सुबह की पहली किरण हवेली की टूटी हुई खिड़की से अंदर आई, लेकिन आरती की आँखों से रात का डर अभी तक नहीं गया था।
वह पूरी रात सो नहीं पाई थी।
उसके सामने बार-बार वही चेहरा आ रहा था—
जला हुआ चेहरा…
लाल साड़ी…
आँखों में आँसू…
और वह आवाज—
“मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”
आरती ने सोचा था कि सुबह होते ही वह अपने पति विवेक को सब कुछ बता देगी।
लेकिन जब वह कमरे से बाहर निकली, तो हवेली बिल्कुल सामान्य लग रही थी।
रसोई में उसकी सास कमला चाय बना रही थी।
विवेक अखबार पढ़ रहा था।
आरती ने काँपती आवाज में पूछा—
“विवेक… क्या इस घर में पहले कभी नंदिनी नाम की कोई लड़की रहती थी?”
अखबार पढ़ते-पढ़ते विवेक के हाथ रुक गए।
उसने धीरे से आरती की तरफ देखा।
“तुमने ये नाम कहाँ सुना?”
आरती समझ गई कि कुछ तो छिपाया जा रहा है।
“बस ऐसे ही…”
कमला अचानक जोर से बोली—
“इस घर में किसी नंदिनी का नाम मत लेना!”
आरती चौंक गई।
कमला की आँखों में डर था।
सिर्फ डर नहीं…
ऐसा डर, जैसे किसी पुराने जख्म को अचानक किसी ने छू लिया हो।
विवेक ने माँ को शांत करते हुए कहा—
“माँ, रहने दो।”
फिर आरती से बोला—
“तुमने शायद सपना देखा होगा।”
आरती ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उसके मन में एक सवाल पैदा हो चुका था—
अगर नंदिनी केवल सपना थी, तो माँ इतनी डर क्यों गई?
उस दिन दोपहर में आरती पूरे घर में घूम रही थी।
हवेली बहुत बड़ी थी।
पुरानी दीवारों पर जगह-जगह सीलन थी।
कई कमरों पर ताले लगे थे।
एक लंबा गलियारा हवेली की पिछली तरफ जाता था।
वहीं उसे लोहे का एक पुराना दरवाजा दिखाई दिया।
दरवाजे पर मोटा ताला लगा था।
आरती ने हाथ बढ़ाकर ताले को छूना चाहा।
तभी पीछे से आवाज आई—
“उस दरवाजे के पास मत जाना।”
आरती पलटी।
विवेक खड़ा था।
“क्यों?”
“बस मत जाना।”
“उस कमरे में क्या है?”
विवेक ने नजरें चुरा लीं।
“पुराना सामान।”
आरती ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“पुराने सामान से इतना डर क्यों लगता है?”
विवेक चुप रहा।
उस रात आरती ने फैसला किया कि वह सच्चाई जानकर रहेगी।
आधी रात को जब पूरा घर सो गया, वह धीरे से उठी।
उसने गलियारे में कदम रखा।
हवा अचानक ठंडी हो गई।
उसकी साँस से भाप निकलने लगी।
फिर उसे वही आवाज सुनाई दी—
छन…
छन…
छन…
पायल की आवाज उसी बंद कमरे के पीछे से आ रही थी।
आरती धीरे-धीरे दरवाजे तक पहुँची।
अचानक ताला अपने आप गिर गया।
धड़ाम!
आरती पीछे हट गई।
कुछ पल तक उसने दरवाजे को देखा।
फिर साहस करके उसे खोल दिया।
अंदर घना अंधेरा था।
उसने मोबाइल की रोशनी जलाई।
कमरे में पुराने संदूक, टूटी हुई कुर्सियाँ और धूल से ढके सामान पड़े थे।
दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।
आरती ने रोशनी तस्वीर पर डाली।
वह नंदिनी की तस्वीर थी।
लाल जोड़े में मुस्कुराती हुई नंदिनी।
आरती की आँखें नम हो गईं।
तस्वीर के नीचे कुछ लिखा था—
“नंदिनी — इस घर की बहू।”
लेकिन उसके ठीक नीचे किसी ने काले रंग से दूसरा वाक्य लिख दिया था—
“इस घर की सबसे बड़ी गलती।”
आरती का दिल काँप उठा।
तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।
धड़ाम!
