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महादेव भक्त से मिलने पहुंचे

पढ़ने का समय : 6 मिनट

महादेव अपने भक्त से मिलने आए

 

रतीराम और मतिराम दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे। दोनों की हालत पिछले कई सालों से खराब चल रही थी। घर में खाने तक के लाले पड़े रहते थे। कभी मजदूरी मिल जाती तो चूल्हा जल जाता, वरना दोनों परिवारों को खाली पेट ही सोना पड़ता।

 

लेकिन गरीबी से ज्यादा उन्हें एक और चीज ने तोड़ दिया था—शराब।

 

शाम होते ही दोनों गांव के बाहर बनी छोटी-सी शराब की दुकान पर पहुंच जाते और अपनी सारी कमाई वहीं उड़ा देते।

 

उस दिन भी दोनों ने दिनभर मजदूरी की थी। शाम को हाथ में आए कुछ पैसे लेकर शराब की दुकान पर पहुंचे और खूब शराब पी ली।

 

रतीराम लड़खड़ाते हुए बोला, “मतिराम… हमारी किस्मत ही खराब है रे। देख, दिनभर हड्डियां तोड़ो और रात को भी पेट खाली।”

 

मतिराम ने हंसते हुए कहा, “किस्मत खराब नहीं है रतीराम… भगवान ही हमारे खिलाफ हैं।”

 

रतीराम ने बोतल का आखिरी घूंट पीते हुए कहा, “हां… भगवान अगर होते तो हमारी ये हालत क्यों होती?”

 

दोनों सड़क पर हिलते-डुलते आगे बढ़ने लगे।

 

रात काफी हो चुकी थी। गांव की सड़क लगभग सुनसान थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।

 

अचानक सामने से उन्हें एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

 

उसके हाथ में लकड़ी की एक पुरानी छड़ी थी। कपड़े बेहद साधारण थे और वह इतना धीरे-धीरे चल रहा था कि हर कदम पर ऐसा लगता जैसे अभी गिर जाएगा।

 

मतिराम ने उसे देखकर कहा, “अरे हटो बाबा… सड़क के बीच में क्यों चल रहे हो?”

 

बूढ़ा कुछ बोल पाता, उससे पहले दोनों उससे टकरा गए।

 

धड़ाम!

 

बूढ़ा सड़क पर गिर पड़ा।

 

रतीराम और मतिराम भी लड़खड़ाकर कुछ कदम पीछे हो गए।

 

मतिराम झल्लाकर बोला, “अरे बाबा! देखकर नहीं चल सकते?”

 

बूढ़े ने धीरे से सिर उठाया।

 

उसके चेहरे पर अजीब सी शांति थी।

 

उसने कहा, “गलती तुम्हारी थी बेटा… फिर भी तुम मुझे ही दोष दे रहे हो?”

 

रतीराम कुछ देर उसे देखता रहा।

 

उस बूढ़े की आंखों में उसे कुछ ऐसा दिखाई दे रहा था, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।

 

उसने मतिराम से कहा, “चल, इसे उठा देते हैं।”

 

दोनों ने बूढ़े को उठाया।

 

बूढ़ा खड़ा हुआ और अपनी छड़ी के सहारे कुछ कदम आगे बढ़ा। फिर अचानक रुक गया।

 

“रतीराम…”

 

रतीराम के पैर वहीं जम गए।

 

उसने घबराकर पूछा, “आप… मेरा नाम कैसे जानते हो?”

 

बूढ़ा पलटा।

 

“मतिराम… तुम भी यही सोच रहे हो न कि मैंने तुम्हारा नाम कैसे जाना?”

 

मतिराम का नशा जैसे एक पल में उतरने लगा।

 

वह बोला, “आप कौन हैं?”

 

बूढ़ा मुस्कुराया।

 

“जिसे तुमने आज शाम दोष दिया था… उसी को तुम सालों से पुकारते भी आए हो।”

 

रतीराम और मतिराम एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

 

रतीराम बोला, “हमने तो भगवान को कभी देखा ही नहीं।”

 

बूढ़े ने कहा, “लेकिन तुम्हारे घर के कोने में शिव की एक छोटी-सी मूर्ति आज भी रखी है।”

 

रतीराम की आंखें फैल गईं।

 

वह मूर्ति उसकी मां ने उसे बचपन में दी थी।

 

मां के गुजरने के बाद भी उसने वह मूर्ति संभालकर रखी थी।

 

बूढ़ा बोला, “तुम भूल गए रतीराम, लेकिन तुम्हारी मां नहीं भूली थी।”

 

रतीराम के चेहरे पर डर और हैरानी साफ दिखाई देने लगी।

 

बूढ़ा धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

 

“तुम बचपन में रोज मेरे सामने बैठकर प्रार्थना करते थे। कहते थे—’महादेव, जब मैं बड़ा होऊंगा तो गरीबों की मदद करूंगा। किसी भूखे को खाली हाथ नहीं लौटाऊंगा।’”

 

रतीराम की आंखों में बचपन की तस्वीरें घूमने लगीं।

 

उसे अपनी मां याद आ गई।

 

मंदिर की घंटियां याद आ गईं।

 

और वह छोटी सी शिव प्रतिमा भी याद आ गई।

 

वह कांपती आवाज में बोला, “लेकिन… मैं बदल गया।”

 

बूढ़े ने कहा, “गरीबी ने तुम्हें नहीं बदला बेटा… तुम्हारे फैसलों ने बदला।”

 

मतिराम चुपचाप खड़ा था।

 

तभी बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

 

“और तुम मतिराम… तुम्हें याद है वह बरसात का दिन?”

