हवेली की दीवारें काँप रही थीं।ऊपर की खिड़की में खड़ी वह बूढ़ी औरत लगातार मुस्कुरा रही थी।
उसकी लाल आँखें अंधेरे में किसी जलते हुए अंगारे की तरह चमक रही थीं।
नीचे तहखाने में नंदिनी, अमन, हरिदास बाबा और वीरेंद्र पत्थर की तरह खड़े थे।
किसी के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी।
वीरेंद्र की नजर अब भी ऊपर उसी बूढ़ी औरत पर थी।
उसने काँपते हुए कहा—
“दादी… आप तो तीस साल पहले मर गई थीं।”
बूढ़ी औरत ने अपना सिर टेढ़ा किया।
फिर उसकी हँसी पूरे तहखाने में गूँज उठी।
“मरी थी… लेकिन तुम लोगों के लालच ने मुझे मरने नहीं दिया।”
नंदिनी ने गौरी की आत्मा की तरफ देखा।
“क्या यही वह औरत है?”
गौरी ने धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ।”
नंदिनी ने पूछा—
“इसने तुम्हारे साथ क्या किया था?”
गौरी की आँखों में वर्षों पुराना दर्द दिखाई दिया।
“उसका नाम था भवानी।”
हरिदास बाबा ने काँपते हुए कहा—
“भवानी… भैरव सिंह की माँ।”
वीरेंद्र ने सिर झुका लिया।
गौरी ने अपनी कहानी शुरू की।
तीस साल पहले जब गाँव में बीमारी फैली थी, तब भवानी ने लोगों के डर का फायदा उठाया था।
वह तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास की बातें करके लोगों को अपने नियंत्रण में रखती थी।
भैरव सिंह जमीन हड़पता था और भवानी लोगों के मन में डर पैदा करती थी।
जिस औरत के पास जमीन होती, उसे डायन कह दिया जाता।
जिस परिवार ने विरोध किया, उसके घर के बाहर रात में अजीब निशान बना दिए जाते।
फिर पूरे गाँव में अफवाह फैलाई जाती कि उस परिवार पर डायन का साया है।
लोग डर जाते।
और आखिरकार अपनी जमीन छोड़कर गाँव से चले जाते।
गौरी ने इस षड्यंत्र को देख लिया था।
इसीलिए उसे भी डायन बना दिया गया।
लेकिन गौरी भागने में सफल हो गई।
उस रात उसने भवानी और भैरव सिंह को आपस में बात करते सुन लिया था।
वे किसी पुराने तहखाने में एक अनुष्ठान करने वाले थे।
गौरी ने उन्हें रोकने की कोशिश की।
लेकिन भवानी ने उसे पकड़ लिया।
“तुमने हमारा राज देख लिया है,” भवानी ने कहा था।
गौरी ने जवाब दिया—
“मैं पूरे गाँव को सच बता दूँगी।”
भवानी हँसी।
“गाँव वाले तुम्हारी बात नहीं मानेंगे।”
गौरी ने कहा—
“एक दिन सच सामने जरूर आएगा।”
भवानी ने उसे धमकाया।
लेकिन उसी समय मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं।
गाँव वाले उस तरफ आने लगे।
भवानी डर गई।
उसने गौरी को तहखाने में बंद कर दिया और गाँव वालों से कहा—
“गौरी डायन है। इसे पकड़ो।”
गाँव वालों ने तहखाने को घेर लिया।
लेकिन उसी रात अचानक भयंकर आग लग गई।
अराजकता में गौरी तहखाने से बाहर निकल गई।
वह बरगद के पेड़ तक पहुँची।
वहाँ उसने आखिरी बार हरिदास को देखा।
“बाबा, मुझे बचा लीजिए।”
लेकिन हरिदास डर के कारण कुछ नहीं कर पाए।
गौरी जंगल की तरफ भागी।
इसके बाद किसी ने उसे जीवित नहीं देखा।
