🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

लेखक: Alka Singh

Avatar photo

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

कृपया लॉग‑इन करें लेखक को मैसेज करने के लिए।

1 Follower
📝
232
रचनाएँ
👁️
8,744
व्यूज़
❤️
20
लाइक
💬
7
Comments
📅
मार्च 2026
सदस्य बने
👥 लेखक नेटवर्क
👥 Followers 1
  • मृणालिनी का कमरा (part-2)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा था।

     

    लकड़ी के पुराने पल्ले की आवाज़ पूरे गलियारे में गूँज रही थी।

     

    कrrrr…

     

    आरव और कबीर पीछे हट गए।

     

    दरवाज़ा पूरी तरह खुला तो अंदर घना अँधेरा दिखाई दिया। आरव ने टॉर्च जलाई, लेकिन रोशनी कुछ ही फीट आगे जाकर जैसे निगल ली गई।

     

    “अंदर मत जाना,” कबीर ने कहा।

     

    लेकिन आरव के भीतर का जिज्ञासु इंसान डर से ज्यादा ताकतवर था।

     

    वह कमरे के अंदर चला गया।

     

    कबीर मजबूरी में उसके पीछे आया।

     

    कमरा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था। वहाँ धूल तो थी, लेकिन सामान अपनी जगह पर रखा हुआ था। एक पुराना लकड़ी का पलंग, एक मेज, दीवार पर कुछ चित्र और कमरे के कोने में एक छोटी-सी गुड़िया।

     

    आरव ने गुड़िया उठाई।

     

    उसके कपड़े पुराने थे, लेकिन चेहरे पर धूल नहीं थी।

     

    “अजीब है,” आरव ने कहा।

     

    तभी कबीर ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “इधर देख।”

     

    दीवार पर दर्जनों तारीखें लिखी थीं।

     

    1898…

     

    1899…

     

    1900…

     

    फिर अचानक—

     

    1936

     

    और उसके बाद कोई तारीख नहीं।

     

    आरव ने कैमरा दीवार की ओर किया।

     

    “लगता है किसी ने यहाँ साल गिने थे।”

     

    कबीर ने पूछा, “किसलिए?”

     

    तभी मेज की दराज़ अपने आप खुल गई।

     

    दोनों पीछे हट गए।

     

    आरव धीरे से मेज के पास गया।

     

    दराज़ में एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    उसके ऊपर लाल स्याही से लिखा था—

     

    “मृणालिनी की डायरी। जिसे पढ़ना नहीं चाहिए।”

     

    आरव ने डायरी खोल दी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मेरा नाम मृणालिनी है। मैं रुद्रगढ़ की बेटी हूँ। पिता कहते हैं कि यह हवेली हमारे पूर्वजों की शान है। लेकिन मुझे लगता है कि हवेली के अंदर कोई और भी रहता है।”

     

    आरव आगे पढ़ता गया।

     

    मृणालिनी ने लिखा था कि बचपन से उसे पश्चिमी कमरे से आवाज़ें सुनाई देती थीं। कभी कोई उसे बुलाता था, कभी रोता था। उसके पिता उसे हमेशा उस कमरे से दूर रहने को कहते थे।

     

    एक रात उसने देखा कि उसकी माँ आधी रात को पश्चिमी कमरे में गई थी।

     

    मृणालिनी उसके पीछे चली गई।

     

    कमरे के अंदर उसकी माँ एक पुराने पत्थर के चबूतरे के सामने खड़ी थी।

     

    चबूतरे पर एक लोहे का संदूक रखा था।

     

    उसकी माँ रो रही थी।

     

    मृणालिनी ने पूछा—

     

    “माँ, आप यहाँ क्यों आती हैं?”

     

    उसकी माँ ने पलटकर कहा—

     

    “अगर कभी यह कमरा खुल जाए… तो हवेली छोड़ देना। पीछे मुड़कर मत देखना।”

     

    डायरी का अगला पन्ना फटा हुआ था।

     

    फिर अगला पन्ना—

     

    “आज पिता ने मुझे बताया कि हमारे परिवार ने बहुत बड़ा पाप किया था। उन्होंने कहा कि इस हवेली की जमीन के नीचे एक ऐसी चीज़ दफन है, जिसे बाहर नहीं आना चाहिए।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    तभी कमरे में अचानक ठंडी हवा चली।

     

    गुड़िया फर्श पर गिर गई।

     

    ठक!

     

    कबीर ने डरकर पीछे देखा।

     

    दरवाज़ा खुला था।

     

    लेकिन गलियारे में अब कोई रोशनी नहीं थी।

     

    “आरव…”

     

    कबीर की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “क्या?”

     

    “दरवाज़े के पास कौन खड़ा है?”

     

    आरव ने धीरे से टॉर्च घुमाई।

     

    वहाँ एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    सफेद कपड़े।

     

    लंबे काले बाल।

     

    और झुका हुआ सिर।

     

    आरव ने कहा—

     

    “मृणालिनी?”

     

    बच्ची ने सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा बहुत पीला था।

     

    लेकिन आँखें…

     

    आँखें बिल्कुल काली थीं।

     

    कबीर चीख पड़ा।

     

    बच्ची अचानक पीछे मुड़ी और गलियारे में भाग गई।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    लेकिन गलियारा खाली था।

     

    सिर्फ फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों की ओर जा रहे थे।

     

    आरव नीचे पहुँचा तो उसे हरिदास दिखाई दिया।

     

    बूढ़ा हवेली के आँगन में खड़ा था।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “तुमने दरवाज़ा खोल दिया।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा—

     

    “आपको सब पता था?”

     

    हरिदास ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    “मृणालिनी कौन है?”

     

    हरिदास कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “मृणालिनी इस हवेली की बेटी थी। लेकिन उसकी मौत अस्सी साल पहले नहीं हुई थी।”

     

    आरव चौंका।

     

    “तो?”

     

    हरिदास ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “वह मरी थी… लेकिन उसकी आत्मा नहीं।”

     

    कबीर ने पूछा, “उसके साथ क्या हुआ था?”

     

    हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “1936 में रुद्रगढ़ परिवार ने एक अनुष्ठान किया था। उनका विश्वास था कि हवेली के नीचे दबे खजाने की रक्षा एक अदृश्य शक्ति करती है। उस शक्ति को शांत करने के लिए परिवार ने अपनी ही बेटी को बलि के लिए चुना।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “मृणालिनी को उसी पश्चिमी कमरे में बंद कर दिया गया था।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “तीन दिन बाद दरवाज़ा खोला गया। अंदर लड़की नहीं थी। सिर्फ उसकी चूड़ियाँ थीं… और दीवार पर खून से लिखा था—”

     

    हरिदास रुक गया।

     

    “क्या लिखा था?”

     

    बूढ़े ने आरव की आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “मैं अकेली नहीं मरूँगी।”

     

    उसी समय हवेली की ऊपरी मंज़िल से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पश्चिमी कमरे की खिड़की में वही बच्ची खड़ी थी।

     

    उसने हाथ में कुछ पकड़ा हुआ था।

     

    आरव ने कैमरे का ज़ूम बढ़ाया।

     

    वह एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में मृणालिनी खड़ी थी।

     

    उसके साथ एक आदमी था।

     

    हरिदास का चेहरा देखकर आरव समझ गया कि कुछ बहुत गलत था।

     

    क्योंकि तस्वीर में वह आदमी…

     

    हरिदास था।

     

    लेकिन तस्वीर के नीचे साल लिखा था—

     

    1936।

     

    आरव ने घबराकर बूढ़े की ओर देखा।

     

    “आप… तब भी जिंदा थे?”

     

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान आ गई।

     

    और फिर उसने कहा—

     

    “मैंने कहा था ना… हवेली कहानी नहीं सुनाती। वह अपने कैदियों की तलाश करती है।”

     

    अचानक आरव के पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    हरिदास गायब था।

     

    और पश्चिमी कमरे से फिर वही बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “अब तीसरा कौन होगा?”

