🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

लेखक: Alka Singh

Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

कृपया लॉग‑इन करें लेखक को मैसेज करने के लिए।

1 Follower
📝
197
रचनाएँ
👁️
4,809
व्यूज़
❤️
16
लाइक
📅
मार्च 2026
सदस्य बने
👥 लेखक नेटवर्क
👥 Followers 1
➡️ Following 0
अभी किसी लेखक को Follow नहीं किया है।
  • भाग 2 — हवेली का बंद कमरा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    सुबह की पहली किरण हवेली की टूटी हुई खिड़की से अंदर आई, लेकिन आरती की आँखों से रात का डर अभी तक नहीं गया था।

     

    वह पूरी रात सो नहीं पाई थी।

     

    उसके सामने बार-बार वही चेहरा आ रहा था—

     

    जला हुआ चेहरा…

     

    लाल साड़ी…

     

    आँखों में आँसू…

     

    और वह आवाज—

     

    “मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”

     

    आरती ने सोचा था कि सुबह होते ही वह अपने पति विवेक को सब कुछ बता देगी।

     

    लेकिन जब वह कमरे से बाहर निकली, तो हवेली बिल्कुल सामान्य लग रही थी।

     

    रसोई में उसकी सास कमला चाय बना रही थी।

     

    विवेक अखबार पढ़ रहा था।

     

    आरती ने काँपती आवाज में पूछा—

     

    “विवेक… क्या इस घर में पहले कभी नंदिनी नाम की कोई लड़की रहती थी?”

     

    अखबार पढ़ते-पढ़ते विवेक के हाथ रुक गए।

     

    उसने धीरे से आरती की तरफ देखा।

     

    “तुमने ये नाम कहाँ सुना?”

     

    आरती समझ गई कि कुछ तो छिपाया जा रहा है।

     

    “बस ऐसे ही…”

     

    कमला अचानक जोर से बोली—

     

    “इस घर में किसी नंदिनी का नाम मत लेना!”

     

    आरती चौंक गई।

     

    कमला की आँखों में डर था।

     

    सिर्फ डर नहीं…

     

    ऐसा डर, जैसे किसी पुराने जख्म को अचानक किसी ने छू लिया हो।

     

    विवेक ने माँ को शांत करते हुए कहा—

     

    “माँ, रहने दो।”

     

    फिर आरती से बोला—

     

    “तुमने शायद सपना देखा होगा।”

     

    आरती ने कुछ नहीं कहा।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल पैदा हो चुका था—

     

    अगर नंदिनी केवल सपना थी, तो माँ इतनी डर क्यों गई?

     

    उस दिन दोपहर में आरती पूरे घर में घूम रही थी।

     

    हवेली बहुत बड़ी थी।

     

    पुरानी दीवारों पर जगह-जगह सीलन थी।

     

    कई कमरों पर ताले लगे थे।

     

    एक लंबा गलियारा हवेली की पिछली तरफ जाता था।

     

    वहीं उसे लोहे का एक पुराना दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर मोटा ताला लगा था।

     

    आरती ने हाथ बढ़ाकर ताले को छूना चाहा।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “उस दरवाजे के पास मत जाना।”

     

    आरती पलटी।

     

    विवेक खड़ा था।

     

    “क्यों?”

     

    “बस मत जाना।”

     

    “उस कमरे में क्या है?”

     

    विवेक ने नजरें चुरा लीं।

     

    “पुराना सामान।”

     

    आरती ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “पुराने सामान से इतना डर क्यों लगता है?”

     

    विवेक चुप रहा।

     

    उस रात आरती ने फैसला किया कि वह सच्चाई जानकर रहेगी।

     

    आधी रात को जब पूरा घर सो गया, वह धीरे से उठी।

     

    उसने गलियारे में कदम रखा।

     

    हवा अचानक ठंडी हो गई।

     

    उसकी साँस से भाप निकलने लगी।

     

    फिर उसे वही आवाज सुनाई दी—

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    पायल की आवाज उसी बंद कमरे के पीछे से आ रही थी।

     

    आरती धीरे-धीरे दरवाजे तक पहुँची।

     

    अचानक ताला अपने आप गिर गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    कुछ पल तक उसने दरवाजे को देखा।

     

    फिर साहस करके उसे खोल दिया।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    उसने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    कमरे में पुराने संदूक, टूटी हुई कुर्सियाँ और धूल से ढके सामान पड़े थे।

     

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    आरती ने रोशनी तस्वीर पर डाली।

     

    वह नंदिनी की तस्वीर थी।

     

    लाल जोड़े में मुस्कुराती हुई नंदिनी।

     

    आरती की आँखें नम हो गईं।

     

    तस्वीर के नीचे कुछ लिखा था—

     

    “नंदिनी — इस घर की बहू।”

     

    लेकिन उसके ठीक नीचे किसी ने काले रंग से दूसरा वाक्य लिख दिया था—

     

    “इस घर की सबसे बड़ी गलती।”

     

    आरती का दिल काँप उठा।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरती ने तुरंत दरवाजा खींचा।

     

    वह नहीं खुला।

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर कमरे में किसी के रोने की आवाज आई।

     

    “बाबा… मुझे घर ले चलो…”

     

    आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    वह आवाज नंदिनी की थी।

     

    “बाबा… मैं घर जाना चाहती हूँ…”

     

    आरती रोने लगी।

     

    “नंदिनी… तुम यहाँ हो?”

     

    अचानक संदूक अपने आप खुल गया।

     

    उसके अंदर लाल कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी पड़ी थी।

     

    आरती ने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कोई बेटी यह डायरी पढ़ रही है, तो समझ लेना कि मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरती ने काँपते हाथों से पन्ने पलटे।

     

    नंदिनी ने अपनी जिंदगी का हर दर्द उसमें लिखा था।

     

    दहेज की माँग…

     

    मारपीट…

     

    भूखे रहना…

     

    पिता से पैसे माँगने का दबाव…

     

    और फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “आज उन्होंने कहा है कि अगर पिताजी ने दो लाख रुपये नहीं दिए, तो मेरी जिंदगी खत्म कर देंगे।”

     

    आरती की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    अगला पन्ना आधा जला हुआ था।

     

    उस पर केवल कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे—

     

    “मुझे रसोई में बुलाया गया है… अगर मैं वापस न आऊँ तो…”

     

    इसके बाद कुछ नहीं था।

     

    आरती ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी कमरे में किसी महिला की धीमी हँसी गूँजी।

     

    “सच जानना चाहती हो?”

     

    आरती ने पलटकर देखा।

     

    नंदिनी उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा पहले से ज्यादा भयानक था।

     

    लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा नहीं…

     

    दर्द था।

     

    आरती ने कहा—

     

    “तुम्हें किसने मारा?”

     

    नंदिनी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली हवेली के बाहर बने पुराने कुएँ की तरफ थी।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “जिसे तुम अपना पति समझती हो… उसके परिवार ने मेरी जिंदगी छीनी थी।”

     

    आरती के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “विवेक?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “विवेक उस समय पैदा भी नहीं हुआ था।”

     

    आरती ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन नंदिनी ने अगला वाक्य कहा—

     

    “लेकिन उसके पिता जानते हैं कि मेरे साथ क्या हुआ था।”

     

    आरती के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तभी दरवाजा खुल गया।

     

    आरती भागकर अपने कमरे में पहुँची।

     

    विवेक जाग रहा था।

     

    उसने पूछा—

     

    “तुम कहाँ गई थीं?”

     

    आरती ने डायरी उसके सामने रख दी।

     

    विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तुम्हें ये कहाँ मिली?”

     

    “उस कमरे में।”

     

    विवेक ने डायरी उठाई।

     

    कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “आरती, हमें यह घर छोड़ देना चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    विवेक ने जवाब नहीं दिया।

     

    तभी नीचे से उसकी माँ की चीख सुनाई दी।

     

    “विवेक!”

     

    दोनों दौड़कर नीचे गए।

     

    कमला सीढ़ियों के पास खड़ी काँप रही थी।

     

    उसके सामने जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    वही तस्वीर जिसमें नंदिनी थी।

     

    लेकिन अब तस्वीर में नंदिनी अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी खड़ा दिखाई दे रहा था।

     

    विवेक ने तस्वीर उठाई।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “ये कौन है?” आरती ने पूछा।

     

    विवेक ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “मेरे पिता।”

     

    आरती ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में नंदिनी के पीछे खड़ा आदमी मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन उसके हाथ में कुछ था।

     

    एक लाल रंग का कपड़ा।

     

    वही लाल कपड़ा जो नंदिनी ने अपनी डायरी में आखिरी दिन पहना था।

     

    कमला अचानक फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “मैंने उसे नहीं मारा था…”

     

    आरती ने कहा—

     

    “तो किसने मारा?”

     

    कमला ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुम्हारे ससुर ने।”

     

    हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    “लेकिन फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

     

    कमला ने काँपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मैं डर गई थी।”

     

    “किससे?”

     

    कमला ने हवेली की ऊपरी मंजिल की ओर देखा।

     

    “उससे… जो नंदिनी की मौत के बाद इस घर में आया था।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    कमला ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “नंदिनी की आत्मा नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “उसका बदला।”

     

    उसी समय ऊपर से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पुराना बंद कमरा फिर से खुल चुका था।

     

    और अंदर से किसी बच्ची के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    “माँ… मुझे बचा लो…”

     

    कमला के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “नहीं… ये फिर शुरू हो गया।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “माँ, बच्ची कौन है?”

     

    कमला ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरती ने उसकी ओर देखा।

     

    “माँजी… सच बताइए।”

     

    कमला की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “नंदिनी मरने से पहले गर्भवती थी।”

     

    आरती के मुँह से चीख निकल गई।

     

    “क्या?”

     

    कमला ने कहा—

     

    “उस रात सिर्फ नंदिनी नहीं मरी थी… उसका अजन्मा बच्चा भी मर गया था।”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    तेज हवा अंदर आने लगी।

     

    ऊपर से पायल की आवाज आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    फिर एक और आवाज गूँजी—

     

    “जिसने मेरी जिंदगी छीनी… उसकी नस्ल में कोई बेटी चैन से नहीं रहेगी।”

     

    विवेक ने आरती का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों दरवाजे की तरफ दौड़े।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    तभी आरती ने देखा—

     

    दीवार पर धीरे-धीरे लाल अक्षरों में कुछ लिखा जा रहा था।

     

    “भागने से पहले सच पूरा जानो।”

     

    और उसके नीचे एक नाम उभर आया—

     

    “राघव।”

     

    वही राघव…

     

    नंदिनी का पति।

     

    विवेक का पिता।

     

    जिसे पंद्रह साल पहले हवेली से गायब बताया गया था।

     

    आरती ने विवेक की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मरे नहीं थे?”

