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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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  • 😱शिनिगामी 😱 (मौत का संदेशवाहक)😱

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    मंदिर की दीवार पर लिखे शब्दों को देखकर हारुतो की साँस रुक गई।

     

    “हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

     

    उसके सामने खड़ा शिनिगामी बिल्कुल स्थिर था।

     

    उसका चेहरा इंसान जैसा था, लेकिन उस चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

     

    फिर भी हारुतो को महसूस हो रहा था कि वह उसे देख रहा है।

     

    बहुत देर तक मंदिर में कोई आवाज़ नहीं हुई।

     

    अचानक शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली सीधे हारुतो की तरफ थी।

     

    “तुम्हारे पूर्वजों ने मुझे जन्म दिया था।”

     

    उसकी आवाज़ इंसान की आवाज़ नहीं थी।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कई बूढ़े लोग एक साथ बोल रहे हों।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    “मैंने क्या किया है?”

     

    शिनिगामी ने उत्तर दिया,

     

    “तुमने कुछ नहीं किया।”

     

    कुछ पल की खामोशी।

     

    “लेकिन तुम्हारे खून ने बहुत कुछ किया है।”

     

    हारुतो के पिता आगे आए।

     

    “उसे छोड़ दो!”

     

    शिनिगामी ने अपना सिर पिता की तरफ घुमाया।

     

    “तुम पहले ही मर चुके हो।”

     

    पिता ने कहा,

     

    “लेकिन मैं उसका पिता हूँ।”

     

    शिनिगामी हँसा।

     

    “मृत लोग पिता नहीं होते।”

     

    अचानक उसके हाथ में पकड़ी घंटी बज उठी।

     

    टन…

     

    पिता जमीन पर गिर पड़े।

     

    हारुतो चीख पड़ा।

     

    “पापा!”

     

    उसने उन्हें उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उनके शरीर से धुआँ निकल रहा था।

     

    पिता ने कमजोर आवाज़ में कहा,

     

    “हारुतो… मंदिर के पीछे वाला दरवाज़ा…”

     

    “क्या?”

     

    “वहीं से सब शुरू हुआ था।”

     

    शिनिगामी उनकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    पिता ने आखिरी बार कहा,

     

    “अपनी दादी को ढूँढो।”

     

    हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

     

    “दादी तो—”

     

    “वह अभी जिंदा है।”

     

    अगले ही पल पिता का शरीर राख में बदल गया।

     

    हारुतो चीख उठा।

     

    लेकिन शिनिगामी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब केवल तुम बचे हो।”

     

    हारुतो मंदिर के पीछे बने लकड़ी के दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    नीचे जाने वाली पत्थर की सीढ़ियाँ थीं।

     

    वह तेजी से नीचे उतरने लगा।

     

    सीढ़ियाँ इतनी लंबी थीं कि उसे लग रहा था जैसे वह जमीन के अंदर नहीं, बल्कि किसी दूसरी दुनिया में जा रहा हो।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।

     

    एक चित्र में गाँव के लोग एक काले कपड़े पहने आदमी के सामने खड़े थे।

     

    दूसरे चित्र में वही आदमी एक घंटी पकड़े हुए था।

     

    तीसरे चित्र में…

     

    एक बच्चा था।

     

    उस बच्चे के सामने वही शिनिगामी खड़ा था।

     

    हारुतो रुक गया।

     

    चित्र के नीचे पुराने जापानी अक्षरों में कुछ लिखा था।

     

    वह उसे पूरी तरह पढ़ नहीं पा रहा था, लेकिन एक शब्द पहचान गया।

     

    “कुरोमोरी।”

     

    तभी पीछे से कदमों की आवाज़ आई।

     

    हारुतो ने पीछे देखा।

     

    सीढ़ियों के ऊपर कोई खड़ा था।

     

    उसकी दादी।

     

    “हारुतो…”

     

    हारुतो दौड़कर उनके पास गया।

     

    “दादी!”

     

    दादी ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “सच क्या है?”

     

    दादी कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “आज तुम्हें सब जानना होगा।”

     

    वे उसे एक विशाल भूमिगत कमरे में ले गईं।

     

    कमरे के बीचों-बीच पत्थर की एक वेदी थी।

     

    उसके ऊपर वही लोहे की घंटी रखी थी।

     

    दादी ने कहा,

     

    “सौ साल पहले तुम्हारे परदादा ने मौत से बात करने की कोशिश की थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “तुम्हारी परदादी मर रही थीं।”

     

    हारुतो चुप रहा।

     

    “उन्होंने एक पुरानी किताब में एक अनुष्ठान पढ़ा। उस अनुष्ठान के जरिए उन्होंने मृत्यु को रोकने की कोशिश की।”

     

    “और शिनिगामी पैदा हुआ?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। शिनिगामी पहले से था।”

     

    उन्होंने घंटी की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे परदादा ने उसे इंसानों की दुनिया में बुलाया।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “शुरुआत में शिनिगामी ने सौदा किया।”

     

    “कैसा सौदा?”

     

    “वह एक इंसान की जान बचाएगा… बदले में हर पचास साल में उसी परिवार की एक आत्मा उसे देनी होगी।”

     

    हारुतो के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “और अगर परिवार ने मना किया?”

     

    दादी ने कहा,

     

    “तो वह पूरे गाँव की मौत चुनता।”

     

    हारुतो ने चारों तरफ देखा।

     

    “इसलिए गाँव के लोग उसे नहीं रोकते थे?”

     

    “वे डरते थे।”

     

    अचानक कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    हारुतो…

     

    हारुतो…

     

    हारुतो…

     

    दादी ने जल्दी से वेदी के नीचे से एक पुरानी किताब निकाली।

     

    “लेकिन तुम्हारे परदादा ने एक और गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    दादी ने किताब खोली।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस दिन परिवार का अंतिम वंशज जन्म लेगा, उसी दिन शिनिगामी की शक्ति समाप्त की जा सकती है।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “अंतिम वंशज मैं हूँ?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    दादी ने घंटी की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे बजाना होगा।”

     

    हारुतो ने घंटी उठाई।

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    दादी की आँखों में डर था।

     

    “घंटी तभी काम करेगी जब उसे शिनिगामी के सामने बजाया जाए।”

     

    “और फिर?”

     

    “जिस व्यक्ति ने घंटी बजाई… उसे अपनी सबसे प्यारी याद हमेशा के लिए खोनी होगी।”

     

    हारुतो ने किताब नीचे रख दी।

     

    “कौन-सी याद?”

     

    दादी ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई।

     

    “तुम्हारी माँ की।”

     

    हारुतो पलट गया।

     

    शिनिगामी कमरे के प्रवेश द्वार पर खड़ा था।

     

    उसके पीछे अंधेरा फैलता जा रहा था।

     

    दादी ने हारुतो को अपने पीछे कर लिया।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    दादी हवा में उठ गईं।

     

    हारुतो चीख पड़ा।

     

    “दादी!”

     

    शिनिगामी ने कहा,

     

    “तुम्हारे परिवार ने मुझे जन्म दिया।”

     

    फिर उसने दादी को जमीन पर फेंक दिया।

     

    “अब तुम्हारे परिवार का अंत होगा।”

     

    हारुतो ने घंटी उठाई।

     

    शिनिगामी उसकी तरफ बढ़ने लगा।

     

    हर कदम के साथ जमीन काँप रही थी।

     

    हारुतो पीछे हटता गया।

     

    उसके दिमाग में माँ की यादें घूमने लगीं।

     

    माँ का चेहरा।

     

    माँ की हँसी।

     

    बचपन में उसका हाथ पकड़कर चलना।

     

    बारिश में उसके लिए छाता लेकर आना।

     

    और आखिरी दिन…

     

    जब माँ ने मरने से पहले उससे कहा था—

     

    “डरना मत।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    शिनिगामी उसके सामने आ चुका था।

     

    “घंटी बजाओ।”

     

    हारुतो ने उसे देखा।

     

    “अगर मैं बजाऊँगा तो?”

     

    “तुम अपनी माँ को हमेशा के लिए भूल जाओगे।”

     

    हारुतो काँपने लगा।

     

    “और अगर नहीं बजाया?”

     

    शिनिगामी मुस्कुराया।

     

    “तो तुम्हारी दादी मरेंगी।”

     

    हारुतो ने दादी की तरफ देखा।

     

    वह जमीन पर पड़ी थीं।

     

    बहुत कमजोर।

     

    लेकिन उन्होंने आँखें खोलकर कहा,

     

    “बजा दो।”

     

    “दादी…”

     

    “तुम्हारी माँ ने भी यही चाहा होता।”

     

    हारुतो ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने घंटी उठाई।

     

    और पूरी ताकत से बजा दी।

     

    टन————————!

     

    आवाज़ पूरे भूमिगत कमरे में गूँज उठी।

     

    शिनिगामी पीछे हट गया।

     

    उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    उसका चेहरा फटने लगा।

     

    और पहली बार…

     

    उसके चेहरे पर आँखें दिखाई दीं।

     

    सैकड़ों आँखें।

     

    हर आँख में किसी मरे हुए इंसान का चेहरा था।

     

    शिनिगामी चीखने लगा।

     

    “नहीं!!!”

     

    हारुतो ने दूसरी बार घंटी बजाई।

     

    टन————————!

     

    पूरा मंदिर काँपने लगा।

     

    ऊपर गाँव के घरों की खिड़कियाँ टूटने लगीं।

     

    जंगल के पेड़ एक साथ झुक गए।

     

    और फिर तीसरी बार…

     

    हारुतो ने घंटी बजाई।

     

    टन————————!

     

    अचानक सब कुछ शांत हो गया।

     

    शिनिगामी गायब था।

     

    कमरे में सिर्फ हारुतो और उसकी दादी थे।

     

    दादी धीरे-धीरे उठीं।

     

    “खत्म हो गया।”

     

    हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

     

    “सच में?”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “हाँ।”

     

    हारुतो ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल उसने पूछा,

     

    “दादी… मेरी माँ कौन थी?”

     

    दादी का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    हारुतो ने फिर पूछा,

     

    “मेरी माँ कौन थी?”

     

    दादी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    हारुतो अपनी माँ को पूरी तरह भूल चुका था।

     

    उसके चेहरे की कोई तस्वीर उसे याद नहीं थी।

     

    उसकी आवाज़…

     

    उसकी हँसी…

     

    कुछ भी नहीं।

     

    वह रोने लगा।

     

    दादी ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम्हारी माँ बहुत अच्छी औरत थी।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “क्या वह मुझसे प्यार करती थी?”

