जापान के एक छोटे-से पहाड़ी गाँव कुरोमोरी में सूरज ढलने के बाद कोई घर से बाहर नहीं निकलता था।
गाँव के चारों तरफ घना जंगल था। उस जंगल के पेड़ इतने पुराने थे कि उनकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी जंगल के भीतर अजीब-सी धुंध रहती थी।
लेकिन गाँव की सबसे डरावनी चीज़ जंगल नहीं था।
वह थी…
रात के बारह बजे बजने वाली घंटी।
गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि अगर किसी ने आधी रात को जंगल की तरफ से घंटी की आवाज़ सुन ली, तो अगले तीन दिनों के भीतर किसी की मौत निश्चित होती है।
और अगर घंटी तीन बार बजे…
तो मरने वाला इंसान नहीं होता।
वह कोई ऐसी चीज़ होती थी, जिसे इंसानों की दुनिया में होना ही नहीं चाहिए।
गाँव में रहने वाला सत्रह वर्षीय हारुโต इन बातों को अंधविश्वास समझता था।
उसका पिता शहर में काम करता था और उसकी माँ की कई साल पहले मृत्यु हो चुकी थी। हारुतो अपनी दादी के साथ रहता था।
एक रात तेज़ बारिश हो रही थी।
हवा खिड़कियों से टकरा रही थी।
दादी ने घर की सारी खिड़कियाँ बंद करते हुए कहा,
“आज रात दरवाज़ा मत खोलना।”
हारुतो किताब पढ़ते हुए हँसा।
“दादी, फिर वही कहानी?”
दादी ने उसकी तरफ देखा।
उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।
“यह कहानी नहीं है।”
हारुतो चुप हो गया।
दादी धीरे से उसके पास आईं और बोलीं,
“आज से ठीक पचास साल पहले… इसी रात… गाँव में पहली बार वह घंटी बजी थी।”
“और?”
“उस रात मेरे पिता गायब हुए थे।”
हारुतो ने किताब बंद कर दी।
“गायब?”
दादी ने सिर हिलाया।
“उनकी लाश कभी नहीं मिली।”
कुछ पल के लिए कमरे में सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई देती रही।
तभी…
टन…
हारुतो का दिल धक से रह गया।
दादी के हाथ से लालटेन लगभग गिर गई।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
फिर…
टन…
दूसरी घंटी।
दादी के चेहरे का रंग उड़ गया।
उन्होंने फुसफुसाकर कहा,
“खिड़की के पास मत जाना।”
हारुतो ने पूछा,
“लेकिन घंटी कहाँ से—”
टन…
तीसरी घंटी।
कमरे की लालटेन अचानक बुझ गई।
पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
दादी काँपने लगीं।
“वह आ गया…”
हारुतो ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
“कौन?”
दादी ने काँपते हुए कहा,
“शिनिगामी।”
जापानी लोककथाओं में शिनिगामी को मृत्यु से जुड़ी आत्मिक सत्ता माना जाता है।
लेकिन कुरोमोरी के लोगों के लिए शिनिगामी सिर्फ मौत का देवता नहीं था।
वह मौत का चुनाव करने वाला था।
दादी ने हारुतो का हाथ पकड़ लिया।
“अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे… तो जवाब मत देना।”
“और अगर मैं जवाब दे दूँ?”
दादी की आँखों में आँसू आ गए।
“तो वह तुम्हें देख लेगा।”
अचानक बाहर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
छपाक…
बारिश में कोई नंगे पैर चल रहा था।
छपाक… छपाक…
आवाज़ घर के सामने आकर रुक गई।
हारुतो की साँसें तेज़ हो गईं।
फिर दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
दादी ने हारुतो का मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया।
बाहर से आवाज़ आई।
“हारुतो…”
उसका शरीर सुन्न पड़ गया।
वह आवाज़ उसकी माँ की थी।
वही आवाज़…
जो उसने दस साल से नहीं सुनी थी।
“हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“माँ…?”
दादी ने उसका मुँह और कसकर दबा दिया।
“नहीं!”
बाहर से फिर आवाज़ आई।
“बेटा… मुझे बहुत ठंड लग रही है।”
हारुतो दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा।
दादी ने उसे पीछे खींच लिया।
“वह तुम्हारी माँ नहीं है!”