     

    विवेक की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “नहीं…”

     

    “तो कहाँ हैं?”

     

    विवेक ने काँपते हुए कहा—

     

    “यही तो मैं आज तक नहीं जानता था।”

     

    उसी क्षण हवेली के बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    तीनों जम गए।

     

    फिर बाहर से एक बूढ़ी आवाज आई—

     

    “दरवाजा खोलो… मैं राघव हूँ।”

     

    कमला ने चीखते हुए अपने कान बंद कर लिए।

     

    आरती ने विवेक की तरफ देखा।

     

    विवेक धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने कुंडी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया…

     

    उसके पीछे नंदिनी खड़ी थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    विवेक रुक गया।

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि बाहर खड़ा आदमी तुम्हारा पिता नहीं है।”

     

    अचानक बाहर से वही आवाज फिर आई—

     

    “विवेक… दरवाजा खोलो बेटा…”

     

    और इस बार आवाज के पीछे किसी और की धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    एक ऐसी हँसी…

     

    जिसमें इंसानियत का नामोनिशान नहीं था।

     

    क्रमशः… भाग 3 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    दहेज केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। यह चुप रहने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बन जाती है।

     

    नंदिनी की सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं थी कि उससे पैसे माँगे गए। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि लोग जानते थे कि उसके साथ गलत हो रहा है, फिर भी डर के कारण चुप रहे।

     

    इसलिए जब भी किसी बेटी पर दहेज का दबाव बनाया जाए, उसे अकेला मत छोड़िए।

     

    गलत के सामने चुप रहना भी कभी-कभी गलत का साथ देना बन जाता है।

     

    और याद रखिए—

     

    बेटी की कीमत दहेज से नहीं, उसके सपनों से होती है।

    जिस घर को बेटी की जरूरत है, उसे दहेज की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

  • भाग 1 — दहेज की पहली बेड़ियाँ

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    रात के करीब बारह बज रहे थे।गाँव के आखिरी छोर पर बनी उस पुरानी हवेली में आज फिर वही आवाज गूँज रही थी—

     

    “मुझे मेरा दहेज वापस चाहिए…”

     

    हवेली की दीवारें जैसे उस आवाज को पकड़कर बार-बार दोहरा रही थीं।

     

    “मेरा दहेज… मेरा जीवन… मेरा इंसाफ…”

     

    लेकिन इस आवाज की कहानी आज से नहीं, लगभग पंद्रह साल पहले शुरू हुई थी।

     

    उस समय उस गाँव में रहने वाले रामदीन की बेटी नंदिनी की शादी तय हुई थी।

     

    नंदिनी बहुत साधारण लड़की थी। चेहरे पर हमेशा मुस्कान, आँखों में बड़े-बड़े सपने और दिल में अपने माता-पिता के लिए अथाह प्रेम।

     

    रामदीन गरीब किसान था। उसके पास ज्यादा जमीन नहीं थी, लेकिन उसने अपनी बेटी को कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।

     

    शादी की तारीख नजदीक आती गई।

     

    एक शाम लड़के वालों का फोन आया।

     

    “देखिए रामदीन जी,” लड़के के पिता ने कहा, “हमने तो कुछ माँगा नहीं है, लेकिन आजकल समाज में इज्जत भी कोई चीज होती है।”

     

    रामदीन चुप रहा।

     

    “बस एक मोटरसाइकिल, थोड़ा सोना और पचास हजार रुपये… इससे ज्यादा कुछ नहीं।”

     

    रामदीन के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा, “भाई साहब… मैं गरीब आदमी हूँ। इतना सब कहाँ से लाऊँगा?”

     

    दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर जवाब आया—

     

    “तो फिर शादी भी कहाँ से होगी?”

     

    फोन कट गया।

     

    उस रात रामदीन अपनी चारपाई पर बैठकर देर तक रोता रहा।

     

    नंदिनी ने पिता को देख लिया।

     

    “बाबा… क्या हुआ?”

     

    रामदीन ने आँसू पोंछते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटी।”

     

    “आप मुझसे झूठ बोल रहे हैं।”

     

    रामदीन ने सिर झुका लिया।

     

    “तेरी शादी में दहेज माँग रहे हैं।”

     

    नंदिनी कुछ पल बिल्कुल शांत रही।

     

    फिर उसने पिता का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “बाबा, अगर मेरी खुशी की कीमत आपकी जिंदगी है, तो मुझे ऐसी शादी नहीं करनी।”

     

    रामदीन ने बेटी की ओर देखा।

     

    “लेकिन समाज क्या कहेगा?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “समाज मेरे साथ दुख बाँटने नहीं आएगा बाबा। फिर समाज के डर से मैं अपना जीवन क्यों बर्बाद करूँ?”

     

    रामदीन की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    लेकिन तभी नंदिनी की माँ बोली—

     

    “बेटी, बात इतनी आसान नहीं है। अगर रिश्ता टूट गया तो लोग तुझे ही दोष देंगे।”

     

    नंदिनी चुप हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद रामदीन ने अपनी छोटी-सी जमीन का एक हिस्सा बेच दिया।

     

    मोटरसाइकिल खरीदी गई।

     

    गहने बनवाए गए।

     

    पचास हजार रुपये का इंतजाम करने के लिए उसने साहूकार से भारी ब्याज पर कर्ज लिया।

     

    शादी हो गई।

     

    ढोल बजे।

     

    बारात आई।

     

    नंदिनी लाल जोड़े में विदा हुई।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि जिस घर में वह दुल्हन बनकर जा रही थी, वही घर उसकी जिंदगी की सबसे डरावनी कैद बनने वाला था।

     

    ससुराल में पहले कुछ दिन सब ठीक रहा।

     

    फिर एक रात नंदिनी के पति राघव ने कहा—

     

    “पापा कह रहे थे कि तुम्हारे पिता ने कार का वादा किया था।”

     

    नंदिनी चौंक गई।

     

    “कार? बाबा ने तो अपनी जमीन बेचकर मोटरसाइकिल दी है।”

     

    राघव ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब तुम लोग हमें बेवकूफ बनाकर लाए हो?”

     

    उस रात पहली बार नंदिनी के चेहरे से मुस्कान गायब हुई।

     

    दिन बीतते गए।

     

    माँग बढ़ती गई।

     

    कभी कार।

     

    कभी दो लाख रुपये।

     

    कभी नया फर्नीचर।

     

    कभी सोने की चेन।

     

    नंदिनी हर बार कहती—

     

    “मेरे पिता अब कुछ नहीं दे सकते।”

     

    और हर बार उसे यही जवाब मिलता—

     

    “तो फिर तू भी यहाँ ज्यादा दिन नहीं रह पाएगी।”

     

    एक दिन नंदिनी ने अपने पिता को फोन किया।

     

    “बाबा… मुझे घर ले चलो।”

     

    रामदीन की आवाज काँप गई।

     

    “क्या हुआ बेटी?”

     

    “कुछ नहीं बाबा… बस आपकी बहुत याद आ रही है।”

     

    वह अपने पिता को सच्चाई नहीं बता पाई।

     

    क्योंकि वह जानती थी कि उसके पिता के पास अब देने के लिए कुछ नहीं था।

     

    कुछ सप्ताह बाद एक रात हवेली में जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    “बचाओ!”

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    सुबह खबर फैली—

     

    नंदिनी रसोई में लगी आग में जल गई।

     

    उसकी मौत को हादसा बताया गया।

     

    रामदीन जब पहुँचा तो बेटी का चेहरा तक पहचान में नहीं आ रहा था।

     

    वह फूट-फूटकर रोया।

     

    “मेरी बेटी को जला दिया तुम लोगों ने!”

     

    लेकिन सबूत नहीं था।

     

    मामला धीरे-धीरे दब गया।

     

    हवेली फिर शांत हो गई।

     

    लेकिन नंदिनी शांत नहीं हुई।

     

    शादी के ठीक पंद्रहवें दिन से हवेली में अजीब घटनाएँ होने लगीं।

     

    रात को किसी के पायल पहनकर चलने की आवाज आती।

     

    रसोई में बंद बर्तन अपने आप गिरने लगते।

     

    और हर अमावस्या की रात हवेली की ऊपरी मंजिल से एक औरत की आवाज आती—

     

    “मेरा दहेज वापस करो…”

     

    राघव की माँ ने इसे वहम बताया।

     

    लेकिन एक रात राघव ने खुद वह आवाज सुनी।

     

    वह ऊपर गया।

     

    कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था।

     

    उसने दरवाजा तोड़ा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर राख से लिखा था—

     

    “बेटी की कीमत लगाने वालों का घर कभी आबाद नहीं होता।”

     

    राघव डरकर पीछे हट गया।

     

    तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुमने मेरी कीमत लगाई थी ना?”

     

    राघव पलटा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था।

     

    उसी रात हवेली की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    और बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    राघव की माँ चीखती हुई नीचे भागी।

     

    तभी ऊपर से पायल की आवाज आई—

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    धीरे-धीरे वह आवाज सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।

     

    एक कदम…

     

    फिर दूसरा…

     

    फिर तीसरा…

     

    राघव और उसकी माँ दरवाजे के पास खड़े काँप रहे थे।

     

    आवाज बिल्कुल उनके सामने आकर रुक गई।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई—

     

    “जिस घर में दहेज माँगा जाता है… वहाँ दुल्हन नहीं आती… उसकी मजबूरी आती है।”

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

     

    सुबह जब गाँव वाले हवेली पहुँचे, तो राघव की माँ बेहोश मिली।

     

    राघव गायब था।

     

    उस दिन के बाद वह कभी वापस नहीं आया।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    पंद्रह साल बाद एक नई दुल्हन उस हवेली में आई।

     

    उसका नाम था आरती।

     

    उसे हवेली के पुराने इतिहास के बारे में कुछ नहीं पता था।

     

    वह अपने पति के साथ कमरे में पहुँची।

     

    रात को उसने अपने सामान में से लाल साड़ी निकाली।

     

    तभी उसे कमरे के कोने से पायल की आवाज सुनाई दी।

     

    छन…

     

    छन…

     

    आरती ने पलटकर देखा।

     

    एक औरत खिड़की के पास खड़ी थी।

     

    लाल साड़ी…

     

    जला हुआ चेहरा…

     

    और आँखों से बहते आँसू।

     

    आरती चीखने ही वाली थी कि वह औरत बोली—

     

    “डर मत बेटी… मैं तुझे डराने नहीं आई।”

     

    आरती काँपते हुए बोली—

     

    “आप… कौन हैं?”

