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😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-1)

पढ़ने का समय : 5 मिनट

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बरवा में चारों तरफ खेत, आम के बाग और कच्ची पगडंडियाँ थीं। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना श्मशान घाट था। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची घास उगी रहती थी और पास में एक सूखी नदी बहती थी, जिसमें साल के ज्यादातर दिनों में सिर्फ थोड़ा-सा पानी रहता था।

 

लेकिन उस श्मशान घाट की सबसे डरावनी चीज थी—वहाँ खड़ा एक विशाल बरगद का पेड़।

 

गाँव के लोग उसे “श्मशान का पेड़” कहते थे।

 

पेड़ इतना पुराना था कि उसकी जड़ें जमीन से बाहर निकलकर साँपों की तरह दूर-दूर तक फैली थीं। उसकी मोटी शाखाएँ पूरे श्मशान घाट पर इस तरह फैली थीं, जैसे कोई विशालकाय हाथ आसमान को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।

 

गाँव में उस पेड़ को लेकर तरह-तरह की कहानियाँ मशहूर थीं।

 

बुजुर्ग कहते थे कि करीब पचास साल पहले एक औरत की उसी पेड़ के नीचे मौत हुई थी। किसी ने कहा कि उसने आत्महत्या की थी, तो किसी का कहना था कि उसकी हत्या हुई थी। लेकिन उसकी मौत का सच कभी सामने नहीं आया।

 

उसके बाद से रात में पेड़ के पास से गुजरने वाले लोगों को किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई देती थी।

 

“हाय… मुझे बचा लो…”

 

गाँव के बुजुर्ग हमेशा बच्चों को समझाते थे—

 

“सूरज डूबने के बाद श्मशान की तरफ मत जाना।”

 

लेकिन गाँव का एक लड़का था—रघु।

 

रघु की उम्र लगभग सत्रह साल थी। वह बहुत निडर था और गाँव के लड़कों में सबसे ज्यादा शरारती भी। उसे भूत-प्रेत की कहानियों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।

 

उसके तीन दोस्त थे—मुन्ना, छोटू और कालू।

 

एक दिन शाम को चारों लड़के गाँव के बाहर क्रिकेट खेल रहे थे। तभी मुन्ना ने कहा—

 

“रघु, आज रात तू हमारे साथ श्मशान वाले पेड़ तक चलकर दिखा।”

 

रघु हँस पड़ा।

 

“इसमें कौन-सी बड़ी बात है?”

 

छोटू बोला, “सुना है, जो उस पेड़ को आधी रात में छू ले, उसके पीछे कोई आत्मा घर तक आती है।”

 

रघु ने मजाक उड़ाते हुए कहा—

 

“अरे, तुम लोगों ने भूत देखा भी है कभी?”

 

कालू ने धीरे से कहा—

 

“मेरे चाचा ने देखा था।”

 

“क्या देखा था?”

 

“एक औरत… सफेद साड़ी में। उसका चेहरा नहीं था।”

 

तीनों लड़के कुछ पल के लिए चुप हो गए।

 

रघु ने हँसते हुए कहा—

 

“आज रात मैं उस पेड़ को छूकर वापस आऊँगा। अगर भूत मिला तो उसे भी क्रिकेट खिलाऊँगा।”

 

चारों ने तय कर लिया कि रात को करीब ग्यारह बजे वे श्मशान जाएँगे।

 

रात हुई।

 

गाँव में धीरे-धीरे सन्नाटा फैलने लगा। घरों के दरवाजे बंद हो गए। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। आसमान में बादल थे और चाँद कभी दिखाई देता, कभी बादलों के पीछे छिप जाता।

 

रघु अपने घर से चुपचाप निकला।

 

उसके हाथ में एक टॉर्च थी।

 

मुन्ना, छोटू और कालू पहले से ही गाँव के बाहर उसका इंतजार कर रहे थे।

 

चारों धीरे-धीरे श्मशान की ओर चल पड़े।

 

जैसे-जैसे वे श्मशान के पास पहुँचे, हवा ठंडी होती गई।

 

पेड़ों के पत्ते बिना हवा के ही हिलने लगे।

 

छोटू ने डरते हुए पूछा—

 

“रघु… वापस चलें?”