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बंद दरवाज़ा (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरुआ के बाहर, घने पीपल और बरगद के पेड़ों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। गाँव वाले उसे रुद्रगढ़ हवेली कहते थे। लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी वह हवेली अब खंडहर में बदल चुकी थी। उसकी दीवारों पर जगह-जगह काई जम चुकी थी, छत का एक हिस्सा टूट चुका था और लकड़ी के दरवाज़े इतने पुराने हो चुके थे कि हवा चलने पर अपने आप कराहने लगते थे।

     

    लेकिन हवेली की सबसे डरावनी बात उसका उजाड़ होना नहीं था।

     

    उसका सबसे डरावना रहस्य था—पश्चिमी कमरे का बंद दरवाज़ा।

     

    कहा जाता था कि उस कमरे को पिछले अस्सी वर्षों से किसी ने नहीं खोला था।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि आधी रात के बाद उस कमरे के अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती थी। कभी-कभी खिड़की पर किसी बूढ़ी औरत की परछाईं दिखाई देती थी। और जो भी उस कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करता, वह अगले दिन गाँव छोड़कर चला जाता।

     

    इन बातों को सुनकर शहर में रहने वाला आरव हमेशा हँसता था।

     

    आरव पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों पर डॉक्यूमेंट्री बनाता था। जब उसके दादा की मृत्यु के बाद उसे पता चला कि रुद्रगढ़ हवेली उसकी पुश्तैनी संपत्ति है, तो उसने फैसला किया कि वह गाँव जाकर हवेली की हालत देखेगा।

     

    उसके साथ उसका दोस्त कबीर भी आया।

     

    शाम के करीब चार बजे दोनों हवेली के सामने खड़े थे।

     

    “यार, तू सच में यहाँ रात बिताने वाला है?” कबीर ने टूटी हुई दीवार को देखते हुए पूछा।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “यही तो मज़ा है। ऐसी जगहों की कहानी रिकॉर्ड करनी चाहिए।”

     

    तभी पीछे से एक बूढ़ी आवाज़ आई।

     

    “कहानी रिकॉर्ड करने आए हो… या अपनी कहानी लिखवाने?”

     

    दोनों ने पलटकर देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी हाथ में लकड़ी की छड़ी लिए खड़ा था। उसका नाम हरिदास था। गाँव में लोग उसे हवेली का आखिरी रखवाला कहते थे।

     

    आरव ने नमस्ते की।

     

    “आपको हमारे आने का पता था?”

     

    हरिदास ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “जिसे हवेली बुलाती है, उसके आने का पता सबको चल जाता है।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “बाबा, आप भी गाँव वालों की तरह डरावनी बातें करते हैं?”

     

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

     

    “डरावनी बातें मैं नहीं करता बेटा। हवेली करती है।”

     

    उसकी आवाज़ में ऐसी गंभीरता थी कि कबीर की हँसी अचानक रुक गई।

     

    हरिदास ने उन्हें हवेली की चाबी दी।

     

    “ऊपर के कमरों में जा सकते हो। आँगन देख सकते हो। पुराने कागज़ भी मिल जाएँगे। लेकिन पश्चिमी हिस्से में मत जाना।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा, “क्यों?”

     

    बूढ़े ने कुछ पल चुप रहकर कहा—

     

    “क्योंकि वहाँ जो बंद है… वह दरवाज़ा नहीं है।”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    आरव और कबीर ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब था उसका?” कबीर ने पूछा।

     

    “बूढ़े लोग रहस्य बनाए बिना नहीं रह सकते,” आरव ने कहा।

     

    दोनों अंदर चले गए।

     

    हवेली के भीतर धूल की मोटी परत थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। कुछ तस्वीरों में रुद्रगढ़ परिवार के लोग दिखाई दे रहे थे। एक तस्वीर में लगभग दस साल की लड़की खड़ी थी।

     

    उसकी आँखें बेहद अजीब थीं।

     

    ऐसा लगता था जैसे वह तस्वीर से बाहर निकलकर उन्हें देख रही हो।

     

    आरव ने कैमरा निकाला और तस्वीर रिकॉर्ड करने लगा।

     

    तभी कबीर ने कहा—

     

    “आरव… ये लड़की कौन है?”

     

    तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “मृणालिनी देवी — 1891”

     

    आरव ने मोबाइल से फोटो खींची।

     

    “शायद हवेली के मालिक की बेटी थी।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    रात होने लगी।

     

    करीब साढ़े दस बजे वे नीचे वाले बड़े कमरे में बैठे खाना खा रहे थे। अचानक ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने चौंककर आरव को देखा।

     

    “ऊपर कोई है?”

     

    आरव ने टॉर्च उठाई।

     

    दोनों सीढ़ियों से ऊपर गए।

     

    ऊपर पहुँचते ही उन्हें लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के अंत में एक बड़ा लकड़ी का दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर लोहे की मोटी जंजीर बंधी थी।

     

    आरव रुक गया।

     

    “यही पश्चिमी कमरा होगा।”

     

    तभी अंदर से बहुत हल्की आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    किसी ने दरवाज़े पर तीन बार दस्तक दी।

     

    कबीर का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “चल वापस चलते हैं।”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    फिर अंदर से आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    दोनों के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर पूछा—

     

    “इसने तेरा नाम कैसे लिया?”

     

    आरव के हाथ से टॉर्च लगभग गिर गई।

     

    अंदर से फिर वही आवाज़ आई।

     

    इस बार थोड़ी स्पष्ट—

     

    “आरव… दरवाज़ा खोलो…”

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    उसने जंजीर को छुआ।

     

    तभी अचानक पीछे से किसी के भागने की आवाज़ आई।

     

    दोनों पलटे।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान गलियारे से आते हुए सीधे बंद दरवाज़े तक जा रहे थे।

     

    और फिर…

     

    दरवाज़े के नीचे से एक कागज़ बाहर सरक आया।

     

    आरव ने काँपते हाथों से कागज़ उठाया।

     

    उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसे तुम धरोहर समझ रहे हो, वह असल में कैद है।”

     

    आरव ने कागज़ को देखा।

     

    और उसी क्षण पश्चिमी कमरे के अंदर से एक बच्ची के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    कबीर ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा। अभी।”

     

    लेकिन आरव की नज़र दरवाज़े पर थी।

     

    क्योंकि जंजीर अपने आप धीरे-धीरे खुल रही थी।

     

    छन्न…

     

    और दरवाज़ा…

     

    अंदर की तरफ खुलने लगा।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना भाग 6

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव कई मिनट तक उस काँच के टुकड़े को देखता रहा।

     

    उसमें दिखाई देने वाला बच्चा लगातार उसकी तरफ देख रहा था।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    फिर आईने में एक और दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक स्कूल।

     

    बच्चे हँस रहे थे।

     

    एक गरीब बच्चा अकेला बैठा था।

     

    बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे।

     

    शिक्षक सब देख रहा था।

     

    लेकिन उसने आँखें फेर लीं।

     

    दृश्य बदल गया।

     

    एक सड़क।

     

    एक घायल आदमी पड़ा था।

     

    लोग वीडियो बना रहे थे।

     

    लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था।

     

    दृश्य फिर बदला।

     

    एक घर।

     

    एक लड़की रो रही थी।

     

    परिवार वाले उसे चुप करा रहे थे।

     

    “लोग क्या कहेंगे?”

     

    दृश्य बदलता गया।

     

    हर जगह एक ही चीज थी—

     

    लोग गलत देख रहे थे, लेकिन चुप थे।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अब उसे समझ आ चुका था कि आईना किसी भूत की कहानी नहीं था।

     

    यह इंसान की उस आदत की कहानी था जिसमें वह दूसरों के पाप देखता है, लेकिन अपने हिस्से की चुप्पी भूल जाता है।

     

    तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।

     

    पहली बार वह पूरी तरह शांत लग रही थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या तुम्हें अब मुक्ति मिल गई?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती थी जब तक मेरी कहानी झूठ के नीचे दबाई गई थी।”

     

    “अब?”

     

    “अब सच सामने है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आईना खत्म?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “आईना कभी खत्म नहीं होता।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि समाज बदलता रहता है… लेकिन इंसान के भीतर का लालच, डर और अहंकार भी साथ बदलते हैं।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    अगली सुबह आरव सूरजपुर के चौक पर पहुँचा।

     

    वहाँ उसने वह बड़ा आईना लगवाया जो हवेली के टूटे हुए टुकड़ों से बचा था।

     

    लोग उसके चारों तरफ जमा हो गए।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यह आईना किसी को डराने के लिए नहीं है।”

     

    लोग चुप रहे।

     

    “यह हमें याद दिलाने के लिए है कि हम दूसरों को जिस नजर से देखते हैं, कभी उसी नजर से खुद को भी देखें।”

     

    एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

     

    उसने कहा—

     

    “अगर कोई अपना सच देखकर बदल जाए तो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो आईना सफल है।”

     

    एक महिला ने पूछा—

     

    “और अगर कोई सच देखकर भी न बदले?”

     

    आरव ने जवाब दिया—

     

    “तो आईना दोषी नहीं होगा।”

     

    उसी समय हवा चली।

     

    आईने की सतह पर हल्की धुंध छा गई।

     

    लोग पीछे हटने लगे।

     

    फिर आईने में पूरे कस्बे का चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार कोई डरावना चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ इंसान थे।

     

    थके हुए।

     

    डरे हुए।

     

    गलतियाँ किए हुए।

     

    लेकिन सच स्वीकार करने की कोशिश करते हुए।

     

    हरिदास बाबा आगे आए।

     

    उन्होंने आईने को देखा।

     

    “अब यह शांत है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    बाबा बोले—

     

    “क्योंकि अब लोग इससे डर नहीं रहे।”

     

    “फिर?”