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “मैं नंदिनी हूँ।”

     

    आरती के हाथ से साड़ी गिर गई।

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखकर कहा—

     

    “मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”

     

    आरती रोने लगी।

     

    “लेकिन मैं क्या करूँ?”

     

    नंदिनी की आवाज कठोर हो गई—

     

    “आवाज उठाओ।”

     

    फिर वह धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    जाते-जाते उसने कहा—

     

    “जिस दिन बेटियाँ डरना बंद कर देंगी… उस दिन दहेज की बेड़ियाँ टूट जाएँगी।”

     

    आरती ने उस रात फैसला कर लिया।

     

    वह चुप नहीं रहेगी।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि सुबह होते ही उसके सामने ऐसा सच आने वाला है, जो नंदिनी की मौत से भी ज्यादा भयानक था…

     

    क्रमशः… भाग 2 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    दहेज केवल पैसों की माँग नहीं है। यह किसी बेटी के आत्मसम्मान, सपनों और जीवन की कीमत लगाने की सोच है।

     

    बेटी बोझ नहीं है। दहेज परंपरा नहीं, सामाजिक बुराई है।

     

    अगर किसी रिश्ते की शुरुआत ही लालच से हो रही है, तो वहाँ प्रेम और सम्मान की उम्मीद करना अपने जीवन के साथ अन्याय है।

     

    डरकर चुप रहना समस्या को बढ़ाता है, जबकि आवाज उठाना बदलाव की पहली सीढ़ी है।

  • काली हवेली का आख़िरी कमरा (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    तेरहवीं घंटी की आवाज़ के बाद पूरी हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव सामने खड़ी उस काली परछाईं को देख रहा था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं और शरीर धुएँ की तरह हिल रहा था। उसके चेहरे पर कोई निश्चित आकार नहीं था। कभी वह बूढ़े आदमी जैसा दिखाई देता, कभी जवान, और कभी बिल्कुल आरव जैसा।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “जिसे तुम दोस्त समझते हो, वह अभी भी ज़िंदा है।”

     

    “तो उसे मेरे सामने लाओ!”

     

    परछाईं ने हाथ उठाया।

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक तस्वीर दिखाई दी।

     

    उसमें कबीर एक छोटे से कमरे में बंद था।

     

    वह दरवाज़ा पीट रहा था।

     

    “आरव! मुझे यहाँ से निकाल!”

     

    आरव ने तस्वीर पर हाथ मारा।

     

    “कबीर!”

     

    तस्वीर के अंदर कबीर ने आरव को देखा।

     

    “तेरहवीं चाबी!”

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    वही पुरानी चाबी उसकी मुट्ठी में थी।

     

    कबीर चिल्लाया—

     

    “दीवार के पीछे का दरवाज़ा खोलो!”

     

    तभी तस्वीर गायब हो गई।

     

    आरव ने दीवार को ध्यान से देखा।

     

    उस पर मीरा की तस्वीर बनी हुई थी।

     

    आरव ने चाबी तस्वीर के बीच लगा दी।

     

    क्लिक!

     

    दीवार दो हिस्सों में बँट गई।

     

    पीछे एक संकरी सीढ़ी थी।

     

    आरव नीचे उतरने लगा।

     

    हर सीढ़ी के साथ तापमान गिरता जा रहा था।

     

    नीचे पहुँचकर उसे एक विशाल कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीचों-बीच कबीर बंधा हुआ था।

     

    “आरव!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन तभी कबीर ने चीखकर कहा—

     

    “रुको!”

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    कबीर के पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

     

    “आरव, ये कबीर नहीं है।”

     

    आरव ने चौंककर कबीर को देखा।

     

    कबीर मुस्कुराने लगा।

     

    उसकी मुस्कान धीरे-धीरे फैलती गई।

     

    फिर उसका चेहरा बदलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में वहाँ वही काली परछाईं खड़ी थी।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”

     

    परछाईं ने कहा—

     

    “मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हारे परिवार ने किया था।”

     

    तभी कमरे की दीवारों पर पुरानी घटनाएँ दिखाई देने लगीं।

     

    आरव ने देखा—

     

    तीस साल पहले रुद्र प्रताप ने इसी कमरे में एक अनुष्ठान किया था।

     

    उसकी बेटी मीरा गंभीर बीमारी से मर रही थी।

     

    रुद्र अपनी बेटी को बचाना चाहता था।

     

    उसने एक अजीब शक्ति को बुलाया।

     

    उस शक्ति ने कहा था—

     

    “मैं मीरा को जीवन दूँगा, लेकिन बदले में तुम्हारे परिवार की हर पीढ़ी से एक व्यक्ति मुझे अपना जीवन देगा।”

     

    रुद्र ने हामी भर दी।

     

    मीरा बच गई।

     

    लेकिन उसी रात रुद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ।

     

    उसने उस शक्ति को कैद करने के लिए कमरा 13 बनवाया।

     

    लेकिन शक्ति ने पूरे परिवार को एक-एक करके मार दिया।

     

    मीरा को भी।

     

    मरने से पहले मीरा ने उस शक्ति को हवेली में बंद कर दिया।

     

    लेकिन एक शर्त थी—

     

    हर इक्कीस साल बाद रुद्र के परिवार का कोई वंशज हवेली में आएगा और उसकी जगह कैद हो जाएगा।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो मेरे पिता?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए अपना नाम और शहर बदल दिया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और तुम?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया क्योंकि मुझे लगा था कि तुम ही इस श्राप को खत्म कर सकते हो।”

     

    परछाईं जोर से हँसी।

     

    “वह श्राप खत्म नहीं कर सकता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    परछाईं ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

     

    “क्योंकि अब तुम मेरे हो।”

     

    अचानक आरव के हाथ में जलन होने लगी।

     

    उसकी हथेली पर एक काला निशान बन गया।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “आरव! चाबी को आग में डालो!”

     

    कमरे के बीच एक पुरानी लोहे की भट्टी जल रही थी।

     

    आरव ने चाबी उसमें फेंक दी।

     

    आग अचानक नीली हो गई।

     

    परछाईं दर्द से चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    पूरा कमरा काँपने लगा।

     

    दीवारों में दरारें पड़ गईं।

     

    मीरा ने आरव से कहा—

     

    “जल्दी! आख़िरी दरवाज़ा खोलो!”

     

    आरव ने सामने देखा।

     

    वहाँ एक छोटा-सा लकड़ी का दरवाज़ा था।

     

    उस पर कोई ताला नहीं था।

     

    लेकिन उसके ऊपर लिखा था—

     

    “जिसे सच स्वीकार है, वही इसे खोल सकता है।”

     

    आरव ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

     

    उसके सामने उसके पिता दिखाई दिए।

     

    वह रो रहे थे।

     

    “बेटा, मुझे माफ करना।”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “आपने मुझे क्यों छोड़ा?”

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर मैं तुम्हें अपने पास रखता, तो वह तुम्हें ढूँढ लेता।”

     

    दृश्य गायब हो गया।

     

    फिर आरव ने अपनी माँ को देखा।

     

    फिर बचपन की यादें।

     

    फिर वह रात जब उसके पिता अचानक घर छोड़कर चले गए थे।

     

    आरव समझ गया कि उसके माता-पिता ने उससे नफरत नहीं की थी।

     

    वे उसे बचा रहे थे।

     

    उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    अंदर कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ एक आईना।

     

    आरव आईने के सामने खड़ा हुआ।

     

    आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    और उसके पीछे वह काली परछाईं।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आरव, तुम्हें फैसला करना होगा।”

     

    “कैसा फैसला?”

     

    “या तो तुम हवेली से बाहर जाओ और श्राप हमेशा के लिए तुम्हारे परिवार के साथ रहेगा…”

     

    “या?”

     

    “या तुम यहीं रहकर इसे खत्म कर दो।”

     

    आरव ने परछाईं की तरफ देखा।

     

    “अगर मैं यहीं रह गया तो?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “तुम्हारा शरीर नहीं रहेगा। लेकिन तुम्हारी आत्मा इस हवेली को हमेशा के लिए बंद कर देगी।”

     

    आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा।

     

    फिर उसने फैसला कर लिया।

     

    उसने आईने को उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर पटक दिया।

     

    छन्न्न्न!

     

    आईना टूटते ही भयंकर चीख सुनाई दी।

     

    काली परछाईं टूटने लगी।

     

    उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

     

    “तुम नहीं जानते कि तुमने क्या किया है!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब इस हवेली में कोई नहीं फँसेगा।”

     

    परछाईं ने आख़िरी बार चीखते हुए कहा—

     

    “अगर मैं खत्म हुआ… तो तुम्हारी यादें भी खत्म होंगी!”

     

    अचानक आरव के सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं तो सुबह हो चुकी थी।

     

    वह जंगल के बाहर सड़क पर पड़ा था।

     

    उसके पास कबीर भी बेहोश पड़ा था।

     

    कुछ देर बाद कबीर ने आँखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    “हाँ?”

     

    “हम बच गए?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    वहाँ अब कोई हवेली नहीं थी।

     

    सिर्फ एक जला हुआ खंडहर था।

     

    दोनों धीरे-धीरे सड़क की तरफ चलने लगे।

     

    लेकिन आरव को कुछ अजीब महसूस हो रहा था।

     

    उसे अपने बचपन की कोई याद नहीं आ रही थी।

     

    उसे अपने माता-पिता के चेहरे याद नहीं थे।

     

    उसे अपना पुराना घर याद नहीं था।

     

    यहाँ तक कि उसे यह भी याद नहीं था कि वह कबीर को कब से जानता था।

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला।

     

    उसके हाथ में एक छोटी-सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन अब वह मुस्कुरा रही थी।

     

    तस्वीर के पीछे एक आख़िरी वाक्य लिखा था—

     

    “धन्यवाद, आरव। अब मैं आज़ाद हूँ।”

     

    आरव ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।

     

    तभी दूर जंगल के अंदर से किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।

     

    आरव और कबीर दोनों रुक गए।

     

    कबीर ने घबराकर पूछा—

     

    “तुमने भी सुना?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

     

    वहाँ कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ पेड़ों के बीच हवा चल रही थी।

     

    आरव ने राहत की साँस ली और आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था…

     

    कि उसकी जेब में रखी तस्वीर के अंदर मीरा अब अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक नया चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    वही काली परछाईं।

     

    और तस्वीर के नीचे धीरे-धीरे नए शब्द उभर रहे थे—

     

    “हवेली खत्म हुई है… श्राप नहीं।”

     

    समाप्त।

  • काली हवेली का आख़िरी कमरा — भाग 2: तेरहवीं चाबी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी चाबी थी, जिस पर 13 लिखा हुआ था।

     

    सुबह होते ही उसने अपने दोस्त कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, मुझे तुमसे मिलना है। अभी।”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

     

    फिर कबीर ने धीमी आवाज़ में पूछा—

     

    “तुम भैरवगढ़ गए थे?”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस इतना कहा—

     

    “तुम जहाँ हो, वहीं रहो। मैं आ रहा हूँ।”

     

    करीब एक घंटे बाद कबीर आरव के कमरे में पहुँचा।

     

    आरव ने बिना कुछ कहे उसके सामने चाबी रख दी।

     

    चाबी देखते ही कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये तुम्हें कहाँ मिली?”