कुछ दिनों बाद बरगद के पेड़ के पास उसकी चूड़ियाँ और खून से सना कपड़ा मिला।
गाँव वालों ने मान लिया कि वह मर चुकी है।
लेकिन सच्चाई कुछ और थी।
गौरी कई वर्षों तक जंगल में छिपकर जीवित रही।
उसने गाँव से दूर एक छोटी झोपड़ी बनाई।
वह आज भी लोगों का इलाज करती रही।
लेकिन भवानी ने उसे ढूँढ़ लिया।
और एक रात…
गौरी की हत्या कर दी गई।
उसकी आत्मा उसी बरगद के पेड़ से बंध गई।
गौरी ने कहा—
“मैंने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। मैं सिर्फ अपना सच साबित करना चाहती थी।”
नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।
“लेकिन लोग तुम्हें डायन कहते रहे।”
गौरी ने कहा—
“हाँ।”
फिर उसने भवानी की ओर देखा।
“और उसने मेरे नाम का इस्तेमाल करके डर फैलाया।”
तभी ऊपर खड़ी भवानी की आत्मा जोर से हँसी।
“क्योंकि इंसान डरना पसंद करता है।”
अचानक हवेली की दीवारों से धुआँ निकलने लगा।
भवानी नीचे उतरने लगी।
उसके पैर जमीन को छू नहीं रहे थे।
वह हवा में तैरती हुई सीढ़ियों से नीचे आई।
हर कदम के साथ दीवारों पर लगे चित्रों से औरतों की चीखें आने लगीं।
“हमें बचाओ…”
“हम निर्दोष हैं…”
“हमने कुछ नहीं किया…”
नंदिनी ने चारों तरफ देखा।
सभी चित्रों की आँखों से काले आँसू बह रहे थे।
भवानी ने हाथ उठाया।
अचानक अमन हवा में उठ गया।
“अमन!”
नंदिनी उसकी तरफ भागी।
लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने उसे पीछे फेंक दिया।
हरिदास मंत्र पढ़ने लगे।
भवानी ने उनकी ओर देखा।
“तुम!”
हरिदास काँप गए।
“मैंने क्या किया?”
भवानी हँसी।
“तुमने सच देखा था… फिर भी चुप रहे।”
हरिदास घुटनों के बल बैठ गए।
“हाँ… मेरी गलती थी।”
“मैं डर गया था।”
“लेकिन अब मैं सच बताऊँगा।”
भवानी ने जोर से चीख मारी।
पूरी हवेली हिलने लगी।
लेकिन इस बार हरिदास पीछे नहीं हटे।
उन्होंने ऊँची आवाज में कहा—
“गौरी डायन नहीं थी!”
उनकी आवाज हवेली से बाहर तक पहुँची।
गाँव के कई लोग डरते-डरते हवेली के पास पहुँच चुके थे।
हरिदास ने फिर कहा—
“गौरी निर्दोष थी!”
गाँव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
वीरेंद्र अचानक आगे आया।
उसने सबके सामने अपने परिवार का सच बता दिया।
“मेरे दादा और मेरी दादी ने गाँव की औरतों को डायन कहकर उनकी जमीन छीनी थी।”
गाँव में सन्नाटा छा गया।
वीरेंद्र ने कहा—
“मैंने भी वर्षों तक यह सच छिपाया।”
“लेकिन अब नहीं।”
उसने जमीन के सारे कागज गाँव वालों के सामने रख दिए।
“जिसकी जो जमीन थी, वह वापस मिलेगी।”
भवानी की आत्मा क्रोध से काँपने लगी।
“तुम मेरे खिलाफ जाओगे?”
वीरेंद्र ने सिर उठाकर कहा—
“हाँ।”
“क्योंकि मेरे परिवार ने जो किया, वह गलत था।”
अचानक भवानी की शक्ति और बढ़ गई।
हवेली की छत टूटने लगी।
लोग बाहर भागने लगे।
लेकिन नंदिनी वहीं खड़ी रही।
उसने गौरी की तरफ देखा।
“अब क्या करें?”