     

    “अब वे खुद को देखने लगे हैं।”

     

    सूरजपुर की कहानी वहीं खत्म हो गई।

     

    लेकिन आरव की नहीं।

     

    कुछ महीने बाद वह शहर चला गया।

     

    उसने एक नई किताब लिखनी शुरू की।

     

    नाम था—

     

    “समाज का आईना।”

     

    उसने किताब की शुरुआत एक लाइन से की—

     

    “हम राक्षसों को जंगलों में ढूँढते रहे, जबकि वे हमारे डर, लालच और चुप्पी के पीछे छिपे थे।”

     

    किताब के आखिरी पन्ने पर उसने लिखा—

     

    “अगर कभी आपको लगे कि दुनिया बहुत बुरी हो गई है, तो दूसरों के चेहरे देखने से पहले अपना चेहरा देखिए।”

     

    उस रात आरव अपने कमरे में अकेला बैठा था।

     

    उसके सामने वही काँच का छोटा टुकड़ा रखा था।

     

    उसने उसे उठाया।

     

    इस बार उसमें सिर्फ उसका चेहरा था।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “सब खत्म।”

     

    तभी काँच पर एक छोटी-सी दरार पड़ी।

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    दरार धीरे-धीरे फैलने लगी।

     

    और उसके बीच एक शब्द उभरा—

     

    “नहीं।”

     

    कमरे की बत्ती अपने आप बुझ गई।

     

    अंधेरे में किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “आईना अभी जाग रहा है।”

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन काँच के टुकड़े में अब उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ हजारों लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    अलग-अलग शहर।

     

    अलग-अलग चेहरे।

     

    अलग-अलग कहानियाँ।

     

    और उन सबके पीछे…

     

    एक ही काली परछाईं।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आईने में परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।

     

    और पहली बार उसने साफ आवाज में जवाब दिया—

     

    “मैं समाज हूँ।”

     

    आरव के हाथ से काँच गिर गया।

     

    काँच फर्श पर टूट गया।

     

    लेकिन इस बार कोई डरावनी आवाज नहीं आई।

     

    सिर्फ एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “जब तक इंसान खुद को दूसरों से बेहतर समझता रहेगा… मैं जिंदा रहूँगा।”

     

    सुबह जब सूरज निकला, आरव ने खिड़की खोली।

     

    बाहर लोग अपने काम पर जा रहे थे।

     

    दुकानें खुल रही थीं।

     

    बच्चे स्कूल जा रहे थे।

     

    मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    लेकिन अब आरव जानता था—

     

    हर चेहरे के पीछे एक कहानी है।

     

    हर मुस्कान के पीछे एक दर्द हो सकता है।

     

    हर अच्छाई के पीछे कोई स्वार्थ छिपा हो सकता है।

     

    और हर बुरे इंसान के भीतर भी बदलने की संभावना होती है।

     

    उसने आखिरी बार आईने में खुद को देखा।

     

    इस बार उसने खुद से सिर्फ एक सवाल पूछा—

     

    “अगर पूरा समाज मेरा आईना है… तो मैं समाज को क्या चेहरा दिखा रहा हूँ?”

     

    आईने ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    क्योंकि जवाब आरव को खुद देना था।

     

    और शायद यही इस कहानी का सबसे डरावना सच था—

     

    भूतों से डरना आसान है।

    अपने असली चेहरे से डरना मुश्किल।

     

    समाप्त।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना भाग 5

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सूरजपुर में सुबह किसी त्योहार की तरह नहीं, किसी शोक की तरह हुई।

     

    हर घर में लोग अपने-अपने आईने के टुकड़े को देखकर डर रहे थे।

     

    किसी को अपनी पत्नी का छिपा हुआ दुख दिखाई दे रहा था।

     

    किसी को पिता का अपराध।

     

    किसी को भाई की धोखाधड़ी।

     

    और किसी को अपना ही चेहरा इतना अजनबी लग रहा था कि वह खुद से नजरें नहीं मिला पा रहा था।

     

    देवेंद्र चौहान रातोंरात गायब हो गया।

     

    लोगों ने उसकी तलाश शुरू की।

     

    लेकिन आरव जानता था कि वह कहाँ होगा।

     

    पुरानी हवेली में।

     

    वही हुआ।

     

    देवेंद्र तहखाने में उस जगह बैठा था जहाँ कभी मीरा को छिपाया गया था।

     

    उसके हाथ में आईने का एक टुकड़ा था।

     

    आरव ने उसे देखा।

     

    “यहाँ क्यों आए हो?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “मैंने सोचा था कि अगर आईना टूट गया तो सब खत्म हो जाएगा।”

     

    “लेकिन नहीं हुआ।”

     

    देवेंद्र हँसने लगा।

     

    “क्योंकि असली आईना शीशे का नहीं था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तुम्हें अब सच बोलना होगा।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी बोलोगे?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम्हारा सच भी सबके सामने आएगा।”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “डर नहीं लगता?”

     

    “बहुत।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर भी बोलूँगा।”

     

    देवेंद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    पहली बार उसके चेहरे पर घमंड नहीं था।

     

    सिर्फ थकान थी।

     

    “मैंने बहुत कुछ किया,” उसने कहा।

     

    और फिर उसने सब बता दिया।

     

    किस तरह उसने सरकारी जमीन बेचने में मदद की।

     

    किस तरह गरीबों के नाम पर आए पैसे अपने लोगों में बाँटे।

     

    किस तरह मीरा के पिता की शिकायत दबाई गई।

     

    और सबसे बड़ी बात—

     

    मीरा की हत्या के बाद उसने उस मामले को दबाने में मदद की थी।

     

    आरव ने उसकी पूरी बात रिकॉर्ड कर ली।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    अचानक तहखाने में वही लड़की दिखाई दी।

     

    मीरा।

     

    इस बार उसका चेहरा शांत था।

     

    उसने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “अब तुमने सच बोल दिया।”

     

    देवेंद्र रोने लगा।

     

    “क्या अब मुझे माफ करोगी?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “माफी मेरे हाथ में नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “न्याय समाज के हाथ में है।”

     

    और वह गायब हो गई।

     

    अगले दिन आरव ने सारे दस्तावेज और रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिए।

     

    कस्बे में हड़कंप मच गया।

     

    पुलिस ने देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया।

     

    पुराने मामलों की जाँच फिर से शुरू हुई।

     

    मीरा की हत्या का केस दोबारा खोला गया।

     

    हरिदास बाबा ने अदालत में गवाही दी।

     

    वह जानते थे कि इससे उनका अपना अपराध भी सामने आएगा।

     

    लेकिन उन्होंने कहा—

     

    “मैंने वर्षों तक चुप रहकर अपराध किया। अब सच बोलकर जितनी सजा मिलेगी, स्वीकार करूँगा।”

     

    आरव ने अपनी पुरानी गलती भी सार्वजनिक कर दी।

     

    उसने बताया कि उसने कभी पैसे लेकर एक खबर रोक दी थी।

     

    लोगों ने उसका विरोध किया।

     

    कुछ ने उसे गालियाँ दीं।

     

    कुछ ने कहा कि वह भी बाकी लोगों जैसा है।

     

    लेकिन आरव ने पहली बार सफाई नहीं दी।

     

    उसने सिर्फ कहा—

     

    “हाँ। मैं गलत था।”

     

    धीरे-धीरे सूरजपुर बदलने लगा।

     

    लोगों ने एक-दूसरे को आईने के टुकड़े दिखाना बंद कर दिया।

     

    उन्होंने उन्हें संभालकर रखा।

     

    क्योंकि अब उन्हें समझ आ चुका था कि आईना किसी को शर्मिंदा करने के लिए नहीं था।

     

    वह खुद को देखने के लिए था।

     

    लेकिन एक रात आरव के घर के बाहर फिर एक काँच का टुकड़ा मिला।

     

    उसमें कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “एक समाज तब नहीं बदलता जब अपराधी पकड़ा जाता है… समाज तब बदलता है जब लोग अपनी चुप्पी पहचानते हैं।”

     

    आरव ने वह टुकड़ा उठाया।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “क्या तुम्हें लगता है सब खत्म हो गया?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    हरिदास बाबा खड़े थे।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “तुमने सिर्फ सूरजपुर का सच देखा है।”

     

    “और?”

     

    “यह आईना सिर्फ एक जगह का नहीं था।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    “तो फिर?”

     

    बाबा ने अपनी जेब से एक और काँच का टुकड़ा निकाला।

     

    उसमें सूरजपुर नहीं था।

     

    एक दूसरा शहर दिखाई दे रहा था।

     

    लखनऊ।

     

    फिर दिल्ली।

     

    फिर मुंबई।

     

    फिर हजारों अनजान चेहरे।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “यह कैसे?”

