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भूतिया गुड़िया (Last part-3)

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

आरव ने चारों तरफ देखा।

 

सब कुछ अचानक बदल चुका था।

 

पुरानी काली हवेली अब नई दिखाई दे रही थी।

 

दीवारों पर दीपक जल रहे थे।

 

आँगन में एक बच्ची खेल रही थी।

 

वह मीरा थी।

 

उसके पास लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी।

 

लेकिन कुछ ही दूरी पर एक और बच्ची खड़ी थी।

 

वह तारा थी।

 

तारा की आँखों में डर था।

 

आरव ने चारों तरफ देखा।

 

एक कमरे से किसी आदमी की आवाज़ आ रही थी।

 

“तुम दोनों में से एक ही इस घर की वारिस होगी।”

 

यह रुद्र प्रताप की आवाज़ थी।

 

आरव धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़ा।

 

दरवाज़े के पीछे रुद्र प्रताप खड़ा था।

 

उसके हाथ में एक पुरानी काली किताब थी।

 

वह कुछ मंत्र पढ़ रहा था।

 

आरव समझ गया कि यह सिर्फ किसी बच्ची की हत्या की कहानी नहीं थी।

 

इसके पीछे कोई भयानक रहस्य था।

 

तभी सावित्री कमरे में आई।

 

“आप ये क्या कर रहे हैं?”

 

रुद्र ने किताब बंद कर दी।

 

“जिसे मैंने शुरू किया है, उसे पूरा करना होगा।”

 

“लेकिन ये हमारी बेटियाँ हैं!”

 

रुद्र ने ठंडी आवाज़ में कहा, “बेटियाँ नहीं… रास्ता हैं।”

 

आरव ने किताब के पन्नों पर नजर डाली।

 

उसमें लिखा था कि हवेली के नीचे एक प्राचीन शक्ति बंद थी। उसे जगाने के लिए एक मासूम बच्चे की आत्मा चाहिए थी।

 

रुद्र ने मीरा को चुना था।

 

लेकिन तारा ने उसे देख लिया था।

 

इसीलिए उसने तारा को कुएँ में धकेल दिया।

 

लेकिन योजना असफल हो गई।

 

तारा मरने के बाद भी मीरा के पास लौट आई।

 

रुद्र ने मीरा को उसी कमरे में बंद कर दिया।

 

और फिर…

 

वह रात आई।

 

मीरा ने अपनी गुड़िया को सीने से लगाया और रोते हुए कहा—

 

“तारा मुझे लेने आएगी।”

 

कमरे के अंदर अचानक ठंडी हवा चली।

 

गुड़िया की आँखें चमक उठीं।

 

तारा की आत्मा वहाँ प्रकट हुई।

 

उसने मीरा का हाथ पकड़ा।

 

दोनों बच्चियाँ एक-दूसरे से लिपट गईं।

 

रुद्र कमरे में पहुँचा।

 

लेकिन जैसे ही उसने उन्हें छुआ, वह चीख पड़ा।

 

उसकी त्वचा काली पड़ने लगी।

 

कमरे की दीवारों से काली परछाइयाँ निकलने लगीं।

 

रुद्र भागने लगा।

 

लेकिन दरवाज़ा बंद हो गया।

 

फिर दोनों बच्चियों की आवाज़ गूँजी—

 

“अब तुम्हारी बारी है।”

 

कुछ ही सेकंड में कमरा शांत हो गया।

 

रुद्र गायब था।

 

सिर्फ उसकी काली किताब जमीन पर पड़ी थी।

 

आरव यह सब देख रहा था।

 

तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

 

“अब तुम समझ गए।”

 

आरव ने पलटकर देखा।

 

मीरा और तारा उसके सामने खड़ी थीं।

 

लेकिन अब वे डरावनी नहीं लग रही थीं।

 

मीरा की आँखों में आँसू थे।

 

“हमें आज़ाद करो।”

 

आरव ने पूछा, “कैसे?”

 

तारा ने अपनी गुड़िया की तरफ इशारा किया।

 

“इसे तोड़ना होगा।”

 

आरव ने गुड़िया उठाई।

 

लेकिन जैसे ही उसने उसे जमीन पर पटकने की कोशिश की, उसका हाथ रुक गया।

 

उसकी उँगलियाँ सुन्न हो गईं।

 

गुड़िया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

 

फिर एक भारी आवाज़ गूँजी—

 

“उसे मत छूना।”

 

कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

 

दीवारें काँपने लगीं।

 

एक विशाल काली परछाई आरव के सामने खड़ी हो गई।

 

वह रुद्र की आत्मा थी।

 

“यह गुड़िया मेरी है।”

 

आरव पीछे हट गया।

 

रुद्र की आत्मा ने कहा, “मैंने इसे बनाया है। इसमें मीरा की आत्मा कैद है। और तारा उसकी रखवाली करती है।”

 

आरव ने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो।”

 

परछाई हँसी।

 

“तुम्हें लगता है ये दोनों तुम्हें आज़ाद करना चाहती हैं?”

