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काली हवेली का आख़िरी कमरा — भाग 2: तेरहवीं चाबी

पढ़ने का समय : 7 मिनट

आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

 

उसके हाथ में वही पुरानी चाबी थी, जिस पर 13 लिखा हुआ था।

 

सुबह होते ही उसने अपने दोस्त कबीर को फोन किया।

 

“कबीर, मुझे तुमसे मिलना है। अभी।”

 

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

 

फिर कबीर ने धीमी आवाज़ में पूछा—

 

“तुम भैरवगढ़ गए थे?”

 

आरव चौंक गया।

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

कबीर ने जवाब नहीं दिया।

 

बस इतना कहा—

 

“तुम जहाँ हो, वहीं रहो। मैं आ रहा हूँ।”

 

करीब एक घंटे बाद कबीर आरव के कमरे में पहुँचा।

 

आरव ने बिना कुछ कहे उसके सामने चाबी रख दी।

 

चाबी देखते ही कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“ये तुम्हें कहाँ मिली?”

 

“काली हवेली में।”

 

कबीर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

 

“तुम वहाँ गए थे?”

 

आरव ने पूरी घटना बता दी।

 

मीरा…

 

आख़िरी कमरा…

 

तेरह नंबर की चाबी…

 

और वह तस्वीर।

 

कबीर चुपचाप सुनता रहा।

 

फिर उसने अपने बैग से एक पुरानी डायरी निकाली।

 

“मेरे दादा ने ये डायरी मुझे मरने से पहले दी थी।”

 

उसने डायरी खोली।

 

पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“भैरवगढ़ की हवेली में जो दिखाई देता है, वह सच नहीं होता। और जो दिखाई नहीं देता, वही सबसे खतरनाक है।”

 

आरव ने अगला पन्ना पलटा।

 

वहाँ रुद्र प्रताप सिंह का नाम था।

 

कबीर बोला—

 

“मेरे दादा इस हवेली में चौकीदार थे। उन्होंने बताया था कि रुद्र प्रताप की बेटी मीरा को बचपन से एक अजीब बीमारी थी। वह अक्सर कहती थी कि उसे घर की दीवारों के अंदर से कोई बुलाता है।”

 

“कौन?”

 

“उसे नहीं पता था।”

 

कबीर ने डायरी का एक और पन्ना खोला।

 

उसमें हवेली का नक्शा बना था।

 

लेकिन नक्शे में एक ऐसी मंज़िल दिखाई दे रही थी जो हवेली में मौजूद ही नहीं थी।

 

तहखाना — कमरा 13।

 

आरव ने चाबी उठाई।

 

“तो मुझे वहाँ जाना होगा।”

 

कबीर ने तुरंत कहा—

 

“नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मेरे दादा ने लिखा है कि कमरा 13 का दरवाज़ा खोलने वाला कभी वापस नहीं आया।”

 

कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

 

फिर आरव ने कहा—

 

“लेकिन मीरा ने मुझे बुलाया है।”

 

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“और अगर मीरा तुम्हें बचाना नहीं, फँसाना चाहती हो तो?”

 

आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

 

शाम होते ही दोनों भैरवगढ़ के लिए निकल पड़े।

 

रास्ते भर बारिश होती रही।

 

जब वे उस जगह पहुँचे, जहाँ पिछली रात आरव को हवेली दिखाई दी थी, वहाँ अब भी सिर्फ घना जंगल था।

 

कबीर ने डायरी निकालकर नक्शा देखा।

 

“हवेली यहीं होनी चाहिए।”

 

दोनों कुछ देर तक तलाश करते रहे।

 

अचानक आरव की नजर एक पुराने कुएँ पर पड़ी।

 

कुएँ के किनारे वही निशान बना था जो डायरी के नक्शे पर था।

 

कबीर ने पत्थर हटाया।

 

नीचे सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

 

दोनों नीचे उतरने लगे।

 

लगभग पचास सीढ़ियों के बाद एक पत्थर की सुरंग सामने आई।

 

सुरंग के अंत में लोहे का दरवाज़ा था।

 

उस पर लिखा था—

 

13

 

आरव ने चाबी ताले में लगाई।

 

ताला अपने आप खुल गया।

 

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

 

अंदर एक बड़ा कमरा था।

 

कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

 

हर तस्वीर में कोई न कोई इंसान था।

 

कुछ लोग रो रहे थे।

 

कुछ चिल्ला रहे थे।

 

कुछ सीधे कैमरे की तरफ देख रहे थे।

 

कबीर ने एक तस्वीर उठाई।

 

उसका चेहरा अचानक बदल गया।

 

“आरव…”

 

“क्या हुआ?”

 

कबीर ने तस्वीर आरव को दिखाई।

 

उसमें एक छोटे बच्चे की तस्वीर थी।

 

नीचे नाम लिखा था—

 

“देवेंद्र — उम्र 8 वर्ष।”

 

कबीर काँपने लगा।

 

“ये मेरे दादा हैं।”

 

आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

 

तस्वीर में छोटा देवेंद्र उसी कमरे में खड़ा था।

 

उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

 

लेकिन यह तस्वीर लगभग चालीस साल पुरानी थी।

 

“ये कैसे हो सकता है?”