     

    “काली हवेली में।”

     

    कबीर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

     

    “तुम वहाँ गए थे?”

     

    आरव ने पूरी घटना बता दी।

     

    मीरा…

     

    आख़िरी कमरा…

     

    तेरह नंबर की चाबी…

     

    और वह तस्वीर।

     

    कबीर चुपचाप सुनता रहा।

     

    फिर उसने अपने बैग से एक पुरानी डायरी निकाली।

     

    “मेरे दादा ने ये डायरी मुझे मरने से पहले दी थी।”

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “भैरवगढ़ की हवेली में जो दिखाई देता है, वह सच नहीं होता। और जो दिखाई नहीं देता, वही सबसे खतरनाक है।”

     

    आरव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ रुद्र प्रताप सिंह का नाम था।

     

    कबीर बोला—

     

    “मेरे दादा इस हवेली में चौकीदार थे। उन्होंने बताया था कि रुद्र प्रताप की बेटी मीरा को बचपन से एक अजीब बीमारी थी। वह अक्सर कहती थी कि उसे घर की दीवारों के अंदर से कोई बुलाता है।”

     

    “कौन?”

     

    “उसे नहीं पता था।”

     

    कबीर ने डायरी का एक और पन्ना खोला।

     

    उसमें हवेली का नक्शा बना था।

     

    लेकिन नक्शे में एक ऐसी मंज़िल दिखाई दे रही थी जो हवेली में मौजूद ही नहीं थी।

     

    तहखाना — कमरा 13।

     

    आरव ने चाबी उठाई।

     

    “तो मुझे वहाँ जाना होगा।”

     

    कबीर ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे दादा ने लिखा है कि कमरा 13 का दरवाज़ा खोलने वाला कभी वापस नहीं आया।”

     

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मीरा ने मुझे बुलाया है।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और अगर मीरा तुम्हें बचाना नहीं, फँसाना चाहती हो तो?”

     

    आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    शाम होते ही दोनों भैरवगढ़ के लिए निकल पड़े।

     

    रास्ते भर बारिश होती रही।

     

    जब वे उस जगह पहुँचे, जहाँ पिछली रात आरव को हवेली दिखाई दी थी, वहाँ अब भी सिर्फ घना जंगल था।

     

    कबीर ने डायरी निकालकर नक्शा देखा।

     

    “हवेली यहीं होनी चाहिए।”

     

    दोनों कुछ देर तक तलाश करते रहे।

     

    अचानक आरव की नजर एक पुराने कुएँ पर पड़ी।

     

    कुएँ के किनारे वही निशान बना था जो डायरी के नक्शे पर था।

     

    कबीर ने पत्थर हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    लगभग पचास सीढ़ियों के बाद एक पत्थर की सुरंग सामने आई।

     

    सुरंग के अंत में लोहे का दरवाज़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    13

     

    आरव ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला अपने आप खुल गया।

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

     

    अंदर एक बड़ा कमरा था।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में कोई न कोई इंसान था।

     

    कुछ लोग रो रहे थे।

     

    कुछ चिल्ला रहे थे।

     

    कुछ सीधे कैमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    कबीर ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “आरव…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने तस्वीर आरव को दिखाई।

     

    उसमें एक छोटे बच्चे की तस्वीर थी।

     

    नीचे नाम लिखा था—

     

    “देवेंद्र — उम्र 8 वर्ष।”

     

    कबीर काँपने लगा।

     

    “ये मेरे दादा हैं।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में छोटा देवेंद्र उसी कमरे में खड़ा था।

     

    उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन यह तस्वीर लगभग चालीस साल पुरानी थी।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    तभी कमरे के अंदर से आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि वह कभी यहाँ से गया ही नहीं।”

     

    दोनों ने पीछे देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह बच्ची नहीं लग रही थी।

     

    उसका चेहरा बूढ़ा दिखाई दे रहा था।

     

    बाल सफेद थे।

     

    आँखें काली।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुम मीरा नहीं हो।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “मैं मीरा हूँ।”

     

    “तो तुम्हारी उम्र…?”

     

    “इस हवेली में उम्र नहीं बढ़ती।”

     

    मीरा ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “यहाँ हर इंसान की एक रात बंद है।”

     

    अचानक एक तस्वीर जमीन पर गिर गई।

     

    उसमें रुद्र प्रताप सिंह थे।

     

    उनके हाथ में वही तेरह नंबर की चाबी थी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    पीछे कुछ लिखा था—

     

    “रुद्र ने दरवाज़ा खोला था, लेकिन बाहर कुछ और निकला।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्या निकला?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे दादा जानते थे।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    दरवाज़ा काला था।

     

    उसके ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिसे अंदर बुलाया गया है, वही बाहर जा सकता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मुझे क्यों बुलाया गया?”

     

    मीरा चुप रही।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि तुम रुद्र के परिवार से जुड़े हो।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम्हारे परिवार का नाम क्या है।”

     

    आरव ने घबराकर कहा—

     

    “मेरा नाम आरव मल्होत्रा है। मेरा रुद्र प्रताप से कोई संबंध नहीं।”

     

    मीरा हँसने लगी।

     

    “नाम बदलने से खून नहीं बदलता।”

     

    कमरे की सारी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    फिर एक तस्वीर दीवार से गिरकर आरव के पैरों के पास आ गिरी।

     

    उसमें एक नवजात बच्चा था।

     

    गोद में उसे पकड़े एक आदमी खड़ा था।

     

    वह आदमी रुद्र प्रताप था।

     

    और बच्चे के नीचे लिखा था—

     

    “आरव।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    “ये झूठ है।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें सच से दूर रखा।”

     

    कबीर ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “जब आरव 21 साल का होगा, दरवाज़ा फिर खुलेगा।”

     

    आरव ने अपनी उम्र याद की।

     

    वह अगले दिन 21 साल का होने वाला था।

     

    उसी समय हवेली के अंदर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    फिर किसी आदमी की भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “समय पूरा हो गया।”

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वही… जिसने हम सबको कैद किया है।”

     

    अचानक काला दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    उस अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    लेकिन रास्ता गायब हो चुका था।

     

    कमरे की दीवारें धीरे-धीरे उनके करीब आने लगीं।

     

    मीरा चीखी—

     

    “आरव! अंदर जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुम अंदर नहीं गए, तो वह बाहर आ जाएगा!”

     

    आरव ने काले दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    अंधेरे से एक हाथ बाहर निकला।

     

    वह हाथ इंसान जैसा था…

     

    लेकिन उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    आरव ने हिम्मत जुटाई और दरवाज़े के अंदर कदम रख दिया।

     

    कबीर उसके पीछे गया।

     

    दरवाज़ा उनके पीछे बंद हो गया।

     

    अंदर एक लंबा कमरा था।

     

    कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा आरव जैसा था।

     

    लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह धीरे से मुस्कुराया।

     

    “आख़िरकार तुम आ ही गए।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आदमी ने सिर उठाया।

     

    “मैं वही हूँ…”

     

    उसने कहा,

     

    “…जिसे तुम्हारे परिवार ने तीस साल पहले इस हवेली में बंद किया था।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    आदमी आगे झुका।

     

    “लेकिन अब मुझे आज़ाद होने के लिए सिर्फ तुम्हारे खून की जरूरत है।”

     

    अचानक पीछे से कबीर की चीख सुनाई दी।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कबीर गायब था।

     

    दरवाज़ा भी गायब था।

     

    और सामने बैठा वह आदमी धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठ रहा था।

     

    “अब हम दोनों अकेले हैं, आरव।”

     

    तभी दूर कहीं घड़ी ने बारह बजने की आवाज़ की।

     

    टन… टन… टन…

     

    तेरहवीं घंटी बजते ही आदमी का चेहरा बदल गया।

     

    अब वह आदमी नहीं था।

     

    वह एक भयानक काली परछाईं बन चुका था।

     

    और उसके पीछे दीवार पर खून से एक वाक्य लिखा जा रहा था—

     

     

  • 😱 काली हवेली का आख़िरी कमरा 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब ग्यारह बजे आरव की कार सुनसान सड़क पर अचानक बंद हो गई।

     

    उसने कई बार चाबी घुमाई, लेकिन इंजन ने कोई आवाज़ नहीं की। चारों तरफ घना जंगल था। आसमान पर बादल इतने काले थे कि चाँद तक दिखाई नहीं दे रहा था। मोबाइल में नेटवर्क पहले ही गायब हो चुका था।

     

    आरव ने परेशान होकर कार से बाहर देखा।

     

    सड़क के दूसरी तरफ एक पुराना पत्थर लगा था, जिस पर धुंधली रोशनी में कुछ लिखा दिखाई दे रहा था—

     

    “भैरवगढ़ — 2 किलोमीटर।”

     

    आरव ने घड़ी देखी। रात के 11:07 बज रहे थे।

     

    उसे याद आया कि उसके दोस्त कबीर ने इस जगह के बारे में बताया था। भैरवगढ़ में एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग काली हवेली कहते थे। कहा जाता था कि लगभग तीस साल पहले उस हवेली में रहने वाला पूरा परिवार एक ही रात में गायब हो गया था।

     

    लोगों का मानना था कि परिवार का कोई सदस्य आज भी हवेली में रहता है।

     

    आरव ने इन बातों को हमेशा मज़ाक समझा था।

     

    लेकिन उस रात उसके पास हवेली के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

     

    उसने बैग उठाया और पैदल चल पड़ा।

     

    लगभग बीस मिनट बाद जंगल खत्म हुआ।

     

    सामने एक विशाल हवेली खड़ी थी।

     

    उसकी दीवारों पर काई जमी हुई थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के अंदर से हल्की पीली रोशनी आ रही थी।

     

    आरव रुक गया।

     

    “यहाँ कोई रहता है?”

     

    उसने आवाज़ लगाई—

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर चला गया।

     

    दरवाज़ा उसके पीछे अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने पीछे मुड़कर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    “बहुत बढ़िया…”

     

    उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    हॉल में पुरानी तस्वीरें लगी थीं। हर तस्वीर पर धूल की मोटी परत थी। उसने एक तस्वीर साफ की।

     

    उसमें एक आदमी, एक औरत और एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

     

    “रुद्र प्रताप सिंह — पत्नी देविका — बेटी मीरा।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    छोटी लड़की मीरा की आँखें अजीब थीं।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे वह कैमरे में नहीं, सीधे आरव को देख रही हो।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    ठक!

