रात के करीब ग्यारह बजे आरव की कार सुनसान सड़क पर अचानक बंद हो गई।
उसने कई बार चाबी घुमाई, लेकिन इंजन ने कोई आवाज़ नहीं की। चारों तरफ घना जंगल था। आसमान पर बादल इतने काले थे कि चाँद तक दिखाई नहीं दे रहा था। मोबाइल में नेटवर्क पहले ही गायब हो चुका था।
आरव ने परेशान होकर कार से बाहर देखा।
सड़क के दूसरी तरफ एक पुराना पत्थर लगा था, जिस पर धुंधली रोशनी में कुछ लिखा दिखाई दे रहा था—
“भैरवगढ़ — 2 किलोमीटर।”
आरव ने घड़ी देखी। रात के 11:07 बज रहे थे।
उसे याद आया कि उसके दोस्त कबीर ने इस जगह के बारे में बताया था। भैरवगढ़ में एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग काली हवेली कहते थे। कहा जाता था कि लगभग तीस साल पहले उस हवेली में रहने वाला पूरा परिवार एक ही रात में गायब हो गया था।
लोगों का मानना था कि परिवार का कोई सदस्य आज भी हवेली में रहता है।
आरव ने इन बातों को हमेशा मज़ाक समझा था।
लेकिन उस रात उसके पास हवेली के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
उसने बैग उठाया और पैदल चल पड़ा।
लगभग बीस मिनट बाद जंगल खत्म हुआ।
सामने एक विशाल हवेली खड़ी थी।
उसकी दीवारों पर काई जमी हुई थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था।
सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के अंदर से हल्की पीली रोशनी आ रही थी।
आरव रुक गया।
“यहाँ कोई रहता है?”
उसने आवाज़ लगाई—
“कोई है?”
कोई जवाब नहीं आया।
वह धीरे-धीरे अंदर चला गया।
दरवाज़ा उसके पीछे अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने पीछे मुड़कर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला।
“बहुत बढ़िया…”
उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
हॉल में पुरानी तस्वीरें लगी थीं। हर तस्वीर पर धूल की मोटी परत थी। उसने एक तस्वीर साफ की।
उसमें एक आदमी, एक औरत और एक छोटी लड़की खड़ी थी।
तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—
“रुद्र प्रताप सिंह — पत्नी देविका — बेटी मीरा।”
आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
छोटी लड़की मीरा की आँखें अजीब थीं।
ऐसा लग रहा था जैसे वह कैमरे में नहीं, सीधे आरव को देख रही हो।
तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
ठक!
आरव ने फ्लैशलाइट ऊपर की।
पहली मंज़िल पर एक लंबा गलियारा था।
और गलियारे के आख़िरी सिरे पर एक दरवाज़ा।
उस दरवाज़े के नीचे से वही पीली रोशनी बाहर आ रही थी।
आरव ने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं।
पहली सीढ़ी…
दूसरी…
तीसरी…
जैसे-जैसे वह ऊपर जा रहा था, उसे किसी बच्ची के गुनगुनाने की आवाज़ सुनाई देने लगी।
“सो जा… सो जा…”
आरव रुक गया।
आवाज़ बंद हो गई।
वह कुछ सेकंड तक खड़ा रहा।
फिर आगे बढ़ा।
गलियारे की दीवार पर एक घड़ी लगी थी।
उसकी सुइयाँ 12 बजकर 13 मिनट पर रुकी हुई थीं।
आरव ने अपनी घड़ी देखी।
11:42।
उसने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी घड़ी की सुइयाँ हिलने लगीं।
टक… टक… टक…
और अचानक वह 12:13 पर पहुँच गई।
उसी क्षण हवेली की सारी लाइटें बुझ गईं।
अंधेरा।
पूरा अंधेरा।
आरव ने मोबाइल की रोशनी जलाई।
सामने वही आख़िरी कमरा था।
दरवाज़ा अब खुला हुआ था।
अंदर से एक बच्ची की आवाज़ आई—
“आरव…”
उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने किसी को अपना नाम नहीं बताया था।
आवाज़ फिर आई—
“आरव… तुम बहुत देर से आए।”
आरव पीछे हटने लगा।
“क… कौन हो तुम?”
कमरे के अंदर से धीमी हँसी सुनाई दी।
फिर एक छोटी-सी लड़की दरवाज़े के पीछे से बाहर आई।
उसने सफेद फ्रॉक पहनी थी।
उसके लंबे काले बाल चेहरे पर लटक रहे थे।
आरव ने काँपते हुए पूछा—
“मीरा?”
लड़की ने अपना चेहरा उठाया।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
वह मुस्कुराई।
“तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”
आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।
अंधेरे में लड़की उसके करीब आई।
“क्योंकि तुम मेरे पापा को ढूँढने आए हो…”
आरव ने घबराकर कहा—
“मैं किसी को ढूँढने नहीं आया।”
मीरा की मुस्कान गायब हो गई।
“झूठ।”
अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।
आरव ने पूरी ताकत से उसे खींचा।
लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।
मीरा उसके बिल्कुल सामने खड़ी थी।
“अगर बाहर जाना है…”
वह फुसफुसाई,
“…तो आख़िरी कमरा खोलना होगा।”
आरव ने पूछा—
“आख़िरी कमरा?”
मीरा ने गलियारे की तरफ इशारा किया।
“यह कमरा आख़िरी नहीं है।”
आरव ने धीरे-धीरे पीछे देखा।
गलियारे में अब पहले से कहीं ज्यादा दरवाज़े थे।
दस…
बीस…
शायद पचास।
जबकि कुछ मिनट पहले वहाँ केवल तीन दरवाज़े थे।
मीरा ने कहा—
“हर दरवाज़े के पीछे हमारे परिवार की एक रात बंद है।”
आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले हवेली की दीवारों से चीखें आने लगीं।
एक आदमी चिल्ला रहा था।
एक औरत रो रही थी।
और एक बच्ची बार-बार कह रही थी—
“दरवाज़ा मत खोलना…”
आरव ने कान बंद कर लिए।
लेकिन आवाज़ उसके सिर के अंदर गूँज रही थी।
फिर मीरा ने उसके हाथ में एक पुरानी चाबी रख दी।
“कल रात तक तुम्हें सच पता करना होगा।”
आरव ने चाबी को देखा।
उस पर खून जैसे लाल रंग से एक नंबर लिखा था—
13
“और अगर मैंने नहीं किया?”
मीरा ने धीरे से सिर झुकाया।
उसके चेहरे पर फिर वही डरावनी मुस्कान आ गई।
“तो कल रात…”
वह फुसफुसाई—
“…तुम भी इस हवेली की तस्वीर में होंगे।”
अचानक आरव की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
जब उसकी आँख खुली, सुबह हो चुकी थी।
वह हवेली के बाहर सड़क पर पड़ा था।
उसकी कार बिल्कुल ठीक थी।
आरव ने घबराकर हवेली की ओर देखा।
वहाँ कोई हवेली नहीं थी।
सिर्फ जंगल था।
लेकिन उसके हाथ में अभी भी वह पुरानी चाबी थी।
और चाबी पर लिखा नंबर—
13
उसने मोबाइल निकाला।
गैलरी अपने आप खुली।
उसमें एक नई तस्वीर थी।
तस्वीर में वही काली हवेली दिखाई दे रही थी।
और पहली मंज़िल की खिड़की में एक छोटी लड़की खड़ी थी।
मीरा।
लेकिन उसके पीछे एक दूसरा चेहरा भी था।
एक आदमी का।
जिसकी आँखें बिल्कुल काली थीं।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
प्रातिक्रिया दे