आरती ने तुरंत दरवाजा खींचा।
वह नहीं खुला।
“कोई है?”
कोई जवाब नहीं।
फिर कमरे में किसी के रोने की आवाज आई।
“बाबा… मुझे घर ले चलो…”
आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।
वह आवाज नंदिनी की थी।
“बाबा… मैं घर जाना चाहती हूँ…”
आरती रोने लगी।
“नंदिनी… तुम यहाँ हो?”
अचानक संदूक अपने आप खुल गया।
उसके अंदर लाल कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी पड़ी थी।
आरती ने डायरी उठाई।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर कोई बेटी यह डायरी पढ़ रही है, तो समझ लेना कि मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”
आरती ने काँपते हाथों से पन्ने पलटे।
नंदिनी ने अपनी जिंदगी का हर दर्द उसमें लिखा था।
दहेज की माँग…
मारपीट…
भूखे रहना…
पिता से पैसे माँगने का दबाव…
और फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“आज उन्होंने कहा है कि अगर पिताजी ने दो लाख रुपये नहीं दिए, तो मेरी जिंदगी खत्म कर देंगे।”
आरती की आँखों से आँसू गिरने लगे।
अगला पन्ना आधा जला हुआ था।
उस पर केवल कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे—
“मुझे रसोई में बुलाया गया है… अगर मैं वापस न आऊँ तो…”
इसके बाद कुछ नहीं था।
आरती ने डायरी बंद कर दी।
तभी कमरे में किसी महिला की धीमी हँसी गूँजी।
“सच जानना चाहती हो?”
आरती ने पलटकर देखा।
नंदिनी उसके सामने खड़ी थी।
इस बार उसका चेहरा पहले से ज्यादा भयानक था।
लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा नहीं…
दर्द था।
आरती ने कहा—
“तुम्हें किसने मारा?”
नंदिनी ने अपना हाथ उठाया।
उसकी उँगली हवेली के बाहर बने पुराने कुएँ की तरफ थी।
फिर उसने कहा—
“जिसे तुम अपना पति समझती हो… उसके परिवार ने मेरी जिंदगी छीनी थी।”
आरती के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“विवेक?”
नंदिनी ने सिर हिलाया।
“विवेक उस समय पैदा भी नहीं हुआ था।”
आरती ने राहत की साँस ली।
लेकिन नंदिनी ने अगला वाक्य कहा—
“लेकिन उसके पिता जानते हैं कि मेरे साथ क्या हुआ था।”
आरती के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
तभी दरवाजा खुल गया।
आरती भागकर अपने कमरे में पहुँची।
विवेक जाग रहा था।
उसने पूछा—
“तुम कहाँ गई थीं?”
आरती ने डायरी उसके सामने रख दी।
विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।
“तुम्हें ये कहाँ मिली?”
“उस कमरे में।”
विवेक ने डायरी उठाई।
कुछ देर तक उसे देखता रहा।
फिर बोला—
“आरती, हमें यह घर छोड़ देना चाहिए।”
“क्यों?”
विवेक ने जवाब नहीं दिया।
तभी नीचे से उसकी माँ की चीख सुनाई दी।
“विवेक!”
दोनों दौड़कर नीचे गए।
कमला सीढ़ियों के पास खड़ी काँप रही थी।
उसके सामने जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।
वही तस्वीर जिसमें नंदिनी थी।
लेकिन अब तस्वीर में नंदिनी अकेली नहीं थी।
उसके पीछे एक आदमी खड़ा दिखाई दे रहा था।
विवेक ने तस्वीर उठाई।
उसका चेहरा बदल गया।
“ये कौन है?” आरती ने पूछा।
विवेक ने काँपती आवाज में कहा—
“मेरे पिता।”
आरती ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
तस्वीर में नंदिनी के पीछे खड़ा आदमी मुस्कुरा रहा था।
लेकिन उसके हाथ में कुछ था।
एक लाल रंग का कपड़ा।
वही लाल कपड़ा जो नंदिनी ने अपनी डायरी में आखिरी दिन पहना था।
कमला अचानक फूट-फूटकर रोने लगी।
“मैंने उसे नहीं मारा था…”
आरती ने कहा—
“तो किसने मारा?”
कमला ने सिर उठाया।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
“तुम्हारे ससुर ने।”
हवेली में सन्नाटा छा गया।
“लेकिन फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”
कमला ने काँपते हुए कहा—
“क्योंकि मैं डर गई थी।”
“किससे?”
