कुएँ के सामने खड़ा विवेक काँप रहा था।
उसके सामने सफेद चेहरे वाली औरत खड़ी थी।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
उसके बाल हवा में नहीं, बल्कि पानी के अंदर की तरह धीरे-धीरे तैर रहे थे।
विवेक ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
औरत ने जवाब दिया—
“मेरा कोई नाम नहीं।”
“फिर लोग तुम्हें क्या कहते हैं?”
वह मुस्कुराई।
“परछाई।”
कुएँ के अंदर से अचानक कई आवाज़ें आने लगीं।
किसी बच्चे की रोने की आवाज़।
किसी बूढ़े के कराहने की आवाज़।
किसी औरत की चीख।
विवेक पीछे हट गया।
औरत ने कहा—
“तीस साल पहले तुम्हारे दादा और गाँव के कुछ लोगों ने मुझे बुलाया था।”
“क्यों?”
“उन्हें लगा कि अगर वे अपनी परछाइयों को अलग कर लें, तो वे मौत से बच सकते हैं।”
“फिर?”
“उन्होंने गलती की।”
औरत की मुस्कान गायब हो गई।
“परछाई शरीर से अलग होने के बाद आज़ाद हो सकती है। लेकिन उसे जीवित रहने के लिए किसी इंसान की आत्मा चाहिए।”
विवेक को समझ आ गया।
“इसलिए तुम लोगों की परछाइयाँ चुराती हो।”
“हाँ।”
तभी पीछे से शंकर चाचा की आवाज़ आई—
“विवेक!”
वह मुड़ा।
शंकर चाचा हाथ में एक पुराना दीपक लिए खड़े थे।
उनके साथ विवेक की दादा की परछाई भी थी।
वह परछाई धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
सफेद चेहरे वाली औरत ने उसे देखते ही गुस्से में कहा—
“तुम अब भी जीवित हो?”
परछाई ने जवाब दिया—
“शरीर नहीं… लेकिन वादा अभी बाकी है।”
विवेक ने पूछा—
“कौन सा वादा?”
शंकर चाचा ने कहा—
“तुम्हारे दादा ने मरने से पहले अपनी परछाई को आदेश दिया था कि जब तक इस शक्ति को खत्म न कर दे, वह आज़ाद नहीं होगी।”
अचानक काली हवा चलने लगी।
पेड़ों की शाखाएँ टूटने लगीं।
कुएँ के अंदर से काली परछाइयाँ बाहर निकलने लगीं।
एक।
दो।
दस।
फिर दर्जनों।
हर परछाई किसी इंसान का रूप ले रही थी।
विवेक ने डरकर पूछा—
“ये कौन हैं?”
शंकर चाचा ने कहा—
“जिनकी परछाइयाँ उसने चुराई थीं।”
काली परछाइयाँ धीरे-धीरे गाँव की तरफ बढ़ने लगीं।
विवेक ने पूछा—
“इन्हें कैसे रोकेंगे?”
शंकर चाचा ने दीपक उसकी तरफ बढ़ाया।
“यह दीपक तुम्हारी दादी ने बनाया था।”
“इससे क्या होगा?”
“जिस इंसान की परछाई उसके शरीर से अलग हो चुकी है, उसके सामने यह दीपक जलाओ। अगर वह परछाई सच में उसकी है, तो वापस शरीर में चली जाएगी।”
विवेक ने दीपक लिया।
सबसे पहली परछाई उसके सामने आई।
उसने दीपक जलाया।
परछाई काँपने लगी।
फिर वह जमीन पर गिरकर धीरे-धीरे गायब हो गई।
अगले ही पल गाँव के एक घर से किसी आदमी के जागने की आवाज़ आई।
शंकर चाचा ने कहा—
“एक वापस आ गई।”
विवेक ने दीपक लेकर दूसरी परछाई की तरफ बढ़ा।
एक-एक करके परछाइयाँ अपने असली शरीरों में लौटने लगीं।
लेकिन सफेद चेहरे वाली औरत अब भी कुएँ के पास खड़ी थी।
उसने हाथ उठाया।
अचानक दीपक बुझ गया।
“बस!”
उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरा गाँव काँप गया।
“तुम मेरी बनाई दुनिया को खत्म नहीं कर सकते।”
वह अचानक हवा में उठी।
उसका शरीर फैलने लगा।
उसके बाल पूरे कुएँ को ढकने लगे।
अब वह इंसान नहीं थी।
एक विशाल काली आकृति बन चुकी थी।
विवेक पीछे गिर पड़ा।
उसने देखा कि उसकी अपनी परछाई भी अब वापस जमीन पर आ गई थी।
लेकिन वह विवेक की तरह नहीं दिख रही थी।
उसके पीछे दो सिर थे।
एक उसके दादा का।
दूसरा…
विवेक का।
विवेक समझ गया कि अगर वह डर गया तो वह शक्ति उसके शरीर पर कब्ज़ा कर लेगी।
उसने आँखें बंद कीं।
और पहली बार उसने अपनी परछाई से कहा—
“तुम मेरी दुश्मन नहीं हो।”
परछाई शांत हो गई।
“तुम मेरे अंदर का डर हो।”
अंधेरा काँपने लगा।
“और मैं अपने डर से भागूँगा नहीं।”
विवेक ने दीपक फिर जलाया।
इस बार लौ बुझी नहीं।
बल्कि तेज़ होती गई।
सफेद चेहरे वाली औरत चीखी।
“नहीं!”
विवेक ने दीपक कुएँ के अंदर फेंक दिया।
एक तेज़ सफेद रोशनी पूरे गाँव में फैल गई।
सभी परछाइयाँ एक साथ चीखने लगीं।
फिर एक-एक करके वे कुएँ में खिंचने लगीं।
सफेद चेहरे वाली औरत भी पीछे खिंचने लगी।
उसने आखिरी बार विवेक की ओर देखा।
“तुमने मुझे खत्म नहीं किया।”
विवेक चुप रहा।
वह हँसी।
“क्योंकि परछाई को खत्म नहीं किया जा सकता।”
और फिर वह कुएँ में गायब हो गई।
सब कुछ शांत हो गया।
सुबह हुई।
गाँव वालों ने देखा कि पुराने कुएँ के चारों तरफ की जमीन काली पड़ चुकी थी।
शंकर चाचा ने कहा—
“अब यह कुआँ हमेशा के लिए बंद करना होगा।”
गाँव वालों ने उसे पत्थरों से भर दिया।
विवेक ने अपनी दादा-दादी की तस्वीर घर से निकालकर मंदिर में रख दी।
वह गाँव छोड़ने ही वाला था कि उसकी नजर दीवार पर पड़ी।
सुबह की तेज़ धूप में उसकी परछाई जमीन पर साफ दिखाई दे रही थी।
विवेक मुस्कुराया।
उसने हाथ उठाया।
परछाई ने भी हाथ उठाया।
सब सामान्य था।
वह जाने लगा।
लेकिन तभी…
उसकी परछाई ने हाथ नीचे नहीं किया।
विवेक रुक गया।
उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।
परछाई अब भी हाथ उठाए खड़ी थी।
विवेक ने अपना हाथ नीचे किया।
परछाई ने नहीं किया।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
फिर परछाई ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया।
वह विवेक की ओर नहीं…
कुएँ की ओर देख रही थी।
कुएँ के नीचे से हल्की लाल रोशनी दिखाई दे रही थी।
और उसी समय विवेक के कान के पास किसी ने फुसफुसाया—
“एक परछाई अभी बाकी है…”
विवेक ने झटके से पीछे देखा।
कोई नहीं था।
उसने फिर जमीन की तरफ देखा।
अब वहाँ उसकी परछाई अकेली नहीं थी।
उसके बिल्कुल पीछे…
एक दूसरी छोटी-सी परछाई खड़ी थी।
विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।
छोटी परछाई ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।
और उसके हाथ में…
एक पुरानी लाल चूड़ी थी।
विवेक समझ गया—
जिस शक्ति को उन्होंने कुएँ में बंद किया था…
वह खत्म नहीं हुई थी।
वह सिर्फ…
एक नई परछाई की तलाश में थी।
और इस बार…
उसकी नजर विवेक पर नहीं थी।
उसकी नजर थी—
विवेक के आने वाले बच्चे पर।
समाप्त।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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