 

तभी मीरा चीखी—

 

“आरव! गुड़िया तोड़ दो!”

 

आरव ने पूरी ताकत से गुड़िया को जमीन पर दे मारा।

 

धड़ाम!

 

गुड़िया का सिर टूट गया।

 

एक तेज चीख पूरे घर में गूँज गई।

 

रुद्र की परछाई पीछे हट गई।

 

लेकिन अगले ही पल गुड़िया के टूटे हुए शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

 

धुआँ पूरे कमरे में फैल गया।

 

आरव को लगा कि कोई उसके गले को दबा रहा है।

 

तभी तारा ने मीरा का हाथ पकड़ा।

 

दोनों ने एक साथ कहा—

 

“आज हमारा खेल खत्म होगा।”

 

अचानक कमरे में तेज सफेद रोशनी फैल गई।

 

रुद्र की आत्मा चीखने लगी।

 

“नहीं!”

 

एक पल बाद सब शांत हो गया।

 

आरव जमीन पर गिर पड़ा।

 

जब उसकी आँखें खुलीं, वह हवेली के उसी पुराने कमरे में था।

 

सुबह हो चुकी थी।

 

उसके हाथ में गुड़िया का टूटा हुआ सिर था।

 

लेकिन अब उसके चेहरे पर कोई डरावनी मुस्कान नहीं थी।

 

उसकी आँखें बंद थीं।

 

आरव ने राहत की साँस ली।

 

वह घर लौट आया।

 

गाँव वालों को पूरी कहानी बताई।

 

बूढ़े ने उसकी बात सुनकर कहा—

 

“अब शायद दोनों बच्चियों को मुक्ति मिल गई है।”

 

काली हवेली को बाद में पूरी तरह बंद कर दिया गया।

 

उस कमरे को ईंटों से चुनवा दिया गया।

 

कुछ दिनों बाद आरव शहर लौट गया।

 

उसने उस घटना के बारे में किसी से बात नहीं की।

 

लेकिन एक रात…

 

लगभग तीन महीने बाद…

 

आरव अपने कमरे में बैठा था।

 

अचानक उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

 

टक… टक… टक…

 

उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

 

कोई नहीं था।

 

फिर आवाज़ आई।

 

टक… टक… टक…

 

आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

 

दरवाज़ा खोला।

 

बाहर कोई नहीं था।

 

फर्श पर एक छोटी-सी लाल गुड़िया पड़ी थी।

 

आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

उसने गुड़िया उठाई।

 

उसके गले में एक नया लॉकेट था।

 

उस पर लिखा था—

 

“तारा।”

 

आरव के हाथ काँपने लगे।

 

तभी उसके पीछे से एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

 

“आरव…”

 

उसने धीरे-धीरे पलटकर देखा।

 

कमरे के कोने में मीरा खड़ी थी।

 

वह मुस्कुरा रही थी।

 

और उसके पीछे…

 

तारा खड़ी थी।

 

दोनों ने एक साथ कहा—

 

“हमने कहा था ना… खेल अभी खत्म नहीं हुआ।”

 

अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

अंधेरे में सिर्फ दो जोड़ी काली आँखें चमक रही थीं।

 

फिर एक गुड़िया की हँसी सुनाई दी—

 

“ही… ही… ही…”

 

और उसी रात से आरव के घर के सामने रहने वाले लोगों ने एक अजीब चीज़ देखनी शुरू कर दी।

 

हर रात ठीक तीन बजे आरव की खिड़की में दो छोटी बच्चियाँ दिखाई देती थीं।

 

एक लाल फ्रॉक पहने हुए।

 

दूसरी सफेद कपड़ों में।

 

और उनके बीच में…

 

एक गुड़िया।

 

कहते हैं, अगर कोई उस खिड़की की तरफ लगातार देखता रहे…

 

तो कुछ देर बाद उन दोनों बच्चियों में से एक धीरे-धीरे अपना हाथ उठाती है…

 

और खिड़की के शीशे पर उँगली से सिर्फ एक शब्द लिखती है—

 

“खेलोगे?”

 

उसके बाद वह घर कभी खाली नहीं रहता।

 

क्योंकि जहाँ वह गुड़िया पहुँचती है…

 

वहाँ से उसकी कहानी कभी खत्म नहीं होती।

 

समाप्त… या शायद नहीं।

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