 

मतिराम ने सिर झुका लिया।

 

“कौन सा दिन?”

 

“जब तुम्हारे पास सिर्फ दो रोटियां थीं और तुमने उनमें से एक रोटी रास्ते में बैठे बूढ़े को दे दी थी?”

 

मतिराम के चेहरे का रंग बदल गया।

 

वह घटना उसे धुंधली-सी याद थी।

 

बूढ़े ने कहा, “उस दिन तुमने कहा था ‘बाबा, मेरे पास ज्यादा नहीं है, लेकिन आधा आपका है।’”

 

मतिराम की आंखें भर आईं।

 

“वो तो बहुत साल पहले की बात है।”

 

बूढ़ा मुस्कुराया।

 

“भगवान के लिए साल पुराने नहीं होते। कर्म पुराने नहीं होते। इंसान भूल जाता है, लेकिन कर्म अपना रास्ता नहीं भूलते।”

 

अचानक हवा तेज चलने लगी।

 

बूढ़े की छड़ी जमीन पर गिर गई।

 

रतीराम उसे उठाने के लिए झुका।

 

लेकिन जैसे ही उसने सिर उठाया…

 

वह बूढ़ा वहां नहीं था।

 

सड़क के बीच सिर्फ उसकी लकड़ी की छड़ी पड़ी थी।

दोनों घबरा गए।

 

अचानक दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

टन… टन… टन…

रतीराम की नजर आसमान की तरफ उठी।

 

बादलों के बीच से चांद की रोशनी निकली और उसी रोशनी में उसे एक विशाल त्रिशूल की परछाईं दिखाई दी।

 

मतिराम कांपते हुए बोला, “रतीराम… वो बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था।”

 

रतीराम की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

उसने हाथ जोड़ लिए।

 

“महादेव…”

 

तभी उनके कानों में एक शांत आवाज आई

 

“मैं तुम्हें सजा देने नहीं आया था। मैं तुम्हें तुम्हारा रास्ता याद दिलाने आया था।”

 

दोनों सड़क पर बैठ गए।

 

रतीराम रोते हुए बोला, “महादेव… हमने आपको दोष दिया। अपनी गलतियों का दोष भी आपके सिर डाल दिया। हमें माफ कर दीजिए।”

 

आवाज फिर आई”माफी शब्दों से नहीं, कर्मों से मांगो।”

 

अगली सुबह गांव वालों ने देखा कि रतीराम और मतिराम शराब की दुकान पर नहीं गए।

 

दोनों मजदूरी करने निकले।

 

शाम को जब मजदूरी मिली तो रतीराम ने पैसे घर ले जाकर अपनी पत्नी के हाथ में रख दिए।

 

पत्नी ने हैरानी से पूछा, “आज शराब नहीं पी?”

 

रतीराम मुस्कुराया।

 

“आज समझ आया है कि गरीबी हमारी दुश्मन नहीं थी… हमारी गलत आदतें थीं।”

 

उधर मतिराम ने रास्ते में एक भूखे बच्चे को देखा।

 

उसने अपनी मजदूरी से खाना खरीदा और बच्चे को दे दिया।

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा, “भगवान आपको खुश रखे।”

 

मतिराम कुछ पल उसे देखता रहा।

 

फिर उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

उसे वही बूढ़ा याद आ गया।

 

कुछ दिनों बाद दोनों ने गांव के पुराने शिव मंदिर की सफाई शुरू कर दी।

 

जिस मंदिर में कभी रतीराम बचपन में बैठकर महादेव से प्रार्थना करता था, वहां अब फिर दीपक जलने लगा।

 

एक शाम रतीराम ने मंदिर में सिर झुकाकर कहा

 

“महादेव, उस रात आपने बूढ़े का रूप लेकर हमें नहीं बचाया था… आपने हमें हमारे ही पुराने रूप से मिलाया था।”

 

मतिराम ने कहा, “और हमारे कर्मों की याद दिलाकर हमें दूसरा मौका दिया।”

मंदिर की घंटी अचानक अपने आप बज उठी।

 

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

रतीराम मुस्कुराया।

 

“चल मतिराम… लगता है महादेव ने हमारी बात सुन ली।”

 

मतिराम ने हाथ जोड़कर कहा”महादेव को सुनाने के लिए शब्द नहीं चाहिए होते… सच्चा मन चाहिए।”

 

उस दिन के बाद दोनों ने शराब छोड़ दी।

गरीबी तुरंत खत्म नहीं हुई।

 

मुश्किलें भी खत्म नहीं हुईं।

लेकिन अब उनके पास मुश्किलों से लड़ने की हिम्मत थी।

और गांव वाले अक्सर कहते थे

“जिस रात दो नशे में डूबे आदमी एक बूढ़े से टकराए थे, उसी रात उनकी जिंदगी बदल गई थी। क्योंकि वह बूढ़ा कोई इंसान नहीं… स्वयं महादेव थे, जो अपने भूले हुए भक्तों को उनका रास्ता याद दिलाने आए थे।”

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