अचानक बाहर की आवाज़ बदल गई।
अब वह भारी और खुरदरी थी।
“तो तुमने उसे पहचान लिया…”
दरवाज़े के नीचे से काला पानी अंदर आने लगा।
लेकिन वह पानी बारिश का नहीं था।
उसमें से सड़ी हुई मिट्टी और लोहे जैसी गंध आ रही थी।
हारुतो ने मोबाइल नीचे किया।
दरवाज़े के दूसरी तरफ दो लंबे पैर दिखाई दे रहे थे।
लेकिन…
उन पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।
दादी ने फुसफुसाकर मंत्र जैसा कुछ बोलना शुरू किया।
अचानक दरवाज़े पर जोरदार प्रहार हुआ।
धड़ाम!
पूरा घर हिल गया।
फिर दूसरा प्रहार।
धड़ाम!
तीसरे प्रहार के बाद दरवाज़े पर एक लंबी काली दरार बन गई।
उस दरार के भीतर से एक आँख दिखाई दी।
लाल…
बिल्कुल लाल।
हारुतो चीखने ही वाला था कि दादी ने उसे खींचकर पुराने तहखाने में पहुँचा दिया।
उन्होंने फर्श के नीचे छिपा एक लकड़ी का दरवाज़ा खोला।
“अंदर जाओ!”
“आप?”
“मैं उसके लिए हूँ।”
हारुतो ने सिर हिलाया।
“नहीं!”
दादी ने उसे धक्का देकर अंदर कर दिया।
“जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”
लकड़ी का दरवाज़ा बंद हो गया।
अंदर घुप्प अंधेरा था।
हारुतो ने मोबाइल की रोशनी जलाई।
तहखाने की दीवारों पर सैकड़ों नाम लिखे थे।
केंजी।
मासाओ।
युकी।
अकीरा।
कुछ नामों पर लाल निशान बने थे।
सबसे नीचे एक नया नाम लिखा था।
हारुतो।
उसकी साँस रुक गई।
“यह… यहाँ किसने लिखा?”
तभी उसके पीछे से किसी ने धीरे से फुसफुसाया,
“तुम्हारी दादी ने।”
हारुतो पलटा।
वहाँ कोई नहीं था।
उसका मोबाइल अपने-आप बंद हो गया।
और उसी क्षण…
तहखाने के दूसरे छोर से एक आदमी की धीमी हँसी सुनाई दी।
“हारुतो…”
वह पीछे हटने लगा।
अंधेरे में एक लंबी आकृति खड़ी थी।
काले कपड़े।
बहुत लंबे हाथ।
सफेद चेहरा।
और आँखों की जगह दो गहरे काले गड्ढे।
उसके हाथ में एक पुरानी लोहे की घंटी थी।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
टन…
घंटी बजी।
हारुतो के कानों में अचानक हजारों लोगों की चीखें सुनाई देने लगीं।
आकृति उसके सामने आकर रुक गई।
फिर उसने अपना सिर टेढ़ा किया।
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाया था…”
हारुतो काँपने लगा।
“क्या…?”
शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।
उसकी उँगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।
“लेकिन अब… तुम्हारी बारी है।”
हारुतो ने पीछे हटते हुए दीवार को छुआ।
तभी उसकी उँगलियाँ किसी ठंडी चीज़ से टकराईं।
एक पुरानी तस्वीर।
उसने मोबाइल दोबारा चालू किया।
तस्वीर में गाँव के लगभग बीस लोग खड़े थे।
बीच में उसकी दादी थीं।
उनके पास एक जवान आदमी खड़ा था।
हारुतो ने तस्वीर को गौर से देखा।
वह आदमी…
उसका पिता था।
लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—
1976
हारुतो के हाथ काँपने लगे।
उसका पिता तो 1989 में पैदा हुआ था।
तभी तस्वीर में खड़ा उसका पिता धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा।
हारुतो ने तस्वीर गिरा दी।
शिनिगामी गायब था।
लेकिन तहखाने की दीवार पर एक नई आवाज़ गूँजी—
टन…
फिर फुसफुसाहट आई।
“भागो, हारुतो…”
“क्योंकि अगली घंटी तुम्हारे लिए नहीं…”
कुछ पल की खामोशी।
फिर…
“तुम्हारे पिता के लिए है।”
उसी क्षण ऊपर से दादी की चीख सुनाई दी।
और उसके बाद…
घर के बाहर किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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