🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

एक राज़

पढ़ने का समय : 6 मिनट

एक राज, जिसका पता चल जाता तो उसका खात्मा हो जाता

 

रुद्रपुर नाम का एक छोटा-सा शहर था। बाहर से देखने पर वह बिल्कुल शांत लगता था, लेकिन उस शहर के बीचों-बीच बनी एक पुरानी हवेली अपने अंदर ऐसा राज छिपाए बैठी थी, जिसके बारे में अगर किसी को पता चल जाता, तो कई लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती थी।

 

उस हवेली में रहने वाली थी काव्या।

 

काव्या उम्र में जवान थी, शांत स्वभाव की और हमेशा अपने काम में लगी रहने वाली लड़की। शहर के लोग उसे एक साधारण लड़की समझते थे, लेकिन कोई नहीं जानता था कि पिछले सात सालों से वह एक ऐसा सच अपने सीने में दबाए घूम रही थी, जिसे जानने के लिए कई लोग कुछ भी करने को तैयार थे।

 

उस राज की शुरुआत सात साल पहले हुई थी।

 

तब काव्या सिर्फ सत्रह साल की थी।

 

एक रात उसके पिता ने उसे अपने कमरे में बुलाया था। उनके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

 

“काव्या, आज के बाद तुम मुझसे एक सवाल भी मत करना।”

 

“लेकिन पापा हुआ क्या है?”

 

उन्होंने कमरे का दरवाजा बंद किया और धीरे से बोले, “मेरे साथ कुछ भी हो जाए, इस हवेली के पीछे वाले कमरे में मत जाना। और सबसे जरूरी बात… किसी पर भरोसा मत करना।”

 

काव्या कुछ समझ पाती, उससे पहले ही बाहर तेज आवाज हुई।

 

उसके पिता घबरा गए।

 

उन्होंने एक छोटी-सी लोहे की चाबी काव्या के हाथ में रखी और कहा, “इसे संभालकर रखना। जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम्हारे आसपास के लोग तुम्हें नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, उस दिन इस चाबी का इस्तेमाल करना।”

 

“इससे क्या खुलेगा?”

 

पिता ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “एक ऐसा सच… जिसके सामने आने से बहुत लोगों का खात्मा हो सकता है।”

 

उस रात उसके पिता गायब हो गए।

 

अगले दिन शहर में खबर फैली कि उनकी गाड़ी पहाड़ी रास्ते में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी।

 

लेकिन काव्या को कभी इस बात पर विश्वास नहीं हुआ।

 

सात साल तक उसने उस चाबी को अपने पास छिपाकर रखा।

 

फिर एक दिन हवेली में एक अजनबी आदमी आया।

 

उसका नाम था विराज।

 

वह खुद को काव्या के पिता का पुराना दोस्त बता रहा था।

 

“तुम्हारे पिता ने मुझे तुम्हारी जिम्मेदारी दी थी,” विराज ने कहा।

 

काव्या ने उसे गौर से देखा।

 

“अगर आप उनके दोस्त थे, तो इतने साल कहां थे?”

 

विराज कुछ पल चुप रहा।

 

“क्योंकि मैं जानता था कि तुम्हारे पिता की मौत हादसा नहीं थी।”

 

काव्या के हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा।

 

“आप क्या कह रहे हैं?”

 

विराज ने धीमे स्वर में कहा, “तुम्हारे पिता ने जिस राज को छिपाया था, वह आज भी जिंदा है।”

 

काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“कौन-सा राज?”

 

विराज ने चारों तरफ देखा।

 

“यह बात यहां नहीं हो सकती।”

 

उसी रात काव्या को पहली बार महसूस हुआ कि हवेली के बाहर कोई उसे देख रहा है।

 

खिड़की के पास जाकर उसने देखा तो दूर सड़क पर एक काली गाड़ी खड़ी थी।

 

गाड़ी में कोई बैठा था।

 

काव्या ने पर्दा बंद कर दिया।

 

सुबह वह गाड़ी वहां नहीं थी।

 

विराज ने काव्या को समझाया कि उसे कुछ दिनों के लिए हवेली छोड़ देनी चाहिए।

 

लेकिन काव्या ने मना कर दिया।

 

“मैं भागती रही तो यह राज कभी सामने नहीं आएगा।”

 

विराज ने उसकी ओर देखा।

 

“तुम्हें पता भी है कि तुम्हारे पिता ने क्या खोजा था?”

 

काव्या ने सिर हिलाया।

 

विराज ने कहा, “तुम्हारे पिता ने सात साल पहले शहर के सबसे बड़े कारोबारियों और कुछ बड़े अधिकारियों के बीच चल रहे एक गुप्त सौदे का पता लगाया था। शहर के गरीब लोगों की जमीन बहुत कम कीमत में हथियाकर करोड़ों में बेची जा रही थी।”

 

“लेकिन इसका मेरे पिता से क्या लेना-देना था?”