     

    दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बहुत ज्यादा।”

     

    सुबह होने लगी।

     

    कुरोमोरी के ऊपर पहली बार कई वर्षों बाद साफ सूरज निकला।

     

    जंगल की धुंध गायब हो गई।

     

    गाँव के लोग अपने घरों से बाहर आने लगे।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन उसी शाम…

     

    हारुतो अपने घर में अकेला बैठा था।

     

    उसने पुराने सामान की एक पेटी खोली।

     

    अंदर उसकी माँ की एक तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर उठाई।

     

    वह तस्वीर में मौजूद औरत को देख रहा था।

     

    लेकिन उसके दिल में कोई पहचान नहीं थी।

     

    बस एक अजीब-सी खाली जगह थी।

     

    तभी…

     

    तस्वीर के पीछे कुछ गिरा।

     

    एक छोटी लोहे की घंटी।

     

    हारुतो ने उसे उठाया।

     

    उस पर खून से एक शब्द लिखा था—

     

    “समाप्त नहीं।”

     

    हारुतो के हाथ से घंटी गिर गई।

     

    उसी समय बाहर जंगल से…

     

    टन…

     

    एक घंटी बजी।

     

    हारुतो खिड़की की तरफ मुड़ा।

     

    जंगल के बीच एक काली आकृति खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह शिनिगामी नहीं था।

     

    वह उसकी माँ थी।

     

    वह दूर से उसे देख रही थी।

     

    और उसके होंठों पर एक मुस्कान थी।

     

    हारुतो ने धीरे से खिड़की खोली।

     

    हवा के साथ उसकी माँ की आवाज़ आई—

     

    “बेटा… तुमने मुझे याद तो नहीं रखा… लेकिन मैंने तुम्हें कभी नहीं भुलाया।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    और जंगल के भीतर वह आकृति धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गई।

     

    उस रात के बाद कुरोमोरी में कभी शिनिगामी की घंटी नहीं बजी।

     

    लेकिन गाँव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं—

     

    अगर किसी रात जापान के किसी सुनसान जंगल में आपको आधी रात को घंटी की आवाज़ सुनाई दे…

     

    तो पीछे मुड़कर मत देखना।

     

    क्योंकि हो सकता है…

     

    मौत आपको बुला नहीं रही हो।

     

    हो सकता है…

     

    वह सिर्फ यह देख रही हो कि आपको अब भी कौन याद है।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 शिनिगामी 😱( मौत का संदेशवाहक)😱

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    “हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

     

    तहखाने में खड़ा हारुतो पत्थर की तरह जम गया।

     

    ऊपर से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    धीरे-धीरे वे कदम सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगे।

     

    हारुतो ने अपनी साँस रोक ली।

     

    उसे दादी की बात याद आई—

     

    “जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन तभी ऊपर से उसके पिता की आवाज़ आई।

     

    “हारुतो?”

     

    वह आवाज़ बिल्कुल वैसी ही थी।

     

    गहरी।

     

    शांत।

     

    जैसी आवाज़ वह बचपन से सुनता आया था।

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “पापा…?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ सेकंड बाद आवाज़ फिर आई।

     

    “बेटा, बाहर आओ।”

     

    हारुतो ने तहखाने के दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।

     

    तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।

     

    उसके पिता हमेशा उसे “हारु” कहकर बुलाते थे।

     

    कभी “हारुतो” नहीं।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह दरवाज़े से कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    फिर ऊपर से उसकी दादी की चीख सुनाई दी।

     

    “हारुतो! दरवाज़ा मत खोलना!”

     

    और उसके तुरंत बाद…

     

    एक भारी आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    हारुतो ने काँपते हाथों से दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

     

    उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।

     

    ऊपर का कमरा खाली था।

     

    लालटेन टूटी हुई थी।

     

    फर्श पर दादी की चादर पड़ी थी।

     

    लेकिन दादी कहीं नहीं थीं।

     

    हारुतो ने उन्हें पुकारा।

     

    “दादी?”

     

    कोई उत्तर नहीं।

     

    तभी उसे फर्श पर कुछ दिखाई दिया।

     

    काले रंग की मिट्टी से बने पैरों के निशान।

     

    वे दरवाज़े से शुरू होकर घर के पीछे वाले कमरे तक जा रहे थे।

     

    हारुतो उनके पीछे चल पड़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    अंदर से सड़ी हुई गंध आ रही थी।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    और जो उसने देखा, उसे देखकर उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    कमरे की दीवार पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    गाँव के लोगों की तस्वीरें।

     

    बच्चे।

     

    बूढ़े।

     

    औरतें।

     

    पुरुष।

     

    हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    कुछ तारीखें बहुत पुरानी थीं।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि कई तस्वीरों में लोगों के चेहरों पर लाल निशान बने थे।

     

    हारुतो ने एक तस्वीर उठाई।

     

    वह उसकी माँ की थी।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    12 अक्टूबर 2006

     

    और उसके नीचे एक शब्द था—

     

    “मृत।”

     

    हारुतो का गला सूख गया।

     

    उसकी माँ की मृत्यु भी 12 अक्टूबर 2006 को हुई थी।

     

    उसने अगली तस्वीर उठाई।

     

    उसके पिता की तस्वीर थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “मृत — 3 अगस्त 2014।”

     

    हारुतो के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    उसका पिता जिंदा था।

     

    कम से कम वह यही सोचता आया था।

     

    उसके पिता पिछले बारह वर्षों से शहर में काम कर रहे थे।

     

    हर महीने पैसे भेजते थे।

     

    हर कुछ दिनों में फोन करते थे।

     

    लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

     

    पिछले तीन महीनों से उसके पिता ने उसे फोन नहीं किया था।

     

    उन्होंने सिर्फ संदेश भेजे थे।

     

    छोटे-छोटे संदेश।

     

    “मैं ठीक हूँ।”

     

    “जल्द घर आऊँगा।”

     

    “दरवाज़ा रात में मत खोलना।”

     

    हारुतो के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी कमरे के कोने से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    हारुतो धीरे से मुड़ा।

     

    वहाँ एक छोटी लड़की बैठी थी।

     

    उसके बाल उसके पूरे चेहरे को ढके हुए थे।

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो काले खाली गड्ढे।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे भी यही सवाल पूछा था।”

     

    अचानक कमरे की सारी तस्वीरें अपने-आप हिलने लगीं।

     

    फिर एक साथ गिरने लगीं।

     

    धड़… धड़… धड़…

     

    लड़की गायब हो गई।

     

    हारुतो कमरे से भागकर बाहर आया।

     

    घर का मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    बाहर बारिश रुक चुकी थी।

     

    लेकिन जंगल की तरफ से धुंध गाँव में उतर रही थी।

     

    और उस धुंध के भीतर…

     

    एक आदमी खड़ा था।

     

    लंबा कोट।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    हाथ में पुरानी छतरी।

     

    हारुतो की आँखें फैल गईं।

     

    “पापा?”

     

    आदमी ने सिर उठाया।

     

    वह सचमुच उसका पिता था।

     

    हारुतो दौड़कर उसके पास गया।

     

    “पापा!”

     

    उसके पिता ने उसे गले लगा लिया।

     

    उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था।

     

    हारुतो काँप गया।

     

    “आप इतने साल कहाँ थे?”

     

    पिता ने कुछ नहीं कहा।

     

    हारुतो ने उनका चेहरा देखा।

     

    चेहरा वही था।

     

    लेकिन आँखें…

     

    उनमें कोई भाव नहीं था।

     

    “पापा?”

     

    पिता ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी दादी ने गलती की।”

     

    हारुतो ने घबराकर पूछा,

     

    “दादी कहाँ हैं?”

     

    पिता ने जंगल की तरफ देखा।

     

    “वह उसे रोकने गई है।”

     

    “किसे?”

     

    पिता ने उत्तर नहीं दिया।

     

    तभी जंगल के भीतर से घंटी बजी।

     

    टन…

     

    पिता का चेहरा बदल गया।

     

    “भागो।”

     

    “लेकिन—”

     

    “भागो!”

     

    उनकी आवाज़ अचानक इतनी तेज़ थी कि हारुतो पीछे हट गया।

     

    जंगल से कोई चीज़ उनकी तरफ आ रही थी।

     

    पेड़ों के बीच एक काली आकृति दिखाई दी।

     

    लंबे हाथ।

     

    झुका हुआ शरीर।

     

    और हाथ में वही लोहे की घंटी।

     

    शिनिगामी।

     

    हारुतो के पिता ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे, तो जवाब मत देना।”

     

    दोनों गाँव की तरफ भागने लगे।

     

    पीछे से घंटी लगातार बज रही थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    हर घंटी के साथ गाँव का एक घर अंधेरे में डूबता जा रहा था।

     

    पहले मंदिर की बत्तियाँ बुझीं।

     

    फिर स्कूल।

     

    फिर गाँव के घर।

     

    एक-एक करके पूरा गाँव अंधेरे में डूब गया।

     

    कुछ ही मिनटों में पूरा कुरोमोरी काली धुंध में घिर चुका था।

     

    पिता हारुतो को गाँव के पुराने मंदिर में ले गए।

     

    मंदिर का दरवाज़ा बंद करते हुए उन्होंने कहा,

     

    “यह जगह कुछ समय के लिए उसे रोक सकती है।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “आपको यह सब कैसे पता है?”

     

    पिता चुप रहे।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    पिता ने उसकी ओर देखा।

     

    “मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

     

    “नहीं!”

     

    हारुतो की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “मेरे पिता की मौत 2014 में हो चुकी थी।”

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर उसके पिता ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हें सच पता चल गया।”

     

    मंदिर के अंदर एक पुरानी घंटी लटकी थी।

     

    पिता ने उसे देखा।

     

    “बारह साल पहले मैं मर गया था।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “तो फिर आप…”

     

    “मैं यहाँ अपनी इच्छा से नहीं हूँ।”

     

    “कौन लाया आपको?”

     

    पिता ने धीमे स्वर में कहा,

     

    “शिनिगामी।”

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    “क्यों?”

     

    पिता ने मंदिर के फर्श पर बने एक पुराने निशान की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक गोल घेरा बना था।

     

    उसके चारों ओर जापानी अक्षरों जैसे चिन्ह खुदे थे।

     

    “हर पचास साल में शिनिगामी एक परिवार चुनता है।”

     

    “उस परिवार के किसी एक व्यक्ति को मृत्यु के बाद उसका सेवक बनना पड़ता है।”

     

    हारुतो ने डरते हुए पूछा,

     

    “और हमारा परिवार?”

     

    पिता ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “हमारा परिवार पिछले सौ साल से चुना जा रहा है।”

     

    तभी मंदिर के बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

     

    ठक…

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    फिर दूसरी दस्तक।

     

    ठक… ठक…

     

    पिता ने हारुतो के मुँह पर उंगली रख दी।

     

    बाहर से दादी की आवाज़ आई।

     

    “हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”

     

    हारुतो ने राहत की साँस ली।

     

    “दादी!”

     

    वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “वह दादी हैं!”

     

    पिता ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    बाहर से फिर आवाज़ आई।

     

    “हारुतो… मैं हूँ।”

     

    हारुतो दरवाज़े के पास गया और नीचे की दरार से बाहर देखने लगा।

     

    उसे दादी के पैर दिखाई दिए।

     

    वह वहीं खड़ी थीं।

     

    लेकिन…

     

    उनके पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    बाहर खड़ी चीज़ अचानक हँसने लगी।

     

    फिर दादी की आवाज़ बदल गई।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत कुछ बता दिया।”

     

    दरवाज़े पर एक लंबी काली उँगली दिखाई दी।

     

    “लेकिन एक बात नहीं बताई…”

     

    पिता का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    काली उँगली धीरे-धीरे दरवाज़े पर ऊपर की तरफ चलने लगी।

     

    “तुम्हारे परिवार को शिनिगामी ने क्यों चुना।”

     

    हारुतो ने पिता की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    पिता ने आँखें बंद कर लीं।

     

    बाहर से आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पूर्वजों ने…”

     

    एक लंबी खामोशी हुई।

     

    फिर दरवाज़े के पीछे से फुसफुसाहट आई—

     

    “पहले शिनिगामी को बनाया था।”

     

    मंदिर के अंदर अचानक सारी मोमबत्तियाँ जल उठीं।

     

    और सामने रखी बुद्ध की मूर्ति के पीछे…

     

    एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    हारुतो ने उसे पहले कभी नहीं देखा था।

     

    दरवाज़े पर खून से एक ही वाक्य लिखा था—

     

    “जिसने शिनिगामी को जन्म दिया, उसका अंतिम वंशज ही उसे खत्म कर सकता है।”

     

    हारुतो ने काँपते हुए पूछा,

     

    “अंतिम वंशज कौन है?”

