रात के करीब बारह बज रहे थे।गाँव के आखिरी छोर पर बनी उस पुरानी हवेली में आज फिर वही आवाज गूँज रही थी—
“मुझे मेरा दहेज वापस चाहिए…”
हवेली की दीवारें जैसे उस आवाज को पकड़कर बार-बार दोहरा रही थीं।
“मेरा दहेज… मेरा जीवन… मेरा इंसाफ…”
लेकिन इस आवाज की कहानी आज से नहीं, लगभग पंद्रह साल पहले शुरू हुई थी।
उस समय उस गाँव में रहने वाले रामदीन की बेटी नंदिनी की शादी तय हुई थी।
नंदिनी बहुत साधारण लड़की थी। चेहरे पर हमेशा मुस्कान, आँखों में बड़े-बड़े सपने और दिल में अपने माता-पिता के लिए अथाह प्रेम।
रामदीन गरीब किसान था। उसके पास ज्यादा जमीन नहीं थी, लेकिन उसने अपनी बेटी को कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।
शादी की तारीख नजदीक आती गई।
एक शाम लड़के वालों का फोन आया।
“देखिए रामदीन जी,” लड़के के पिता ने कहा, “हमने तो कुछ माँगा नहीं है, लेकिन आजकल समाज में इज्जत भी कोई चीज होती है।”
रामदीन चुप रहा।
“बस एक मोटरसाइकिल, थोड़ा सोना और पचास हजार रुपये… इससे ज्यादा कुछ नहीं।”
रामदीन के हाथ से फोन लगभग छूट गया।
उसने धीमी आवाज में कहा, “भाई साहब… मैं गरीब आदमी हूँ। इतना सब कहाँ से लाऊँगा?”
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
फिर जवाब आया—
“तो फिर शादी भी कहाँ से होगी?”
फोन कट गया।
उस रात रामदीन अपनी चारपाई पर बैठकर देर तक रोता रहा।
नंदिनी ने पिता को देख लिया।
“बाबा… क्या हुआ?”
रामदीन ने आँसू पोंछते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटी।”
“आप मुझसे झूठ बोल रहे हैं।”
रामदीन ने सिर झुका लिया।
“तेरी शादी में दहेज माँग रहे हैं।”
नंदिनी कुछ पल बिल्कुल शांत रही।
फिर उसने पिता का हाथ पकड़कर कहा—
“बाबा, अगर मेरी खुशी की कीमत आपकी जिंदगी है, तो मुझे ऐसी शादी नहीं करनी।”
रामदीन ने बेटी की ओर देखा।
“लेकिन समाज क्या कहेगा?”
नंदिनी मुस्कुराई।
“समाज मेरे साथ दुख बाँटने नहीं आएगा बाबा। फिर समाज के डर से मैं अपना जीवन क्यों बर्बाद करूँ?”
रामदीन की आँखों से आँसू निकल पड़े।
लेकिन तभी नंदिनी की माँ बोली—
“बेटी, बात इतनी आसान नहीं है। अगर रिश्ता टूट गया तो लोग तुझे ही दोष देंगे।”
नंदिनी चुप हो गई।
कुछ दिनों बाद रामदीन ने अपनी छोटी-सी जमीन का एक हिस्सा बेच दिया।
मोटरसाइकिल खरीदी गई।
गहने बनवाए गए।
पचास हजार रुपये का इंतजाम करने के लिए उसने साहूकार से भारी ब्याज पर कर्ज लिया।
शादी हो गई।
ढोल बजे।
बारात आई।
नंदिनी लाल जोड़े में विदा हुई।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि जिस घर में वह दुल्हन बनकर जा रही थी, वही घर उसकी जिंदगी की सबसे डरावनी कैद बनने वाला था।
ससुराल में पहले कुछ दिन सब ठीक रहा।
फिर एक रात नंदिनी के पति राघव ने कहा—
“पापा कह रहे थे कि तुम्हारे पिता ने कार का वादा किया था।”
नंदिनी चौंक गई।
“कार? बाबा ने तो अपनी जमीन बेचकर मोटरसाइकिल दी है।”
राघव ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।
“मतलब तुम लोग हमें बेवकूफ बनाकर लाए हो?”
उस रात पहली बार नंदिनी के चेहरे से मुस्कान गायब हुई।
दिन बीतते गए।
माँग बढ़ती गई।
कभी कार।
कभी दो लाख रुपये।
कभी नया फर्नीचर।
कभी सोने की चेन।
नंदिनी हर बार कहती—
“मेरे पिता अब कुछ नहीं दे सकते।”
और हर बार उसे यही जवाब मिलता—
“तो फिर तू भी यहाँ ज्यादा दिन नहीं रह पाएगी।”
एक दिन नंदिनी ने अपने पिता को फोन किया।
“बाबा… मुझे घर ले चलो।”
रामदीन की आवाज काँप गई।
“क्या हुआ बेटी?”