     

    बाबा बोले—

     

    “क्योंकि समाज हर जगह एक जैसा है।”

     

    “क्या आईना हर जगह है?”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “हर इंसान के भीतर एक आईना है।”

     

    आरव ने काँच को देखा।

     

    अचानक उसमें उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार चेहरा साफ था।

     

    उसने पूछा—

     

    “तो क्या अब मैं सच से डरता नहीं?”

     

    आईने में उसका प्रतिबिंब मुस्कुराया।

     

    “डरते हो।”

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन अब भागते नहीं।”

     

    अचानक काँच का टुकड़ा गर्म होने लगा।

     

    उस पर एक आखिरी शब्द उभरा—

     

    “अगला।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “अगला कौन?”

     

    आईना शांत रहा।

     

    फिर उसमें एक बच्चा दिखाई दिया।

     

    एक छोटा बच्चा।

     

    वह अपने कमरे में बैठा था।

     

    उसके सामने वही आईना था।

     

    और उसके पीछे कोई खड़ा था।

     

    एक काली परछाईं।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    परछाईं धीरे-धीरे मुड़ी।

     

    उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    वह चेहरा…

     

    आरव का ही था।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना भाग 4

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    सूरजपुर का प्रधान देवेंद्र चौहान बाहर से बहुत सम्मानित आदमी था।

     

    हर धार्मिक आयोजन में सबसे आगे।

     

    गरीबों के लिए भाषण।

     

    बेटियों की सुरक्षा पर बड़े-बड़े दावे।

     

    और हर चुनाव में एक ही वादा—

     

    “मैं इस कस्बे को बदल दूँगा।”

     

    लेकिन लाल डायरी में उसका नाम देखकर आरव को यकीन हो गया कि असली कहानी कुछ और थी।

     

    डायरी में लिखा था—

     

    “देवेंद्र ने ठाकुर के बाद भी वही खेल जारी रखा। जमीनें हड़पीं। सरकारी पैसे खाए। गरीबों को कागजों में मरा हुआ दिखाकर योजनाओं का पैसा खाया।”

     

    आरव ने दस्तावेजों की तस्वीरें खींच लीं।

     

    उसने तय किया कि अब वह सबके सामने सच लाएगा।

     

    लेकिन उसी शाम पूरे कस्बे में एक खबर फैल गई—

     

    आरव झूठी खबरें फैलाकर लोगों को बदनाम कर रहा है।

     

    कुछ ही घंटों में उसके खिलाफ लोग जमा हो गए।

     

    जो लोग कल तक उसे ईमानदार पत्रकार कहते थे, वही आज उसे गालियाँ दे रहे थे।

     

    कबीर ने कहा—

     

    “देख रहा है? यही समाज है।”

     

    आरव ने भीड़ की तरफ देखा।

     

    उसे लगा जैसे हर चेहरे के पीछे कोई दूसरा चेहरा छिपा है।

     

    फिर अचानक उसे कुछ दिखाई दिया।

     

    भीड़ के बीच एक आदमी था।

     

    उसकी परछाईं बाकी सबकी तुलना में बहुत बड़ी थी।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    वह देवेंद्र नहीं था।

     

    वह एक साधारण आदमी था—रमेश, जो रोज मंदिर में दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता था।

     

    लेकिन उसकी परछाईं के हाथ में पत्थर था।

     

    आरव समझ गया।

     

    समाज हमेशा अपराधी को अकेले पैदा नहीं करता।

     

    कई बार समाज अपराधी को भीड़ देता है।

     

    रात में आरव फिर हवेली पहुँचा।

     

    इस बार उसके साथ कबीर, हरिदास बाबा और कुछ अन्य लोग भी थे।

     

    आईना कमरे के बीच में था।

     

    हरिदास बाबा बोले—

     

    “अब यह सिर्फ तुम्हारा मामला नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो इसे खत्म कैसे करेंगे?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “आईने को तोड़कर नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “सच बोलकर।”

     

    अचानक हवेली में तेज हवा चली।

     

    आईने पर धुंध जम गई।

     

    फिर उस धुंध में एक-एक करके लोगों के चेहरे दिखाई देने लगे।

     

    सबसे पहले देवेंद्र।

     

    फिर शंभूनाथ।

     

    फिर ठाकुर।

     

    फिर हरिदास।

     

    फिर कबीर।

     

    और अंत में आरव।

     

    हर व्यक्ति के पीछे उसके कर्मों की तस्वीरें चलने लगीं।

     

    देवेंद्र पैसे लेते हुए।

     

    शंभूनाथ मजदूरों को डाँटते हुए।

     

    ठाकुर जमीन हड़पते हुए।

     

    हरिदास चुप खड़े हुए।

     

    कबीर किसी पुराने झगड़े में झूठ बोलते हुए।

     

    और आरव—

     

    वह खुद को पैसे लेकर खबर रोकते हुए देख रहा था।

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ,” उसने कहा। “मैं भी दोषी हूँ।”

     

    आईने की सतह काँपने लगी।

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “बस यही चाहिए था।”

     

    “क्या?”

     

    “स्वीकार करना।”

     

    अचानक हवेली के बाहर हजारों लोगों की आवाज सुनाई दी।

     

    पूरा कस्बा वहाँ जमा था।

     

    देवेंद्र भी।

     

    उसने चिल्लाकर कहा—

     

    “यह सब जादू है! इसे बंद करो!”

     

    आईने ने अचानक उसकी तरफ रुख किया।

     

    देवेंद्र की परछाईं उसके पीछे खड़ी थी।

     

    वह परछाईं धीरे-धीरे उससे अलग होने लगी।

     

    देवेंद्र चीख पड़ा।

     

    “नहीं!”

     

    लोग पीछे हटने लगे।

     

    परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।

     

    वह देवेंद्र जैसा ही था।

     

    लेकिन उसकी आँखें काली थीं।

     

    उसने कहा—

     

    “तुमने मुझे बनाया है।”

     

    देवेंद्र जमीन पर गिर पड़ा।

     

    “मैंने कुछ नहीं किया!”

     

    आईने से आवाज आई—

     

    “यही तो तुम्हारा सबसे बड़ा झूठ है।”

     

    अचानक पूरा कमरा रोशनी से भर गया।

     

    लोगों ने अपनी-अपनी परछाइयाँ देखीं।

     

    किसी ने अपने बेटे से झूठ बोला था।

     

    किसी ने पड़ोसी की जमीन हड़पी थी।

     

    किसी ने दहेज के लिए बहू को सताया था।

     

    किसी ने गरीब को अपमानित किया था।

     

    किसी ने अन्याय देखा था और चुप रहा था।

     

    और कुछ लोगों ने सिर्फ इसलिए किसी को बुरा कहा था क्योंकि भीड़ ऐसा कह रही थी।

     

    हर कोई डरने लगा।

     

    किसी ने आईना तोड़ने के लिए पत्थर उठाया।

     

    हरिदास चिल्लाए—

     

    “रुको!”

     

    लेकिन पत्थर आईने पर जा चुका था।

     

    काँच में दरार पड़ गई।

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी दीवारें हिलने लगीं।

     

    मीरा की आवाज पूरे कस्बे में गूँज उठी—

     

    “तुमने आईना तोड़ दिया… अब तुम्हारा सच कहाँ छिपेगा?”

     

    एक तेज चीख सुनाई दी।

     

    आईना हजारों टुकड़ों में टूट गया।

     

    लेकिन हर टुकड़े में किसी न किसी इंसान का चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    अब आईना एक नहीं था।

     

    पूरा कस्बा आईना बन चुका था।

     

    और अगले दिन सूरजपुर में जो हुआ, उसने सबकी नींद उड़ा दी।

     

    हर घर के दरवाजे पर एक काँच का छोटा टुकड़ा पड़ा मिला।

     

    हर टुकड़े में घर के किसी सदस्य का ऐसा सच दिखाई दे रहा था जिसे वह वर्षों से छिपा रहा था।

     

    अब डर हवेली में नहीं था।

     

    डर लोगों के अपने घरों में पहुँच चुका था।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना भाग 3

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    अगली सुबह आरव सीधे पुराने मंदिर पहुँचा।

     

    हरिदास बाबा मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे थे।

     

    आरव ने उनके सामने लाल डायरी रख दी।

     

    बाबा ने डायरी देखते ही आँखें बंद कर लीं।

     

    “तुमने इसे खोल लिया।”

     

    “आप जानते थे इसके बारे में?”

     

    बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने कठोर आवाज में पूछा—

     

    “इसमें आपका नाम क्यों है?”

     

    काफी देर तक चुप रहने के बाद बाबा बोले—

     

    “क्योंकि मैं भी दोषी हूँ।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “किस चीज का?”