     

    उसके पिता ने उसकी तरफ देखा।

     

    और पहली बार…

     

    उनकी आँखों में डर दिखाई दिया।

     

    “तुम।”

     

    उसी पल मंदिर की घंटी अपने-आप बज उठी।

     

    टन…

     

    और दूर जंगल से किसी ने चीखकर कहा—

     

    “हारुतो!!!”

     

    तीसरी घंटी बजते ही मंदिर की सारी खिड़कियाँ टूट गईं।

     

    काली धुंध अंदर भरने लगी।

     

    और उस धुंध के बीच…

     

    एक बहुत लंबी आकृति धीरे-धीरे मंदिर के अंदर प्रवेश कर गई।

     

    उसके चेहरे पर इस बार कोई आँखें नहीं थीं।

     

    लेकिन वह सीधे हारुतो को देख रही थी।

     

    शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    और उसकी हथेली पर एक नया नाम उभर आया—

     

    “हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 शिनिगामी 😱( मौत का संदेशवाहक )😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    जापान के एक छोटे-से पहाड़ी गाँव कुरोमोरी में सूरज ढलने के बाद कोई घर से बाहर नहीं निकलता था।

     

    गाँव के चारों तरफ घना जंगल था। उस जंगल के पेड़ इतने पुराने थे कि उनकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी जंगल के भीतर अजीब-सी धुंध रहती थी।

     

    लेकिन गाँव की सबसे डरावनी चीज़ जंगल नहीं था।

     

    वह थी…

     

    रात के बारह बजे बजने वाली घंटी।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि अगर किसी ने आधी रात को जंगल की तरफ से घंटी की आवाज़ सुन ली, तो अगले तीन दिनों के भीतर किसी की मौत निश्चित होती है।

     

    और अगर घंटी तीन बार बजे…

     

    तो मरने वाला इंसान नहीं होता।

     

    वह कोई ऐसी चीज़ होती थी, जिसे इंसानों की दुनिया में होना ही नहीं चाहिए।

     

    गाँव में रहने वाला सत्रह वर्षीय हारुโต इन बातों को अंधविश्वास समझता था।

     

    उसका पिता शहर में काम करता था और उसकी माँ की कई साल पहले मृत्यु हो चुकी थी। हारुतो अपनी दादी के साथ रहता था।

     

    एक रात तेज़ बारिश हो रही थी।

     

    हवा खिड़कियों से टकरा रही थी।

     

    दादी ने घर की सारी खिड़कियाँ बंद करते हुए कहा,

     

    “आज रात दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    हारुतो किताब पढ़ते हुए हँसा।

     

    “दादी, फिर वही कहानी?”

     

    दादी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

     

    “यह कहानी नहीं है।”

     

    हारुतो चुप हो गया।

     

    दादी धीरे से उसके पास आईं और बोलीं,

     

    “आज से ठीक पचास साल पहले… इसी रात… गाँव में पहली बार वह घंटी बजी थी।”

     

    “और?”

     

    “उस रात मेरे पिता गायब हुए थे।”

     

    हारुतो ने किताब बंद कर दी।

     

    “गायब?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “उनकी लाश कभी नहीं मिली।”

     

    कुछ पल के लिए कमरे में सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई देती रही।

     

    तभी…

     

    टन…

     

    हारुतो का दिल धक से रह गया।

     

    दादी के हाथ से लालटेन लगभग गिर गई।

     

    दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    फिर…

     

    टन…

     

    दूसरी घंटी।

     

    दादी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उन्होंने फुसफुसाकर कहा,

     

    “खिड़की के पास मत जाना।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “लेकिन घंटी कहाँ से—”

     

    टन…

     

    तीसरी घंटी।

     

    कमरे की लालटेन अचानक बुझ गई।

     

    पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

     

    दादी काँपने लगीं।

     

    “वह आ गया…”

     

    हारुतो ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    “कौन?”

     

    दादी ने काँपते हुए कहा,

     

    “शिनिगामी।”

     

    जापानी लोककथाओं में शिनिगामी को मृत्यु से जुड़ी आत्मिक सत्ता माना जाता है।

     

    लेकिन कुरोमोरी के लोगों के लिए शिनिगामी सिर्फ मौत का देवता नहीं था।

     

    वह मौत का चुनाव करने वाला था।

     

    दादी ने हारुतो का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे… तो जवाब मत देना।”

     

    “और अगर मैं जवाब दे दूँ?”

     

    दादी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो वह तुम्हें देख लेगा।”

     

    अचानक बाहर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छपाक…

     

    बारिश में कोई नंगे पैर चल रहा था।

     

    छपाक… छपाक…

     

    आवाज़ घर के सामने आकर रुक गई।

     

    हारुतो की साँसें तेज़ हो गईं।

     

    फिर दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दादी ने हारुतो का मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया।

     

    बाहर से आवाज़ आई।

     

    “हारुतो…”

     

    उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    वह आवाज़ उसकी माँ की थी।

     

    वही आवाज़…

     

    जो उसने दस साल से नहीं सुनी थी।

     

    “हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”

     

    उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “माँ…?”

     

    दादी ने उसका मुँह और कसकर दबा दिया।

     

    “नहीं!”

     

    बाहर से फिर आवाज़ आई।

     

    “बेटा… मुझे बहुत ठंड लग रही है।”

     

    हारुतो दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा।

     

    दादी ने उसे पीछे खींच लिया।

     

    “वह तुम्हारी माँ नहीं है!”

     

    अचानक बाहर की आवाज़ बदल गई।

     

    अब वह भारी और खुरदरी थी।

     

    “तो तुमने उसे पहचान लिया…”

     

    दरवाज़े के नीचे से काला पानी अंदर आने लगा।

     

    लेकिन वह पानी बारिश का नहीं था।

     

    उसमें से सड़ी हुई मिट्टी और लोहे जैसी गंध आ रही थी।

     

    हारुतो ने मोबाइल नीचे किया।

     

    दरवाज़े के दूसरी तरफ दो लंबे पैर दिखाई दे रहे थे।

     

    लेकिन…

     

    उन पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।

     

    दादी ने फुसफुसाकर मंत्र जैसा कुछ बोलना शुरू किया।

     

    अचानक दरवाज़े पर जोरदार प्रहार हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरा घर हिल गया।

     

    फिर दूसरा प्रहार।

     

    धड़ाम!

     

    तीसरे प्रहार के बाद दरवाज़े पर एक लंबी काली दरार बन गई।

     

    उस दरार के भीतर से एक आँख दिखाई दी।

     

    लाल…

     

    बिल्कुल लाल।

     

    हारुतो चीखने ही वाला था कि दादी ने उसे खींचकर पुराने तहखाने में पहुँचा दिया।

     

    उन्होंने फर्श के नीचे छिपा एक लकड़ी का दरवाज़ा खोला।

     

    “अंदर जाओ!”

     

    “आप?”

     

    “मैं उसके लिए हूँ।”

     

    हारुतो ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं!”

     

    दादी ने उसे धक्का देकर अंदर कर दिया।

     

    “जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”

     

    लकड़ी का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    अंदर घुप्प अंधेरा था।

     

    हारुतो ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    तहखाने की दीवारों पर सैकड़ों नाम लिखे थे।

     

    केंजी।

     

    मासाओ।

     

    युकी।

     

    अकीरा।

     

    कुछ नामों पर लाल निशान बने थे।

     

    सबसे नीचे एक नया नाम लिखा था।

     

    हारुतो।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    “यह… यहाँ किसने लिखा?”

     

    तभी उसके पीछे से किसी ने धीरे से फुसफुसाया,

     

    “तुम्हारी दादी ने।”

     

    हारुतो पलटा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    उसका मोबाइल अपने-आप बंद हो गया।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने के दूसरे छोर से एक आदमी की धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    “हारुतो…”

     

    वह पीछे हटने लगा।

     

    अंधेरे में एक लंबी आकृति खड़ी थी।

     

    काले कपड़े।

     

    बहुत लंबे हाथ।

     

    सफेद चेहरा।

     

    और आँखों की जगह दो गहरे काले गड्ढे।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी लोहे की घंटी थी।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    टन…

     

    घंटी बजी।

     

    हारुतो के कानों में अचानक हजारों लोगों की चीखें सुनाई देने लगीं।

     

    आकृति उसके सामने आकर रुक गई।

     

    फिर उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाया था…”

     

    हारुतो काँपने लगा।

     

    “क्या…?”

     

    शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    “लेकिन अब… तुम्हारी बारी है।”

     

    हारुतो ने पीछे हटते हुए दीवार को छुआ।

     

    तभी उसकी उँगलियाँ किसी ठंडी चीज़ से टकराईं।

     

    एक पुरानी तस्वीर।

     

    उसने मोबाइल दोबारा चालू किया।

     

    तस्वीर में गाँव के लगभग बीस लोग खड़े थे।

     

    बीच में उसकी दादी थीं।

     

    उनके पास एक जवान आदमी खड़ा था।

     

    हारुतो ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    वह आदमी…

     

    उसका पिता था।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

     

    1976

     

    हारुतो के हाथ काँपने लगे।

     

    उसका पिता तो 1989 में पैदा हुआ था।

     

    तभी तस्वीर में खड़ा उसका पिता धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा।

     

    हारुतो ने तस्वीर गिरा दी।

     

    शिनिगामी गायब था।

     

    लेकिन तहखाने की दीवार पर एक नई आवाज़ गूँजी—

     

    टन…

     

    फिर फुसफुसाहट आई।

     

    “भागो, हारुतो…”

     

    “क्योंकि अगली घंटी तुम्हारे लिए नहीं…”

     

    कुछ पल की खामोशी।

     

    फिर…

     

    “तुम्हारे पिता के लिए है।”

     

    उसी क्षण ऊपर से दादी की चीख सुनाई दी।

     

    और उसके बाद…

     

    घर के बाहर किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूतिया गुड़िया (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    सब कुछ अचानक बदल चुका था।

     

    पुरानी काली हवेली अब नई दिखाई दे रही थी।

     

    दीवारों पर दीपक जल रहे थे।

     

    आँगन में एक बच्ची खेल रही थी।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके पास लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी।

     

    लेकिन कुछ ही दूरी पर एक और बच्ची खड़ी थी।

     

    वह तारा थी।

     

    तारा की आँखों में डर था।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    एक कमरे से किसी आदमी की आवाज़ आ रही थी।

     

    “तुम दोनों में से एक ही इस घर की वारिस होगी।”

     

    यह रुद्र प्रताप की आवाज़ थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़ा।

     

    दरवाज़े के पीछे रुद्र प्रताप खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी काली किताब थी।

     

    वह कुछ मंत्र पढ़ रहा था।

     

    आरव समझ गया कि यह सिर्फ किसी बच्ची की हत्या की कहानी नहीं थी।

     

    इसके पीछे कोई भयानक रहस्य था।

     

    तभी सावित्री कमरे में आई।

     

    “आप ये क्या कर रहे हैं?”

     

    रुद्र ने किताब बंद कर दी।

     

    “जिसे मैंने शुरू किया है, उसे पूरा करना होगा।”

     

    “लेकिन ये हमारी बेटियाँ हैं!”

     

    रुद्र ने ठंडी आवाज़ में कहा, “बेटियाँ नहीं… रास्ता हैं।”

     

    आरव ने किताब के पन्नों पर नजर डाली।

     

    उसमें लिखा था कि हवेली के नीचे एक प्राचीन शक्ति बंद थी। उसे जगाने के लिए एक मासूम बच्चे की आत्मा चाहिए थी।

     

    रुद्र ने मीरा को चुना था।

     

    लेकिन तारा ने उसे देख लिया था।

     

    इसीलिए उसने तारा को कुएँ में धकेल दिया।

     

    लेकिन योजना असफल हो गई।

     

    तारा मरने के बाद भी मीरा के पास लौट आई।

     

    रुद्र ने मीरा को उसी कमरे में बंद कर दिया।

     

    और फिर…

     

    वह रात आई।

     

    मीरा ने अपनी गुड़िया को सीने से लगाया और रोते हुए कहा—

     

    “तारा मुझे लेने आएगी।”

     

    कमरे के अंदर अचानक ठंडी हवा चली।

     

    गुड़िया की आँखें चमक उठीं।

     

    तारा की आत्मा वहाँ प्रकट हुई।

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों बच्चियाँ एक-दूसरे से लिपट गईं।

     

    रुद्र कमरे में पहुँचा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उन्हें छुआ, वह चीख पड़ा।

     

    उसकी त्वचा काली पड़ने लगी।

     

    कमरे की दीवारों से काली परछाइयाँ निकलने लगीं।

     

    रुद्र भागने लगा।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    फिर दोनों बच्चियों की आवाज़ गूँजी—

     

    “अब तुम्हारी बारी है।”

     

    कुछ ही सेकंड में कमरा शांत हो गया।

     

    रुद्र गायब था।

     

    सिर्फ उसकी काली किताब जमीन पर पड़ी थी।

     

    आरव यह सब देख रहा था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “अब तुम समझ गए।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    मीरा और तारा उसके सामने खड़ी थीं।

     

    लेकिन अब वे डरावनी नहीं लग रही थीं।

     

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    “हमें आज़ाद करो।”

     

    आरव ने पूछा, “कैसे?”

     

    तारा ने अपनी गुड़िया की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे तोड़ना होगा।”

     

    आरव ने गुड़िया उठाई।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उसे जमीन पर पटकने की कोशिश की, उसका हाथ रुक गया।

     

    उसकी उँगलियाँ सुन्न हो गईं।

     

    गुड़िया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    फिर एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “उसे मत छूना।”

     

    कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    एक विशाल काली परछाई आरव के सामने खड़ी हो गई।

     

    वह रुद्र की आत्मा थी।

     

    “यह गुड़िया मेरी है।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    रुद्र की आत्मा ने कहा, “मैंने इसे बनाया है। इसमें मीरा की आत्मा कैद है। और तारा उसकी रखवाली करती है।”

     

    आरव ने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    परछाई हँसी।

     

    “तुम्हें लगता है ये दोनों तुम्हें आज़ाद करना चाहती हैं?”

     

    तभी मीरा चीखी—

     

    “आरव! गुड़िया तोड़ दो!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से गुड़िया को जमीन पर दे मारा।

     

    धड़ाम!

     

    गुड़िया का सिर टूट गया।

     

    एक तेज चीख पूरे घर में गूँज गई।

     

    रुद्र की परछाई पीछे हट गई।

     

    लेकिन अगले ही पल गुड़िया के टूटे हुए शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    धुआँ पूरे कमरे में फैल गया।

     

    आरव को लगा कि कोई उसके गले को दबा रहा है।

     

    तभी तारा ने मीरा का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों ने एक साथ कहा—

     

    “आज हमारा खेल खत्म होगा।”

     

    अचानक कमरे में तेज सफेद रोशनी फैल गई।

     

    रुद्र की आत्मा चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    एक पल बाद सब शांत हो गया।

     

    आरव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    जब उसकी आँखें खुलीं, वह हवेली के उसी पुराने कमरे में था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    उसके हाथ में गुड़िया का टूटा हुआ सिर था।

     

    लेकिन अब उसके चेहरे पर कोई डरावनी मुस्कान नहीं थी।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    आरव ने राहत की साँस ली।

     

    वह घर लौट आया।

     

    गाँव वालों को पूरी कहानी बताई।

     

    बूढ़े ने उसकी बात सुनकर कहा—

     

    “अब शायद दोनों बच्चियों को मुक्ति मिल गई है।”

     

    काली हवेली को बाद में पूरी तरह बंद कर दिया गया।

     

    उस कमरे को ईंटों से चुनवा दिया गया।

     

    कुछ दिनों बाद आरव शहर लौट गया।

     

    उसने उस घटना के बारे में किसी से बात नहीं की।

     

    लेकिन एक रात…

     

    लगभग तीन महीने बाद…

     

    आरव अपने कमरे में बैठा था।

     

    अचानक उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

     

    टक… टक… टक…

     

    उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फर्श पर एक छोटी-सी लाल गुड़िया पड़ी थी।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उसने गुड़िया उठाई।

     

    उसके गले में एक नया लॉकेट था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तारा।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी उसके पीछे से एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    उसने धीरे-धीरे पलटकर देखा।

     

    कमरे के कोने में मीरा खड़ी थी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    और उसके पीछे…

     

    तारा खड़ी थी।

     

    दोनों ने एक साथ कहा—

     

    “हमने कहा था ना… खेल अभी खत्म नहीं हुआ।”

     

    अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ दो जोड़ी काली आँखें चमक रही थीं।

     

    फिर एक गुड़िया की हँसी सुनाई दी—

     

    “ही… ही… ही…”

     

    और उसी रात से आरव के घर के सामने रहने वाले लोगों ने एक अजीब चीज़ देखनी शुरू कर दी।

     

    हर रात ठीक तीन बजे आरव की खिड़की में दो छोटी बच्चियाँ दिखाई देती थीं।

     

    एक लाल फ्रॉक पहने हुए।

     

    दूसरी सफेद कपड़ों में।

     

    और उनके बीच में…

     

    एक गुड़िया।

     

    कहते हैं, अगर कोई उस खिड़की की तरफ लगातार देखता रहे…

     

    तो कुछ देर बाद उन दोनों बच्चियों में से एक धीरे-धीरे अपना हाथ उठाती है…

     

    और खिड़की के शीशे पर उँगली से सिर्फ एक शब्द लिखती है—

     

    “खेलोगे?”

     

    उसके बाद वह घर कभी खाली नहीं रहता।

     

    क्योंकि जहाँ वह गुड़िया पहुँचती है…

     

    वहाँ से उसकी कहानी कभी खत्म नहीं होती।

     

    समाप्त… या शायद नहीं।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूतिया गुड़िया (part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव की आँखें खुलीं तो सुबह हो चुकी थी।

     

    उसकी माँ उसके पास बैठी थी और पिता डॉक्टर को बुलाने के लिए बाहर गए थे।

     

    आरव ने घबराकर पूछा, “गुड़िया कहाँ है?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव तुरंत उठकर कमरे में देखने लगा।

     

    मेज खाली थी।

     

    बिस्तर के नीचे कुछ नहीं था।

     

    अलमारी बंद थी।

     

    लेकिन दीवार पर लिखा हुआ वाक्य अब भी मौजूद था—

     

    “मीरा अभी घर नहीं आई है…”

     

    आरव ने काँपती आवाज़ में पूछा, “माँ, आपको ये दिखाई दे रहा है?”

     

    माँ ने सिर हिला दिया।

     

    “हाँ।”

     

    उसी समय बाहर से किसी बच्चे के हँसने की आवाज़ आई।

     

    दोनों ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    खिड़की के बाहर कोई नहीं था।

     

    आरव ने उसी दिन गाँव के बुजुर्ग से मिलने का फैसला किया।

     

    वही बूढ़ा आदमी, जिसने उसे हवेली के बारे में चेतावनी दी थी, गाँव के मंदिर के पास बैठा था।

     

    आरव उसके सामने बैठ गया।

     

    “बाबा, मुझे मीरा के बारे में बताइए।”

     

    बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तुमने उसे देख लिया?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “मैं उसकी गुड़िया घर ले आया था।”

     

    बूढ़े ने अपना माथा पकड़ लिया।

     

    “तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी।”

     

    “मीरा कौन थी?”

     

    बूढ़े ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहना शुरू किया।

     

    लगभग पचास साल पहले काली हवेली में एक परिवार रहता था—ठाकुर रुद्र प्रताप, उनकी पत्नी सावित्री और उनकी सात साल की बेटी मीरा।

     

    मीरा बहुत खुशमिजाज बच्ची थी।

     

    उसके पास एक लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी, जिसका नाम उसने खुद “गुड़िया” रखा था।

     

    लेकिन एक रात मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    पूरा गाँव उसे खोजने लगा।

     

    तीन दिन बाद हवेली के बंद कमरे से उसकी आवाज़ सुनाई दी।

     

    “माँ… मुझे बाहर निकालो…”

     

    सावित्री ने कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा बाहर से नहीं, अंदर से बंद था।

     

    जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो मीरा वहाँ नहीं थी।

     

    सिर्फ उसकी गुड़िया कमरे के बीचोंबीच रखी थी।

     

    और दीवार पर खून से लिखा था—

     

    “वह खेलना चाहती है।”

     

    उस दिन के बाद सावित्री पागल हो गई।

     

    वह हर रात कहती थी कि मीरा उसके कमरे में आती है।

     

    कुछ दिनों बाद सावित्री भी गायब हो गई।

     

    ठाकुर रुद्र प्रताप ने हवेली छोड़ दी।

     

    लेकिन जाने से पहले उन्होंने उस कमरे को हमेशा के लिए बंद कर दिया।

     

    बूढ़े ने कहानी खत्म की।

     

    आरव ने पूछा, “मीरा की मौत कैसे हुई?”

     

    बूढ़े ने धीमे स्वर में कहा, “किसी को नहीं पता।”

     

    “और गुड़िया?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “गुड़िया को कभी हवेली से बाहर नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा, “क्यों?”

     

    बूढ़े ने जवाब दिया, “क्योंकि वह गुड़िया नहीं है।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “वह मीरा का घर है।”

     

    उस रात आरव ने गुड़िया को ढूँढने का फैसला किया।

     

    वह घर के हर कमरे में खोजने लगा।

     

    अचानक उसे ऊपर की मंजिल से हँसी सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही…”

     

    वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया।

     

    गलियारे के आखिर में वही पुराना कमरा था।

     

    दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    अंदर गुड़िया कुर्सी पर बैठी थी।

     

    आरव ने दूर से ही कहा, “तुम यहाँ कैसे आई?”

