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😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-2)

पढ़ने का समय : 6 मिनट

अगली सुबह रघु ने दीवार पर बना निशान देखा तो उसके होश उड़ गए।

 

उसने रात की बात किसी को नहीं बताई।

 

उसे डर था कि अगर घरवालों को पता चला तो उसकी खूब पिटाई होगी।

 

लेकिन उसी दिन एक अजीब घटना हुई।

 

मुन्ना के घर के बाहर भी वही निशान बना था।

 

फिर छोटू के दरवाजे पर भी।

 

और कालू के घर की पिछली दीवार पर भी।

 

चारों दोस्त दोपहर में गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे मिले।

 

मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

 

“ये हमारे घरों तक कैसे आया?”

 

रघु चुप था।

 

छोटू बोला—

 

“हमें गाँव के पंडित जी के पास जाना चाहिए।”

 

चारों पंडित हरिदास के घर पहुँचे।

 

पंडित जी गाँव के सबसे बुजुर्ग लोगों में से एक थे। उन्होंने चारों की बात ध्यान से सुनी और फिर कुछ देर चुप रहे।

 

“तुम लोग श्मशान के पेड़ के पास गए थे?”

 

रघु ने सिर झुका लिया।

 

“हाँ।”

 

पंडित जी ने गहरी साँस ली।

 

“मैंने तुम्हारे दादा-दादियों को भी इस पेड़ की कहानी बताते सुना था। लेकिन उस पेड़ का रहस्य आज तक किसी ने नहीं जाना।”

 

रघु ने पूछा—

 

“कौन थी वो औरत?”

 

पंडित जी ने कहा—

 

“उसका नाम गौरी था।”

 

फिर उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनानी शुरू की।

 

करीब पचास साल पहले गौरी इसी गाँव में रहती थी। वह बहुत गरीब परिवार की लड़की थी। उसकी शादी गाँव के ही एक आदमी से हुई थी, जिसका नाम भैरव था।

 

भैरव बहुत लालची और क्रूर आदमी था।

 

गौरी के पिता ने शादी में अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया था, लेकिन भैरव की लालच खत्म नहीं हुई।

 

एक दिन उसने गौरी के पिता से और पैसे माँगे।

 

पैसे नहीं मिले।

 

कुछ दिनों बाद गौरी अचानक गायब हो गई।

 

गाँव में खबर फैली कि वह अपने मायके चली गई है।

 

लेकिन उसके पिता को विश्वास नहीं हुआ।

 

उन्होंने कई दिनों तक उसे खोजा।

 

एक रात उन्हें श्मशान के पास गौरी की चप्पल मिली।

 

अगले दिन भैरव भी गाँव से गायब हो गया।

 

किसी को कुछ समझ नहीं आया।

 

कई साल बाद श्मशान के पास खुदाई के दौरान कुछ हड्डियाँ मिलीं।

 

लेकिन यह साबित नहीं हो पाया कि वे गौरी की थीं।

 

पंडित जी बोले—

 

“लोगों का मानना है कि गौरी को उसी बरगद के नीचे मार दिया गया था।”

 

रघु ने पूछा—

 

“लेकिन वह हमें क्यों डरा रही है?”

 

पंडित जी ने उसकी ओर गंभीर नजरों से देखा।

 

“शायद इसलिए क्योंकि उसके साथ जो हुआ, उसका सच अभी भी दबा हुआ है।”

 

चारों लड़के एक-दूसरे को देखने लगे।

 

उस रात रघु के घर फिर अजीब घटना हुई।

 

रात करीब दो बजे उसकी खिड़की अपने आप खुल गई।

 

ठंडी हवा कमरे में भर गई।

 

रघु की आँख खुली।

 

उसे लगा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है।

 

वही सफेद साड़ी।

 

लंबे बाल।

 

रघु ने काँपते हुए पूछा—

 

“कौन हो?”

 

वह आकृति धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

 

फिर उसके कान में आवाज आई—

 

“सच… पेड़ के नीचे…”

 

और वह गायब हो गई।

 

सुबह रघु ने यह बात मुन्ना को बताई।

 

दोनों ने तय किया कि उन्हें श्मशान जाकर देखना होगा।

 

इस बार वे दिन में गए।

 

पेड़ के पास उन्हें जमीन पर एक पुरानी लोहे की अंगूठी मिली।

 

अंगूठी पर एक नाम खुदा था—

 

“भैरव”

 

रघु के हाथ काँपने लगे।

 

उन्होंने पेड़ के आसपास जमीन को ध्यान से देखा।

 

एक जगह मिट्टी बाकी जमीन से अलग थी।

 

उन्होंने वहाँ खुदाई शुरू की।

 

कुछ ही देर में फावड़ा किसी लोहे की चीज से टकराया।

 

खनन!

