उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव देवगढ़ में एक पुरानी हवेली थी। गाँव के लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे। हवेली लगभग सौ साल पुरानी थी और पिछले बीस वर्षों से पूरी तरह खाली पड़ी थी।
कहते थे कि उस हवेली में रात के समय किसी बच्ची के रोने की आवाज़ आती थी।
कभी किसी को ऊपर की मंजिल पर किसी के चलने की आहट सुनाई देती, तो कभी बंद खिड़कियों के पीछे से एक छोटी बच्ची का चेहरा दिखाई देता।
लेकिन सबसे डरावनी बात थी—वह गुड़िया।
गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि हवेली के अंदर एक पुरानी गुड़िया रखी थी। वह साधारण गुड़िया नहीं थी। उसकी आँखें काँच की थीं, लेकिन रात में वे आँखें खुद-ब-खुद घूमती थीं।
लोगों का मानना था कि जिस दिन वह गुड़िया हवेली से बाहर निकली, उस दिन देवगढ़ में एक भयानक अनहोनी हुई थी।
कई सालों तक कोई हवेली के पास तक नहीं गया।
लेकिन फिर एक दिन शहर से आरव अपने माता-पिता के साथ देवगढ़ आया।
आरव की उम्र पच्चीस साल थी। वह पुराने मकानों और ऐतिहासिक जगहों की तस्वीरें खींचने का शौकीन था। उसके पिता ने गाँव के पास एक पुराना पुश्तैनी मकान खरीदा था, इसलिए परिवार कुछ समय के लिए देवगढ़ आया था।
गाँव में आते ही आरव ने काली हवेली के बारे में सुना।
उसने चाय की दुकान पर बैठे बूढ़े आदमी से पूछा, “बाबा, लोग उस हवेली में जाते क्यों नहीं?”
बूढ़े ने उसकी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि जो वहाँ गया है, वह पहले जैसा वापस नहीं आया।”
आरव हँस पड़ा।
“बाबा, ये सब गाँव की कहानियाँ हैं।”
बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “कहानियाँ नहीं हैं बेटा। चेतावनी हैं।”
आरव ने बात मज़ाक में टाल दी।
उस रात लगभग ग्यारह बजे आरव अपने कमरे में बैठा तस्वीरें देख रहा था। तभी उसे खिड़की के बाहर से किसी बच्ची के हँसने की आवाज़ सुनाई दी।
“ही… ही… ही…”
आरव ने तुरंत खिड़की खोली।
बाहर अंधेरा था।
दूर काली हवेली दिखाई दे रही थी।
उसी समय उसे हवेली की दूसरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।
आरव की आँखें सिकुड़ गईं।
“वहाँ कोई है?”
रोशनी कुछ सेकंड बाद गायब हो गई।
अगली सुबह आरव ने तय कर लिया कि वह हवेली के अंदर जाएगा।
दोपहर में वह कैमरा लेकर हवेली पहुँच गया।
हवेली का मुख्य दरवाज़ा जंग लगा हुआ था। आरव ने जैसे ही उसे धक्का दिया, दरवाज़ा अपने आप चरमराते हुए खुल गया।
अंदर धूल की मोटी परत थी।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। कई चित्रों के चेहरे खुरचे हुए थे।
आरव तस्वीरें लेने लगा।
तभी उसे ऊपर से कुछ गिरने की आवाज़ आई।
धड़ाम!
आरव रुक गया।
“कोई है?”
कोई जवाब नहीं आया।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
सीढ़ियों पर उसे छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।
धूल पर बने वे निशान किसी बच्चे के थे।
आरव ने कैमरे से उनकी तस्वीर खींची।
जैसे ही वह ऊपर पहुँचा, गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा दिखाई दिया।
दरवाज़े पर मोटी लोहे की जंजीर लगी थी।
लेकिन जंजीर जमीन पर पड़ी थी।
दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।
आरव ने दरवाज़ा धक्का देकर खोला।
कमरा अंधेरा था।
उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
कमरे में पुराने खिलौने पड़े थे।
टूटी हुई गाड़ियाँ।
लकड़ी के घोड़े।
एक पुराना पालना।
और कमरे के बीच में एक छोटी-सी कुर्सी।
उस कुर्सी पर बैठी थी—
एक गुड़िया।
गुड़िया बेहद पुरानी थी।
उसके सुनहरे बाल कंधों तक थे। उसने लाल रंग की पुरानी फ्रॉक पहन रखी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
लेकिन उसकी सबसे डरावनी चीज़ थीं उसकी आँखें।
दो बड़ी काली आँखें।
आरव उसके पास गया।
गुड़िया के गले में एक छोटा-सा लॉकेट था।
लॉकेट पर लिखा था—
“मीरा”
आरव ने कैमरा निकाला और उसकी तस्वीर खींची।
कैमरे की स्क्रीन देखते ही वह चौंक गया।
तस्वीर में गुड़िया कुर्सी पर नहीं थी।
वह कैमरे की तरफ देखकर खड़ी थी।
आरव ने दोबारा असली गुड़िया की तरफ देखा।
गुड़िया अभी भी कुर्सी पर बैठी थी।
उसने कैमरे की स्क्रीन फिर देखी।
अब तस्वीर में गुड़िया गायब थी।
आरव के हाथ काँपने लगे।
तभी पीछे से किसी बच्ची की आवाज़ आई।
“मेरी गुड़िया मुझे दे दो…”
आरव बिजली की तरह पलटा।
कमरे में कोई नहीं था।
उसने गुड़िया उठाई और तेजी से कमरे से बाहर निकल आया।
घर पहुँचकर उसने गुड़िया को अपने कमरे की मेज पर रख दिया।
उसकी माँ ने पूछा, “ये कहाँ से लाए?”
“पुरानी हवेली से मिली है। बहुत सुंदर है।”
माँ का चेहरा अचानक उतर गया।
“इसे वापस रख आओ।”
आरव हँसते हुए बोला, “माँ, आप भी गाँव वालों की बातों पर विश्वास करने लगीं?”
माँ ने गुड़िया को ध्यान से देखा।
“इसके गले में क्या लिखा है?”
“मीरा।”
माँ कुछ पल चुप रही।
फिर बोली, “आरव… इसे रात में कमरे से बाहर मत निकालना।”
उस रात आरव देर तक जागता रहा।
करीब दो बजे उसे लगा कि कमरे में कोई धीरे-धीरे चल रहा है।
टक… टक… टक…
उसने आँखें खोलीं।
गुड़िया मेज पर बैठी थी।
आरव ने राहत की साँस ली और फिर आँखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद उसे किसी के फुसफुसाने की आवाज़ सुनाई दी।
“आरव…”
उसकी आँखें खुल गईं।
गुड़िया अब मेज पर नहीं थी।
वह उसके बिस्तर के पास जमीन पर खड़ी थी।
आरव का शरीर ठंडा पड़ गया।
गुड़िया की गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घूमी।
उसके होंठ हिले।
और फिर एक बच्ची की आवाज़ आई—
“तुम मुझे वापस क्यों नहीं ले गए?”
आरव चीखते हुए बिस्तर से गिर पड़ा।
सुबह जब उसकी माँ कमरे में आई, तो आरव बेहोश पड़ा था।
लेकिन गुड़िया गायब थी।
कमरे की खिड़की बंद थी।
दरवाज़ा अंदर से बंद था।
और दीवार पर लाल रंग से एक वाक्य लिखा था—
“मीरा अभी घर नहीं आई है…”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
प्रातिक्रिया दे