     

    गुड़िया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    तभी उसके पीछे कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    कमरे में अचानक ठंड बढ़ने लगी।

     

    फिर एक बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “मेरे साथ खेलोगे?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    गुड़िया अब कुर्सी पर नहीं थी।

     

    वह कमरे के कोने में खड़ी थी।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    आरव ने दीवार पर देखा।

     

    वहाँ अचानक एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में वही गुड़िया थी।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे एक और बच्ची दिखाई दे रही थी।

     

    वह बच्ची मीरा जैसी ही दिखती थी।

     

    आरव ने तस्वीर उतार ली।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “मीरा अकेली नहीं थी।”

     

    तभी कमरे में किसी के रोने की आवाज़ गूँजी।

     

    “मुझे भी बाहर निकालो…”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    दीवार के पीछे से आवाज़ आ रही थी।

     

    उसने दीवार पर हाथ मारा।

     

    एक जगह खोखली आवाज़ आई।

     

    आरव ने पास पड़ा लोहे का डंडा उठाया और दीवार तोड़ने लगा।

     

    कुछ ही देर में दीवार में एक छोटा-सा छेद हो गया।

     

    अंदर एक पुरानी लकड़ी की पेटी थी।

     

    उसने पेटी बाहर निकाली।

     

    पेटी खोलते ही उसके अंदर पुराने कागज़, एक चाँदी की पायल और बच्चों के कई बाल मिले।

     

    सबसे नीचे एक डायरी थी।

     

    डायरी सावित्री की थी।

     

    आरव ने उसे पढ़ना शुरू किया।

     

    पहले कुछ पन्नों में मीरा के बारे में सामान्य बातें थीं।

     

    फिर एक पन्ने पर लिखा था—

     

    “रुद्र ने मुझसे झूठ बोला। मीरा कमरे में अकेली नहीं थी।”

     

    अगले पन्ने पर—

     

    “वह बच्ची मीरा की बहन थी।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    लेकिन मीरा की कोई बहन गाँव में कभी नहीं जानी गई थी।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “उसका नाम तारा था।”

     

    फिर एक और वाक्य—

     

    “रुद्र ने तारा को कुएँ में धकेल दिया।”

     

    आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तभी कमरे के बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

     

    धड़धड़धड़…

     

    फिर अचानक सन्नाटा।

     

    आरव ने गुड़िया की तरफ देखा।

     

    गुड़िया जमीन पर पड़ी थी।

     

    उसके पास दीवार पर ताजा खून से लिखा था—

     

    “मीरा नहीं… तारा।”

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुमने मेरा नाम पढ़ लिया।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    उसके सामने एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    उसके बाल चेहरे पर बिखरे थे।

     

    आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    और उसके गले में वही चाँदी की पायल थी जो पेटी में रखी थी।

     

    आरव चीख पड़ा।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    “अब तुम भी मेरे साथ खेलोगे।”

     

    अचानक कमरे की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    गुड़िया जमीन से उठकर हवा में तैरने लगी।

     

    और फिर एक साथ दो आवाज़ें आईं—

     

    “हम दोनों को घर चाहिए।”

     

    आरव ने किसी तरह दरवाज़ा खोलकर भागना शुरू किया।

     

    लेकिन नीचे पहुँचते ही उसने देखा—

     

    पूरा घर बदल चुका था।

     

    जहाँ पहले टूटी हुई हवेली थी, वहाँ अब रोशनी से भरा एक पुराना घर दिखाई दे रहा था।

     

    दीवारों पर लोग चल रहे थे।

     

    बच्चे खेल रहे थे।

     

    और बीच में मीरा और तारा खड़ी थीं।

     

    आरव समझ गया—

     

    वह वर्तमान में नहीं था।

     

    वह उस रात में पहुँच चुका था…

     

    जिस रात दोनों बच्चियाँ गायब हुई थीं।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱भूतिया गुड़िया 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव देवगढ़ में एक पुरानी हवेली थी। गाँव के लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे। हवेली लगभग सौ साल पुरानी थी और पिछले बीस वर्षों से पूरी तरह खाली पड़ी थी।

     

    कहते थे कि उस हवेली में रात के समय किसी बच्ची के रोने की आवाज़ आती थी।

     

    कभी किसी को ऊपर की मंजिल पर किसी के चलने की आहट सुनाई देती, तो कभी बंद खिड़कियों के पीछे से एक छोटी बच्ची का चेहरा दिखाई देता।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात थी—वह गुड़िया।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि हवेली के अंदर एक पुरानी गुड़िया रखी थी। वह साधारण गुड़िया नहीं थी। उसकी आँखें काँच की थीं, लेकिन रात में वे आँखें खुद-ब-खुद घूमती थीं।

     

    लोगों का मानना था कि जिस दिन वह गुड़िया हवेली से बाहर निकली, उस दिन देवगढ़ में एक भयानक अनहोनी हुई थी।

     

    कई सालों तक कोई हवेली के पास तक नहीं गया।

     

    लेकिन फिर एक दिन शहर से आरव अपने माता-पिता के साथ देवगढ़ आया।

     

    आरव की उम्र पच्चीस साल थी। वह पुराने मकानों और ऐतिहासिक जगहों की तस्वीरें खींचने का शौकीन था। उसके पिता ने गाँव के पास एक पुराना पुश्तैनी मकान खरीदा था, इसलिए परिवार कुछ समय के लिए देवगढ़ आया था।

     

    गाँव में आते ही आरव ने काली हवेली के बारे में सुना।

     

    उसने चाय की दुकान पर बैठे बूढ़े आदमी से पूछा, “बाबा, लोग उस हवेली में जाते क्यों नहीं?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि जो वहाँ गया है, वह पहले जैसा वापस नहीं आया।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “बाबा, ये सब गाँव की कहानियाँ हैं।”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “कहानियाँ नहीं हैं बेटा। चेतावनी हैं।”

     

    आरव ने बात मज़ाक में टाल दी।

     

    उस रात लगभग ग्यारह बजे आरव अपने कमरे में बैठा तस्वीरें देख रहा था। तभी उसे खिड़की के बाहर से किसी बच्ची के हँसने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही…”

     

    आरव ने तुरंत खिड़की खोली।

     

    बाहर अंधेरा था।

     

    दूर काली हवेली दिखाई दे रही थी।

     

    उसी समय उसे हवेली की दूसरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।

     

    आरव की आँखें सिकुड़ गईं।

     

    “वहाँ कोई है?”

     

    रोशनी कुछ सेकंड बाद गायब हो गई।

     

    अगली सुबह आरव ने तय कर लिया कि वह हवेली के अंदर जाएगा।

     

    दोपहर में वह कैमरा लेकर हवेली पहुँच गया।

     

    हवेली का मुख्य दरवाज़ा जंग लगा हुआ था। आरव ने जैसे ही उसे धक्का दिया, दरवाज़ा अपने आप चरमराते हुए खुल गया।

     

    अंदर धूल की मोटी परत थी।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। कई चित्रों के चेहरे खुरचे हुए थे।

     

    आरव तस्वीरें लेने लगा।

     

    तभी उसे ऊपर से कुछ गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव रुक गया।

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    सीढ़ियों पर उसे छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    धूल पर बने वे निशान किसी बच्चे के थे।

     

    आरव ने कैमरे से उनकी तस्वीर खींची।

     

    जैसे ही वह ऊपर पहुँचा, गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    दरवाज़े पर मोटी लोहे की जंजीर लगी थी।

     

    लेकिन जंजीर जमीन पर पड़ी थी।

     

    दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।

     

    आरव ने दरवाज़ा धक्का देकर खोला।

     

    कमरा अंधेरा था।

     

    उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    कमरे में पुराने खिलौने पड़े थे।

     

    टूटी हुई गाड़ियाँ।

     

    लकड़ी के घोड़े।

     

    एक पुराना पालना।

     

    और कमरे के बीच में एक छोटी-सी कुर्सी।

     

    उस कुर्सी पर बैठी थी—

     

    एक गुड़िया।

     

    गुड़िया बेहद पुरानी थी।

     

    उसके सुनहरे बाल कंधों तक थे। उसने लाल रंग की पुरानी फ्रॉक पहन रखी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    लेकिन उसकी सबसे डरावनी चीज़ थीं उसकी आँखें।

     

    दो बड़ी काली आँखें।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    गुड़िया के गले में एक छोटा-सा लॉकेट था।

     

    लॉकेट पर लिखा था—

     

    “मीरा”

     

    आरव ने कैमरा निकाला और उसकी तस्वीर खींची।

     

    कैमरे की स्क्रीन देखते ही वह चौंक गया।

     

    तस्वीर में गुड़िया कुर्सी पर नहीं थी।

     

    वह कैमरे की तरफ देखकर खड़ी थी।

     

    आरव ने दोबारा असली गुड़िया की तरफ देखा।

     

    गुड़िया अभी भी कुर्सी पर बैठी थी।

     

    उसने कैमरे की स्क्रीन फिर देखी।

     

    अब तस्वीर में गुड़िया गायब थी।

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी पीछे से किसी बच्ची की आवाज़ आई।

     

    “मेरी गुड़िया मुझे दे दो…”

     

    आरव बिजली की तरह पलटा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने गुड़िया उठाई और तेजी से कमरे से बाहर निकल आया।

     

    घर पहुँचकर उसने गुड़िया को अपने कमरे की मेज पर रख दिया।

     

    उसकी माँ ने पूछा, “ये कहाँ से लाए?”

     

    “पुरानी हवेली से मिली है। बहुत सुंदर है।”

     

    माँ का चेहरा अचानक उतर गया।

     

    “इसे वापस रख आओ।”

     

    आरव हँसते हुए बोला, “माँ, आप भी गाँव वालों की बातों पर विश्वास करने लगीं?”

     

    माँ ने गुड़िया को ध्यान से देखा।

     

    “इसके गले में क्या लिखा है?”

     

    “मीरा।”

     

    माँ कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “आरव… इसे रात में कमरे से बाहर मत निकालना।”

     

    उस रात आरव देर तक जागता रहा।

     

    करीब दो बजे उसे लगा कि कमरे में कोई धीरे-धीरे चल रहा है।

     

    टक… टक… टक…

     

    उसने आँखें खोलीं।

     

    गुड़िया मेज पर बैठी थी।

     

    आरव ने राहत की साँस ली और फिर आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ सेकंड बाद उसे किसी के फुसफुसाने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “आरव…”

     

    उसकी आँखें खुल गईं।

     

    गुड़िया अब मेज पर नहीं थी।

     

    वह उसके बिस्तर के पास जमीन पर खड़ी थी।

     

    आरव का शरीर ठंडा पड़ गया।

     

    गुड़िया की गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घूमी।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    और फिर एक बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “तुम मुझे वापस क्यों नहीं ले गए?”

     

    आरव चीखते हुए बिस्तर से गिर पड़ा।

     

    सुबह जब उसकी माँ कमरे में आई, तो आरव बेहोश पड़ा था।

     

    लेकिन गुड़िया गायब थी।

     

    कमरे की खिड़की बंद थी।

     

    दरवाज़ा अंदर से बंद था।

     

    और दीवार पर लाल रंग से एक वाक्य लिखा था—

     

    “मीरा अभी घर नहीं आई है…”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • चोटी चुड़ैल (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अमावस्या की रात आ चुकी थी।

     

    पूरा गाँव अंधेरे में डूबा हुआ था।

     

    आसमान में चाँद का नामोनिशान नहीं था।

     

    सौरभ अपने हाथ में लाल धागा, राधिका की गुड़िया और एक छोटी-सी चाकू जैसी धारदार वस्तु लिए बरगद के पेड़ की ओर बढ़ रहा था।

     

    उसके साथ दीनानाथ बाबा भी थे।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

     

    पेड़ के पास पहुँचते ही अचानक तापमान गिर गया।

     

    सौरभ की साँस से धुआँ निकलने लगा।

     

    बाबा ने कहा—

     

    “यही जगह है।”

     

    बरगद के तने पर लाल रंग के पुराने निशान बने हुए थे।

     

    सौरभ ने गुड़िया जमीन पर रख दी।

     

    अचानक पीछे से बच्चे की हँसी सुनाई दी।

     

    “तुम आ गए।”

     

    सौरभ पलटा।

     

    राधिका पेड़ के नीचे खड़ी थी।

     

    आज उसके बाल खुले हुए थे।

     

    लाल फ्रॉक हवा में हिल रही थी।

     

    लेकिन उसका चेहरा पहले से ज्यादा डरावना था।

     

    “मुझे आजाद कर दो।”

     

    सौरभ ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    राधिका ने अपने हाथ की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारा खून।”

     

    सौरभ ने अपनी हथेली पर हल्का-सा कट लगाया।

     

    खून की कुछ बूंदें गुड़िया पर गिराईं।

     

    जैसे ही पहली बूंद गिरी, जमीन काँपने लगी।

     

    बरगद के पेड़ से एक भयानक आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    काली धुंध पूरे पेड़ को घेरने लगी।

     

    बाबा पीछे हट गए।

     

    “यह ठीक नहीं हो रहा!”

     

    राधिका चीखी—

     

    “भैरवनाथ आ गया!”

     

    काली धुंध से एक विशाल आकृति बाहर निकली।

     

    लंबे बाल।

     

    काला चेहरा।

     

    और लाल चमकती आँखें।

     

    वह तांत्रिक की आत्मा थी।

     

    “तुमने मुझे फिर धोखा दिया!”

     

    राधिका काँपते हुए बोली—

     

    “आज मैं तुझसे नहीं डरूँगी।”

     

    भैरवनाथ ने हाथ उठाया।

     

    पेड़ की जड़ें जमीन से बाहर निकलकर राधिका के पैरों से लिपट गईं।

     

    सौरभ ने उसे छुड़ाने की कोशिश की।

     

    लेकिन एक अदृश्य ताकत ने उसे पीछे फेंक दिया।

     

    बाबा ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

     

    भैरवनाथ ने उनकी ओर देखा।

     

    “बूढ़े… तुम्हारी वजह से ही यह आत्मा अब तक जीवित है।”

     

    बाबा जमीन पर गिर पड़े।

     

    सौरभ ने लाल धागा उठाया।

     

    उसे याद आया कि डायरी में लिखा था—

     

    “जिसे बाँधा गया है, उसे उसी बंधन से मुक्त किया जा सकता है।”

     

    उसने लाल धागा बरगद की जड़ पर बाँध दिया।

     

    भैरवनाथ चीख उठा।

     

    “नहीं!”

     

    सौरभ ने धागे को कसकर खींचा।

     

    राधिका की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “सौरभ… मुझे याद है।”

     

    “क्या?”

     

    “जिस रात मैं मरी थी… तुम्हारे दादा मुझे बचाना चाहते थे।”

     

    सौरभ स्तब्ध रह गया।

     

    “लेकिन बाबा ने कहा था कि उन्होंने तुम्हें धोखा दिया।”

     

    राधिका ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “तांत्रिक ने सबको धोखा दिया था।”

     

    भैरवनाथ गरजा—

     

    “चुप!”

     

    राधिका चीख पड़ी।

     

    “मेरे मरने के बाद तुम्हारे दादा ने मुझे बचाने की कोशिश की थी। उन्होंने तांत्रिक को रोकने के लिए अपनी जान दे दी।”

     

    सौरभ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो फिर मेरे परिवार का दोष क्या था?”

     

    राधिका ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डर।”

     

    “डर?”

     

    “उन्होंने सच सामने लाने की हिम्मत नहीं की।”

     

    कुछ पल के लिए सब शांत हो गया।

     

    फिर भैरवनाथ ने सौरभ की ओर झपट्टा मारा।

     

    सौरभ जमीन पर गिर गया।

     

    उसकी हथेली से खून निकल रहा था।

     

    खून की एक बूंद बरगद की जड़ पर गिरी।

     

    अचानक पूरा पेड़ लाल रोशनी से चमक उठा।

     

    राधिका चीखी—

     

    “यही है!”

     

    सौरभ ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे खून ने बंधन तोड़ दिया है!”

     

    पेड़ की जड़ें टूटने लगीं।

     

    भैरवनाथ पीछे हटने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    राधिका उसके सामने आ गई।

     

    “आज मेरी मौत का हिसाब होगा।”

     

    भैरवनाथ ने उसे पकड़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन राधिका ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों के चारों तरफ काली आग जलने लगी।

     

    कुछ ही क्षणों में भैरवनाथ की चीख पूरे जंगल में गूँज उठी।

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    राधिका जमीन पर खड़ी थी।

     

    अब उसका चेहरा डरावना नहीं था।

     

    वह एक सामान्य छोटी बच्ची जैसी लग रही थी।

     

    उसने सौरभ को देखा और मुस्कुराई।

     

    “धन्यवाद।”

     

    सौरभ ने पूछा—

     

    “अब तुम चली जाओगी?”

     

    राधिका ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “फिर कभी नहीं आओगी?”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “अगर कोई मुझे याद रखेगा, तो मैं कभी पूरी तरह नहीं जाऊँगी।”

     

    इतना कहकर उसके शरीर से हल्की सफेद रोशनी निकलने लगी।

     

    कुछ ही सेकंड में वह रोशनी आसमान में विलीन हो गई।

     

    बरगद का पेड़ सूखकर गिर पड़ा।

     

    सुबह गाँव वालों ने देखा कि वर्षों से बंद पड़ा मंदिर भी टूट चुका था।

     

    दीनानाथ बाबा ने सबको राधिका की पूरी कहानी बताई।

     

    गाँव वालों ने बरगद के पास उसकी याद में एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया।

     

    कुछ महीनों तक सब ठीक रहा।

     

    सौरभ भी अपनी सामान्य जिंदगी में लौट आया।

     

    लेकिन एक रात…

     

    वह अपने कमरे में सो रहा था।

     

    समय था—

     

    3:03 AM

     

    अचानक उसकी खिड़की पर आवाज हुई।

     

    टक… टक…

     

    सौरभ की आँख खुल गई।

     

    उसने धीरे से खिड़की की तरफ देखा।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फिर आवाज आई—

     

    टक… टक… टक…

     

    सौरभ बिस्तर से उठा।

     

    खिड़की के शीशे पर भाप जमने लगी।

     

    धीरे-धीरे उस पर छोटे अक्षर दिखाई देने लगे।

     

    “सौरभ…”

     

    उसका दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    फिर एक और शब्द लिखा—

     

    “पीछे देखो।”

     

    सौरभ ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के कोने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    लंबे बाल।

     

    लेकिन इस बार वह राधिका नहीं थी।

     

    उस बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं राधिका नहीं हूँ।”

     

    सौरभ के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।

     

    “तो तुम कौन हो?”

     

    बच्ची ने सिर टेढ़ा किया।

     

    “मैं उसकी छोटी बहन हूँ।”

     

    सौरभ ने घबराकर पूछा—

     

    “लेकिन राधिका की कोई बहन नहीं थी!”

     

    बच्ची की मुस्कान और चौड़ी हो गई।

     

    उसकी आँखें धीरे-धीरे काली होने लगीं।

     

    “अब है।”

     

    कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    अंधेरे में उसकी आवाज गूँजी—

     

    “और मेरी कहानी अभी शुरू हुई है।”

     

    फिर…

     

    टक… टक… टक…

     

    खिड़की पर दस्तक हुई।

     

    सौरभ ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं…

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन उसकी मेज पर एक नई लाल फ्रॉक रखी थी।

     

    उस फ्रॉक के ऊपर एक कागज पड़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगली अमावस्या को मिलना, सौरभ।”

     

    और नीचे एक छोटी-सी मुस्कान बनी थी।

     

    “तुम्हारी नई चुड़ैल।”

     

    End

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • चोटी चुड़ैल (part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    सौरभ ने दीनानाथ बाबा की बात सुनकर पूछा—

     

    “मेरे परिवार को जानता है?”

     

    बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बाहर फिर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सौरभ दरवाजे की तरफ बढ़ा।

     

    बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    “लेकिन बाहर कौन है?”

     

    “वही… जिसका नाम लेना भी ठीक नहीं।”

     

    अचानक बाहर से एक बच्चे की आवाज आई—

     

    “सौरभ…”

     

    सौरभ जम गया।

     

    वही छोटी लड़की।

     

    “मुझे पता है तुम अंदर हो।”

     

    फिर हँसी सुनाई दी।

     

    “बाहर आओ।”

     

    बाबा ने कमरे की सारी लाइटें बंद कर दीं।

     

    कुछ देर बाद दस्तक बंद हो गई।

     

    सौरभ ने पूछा—

     

    “बाबा, राधिका को किसने मारा था?”

     

    बाबा ने गहरी साँस ली।

     

    “करीब बीस साल पहले इस गाँव में एक तांत्रिक आया था। उसका नाम भैरवनाथ था।”

     

    “तांत्रिक?”

     

    “हाँ। वह दावा करता था कि वह आत्माओं को बुला सकता है।”

     

    बाबा ने बताया कि राधिका के माता-पिता बहुत गरीब थे। एक रात राधिका अचानक गायब हो गई।

     

    गाँव वालों ने खोज शुरू की।

     

    अगली सुबह वह बरगद के पेड़ के पास मिली।

     

    लेकिन उसके शरीर पर चोट के निशान थे।

     

    गाँव के लोगों ने तांत्रिक पर शक किया।

     

    लेकिन वह उसी रात गाँव छोड़कर चला गया।

     

    “फिर लोग राधिका को चुड़ैल क्यों कहने लगे?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “क्योंकि उसकी आत्मा शांत नहीं हुई।”

     

    “क्या उसने लोगों को नुकसान पहुँचाया?”

     

    “नहीं।”

     

    सौरभ चौंका।

     

    “फिर?”

     

    “वह सिर्फ उन लोगों के सामने आती थी जो उसकी मौत का सच जानते थे।”

     

    सौरभ को कुछ याद आया।

     

    “आप सच जानते हैं?”

     

    बाबा ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    “क्या हुआ था उस रात?”

     

    बाबा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैं वहाँ था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “मैंने देखा था कि राधिका को तांत्रिक के पास ले जाया गया था।”

     

    “किसने?”

     

    बाबा ने सौरभ की ओर देखा।

     

    “तुम्हारे दादा ने।”

     

    सौरभ पीछे हट गया।

     

    “मेरे दादा?”

     

    “हाँ।”

     

    सौरभ को विश्वास नहीं हुआ।

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “तुम्हारे दादा चाहते थे कि तांत्रिक तुम्हारे पिता की बीमारी ठीक कर दे।”

     

    “और बदले में?”

     

    “तांत्रिक ने एक मासूम बच्चे की बलि माँगी।”

     

    सौरभ की आँखें फैल गईं।

     

    “नहीं…”

     

    “राधिका को उसी रात वहाँ लाया गया।”

     

    बाबा की आवाज टूट गई।

     

    “लेकिन राधिका की बलि नहीं दी गई। उसने भागने की कोशिश की। तांत्रिक ने उसे पकड़ लिया।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं डर गया था। मैं भाग आया।”

     

    कुछ देर बाद सौरभ ने पूछा—

     

    “मेरे दादा?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “वह भी अगले दिन गायब हो गए।”

     

    तभी कमरे के कोने से छोटी लड़की की हँसी सुनाई दी।

     

    दोनों ने उधर देखा।

     

    राधिका खड़ी थी।

     

    वह सौरभ को देख रही थी।

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे मारा नहीं था।”

     

    सौरभ ने धीरे से पूछा—

     

    “तो फिर किसने?”

     

    राधिका ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उंगली गाँव के पुराने मंदिर की तरफ थी।

     

    “वहाँ।”

     

    अगले ही पल वह गायब हो गई।

     

    सौरभ और बाबा मंदिर की ओर निकल पड़े।

     

    मंदिर वर्षों से बंद पड़ा था।

     

    दरवाजा खोलते ही अंदर से सड़ी हुई गंध आई।

     

    दीवारों पर पुराने तांत्रिक चिन्ह बने थे।

     

    एक कोने में लकड़ी का संदूक रखा था।

     

    सौरभ ने संदूक खोला।

     

    अंदर एक पुरानी डायरी थी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    भैरवनाथ।

     

    सौरभ ने डायरी खोली।

     

    पहले कुछ पन्नों पर अजीब मंत्र और तंत्र की बातें थीं।

     

    फिर एक जगह राधिका का नाम लिखा था।

     

    “यह लड़की मेरी साधना के लिए उपयुक्त है।”

     

    सौरभ के हाथ काँपने लगे।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “लेकिन बलि पूरी नहीं हुई।”

     

    और आखिरी पन्ने पर—

     

    “उसकी आत्मा को बरगद से बाँध दिया गया है।”

     

    सौरभ ने बाबा की तरफ देखा।

     

    “इसका मतलब?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “राधिका की आत्मा उस पेड़ से बंधी है।”

     

    “उसे मुक्त कैसे किया जाए?”

     

    बाबा ने डायरी के आखिरी पन्ने को देखा।

     

    उसमें तीन चीजें लिखी थीं—

     

    लाल धागा।

    राधिका की गुड़िया।

    और उस व्यक्ति का खून जिसने उसे धोखा दिया।

     

    सौरभ समझ गया।

     

    “जिसने उसे धोखा दिया… वह मेरे दादा थे?”

     

    बाबा ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन वे तो मर चुके हैं।”

     

    तभी मंदिर के पीछे से आवाज आई—

     

    “उनका खून अभी भी जिंदा है।”

     

    सौरभ और बाबा ने पीछे देखा।

     

    राधिका वहाँ खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी गुड़िया थी।

     

    वह गुड़िया सौरभ की तरफ बढ़ाते हुए बोली—

     

    “तुम्हारे खून से ही मैं आजाद हो सकती हूँ।”

     

    सौरभ पीछे हट गया।

     

    “मेरा खून?”

     

    राधिका ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे दादा का खून तुम्हारे अंदर है।”

     

    अचानक मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    बाबा ने सौरभ को खींच लिया।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन मंदिर का दरवाजा बंद हो चुका था।

     

    दीवारों से काली परछाइयाँ निकलने लगीं।

     

    राधिका का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो गईं।

     

    उसने चीखते हुए कहा—

     

    “मुझे आजाद करो!”

     

    सौरभ ने देखा कि उसके पीछे एक लंबी काली आकृति खड़ी थी।

     

    वह राधिका से भी ज्यादा डरावनी थी।

     

    बाबा चीख पड़े—

     

    “भैरवनाथ!”

     

    वह तांत्रिक की आत्मा थी।

     

    उसने राधिका की गर्दन पकड़ ली।

     

    “तू मेरी साधना अधूरी छोड़कर भागी थी।”

     

    राधिका चीखने लगी।

     

    सौरभ ने मंदिर में पड़ा लोहे का त्रिशूल उठाया और उस काली आकृति की ओर बढ़ा।

     

    “उसे छोड़ दो!”

     

    भैरवनाथ हँसा।

     

    “तुम्हें लगता है तुम मुझे रोक सकते हो?”

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    सौरभ हवा में उठ गया।

     

    तभी राधिका ने अपनी पूरी ताकत से तांत्रिक को पीछे धकेल दिया।

     

    “भागो, सौरभ!”

     

    “लेकिन तुम?”

     

    “मैं बाद में आऊँगी।”

     

    मंदिर का दरवाजा अचानक खुल गया।

     

    सौरभ और बाबा बाहर भागे।

     

    पीछे से भयानक चीख सुनाई दी।

     

    मंदिर की दीवारें काँप रही थीं।

     

    सौरभ ने पलटकर देखा।

     

    राधिका दरवाजे पर खड़ी थी।

     

    उसने आखिरी बार कहा—

     

    “कल अमावस्या है।”

     

    “उस रात मेरा फैसला होगा।”

     

    फिर दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    बाबा ने सौरभ की तरफ देखा।

     

    “हमें कल रात बरगद के पेड़ के पास जाना होगा।”

     

    “और अगर नहीं गए?”

     

    बाबा ने डरते हुए कहा—

     

    “तो राधिका कभी आजाद नहीं होगी।”

     

    सौरभ ने पूछा—

     

    “और अगर गए?”

     

    बाबा ने दूर अंधेरे में देखा।

     

    “तो शायद हममें से कोई भी वापस नहीं आएगा।”

     

    उसी रात सौरभ के घर की दीवार पर लाल अक्षरों में तीन शब्द उभर आए—

     

    “अमावस्या का इंतजार।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 चोटी चुड़ैल 😱 part -1

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    रात के करीब बारह बज रहे थे।

     

    सौरभ अपनी बाइक से गाँव की सुनसान सड़क पर चला जा रहा था। शहर से गाँव तक का रास्ता करीब पैंतीस किलोमीटर का था, लेकिन उस रात उसे यह रास्ता पहले से कहीं ज्यादा लंबा लग रहा था।

     

    आसमान पर बादल छाए हुए थे।

     

    चाँद कभी बादलों के पीछे छिप जाता और कभी अचानक निकलकर सड़क को हल्की सफेद रोशनी से भर देता।

     

    सौरभ ने बाइक की रफ्तार थोड़ी बढ़ा दी।

     

    तभी उसकी नजर सड़क के किनारे लगे एक पुराने बरगद के पेड़ पर पड़ी।

     

    पेड़ के नीचे कोई बच्ची खड़ी थी।

     

    सौरभ ने बाइक धीमी कर दी।

     

    बच्ची की उम्र मुश्किल से आठ या नौ साल होगी।

     

    उसने लाल रंग की पुरानी-सी फ्रॉक पहन रखी थी।

     

    उसके बाल बहुत लंबे थे और चेहरा बालों से आधा ढका हुआ था।

     

    सौरभ ने बाइक रोक दी।

     

    “बेटा… इतनी रात को यहाँ अकेली क्या कर रही हो?”

     

    बच्ची ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    सौरभ ने चारों तरफ देखा।

     

    आसपास कोई घर नहीं था।

     

    सिर्फ जंगल, खेत और वह पुराना बरगद का पेड़।

     

    “तुम्हारा घर कहाँ है?”

     

    बच्ची ने धीरे से हाथ उठाया और सड़क के दूसरी तरफ इशारा किया।

     

    “वहाँ।”

     

    सौरभ ने उस दिशा में देखा।

     

    अंधेरे में एक टूटा हुआ मकान दिखाई दे रहा था।

     

    “चलो, मैं छोड़ देता हूँ।”

     

    बच्ची ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    उसने पहली बार अपना चेहरा ऊपर उठाया।

     

    उसकी आँखें बिल्कुल काली थीं।

     

    सौरभ का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    “आप मुझे घर नहीं छोड़ सकते।”

     

    “क्यों?”

     

    उसने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मेरा घर अब वहाँ नहीं है।”

     

    सौरभ कुछ समझ नहीं पाया।

     

    अचानक तेज हवा चली।

     

    पेड़ की शाखाएँ जोर-जोर से हिलने लगीं।

     

    सौरभ ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।

     

    जब उसने दोबारा देखा…

     

    बच्ची गायब थी।

     

    वहाँ सिर्फ उसकी लाल फ्रॉक का एक छोटा-सा टुकड़ा पड़ा था।

     

    सौरभ ने तुरंत बाइक स्टार्ट की और गाँव की ओर निकल गया।

     

    घर पहुँचने के बाद भी वह घटना उसके दिमाग से नहीं निकली।

     

    उसने माँ को सब कुछ बताया।

     

    माँ का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “कहाँ देखा उसे?”

     

    “पुराने बरगद के पास।”

     

    माँ कुछ सेकंड चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं—

     

    “तुमने उससे बात की?”

     

    “हाँ।”

     

    “उसने तुम्हें छुआ तो नहीं?”

     

    “नहीं।”

     

    माँ ने राहत की साँस ली।

     

    “भगवान का शुक्र है।”

     

    सौरभ ने पूछा—

     

    “आप उसे जानती हैं?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “माँ?”

     

    “उस पेड़ के पास दोबारा मत जाना।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    माँ ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि वहाँ एक छोटी लड़की मरी थी।”

     

    सौरभ चौंक गया।

     

    “कैसे?”

     

    “करीब बीस साल पहले। उसका नाम राधिका था।”

     

    “क्या हुआ था उसे?”

     

    माँ ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “कहते हैं कि वह रात में घर से निकल गई थी। सुबह उसका शव उसी बरगद के पेड़ से लटका मिला।”

     

    सौरभ की रीढ़ में ठंड दौड़ गई।

     

    “लेकिन लोग उसे चुड़ैल क्यों कहते हैं?”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि उसकी मौत के बाद गाँव में बच्चों के गायब होने की घटनाएँ शुरू हो गई थीं।”

     

    सौरभ चुप हो गया।

     

    उसी रात करीब तीन बजे उसे नींद खुली।

     

    कमरे में अजीब ठंड थी।

     

    उसने मोबाइल देखा।

     

    3:03 AM

     

    तभी खिड़की पर हल्की आवाज हुई।

     

    टक… टक…

     

    सौरभ ने ध्यान नहीं दिया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    टक… टक… टक…

     

    उसने पर्दा हटाया।

     

    खिड़की के बाहर वही छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    सौरभ के मुँह से चीख निकलते-निकलते रह गई।

     

    बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    उसने शीशे पर अपनी उंगली से कुछ लिखा।

     

    सौरभ ने गौर से देखा।

     

    शीशे पर भाप जम गई थी।

     

    और उस पर लिखा था—

     

    “मुझे ढूँढो।”

     

    सौरभ पीछे हट गया।

     

    अचानक लड़की ने अपना सिर एक तरफ झुका लिया।

     

    उसकी गर्दन असामान्य तरीके से मुड़ गई।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाया और घर के पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    सौरभ ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    वहाँ अंधेरे में एक पुराना कुआँ था।

     

    उसे अचानक लगा कि कोई उसे बुला रहा है।

     

    “सौरभ…”

     

    वह आवाज लड़की की थी।

     

    “सौरभ… मुझे वहाँ से निकालो…”

     

    सौरभ ने खिड़की बंद कर दी।

     

    सुबह जब उसने खिड़की खोली, वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान खिड़की से शुरू होकर उसके बिस्तर तक जा रहे थे।

     

    और बिस्तर के पास आकर खत्म हो रहे थे।

     

    उस रात सौरभ ने तय कर लिया कि वह इस रहस्य का पता लगाएगा।

     

    शाम होते ही वह गाँव के सबसे बुजुर्ग आदमी, दीनानाथ बाबा, के पास पहुँचा।

     

    बाबा ने राधिका का नाम सुनते ही सौरभ को घूरकर देखा।

     

    “तुमने उसे देख लिया?”

     

    “हाँ।”

     

    बाबा ने सिर झुका लिया।

     

    “फिर अब वह तुम्हें भी देख चुकी है।”

     

    “मुझे क्या करना चाहिए?”

     

    बाबा ने एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    वही लाल फ्रॉक।

     

    वही लंबे बाल।

     

    वही चेहरा।

     

    सौरभ ने तस्वीर हाथ में लेते हुए पूछा—

     

    “इसके साथ हुआ क्या था?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “राधिका चुड़ैल नहीं थी।”

     

    सौरभ ने हैरानी से पूछा—

     

    “तो फिर?”