 

कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

तभी कमरे के अंदर से आवाज़ आई—

 

“क्योंकि वह कभी यहाँ से गया ही नहीं।”

 

दोनों ने पीछे देखा।

 

मीरा खड़ी थी।

 

लेकिन इस बार वह बच्ची नहीं लग रही थी।

 

उसका चेहरा बूढ़ा दिखाई दे रहा था।

 

बाल सफेद थे।

 

आँखें काली।

 

आरव पीछे हट गया।

 

“तुम मीरा नहीं हो।”

 

वह मुस्कुराई।

 

“मैं मीरा हूँ।”

 

“तो तुम्हारी उम्र…?”

 

“इस हवेली में उम्र नहीं बढ़ती।”

 

मीरा ने दीवार की तरफ इशारा किया।

 

“यहाँ हर इंसान की एक रात बंद है।”

 

अचानक एक तस्वीर जमीन पर गिर गई।

 

उसमें रुद्र प्रताप सिंह थे।

 

उनके हाथ में वही तेरह नंबर की चाबी थी।

 

आरव ने तस्वीर उठाई।

 

पीछे कुछ लिखा था—

 

“रुद्र ने दरवाज़ा खोला था, लेकिन बाहर कुछ और निकला।”

 

कबीर ने पूछा—

 

“क्या निकला?”

 

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हारे दादा जानते थे।”

 

अचानक कमरे की दीवार पर एक दरवाज़ा दिखाई दिया।

 

दरवाज़ा काला था।

 

उसके ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—

 

“जिसे अंदर बुलाया गया है, वही बाहर जा सकता है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“मुझे क्यों बुलाया गया?”

 

मीरा चुप रही।

 

फिर उसने धीरे से कहा—

 

“क्योंकि तुम रुद्र के परिवार से जुड़े हो।”

 

आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“क्या?”

 

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम्हारे परिवार का नाम क्या है।”

 

आरव ने घबराकर कहा—

 

“मेरा नाम आरव मल्होत्रा है। मेरा रुद्र प्रताप से कोई संबंध नहीं।”

 

मीरा हँसने लगी।

 

“नाम बदलने से खून नहीं बदलता।”

 

कमरे की सारी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

 

फिर एक तस्वीर दीवार से गिरकर आरव के पैरों के पास आ गिरी।

 

उसमें एक नवजात बच्चा था।

 

गोद में उसे पकड़े एक आदमी खड़ा था।

 

वह आदमी रुद्र प्रताप था।

 

और बच्चे के नीचे लिखा था—

 

“आरव।”

 

आरव के हाथ काँपने लगे।

 

“ये झूठ है।”

 

मीरा ने कहा—

 

“तुम्हारे पिता ने तुम्हें सच से दूर रखा।”

 

कबीर ने तस्वीर पलटी।

 

पीछे लिखा था—

 

“जब आरव 21 साल का होगा, दरवाज़ा फिर खुलेगा।”

 

आरव ने अपनी उम्र याद की।

 

वह अगले दिन 21 साल का होने वाला था।

 

उसी समय हवेली के अंदर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

 

फिर किसी आदमी की भारी आवाज़ गूँजी—

 

“समय पूरा हो गया।”

 

मीरा पीछे हट गई।

 

उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

 

आरव ने पूछा—

 

“कौन है?”

 

मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

 

“वही… जिसने हम सबको कैद किया है।”

 

अचानक काला दरवाज़ा खुल गया।

 

अंदर घना अंधेरा था।

 

उस अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

 

कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।

 

“भागो!”

 

दोनों पीछे मुड़े।

 

लेकिन रास्ता गायब हो चुका था।

 

कमरे की दीवारें धीरे-धीरे उनके करीब आने लगीं।

 

मीरा चीखी—

 

“आरव! अंदर जाओ!”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि अगर तुम अंदर नहीं गए, तो वह बाहर आ जाएगा!”

 

आरव ने काले दरवाज़े की तरफ देखा।

 

अंधेरे से एक हाथ बाहर निकला।

 

वह हाथ इंसान जैसा था…

 

लेकिन उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

 

आरव ने हिम्मत जुटाई और दरवाज़े के अंदर कदम रख दिया।

 

कबीर उसके पीछे गया।

 

दरवाज़ा उनके पीछे बंद हो गया।

 

अंदर एक लंबा कमरा था।

 

कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी रखी थी।

 

कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

 

उसका चेहरा आरव जैसा था।

 

लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

वह धीरे से मुस्कुराया।

 

“आख़िरकार तुम आ ही गए।”

 

आरव ने काँपते हुए पूछा—

 

“तुम कौन हो?”

 

आदमी ने सिर उठाया।

 

“मैं वही हूँ…”

 

उसने कहा,

 

“…जिसे तुम्हारे परिवार ने तीस साल पहले इस हवेली में बंद किया था।”

 

आरव कुछ बोल नहीं पाया।

 

आदमी आगे झुका।

 

“लेकिन अब मुझे आज़ाद होने के लिए सिर्फ तुम्हारे खून की जरूरत है।”

 

अचानक पीछे से कबीर की चीख सुनाई दी।

 

आरव ने पलटकर देखा।

 

कबीर गायब था।

 

दरवाज़ा भी गायब था।

 

और सामने बैठा वह आदमी धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठ रहा था।

 

“अब हम दोनों अकेले हैं, आरव।”

 

तभी दूर कहीं घड़ी ने बारह बजने की आवाज़ की।

 

टन… टन… टन…

 

तेरहवीं घंटी बजते ही आदमी का चेहरा बदल गया।

 

अब वह आदमी नहीं था।

 

वह एक भयानक काली परछाईं बन चुका था।

 

और उसके पीछे दीवार पर खून से एक वाक्य लिखा जा रहा था—

 

 

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