 

मिट्टी हटाई गई।

 

नीचे एक पुराना लकड़ी का संदूक था।

 

संदूक पर जंग लगा ताला लगा था।

 

रघु ने ताला तोड़ा।

 

अंदर एक पुरानी साड़ी, कुछ चूड़ियाँ और एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी थी।

 

डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“गौरी की आखिरी बातें।”

 

रघु ने पढ़ना शुरू किया।

 

डायरी में लिखा था कि भैरव गौरी को मारने की धमकी देता था।

 

गौरी ने अपनी एक सहेली को बताया था कि भैरव ने गाँव के साहूकार से कर्ज लिया था और उस कर्ज को चुकाने के लिए वह गौरी के पिता से पैसे मांग रहा था।

 

आखिरी पन्ने पर लिखा था—

 

“अगर मुझे कुछ हो जाए तो समझ लेना, मुझे श्मशान वाले बरगद के पास ले जाया गया है।”

 

चारों लड़के डर गए।

 

तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

 

चर्र… चर्र… चर्र…

 

वे पलटे।

 

वहाँ कोई नहीं था।

 

फिर पेड़ की शाखा से एक लाल कपड़ा नीचे गिरा।

 

रघु ने कपड़ा उठाया।

 

उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

 

तस्वीर में गौरी खड़ी थी।

 

और उसके पीछे भैरव था।

 

लेकिन तस्वीर का सबसे डरावना हिस्सा यह था कि गौरी के चेहरे पर लाल स्याही से एक बड़ा निशान बना था।

 

उसी हाथ के निशान जैसा…

 

जो उनके घरों पर बना था।

 

अचानक मुन्ना चिल्लाया—

 

“रघु! पीछे देख!”

 

पेड़ के पीछे सफेद साड़ी वाली वही औरत खड़ी थी।

 

इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

 

उसकी आँखों से खून बह रहा था।

 

उसने धीरे से अपना हाथ पेड़ की तरफ उठाया।

 

और फिर जमीन की ओर इशारा किया।

 

रघु समझ गया।

 

“उसे कुछ और दिखाना है।”

 

चारों ने उस जगह खुदाई शुरू कर दी।

 

कुछ गहराई पर उन्हें इंसानी हड्डियाँ मिलीं।

 

साथ में एक टूटी हुई चूड़ी थी।

 

पंडित जी को बुलाया गया।

 

उन्होंने हड्डियों को देखकर कहा—

 

“ये शायद गौरी की हैं।”

 

लेकिन तभी गाँव का एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

 

उसका नाम था रामसेवक।

 

उसने हड्डियों को देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

 

रघु ने पूछा—

 

“काका, आप कुछ जानते हैं?”

 

रामसेवक की आँखों में डर था।

 

वह बोला—

 

“हाँ… मैं जानता हूँ।”

 

सब उसकी ओर देखने लगे।

 

रामसेवक ने काँपती आवाज में कहा—

 

“गौरी को भैरव ने नहीं मारा था…”

 

रघु ने पूछा—

 

“तो किसने?”

 

रामसेवक ने चारों तरफ देखा।

 

फिर धीमे से बोला—

 

“उसे गाँव के तीन लोगों ने मिलकर मारा था।”

 

“कौन लोग?”

 

रामसेवक कुछ बोल पाता, उससे पहले श्मशान के पेड़ से एक भयानक चीख सुनाई दी।

 

हवा तेज हो गई।

 

पेड़ की सारी शाखाएँ एक साथ हिलने लगीं।

 

और जमीन पर मिट्टी से अपने आप तीन शब्द लिखे गए—

 

“नाम बताओ…”

 

रामसेवक डर के मारे जमीन पर बैठ गया।

 

उसने आँखें बंद कर लीं।

 

“मैं सब बताऊँगा… लेकिन पहले मुझे अपने पाप का प्रायश्चित करना होगा।”

 

रघु ने पूछा—

 

“आप उन लोगों में से एक थे?”

 

रामसेवक की आँखों से आँसू निकल आए।

 

उसने सिर झुका दिया।

 

“हाँ।”

 

उसी क्षण पेड़ के पीछे से गौरी की आवाज आई—

 

“सच… सबको सच बताओ…”

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