

     

    दोनों ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    खिड़की के बाहर कोई नहीं था।

     

    आरव ने उसी दिन गाँव के बुजुर्ग से मिलने का फैसला किया।

     

    वही बूढ़ा आदमी, जिसने उसे हवेली के बारे में चेतावनी दी थी, गाँव के मंदिर के पास बैठा था।

     

    आरव उसके सामने बैठ गया।

     

    “बाबा, मुझे मीरा के बारे में बताइए।”

     

    बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तुमने उसे देख लिया?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “मैं उसकी गुड़िया घर ले आया था।”

     

    बूढ़े ने अपना माथा पकड़ लिया।

     

    “तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी।”

     

    “मीरा कौन थी?”

     

    बूढ़े ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहना शुरू किया।

     

    लगभग पचास साल पहले काली हवेली में एक परिवार रहता था—ठाकुर रुद्र प्रताप, उनकी पत्नी सावित्री और उनकी सात साल की बेटी मीरा।

     

    मीरा बहुत खुशमिजाज बच्ची थी।

     

    उसके पास एक लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी, जिसका नाम उसने खुद “गुड़िया” रखा था।

     

    लेकिन एक रात मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    पूरा गाँव उसे खोजने लगा।

     

    तीन दिन बाद हवेली के बंद कमरे से उसकी आवाज़ सुनाई दी।

     

    “माँ… मुझे बाहर निकालो…”

     

    सावित्री ने कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा बाहर से नहीं, अंदर से बंद था।

     

    जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो मीरा वहाँ नहीं थी।

     

    सिर्फ उसकी गुड़िया कमरे के बीचोंबीच रखी थी।

     

    और दीवार पर खून से लिखा था—

     

    “वह खेलना चाहती है।”

     

    उस दिन के बाद सावित्री पागल हो गई।

     

    वह हर रात कहती थी कि मीरा उसके कमरे में आती है।

     

    कुछ दिनों बाद सावित्री भी गायब हो गई।

     

    ठाकुर रुद्र प्रताप ने हवेली छोड़ दी।

     

    लेकिन जाने से पहले उन्होंने उस कमरे को हमेशा के लिए बंद कर दिया।

     

    बूढ़े ने कहानी खत्म की।

     

    आरव ने पूछा, “मीरा की मौत कैसे हुई?”

     

    बूढ़े ने धीमे स्वर में कहा, “किसी को नहीं पता।”

     

    “और गुड़िया?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “गुड़िया को कभी हवेली से बाहर नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा, “क्यों?”

     

    बूढ़े ने जवाब दिया, “क्योंकि वह गुड़िया नहीं है।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “वह मीरा का घर है।”

     

    उस रात आरव ने गुड़िया को ढूँढने का फैसला किया।

     

    वह घर के हर कमरे में खोजने लगा।

     

    अचानक उसे ऊपर की मंजिल से हँसी सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही…”

     

    वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया।

     

    गलियारे के आखिर में वही पुराना कमरा था।

     

    दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    अंदर गुड़िया कुर्सी पर बैठी थी।

     

    आरव ने दूर से ही कहा, “तुम यहाँ कैसे आई?”

     

    गुड़िया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    तभी उसके पीछे कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    कमरे में अचानक ठंड बढ़ने लगी।

     

    फिर एक बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “मेरे साथ खेलोगे?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    गुड़िया अब कुर्सी पर नहीं थी।

     

    वह कमरे के कोने में खड़ी थी।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    आरव ने दीवार पर देखा।

     

    वहाँ अचानक एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में वही गुड़िया थी।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे एक और बच्ची दिखाई दे रही थी।

     

    वह बच्ची मीरा जैसी ही दिखती थी।

     

    आरव ने तस्वीर उतार ली।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “मीरा अकेली नहीं थी।”

     

    तभी कमरे में किसी के रोने की आवाज़ गूँजी।

     

    “मुझे भी बाहर निकालो…”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    दीवार के पीछे से आवाज़ आ रही थी।

     

    उसने दीवार पर हाथ मारा।

     

    एक जगह खोखली आवाज़ आई।

     

    आरव ने पास पड़ा लोहे का डंडा उठाया और दीवार तोड़ने लगा।

     

    कुछ ही देर में दीवार में एक छोटा-सा छेद हो गया।

     

    अंदर एक पुरानी लकड़ी की पेटी थी।

     

    उसने पेटी बाहर निकाली।

     

    पेटी खोलते ही उसके अंदर पुराने कागज़, एक चाँदी की पायल और बच्चों के कई बाल मिले।

     

    सबसे नीचे एक डायरी थी।

     

    डायरी सावित्री की थी।

     

    आरव ने उसे पढ़ना शुरू किया।

     

    पहले कुछ पन्नों में मीरा के बारे में सामान्य बातें थीं।

     

    फिर एक पन्ने पर लिखा था—

     

    “रुद्र ने मुझसे झूठ बोला। मीरा कमरे में अकेली नहीं थी।”

     

    अगले पन्ने पर—

     

    “वह बच्ची मीरा की बहन थी।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    लेकिन मीरा की कोई बहन गाँव में कभी नहीं जानी गई थी।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “उसका नाम तारा था।”

     

    फिर एक और वाक्य—

     

    “रुद्र ने तारा को कुएँ में धकेल दिया।”

     

    आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तभी कमरे के बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

     

    धड़धड़धड़…

     

    फिर अचानक सन्नाटा।

     

    आरव ने गुड़िया की तरफ देखा।

     

    गुड़िया जमीन पर पड़ी थी।

     

    उसके पास दीवार पर ताजा खून से लिखा था—

     

    “मीरा नहीं… तारा।”

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुमने मेरा नाम पढ़ लिया।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    उसके सामने एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    उसके बाल चेहरे पर बिखरे थे।

     

    आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    और उसके गले में वही चाँदी की पायल थी जो पेटी में रखी थी।

     

    आरव चीख पड़ा।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    “अब तुम भी मेरे साथ खेलोगे।”

     

    अचानक कमरे की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    गुड़िया जमीन से उठकर हवा में तैरने लगी।

     

    और फिर एक साथ दो आवाज़ें आईं—

     

    “हम दोनों को घर चाहिए।”

     

    आरव ने किसी तरह दरवाज़ा खोलकर भागना शुरू किया।

     

    लेकिन नीचे पहुँचते ही उसने देखा—

     

    पूरा घर बदल चुका था।

     

    जहाँ पहले टूटी हुई हवेली थी, वहाँ अब रोशनी से भरा एक पुराना घर दिखाई दे रहा था।

     

    दीवारों पर लोग चल रहे थे।

     

    बच्चे खेल रहे थे।

     

    और बीच में मीरा और तारा खड़ी थीं।

     

    आरव समझ गया—

     

    वह वर्तमान में नहीं था।

     

    वह उस रात में पहुँच चुका था…

     

    जिस रात दोनों बच्चियाँ गायब हुई थीं।