     

    आरव ने फ्लैशलाइट ऊपर की।

     

    पहली मंज़िल पर एक लंबा गलियारा था।

     

    और गलियारे के आख़िरी सिरे पर एक दरवाज़ा।

     

    उस दरवाज़े के नीचे से वही पीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    आरव ने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं।

     

    पहली सीढ़ी…

     

    दूसरी…

     

    तीसरी…

     

    जैसे-जैसे वह ऊपर जा रहा था, उसे किसी बच्ची के गुनगुनाने की आवाज़ सुनाई देने लगी।

     

    “सो जा… सो जा…”

     

    आरव रुक गया।

     

    आवाज़ बंद हो गई।

     

    वह कुछ सेकंड तक खड़ा रहा।

     

    फिर आगे बढ़ा।

     

    गलियारे की दीवार पर एक घड़ी लगी थी।

     

    उसकी सुइयाँ 12 बजकर 13 मिनट पर रुकी हुई थीं।

     

    आरव ने अपनी घड़ी देखी।

     

    11:42।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन तभी घड़ी की सुइयाँ हिलने लगीं।

     

    टक… टक… टक…

     

    और अचानक वह 12:13 पर पहुँच गई।

     

    उसी क्षण हवेली की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    अंधेरा।

     

    पूरा अंधेरा।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    सामने वही आख़िरी कमरा था।

     

    दरवाज़ा अब खुला हुआ था।

     

    अंदर से एक बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने किसी को अपना नाम नहीं बताया था।

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “आरव… तुम बहुत देर से आए।”

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    कमरे के अंदर से धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    फिर एक छोटी-सी लड़की दरवाज़े के पीछे से बाहर आई।

     

    उसने सफेद फ्रॉक पहनी थी।

     

    उसके लंबे काले बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “मीरा?”

     

    लड़की ने अपना चेहरा उठाया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    अंधेरे में लड़की उसके करीब आई।

     

    “क्योंकि तुम मेरे पापा को ढूँढने आए हो…”

     

    आरव ने घबराकर कहा—

     

    “मैं किसी को ढूँढने नहीं आया।”

     

    मीरा की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “झूठ।”

     

    अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आरव ने पूरी ताकत से उसे खींचा।

     

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    मीरा उसके बिल्कुल सामने खड़ी थी।

     

    “अगर बाहर जाना है…”

     

    वह फुसफुसाई,

     

    “…तो आख़िरी कमरा खोलना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आख़िरी कमरा?”

     

    मीरा ने गलियारे की तरफ इशारा किया।

     

    “यह कमरा आख़िरी नहीं है।”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    गलियारे में अब पहले से कहीं ज्यादा दरवाज़े थे।

     

    दस…

     

    बीस…

     

    शायद पचास।

     

    जबकि कुछ मिनट पहले वहाँ केवल तीन दरवाज़े थे।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “हर दरवाज़े के पीछे हमारे परिवार की एक रात बंद है।”

     

    आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले हवेली की दीवारों से चीखें आने लगीं।

     

    एक आदमी चिल्ला रहा था।

     

    एक औरत रो रही थी।

     

    और एक बच्ची बार-बार कह रही थी—

     

    “दरवाज़ा मत खोलना…”

     

    आरव ने कान बंद कर लिए।

     

    लेकिन आवाज़ उसके सिर के अंदर गूँज रही थी।

     

    फिर मीरा ने उसके हाथ में एक पुरानी चाबी रख दी।

     

    “कल रात तक तुम्हें सच पता करना होगा।”

     

    आरव ने चाबी को देखा।

     

    उस पर खून जैसे लाल रंग से एक नंबर लिखा था—

     

    13

     

    “और अगर मैंने नहीं किया?”

     

    मीरा ने धीरे से सिर झुकाया।

     

    उसके चेहरे पर फिर वही डरावनी मुस्कान आ गई।

     

    “तो कल रात…”

     

    वह फुसफुसाई—

     

    “…तुम भी इस हवेली की तस्वीर में होंगे।”

     

    अचानक आरव की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    जब उसकी आँख खुली, सुबह हो चुकी थी।

     

    वह हवेली के बाहर सड़क पर पड़ा था।

     

    उसकी कार बिल्कुल ठीक थी।

     

    आरव ने घबराकर हवेली की ओर देखा।

     

    वहाँ कोई हवेली नहीं थी।

     

    सिर्फ जंगल था।

     

    लेकिन उसके हाथ में अभी भी वह पुरानी चाबी थी।

     

    और चाबी पर लिखा नंबर—

     

    13

     

    उसने मोबाइल निकाला।

     

    गैलरी अपने आप खुली।

     

    उसमें एक नई तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में वही काली हवेली दिखाई दे रही थी।

     

    और पहली मंज़िल की खिड़की में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    लेकिन उसके पीछे एक दूसरा चेहरा भी था।

     

    एक आदमी का।

     

    जिसकी आँखें बिल्कुल काली थीं।

     

     

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(Last part-3)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

     

    राघव ने तुरंत मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    “माँ!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    नंदिनी उसके पीछे खड़ी कांप रही थी।

     

    सीढ़ियों के नीचे माँ नहीं थीं।

     

    वहाँ सिर्फ उनकी चप्पलें पड़ी थीं।

     

    राघव ने चारों तरफ देखा।

     

    “माँ कहाँ गईं?”

     

    तभी ऊपर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही कदमों की आवाज।

     

    राघव ने धीरे से सिर उठाया।

     

    छत की सीढ़ियों पर कोई खड़ा था।

     

    लंबे बाल।

     

    सफेद कपड़े।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “भैया… वो कौन है?”

     

    राघव ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह आकृति धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी।

     

    एक सीढ़ी।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    हर कदम के साथ उसकी गर्दन थोड़ी ऊपर उठ रही थी।

     

    राघव ने नंदिनी का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दोनों नीचे की तरफ दौड़े।

     

    पीछे से तेज कदमों की आवाज आने लगी।

     

    ठक-ठक-ठक-ठक!

     

    वे नीचे कमरे में घुसे और दरवाज़ा बंद कर लिया।

     

    राघव ने कुर्सी लगाकर दरवाज़ा रोक दिया।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर सन्नाटा रहा।

     

    फिर दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

     

    राघव और नंदिनी ने एक-दूसरे को देखा।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “राघव…”

     

    यह उनकी माँ की आवाज थी।

     

    राघव दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं!”

     

    “माँ हैं!”

     

    “नहीं भैया।”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा—

     

    “माँ मुझे हमेशा नंदू कहती हैं। उसने आपका नाम लिया है।”

     

    राघव को पिता की डायरी याद आई।

     

    “जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”

     

    दरवाज़े के बाहर आवाज फिर आई।

     

    इस बार वह नंदिनी की आवाज थी।

     

    “भैया, दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर राघव की अपनी आवाज—

     

    “दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर पिता की आवाज—

     

    “राघव…”

     

    फिर रिया की आवाज—

     

    “भैया…”

     

    राघव के शरीर में कंपकंपी होने लगी।

     

    बाहर खड़ी चीज़ उनके घर के हर सदस्य की आवाज निकाल सकती थी।

     

    लेकिन वह थी कौन?

     

    राघव ने डायरी के आखिरी पन्ने याद किए।

     

    वह दौड़कर स्टोर से लाई डायरी उठाने लगा।

     

    एक पन्ने के कोने में कुछ और लिखा था।

     

    “यह घर बनने से पहले यहाँ एक कुआँ था। उस कुएँ में एक लड़की ने आत्महत्या की थी। गाँव वाले कहते थे कि मरने के बाद उसकी आत्मा पानी में नहीं, बल्कि आईने में रहने लगी।”

     

    अगली लाइन थी—

     

    “रिया ने उस रात छत पर एक पुराना आईना देखा था।”

     

    राघव को अचानक कुछ याद आया।

     

    स्टोर रूम में एक टूटा हुआ आईना था।

     

    वह आईना…

     

    जिसे उसने कमरे के कोने में देखा था।

     

    राघव समझ गया।

     

    “नंदिनी, हमें स्टोर रूम वापस जाना होगा।”

     

    “क्या?”

     

    “उस आईने को तोड़ना होगा।”

     

    दोनों पीछे के रास्ते से छत पर पहुँचे।

     

    आश्चर्य की बात थी कि वहाँ अब कोई नहीं था।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

     

    राघव स्टोर रूम में गया।

     

    आईना दीवार के सामने रखा था।

     

    उसके शीशे पर धुंध जमी हुई थी।

     

    राघव ने हाथ से धुंध हटाई।

     

    उसमें उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    फिर नंदिनी का।

     

    फिर…

     

    रिया का।

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    आईने में रिया मुस्कुरा रही थी।

     

    “भैया…”

     

    उसकी आँखों से काला पानी बह रहा था।

     

    राघव ने पास पड़ी लोहे की रॉड उठाई।

     

    रिया ने आईने के अंदर से हाथ बाहर निकाल दिया।

     

    नंदिनी चीख पड़ी।

     

    राघव ने पूरी ताकत से आईने पर वार किया।

     

    छन्न्न्न्न!

     

    आईना टूट गया।

     

    एक साथ पूरे घर में चीख गूँज उठी।

     

    इतनी तेज कि खिड़कियाँ कांपने लगीं।

     

    आईने के टुकड़ों से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    वह धुआँ छत पर घूमता हुआ एक आकृति में बदल गया।

     

    लंबे बाल।

     

    सफेद चेहरा।

     

    आँखों की जगह सिर्फ काले गड्ढे।

     

    वह आकृति राघव की तरफ बढ़ी।

     

    तभी पीछे से माँ की आवाज आई—

     

    “राघव!”

     

    माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।

     

    राघव उनकी तरफ दौड़ा।

     

    “माँ!”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उसी क्षण नंदिनी चिल्लाई—

     

    “भैया, पीछे देखो!”

     

    राघव ने पीछे देखा।

     

    वह काली आकृति गायब हो चुकी थी।

     

    सिर्फ आईने का एक टुकड़ा फर्श पर पड़ा था।

     

    राघव ने राहत की सांस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे।

     

    “नहीं बेटा…”

     

    “क्या?”

     

    माँ ने धीरे से कहा—

     

    “वह आईने में नहीं थी।”

     

    राघव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तो कहाँ थी?”