 

“क्योंकि तुम्हारे पिता के पास उस पूरे खेल के सबूत थे।”

 

काव्या की सांसें थम गईं।

 

“और वह सबूत?”

 

विराज ने हवेली की तरफ देखा।

 

“यहीं कहीं छिपा है।”

 

काव्या को अचानक अपने पिता की दी हुई चाबी याद आई।

 

उसी रात उसने हवेली के पीछे वाले कमरे का दरवाजा खोला।

 

कमरा वर्षों से बंद था।

 

धूल से भरी अलमारी, पुरानी किताबें और एक टूटी मेज।

 

काव्या ने हर जगह तलाश की, लेकिन कुछ नहीं मिला।

 

तभी उसकी नजर फर्श पर पड़ी।

 

एक पत्थर बाकी पत्थरों से थोड़ा अलग था।

 

उसने उसे हटाया।

 

नीचे एक लोहे का छोटा डिब्बा था।

 

काव्या के हाथ कांपने लगे।

 

उसने चाबी निकाली।

 

चाबी ताले में बिल्कुल फिट बैठ गई।

 

डिब्बा खुलते ही अंदर कुछ कागज, एक पुरानी डायरी और एक तस्वीर मिली।

 

तस्वीर देखकर काव्या सन्न रह गई।

 

उसमें उसके पिता के साथ शहर के कई बड़े लोग खड़े थे।

 

लेकिन तस्वीर के पीछे लिखी एक लाइन ने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी—

 

“इनमें से किसी एक ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

 

तभी पीछे से आवाज आई।

 

“तुम्हें वह डिब्बा नहीं खोलना चाहिए था।”

 

काव्या तेजी से पलटी।

 

दरवाजे पर विराज खड़ा था।

 

“आप?”

 

विराज धीरे-धीरे कमरे में आया।

 

काव्या पीछे हट गई।

 

“आपको कैसे पता था कि मैं यहां हूं?”

 

विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

काव्या ने डायरी अपने पीछे छिपा ली।

 

“आप मेरे पिता के दोस्त नहीं हैं, है ना?”

 

विराज की आंखों में अजीब-सी उदासी थी।

 

“नहीं।”

 

“फिर कौन हैं आप?”

 

विराज ने कहा, “वही आदमी जिसे तुम्हारे पिता ने आखिरी बार भरोसे के लायक समझा था।”

 

“तो आपने इतने साल मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

 

विराज चुप रहा।

 

तभी बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

 

दोनों चौंक गए।

 

विराज ने खिड़की से बाहर देखा।

 

काली गाड़ी फिर हवेली के सामने खड़ी थी।

 

उसने तुरंत कहा, “अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

 

काव्या ने पूछा, “कौन लोग हैं?”

 

विराज ने डायरी की ओर इशारा किया।

 

“तुम्हारे पिता ने इस डायरी में असली नाम लिखा था। अगर वह डायरी गलत हाथों में चली गई, तो तुम्हारा खात्मा तय है।”

 

काव्या ने डायरी कसकर पकड़ ली।

 

“लेकिन मैं इसे छिपाऊंगी नहीं।”

 

विराज ने उसकी ओर देखा।

 

“क्यों?”

 

काव्या की आंखों में पहली बार डर की जगह हिम्मत थी।

 

“क्योंकि मेरे पिता इसी सच की वजह से मारे गए। मैं उनकी कुर्बानी बेकार नहीं जाने दूंगी।”

 

अचानक हवेली के बाहर किसी ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया।

 

धड़ाम!

 

धड़ाम!

 

विराज ने काव्या का हाथ पकड़ा।

 

“पीछे का रास्ता अभी भी खुला है। हमें निकलना होगा।”

 

दोनों पिछली खिड़की से बाहर निकल गए।

 

लेकिन काव्या की नजर डायरी के आखिरी पन्ने पर पड़ी।

 

वहां सिर्फ एक नाम लिखा था।

 

विराज।

 

काव्या के कदम रुक गए।

 

विराज ने पीछे मुड़कर देखा।

 

उनकी आंखें मिल गईं।

 

काव्या ने कांपती आवाज में पूछा—

 

“मेरे पिता ने आपका नाम क्यों लिखा था?”

 

विराज कुछ नहीं बोला।

 

बस इतना कहा—

 

“क्योंकि जिस राज को तुम बचाने निकली हो… उसकी शुरुआत मुझसे ही हुई थी।”

 

काव्या के चेहरे पर हैरानी जम गई।

 

और तभी पीछे से हवेली का दरवाजा खुला।

 

किसी ने धीमे से कहा—

 

“विराज, अब बहुत देर हो चुकी है।”

 

काव्या ने पलटकर देखा।

 

दरवाजे पर खड़ा आदमी वही था, जिसकी तस्वीर उसके पिता की डायरी में सबसे ऊपर लगी थी।

 

और उस आदमी को देखकर विराज ने पहली बार डरकर कहा—

 

“काव्या… अब तुम्हें मुझ पर भरोसा करना ही पड़ेगा।”

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *