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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • लाल चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    लाल चुड़ैल

     

    (भाग 4 — देवेंद्र का साथी)

     

    गौरी की आवाज़ सुनने के बाद अमन कई मिनट तक अपने कमरे के बीचोंबीच खड़ा रहा।

     

    कमरे में अंधेरा था।

     

    खिड़की खुली थी।

     

    और फर्श पर वही लाल चूड़ी पड़ी थी।

     

    अमन ने काँपते हाथों से लाइट जलाई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने तुरंत रवि को फोन किया।

     

    फोन कई बार बजा, लेकिन किसी ने नहीं उठाया।

     

    कुछ देर बाद अचानक फोन बजा।

     

    स्क्रीन पर रवि का नाम था।

     

    अमन ने फोन उठाया।

     

    “रवि?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर एक धीमी आवाज़ आई—

     

    “अमन… लाल हवेली मत जाना।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    रवि ने कहा—

     

    “वहाँ कोई वापस आ गया है।”

     

    “कौन?”

     

    फोन कट गया।

     

    अमन ने तुरंत रवि को दोबारा फोन किया।

     

    इस बार फोन बंद था।

     

    सुबह होते ही अमन गाँव के लिए निकल पड़ा।

     

    जब वह बरवा पहुँचा तो रवि उसे गाँव के बाहर पुराने मंदिर के पास मिला।

     

    रवि के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कल रात क्या हुआ?”

     

    रवि ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर देखकर अमन के होश उड़ गए।

     

    उसमें देवेंद्र खड़ा था।

     

    उसके साथ एक दूसरा आदमी था।

     

    वही आदमी…

     

    जिसे अमन ने बचपन से गाँव के मंदिर का पुजारी समझा था।

     

    पंडित रघुनाथ।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये तो मंदिर के पंडित जी हैं।”

     

    रवि ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन यह तस्वीर तीस साल पुरानी है।”

     

    दोनों तुरंत पंडित रघुनाथ के पास पहुँचे।

     

    पंडित जी मंदिर में अकेले बैठे मंत्र पढ़ रहे थे।

     

    अमन ने तस्वीर उनके सामने रख दी।

     

    पंडित जी ने तस्वीर देखी तो उनका चेहरा बदल गया।

     

    “यह तुम्हें कहाँ मिली?”

     

    “हवेली में।”

     

    पंडित जी कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए था।”

     

    अमन ने गुस्से में पूछा—

     

    “देवेंद्र के साथ आपका क्या संबंध था?”

     

    पंडित जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रवि ने कहा—

     

    “हमें सब पता है।”

     

    पंडित जी ने धीरे से सिर उठाया।

     

    “नहीं। तुम्हें कुछ भी पता नहीं।”

     

    उन्होंने मंदिर का दरवाज़ा बंद कर दिया।

     

    “देवेंद्र सिर्फ एक लालची आदमी नहीं था। वह तांत्रिक साधना करता था।”

     

    अमन की रीढ़ में ठंड उतर गई।

     

    “किस चीज़ की साधना?”

     

    पंडित जी ने मंदिर के पीछे बने एक छोटे कमरे की ओर इशारा किया।

     

    “मृत आत्माओं को नियंत्रित करने की।”

     

    उन्होंने बताया कि देवेंद्र को विश्वास था कि अगर किसी शक्तिशाली आत्मा को अपने वश में कर लिया जाए तो इंसान अमर हो सकता है।

     

    उसने कई वर्षों तक पुराने श्मशान में साधना की।

     

    लेकिन एक रात उसे ऐसी आत्मा मिली जिसे वह नियंत्रित नहीं कर सका।

     

    वह आत्मा थी—

     

    लाल चुड़ैल।

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “चंद्रा?”

     

    पंडित जी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “तो फिर चंद्रा कौन थी?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “चंद्रा उस आत्मा की शिकार थी।”

     

    अमन के हाथ से तस्वीर गिरते-गिरते बची।

     

    “क्या मतलब?”

     

    पंडित जी ने बताया—

     

    “जिस रात देवेंद्र ने चंद्रा और गौरी को तहखाने में बंद किया, उसी रात उसने अपनी तांत्रिक साधना पूरी करने की कोशिश की। चंद्रा की मौत के बाद उसकी आत्मा तो वहीं रह गई… लेकिन उसी समय तहखाने में एक दूसरी शक्ति जाग गई।”

     

    “वही लाल चुड़ैल?”

     

    “हाँ।”

     

    रवि ने पूछा—

     

    “लेकिन वह चंद्रा के रूप में क्यों दिखाई देती थी?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “क्योंकि वह लोगों को अपने पास बुलाने के लिए परिचित चेहरा पहनती थी।”

     

    अमन को पिछली रात गौरी की बात याद आई—

     

    “देवेंद्र अकेला नहीं था।”

     

    उसने पूछा—

     

    “तो देवेंद्र का साथी कौन था?”

     

    पंडित जी ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “मैं।”

     

    कमरे में जैसे समय रुक गया।

     

    रवि ने गुस्से में पंडित जी को पकड़ लिया।

     

    “तुमने चंद्रा को मरने दिया!”

     

    पंडित जी ने विरोध नहीं किया।

     

    “हाँ।”

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मैंने देवेंद्र की मदद की थी। लेकिन मुझे नहीं पता था कि वह किस शक्ति को बुला रहा है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर आपने हमें यह सब पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    पंडित जी ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने सच बताया तो वह शक्ति फिर जाग जाएगी।”

     

    अचानक मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    पंडित जी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “वह जाग चुकी है।”

     

    मंदिर के बाहर हवा तेज़ हो गई।

     

    दीवारों पर लाल परछाइयाँ दिखाई देने लगीं।

     

    फिर एक आवाज़ आई—

     

    “रघुनाथ…”

     

    पंडित जी काँपने लगे।

     

    “नहीं…”

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “तुमने वादा किया था…”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किससे?”

     

    पंडित जी ने मंदिर के फर्श की ओर देखा।

     

    “उससे।”

     

    अचानक फर्श पर लाल रंग की एक दरार दिखाई दी।

     

    दरार फैलती गई।

     

    और मंदिर के नीचे से एक सीढ़ी दिखाई देने लगी।

     

    पंडित जी पीछे हटे।

     

    “यह रास्ता… लाल हवेली तक जाता है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन हवेली तो गाँव के दूसरी तरफ है।”

     

    “जमीन के नीचे रास्ते हैं।”

     

    तीनों नीचे उतरने लगे।

     

    सुरंग बहुत पुरानी थी।

     

    दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

     

    कुछ जगहों पर लाल मोमबत्तियाँ जल रही थीं।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “ये सब अभी भी जल रही हैं?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “इन्हें कोई जलाता नहीं।”

     

    अचानक पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    तीनों मुड़े।

     

    सुरंग खाली थी।

     

    फिर आवाज़ सामने से आई।

     

    एक लड़की दिखाई दी।

     

    गौरी।

     

    वह धीरे-धीरे उनकी तरफ चल रही थी।

     

    लेकिन इस बार उसकी आँखें फिर काली थीं।

     

    रवि ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “यह गौरी नहीं है।”

     

    गौरी अचानक मुस्कुराई।

     

    “बहुत देर कर दी तुम लोगों ने।”

     

    पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

     

    गौरी की हँसी तेज़ होती गई।

     

    फिर उसके पीछे एक विशाल लाल परछाई दिखाई दी।

     

    अमन ने पहली बार उस असली शक्ति को देखा।

     

    वह इंसान जैसी नहीं थी।

     

    उसके बाल जमीन तक फैले थे।

     

    चेहरा आधा इंसान का था और आधा राख जैसा।

     

    और उसकी आँखें पूरी तरह लाल थीं।

     

    उसने पंडित रघुनाथ की ओर देखा।

     

    “तीस साल पहले तुमने मुझे बुलाया था।”

     

    पंडित जी काँपने लगे।

     

    “मैंने गलती की थी।”

     

    वह शक्ति हँसी।

     

    “गलती की कीमत कोई और नहीं… तुम दोगे।”

     

    अचानक पंडित जी हवा में उठ गए।

     

    अमन और रवि चीख पड़े।

     

    पंडित जी ने आखिरी बार अमन की ओर देखा।

     

    “लाल हवेली के नीचे… तीसरा दरवाज़ा…”

     

    फिर उनकी गर्दन एक तरफ झुक गई।

     

    उनका शरीर जमीन पर गिर पड़ा।

     

    सुरंग में सन्नाटा छा गया।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तीसरा दरवाज़ा क्या है?”

     

    पीछे से चंद्रा की आवाज़ आई—

     

    “वही दरवाज़ा… जिसे कभी खोलना नहीं चाहिए।”

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    चंद्रा खड़ी थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे पर इस बार डर था।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि उसके पीछे मैं नहीं हूँ।”

     

    “तो कौन है?”

     

    चंद्रा ने धीरे से जवाब दिया—

     

    “जिसने मुझे लाल चुड़ैल बनाया…”

     

    और उसी क्षण सुरंग की दीवार पर एक तीसरा लोहे का दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    उस दरवाज़े पर खून से लिखा था—

     

    “जो इसे खोलेगा, उसकी आत्मा कभी वापस नहीं आएगी।”

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • लाल चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    (भाग 3)

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।

     

    अमन और रवि लाल हवेली के सामने खड़े थे।

     

    उनके पास हरिराम काका की पुरानी डायरी थी और वह लाल लॉकेट भी।

     

    लेकिन इस बार वे अकेले नहीं थे।

     

    गाँव के कुछ बुज़ुर्ग भी उनके साथ थे।

     

    क्योंकि अब सबको समझ आ चुका था कि लाल हवेली की कहानी सिर्फ अंधविश्वास नहीं थी।

     

    हरिराम काका गायब हो चुके थे।

     

    और अगर डायरी सच थी, तो तहखाने में कोई ऐसा राज़ छिपा था जिसने तीस साल से पूरे गाँव को डर में रखा था।

     

    हवेली का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    क्रीईईक…

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    अमन ने टॉर्च जलाई।

     

    सीढ़ियों के नीचे एक पत्थर की दीवार दिखाई दी।

     

    डायरी में लिखे संकेत के अनुसार उन्होंने दीवार के एक पत्थर को दबाया।

     

    घर्रर्र…

     

    दीवार धीरे-धीरे पीछे हट गई।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    सीढ़ियों से ठंडी हवा ऊपर आ रही थी।

     

    रवि ने कहा—

     

    “मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “अब नहीं।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    हर सीढ़ी के साथ हवा और ठंडी होती जा रही थी।

     

    नीचे पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा मिला।

     

    दीवारों पर पुराने हाथों के निशान थे।

     

    कुछ छोटे।

     

    कुछ बड़े।

     

    और कई निशान लाल रंग के थे।

     

    गलियारे के अंत में लोहे का दरवाज़ा था।

     

    उस पर पुराने खून के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    अमन ने दरवाज़ा खोला।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे के बीच में लोहे की जंजीर पड़ी थी।

     

    और दीवार पर खरोंचों से कुछ लिखा हुआ था।

     

    “मैंने अपनी बेटी को नहीं मारा।”

     

    अमन की आँखें फैल गईं।

     

    तभी उसके पीछे से आवाज़ आई—

     

    “वह मेरी बेटी थी।”

     

    दोनों मुड़े।

     

    लाल साड़ी वाली औरत उनके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह डरावनी नहीं लग रही थी।

     

    बल्कि बेहद दुखी थी।

     

    उसकी आँखों से खून के आँसू बह रहे थे।

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम चंद्रा हो?”

     

    औरत ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तुमने गाँव वालों को क्यों डराया?”

     

    चंद्रा ने जवाब दिया—

     

    “मैंने किसी को नहीं डराया। मैंने सिर्फ उन्हें सच याद दिलाया।”

     

    “हरिराम काका कहाँ हैं?”

     

    चंद्रा ने गलियारे की तरफ इशारा किया।

     

    अमन और रवि वहाँ पहुँचे।

     

    हरिराम काका दीवार के पास बैठे थे।

     

    वह जीवित थे।

     

    लेकिन बहुत कमजोर।

     

    अमन ने उन्हें उठाया।

     

    “काका, यहाँ क्या हुआ था?”

     

    हरिराम काका रो पड़े।

     

    “देवेंद्र ने चंद्रा को इस तहखाने में बंद किया था। उसकी बेटी गौरी सब देख रही थी। उसने अपनी माँ को बचाने की कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “देवेंद्र ने गौरी को भी यहाँ बंद कर दिया।”

     

    रवि ने पूछा—

     

    “फिर आग किसने लगाई?”

     

    काका ने सिर झुका लिया।

     

    “देवेंद्र ने।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि चंद्रा के पास उसके सारे अपराधों के सबूत थे। उसे डर था कि चंद्रा गाँव वालों को सब बता देगी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन चंद्रा और गौरी बच कैसे गईं?”

     

    काका ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “वे नहीं बचीं।”

     

    सन्नाटा छा गया।

     

    तभी पीछे से बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “माँ… मुझे बहुत अंधेरा लगा था।”

     

    चंद्रा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    गौरी उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    अमन को समझ आया कि यह बदला नहीं था।

     

    यह अधूरी कहानी थी।

     

    चंद्रा ने अमन की ओर देखा।

     

    “मेरा लॉकेट खोलो।”

     

    अमन ने लॉकेट खोला।

     

    उसके अंदर की तस्वीर के पीछे एक छोटा कागज़ छिपा हुआ था।

     

    कागज़ पर देवेंद्र के अपराधों का पूरा विवरण लिखा था।

     

    गाँव की जमीनों पर कब्ज़ा।

     

    लोगों को धमकाना।

     

    और चंद्रा तथा गौरी को तहखाने में बंद करना।

     

    अमन ने कहा—

     

    “तुम चाहती हो कि यह सच गाँव वालों के सामने आए?”

     

    चंद्रा ने सिर हिला दिया।

     

    “बस इतना ही।”

     

    अचानक तहखाने की दीवारें हिलने लगीं।

     

    ऊपर से तेज़ आवाज़ आने लगी।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    रवि चिल्लाया—

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा!”

     

    लेकिन चंद्रा वहीं खड़ी रही।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।

     

    उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    “तुम भी हमारे साथ चलो।”

     

    चंद्रा हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “मेरा रास्ता यहाँ खत्म होता है।”

     

    गौरी ने पहली बार अमन की तरफ देखा।

     

    उसकी आँखें अब काली नहीं थीं।

     

    वे सामान्य थीं।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “धन्यवाद।”

     

    अगले ही पल चंद्रा और गौरी धुएँ में बदलने लगीं।

     

    उनकी आकृतियाँ धीरे-धीरे गायब हो गईं।

     

    तहखाने में सिर्फ लाल चूड़ी बची।

     

    अमन ने चूड़ी उठाई।

     

    और तभी पीछे से एक भयानक आवाज़ आई—

     

    “नहीं!”

     

    चारों तरफ अचानक आग की लपटें उठने लगीं।

     

    हरिराम काका चिल्लाए—

     

    “देवेंद्र!”

     

    कमरे के बीचोंबीच एक काली आकृति दिखाई दी।

     

    वह देवेंद्र की आत्मा थी।

     

    उसका चेहरा जला हुआ था।

     

    वह अमन की ओर बढ़ा।

     

    “यह सच बाहर नहीं जाएगा!”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    देवेंद्र ने उसका गला पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी लाल चूड़ी चमकने लगी।

     

    पूरे तहखाने में लाल रोशनी फैल गई।

     

    चंद्रा की आवाज़ गूँजी—

     

    “अब मेरा सच कोई नहीं रोक सकता।”

     

    देवेंद्र की आत्मा चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    एक तेज़ हवा चली।

     

    और वह काली आकृति धुएँ की तरह गायब हो गई।

     

    तहखाना टूटने लगा।

     

    अमन, रवि और हरिराम काका किसी तरह बाहर भागे।

     

    सुबह होते ही अमन ने गाँव वालों के सामने डायरी और वह कागज़ रख दिया।

     

    सालों से छिपा सच सबके सामने था।

     

    लाल हवेली को बाद में गिरा दिया गया।

     

    बरगद के पेड़ के नीचे चंद्रा और गौरी की याद में एक छोटा-सा दीपक जलाया जाने लगा।

     

    कहा जाता है कि उसके बाद अमावस्या की रात पगडंडी पर लाल साड़ी वाली औरत दिखाई देना बंद हो गई।

     

    गाँव में फिर से शांति लौट आई।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    एक साल बाद अमन शहर लौट चुका था।

     

    एक रात उसके कमरे की खिड़की पर अचानक—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसकी आँख खुल गई।

     

    वह कुछ पल चुपचाप खिड़की को देखता रहा।

     

    फिर उसने खिड़की खोली।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    नीचे फर्श पर एक छोटी-सी लाल चूड़ी पड़ी थी।

     

    अमन ने काँपते हुए उसे उठाया।

     

    तभी उसके पीछे एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

     

    “माँ को तो मुक्ति मिल गई…”

     

    अमन धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरे के कोने में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    गौरी।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “लेकिन क्या तुम्हें सच में लगता है कि देवेंद्र अकेला था?”

     

    अमन के हाथ से लाल चूड़ी गिर गई।

     

    कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    और अंधेरे में कई आवाज़ें एक साथ फुसफुसाईं—

     

    “अभी तो कहानी शुरू हुई !

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  • 😱लाल चुड़ैल😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    😱(भाग 2 — हवेली का राज़ )😱

     

     

    अगली सुबह अमन की आँख खुली तो उसके कमरे में धूप नहीं थी।

     

    खिड़की बंद थी।

     

    दरवाज़ा बंद था।

     

    लेकिन कमरे में मिट्टी और गीली मिट्टी जैसी अजीब गंध फैली हुई थी।

     

    उसने अपने हाथ की तरफ देखा।

     

    कलाई पर तीन लाल निशान थे।

     

    ऐसे निशान जैसे किसी ने नाखूनों से उसे पकड़कर खरोंचा हो।

     

    अमन घबरा गया।

     

    उसे पिछली रात की सारी बातें याद आने लगीं।

     

    लाल हवेली।

     

    वह औरत।

     

    लाल लॉकेट।

     

    और उसकी आवाज़—

     

    “अब अगली रात तुम्हारी है…”

     

    अमन ने तुरंत रवि को फोन किया।

     

    फोन बंद था।

     

    वह उसके घर पहुँचा तो रवि बिस्तर पर बैठा काँप रहा था।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    रवि ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “कल रात मैंने एक सपना देखा।”

     

    “क्या?”

     

    “वही औरत… लाल चुड़ैल।”

     

    रवि की आँखों में आँसू थे।

     

    “उसने मुझे बताया कि चंद्रा ने किसी को नहीं मारा था।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “तो फिर?”

     

    रवि बोला—

     

    “उसे मारा गया था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    उसी समय बाहर से हरिराम काका की आवाज़ आई।

     

    “अगर सच जानना है तो मेरे पास आओ।”

     

    दोनों उनके घर पहुँचे।

     

    हरिराम काका ने दरवाज़ा बंद किया और एक पुराना लकड़ी का संदूक खोला।

     

    उसमें पुराने कागज़, तस्वीरें और एक डायरी रखी थी।

     

    काका ने डायरी अमन को दी।

     

    “यह चंद्रा के पति देवेंद्र की डायरी है।”

     

    अमन ने पहला पन्ना खोला।

     

    लिखा था—

     

    “चंद्रा को मैं कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “वह मेरे राज़ जानती है।”

     

    फिर एक पन्ना था जिस पर सिर्फ एक तारीख लिखी थी।

     

    वही तारीख…

     

    जिस रात हवेली में आग लगी थी।

     

    अमन ने पूछा, “काका, उस रात क्या हुआ था?”

     

    हरिराम काका ने लंबी साँस ली।

     

    “देवेंद्र गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था। उसने गाँव की जमीनों पर कब्ज़ा कर रखा था। चंद्रा को सब पता चल गया था। उसने गाँव वालों को सच बताने की धमकी दी।”

     

    “फिर?”

     

    “देवेंद्र ने उसे रोकने की कोशिश की।”

     

    काका कुछ देर चुप रहे।

     

    “उस रात हवेली में आग लगी। लोग बाहर खड़े रहे। किसी ने अंदर जाने की हिम्मत नहीं की।”

     

    अमन ने पूछा, “और चंद्रा?”

     

    “सबने माना कि वह जलकर मर गई।”

     

    “लेकिन उसकी लाश नहीं मिली।”

     

    काका ने सिर हिलाया।

     

    “क्योंकि वह हवेली में थी ही नहीं।”

     

    अमन और रवि एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “तो फिर वह कहाँ गई?”

     

    हरिराम काका की आवाज़ धीमी हो गई।

     

    “हवेली के नीचे एक तहखाना है।”

     

    अमन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “तहखाना?”

     

    “हाँ। और वहाँ से गाँव के पुराने कुएँ तक एक सुरंग जाती थी।”

     

    अमन को पिछली रात की लाल चुड़ैल की बात याद आई।

     

    मेरा हार कहाँ है?

     

    उसने तुरंत पूछा—

     

    “उसका हार?”

     

    काका की आँखें फैल गईं।

     

    “तुम्हें उसका हार मिला?”

     

    अमन ने जेब से लॉकेट निकाला।

     

    काका ने उसे देखते ही पीछे कदम कर लिया।

     

    “इसे यहाँ से बाहर ले जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह वही लॉकेट है जो चंद्रा के गले में था।”

     

    अमन ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर एक छोटी-सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में चंद्रा के साथ एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    रवि ने पूछा—

     

    “यह लड़की कौन है?”

     

    हरिराम काका का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “चंद्रा की बेटी।”

     

    अमन हैरान रह गया।

     

    “लेकिन गाँव में तो कहा जाता था कि चंद्रा की कोई बेटी नहीं थी।”

     

    काका ने जवाब नहीं दिया।

     

    उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

     

    “क्योंकि वह बच्ची भी उस रात गायब हो गई थी।”

     

    अचानक कमरे के बाहर पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छन… छन… छन…

     

    तीनों की साँसें रुक गईं।

     

    काका ने तुरंत दरवाज़े की ओर देखा।

     

    पायल की आवाज़ धीरे-धीरे करीब आती जा रही थी।

     

    छन… छन… छन…

     

    फिर आवाज़ दरवाज़े के ठीक बाहर रुक गई।

     

    तीन सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर दरवाज़े पर खरोंच की आवाज़ आई।

     

    खर्रर्रर्र…

     

    काका ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “किसी भी हालत में दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    खरोंच की आवाज़ बंद हो गई।

     

    फिर एक औरत की आवाज़ आई—

     

    “काका… दरवाज़ा खोलो…”

     

    हरिराम काका काँपने लगे।

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “काका, यह आपको जानती है?”

     

    काका की आँखों में डर उतर आया।

     

    “यह चंद्रा नहीं है।”

     

    “तो कौन है?”

     

    काका ने जवाब दिया—

     

    “उसकी बेटी।”

     

    अचानक दरवाज़ा ज़ोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    रवि चीख पड़ा।

     

    अमन ने डायरी कसकर पकड़ ली।

     

    तभी काका ने दीवार के पीछे बने एक छोटे दरवाज़े की ओर इशारा किया।

     

    “उस रास्ते से निकलो!”

     

    तीनों पीछे के रास्ते से बाहर भागे।

     

    कुछ देर बाद जब वे सुरक्षित जगह पहुँचे तो अमन ने डायरी फिर खोली।

     

    एक आख़िरी पन्ने पर कुछ लिखा था।

     

    स्याही धुंधली थी, लेकिन शब्द पढ़े जा सकते थे—

     

    “चंद्रा मरी नहीं थी। उसे तहखाने में जिंदा बंद किया गया था।”

     

    अमन के हाथ काँपने लगे।

     

    “काका… किसने बंद किया था?”

     

    काका ने जवाब नहीं दिया।

     

    उन्होंने सिर झुका लिया।

     

    अमन ने डायरी का अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ एक नाम लिखा था।

     

    हरिराम।

     

    अमन ने धीरे-धीरे काका की ओर देखा।

     

    “यह क्या है?”

     

    हरिराम काका की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैंने दरवाज़ा बंद किया था।”

     

    रवि पीछे हट गया।

     

    “आपने?”

     

    “मैं मजबूर था।”

     

    “किसने मजबूर किया?”

     

    काका कुछ बोलते, उससे पहले कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरा।

     

    फिर एक लाल रोशनी कमरे के कोने में दिखाई दी।

     

    वही लाल साड़ी।

     

    वही लंबे बाल।

     

    लेकिन इस बार उसके साथ एक छोटी बच्ची भी खड़ी थी।

     

    बच्ची का चेहरा नीचे झुका हुआ था।

     

    चंद्रा की आवाज़ गूँजी—

     

    “सच… अभी पूरा नहीं हुआ।”

     

    अमन ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम चाहती क्या हो?”

     

    औरत ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उंगली सीधे हरिराम काका की ओर थी।

     

    “जिसने दरवाज़ा बंद किया था…”

     

    हरिराम काका रो पड़े।

     

    “मुझे माफ़ कर दो।”

     

    चंद्रा की आवाज़ अचानक भयानक चीख में बदल गई—

     

    “मुझे नहीं… मेरी बेटी से माफी माँगो!”

     

    छोटी बच्ची ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर अमन की चीख निकल गई।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे।

     

    अगले ही पल दोनों गायब हो गए।

     

    कमरे की लाइट वापस आ गई।

     

    लेकिन हरिराम काका भी गायब थे।

     

    उनकी जगह फर्श पर सिर्फ एक लाल चूड़ी पड़ी थी।

     

    और दीवार पर खून से लिखा था—

     

    “आज रात तहखाना खुलेगा।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 लाल चुड़ैल 😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    😱(भाग 1 — लाल साड़ी वाली औरत)😱

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बरवा में शाम के बाद लोग घरों से बाहर निकलना पसंद नहीं करते थे। गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना बरगद का पेड़ था। उसके पास एक टूटी हुई हवेली खड़ी थी, जिसे लोग लाल हवेली कहते थे।

     

    कहते थे कि उस हवेली में लगभग तीस साल पहले एक औरत रहती थी—चंद्रा।

     

    चंद्रा की शादी गाँव के एक ज़मींदार परिवार में हुई थी। शादी के कुछ ही महीनों बाद उसके पति की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई। गाँव वालों ने कहा कि वह कुएँ में गिर गया था, लेकिन कुछ लोगों का मानना था कि उसकी मौत के पीछे कोई और राज़ था।

     

    पति की मौत के बाद चंद्रा हमेशा लाल साड़ी पहनकर हवेली की छत पर बैठी रहती थी। एक रात अचानक हवेली में आग लग गई।

     

    सुबह तक सब कुछ राख हो चुका था।

     

    लेकिन चंद्रा की लाश कभी नहीं मिली।

     

    उस दिन के बाद से गाँव में एक अजीब बात शुरू हुई।

     

    हर अमावस्या की रात, गाँव की पगडंडी पर एक औरत दिखाई देती थी।

     

    लाल साड़ी में।

     

    लंबे खुले बाल।

     

    चेहरा घूँघट से ढका हुआ।

     

    और उसके पैरों के निशान…

     

    हमेशा उल्टे होते थे।

     

    गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे—

     

    “वो चंद्रा नहीं है… वो अब लाल चुड़ैल बन चुकी है।”

     

    लोग उस रास्ते से रात में गुजरना तो दूर, दिन में भी अकेले नहीं जाते थे।

     

    लेकिन गाँव में रहने वाला अमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    अमन शहर में पढ़ाई करके कुछ दिनों के लिए गाँव आया था। वह इन भूत-प्रेत की कहानियों को गाँव वालों का अंधविश्वास समझता था।

     

    एक शाम वह अपने दोस्त रवि के साथ चाय की दुकान पर बैठा था।

     

    रवि ने अचानक कहा, “आज अमावस्या है। रात को बाहर मत निकलना।”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “तुम भी इन बातों पर विश्वास करते हो?”

     

    रवि ने उसकी तरफ गंभीरता से देखा।

     

    “मैंने उसे देखा है।”

     

    अमन की हँसी रुक गई।

     

    “किसे?”

     

    “लाल चुड़ैल को।”

     

    रवि ने धीरे से बताया, “दो साल पहले मैं रात में खेत से लौट रहा था। लाल हवेली के पास मुझे किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई दी। मैंने सोचा कोई मुसीबत में है। मैं उसके पास गया।”

     

    “फिर?”

     

    “उसने मुझसे पूछा—‘तुमने उसे कहाँ छिपाया है?’”

     

    अमन ने पूछा, “किसे?”

     

    रवि की आँखों में डर उतर आया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    तभी चाय की दुकान के पीछे बैठे बूढ़े हरिराम काका बोले—

     

    “अगर अपनी जान प्यारी है तो आज रात लाल हवेली के पास मत जाना।”

     

    अमन ने मुस्कुराते हुए पूछा, “काका, आपने भी उसे देखा है?”

     

    हरिराम काका ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “देखा नहीं बेटा… उसके हाथों से बचा हूँ।”

     

    अमन कुछ पूछ पाता, उससे पहले काका उठकर वहाँ से चले गए।

     

    रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे अमन अपने कमरे में सोने की कोशिश कर रहा था।

     

    अचानक—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    अमन उठकर बैठ गया।

     

    उसने खिड़की खोली।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    हवा भी बिल्कुल बंद थी।

     

    वह वापस बिस्तर पर आया ही था कि फिर आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ कमरे के दरवाज़े से आई।

     

    अमन धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर अँधेरा था।

     

    लेकिन फर्श पर कुछ पड़ा था।

     

    एक लाल चूड़ी।

     

    अमन ने उसे उठाया।

     

    उसी पल उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “मुझे… मेरा सामान वापस चाहिए…”

     

    अमन झटके से पीछे मुड़ा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    सुबह होते ही उसने रवि को सब बताया।

     

    रवि ने लाल चूड़ी देखते ही उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “इसे फेंक दो!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह उसकी निशानी है।”

     

    अमन ने कहा, “मैं आज रात लाल हवेली जाऊँगा।”

     

    रवि ने उसे रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन अमन नहीं माना।

     

    रात के करीब बारह बजे दोनों टॉर्च लेकर हवेली की ओर निकल पड़े।

     

    आसमान में चाँद नहीं था।

     

    पेड़ों के बीच से गुजरती हवा किसी के रोने जैसी आवाज़ कर रही थी।

     

    जैसे ही वे हवेली के पास पहुँचे, अमन की टॉर्च अचानक बंद हो गई।

     

    “बैटरी खत्म?” रवि ने पूछा।

     

    “अभी तो नई डाली थी।”

     

    तभी हवेली के अंदर से एक धीमी आवाज़ आई—

     

    छन… छन… छन…

     

    पायल की आवाज़।

     

    रवि ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चल वापस।”

     

    लेकिन अमन आगे बढ़ता गया।

     

    हवेली का मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    उन्होंने उसे धक्का दिया।

     

    क्रीईईईक…

     

    अंदर धूल और मकड़ी के जालों से पूरा कमरा भरा हुआ था।

     

    दीवार पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक तस्वीर के सामने अमन रुक गया।

     

    वह चंद्रा की तस्वीर थी।

     

    लाल साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    और माथे पर बड़ी लाल बिंदी।

     

    अमन तस्वीर को ध्यान से देख ही रहा था कि उसे कुछ अजीब दिखाई दिया।

     

    तस्वीर की आँखों से…

     

    खून जैसे लाल आँसू बह रहे थे।

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    रवि काँपते हुए बोला—

     

    “अमन… तस्वीर को मत देख।”

     

    तभी ऊपर की मंज़िल से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आख़िरी छोर पर एक औरत खड़ी थी।

     

    लाल साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    चेहरा पूरी तरह बालों से ढका हुआ।

     

    अमन ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    औरत ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

     

    फिर उसने अपना चेहरा ऊपर किया।

     

    चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ काली, खाली आँखें थीं।

     

    रवि चीख पड़ा।

     

    दोनों पीछे भागे।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो चुका था।

     

    औरत की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी—

     

    “मेरा… हार… कहाँ है?”

     

    अमन ने काँपते हुए अपनी जेब टटोली।

     

    उसे याद आया कि लाल चूड़ी उठाते समय उसे फर्श पर एक छोटा-सा पुराना लॉकेट भी मिला था।

     

    वह लॉकेट उसने जेब में रख लिया था।

     

    अचानक उसकी जेब गर्म होने लगी।

     

    औरत ने चीखकर कहा—

     

    “तुमने उसे छुआ है…”

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    रवि बेहोश होकर गिर पड़ा।

     

    अमन ने लॉकेट निकालकर जमीन पर फेंक दिया।

     

    औरत अचानक गायब हो गई।

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    अमन ने रवि को उठाया और दोनों हवेली से बाहर भागे।

     

    लेकिन बाहर निकलते समय अमन ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    हवेली की ऊपरी खिड़की में वही लाल साड़ी वाली औरत खड़ी थी।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ उठाया।

     

    और अपनी उंगली से अमन की ओर इशारा किया।

     

    फिर उसके होंठ हिले—

     

    “अब अगली रात तुम्हारी है…”

     

    अमन ने नीचे देखा।

     

    उसके पैरों के पास वही लाल लॉकेट पड़ा था।

     

    और उसके ऊपर ताज़ा खून से सिर्फ एक शब्द लिखा था—

     

    “वापस।”

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  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(Last part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शीशा टूटते ही पूरे पार्लर में भयानक सन्नाटा छा गया।

     

    अमन, सोनू, दीपक और राकेश कुछ समझ नहीं पा रहे थे।

     

    जमुना दादी लगातार रो रही थीं।

     

    उन्होंने काँपते हुए कहा—

     

    “हमें पुलिस को सब बताना होगा।”

     

    लेकिन तभी टूटे हुए शीशे के एक टुकड़े में कुसुम का चेहरा दिखाई दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “सच सामने आएगा… लेकिन एक आखिरी काम बाकी है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    शीशे में दिखाई दे रही कुसुम ने पार्लर के एक कोने की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का संदूक पड़ा था।

     

    अमन ने संदूक खोला।

     

    उसमें सजनी की डायरी थी।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मेरे साथ कुछ हो जाए तो मेरी मौत को हादसा मत समझना। मुझे पता है कि गाँव में कौन लड़कियों को डराता और उनके साथ धोखा करता है। अगर मैं नहीं रही तो मेरी डायरी सच बताएगी।”

     

    डायरी में उन लोगों के नाम लिखे थे।

     

    गाँव के तीन प्रभावशाली आदमी।

     

    उनमें से एक का नाम था बलदेव सिंह।

     

    बलदेव गाँव का बहुत रसूखदार आदमी था।

     

    लोग उससे डरते थे।

     

    अमन ने डायरी लेकर गाँव की पंचायत में सबके सामने सच बता दिया।

     

    पहले तो बलदेव ने सब कुछ झूठ कहा।

     

    लेकिन डायरी में लिखे पुराने सबूत और सजनी की हड्डियाँ देखकर गाँव वालों को सच्चाई समझ आ गई।

     

    पुलिस को बुलाया गया।

     

    जाँच शुरू हुई।

     

    कई साल पुराने राज खुलने लगे।

     

    बलदेव और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    उस रात गाँव के लोगों ने सजनी और कुसुम के लिए प्रार्थना की।

     

    लेकिन अमन के मन में एक सवाल था—

     

    अगर अपराधियों को पकड़ लिया गया है, तो क्या भूतिया पार्लर का रहस्य खत्म हो गया?

     

    रात करीब बारह बजे वह अकेला पार्लर के सामने खड़ा था।

     

    अचानक अंदर से आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    सामने टूटा हुआ शीशा था।

     

    लेकिन इस बार शीशे में उसका प्रतिबिंब नहीं था।

     

    उसकी जगह सजनी खड़ी थी।

     

    सजनी ने लाल साड़ी पहन रखी थी।

     

    चेहरे पर शांति थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरा आखिरी काम बाकी है।”

     

    अमन ने डरते हुए पूछा—

     

    “क्या?”

     

    सजनी ने एक पुरानी कुर्सी की ओर इशारा किया।

     

    वहाँ कुसुम बैठी थी।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    सजनी बोली—

     

    “उस रात मैं कुसुम को बचाना चाहती थी। लेकिन मैं उसे बचा नहीं सकी। अब उसकी आत्मा तब तक नहीं जाएगी, जब तक उसका अधूरा श्रृंगार पूरा नहीं होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन उसका श्रृंगार कौन करेगा?”

     

    सजनी मुस्कुराई।

     

    “तुम नहीं।”

     

    अचानक पार्लर के दरवाजे पर गाँव की कुछ महिलाएँ दिखाई दीं।

     

    उनमें कुसुम की माँ भी थी।

     

    वह रोते हुए आगे बढ़ी।

     

    कुसुम की आत्मा ने अपनी माँ को देखा।

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटी… अब घर चल।”

     

    इतना सुनते ही कुसुम की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर नहीं था।

     

    सजनी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब यह दुल्हन पूरी हो गई।”

     

    धीरे-धीरे कुसुम की आत्मा धुएँ में बदलने लगी।

     

    फिर सजनी भी उसके साथ धुंधली होने लगी।

     

    अमन ने आखिरी बार पूछा—

     

    “क्या तुम दोनों अब मुक्त हो जाओगी?”

     

    सजनी ने कहा—

     

    “हाँ… क्योंकि अब सच छिपा नहीं है।”

     

    दोनों आकृतियाँ धीरे-धीरे गायब हो गईं।

     

    उसी क्षण पार्लर के अंदर रखा पुराना हेयर ड्रायर अपने आप बंद हो गया।

     

    घड़ी की सुई बारह बजकर एक मिनट पर रुक गई।

     

    और फिर…

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    अगली सुबह गाँव वालों ने पार्लर को हमेशा के लिए बंद करने के बजाय उसे एक नई जगह में बदलने का फैसला किया।

     

    उस जगह पर गाँव की लड़कियों के लिए सिलाई और ब्यूटी का प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया।

     

    दरवाजे पर एक बोर्ड लगाया गया—

     

    “सजनी महिला प्रशिक्षण केंद्र”

     

    नीचे एक छोटी-सी पंक्ति लिखी गई—

     

    “डर को छिपाने से वह बढ़ता है, लेकिन सच का सामना करने से डर खत्म हो जाता है।”

     

    कई साल बाद भी गाँव के बुजुर्ग उस घटना को याद करते हैं।

     

    लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात कभी-कभी उस पुराने पार्लर की खिड़की में हल्की-सी रोशनी दिखाई देती है।

     

    कभी-कभी शीशे में लाल साड़ी पहने एक औरत भी दिखाई देती है।

     

    लेकिन अब वह किसी को डराती नहीं।

     

    वह सिर्फ कुछ पल के लिए दिखाई देती है…

     

    और फिर गायब हो जाती है।

     

    गाँव की बूढ़ी जमुना दादी कहती हैं—

     

    “वो भूत नहीं है… वो हमें याद दिलाने आती है कि किसी के साथ गलत होते देखकर चुप मत रहना।”

     

    कहानी की सीख

     

    इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि हर डर के पीछे भूत नहीं होता और हर अफवाह सच नहीं होती। कई बार असली डर इंसानों के गलत कामों से पैदा होता है।

     

    अगर किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तो डरकर चुप नहीं रहना चाहिए। सच बोलने वाला इंसान अकेला जरूर पड़ सकता है, लेकिन उसका साहस किसी दूसरे की जिंदगी बचा सकता है।

     

    और सबसे जरूरी बात—

     

    अंधविश्वास से डरने के बजाय सच्चाई को समझना चाहिए, क्योंकि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी रोशनी उसे खत्म कर सकती है।

     

     

    Story pasand aai ho to comment jarur  kare.

     

    End

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(part-2)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जमुना दादी की बात सुनकर अमन और उसके दोस्त चुप हो गए।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “दादी, आखिरी दुल्हन कौन थी?”

     

    दादी ने चारों तरफ देखा और धीमी आवाज में बोलीं—

     

    “कुसुम।”

     

    “वही लड़की जो दस साल पहले पार्लर में बेहोश मिली थी?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    फिर उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनाई।

     

    कुसुम की शादी शहर में रहने वाले एक आदमी से होने वाली थी। शादी के दिन उसे सजने के लिए सजनी के पार्लर में भेजा गया था।

     

    लेकिन सजनी उस दिन बहुत परेशान थी।

     

    कहा जाता है कि कुछ दिन पहले उसने किसी पुराने ग्राहक की तस्वीर में एक अजीब औरत देखी थी।

     

    वह औरत हर तस्वीर में दिखाई देती थी।

     

    लेकिन जब सजनी तस्वीर खींचती तो आसपास कोई नहीं होता।

     

    धीरे-धीरे सजनी को उस औरत के सपने आने लगे।

     

    सपने में वह औरत कहती—

     

    “मुझे भी दुल्हन बनाओ।”

     

    सजनी ने इसे अपना वहम समझा।

     

    लेकिन जिस दिन कुसुम पार्लर आई, वही औरत पहली बार शीशे में दिखाई दी।

     

    सजनी डर गई।

     

    उसने कुसुम से कहा—

     

    “आज श्रृंगार मत करवाओ। घर चली जाओ।”

     

    लेकिन तभी पार्लर का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    शीशे पर धुंध छा गई।

     

    और उसमें एक शब्द लिखा दिखाई दिया—

     

    “दुल्हन…”

     

    इसके बाद क्या हुआ, किसी को पता नहीं चला।

     

    कुसुम बेहोश मिली।

     

    सजनी गायब थी।

     

    और शीशे पर वह डरावना संदेश लिखा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन सजनी की आत्मा हमें क्यों परेशान कर रही है?”

     

    दादी ने कहा—

     

    “शायद वह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती। शायद वह किसी को अपना सच बताना चाहती है।”

     

    उसी शाम अमन ने अपने दोस्तों के साथ पार्लर जाने का फैसला किया।

     

    इस बार वे अकेले नहीं गए।

     

    जमुना दादी भी उनके साथ थीं।

     

    पार्लर का ताला अब भी लगा था।

     

    दादी ने अपनी चाबी निकाली।

     

    अमन हैरान रह गया।

     

    “आपके पास इसकी चाबी?”

     

    दादी बोलीं—

     

    “सजनी ने मरने से पहले नहीं… गायब होने से पहले मुझे दी थी।”

     

    दरवाजा खुला।

     

    अंदर धूल और मकड़ी के जाले थे।

     

    पुरानी कॉस्मेटिक की बोतलें अब भी मेज पर रखी थीं।

     

    एक कोने में टूटा हुआ हेयर ड्रायर पड़ा था।

     

    और सामने वही बड़ा शीशा।

     

    अमन ने शीशे को देखा।

     

    उसमें कमरा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन अचानक…

     

    शीशे में कमरे का दरवाजा बंद दिखाई दिया।

     

    जबकि असली दरवाजा खुला था।

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    फिर शीशे में देखा।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    और उसके सामने…

     

    एक दुल्हन खड़ी थी।

     

    लाल जोड़ा।

     

    भारी घूँघट।

     

    हाथों में लाल चूड़ियाँ।

     

    अमन ने घबराकर पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    दुल्हन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने धीरे-धीरे अपना घूँघट उठाया।

     

    चेहरा कुसुम का था।

     

    लेकिन उसकी आँखें बिल्कुल सफेद थीं।

     

    अचानक पार्लर की सारी लाइटें अपने आप जल गईं।

     

    हेयर ड्रायर चलने लगा।

     

    कंघियाँ अपने आप घूमने लगीं।

     

    और शीशे पर एक के बाद एक शब्द उभरने लगे—

     

    “सजनी ने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर सजनी कहाँ है?”

     

    शीशे पर अगला संदेश आया—

     

    “वह यहाँ है।”

     

    अचानक कमरे के पीछे से किसी के रोने की आवाज आई।

     

    सभी पलटे।

     

    एक पुराने पर्दे के पीछे किसी की परछाईं थी।

     

    अमन ने पर्दा हटाया।

     

    वहाँ एक छोटा कमरा था।

     

    दीवार पर बहुत सारी तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में गाँव की अलग-अलग दुल्हनें थीं।

     

    लेकिन हर तस्वीर के पीछे वही काली औरत दिखाई दे रही थी।

     

    जमुना दादी ने काँपते हुए कहा—

     

    “हे भगवान…”

     

    दीवार के आखिरी हिस्से में एक तस्वीर थी।

     

    उसमें सजनी खड़ी थी।

     

    उसके पीछे वही काली औरत।

     

    और तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “अगली दुल्हन कौन?”

     

    तभी पार्लर का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    चारों तरफ अंधेरा छा गया।

     

    कुसुम की आवाज आई—

     

    “सच बताओ… नहीं तो अगली दुल्हन तुम्हारे गाँव से होगी।”

     

    अमन चिल्लाया—

     

    “क्या सच?”

     

    आवाज आई—

     

    “सजनी को किसने मारा?”

     

    जमुना दादी अचानक जमीन पर बैठ गईं।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “मैं जानती हूँ।”

     

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

     

    दादी ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “सजनी को किसी भूत ने नहीं मारा था।”

     

    “फिर?”

     

    “उसे इंसानों ने मारा था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    दादी ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में गाँव के चार आदमी खड़े थे।

     

    उनमें से एक था…

     

    जमुना दादी का बेटा।

     

    दादी रोते हुए बोलीं—

     

    “सजनी ने देख लिया था कि गाँव का एक आदमी लड़कियों के साथ धोखा करता था। उसने सबको बताने की धमकी दी थी। उन लोगों ने उसे डराने की कोशिश की। झगड़ा हुआ… और सजनी की मौत हो गई।”

     

    “फिर उसकी लाश?”

     

    “उसे इसी पार्लर के पीछे पुराने कुएँ में फेंक दिया गया।”

     

    अचानक जमीन के नीचे से जोरदार आवाज आई।

     

    धम्म!

     

    पार्लर की फर्श में दरार पड़ गई।

     

    और उस दरार के अंदर से…

     

    एक पुराना लाल दुपट्टा दिखाई दिया।

     

    अमन ने दुपट्टा खींचा।

     

    उसके नीचे हड्डियाँ थीं।

     

    जमुना दादी चीख पड़ीं।

     

    तभी शीशे में सजनी दिखाई दी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मेरा सच सामने आएगा…”

     

    और अगले ही पल शीशा पूरी तरह टूट गया।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(part-1)

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव रामपुरवा में शाम होते ही लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। गाँव बहुत बड़ा नहीं था। चारों तरफ खेत, आम के पेड़, मिट्टी की सड़कें और दूर तक फैले सरसों के खेत थे।

     

    लेकिन गाँव की सबसे अजीब जगह थी—पुरानी हवेली के सामने बना एक छोटा-सा पार्लर।

     

    उसका नाम था “सजनी ब्यूटी पार्लर”।

     

    करीब दस साल पहले तक वहाँ खूब चहल-पहल रहती थी। गाँव की लड़कियाँ शादी-ब्याह और त्योहारों पर सजने के लिए वहीं जाती थीं।

     

    पार्लर की मालकिन थी सजनी।

     

    सजनी बहुत खूबसूरत और हँसमुख महिला थी। वह गाँव की लड़कियों को मेहंदी लगाती, बाल बनाती और दुल्हनों का श्रृंगार करती थी।

     

    लेकिन एक रात अचानक सजनी गायब हो गई।

     

    पार्लर खुला था।

     

    अंदर कुर्सी पर एक दुल्हन बैठी थी।

     

    लेकिन सजनी कहीं नहीं थी।

     

    दुल्हन का नाम था कुसुम।

     

    जब लोगों ने उसे देखा तो वह बेहोश थी।

     

    उसके सामने शीशे पर लाल रंग से सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “दुल्हन अभी अधूरी है…”

     

    उस दिन के बाद पार्लर हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि रात के समय बंद पार्लर के अंदर से कभी-कभी हेयर ड्रायर चलने की आवाज आती है।

     

    कभी चूड़ियों की खनखनाहट।

     

    और कभी किसी औरत के धीरे-धीरे गुनगुनाने की आवाज।

     

    लेकिन गाँव का 18 साल का लड़का अमन इन बातों को बकवास समझता था।

     

    अमन शहर में पढ़ाई करता था और छुट्टियों में गाँव आया हुआ था।

     

    उसके दोस्त थे—सोनू, दीपक और राकेश।

     

    एक शाम चारों चाय की दुकान पर बैठे थे।

     

    सोनू ने कहा—

     

    “कल रात मैंने पुराने पार्लर की खिड़की में किसी को देखा था।”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “बिल्ली होगी।”

     

    दीपक बोला—

     

    “बिल्ली चूड़ी पहनकर गाना गाती है क्या?”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    राकेश ने कहा—

     

    “मेरे दादा कहते हैं, सजनी की आत्मा अभी भी उस पार्लर में है।”

     

    अमन ने हँसते हुए कहा—

     

    “आज रात चलते हैं। देखते हैं कौन है अंदर।”

     

    तीनों दोस्त पहले तो डर गए, लेकिन अमन के पीछे चल पड़े।

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे चारों गाँव से बाहर निकले।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

     

    पुरानी हवेली के पास पहुँचते ही अमन की टॉर्च अचानक झपकने लगी।

     

    “बैटरी खत्म हो रही है,” उसने कहा।

     

    पार्लर सामने था।

     

    दरवाजे पर मोटा ताला लगा हुआ था।

     

    खिड़कियों पर धूल जमी थी।

     

    अमन ने टॉर्च खिड़की के अंदर डाली।

     

    अंदर एक पुरानी कुर्सी थी।

     

    उसके सामने बड़ा-सा शीशा लगा था।

     

    अचानक…

     

    टक!

     

    शीशे पर अंदर से किसी ने हाथ मारा।

     

    चारों पीछे हट गए।

     

    “चलो यहाँ से,” राकेश ने कहा।

     

    लेकिन अमन ने खिड़की के पास जाकर फिर टॉर्च डाली।

     

    इस बार शीशे में चारों लड़कों का प्रतिबिंब दिखाई दिया।

     

    लेकिन उनके पीछे…

     

    एक पाँचवीं औरत खड़ी थी।

     

    लंबे काले बाल।

     

    लाल साड़ी।

     

    और हाथ में कंघी।

     

    अमन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने फिर शीशे की तरफ देखा।

     

    औरत अब भी वहाँ थी।

     

    वह धीरे-धीरे अपने बालों में कंघी कर रही थी।

     

    फिर उसने शीशे के अंदर से अमन की तरफ देखकर मुस्कुराया।

     

    अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

     

    चारों भागकर गाँव की तरफ दौड़े।

     

    घर पहुँचकर अमन ने सोचा कि शायद डर की वजह से उसे भ्रम हुआ होगा।

     

    लेकिन अगली सुबह उसके कमरे में एक चीज पड़ी थी।

     

    एक पुरानी कंघी।

     

    उस कंघी में लंबे काले बाल उलझे हुए थे।

     

    और उसके नीचे एक छोटी-सी चिट्ठी थी—

     

    “कल दुल्हन बनकर आना।”

     

    अमन ने चिट्ठी पढ़ी तो उसके हाथ काँपने लगे।

     

    तभी बाहर से सोनू की आवाज आई—

     

    “अमन! जल्दी बाहर आ!”

     

    अमन बाहर आया।

     

    सोनू की हालत खराब थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरे घर में भी यही कंघी मिली है।”

     

    दीपक और राकेश भी वहाँ पहुँच गए।

     

    तीनों के हाथ में भी वैसी ही कंघियाँ थीं।

     

    और चारों कंघियों में…

     

    एक जैसे लंबे काले बाल उलझे हुए थे।

     

    तभी गाँव की सबसे बुजुर्ग महिला जमुना दादी उनके पास आईं।

     

    उन्होंने कंघी देखते ही अपना चेहरा गंभीर कर लिया।

     

    “तुम लोगों ने पार्लर खोल दिया है क्या?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “नहीं दादी।”

     

    जमुना दादी ने धीरे से कहा—

     

    “तो फिर सजनी ने तुम्हें चुन लिया है।”

     

    चारों लड़कों के चेहरों का रंग उड़ गया।

     

    “किसलिए?”

     

    दादी ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि उस पार्लर की आखिरी दुल्हन आज तक घर नहीं पहुँची थी…”

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    रामसेवक की बात सुनकर पूरा गाँव सन्न रह गया।

     

    उस रात पंचायत बुलाई गई।

     

    रामसेवक ने सबके सामने अपनी कहानी बताई।

     

    पचास साल पहले वह जवान था। उसके साथ गाँव के दो और आदमी—लालमन और जग्गा—भैरव के दोस्त थे।

     

    भैरव ने गौरी को मारने की योजना बनाई थी।

     

    लेकिन जब गौरी ने विरोध किया तो मामला बिगड़ गया।

     

    रामसेवक ने बताया—

     

    “हमने गौरी को डराने के लिए श्मशान तक ले गए थे। हमारा इरादा उसे मारने का नहीं था। लेकिन भैरव ने गुस्से में उसका गला दबा दिया।”

     

    गाँव के लोग स्तब्ध रह गए।

     

    “फिर क्या हुआ?” रघु ने पूछा।

     

    रामसेवक रोते हुए बोला—

     

    “गौरी मर चुकी थी। हम तीनों डर गए। हमने उसे बरगद के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। भैरव ने हमसे कहा कि अगर किसी को बताया तो वह हम सबको बर्बाद कर देगा।”

     

    “फिर भैरव कहाँ गया?”

     

    “वह रातों-रात गाँव छोड़कर चला गया।”

     

    उसके बाद लालमन और जग्गा भी धीरे-धीरे गाँव छोड़ गए।

     

    रामसेवक अकेला रह गया।

     

    उसने इतने वर्षों तक किसी को सच नहीं बताया।

     

    पंडित हरिदास ने कहा—

     

    “शायद गौरी की आत्मा इसी वजह से भटक रही है। उसे न्याय नहीं मिला।”

     

    अगले दिन गाँव वालों ने गौरी की हड्डियों को विधि-विधान से निकाला।

     

    श्मशान घाट की सफाई की गई।

     

    गौरी के नाम से पूजा रखी गई।

     

    लेकिन रात होते ही फिर वही डरावनी घटना शुरू हो गई।

     

    आसमान में अचानक बादल घिर आए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    बरगद का पेड़ बुरी तरह हिलने लगा।

     

    गाँव के लोगों ने देखा कि पेड़ की शाखाओं पर सफेद कपड़े लटक रहे हैं।

     

    और फिर…

     

    एक-एक करके श्मशान की सारी चिताओं की राख हवा में उड़ने लगी।

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    पेड़ के नीचे सफेद साड़ी वाली गौरी दिखाई दी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था।

     

    वह बहुत उदास लग रही थी।

     

    उसने रामसेवक की तरफ देखा।

     

    रामसेवक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

     

    “गौरी… मुझे माफ कर दो।”

     

    गौरी धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाया।

     

    रामसेवक की आँखों के सामने अचानक पचास साल पुराना दृश्य दिखाई देने लगा।

     

    गौरी रो रही थी।

     

    वह मदद के लिए पुकार रही थी।

     

    और रामसेवक खड़ा होकर सब देख रहा था।

     

    रामसेवक जमीन पर गिर पड़ा।

     

    “मुझे माफ कर दो!”

     

    गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    फिर उसने पीछे मुड़कर बरगद के पेड़ को देखा।

     

    अचानक पेड़ की एक बड़ी शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।

     

    शाखा के नीचे से एक पुरानी लोहे की पेटी दिखाई दी।

     

    रघु ने पेटी खोली।

     

    उसमें भैरव की एक चिट्ठी थी।

     

    चिट्ठी में लिखा था—

     

    “गौरी की मौत का जिम्मेदार मैं हूँ। अगर कभी यह चिट्ठी किसी को मिले तो समझ लेना कि रामसेवक, लालमन और जग्गा ने सिर्फ मेरी मदद की थी। असली अपराधी मैं हूँ।”

     

    यह चिट्ठी सबूत बन गई।

     

    गाँव के लोगों ने गौरी के लिए न्याय की प्रार्थना की।

     

    उसी रात पहली बार श्मशान में अजीब शांति थी।

     

    हवा बंद हो गई।

     

    कुत्तों का भौंकना बंद हो गया।

     

    पेड़ की शाखाएँ बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    गौरी की आत्मा आखिरी बार दिखाई दी।

     

    उसने रघु की तरफ देखा।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “अब… मुझे जाने दो।”

     

    रघु ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “तुम्हें न्याय मिलेगा।”

     

    गौरी की आकृति धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    कुछ ही क्षणों में वह धुएँ की तरह हवा में घुल गई।

     

    उस रात के बाद किसी ने श्मशान से रोने की आवाज नहीं सुनी।

     

    लेकिन बरगद का पेड़ फिर भी वहीं खड़ा रहा।

     

    गाँव वालों ने उसे काटने का फैसला किया।

     

    पंडित हरिदास ने मना कर दिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “इसे मत काटो। यह पेड़ अब डर की निशानी नहीं, बल्कि हमें हमारे कर्मों की याद दिलाने वाली निशानी है।”

     

    तब से गाँव वालों ने उस जगह पर एक छोटा-सा पत्थर लगाया।

     

    उस पर लिखा—

     

    “अन्याय को देखकर चुप रहना भी अपराध है।”

     

    कई साल बीत गए।

     

    रघु बड़ा होकर शहर चला गया।

     

    मुन्ना और छोटू भी अपने-अपने काम में लग गए।

     

    लेकिन श्मशान का पेड़ आज भी बरवा गाँव में खड़ा है।

     

    गाँव के बच्चे आज भी उसकी कहानी सुनते हैं।

     

    लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात कभी-कभी पेड़ की शाखाओं के बीच सफेद रोशनी दिखाई देती है।

     

    लेकिन अब किसी को डर नहीं लगता।

     

    क्योंकि गाँव वाले जानते हैं कि वह गौरी की आत्मा नहीं…

     

    बल्कि उस पुराने इतिहास की याद है।

     

    इस कहानी की सीख यह है कि अंधविश्वास और डर के पीछे भागने के बजाय सच को समझना जरूरी है। उससे भी बड़ी बात—अगर हमारे सामने किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तो चुप रहना उस अन्याय को बढ़ावा देना है। गलत काम कितना भी पुराना क्यों न हो, एक दिन उसका सच सामने आता ही है। इसलिए डर से नहीं, बल्कि सच्चाई, इंसानियत और साहस से काम लेना चाहिए।

     

    और बरवा गाँव के लोग आज भी बच्चों से कहते हैं—

     

    “श्मशान के पेड़ से मत डरो… उस गलती से डरो, जो इंसान को इंसान के खिलाफ खड़ा कर दे।”

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अगली सुबह रघु ने दीवार पर बना निशान देखा तो उसके होश उड़ गए।

     

    उसने रात की बात किसी को नहीं बताई।

     

    उसे डर था कि अगर घरवालों को पता चला तो उसकी खूब पिटाई होगी।

     

    लेकिन उसी दिन एक अजीब घटना हुई।

     

    मुन्ना के घर के बाहर भी वही निशान बना था।

     

    फिर छोटू के दरवाजे पर भी।

     

    और कालू के घर की पिछली दीवार पर भी।

     

    चारों दोस्त दोपहर में गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे मिले।

     

    मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

     

    “ये हमारे घरों तक कैसे आया?”

     

    रघु चुप था।

     

    छोटू बोला—

     

    “हमें गाँव के पंडित जी के पास जाना चाहिए।”

     

    चारों पंडित हरिदास के घर पहुँचे।

     

    पंडित जी गाँव के सबसे बुजुर्ग लोगों में से एक थे। उन्होंने चारों की बात ध्यान से सुनी और फिर कुछ देर चुप रहे।

     

    “तुम लोग श्मशान के पेड़ के पास गए थे?”

     

    रघु ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    पंडित जी ने गहरी साँस ली।

     

    “मैंने तुम्हारे दादा-दादियों को भी इस पेड़ की कहानी बताते सुना था। लेकिन उस पेड़ का रहस्य आज तक किसी ने नहीं जाना।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “कौन थी वो औरत?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “उसका नाम गौरी था।”

     

    फिर उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनानी शुरू की।

     

    करीब पचास साल पहले गौरी इसी गाँव में रहती थी। वह बहुत गरीब परिवार की लड़की थी। उसकी शादी गाँव के ही एक आदमी से हुई थी, जिसका नाम भैरव था।

     

    भैरव बहुत लालची और क्रूर आदमी था।

     

    गौरी के पिता ने शादी में अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया था, लेकिन भैरव की लालच खत्म नहीं हुई।

     

    एक दिन उसने गौरी के पिता से और पैसे माँगे।

     

    पैसे नहीं मिले।

     

    कुछ दिनों बाद गौरी अचानक गायब हो गई।

     

    गाँव में खबर फैली कि वह अपने मायके चली गई है।

     

    लेकिन उसके पिता को विश्वास नहीं हुआ।

     

    उन्होंने कई दिनों तक उसे खोजा।

     

    एक रात उन्हें श्मशान के पास गौरी की चप्पल मिली।

     

    अगले दिन भैरव भी गाँव से गायब हो गया।

     

    किसी को कुछ समझ नहीं आया।

     

    कई साल बाद श्मशान के पास खुदाई के दौरान कुछ हड्डियाँ मिलीं।

     

    लेकिन यह साबित नहीं हो पाया कि वे गौरी की थीं।

     

    पंडित जी बोले—

     

    “लोगों का मानना है कि गौरी को उसी बरगद के नीचे मार दिया गया था।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “लेकिन वह हमें क्यों डरा रही है?”

     

    पंडित जी ने उसकी ओर गंभीर नजरों से देखा।

     

    “शायद इसलिए क्योंकि उसके साथ जो हुआ, उसका सच अभी भी दबा हुआ है।”

     

    चारों लड़के एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उस रात रघु के घर फिर अजीब घटना हुई।

     

    रात करीब दो बजे उसकी खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    ठंडी हवा कमरे में भर गई।

     

    रघु की आँख खुली।

     

    उसे लगा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है।

     

    वही सफेद साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    रघु ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    वह आकृति धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    फिर उसके कान में आवाज आई—

     

    “सच… पेड़ के नीचे…”

     

    और वह गायब हो गई।

     

    सुबह रघु ने यह बात मुन्ना को बताई।

     

    दोनों ने तय किया कि उन्हें श्मशान जाकर देखना होगा।

     

    इस बार वे दिन में गए।

     

    पेड़ के पास उन्हें जमीन पर एक पुरानी लोहे की अंगूठी मिली।

     

    अंगूठी पर एक नाम खुदा था—

     

    “भैरव”

     

    रघु के हाथ काँपने लगे।

     

    उन्होंने पेड़ के आसपास जमीन को ध्यान से देखा।

     

    एक जगह मिट्टी बाकी जमीन से अलग थी।

     

    उन्होंने वहाँ खुदाई शुरू की।

     

    कुछ ही देर में फावड़ा किसी लोहे की चीज से टकराया।

     

    खनन!

     

    मिट्टी हटाई गई।

     

    नीचे एक पुराना लकड़ी का संदूक था।

     

    संदूक पर जंग लगा ताला लगा था।

     

    रघु ने ताला तोड़ा।

     

    अंदर एक पुरानी साड़ी, कुछ चूड़ियाँ और एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी थी।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “गौरी की आखिरी बातें।”

     

    रघु ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी में लिखा था कि भैरव गौरी को मारने की धमकी देता था।

     

    गौरी ने अपनी एक सहेली को बताया था कि भैरव ने गाँव के साहूकार से कर्ज लिया था और उस कर्ज को चुकाने के लिए वह गौरी के पिता से पैसे मांग रहा था।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मुझे कुछ हो जाए तो समझ लेना, मुझे श्मशान वाले बरगद के पास ले जाया गया है।”

     

    चारों लड़के डर गए।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    वे पलटे।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर पेड़ की शाखा से एक लाल कपड़ा नीचे गिरा।

     

    रघु ने कपड़ा उठाया।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में गौरी खड़ी थी।

     

    और उसके पीछे भैरव था।

     

    लेकिन तस्वीर का सबसे डरावना हिस्सा यह था कि गौरी के चेहरे पर लाल स्याही से एक बड़ा निशान बना था।

     

    उसी हाथ के निशान जैसा…

     

    जो उनके घरों पर बना था।

     

    अचानक मुन्ना चिल्लाया—

     

    “रघु! पीछे देख!”

     

    पेड़ के पीछे सफेद साड़ी वाली वही औरत खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी आँखों से खून बह रहा था।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ पेड़ की तरफ उठाया।

     

    और फिर जमीन की ओर इशारा किया।

     

    रघु समझ गया।

     

    “उसे कुछ और दिखाना है।”

     

    चारों ने उस जगह खुदाई शुरू कर दी।

     

    कुछ गहराई पर उन्हें इंसानी हड्डियाँ मिलीं।

     

    साथ में एक टूटी हुई चूड़ी थी।

     

    पंडित जी को बुलाया गया।

     

    उन्होंने हड्डियों को देखकर कहा—

     

    “ये शायद गौरी की हैं।”

     

    लेकिन तभी गाँव का एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

     

    उसका नाम था रामसेवक।

     

    उसने हड्डियों को देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

     

    रघु ने पूछा—

     

    “काका, आप कुछ जानते हैं?”

     

    रामसेवक की आँखों में डर था।

     

    वह बोला—

     

    “हाँ… मैं जानता हूँ।”

     

    सब उसकी ओर देखने लगे।

     

    रामसेवक ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “गौरी को भैरव ने नहीं मारा था…”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “तो किसने?”

     

    रामसेवक ने चारों तरफ देखा।

     

    फिर धीमे से बोला—

     

    “उसे गाँव के तीन लोगों ने मिलकर मारा था।”

     

    “कौन लोग?”

     

    रामसेवक कुछ बोल पाता, उससे पहले श्मशान के पेड़ से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    हवा तेज हो गई।

     

    पेड़ की सारी शाखाएँ एक साथ हिलने लगीं।

     

    और जमीन पर मिट्टी से अपने आप तीन शब्द लिखे गए—

     

    “नाम बताओ…”

     

    रामसेवक डर के मारे जमीन पर बैठ गया।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं सब बताऊँगा… लेकिन पहले मुझे अपने पाप का प्रायश्चित करना होगा।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “आप उन लोगों में से एक थे?”

     

    रामसेवक की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उसने सिर झुका दिया।

     

    “हाँ।”

     

    उसी क्षण पेड़ के पीछे से गौरी की आवाज आई—

     

    “सच… सबको सच बताओ…”

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बरवा में चारों तरफ खेत, आम के बाग और कच्ची पगडंडियाँ थीं। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना श्मशान घाट था। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची घास उगी रहती थी और पास में एक सूखी नदी बहती थी, जिसमें साल के ज्यादातर दिनों में सिर्फ थोड़ा-सा पानी रहता था।

     

    लेकिन उस श्मशान घाट की सबसे डरावनी चीज थी—वहाँ खड़ा एक विशाल बरगद का पेड़।

     

    गाँव के लोग उसे “श्मशान का पेड़” कहते थे।

     

    पेड़ इतना पुराना था कि उसकी जड़ें जमीन से बाहर निकलकर साँपों की तरह दूर-दूर तक फैली थीं। उसकी मोटी शाखाएँ पूरे श्मशान घाट पर इस तरह फैली थीं, जैसे कोई विशालकाय हाथ आसमान को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।

     

    गाँव में उस पेड़ को लेकर तरह-तरह की कहानियाँ मशहूर थीं।

     

    बुजुर्ग कहते थे कि करीब पचास साल पहले एक औरत की उसी पेड़ के नीचे मौत हुई थी। किसी ने कहा कि उसने आत्महत्या की थी, तो किसी का कहना था कि उसकी हत्या हुई थी। लेकिन उसकी मौत का सच कभी सामने नहीं आया।

     

    उसके बाद से रात में पेड़ के पास से गुजरने वाले लोगों को किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई देती थी।

     

    “हाय… मुझे बचा लो…”

     

    गाँव के बुजुर्ग हमेशा बच्चों को समझाते थे—

     

    “सूरज डूबने के बाद श्मशान की तरफ मत जाना।”

     

    लेकिन गाँव का एक लड़का था—रघु।

     

    रघु की उम्र लगभग सत्रह साल थी। वह बहुत निडर था और गाँव के लड़कों में सबसे ज्यादा शरारती भी। उसे भूत-प्रेत की कहानियों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।

     

    उसके तीन दोस्त थे—मुन्ना, छोटू और कालू।

     

    एक दिन शाम को चारों लड़के गाँव के बाहर क्रिकेट खेल रहे थे। तभी मुन्ना ने कहा—

     

    “रघु, आज रात तू हमारे साथ श्मशान वाले पेड़ तक चलकर दिखा।”

     

    रघु हँस पड़ा।

     

    “इसमें कौन-सी बड़ी बात है?”

     

    छोटू बोला, “सुना है, जो उस पेड़ को आधी रात में छू ले, उसके पीछे कोई आत्मा घर तक आती है।”

     

    रघु ने मजाक उड़ाते हुए कहा—

     

    “अरे, तुम लोगों ने भूत देखा भी है कभी?”

     

    कालू ने धीरे से कहा—

     

    “मेरे चाचा ने देखा था।”

     

    “क्या देखा था?”

     

    “एक औरत… सफेद साड़ी में। उसका चेहरा नहीं था।”

     

    तीनों लड़के कुछ पल के लिए चुप हो गए।

     

    रघु ने हँसते हुए कहा—

     

    “आज रात मैं उस पेड़ को छूकर वापस आऊँगा। अगर भूत मिला तो उसे भी क्रिकेट खिलाऊँगा।”

     

    चारों ने तय कर लिया कि रात को करीब ग्यारह बजे वे श्मशान जाएँगे।

     

    रात हुई।

     

    गाँव में धीरे-धीरे सन्नाटा फैलने लगा। घरों के दरवाजे बंद हो गए। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। आसमान में बादल थे और चाँद कभी दिखाई देता, कभी बादलों के पीछे छिप जाता।

     

    रघु अपने घर से चुपचाप निकला।

     

    उसके हाथ में एक टॉर्च थी।

     

    मुन्ना, छोटू और कालू पहले से ही गाँव के बाहर उसका इंतजार कर रहे थे।

     

    चारों धीरे-धीरे श्मशान की ओर चल पड़े।

     

    जैसे-जैसे वे श्मशान के पास पहुँचे, हवा ठंडी होती गई।

     

    पेड़ों के पत्ते बिना हवा के ही हिलने लगे।

     

    छोटू ने डरते हुए पूछा—

     

    “रघु… वापस चलें?”

     

    रघु ने कहा—

     

    “डरपोक मत बन।”

     

    कुछ दूर जाने के बाद श्मशान का विशाल बरगद दिखाई देने लगा।

     

    टॉर्च की रोशनी उसकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाओं पर पड़ी तो ऐसा लगा जैसे पेड़ की शाखाएँ किसी बूढ़े आदमी की उंगलियाँ हों।

     

    अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीन बार किसी चीज के जमीन पर गिरने की आवाज आई।

     

    चारों रुक गए।

     

    “ये आवाज कहाँ से आई?” मुन्ना ने फुसफुसाकर पूछा।

     

    रघु ने टॉर्च घुमाई।

     

    कुछ दिखाई नहीं दिया।

     

    फिर अचानक दूर से किसी औरत के रोने की आवाज आई।

     

    “हूँ… हूँ… मुझे बचा लो…”

     

    छोटू का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “रघु… चल यहाँ से।”

     

    रघु ने खुद को संभालते हुए कहा—

     

    “किसी जानवर की आवाज होगी।”

     

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

     

    पेड़ के तने पर एक अजीब निशान बना था। वह निशान किसी हाथ जैसा था।

     

    रघु ने टॉर्च पास की।

     

    तभी उसे लगा कि पेड़ के पीछे कोई खड़ा है।

     

    सफेद कपड़े में एक औरत।

     

    रघु ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह पीछे हटा।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “रघु…”

     

    रघु का शरीर जम गया।

     

    उसने तुरंत पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    “तुम लोगों ने मेरा नाम लिया?”

     

    मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

     

    “नहीं…”

     

    “मैंने भी नहीं,” छोटू बोला।

     

    कालू तो बोल ही नहीं पा रहा था।

     

    तभी पेड़ की सबसे ऊँची शाखा से एक सूखी टहनी टूटकर जमीन पर गिरी।

     

    रघु ने हिम्मत करके पेड़ के तने को छू लिया।

     

    उसी क्षण टॉर्च बंद हो गई।

     

    चारों तरफ घना अंधेरा छा गया।

     

    और फिर…

     

    किसी औरत की जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    “भागोऽऽऽ!”

     

    चारों लड़के चीखते हुए गाँव की ओर भागे।

     

    रघु सबसे आगे था।

     

    लेकिन दौड़ते समय उसे ऐसा महसूस हुआ कि कोई उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा है।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    अंधेरे में एक सफेद साड़ी पहने औरत खड़ी थी।

     

    उसके लंबे बाल जमीन तक लटक रहे थे।

     

    रघु की सांस रुक गई।

     

    वह औरत धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगी।

     

    लेकिन उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    सिर्फ दो चमकती हुई आँखें थीं।

     

    रघु ने आँखें बंद कीं और पूरी ताकत से गाँव की तरफ भागा।

     

    घर पहुँचने के बाद उसने दरवाजा बंद किया और चारपाई पर गिर पड़ा।

     

    उस रात उसे नींद नहीं आई।

     

    सुबह जब वह उठा तो उसके कमरे की दीवार पर मिट्टी से एक निशान बना था।

     

    वही निशान…

     

    जो श्मशान के पेड़ पर बना था।

     

    और उसके नीचे लिखा था—

     

    “तुमने मुझे देखा है… अब मैं तुम्हें देखती रहूँगी।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।