     

    माँ ने छत की तरफ देखा।

     

    “वह हमेशा छत पर थी।”

     

    अचानक नंदिनी ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    नंदिनी की आँखें फैल गईं।

     

    “छत पर कोई खड़ा है।”

     

    राघव ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    छत की दीवार के पास रिया खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ था।

     

    वह रो रही थी।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “रिया?”

     

    रिया ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे उसने नहीं मारा था।”

     

    राघव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “फिर किसने?”

     

    रिया ने पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ…

     

    उनके पिता खड़े थे।

     

    लेकिन वह उनके पिता की आत्मा नहीं थी।

     

    उसके चेहरे पर वही काली मुस्कान थी।

     

    रिया ने कहा—

     

    “पापा ने उसे घर में बुलाया था।”

     

    माँ अचानक घुटनों के बल बैठ गईं।

     

    “नहीं…”

     

    राघव ने पिता की डायरी को देखा।

     

    आखिरी पन्ना अचानक अपने आप खुल गया।

     

    उस पर एक नई लाइन लिखी हुई थी—

     

    “मैंने उसे बुलाया नहीं था। मैंने सिर्फ उसे बाहर जाने से रोका था।”

     

    राघव ने सिर उठाया।

     

    काली आकृति अब उसके बिल्कुल सामने थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “दस साल पहले मैंने रिया का चेहरा पहना था…”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “…आज मुझे तुम्हारा चेहरा चाहिए।”

     

    राघव पीछे हटने लगा।

     

    लेकिन तभी रिया उसके सामने आ गई।

     

    उसने उस काली आकृति का हाथ पकड़ लिया।

     

    आसमान में अचानक बिजली चमकी।

     

    एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    और अगले ही पल…

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    सुबह पड़ोसियों ने शर्मा परिवार के घर का दरवाज़ा खुला पाया।

     

    घर के अंदर राघव, नंदिनी और उनकी माँ बेहोश मिले।

     

    छत पर सिर्फ टूटा हुआ आईना पड़ा था।

     

    और उसके पास…

     

    एक पुरानी चाँदी की पायल।

     

    रिया की।

     

    उस दिन के बाद उस घर की छत पर कभी कोई आवाज नहीं आई।

     

    कहानी यहीं खत्म हो जाती…

     

    अगर छह महीने बाद उस घर को खरीदने वाला नया परिवार वहाँ रहने न आया होता।

     

    पहली ही रात…

     

    नए घर का दस साल का बेटा आधी रात को अपनी माँ के कमरे में दौड़ता हुआ आया।

     

    वह कांप रहा था।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने छत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “मम्मी…”

     

    “हाँ?”

     

    “छत पर कोई है।”

     

    माँ ने हँसकर कहा—

     

    “बेटा, छत पर तो कोई नहीं है।”

     

    बच्चे ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “नहीं मम्मी…”

     

    फिर उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वहाँ एक आदमी खड़ा है। वो बिल्कुल मेरे जैसा दिखता है।”

     

     

    END

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राघव कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।

     

    ऊपर से फिर वही आवाज आई।

     

    “राघव…”

     

    उसके पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

     

    यह आवाज वह कैसे भूल सकता था?

     

    यह उसकी छोटी बहन रिया की आवाज थी।

     

    रिया…

     

    जो दस साल पहले मर चुकी थी।

     

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, ऊपर मत जाना।”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर छत की तरफ थी।

     

    कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई।

     

    पूरा घर फिर शांत हो गया।

     

    राघव ने माँ को जगाया।

     

    माँ कमरे से बाहर आईं और जैसे ही राघव ने उन्हें सारी बात बताई, उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “रिया का नाम मत लेना,” माँ ने कहा।

     

    “क्यों?”

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि वह मरकर भी इस घर से गई नहीं थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    राघव ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब सच बताइए।”

     

    माँ बहुत देर तक चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहना शुरू किया।

     

    दस साल पहले रिया सिर्फ तेरह साल की थी।

     

    उसे रात में छत पर जाकर आसमान देखना बहुत पसंद था।

     

    एक रात वह अचानक छत से गायब हो गई थी।

     

    घर में सबने सोचा कि वह शायद सीढ़ियों से नीचे गई होगी।

     

    लेकिन वह कहीं नहीं मिली।

     

    सुबह उसकी लाश…

     

    माँ आगे नहीं बोल पाईं।

     

    राघव ने पूछा, “कहाँ मिली थी?”

     

    माँ ने कांपते हुए छत के स्टोर रूम की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    राघव के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “लेकिन वह कमरा तो हमेशा बंद रहा है।”

     

    माँ बोलीं, “उस रात से।”

     

    राघव ने पूछा, “दरवाज़ा बंद किसने किया था?”

     

    माँ ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    अचानक राघव को अपने पिता की आखिरी बात याद आई।

     

    मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने उसे चेतावनी दी थी—

     

    “अगर कभी रात में छत से किसी के चलने की आवाज आए… तो दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    तब राघव ने इसे बीमारी के कारण कही गई बात समझा था।

     

    लेकिन अब…

     

    सब कुछ जुड़ रहा था।

     

    अगली सुबह राघव ने स्टोर रूम का ताला देखने का फैसला किया।

     

    वह छत पर गया।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    दिन की रोशनी में रात का डर थोड़ा कम लग रहा था।

     

    लेकिन स्टोर रूम के सामने पहुँचते ही उसकी सांस रुक गई।

     

    दरवाज़े पर खरोंच के निशान थे।

     

    बहुत सारे।

     

    ऐसे निशान जैसे किसी ने अंदर से बाहर निकलने के लिए लकड़ी को नाखूनों से खुरचा हो।

     

    राघव ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को छुआ।

     

    दरवाज़ा बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    उसने ताला देखा।

     

    ताला बाहर से बंद था।

     

    तभी उसकी नजर फर्श पर गई।

     

    वहाँ गीली मिट्टी के छोटे-छोटे पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान स्टोर रूम से निकलकर…

     

    पानी की टंकी तक जा रहे थे।

     

    राघव ने टंकी की तरफ देखा।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह टंकी के पास गया।

     

    ऊपर ढक्कन लगा था।

     

    उसने धीरे से ढक्कन उठाया।

     

    अंदर पानी बिल्कुल काला दिखाई दे रहा था।

     

    और पानी की सतह पर…

     

    एक लंबे बालों का गुच्छा तैर रहा था।

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    उसी समय पीछे से आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    राघव पलटा।

     

    नंदिनी खड़ी थी।

     

    “आप यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    राघव ने तुरंत टंकी का ढक्कन बंद कर दिया।

     

    “कुछ नहीं। नीचे चलो।”

     

    लेकिन नंदिनी की नजर स्टोर रूम पर पड़ी।

     

    “भैया, ये दरवाज़ा तो खुला है।”

     

    राघव ने देखा।

     

    दरवाज़ा सचमुच थोड़ा खुला हुआ था।

     

    उसने तो उसे बंद देखा था।

     

    दोनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे।

     

    फिर अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    नंदिनी के होंठ कांपने लगे।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।

     

    अंदर पूरा अंधेरा था।

     

    टॉर्च जलाकर उसने अंदर देखा।

     

    धूल से भरा कमरा।

     

    पुराना सामान।

     

    टूटी कुर्सी।

     

    एक लकड़ी की पेटी।

     

    और दीवार पर एक पुरानी तस्वीर।

     

    राघव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें पूरा परिवार था।

     

    माँ।

     

    पिता।

     

    राघव।

     

    नंदिनी।

     

    और रिया।

     

    लेकिन तस्वीर में एक अजीब बात थी।

     

    रिया के चेहरे पर किसी ने काले रंग से गोल घेरा बना दिया था।

     

    राघव ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे कुछ लिखा था।

     

    “यह रिया नहीं है।”

     

    राघव की उंगलियाँ कांपने लगीं।

     

    तभी पेटी के अंदर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    नंदिनी पीछे हट गई।

     

    राघव ने पेटी खोली।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कुछ खिलौने और एक डायरी थी।

     

    डायरी उसके पिता की थी।

     

    राघव ने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटे।

     

    एक पन्ने पर लिखा था—

     

    “रिया की मौत दुर्घटना नहीं थी।”

     

    अगली लाइन पढ़ते ही राघव के हाथ से डायरी गिर गई।

     

    “उस रात छत पर रिया के साथ कोई और भी था।”

     

    राघव ने डायरी फिर उठाई।

     

    अगला पन्ना खाली था।

     

    उसके बाद एक वाक्य था—

     

    “जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”

     

    राघव की सांस रुक गई।

     

    उसी समय कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    नंदिनी चीख उठी।

     

    अंदर अंधेरा छा गया।

     

    राघव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    कुंडी हिल नहीं रही थी।

     

    फिर…

     

    अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “भैया…”

     

    राघव जम गया।

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी तरफ मत देखना,” नंदिनी ने कांपते हुए कहा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि…”

     

    नंदिनी की आवाज टूट गई।

     

    “मेरे पीछे कोई खड़ा है।”

     

    राघव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    पीछे से ठंडी सांस उसकी गर्दन पर महसूस हुई।

     

    फिर किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—

     

    “तुमने मुझे दस साल इंतजार कराया।”

     

    अचानक दरवाज़ा खुल गया।

     

    दोनों भागकर बाहर आए।

     

    राघव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    स्टोर रूम खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान कमरे से बाहर निकलकर सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।

     

    और फिर…

     

    सीढ़ियों पर रुक गए।

     

    राघव ने नीचे देखा।

     

    घर के अंदर उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    लेकिन उनकी आँखें बंद थीं।

     

    और उनके पीछे…

     

    एक लंबी काली परछाईं खड़ी थी।

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “माँ!”

     

    माँ ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    लेकिन वह उनकी मुस्कान नहीं थी।

     

    उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “अब वह नीचे आ गई है।”

     

    और उसी पल पूरे घर की सारी लाइटें बंद हो गईं।

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब बारह बज रहे थे।लखनऊ की उस पुरानी कॉलोनी में दिन के समय सब कुछ सामान्य लगता था। बच्चे गलियों में खेलते, चाय की दुकानों पर लोग बातें करते और शाम होते ही हर घर की बालकनी में पीली रोशनी जल उठती। लेकिन रात के बाद वही कॉलोनी बिल्कुल बदल जाती थी।

     

    खासकर शर्मा परिवार का घर।

     

    तीन मंज़िला पुराना मकान था। सबसे ऊपर एक खुली छत, जिसके चारों तरफ करीब चार फीट ऊँची दीवार थी। छत के एक कोने में पानी की बड़ी काली टंकी थी और दूसरे कोने में एक पुराना स्टोर रूम, जिसका दरवाज़ा पिछले कई सालों से बंद पड़ा था।

     

    घर में उस समय सिर्फ तीन लोग थे—राघव, उसकी छोटी बहन नंदिनी और उनकी माँ।

     

    पिता की मृत्यु को दो साल हो चुके थे। पिता के जाने के बाद राघव ने ही घर की जिम्मेदारी संभाल ली थी।

     

    उस रात राघव अपने कमरे में बैठकर लैपटॉप पर काम कर रहा था।

     

    तभी…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने स्क्रीन से नजर उठाई।

     

    आवाज़ ऊपर से आई थी।

     

    छत से।

     

    राघव कुछ सेकंड तक चुप बैठा रहा।

     

    फिर दोबारा आवाज आई।

     

    ठक… ठक…

     

    इस बार जैसे कोई छत की फर्श पर धीरे-धीरे चल रहा हो।

     

    राघव ने घड़ी देखी।

     

    12:07 AM.