     

    बाबा की आँखें भर आईं।

     

    “उसे चुड़ैल बनाया गया था।”

     

    “किसने?”

     

    बाबा ने जवाब नहीं दिया।

     

    तभी बाहर किसी बच्चे के हँसने की आवाज आई।

     

    दोनों ने दरवाजे की ओर देखा।

     

    दरवाजे के नीचे से एक लाल फ्रॉक का टुकड़ा अंदर सरक आया।

     

    और उसके साथ एक छोटी-सी आवाज आई—

     

    “बाबा… झूठ मत बोलो।”

     

    दीनानाथ बाबा का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उन्होंने सौरभ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    “क्यों?”

     

    बाबा ने काँपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि राधिका को मारने वाला अभी भी जिंदा है।”

     

    उसी क्षण घर के बाहर से जोरदार दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    बाबा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “और वह आदमी… तुम्हारे परिवार को जानता है।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • SATVI RAAT KA SHRAP (LAST PART-3)

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    सौरभ की नजर खिड़की पर जमी हुई थी।

     

    उसकी माँ वहाँ खड़ी थीं।

     

    लेकिन वह उसकी माँ नहीं थीं।

     

    काली आँखें।

     

    सफेद चेहरा।

     

    और होंठों पर ऐसी मुस्कान, जिसे देखकर सौरभ के शरीर का हर रोम काँप उठा।

     

    उसके पीछे उसके पिता की परछाईं खड़ी थी।

     

    “सौरभ,” आवाज आई, “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

     

    “पापा… आप?”

     

    “मैं मर चुका हूँ।”

     

    सौरभ की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “फिर आप यहाँ कैसे?”

     

    “क्योंकि मौत के बाद भी कुछ वादे खत्म नहीं होते।”

     

    “मुझे सब सच बताइए।”

     

    परछाईं कुछ देर शांत रही।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “पंद्रह साल पहले तुम्हारे पिता, आरव के पिता और कुछ दूसरे लोगों ने इस मकान में एक पुरानी रस्म के बारे में पढ़ा था। उनका मानना था कि इस रस्म से इंसान को मृत्यु से बचाया जा सकता है।”

     

    “उन्होंने क्या किया?”

     

    “उन्होंने मौत को बुलाने की कोशिश की।”

     

    सौरभ ने डरते हुए पूछा—

     

    “और?”

     

    “मौत आई… लेकिन वह किसी एक व्यक्ति को लेने नहीं आई। उसने कहा कि जिस परिवार ने उसे बुलाया है, उसकी एक पीढ़ी उसे देनी होगी।”

     

    सौरभ की साँस अटक गई।

     

    “फिर आपने क्या किया?”

     

    “हमने सौदा करने की कोशिश की।”

     

    “किसके साथ?”

     

    परछाईं ने सामने खड़ी बूढ़ी औरत की ओर देखा।

     

    “उससे।”

     

    सौरभ ने औरत की तरफ देखा।

     

    वह शांत खड़ी थी।

     

    “वह इंसान नहीं है?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर कौन है?”

     

    “मौत की रखवाली करने वाली।”

     

    बूढ़ी औरत हँसी।

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे धोखा दिया था, सौरभ। उन्होंने तुम्हें शहर भेज दिया और सोचा कि मैं तुम्हें भूल जाऊँगी।”

     

    सौरभ ने पूछा—

     

    “आपको मुझसे क्या चाहिए?”

     

    “तुम्हारा जीवन।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हारे बदले अपनी जान दी थी। लेकिन सौदा पूरा नहीं हुआ।”

     

    सौरभ के पिता की परछाईं बोली—

     

    “मैंने उसे रोकने के लिए खुद को दे दिया था। लेकिन वह जानती थी कि एक दिन तुम वापस आओगे।”

     

    “तो मैं क्या करूँ?”

     

    परछाईं ने धीरे से कहा—

     

    “मौत का दरवाजा बंद करो।”

     

    “कैसे?”

     

    “तीन दस्तकें पूरी होने से पहले।”

     

    सौरभ ने पुराने मकान की तरफ देखा।

     

    “लेकिन दो दस्तक तो हो चुकी हैं।”

     

    “हाँ।”

     

    “और तीसरी?”

     

    परछाईं ने सिर झुका लिया।

     

    “तीसरी दस्तक तुम खुद दोगे।”

     

    सौरभ समझ नहीं पाया।

     

    तभी बूढ़ी औरत ने अपनी हथेली खोली।

     

    उसमें एक पुरानी चाबी थी।

     

    “इसे लो।”

     

    सौरभ ने चाबी नहीं ली।

     

    “किसकी है?”

     

    “उस कमरे की, जिसे तुम्हारे पिता ने कभी नहीं खोला।”

     

    सौरभ ने ऊपर देखा।

     

    वही कमरा।

     

    जिसके दरवाजे पर लिखा था—

     

    “इसे कभी मत खोलना।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “अगर तुमने दरवाजा खोला, तो तुम्हें अपनी माँ मिल जाएगी।”

     

    “और अगर नहीं खोला?”

     

    “तो तुम्हारी माँ हमेशा के लिए मेरे साथ रहेगी।”

     

    सौरभ ने चाबी उठा ली।

     

    वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    हर कदम के साथ घर की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    “सौरभ…”

     

    “वापस जाओ…”

     

    “दरवाजा मत खोलना…”

     

    लेकिन वह आगे बढ़ता रहा।

     

    ऊपर पहुँचकर उसने दरवाजे में चाबी लगाई।

     

    चाबी घूम गई।

     

    दरवाजा खुला।

     

    अंदर एक छोटा-सा कमरा था।

     

    बीच में लकड़ी की कुर्सी पर उसकी माँ बैठी थीं।

     

    उनके हाथ बंधे थे।

     

    सौरभ दौड़कर उनके पास गया।

     

    “माँ!”

     

    उन्होंने सिर उठाया।

     

    “सौरभ… भाग जाओ।”

     

    “मैं आपको लेने आया हूँ।”

     

    “मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ।”

     

    सौरभ रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “सौरभ, मैं तुम्हारी माँ हूँ… लेकिन मेरे अंदर अब कुछ और भी है।”

     

    कमरे की दीवारें काँपने लगीं।

     

    पीछे से बूढ़ी औरत की आवाज आई—

     

    “अब तीसरी दस्तक का समय है।”

     

    दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    ठक…

     

    सौरभ ने दरवाजे की ओर देखा।

     

    ठक…

     

    उसकी माँ ने चीखकर कहा—

     

    “मत खोलना!”

     

    फिर तीसरी आवाज आने वाली थी।

     

    सौरभ ने अचानक पिता की डायरी याद की।

     

    “जो व्यक्ति तीसरी दस्तक के बाद दरवाजा खोलता है, वह वापस नहीं लौटता।”

     

    उसने कमरे में चारों तरफ देखा।

     

    दीवार पर वही निशान बना था, जो तस्वीर के पीछे था।

     

    एक गोल घेरे के अंदर तीन रेखाएँ।

     

    उसे समझ आया।

     

    मौत का दरवाजा कोई साधारण दरवाजा नहीं था।

     

    वह पूरा कमरा ही दरवाजा था।

     

    और उस दरवाजे को बंद करने के लिए किसी को अंदर रहना था।

     

    सौरभ ने अपनी माँ की रस्सियाँ खोल दीं।

     

    “माँ, आप बाहर जाएँ।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैं इसे खत्म करूँगा।”

     

    “नहीं!”

     

    सौरभ ने दरवाजा खोला और माँ को बाहर धकेल दिया।

     

    बूढ़ी औरत गलियारे में खड़ी थी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    “अब मेरा क्या होगा?”

     

    “तुम्हें मेरे साथ आना होगा।”

     

    सौरभ ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    अंदर पूरी तरह अंधेरा हो गया।

     

    कुछ सेकंड बाद—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीसरी दस्तक पूरी हो चुकी थी।

     

    लेकिन सौरभ ने दरवाजा नहीं खोला।

     

    वह कमरे के बीच खड़ा होकर पिता की डायरी से वह आखिरी मंत्र पढ़ने लगा, जो आखिरी पन्ने पर लिखा था।

     

    हवा तेज हो गई।

     

    दीवारों से चीखें आने लगीं।

     

    किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—

     

    “तुम अपने पिता जैसे ही हो।”

     

    सौरभ ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “लेकिन मैं उनका सौदा पूरा करने नहीं आया।”

     

    अचानक कमरे के बीच एक काला दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उसके पीछे अनगिनत चेहरे थे।

     

    कुछ बूढ़े।

     

    कुछ जवान।

     

    कुछ बच्चे।

     

    और सबसे आगे—

     

    आरव।

     

    वह सौरभ को देखकर मुस्कुराया।

     

    “अब इसे बंद कर दो।”

     

    सौरभ ने आगे बढ़कर दरवाजे को धक्का दिया।

     

    लेकिन वह बंद नहीं हुआ।

     

    तभी उसे पिता की आवाज सुनाई दी—

     

    “दरवाजा बाहर से नहीं, अंदर से बंद होता है।”

     

    सौरभ समझ गया।

     

    उसे उस दरवाजे के दूसरी तरफ जाना था।

     

    उसने आखिरी बार अपनी माँ के बारे में सोचा।

     

    फिर वह दरवाजे के अंदर चला गया।

     

    अगले ही पल—

     

    पूरा मकान हिलने लगा।

     

    बाहर खड़ी उसकी माँ ने देखा कि पुराना मकान आग के बिना ही जलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में वह धुएँ में बदल गया।

     

    सुबह तक वहाँ केवल जली हुई जमीन बची थी।

     

    सौरभ नहीं मिला।

     

    पुलिस आई।

     

    मकान की तलाशी हुई।

     

    कुछ नहीं मिला।

     

    सिर्फ एक पुरानी काली डायरी मिली।

     

    उसके आखिरी पन्ने पर एक नई लाइन लिखी थी—

     

    “दरवाजा बंद हो चुका है।”

     

    पंद्रह साल बाद तक उस कस्बे में उस मकान का नाम कोई नहीं लेता था।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    कई साल बाद, एक रात सौरभ की माँ अपने घर में अकेली बैठी थीं।

     

    रात के ठीक 2:13 बजे दरवाजे पर आवाज हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वह डर गईं।

     

    उन्होंने दरवाजे के पास जाकर पूछा—

     

    “कौन?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “सौरभ?”

     

    कुछ देर खामोशी रही।

     

    फिर बाहर से एक धीमी आवाज आई—

     

    “माँ… दरवाजा मत खोलना।”

     

    माँ पीछे हट गईं।

     

    लेकिन तभी दरवाजे के नीचे से एक पुरानी काली डायरी अंदर सरक आई।

     

    माँ ने काँपते हाथों से उसे उठाया।

     

    डायरी अपने आप खुल गई।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैंने मौत का दरवाजा बंद कर दिया था।”

     

    नीचे एक और वाक्य दिखाई दिया।

     

    स्याही अभी गीली थी।

     

    “लेकिन माँ… किसी ने अंदर से उसे फिर खोल दिया है।”

     

    और उसी क्षण—

     

    घर के अंदर, ठीक उनके पीछे…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दस्तक हुई।

     

    माँ ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के बीच एक काला दरवाजा खड़ा था।

     

    उस दरवाजे के पीछे सौरभ खड़ा था।

     

    लेकिन उसके चेहरे पर इंसानी मुस्कान नहीं थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “माँ… अब मेरी बारी खत्म हुई।”

     

    एक पल की खामोशी।

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब आपकी बारी है।”

     

     

    End

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।