     

    बाबा ने मंदिर के पीछे बने छोटे कमरे की ओर इशारा किया।

     

    “वहाँ एक पुराना संदूक है। उसे खोलो।”

     

    आरव ने संदूक खोला।

     

    अंदर दर्जनों पुराने कागज थे।

     

    जमीन के कागज।

     

    शिकायतें।

     

    पुराने अखबार।

     

    और कई तस्वीरें।

     

    एक तस्वीर में ठाकुर रघुवीर सिंह था।

     

    उसके पास एक युवा हरिदास खड़ा था।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    “आप ठाकुर के साथ थे?”

     

    बाबा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैं उसका मुंशी था।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    “मैंने उसकी बहुत मदद की,” बाबा बोले। “गरीबों की जमीन के कागज बदले। झूठे दस्तावेज बनाए। लोगों को धमकाया। और हर बार खुद को समझाया कि मैं सिर्फ नौकरी कर रहा हूँ।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन मैंने उस आईने को देखा।”

     

    बाबा की आवाज काँपने लगी।

     

    “ठाकुर ने मुझे उसके कमरे में बुलाया था। उसने कहा था कि आईना मुझे मेरा भविष्य दिखाएगा।”

     

    “और आपने क्या देखा?”

     

    बाबा ने सिर उठाया।

     

    “मैंने खुद को देखा… लेकिन बूढ़ा नहीं। एक लाश के पास खड़ा देखा।”

     

    आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

     

    “किसकी लाश?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “एक लड़की की।”

     

    कुछ पल के लिए मंदिर में बिल्कुल सन्नाटा छा गया।

     

    “उस लड़की का नाम मीरा था। वह किसान की बेटी थी। उसके पिता ने ठाकुर की जमीन हड़पने की कोशिश का विरोध किया था।”

     

    “क्या हुआ उसके साथ?”

     

    बाबा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मीरा ने सबूत इकट्ठा कर लिए थे। वह शहर जाकर शिकायत करने वाली थी। लेकिन वह कभी शहर नहीं पहुँच पाई।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “उसे मार दिया गया?”

     

    बाबा ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    “और आपने?”

     

    “मैंने सब देखा।”

     

    “फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

     

    बाबा ने काँपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    यही वह बात थी जिसे समाज बार-बार दोहराता है।

     

    अन्याय देखकर चुप रहना।

     

    गलत देखकर आँखें बंद कर लेना।

     

    और फिर खुद को निर्दोष समझना।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मीरा की लाश कहाँ है?”

     

    बाबा ने धीरे से कहा—

     

    “हवेली के नीचे।”

     

    उसी रात आरव और कबीर हवेली पहुँचे।

     

    हरिदास बाबा ने उन्हें एक पुराना नक्शा दिया था।

     

    हवेली के तहखाने में जाने का रास्ता एक टूटी हुई दीवार के पीछे था।

     

    दोनों नीचे उतरे।

     

    सीढ़ियाँ इतनी पुरानी थीं कि हर कदम पर धूल उड़ रही थी।

     

    नीचे पहुँचकर उन्हें एक कमरा मिला।

     

    कमरे की दीवार पर दर्जनों नाम लिखे थे।

     

    कुछ नाम मिटाए गए थे।

     

    कुछ के नीचे लाल निशान थे।

     

    बीच में एक बड़ा आईना लगा था।

     

    आरव ने उसमें देखा।

     

    इस बार उसे अपना प्रतिबिंब नहीं दिखा।

     

    उसे पूरा सूरजपुर दिखाई दिया।

     

    लोगों के घर।

     

    गलियाँ।

     

    मंदिर।

     

    बाजार।

     

    और हर व्यक्ति के पीछे उसकी एक काली परछाईं।

     

    किसी की परछाईं लालच थी।

     

    किसी की झूठ।

     

    किसी की हिंसा।

     

    किसी की चुप्पी।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “तुम्हें लगता है राक्षस बाहर है?”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “राक्षस कौन है?”

     

    आईने से जवाब आया—

     

    “जिस दिन इंसान गलत देखकर भी चुप रहता है, उसी दिन उसके भीतर राक्षस पैदा होता है।”

     

    अचानक कबीर चीख पड़ा।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने देखा—कबीर आईने के सामने खड़ा था।

     

    आईने में कबीर का चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ कबीर किसी आदमी पर हमला कर रहा था।

     

    आरव ने उसे पीछे खींच लिया।

     

    “तूने क्या देखा?”

     

    कबीर ने काँपते हुए कहा—

     

    “मैंने… अपना सच देखा।”

     

    “क्या सच?”

     

    कबीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी तहखाने में किसी लड़की के रोने की आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    बहुत दूर से।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    आरव ने आवाज का पीछा किया।

     

    दीवार के पीछे एक बंद जगह थी।

     

    उसने पत्थर हटाया।

     

    अंदर एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।

     

    संदूक के अंदर कपड़े का एक टुकड़ा और एक पुरानी चूड़ी थी।

     

    कपड़े पर खून के धब्बे थे।

     

    और नीचे एक छोटा-सा कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मैं मीरा हूँ। अगर यह कागज किसी को मिले, तो समझ लेना कि मुझे समाज ने नहीं, समाज की चुप्पी ने मारा है।”

     

    आरव की आँखें भर आईं।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    कबीर ने जोर से उसे खींचा।

     

    लेकिन दरवाजा नहीं खुला।

     

    आईने में मीरा दिखाई दी।

     

    उसका चेहरा डरावना नहीं था।

     

    वह सिर्फ दुखी थी।

     

    उसने आरव की तरफ देखकर कहा—

     

    “मुझे न्याय नहीं चाहिए… मुझे सच चाहिए।”

     

    फिर आईने की सतह पर एक नया नाम उभरा—

     

    “सूरजपुर का प्रधान।”

     

    आरव समझ गया।

     

    अगला चेहरा सिर्फ एक आदमी का नहीं था।

     

    यह चेहरा पूरे समाज के सामने आने वाला था।

     

    और शायद इस बार आईना किसी एक इंसान को नहीं, पूरे कस्बे को दिखाने वाला था।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना भाग 2

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले ही कमरे में मौजूद वह रहस्यमयी औरत गायब हो गई।

     

    उसके हाथ में पकड़ी लाल डायरी फर्श पर पड़ी थी।

     

    आरव ने डायरी उठाई।

     

    उसका पहला पन्ना खाली था।

     

    दूसरा पन्ना भी खाली।

     

    तीसरे पन्ने पर केवल एक तारीख लिखी थी—

     

    17 अगस्त 1986।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “जिस दिन पहला झूठ बोला गया, उसी दिन आईना बना।”

     

    आरव ने पन्ना पलटा।

     

    अब उस पर कुछ लिखा हुआ था।

     

    “हर समाज अपने लिए कुछ चेहरे चुनता है। किसी को अच्छा आदमी कहता है, किसी को बुरा। लेकिन असली सच उन चेहरों के पीछे छिपा रहता है।”

     

    आरव की उंगलियाँ काँपने लगीं।

     

    अचानक हवेली के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कोई दरवाजे के पास आकर रुक गया।

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    दरवाजे पर उसका दोस्त कबीर खड़ा था।

     

    “तू यहाँ क्या कर रहा है?” कबीर ने पूछा।

     

    आरव ने राहत की साँस ली।

     

    “तू मेरा पीछा कर रहा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। मुझे लगा तू अकेला यहाँ आकर कोई बेवकूफी करेगा।”

     

    दोनों हवेली से बाहर निकल आए।

     

    लेकिन आरव ने लाल डायरी अपने बैग में रख ली।

     

    अगली सुबह उसने डायरी पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी में सूरजपुर के कई लोगों के बारे में लिखा था।

     

    सबसे पहला नाम था—

     

    शंभूनाथ।

     

    शंभूनाथ कस्बे का सबसे बड़ा व्यापारी था। बाहर से वह बहुत धार्मिक और दयालु माना जाता था। मंदिर में रोज पूजा करता और गरीबों को खाना बाँटता।

     

    लेकिन डायरी में लिखा था कि वह मजदूरों को महीनों की मजदूरी नहीं देता था।

     

    आरव ने उसी दिन शंभूनाथ से मिलने का फैसला किया।

     

    शंभूनाथ ने उसे बड़े प्यार से बैठाया।

     

    “बेटा, पत्रकार हो। चाय पियोगे?”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आप अपने मजदूरों को समय पर पैसा क्यों नहीं देते?”

     

    शंभूनाथ का चेहरा बदल गया।

     

    “किसने कहा तुमसे?”