     

    उसने खुद को समझाया, “शायद बिल्ली होगी।”

     

    वह वापस काम करने लगा।

     

    लेकिन तभी उसके कमरे की खिड़की पर हल्की-सी परछाईं दिखाई दी।

     

    राघव ने चौंककर खिड़की की तरफ देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    उसने पर्दा हटाया।

     

    नीचे पूरी गली खाली थी।

     

    सड़क की लाइट के नीचे एक आवारा कुत्ता बैठा था, लेकिन वह भी ऊपर आसमान की तरफ देख रहा था।

     

    राघव के शरीर में हल्की सिहरन दौड़ गई।

     

    “अजीब है…”

     

    उसी समय पीछे से नंदिनी की आवाज आई।

     

    “भैया?”

     

    राघव पलटा।

     

    नंदिनी दरवाज़े पर खड़ी थी।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आपने भी आवाज सुनी?”

     

    “कौन-सी आवाज?”

     

    नंदिनी ने छत की तरफ इशारा किया।

     

    “ऊपर कोई चल रहा है।”

     

    राघव कुछ बोलता, उससे पहले फिर आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    जैसे किसी के नंगे पैर सीमेंट की फर्श पर पड़ रहे हों।

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा, “क्या ऊपर कोई है?”

     

    राघव ने कहा, “नहीं। माँ नीचे हैं और पड़ोसी अपने घर में। शायद बिल्ली होगी।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया, लेकिन उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “भैया… मुझे बिल्ली के कदम इतने भारी नहीं लगते।”

     

    राघव ने टॉर्च उठाई।

     

    “चलो देखते हैं।”

     

    दोनों सीढ़ियों से ऊपर जाने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे छत के करीब पहुँच रहे थे, आवाज बंद हो गई।

     

    राघव ने दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

     

    एक पल के लिए उसने सोचा कि वापस चला जाए।

     

    फिर उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    छत खाली थी।

     

    ठंडी हवा चल रही थी।

     

    पानी की टंकी के पास कुछ सूखे पत्ते पड़े थे।

     

    स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद था।

     

    राघव ने टॉर्च चारों तरफ घुमाई।

     

    “देखा? कोई नहीं है।”

     

    नंदिनी ने राहत की सांस ली।

     

    तभी…

     

    टंकी के पीछे से एक छोटी-सी आवाज आई।

     

    छन्न…

     

    जैसे किसी ने कांच की चीज़ गिरा दी हो।

     

    दोनों वहीं रुक गए।

     

    राघव धीरे-धीरे टंकी की तरफ बढ़ा।

     

    पीछे जाकर देखा तो वहाँ कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ फर्श पर एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

     

    नंदिनी ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    राघव ने तुरंत उसका हाथ रोक दिया।

     

    “मत छूना।”

     

    “क्यों?”

     

    राघव खुद नहीं जानता था।

     

    उसने पायल को टॉर्च की रोशनी में देखा।

     

    उस पर काले रंग की मिट्टी लगी हुई थी।

     

    और सबसे अजीब बात…

     

    पायल बिल्कुल गीली थी।

     

    जबकि छत पूरी तरह सूखी थी।

     

    “चलो नीचे,” राघव ने कहा।

     

    दोनों वापस कमरे में आ गए।

     

    लेकिन उस रात किसी को नींद नहीं आई।

     

    सुबह राघव ने पायल माँ को दिखाई।

     

    पायल देखते ही माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उन्होंने उसे हाथ में लेने से इनकार कर दिया।

     

    “इसे घर से बाहर फेंक दो।”

     

    राघव ने पूछा, “आप इसे पहचानती हैं?”

     

    माँ कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “नहीं।”

     

    “माँ, आप झूठ बोल रही हैं।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आँखों में डर था।

     

    “कुछ चीज़ों के बारे में जितना कम जानो, उतना अच्छा है।”

     

    उस रात राघव ने पायल घर से बाहर फेंक दी।

     

    लेकिन अगले दिन सुबह वही पायल फिर छत पर पड़ी मिली।

     

    इस बार वह पानी की टंकी के ठीक सामने थी।

     

    राघव ने उसे उठाया और गुस्से में नाली के बाहर फेंक दिया।

     

    नंदिनी ने कहा, “भैया, इसे किसी नदी में फेंक दो।”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रात आई।

     

    11:45 बजे तक सब सो चुके थे।

     

    राघव भी बिस्तर पर लेट गया।

     

    अचानक…

     

    ठक…

     

    उसकी आँख खुल गई।

     

    ठक… ठक…

     

    वही आवाज।

     

    लेकिन इस बार आवाज छत से नहीं आ रही थी।

     

    वह उसके कमरे की छत से आ रही थी।

     

    राघव बिस्तर पर बैठ गया।

     

    कुछ सेकंड बाद उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके कमरे की छत पर चल रहा हो।

     

    धीरे…

     

    बहुत धीरे…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने मोबाइल उठाया और समय देखा।

     

    12:13 AM.

     

    तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

     

    मैसेज में सिर्फ चार शब्द थे—

     

    “ऊपर मत आना। वो जाग गई है।”

     

    राघव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने तुरंत नंबर पर कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    तभी नंदिनी चीखती हुई उसके कमरे में आई।

     

    “भैया!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “छत पर कोई है!”

     

    राघव ने पूछा, “तुमने देखा?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कौन था?”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    “एक औरत…”

     

    “कैसी औरत?”

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

     

    “उसका चेहरा नहीं था।”

     

    उसी क्षण ऊपर से किसी चीज़ के घिसटने की आवाज आई।

     

    घ्र्र्र्र…

     

    फिर…

     

    छत का दरवाज़ा अपने आप बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    राघव और नंदिनी एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    और तभी…

     

    ऊपर से किसी औरत की बहुत धीमी आवाज आई—

     

    “राघव…”

     

    राघव का खून जम गया।

     

    क्योंकि वह आवाज…

     

    उसके पिता की मृत्यु के बाद से उसकी माँ की नहीं, बल्कि उसकी मरी हुई बहन की आवाज़ जैसी थी।

     

    उसकी बहन की मृत्यु दस साल पहले हो चुकी थी।

     

    और उस रात पहली बार राघव को समझ आया—

     

    छत पर कोई था।

     

    और शायद…

     

    वह कई सालों से वहीं था।

  • 😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 3: आखिरी फैसला और सीख)

     

    रघु का पूरा घर डर से काँप रहा था।

     

    दीवार से निकलती काली शाखाएँ धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। बच्चों की चीखें सुनकर सीता उन्हें लेकर दूसरे कमरे में चली गई।

     

    रघु को हरिया की बात याद आई—

     

    “वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

     

    उसे समझ आ गया कि अगर इस श्राप को खत्म करना है, तो उसे वापस उसी जंगल में जाना होगा।

     

    लेकिन इस बार अकेले नहीं।

     

    सुबह होते ही रघु हरिया के पास गया।

     

    हरिया ने उसकी बात सुनी और बोला,

    “इस श्राप को खत्म करने का एक ही रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “जिस कुल्हाड़ी से तुमने पेड़ पर पहला वार किया था, उसी से आखिरी वार करना होगा।”

     

    रघु ने पूछा,

    “लेकिन मैं उस पेड़ को काटूँगा तो श्राप खत्म कैसे होगा?”

     

    हरिया बोला,

    “पेड़ को काटना नहीं है। उसके तने में जहाँ से खून निकला था, वहाँ जमीन के अंदर एक पुराना पत्थर दबा है। वही इस श्राप की जड़ है।”

     

    “उसे कैसे निकालेंगे?”

     

    हरिया ने कहा,

    “जिसने लालच में पहला वार किया था, वही अपनी गलती स्वीकार करके उस पत्थर को वापस जमीन में दबाएगा। तभी दरवाजा बंद होगा।”

     

    रघु ने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और हरिया के साथ जंगल की ओर चल पड़ा।

     

    जैसे ही दोनों काले बरगद के पास पहुँचे, हवा तेज हो गई।

     

    पेड़ की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    लेकिन आसपास हवा नहीं चल रही थी।

     

    अचानक पेड़ के तने से आवाज आई—

     

    “रघु…”

     

    रघु रुक गया।

     

    आवाज फिर आई—

     

    “तुम्हारे बच्चों को बचाना है?”

     

    रघु ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    पेड़ बोला—

     

    “तो अपनी कुल्हाड़ी यहाँ छोड़ दो और चले जाओ।”

     

    रघु कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैं तुम्हारे सामने अपनी गलती मानता हूँ। मैंने लालच में आकर तुम्हें काटा। लेकिन अब मैं किसी और को नुकसान नहीं होने दूँगा।”

     

    अचानक पेड़ जोर से हिलने लगा।

     

    उसकी शाखाओं से काले धुएँ जैसी चीज निकलने लगी।

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “जल्दी! तने के नीचे!”

     

    रघु ने जमीन खोदनी शुरू की।

     

    कुछ ही देर में उसकी कुल्हाड़ी किसी कठोर चीज से टकराई।

     

    टन!

     

    मिट्टी हटाने पर एक काला पत्थर दिखाई दिया।

     

    उस पत्थर पर कई पुराने नाम खुदे हुए थे।

     

    हरिया ने उन नामों को देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “ये वही लोग हैं… जो इस जंगल में गायब हुए थे।”

     

    रघु ने पत्थर उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन पत्थर बहुत भारी था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “रघु…”

     

    उसने पीछे देखा।

     

    वहाँ उसकी बेटी गुड़िया खड़ी थी।

     

    रघु घबरा गया।

     

    “तुम यहाँ कैसे आई?”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “बाबा, मेरे साथ घर चलो।”

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “उसके पास मत जाना!”