 

रघु ने कहा—

 

“डरपोक मत बन।”

 

कुछ दूर जाने के बाद श्मशान का विशाल बरगद दिखाई देने लगा।

 

टॉर्च की रोशनी उसकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाओं पर पड़ी तो ऐसा लगा जैसे पेड़ की शाखाएँ किसी बूढ़े आदमी की उंगलियाँ हों।

 

अचानक…

 

ठक… ठक… ठक…

 

तीन बार किसी चीज के जमीन पर गिरने की आवाज आई।

 

चारों रुक गए।

 

“ये आवाज कहाँ से आई?” मुन्ना ने फुसफुसाकर पूछा।

 

रघु ने टॉर्च घुमाई।

 

कुछ दिखाई नहीं दिया।

 

फिर अचानक दूर से किसी औरत के रोने की आवाज आई।

 

“हूँ… हूँ… मुझे बचा लो…”

 

छोटू का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“रघु… चल यहाँ से।”

 

रघु ने खुद को संभालते हुए कहा—

 

“किसी जानवर की आवाज होगी।”

 

वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

 

पेड़ के तने पर एक अजीब निशान बना था। वह निशान किसी हाथ जैसा था।

 

रघु ने टॉर्च पास की।

 

तभी उसे लगा कि पेड़ के पीछे कोई खड़ा है।

 

सफेद कपड़े में एक औरत।

 

रघु ने टॉर्च उसकी तरफ की।

 

कुछ नहीं था।

 

वह पीछे हटा।

 

तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

 

“रघु…”

 

रघु का शरीर जम गया।

 

उसने तुरंत पीछे देखा।

 

कोई नहीं था।

 

“तुम लोगों ने मेरा नाम लिया?”

 

मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

 

“नहीं…”

 

“मैंने भी नहीं,” छोटू बोला।

 

कालू तो बोल ही नहीं पा रहा था।

 

तभी पेड़ की सबसे ऊँची शाखा से एक सूखी टहनी टूटकर जमीन पर गिरी।

 

रघु ने हिम्मत करके पेड़ के तने को छू लिया।

 

उसी क्षण टॉर्च बंद हो गई।

 

चारों तरफ घना अंधेरा छा गया।

 

और फिर…

 

किसी औरत की जोरदार चीख सुनाई दी।

 

“भागोऽऽऽ!”

 

चारों लड़के चीखते हुए गाँव की ओर भागे।

 

रघु सबसे आगे था।

 

लेकिन दौड़ते समय उसे ऐसा महसूस हुआ कि कोई उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा है।

 

उसने पीछे मुड़कर देखा।

 

अंधेरे में एक सफेद साड़ी पहने औरत खड़ी थी।

 

उसके लंबे बाल जमीन तक लटक रहे थे।

 

रघु की सांस रुक गई।

 

वह औरत धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगी।

 

लेकिन उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

 

सिर्फ दो चमकती हुई आँखें थीं।

 

रघु ने आँखें बंद कीं और पूरी ताकत से गाँव की तरफ भागा।

 

घर पहुँचने के बाद उसने दरवाजा बंद किया और चारपाई पर गिर पड़ा।

 

उस रात उसे नींद नहीं आई।

 

सुबह जब वह उठा तो उसके कमरे की दीवार पर मिट्टी से एक निशान बना था।

 

वही निशान…

 

जो श्मशान के पेड़ पर बना था।

 

और उसके नीचे लिखा था—

 

“तुमने मुझे देखा है… अब मैं तुम्हें देखती रहूँगी।”

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