     

    “बस सवाल पूछा है।”

     

    वह हँसने लगा।

     

    “आजकल के पत्रकार भी न… गरीबों के नाम पर कहानी बनाते हैं।”

     

    आरव ने उसे गौर से देखा।

     

    वह आदमी बाहर से जितना शांत था, भीतर से उतना ही बेचैन।

     

    शाम को आरव को अपने कमरे में वही आवाज सुनाई दी—

     

    “पहला चेहरा देख लिया?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने आईने के सामने जाकर खुद को देखा।

     

    लेकिन आईने में वह अकेला नहीं था।

     

    उसके पीछे शंभूनाथ खड़ा था।

     

    आरव पलटा।

     

    कमरा खाली था।

     

    फिर आईने की तरफ देखा।

     

    इस बार शंभूनाथ का चेहरा बदल रहा था।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    मुँह से खून बहने लगा।

     

    और फिर आईने में लिखा दिखाई दिया—

     

    “झूठ का पहला चेहरा।”

     

    अगली सुबह पूरे कस्बे में खबर फैल गई।

     

    शंभूनाथ रात में अपने घर के कमरे में मृत पाया गया था।

     

    उसके सामने एक बड़ा आईना रखा था।

     

    और आईने पर उंगली से लिखा था—

     

    “मजदूरी का हिसाब बाकी है।”

     

    पुलिस ने इसे हत्या माना।

     

    कस्बे में डर फैल गया।

     

    लोग कहने लगे कि ठाकुर की हवेली का श्राप लौट आया है।

     

    लेकिन आरव को यकीन था कि यह सिर्फ श्राप नहीं था।

     

    किसी को उन लोगों के राज पता थे।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तू इस मामले से दूर क्यों नहीं हो जाता?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि कोई लोगों को मार नहीं रहा… कोई उन्हें उनके किए का हिसाब दिखा रहा है।”

     

    “और अगर अगला नाम तेरा हुआ तो?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    उसी रात उसने लाल डायरी फिर खोली।

     

    एक नया पन्ना अपने आप खुल गया।

     

    उस पर उसका नाम लिखा था।

     

    आरव मिश्रा।

     

    उसके नीचे—

     

    “सच लिखने वाला आदमी भी सच से भागता है।”

     

    आरव का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उसे अपने जीवन की एक घटना याद आई।

     

    तीन साल पहले उसने एक बड़े उद्योगपति के खिलाफ भ्रष्टाचार की खबर लिखी थी।

     

    लेकिन जब उस उद्योगपति ने उसे पैसे देने की पेशकश की थी, आरव ने खबर रोक दी थी।

     

    उसने खुद को समझाया था कि परिवार की जरूरत थी।

     

    मगर वह भी तो एक झूठ था।

     

    वह भी तो बिक गया था।

     

    आईने में उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसे अपना चेहरा नहीं दिखाई दिया।

     

    एक आदमी दिखाई दिया जो नोटों का बंडल हाथ में लिए खड़ा था।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    आईने वाला आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम दूसरों का सच लिखते हो… अपना कब लिखोगे?”

     

    आरव ने आईने पर मुक्का मारा।

     

    शीशा नहीं टूटा।

     

    बल्कि उसके अंदर से आवाज आई—

     

    “समाज का सबसे खतरनाक झूठ वह होता है जिसे इंसान खुद से बोलता है।”

     

    अचानक कमरे की बत्ती बुझ गई।

     

    अंधेरे में लाल डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे।

     

    फिर एक नाम पर आकर रुक गए।

     

    हरिदास बाबा।

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    वही बाबा जिन्होंने उसे हवेली से दूर रहने को कहा था।

     

    अब सवाल यह था—

     

    क्या हरिदास बाबा भी किसी सच को छिपा रहे थे?

     

    आरव को नहीं पता था कि इस सवाल का जवाब उसे सूरजपुर के सबसे पुराने मंदिर में मिलने वाला था।

     

    और वहाँ उसका सामना उस आदमी से होने वाला था, जो पिछले चालीस सालों से आईने का रहस्य छिपाए बैठा था।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना” (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा था—सूरजपुर। नाम भले ही सूरजपुर था, लेकिन शाम ढलते ही यह जगह किसी अंधेरी दुनिया में बदल जाती थी। कस्बे के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी, जिसे लोग “आईने वाली हवेली” कहते थे।

     

    हवेली करीब सौ साल पुरानी थी। उसकी ऊँची दीवारों पर काई जम चुकी थी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लगी लोहे की जंजीर हमेशा हवा के साथ खड़खड़ाती रहती थी।

     

    लोग कहते थे कि उस हवेली में एक बहुत बड़ा आईना था।

     

    ऐसा आईना, जिसमें इंसान अपना चेहरा नहीं, बल्कि अपना असली चेहरा देखता था।

     

    कस्बे के बुजुर्गों का कहना था कि कई साल पहले हवेली का मालिक ठाकुर रघुवीर सिंह था। वह पूरे इलाके में बहुत सम्मानित आदमी माना जाता था। मंदिर में सबसे बड़ा दान वही देता था, गरीबों के सामने खुद को उनका मसीहा बताता था और हर साल बड़ी-बड़ी धार्मिक सभाएँ करवाता था।

     

    लेकिन उसकी हवेली के अंदर कुछ और ही कहानी थी।

     

    कहा जाता था कि ठाकुर गरीब किसानों की जमीन हड़पता था। जो उसके खिलाफ आवाज उठाता, उसे धमकाया जाता। मगर बाहर की दुनिया में ठाकुर को लोग “धर्मात्मा” कहते थे।

     

    एक रात ठाकुर ने उसी रहस्यमयी आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा।

     

    आईने में उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसके हाथ खून से सने थे।

     

    ठाकुर घबरा गया।

     

    उसने आईना तोड़ने की कोशिश की, लेकिन तभी आईने के अंदर से किसी औरत की आवाज आई—

     

    “दुनिया से झूठ बोल सकते हो ठाकुर… अपने आप से नहीं।”

     

    अगली सुबह ठाकुर अपनी हवेली के अंदर मृत मिला।

     

    उसकी आँखें खुली थीं और चेहरे पर ऐसा डर था जैसे मरने से पहले उसने कोई भयानक चीज देखी हो।

     

    तब से हवेली बंद कर दी गई।

     

    लेकिन असली कहानी वर्षों बाद शुरू हुई।

     

    सूरजपुर में रहने वाला आरव शहर से अपने कस्बे वापस आया था। वह पत्रकार था और समाज में फैले अंधविश्वास और अपराध पर लिखता था।

     

    उसे अपने दादा की पुरानी डायरी मिली थी।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “जिस दिन समाज अपने चेहरे से पर्दा हटाएगा, आईना फिर जाग जाएगा।”

     

    आरव ने उस लाइन को कई बार पढ़ा।

     

    उसे लगा कि शायद उसके दादा भी उसी हवेली की कहानी से परिचित थे।

     

    अगले दिन उसने कस्बे के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, हरिदास बाबा, से इस बारे में पूछा।

     

    बाबा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “उस हवेली का नाम दोबारा मत लेना।”

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    “क्योंकि वहाँ आईना है।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “आईना तो हर घर में होता है बाबा।”

     

    हरिदास बाबा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “हर आईना चेहरा दिखाता है बेटा… लेकिन वह आईना नीयत दिखाता है।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    बाबा ने आगे कहा—

     

    “वह आईना किसी बुरे आदमी को नहीं मारता। वह सिर्फ उसे उसका सच दिखाता है। डर इस बात का है कि इंसान अपना सच देखकर क्या करता है।”

     

    उस रात आरव ने तय किया कि वह हवेली जाएगा।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे वह टॉर्च लेकर हवेली के सामने पहुँचा।

     

    हवा बहुत तेज थी।

     

    दरवाजा बिना छुए ही धीरे-धीरे खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    अंदर धूल और सड़ांध की गंध थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। हर चित्र में ठाकुर परिवार के लोग मुस्कुरा रहे थे।

     

    लेकिन अजीब बात यह थी कि जैसे-जैसे आरव आगे बढ़ता, उसे लगता कि उन चित्रों की आँखें उसका पीछा कर रही हैं।

     

    वह एक बड़े कमरे में पहुँचा।

     

    कमरे के बीचोंबीच एक विशाल आईना कपड़े से ढका हुआ था।

     

    आरव ने धीरे से कपड़ा हटाया।

     

    आईना काला था।

     

    उसमें उसका प्रतिबिंब दिखाई ही नहीं दे रहा था।

     

    फिर अचानक आईने की सतह पर हल्की-सी लहर उठी।

     

    और उसके सामने उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन वह मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    आईने वाला आरव उसे घूर रहा था।

     

    फिर उसने धीरे से अपना हाथ उठाया।

     

    आरव ने हाथ नहीं उठाया था।

     

    आईने के अंदर का आरव मुस्कुराया और उसके होंठ हिले—

     

    “तुम सच जानना चाहते हो?”