कमला ने हवेली की ऊपरी मंजिल की ओर देखा।
“उससे… जो नंदिनी की मौत के बाद इस घर में आया था।”
आरती ने पूछा—
“कौन?”
कमला ने फुसफुसाकर कहा—
“नंदिनी की आत्मा नहीं…”
वह कुछ पल रुकी।
“उसका बदला।”
उसी समय ऊपर से जोरदार आवाज आई।
धड़ाम!
तीनों ने ऊपर देखा।
पुराना बंद कमरा फिर से खुल चुका था।
और अंदर से किसी बच्ची के रोने की आवाज आ रही थी।
“माँ… मुझे बचा लो…”
कमला के चेहरे का रंग उड़ गया।
“नहीं… ये फिर शुरू हो गया।”
विवेक ने पूछा—
“माँ, बच्ची कौन है?”
कमला ने कोई जवाब नहीं दिया।
आरती ने उसकी ओर देखा।
“माँजी… सच बताइए।”
कमला की आँखों से आँसू बह निकले।
“नंदिनी मरने से पहले गर्भवती थी।”
आरती के मुँह से चीख निकल गई।
“क्या?”
कमला ने कहा—
“उस रात सिर्फ नंदिनी नहीं मरी थी… उसका अजन्मा बच्चा भी मर गया था।”
अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।
तेज हवा अंदर आने लगी।
ऊपर से पायल की आवाज आई।
छन…
छन…
छन…
फिर एक और आवाज गूँजी—
“जिसने मेरी जिंदगी छीनी… उसकी नस्ल में कोई बेटी चैन से नहीं रहेगी।”
विवेक ने आरती का हाथ पकड़ लिया।
“हमें यहाँ से निकलना होगा।”
दोनों दरवाजे की तरफ दौड़े।
लेकिन दरवाजा बंद था।
तभी आरती ने देखा—
दीवार पर धीरे-धीरे लाल अक्षरों में कुछ लिखा जा रहा था।
“भागने से पहले सच पूरा जानो।”
और उसके नीचे एक नाम उभर आया—
“राघव।”
वही राघव…
नंदिनी का पति।
विवेक का पिता।
जिसे पंद्रह साल पहले हवेली से गायब बताया गया था।
आरती ने विवेक की तरफ देखा।
“तुम्हारे पिता मरे नहीं थे?”
विवेक की आँखों में आँसू आ गए।
“नहीं…”
“तो कहाँ हैं?”
विवेक ने काँपते हुए कहा—
“यही तो मैं आज तक नहीं जानता था।”
उसी क्षण हवेली के बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।
ठक…
ठक…
ठक…
तीनों जम गए।
फिर बाहर से एक बूढ़ी आवाज आई—
“दरवाजा खोलो… मैं राघव हूँ।”
कमला ने चीखते हुए अपने कान बंद कर लिए।
आरती ने विवेक की तरफ देखा।
विवेक धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ा।
लेकिन जैसे ही उसने कुंडी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया…
उसके पीछे नंदिनी खड़ी थी।
उसने धीरे से कहा—
“दरवाजा मत खोलना।”
विवेक रुक गया।
नंदिनी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
उसने कहा—
“क्योंकि बाहर खड़ा आदमी तुम्हारा पिता नहीं है।”
अचानक बाहर से वही आवाज फिर आई—
“विवेक… दरवाजा खोलो बेटा…”
और इस बार आवाज के पीछे किसी और की धीमी हँसी सुनाई दी।
एक ऐसी हँसी…
जिसमें इंसानियत का नामोनिशान नहीं था।
क्रमशः… भाग 3 में।
इस भाग की सीख
दहेज केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। यह चुप रहने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बन जाती है।
नंदिनी की सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं थी कि उससे पैसे माँगे गए। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि लोग जानते थे कि उसके साथ गलत हो रहा है, फिर भी डर के कारण चुप रहे।
इसलिए जब भी किसी बेटी पर दहेज का दबाव बनाया जाए, उसे अकेला मत छोड़िए।
गलत के सामने चुप रहना भी कभी-कभी गलत का साथ देना बन जाता है।
और याद रखिए—
बेटी की कीमत दहेज से नहीं, उसके सपनों से होती है।
जिस घर को बेटी की जरूरत है, उसे दहेज की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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