     

    रघु ने ध्यान से देखा।

     

    वह गुड़िया जैसी दिख रही थी, लेकिन उसके पैरों के नीचे परछाई नहीं थी।

     

    रघु पीछे हट गया।

     

    वह आकृति अचानक डरावनी आवाज में हँसने लगी।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    आँखें काली हो गईं और शरीर धुएँ में बदलने लगा।

     

    पेड़ की शाखाएँ रघु की तरफ झपटने लगीं।

     

    हरिया ने कुल्हाड़ी से एक शाखा काट दी।

     

    उसी क्षण पेड़ से भयानक चीख निकली।

     

    रघु ने पूरी ताकत लगाकर काला पत्थर बाहर खींच लिया।

     

    जैसे ही पत्थर बाहर आया, जमीन के नीचे से तेज हवा निकलने लगी।

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “इसे वापस रख!”

     

    रघु ने पत्थर को उसी गड्ढे में वापस रख दिया।

     

    लेकिन इस बार उसने उसे मिट्टी से पूरी तरह ढक दिया।

     

    अचानक सब शांत हो गया।

     

    पेड़ की शाखाएँ रुक गईं।

     

    हवा बंद हो गई।

     

    और फिर काले बरगद की छाल पर बनी लाल धारियाँ धीरे-धीरे गायब होने लगीं।

     

    रघु ने देखा कि पेड़ की एक शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।

     

    उस शाखा के नीचे वही पुरानी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

     

    रघु ने उसे उठाया और पेड़ से कहा—

     

    “मुझे माफ करना।”

     

    कुछ पल तक कोई आवाज नहीं आई।

     

    फिर पेड़ के अंदर से बहुत धीमी आवाज आई—

     

    “लालच से लिया था… समझदारी से लौटाया।”

     

    इसके बाद पेड़ बिल्कुल शांत हो गया।

     

    रघु और हरिया गाँव वापस लौट आए।

     

    घर पहुँचकर रघु ने देखा कि दीवार की सारी काली दरारें गायब हो चुकी थीं।

     

    उसके बच्चे सुरक्षित थे।

     

    गाँव वालों ने जब पूरी घटना सुनी तो उन्होंने जंगल के उस हिस्से के चारों ओर पत्थरों की सीमा बना दी।

     

    काले बरगद को किसी ने फिर कभी नहीं छुआ।

     

    कई साल बीत गए।

     

    रघु ने भी लकड़ी काटने का काम छोड़ दिया और गाँव में छोटी-सी दुकान खोल ली।

     

    उसने अपने बच्चों को हमेशा एक बात सिखाई—

     

    “जरूरत इंसान को मेहनत करने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन लालच उसे गलत रास्ते पर ले जाता है।”

     

    कभी-कभी गाँव के लोग कहते थे कि अमावस्या की रात काले बरगद के पास से गुजरते समय अब भी किसी के कुल्हाड़ी रखने की आवाज सुनाई देती है।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    लेकिन कोई वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता।

     

    और बरवा गाँव में आज भी बुजुर्ग बच्चों को एक बात बताते हैं—

     

    सीख

     

    प्रकृति हमारे जीवन का हिस्सा है। अपनी जरूरत पूरी करने और लालच में फर्क समझना जरूरी है। हमें पेड़-पौधों और जंगलों का सम्मान करना चाहिए। किसी चेतावनी को सिर्फ अंधविश्वास समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब उसके पीछे पुराने अनुभव और किसी की सुरक्षा जुड़ी हो।

     

    क्योंकि कभी-कभी इंसान जिस चीज़ को अपना अधिकार समझकर छीन लेता है, वही चीज़ उसके लिए मुसीबत बन जाती है।

     

    और अगर आप कभी किसी पुराने जंगल में जाएँ…

     

    जहाँ सब लोग आपको किसी एक पेड़ से दूर रहने को कहें…

     

    तो याद रखना—

     

    हर पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होता। कुछ पेड़ अपने अंदर पूरी कहानी छिपाए बैठे होते हैं। 🌳👻

     

     

    End

  • 😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 2: जंगल की वापसी)

     

    सुबह जब रघु की आँख खुली तो उसकी हालत देखकर सीता घबरा गई।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था और आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे।

     

    सीता ने पूछा,

    “क्या हुआ तुम्हें?”

     

    रघु ने रात की पूरी घटना बता दी।

     

    सीता कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने कहा,

    “आज जंगल मत जाना।”

     

    रघु ने हामी भर दी।

     

    लेकिन उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    रघु ने दरवाजा खोला तो सामने गाँव का बूढ़ा हरिया खड़ा था।

     

    हरिया ने रघु को देखते ही पूछा,

    “तू कल जंगल गया था?”

     

    रघु चौंक गया।

     

    “हाँ… लेकिन आपको कैसे पता?”

     

    हरिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

    “तू काले बरगद के पास गया था।”

     

    रघु के शरीर में ठंड दौड़ गई।

     

    हरिया ने अंदर आकर दरवाजा बंद किया।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा,

    “मैंने तुझे मना नहीं किया था, क्योंकि मुझे लगा था तू गाँव की बात मानेगा। लेकिन अब देर हो चुकी है।”

     

    रघु ने पूछा,

    “उस पेड़ में क्या है?”

     

    हरिया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा,

    “वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

     

    रघु ने घबराकर पूछा,

    “किसका दरवाजा?”

     

    हरिया बोला,

    “जिस चीज़ का नाम लेना भी गाँव में मना है।”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    उस दिन के बाद अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

     

    गाँव की गायें रात में अचानक जंगल की ओर देखकर रंभाने लगीं। कुएँ का पानी लाल रंग का दिखाई देने लगा। कई घरों के बाहर सुबह गीली मिट्टी में पैरों के निशान मिलते।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    हर रात ठीक बारह बजे, पूरे गाँव में कुल्हाड़ी चलने की आवाज आती।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    लेकिन कोई लकड़ी नहीं काट रहा था।

     

    तीसरी रात रघु की बेटी गुड़िया अचानक नींद में उठकर दरवाजे की ओर चलने लगी।

     

    सीता ने उसे पकड़ लिया।

     

    गुड़िया की आँखें बंद थीं।

     

    वह नींद में बोल रही थी—

     

    “माँ… जंगल में दादी बुला रही हैं।”

     

    सीता का दिल बैठ गया।

     

    उनकी बेटी की दादी को मरे हुए छह साल हो चुके थे।

     

    सीता ने उसे जोर से हिलाया।

     

    गुड़िया की आँखें खुलीं।

     

    वह रोते हुए बोली,

    “माँ, बाहर कोई मुझे बुला रहा था।”

     

    रघु ने उसी समय तय कर लिया कि उसे हरिया से सच जानना होगा।

     

    अगली सुबह वह हरिया के घर पहुँचा।

     

    बहुत पूछने पर हरिया ने पुरानी लकड़ी की एक संदूकची निकाली।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में करीब पचास साल पहले का वही काला बरगद दिखाई दे रहा था।

     

    पेड़ के सामने तीन लकड़हारे खड़े थे।

     

    हरिया ने तस्वीर में बीच वाले आदमी की तरफ इशारा किया।

     

    “यह मेरा बड़ा भाई था।”

     

    रघु चुप रहा।

     

    हरिया बोला,

    “उस समय गाँव में अकाल पड़ा था। मेरे भाई और दो दूसरे लकड़हारे उस पेड़ को काटने गए थे। उन्होंने पहला वार किया तो पेड़ से खून निकला। दूसरा वार किया तो मेरे भाई ने अपनी ही आवाज में किसी को चीखते सुना।”

     

    “फिर?”

     

    “उस रात तीनों घर लौट आए। लेकिन अगले दिन मेरे भाई की परछाई गायब थी।”

     

    रघु की आँखें फैल गईं।

     

    “परछाई?”

     

    हरिया ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। धूप में भी उसकी परछाई जमीन पर नहीं पड़ती थी।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    हरिया की आवाज काँपने लगी।

     

    “सात दिन बाद वह जंगल में चला गया। जाते-जाते उसने कहा था—‘पेड़ भूखा है।’”

     

    रघु ने पूछा,

    “उसे रोक क्यों नहीं लिया?”

     

    हरिया बोला,

    “क्योंकि उस समय तक गाँव के चार लोग गायब हो चुके थे।”

     

    अचानक बाहर से किसी बच्चे के चीखने की आवाज आई।

     

    दोनों दौड़कर बाहर निकले।

     

    रघु का बेटा मोहन सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    उसके सामने जंगल की दिशा में एक काली परछाई थी।

     

    हरिया ने चिल्लाकर कहा,

    “मोहन को पीछे खींच!”

     

    रघु दौड़ा।

     

    जैसे ही उसने मोहन का हाथ पकड़ा, वह काली परछाई गायब हो गई।

     

    मोहन रोते हुए बोला,

    “बाबा, वह आदमी मुझे जंगल ले जाने आया था।”

     

    “कैसा आदमी?”

     

    मोहन ने जवाब दिया—

     

    “उसके चेहरे पर चेहरा नहीं था।”

     

    रघु के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उस रात रघु ने घर के सभी दरवाजे बंद कर दिए।

     

    लेकिन ठीक बारह बजे खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सीता बच्चों को लेकर अंदर चली गई।

     

    रघु ने खिड़की नहीं खोली।

     

    तभी बाहर से उसकी अपनी आवाज आई—

     

    “रघु… दरवाजा खोल।”

     

    रघु जम गया।

     

    वह आवाज बिल्कुल उसकी थी।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मैं जंगल से वापस आ गया हूँ।”

     

    रघु ने काँपते हुए सीता का हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    कुछ देर शांति रही।

     

    फिर बाहर से किसी के हँसने की आवाज आई।

     

    धीरे-धीरे वह हँसी तेज होती गई।

     

    और अचानक दरवाजे पर कुल्हाड़ी का वार हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    लकड़ी में गहरा निशान पड़ गया।

     

    दूसरा वार।

     

    धड़ाम!

     

    तीसरा वार।

     

    धड़ाम!

     

    बच्चे चीखने लगे।

     

    रघु ने खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की।

     

    दरवाजे के सामने कोई खड़ा था।

     

    उसका शरीर इंसान जैसा था।

     

    हाथ में कुल्हाड़ी थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे की जगह सिर्फ काली खाली जगह थी।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    उसकी जमीन पर कोई परछाई नहीं थी।

     

    अचानक वह आकृति खिड़की की तरफ मुड़ी।

     

    रघु पीछे हट गया।

     

    उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “पेड़ की एक शाखा काटी थी… अब पूरा घर देना होगा।”

     

    रघु ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर एक काली दरार बन चुकी थी।

     

    वह दरार धीरे-धीरे फैल रही थी।

     

    और उसके अंदर से जंगल के पेड़ों जैसी शाखाएँ बाहर निकल रही थीं।

     

    रघु समझ गया—

     

    अब खतरा सिर्फ जंगल में नहीं था।

     

    जंगल उसके घर तक आ चुका था।