     

    कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    टॉर्च बुझ गई।

     

    और अंधेरे में एक फुसफुसाहट गूँजी—

     

    “तो पहले अपना सच देखो…”

     

    आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजे पर कोई खड़ा था।

     

    एक औरत।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसके हाथ में एक पुरानी लाल डायरी थी।

     

    और वह धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रही थी।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी औरत ने कहा—

     

    “यह आईना समाज का है… और इसमें हर किसी का चेहरा है।”

     

    अचानक आईने में कई चेहरे दिखाई देने लगे।

     

    पुलिस वाले।

     

    नेता।

     

    पुजारी।

     

    व्यापारी।

     

    शिक्षक।

     

    गरीब।

     

    अमीर।

     

    और उन सबके चेहरों के पीछे एक दूसरा चेहरा छिपा था।

     

    एक ऐसा चेहरा जो दुनिया से छिपाया गया था।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    उसे समझ आ गया—

     

    यह सिर्फ एक हवेली की कहानी नहीं थी।

     

    यह पूरे समाज का आईना था।

     

    और आईना अब जाग चुका था।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • PAPO KA SHAHAR (भाग 5 )आखिरी पाप

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    मंदिर के अंदर खड़ा आदमी धीरे-धीरे प्रकाश में आया।

    अर्जुन की साँस रुक गई।

    “पापा…?”

    सामने खड़ा आदमी बिल्कुल उसके पिता जैसा था।

    वही चेहरा।

    वही आँखें।

    वही आवाज।

    लेकिन उसके पिता की मृत्यु को पाँच साल हो चुके थे।

    अर्जुन पीछे हट गया।

    “तुम मेरे पिता नहीं हो।”

    आदमी मुस्कुराया।

    “तुम्हें सच और झूठ में फर्क करना अभी भी नहीं आता।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “तुम कौन हो?”

    उस आदमी ने मंदिर की मूर्ति की तरफ देखा।

    “मैं वह हूँ जिसने इस शहर के पापों को इतने सालों तक संभालकर रखा।”

    अचानक मंदिर की सारी मूर्तियों की आँखें लाल हो गईं।

    मीरा अर्जुन के पास आकर खड़ी हो गई।

    उसने फुसफुसाकर कहा—

    “इसे मत सुनना।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि यह तुम्हारे डर से बात करता है।”

    वह आदमी हँसा।

    “मीरा… तुम अभी भी अधूरी कहानी हो।”

    मीरा की आँखों में गुस्सा आ गया।

    “तुमने मुझे खत्म करने की कोशिश की थी।”

    “लेकिन तुम बच गईं।”

    “क्योंकि सच को मारना आसान नहीं।”

    आदमी ने हाथ उठाया।

    मंदिर की दीवारों पर दृश्य उभरने लगे।

    सूरजपुर नहीं।

    कालपुर।

    सालों पहले का कालपुर।

    गरीब लोग भूखे थे।

    अमीर लोग धन जमा कर रहे थे।

    पुलिस अपराधियों से मिली थी।

    नेता झूठ बोल रहे थे।

    लोग सब जानते थे।

    लेकिन कोई कुछ नहीं करता था।

    फिर उस आदमी की आवाज आई—

    “यहीं से मेरा जन्म हुआ।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “तुम कौन हो?”

    “मैं किसी एक इंसान का नाम नहीं।”

    उसने अपना चेहरा बदलना शुरू किया।

    पहले वह बूढ़ा बना।

    फिर जवान।

    फिर बच्चा।

    फिर महिला।

    फिर अर्जुन।

    फिर मीरा।

    अर्जुन डर गया।

    “तुम…?”

    “मैं इस शहर के हर पाप का चेहरा हूँ।”

    मीरा ने कहा—

    “यह कालपुर की आत्मा है।”

    आदमी हँसा।

    “आत्मा नहीं।”

    उसने अर्जुन की तरफ देखा।

    “मैं इंसानों की इच्छाओं से पैदा हुआ हूँ।”

    अर्जुन समझ गया।

    लालच।

    झूठ।

    विश्वासघात।

    हिंसा।

    और चुप्पी।

    ये सब मिलकर इस डरावनी शक्ति को जन्म देते रहे थे।

    लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी था।

    “मेरा सातवाँ पाप क्या है?”

    आदमी मुस्कुराया।

    “तुमने सोचा था कि तुम्हारा पाप हत्या है।”

    “लेकिन वह तो दुर्घटना थी।”

    “हाँ।”

    “तो फिर?”

    वह धीरे-धीरे अर्जुन के पास आया।

    “तुम्हारा सबसे बड़ा पाप है… सच जानते हुए भी खुद को निर्दोष मानना।”

    अर्जुन चुप हो गया।

    उसके जीवन की सारी घटनाएँ उसकी आँखों के सामने घूमने लगीं।

    वह खबर जिसे उसने पैसे लेकर दबाया।

    वह आदमी जिसे उसने बिना पूरी जाँच के दोषी बताया।

    वह दुर्घटना जिसे उसके पिता ने छिपाया।

    और वह समय जब उसने अपने पिता पर सवाल नहीं उठाए।

    हर बार उसने खुद को समझाया था—

    “मेरी गलती नहीं।”

    लेकिन वह सच नहीं था।

    उसने धीरे से कहा—

    “हाँ।”

    काली शक्ति रुक गई।

    “क्या कहा?”

    “मैं दोषी हूँ।”

    मंदिर में अचानक सन्नाटा छा गया।

    अर्जुन ने आगे कहा—

    “मैंने लोगों के सच से अपना फायदा उठाया।”

    “मैंने अपनी गलतियों से आँखें बंद कीं।”

    “मैंने अपने पिता को सवालों से बचाया।”

    “मैंने नैना के मामले में सच खोजने की कोशिश नहीं की।”

    “और मैंने कई बार दूसरों को दोषी ठहराया, जबकि खुद निर्दोष नहीं था।”

    काली शक्ति पीछे हटने लगी।

    मीरा ने कहा—

    “यही इसकी कमजोरी है।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “क्या?”

    “सच।”

    काली शक्ति चीखने लगी।

    मंदिर की दीवारें काँपने लगीं।

    शहर की सारी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।

    टन! टन! टन!

    लोग सड़कों पर गिरने लगे।

    उनके हाथों से पैसे और कागज गिर गए।

    लाल आँखें सामान्य होने लगीं।

    काली शक्ति का शरीर टूटने लगा।

    उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते!”

    अर्जुन ने कहा—

    “मैं तुम्हें खत्म नहीं कर रहा।”

    “फिर?”

    “मैं तुम्हें स्वीकार कर रहा हूँ।”

    काली शक्ति चीख पड़ी।

    उसके शरीर से धुआँ निकलने लगा।

    फिर वह हजारों छोटे-छोटे काले टुकड़ों में टूट गई।

    हर टुकड़ा किसी इंसान की परछाईं बनकर जमीन पर गिरा।

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

    अर्जुन ने पूछा—

    “अब सब खत्म?”

    मीरा ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि पाप खत्म नहीं होते।”

    “फिर?”

    “इंसान उन्हें पहचानना सीखता है।”

    सुबह हुई।

    कालपुर पहली बार कई वर्षों बाद शांत था।

    लोग अपने घरों से बाहर आए।

    उन्हें पिछली रात की पूरी घटना याद नहीं थी।

    लेकिन हर किसी के दरवाजे पर एक कागज रखा था।

    उस पर सिर्फ एक सवाल लिखा था—

    “अगर कोई तुम्हें न देख रहा हो, तो तुम क्या करोगे?”

    अर्जुन ने अपना कागज देखा।

    उसने उसे मोड़कर जेब में रख लिया।

    मीरा उसके पास खड़ी थी।

    “तुम अब क्या करोगे?”

    अर्जुन ने कहा—

    “सच लिखूँगा।”

    “चाहे उसमें मेरा अपना नाम क्यों न हो?”

    “हाँ।”

    मीरा मुस्कुराई।

    धीरे-धीरे उसका शरीर धुंध में बदलने लगा।

    अर्जुन घबरा गया।

    “तुम जा रही हो?”

    “अब मुझे रुकने की जरूरत नहीं।”

    “तुम्हें इंसाफ मिल गया?”

    मीरा ने कहा—

    “इंसाफ तब मिला जब लोगों ने मेरी कहानी पर विश्वास किया।”

    और वह गायब हो गई।

    कुछ देर बाद अर्जुन मंदिर से बाहर निकला।

    कालपुर की सड़कें अब सामान्य थीं।

    लेकिन शहर के बीचोंबीच लगी पुरानी घड़ी अब भी खड़ी थी।

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

    सुइयाँ बारह बजने से एक मिनट पहले रुकी हुई थीं।

    वह आगे बढ़ गया।

    तभी…

    घड़ी की सुइयाँ चलने लगीं।

    टिक… टिक… टिक…

    अर्जुन रुक गया।

    घड़ी ने बारह बजाए।

    एक…

    दो…

    तीन…

    चार…

    पाँच…

    छह…

    सात…

    आठ…

    नौ…

    दस…

    ग्यारह…

    बारह…

    अर्जुन ने राहत की साँस ली।

    लेकिन फिर—

    तेरहवीं घंटी।

    उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।

    घड़ी के नीचे एक छोटा बच्चा खड़ा था।

    उसके हाथ में लाल गुब्बारा था।

    बच्चे ने अर्जुन को देखकर मुस्कुराया।

    और बोला—

    “अंकल… कालपुर में एक पाप अभी भी बाकी है।”

    अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।

    “कौन सा?”