“कुछ नहीं बाबा… बस आपकी बहुत याद आ रही है।”
वह अपने पिता को सच्चाई नहीं बता पाई।
क्योंकि वह जानती थी कि उसके पिता के पास अब देने के लिए कुछ नहीं था।
कुछ सप्ताह बाद एक रात हवेली में जोरदार चीख सुनाई दी।
“बचाओ!”
फिर अचानक सब शांत हो गया।
सुबह खबर फैली—
नंदिनी रसोई में लगी आग में जल गई।
उसकी मौत को हादसा बताया गया।
रामदीन जब पहुँचा तो बेटी का चेहरा तक पहचान में नहीं आ रहा था।
वह फूट-फूटकर रोया।
“मेरी बेटी को जला दिया तुम लोगों ने!”
लेकिन सबूत नहीं था।
मामला धीरे-धीरे दब गया।
हवेली फिर शांत हो गई।
लेकिन नंदिनी शांत नहीं हुई।
शादी के ठीक पंद्रहवें दिन से हवेली में अजीब घटनाएँ होने लगीं।
रात को किसी के पायल पहनकर चलने की आवाज आती।
रसोई में बंद बर्तन अपने आप गिरने लगते।
और हर अमावस्या की रात हवेली की ऊपरी मंजिल से एक औरत की आवाज आती—
“मेरा दहेज वापस करो…”
राघव की माँ ने इसे वहम बताया।
लेकिन एक रात राघव ने खुद वह आवाज सुनी।
वह ऊपर गया।
कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था।
उसने दरवाजा तोड़ा।
कमरे में कोई नहीं था।
लेकिन दीवार पर राख से लिखा था—
“बेटी की कीमत लगाने वालों का घर कभी आबाद नहीं होता।”
राघव डरकर पीछे हट गया।
तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—
“तुमने मेरी कीमत लगाई थी ना?”
राघव पलटा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था।
उसी रात हवेली की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।
और बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।
राघव की माँ चीखती हुई नीचे भागी।
तभी ऊपर से पायल की आवाज आई—
छन…
छन…
छन…
धीरे-धीरे वह आवाज सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।
एक कदम…
फिर दूसरा…
फिर तीसरा…
राघव और उसकी माँ दरवाजे के पास खड़े काँप रहे थे।
आवाज बिल्कुल उनके सामने आकर रुक गई।
फिर एक धीमी आवाज आई—
“जिस घर में दहेज माँगा जाता है… वहाँ दुल्हन नहीं आती… उसकी मजबूरी आती है।”
और उसी क्षण हवेली की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
सुबह जब गाँव वाले हवेली पहुँचे, तो राघव की माँ बेहोश मिली।
राघव गायब था।
उस दिन के बाद वह कभी वापस नहीं आया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
पंद्रह साल बाद एक नई दुल्हन उस हवेली में आई।
उसका नाम था आरती।
उसे हवेली के पुराने इतिहास के बारे में कुछ नहीं पता था।
वह अपने पति के साथ कमरे में पहुँची।
रात को उसने अपने सामान में से लाल साड़ी निकाली।
तभी उसे कमरे के कोने से पायल की आवाज सुनाई दी।
छन…
छन…
आरती ने पलटकर देखा।
एक औरत खिड़की के पास खड़ी थी।
लाल साड़ी…
जला हुआ चेहरा…
और आँखों से बहते आँसू।
आरती चीखने ही वाली थी कि वह औरत बोली—
“डर मत बेटी… मैं तुझे डराने नहीं आई।”
आरती काँपते हुए बोली—
“आप… कौन हैं?”
औरत ने धीरे से कहा—
“मैं नंदिनी हूँ।”
आरती के हाथ से साड़ी गिर गई।
नंदिनी ने उसकी ओर देखकर कहा—
“मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”
आरती रोने लगी।
“लेकिन मैं क्या करूँ?”
नंदिनी की आवाज कठोर हो गई—
“आवाज उठाओ।”
फिर वह धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।
जाते-जाते उसने कहा—
“जिस दिन बेटियाँ डरना बंद कर देंगी… उस दिन दहेज की बेड़ियाँ टूट जाएँगी।”
आरती ने उस रात फैसला कर लिया।
वह चुप नहीं रहेगी।
लेकिन उसे नहीं पता था कि सुबह होते ही उसके सामने ऐसा सच आने वाला है, जो नंदिनी की मौत से भी ज्यादा भयानक था…
क्रमशः… भाग 2 में।
इस भाग की सीख
दहेज केवल पैसों की माँग नहीं है। यह किसी बेटी के आत्मसम्मान, सपनों और जीवन की कीमत लगाने की सोच है।
बेटी बोझ नहीं है। दहेज परंपरा नहीं, सामाजिक बुराई है।
अगर किसी रिश्ते की शुरुआत ही लालच से हो रही है, तो वहाँ प्रेम और सम्मान की उम्मीद करना अपने जीवन के साथ अन्याय है।
डरकर चुप रहना समस्या को बढ़ाता है, जबकि आवाज उठाना बदलाव की पहली सीढ़ी है।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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