गौरी ने कहा—
“मेरा सच सामने आ गया है।”
“लेकिन भवानी?”
“उसे भी सच से ही हराया जा सकता है।”
नंदिनी ने पूछा—
“कैसे?”
गौरी ने हवेली के बीच रखी एक पुरानी पत्थर की पटिया की ओर इशारा किया।
“इसके नीचे वह चीज है जिसके लिए उसने यह सब किया।”
नंदिनी, अमन और हरिदास ने मिलकर पत्थर हटाया।
नीचे एक लोहे का संदूक मिला।
संदूक खोलते ही उसमें पुराने दस्तावेज, सोने के सिक्के और एक काली किताब मिली।
काली किताब भवानी की थी।
उसमें गाँव की हर उस औरत का नाम लिखा था जिसे उसने डायन घोषित करवाया था।
हर नाम के सामने उसकी जमीन का विवरण था।
नंदिनी ने किताब उठाकर गाँव वालों को दिखाई।
“यही है असली सबूत।”
भवानी चीखने लगी।
“उसे जला दो!”
अचानक आग की लपटें किताब की ओर बढ़ीं।
लेकिन नंदिनी ने किताब को कसकर पकड़ लिया।
गौरी उसके सामने आ खड़ी हुई।
दोनों आत्माएँ आमने-सामने थीं।
एक निर्दोष की आत्मा।
दूसरी लालच और झूठ से भरी आत्मा।
भवानी ने कहा—
“तुम मुझे नहीं हरा सकती।”
गौरी ने शांत स्वर में कहा—
“मैं तुम्हें नहीं हरा रही।”
“सच तुम्हें हरा रहा है।”
इतना सुनते ही हवेली के चारों तरफ तेज प्रकाश फैल गया।
जिन औरतों के चित्र दीवारों पर लगे थे, वे एक-एक करके दीवार से बाहर निकलने लगे।
वे सभी आत्माएँ थीं।
वे गौरी के पीछे खड़ी हो गईं।
भवानी पहली बार डर गई।
“नहीं…”
एक वृद्ध आत्मा आगे आई।
“हम सबको तुमने डायन कहा।”
दूसरी बोली—
“हमारी जमीन छीनी।”
तीसरी बोली—
“हमारे परिवार उजाड़े।”
चौथी ने कहा—
“लेकिन अब हमारा सच सामने आ चुका है।”
भवानी पीछे हटती गई।
अचानक उसके पैरों के नीचे की जमीन काली पड़ने लगी।
उसकी आत्मा कमजोर होने लगी।
वह चीखी—
“मैंने कुछ गलत नहीं किया!”
गौरी ने कहा—
“झूठ बोलना बंद करो।”
भवानी ने आखिरी बार चीख लगाई।
और फिर…
उसका शरीर राख में बदल गया।
हवेली में सन्नाटा छा गया।
अचानक गौरी की आत्मा भी प्रकाश में बदलने लगी।
नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।
“तुम जा रही हो?”
गौरी मुस्कुराई।
“हाँ।”
“अब मुझे किसी बदले की जरूरत नहीं।”
“मुझे सिर्फ यह चाहिए था कि लोग सच जानें।”
नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले।
“क्या तुम फिर कभी वापस आओगी?”
गौरी ने मुस्कुराकर कहा—
“जब तक लोग सच को याद रखेंगे, मुझे लौटने की जरूरत नहीं होगी।”
यह कहते ही गौरी धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गई।
उसकी आत्मा आसमान की ओर उठी।
और फिर पूरी तरह गायब हो गई।
उसी क्षण हवेली की पुरानी घड़ी चलने लगी।
टक… टक… टक…
चालीस वर्षों से रुकी हुई घड़ी पहली बार आगे बढ़ी।
सुबह होने लगी।
सूरज की पहली किरण हवेली की टूटी खिड़की से अंदर आई।
जहाँ रात भर अंधेरा था, वहाँ अब उजाला था।
गाँव वालों ने उस दिन से हवेली को डर की जगह नहीं, बल्कि एक सबक की जगह बना दिया।
जिन औरतों की जमीन छीनी गई थी, उनकी जमीन उनके परिवारों को वापस दी गई।
गौरी के नाम पर गाँव में एक छोटा-सा स्वास्थ्य केंद्र बनाया गया, जहाँ गरीबों का मुफ्त इलाज होने लगा।
बरगद के पेड़ के नीचे एक पत्थर लगाया गया।
उस पर लिखा था—
“गौरी — जिसे लोगों ने डायन कहा, लेकिन जिसने अंत तक इंसानियत नहीं छोड़ी।”
हरिदास बाबा ने अपनी बाकी जिंदगी गाँव के बच्चों को यही समझाने में बिताई कि किसी भी अजीब घटना को देखकर तुरंत उसे भूत, डायन या जादू मत समझो।
पहले सच खोजो।
वीरेंद्र ने अपने परिवार के अपराधों को स्वीकार किया और गाँव वालों की जमीन वापस करने में मदद की।
और नंदिनी?
वह शहर वापस चली गई।
लेकिन हर साल गौरी की बरसी पर भैरवपुर जरूर आती।
एक बार उसने बरगद के पेड़ के नीचे रात बिताई।
गाँव वाले उसे रोकते रहे।
“रात मत रुकना।”
“गौरी वापस आ सकती है।”
लेकिन नंदिनी मुस्कुराई।
“अगर वह आएगी भी तो मुझे उससे डर नहीं लगेगा।”
रात के ठीक बारह बजकर तेरह मिनट हुए।
हवा चली।
बरगद के पत्ते हिले।
नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं।
उसे बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—
“सच को कभी मरने मत देना…”
नंदिनी ने आँखें खोलीं।
सामने कोई नहीं था।
बस बरगद की एक शाखा पर सफेद चमेली के फूल खिले हुए थे।
वह मुस्कुराई।
“मैं वादा करती हूँ।”
और उसी रात पहली बार भैरवपुर में किसी ने डायन के डर से दरवाजा बंद नहीं किया।
लोग बाहर निकले।
बच्चे खेलते रहे।
मंदिर की घंटियाँ बजीं।
और वह हवेली, जो कभी डर का प्रतीक थी, अब गाँव को एक बात याद दिलाती थी—
हर डर के पीछे भूत नहीं होता।
कभी उसके पीछे कोई झूठ होता है।
कभी लालच।
कभी अज्ञान।
और कभी किसी निर्दोष के साथ किया गया अन्याय।
कहानी की सीख
किसी भी इंसान को सिर्फ अफवाह, शक या अंधविश्वास के आधार पर डायन, भूत या बुरा इंसान मान लेना बहुत बड़ा अन्याय है।
अंधविश्वास इंसान की सोचने की शक्ति छीन सकता है।
गौरी को लोगों ने बिना सच जाने डायन समझ लिया और उसके साथ अन्याय किया। असली दोषी वे लोग थे जिन्होंने डर और लालच का इस्तेमाल किया।
इसलिए हमें हमेशा याद रखना चाहिए—
“सच जानने से पहले किसी पर विश्वास या आरोप मत लगाओ।”
“डर के कारण अपनी बुद्धि मत खोओ।”
और सबसे बड़ी बात—
“किसी निर्दोष की चुप्पी को उसकी गलती मत समझो।”
क्योंकि कभी-कभी जिसे पूरी दुनिया डायन समझती है…
वह वास्तव में सबसे ज्यादा पीड़ित और सबसे ज्यादा निर्दोष इंसान होता है।
और असली राक्षस किसी सुनसान जंगल या पुरानी हवेली में नहीं…
इंसान के लालच, झूठ और अंधविश्वास के अंदर छिपा होता है।
यहीं “बहु बनी डायन” की कहानी समाप्त होती है।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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