    बच्चे ने धीरे से कहा—

    “पापों को देखकर भी चुप रहना।”

    और अगले ही पल बच्चा गायब हो गया।

    सड़क पर सिर्फ लाल गुब्बारा रह गया।

    अर्जुन ने उसे उठाया।

    उस पर खून से एक आखिरी शब्द लिखा था—

    “जारी…”

    समाप्त। :::

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • पापों का शहर (भाग 4)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    “हत्या…”

     

    काली आकृति की आवाज पूरे तहखाने में गूँज उठी।

     

    अर्जुन के कानों में जैसे किसी ने हजारों घंटियाँ बजा दी हों।

     

    उसके सामने वही दृश्य बार-बार घूम रहा था।

     

    एक सुनसान सड़क।

     

    तेज बारिश।

     

    एक कार।

     

    और सड़क के बीच खड़ा एक बच्चा।

     

    अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “नहीं… मुझे कुछ याद नहीं।”

     

    काली आकृति हँसी।

     

    “यादें कभी मरती नहीं। इंसान सिर्फ उन्हें दफना देता है।”

     

    अचानक तहखाने की दीवारें गायब हो गईं।

     

    अर्जुन फिर उसी सड़क पर खड़ा था।

     

    बारिश उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

     

    सड़क के किनारे एक छोटी-सी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में लाल गुब्बारा था।

     

    अर्जुन ने उसे पहचानने की कोशिश की।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कुछ नहीं कहा।

     

    दूर से कार की हेडलाइट दिखाई दी।

     

    कार तेजी से उसकी तरफ आ रही थी।

     

    अर्जुन चिल्लाया—

     

    “हटो!”

     

    लेकिन लड़की वहीं खड़ी रही।

     

    कार करीब आई।

     

    और अचानक अर्जुन ने देखा—

     

    कार चला कोई और नहीं, वह खुद था।

     

    उसने ब्रेक लगाने की कोशिश की।

     

    लेकिन ब्रेक काम नहीं कर रहे थे।

     

    एक जोरदार टक्कर हुई।

     

    लड़की हवा में उछली।

     

    लाल गुब्बारा आसमान में चला गया।

     

    और सड़क पर खामोशी छा गई।

     

    अर्जुन चीख उठा।

     

    “नहीं!”

     

    दृश्य बदल गया।

     

    अब वह अस्पताल में था।

     

    एक डॉक्टर किसी से कह रहा था—

     

    “बच्ची की हालत बहुत गंभीर है।”

     

    फिर एक आदमी अंदर आया।

     

    अर्जुन ने उसे देखा।

     

    वह उसका पिता था।

     

    उसने डॉक्टर से कहा—

     

    “इस मामले को यहीं खत्म कर दीजिए।”

     

    अर्जुन ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “आपने ऐसा क्यों किया?”

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर यह बात बाहर गई, तो तुम्हारी जिंदगी खत्म हो जाएगी।”

     

    अर्जुन के चेहरे पर भय उतर आया।

     

    “तो… वह लड़की?”

     

    “वह मर गई।”

     

    अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मैंने उसे मारा?”

     

    पीछे से मीरा की आवाज आई—

     

    “नहीं।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    “तुमने उसे नहीं मारा।”

     

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें उस रात की पूरी सच्चाई कभी नहीं बताई।”

     

    अचानक दृश्य फिर बदला।

     

    इस बार अर्जुन ने देखा कि दुर्घटना से कुछ मिनट पहले कार में वह अकेला नहीं था।

     

    उसके साथ एक आदमी बैठा था।

     

    उस आदमी ने अर्जुन को शराब पिलाई थी।

     

    और फिर…

     

    उसने कार की ब्रेक लाइन काट दी थी।

     

    अर्जुन की आँखें फैल गईं।

     

    “यह कौन था?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “कालपुर का वह आदमी जिसने तुम्हारे पिता को ब्लैकमेल किया था।”

     

    “कौन?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    काली आकृति आगे बढ़ी।

     

    “सच के पास पहुँचकर भी इंसान डरता है।”

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    अर्जुन के सामने उस आदमी का चेहरा दिखाई दिया।

     

    गोविंद।

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    उसने गोविंद की तरफ देखा।

     

    बूढ़ा चुप खड़ा था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “आपने मेरी कार की ब्रेक काटी थीं?”

     

    गोविंद की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे धोखा दिया था।”

     

    “उस बच्ची का क्या दोष था?”

     

    गोविंद चुप रहा।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “यही कालपुर का सबसे बड़ा पाप है।”

     

    अर्जुन ने गुस्से में गोविंद को पकड़ लिया।

     

    “तुमने उसे क्यों मारा?”

     

    गोविंद चीख पड़ा—

     

    “मैंने उसे मारना नहीं चाहा था!”

     

    “लेकिन वह मर गई!”

     

    “हाँ!”

     

    गोविंद जमीन पर बैठ गया।

     

    “और उस दिन से मैं हर रात उसकी चीख सुनता हूँ।”

     

    अचानक लाल गुब्बारा हवा में दिखाई दिया।

     

    वह धीरे-धीरे अर्जुन के सामने आकर रुक गया।

     

    उस पर खून से एक नाम लिखा था—

     

    “नैना।”

     

    अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “उस बच्ची का नाम नैना था?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “और वह सिर्फ एक हादसे में नहीं मरी थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उसे मरने के बाद भी इंसाफ नहीं मिला।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कालपुर के लोगों ने उसकी मौत को छिपा दिया।”

     

    अर्जुन ने चारों तरफ देखा।

     

    दीवारों पर हजारों चेहरे उभर आए।

     

    हर चेहरा उस रात को देख रहा था।

     

    किसी ने पुलिस को नहीं बताया।

     

    किसी ने गवाही नहीं दी।

     

    किसी ने उसके परिवार की मदद नहीं की।

     

    हर कोई चुप रहा।

     

    काली आकृति ने कहा—

     

    “हत्या सिर्फ वह नहीं करता जो किसी की जान लेता है।”

     

    “कई बार हत्या वह भी करता है जो सच जानते हुए चुप रहता है।”

     

    अर्जुन ने सिर झुका लिया।

     

    तभी तहखाने में एक तेज आवाज हुई।

     

    धड़ाम!

     

    सारी दीवारें हिलने लगीं।

     

    काली आकृति पीछे हट गई।

     

    मीरा ने अर्जुन से कहा—

     

    “अब पाँचवाँ पाप जाग रहा है।”

     

    “कौन सा?”

     

    “लालच।”

     

    अचानक शहर के हर घर में एक साथ रोशनी जल उठी।

     

    लोग अपने घरों से बाहर निकलने लगे।

     

    लेकिन उनके हाथों में सोने के सिक्के थे।

     

    जमीन के कागज थे।

     

    नोटों की गड्डियाँ थीं।

     

    और हर व्यक्ति दूसरे से ज्यादा पाने के लिए लड़ रहा था।

     

    अर्जुन समझ गया—

     

    कालपुर सिर्फ लोगों के पाप दिखा नहीं रहा था।

     

    वह उन्हें जगा रहा था।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “जल्दी करो।”

     

    “कहाँ?”

     

    “शहर के पुराने मंदिर में।”

     

    “वहाँ क्यों?”

     

    “क्योंकि पाँचवें पाप की जड़ वहीं है।”

     

    अर्जुन और मीरा सुरंग से बाहर निकलने लगे।

     

    पीछे गोविंद बैठा रो रहा था।

     

    अर्जुन ने उसे देखा।

     

    “आप नहीं आएँगे?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “मेरी सजा अभी बाकी है।”

     

    अर्जुन आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही वह सुरंग से बाहर निकला, उसे एहसास हुआ कि पूरा शहर बदल चुका था।

     

    सड़क पर कोई इंसान जैसा नहीं दिख रहा था।

     

    हर व्यक्ति की आँखें लाल थीं।

     

    हर हाथ में पैसा था।

     

    और सब एक ही चीज के लिए लड़ रहे थे—

     

    और ज्यादा।

     

    दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और फिर तेरहवीं घंटी।

     

    मंदिर के दरवाजे अपने आप खुल गए।

     

    अंदर एक विशाल मूर्ति के सामने कोई खड़ा था।

     

    वह आदमी अर्जुन को देखकर मुस्कुराया।

     

    “आ गए?”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    वह धीरे-धीरे प्रकाश में आया।

     

    अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह आदमी…

     

    उसके पिता थे।

     

    लेकिन उनके पिता तो पाँच साल पहले मर चुके थे।

    Avatar photo

    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।