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  • जिस भाई ने कभी राखी नहीं बँधवाई

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में सिया अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहती थी। उसके पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।

     

    सिया लोगों के घरों में काम करके माँ का पेट पालती थी।

     

    उसका एक छोटा भाई था—राजू।

     

    राजू बचपन से ही बहुत चंचल था। अपनी बहन से बहुत प्यार करता था। जब भी सिया काम से लौटती, राजू दौड़कर उसके हाथ से सामान ले लेता और कहता—

     

    “दीदी, आज बहुत थक गई होगी।”

     

    सिया हँसकर कहती—

     

    “तू इतना बड़ा कब हो गया?”

     

    राजू मुस्कुराता—

     

    “जब से पिताजी नहीं हैं, तब से।”

     

    सिया की आँखें नम हो जातीं।

     

    वह राजू को अपने सीने से लगा लेती।

     

    रक्षाबंधन के दिन दोनों के घर में ज्यादा कुछ नहीं होता था।

     

    सिया एक साधारण-सी राखी खरीदती और राजू की कलाई पर बाँध देती।

     

    राजू बदले में उसे कभी टॉफी देता, कभी फूल।

     

    एक साल रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले राजू ने कहा—

     

    “दीदी, इस बार मैं आपको बहुत बड़ा तोहफा दूँगा।”

     

    सिया हँस पड़ी।

     

    “मेरे लिए तू ही सबसे बड़ा तोहफा है।”

     

    लेकिन कुछ दिनों बाद राजू अचानक घर से गायब हो गया।

     

    सिया ने पूरे गाँव में उसे खोजा।

     

    किसी ने कहा, “शायद शहर चला गया।”

     

    किसी ने कहा, “किसी के साथ काम करने गया होगा।”

     

    लेकिन किसी को सही पता नहीं था।

     

    सिया रोती हुई थाने पहुँची।

     

    वहाँ भी कोई मदद नहीं मिली।

     

    दिन बीतते गए।

     

    रक्षाबंधन आ गया।

     

    सिया ने एक राखी खरीदी और राजू की पुरानी तस्वीर के सामने रख दी।

     

    उसने तस्वीर से कहा—

     

    “तू जहाँ भी है, आज मैं तेरी कलाई पर राखी बाँध रही हूँ।”

     

    उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।

     

    उस दिन के बाद हर रक्षाबंधन पर सिया एक राखी खरीदती।

     

    लेकिन वह राखी कभी किसी भाई की कलाई तक नहीं पहुँचती।

     

    साल गुजरते गए।

     

    सिया की शादी हो गई।

     

    वह दूसरे गाँव चली गई।

     

    फिर भी हर रक्षाबंधन पर वह राजू को याद करती।

     

    उसने कभी उसे मृत नहीं माना।

     

    उसे विश्वास था कि उसका भाई कहीं न कहीं जरूर जीवित है।

     

    एक दिन उसे डाक से एक पत्र मिला।

     

    पत्र पर नाम लिखा था—

     

    “सिया दीदी के नाम।”

     

    सिया के हाथ काँपने लगे।

     

    पत्र के अंदर लिखा था—

     

    “दीदी, मुझे माफ कर देना।”

     

    सिया की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    पत्र राजू का था।

     

    उसने लिखा था कि जिस साल वह घर से गया था, उस साल माँ की बीमारी बहुत बढ़ गई थी।

     

    राजू ने सोचा कि अगर वह शहर जाकर पैसे कमाएगा तो माँ का इलाज हो सकेगा।

     

    वह एक फैक्ट्री में काम करने चला गया था।

     

    लेकिन वहाँ उसके साथ धोखा हुआ।

     

    उसे कई महीनों तक मजदूरी नहीं मिली।

     

    फिर एक दुर्घटना में उसका हाथ घायल हो गया।

     

    उसने घर लौटने की बहुत कोशिश की, लेकिन शर्म के कारण नहीं आ पाया।

     

    उसे लगता था कि वह अपनी बहन और माँ के लिए कुछ नहीं कर पाया।

     

    पत्र के अंत में उसने लिखा था—

     

    “दीदी, मैं हर रक्षाबंधन पर अपनी कलाई देखता हूँ। मुझे लगता है जैसे आपकी राखी अभी भी बंधी हुई है।”

     

    सिया फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसने तुरंत राजू को खोजने की कोशिश शुरू की।

     

    कई महीनों की तलाश के बाद उसे शहर के एक छोटे-से कारखाने में राजू के बारे में पता चला।

     

    राजू वहीं मजदूरी कर रहा था।

     

    सिया उसे देखकर पहचान नहीं पाई।

     

    वह बहुत दुबला हो गया था।

     

    बाल सफेद होने लगे थे।

     

    एक हाथ पर चोट का निशान था।

     

    लेकिन जैसे ही उसने कहा—

     

    “राजू…”

     

    वह तुरंत पलट गया।

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर राजू दौड़कर बहन के पैरों में गिर पड़ा।

     

    “दीदी, मुझे माफ कर दो।”

     

    सिया ने उसे उठाकर गले लगा लिया।

     

    “पागल… भाई अपनी बहन से माफी माँगता है?”

     

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

     

    सिया ने अपने बैग से एक राखी निकाली।

     

    वह वही राखी थी जो उसने पिछले रक्षाबंधन पर राजू की तस्वीर के सामने रखी थी।

     

    उसने राजू की कलाई पकड़ ली।

     

    “इस बार ये राखी सच में तेरी कलाई पर बाँधूँगी।”

     

    राजू रोते हुए बोला—

     

    “दीदी, मुझे लगा था कि आप मुझे भूल गई होंगी।”

     

    सिया ने कहा—

     

    “माँ अपने बच्चे को भूल सकती है क्या? तू मेरा भाई है।”

     

    राजू ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं बहुत गरीब हो गया हूँ दीदी।”

     

    सिया ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “पैसा गरीब बनाता है, रिश्ता नहीं।”

     

    उस दिन सिया उसे अपने घर ले आई।

     

    दोनों ने मिलकर माँ की पुरानी तस्वीर के सामने दीपक जलाया।

     

    माँ अब इस दुनिया में नहीं थीं।

     

    लेकिन सिया को लगा जैसे माँ उन्हें देखकर मुस्कुरा रही हों।

     

    राजू ने अपनी बहन से कहा—

     

    “दीदी, मैंने इतने साल आपसे दूर रहकर एक बात समझी है।”

     

    “क्या?”

     

    “दुनिया में पैसा कमाना आसान है, लेकिन अपना इंसान खो देना सबसे बड़ा नुकसान है।”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    राजू ने बहन का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “अब जिंदगी भर आपकी राखी मेरी कलाई पर रहेगी।”

     

    उसके बाद हर रक्षाबंधन पर सिया अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती।

     

    राखी साधारण होती।

     

    मिठाई भी कभी-कभी कम होती।

     

    लेकिन दोनों के चेहरों पर ऐसी खुशी होती जैसे उन्हें दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो।

     

    सीख:

     

    कभी-कभी इंसान गरीबी या परिस्थितियों से हारकर अपनों से दूर चला जाता है, लेकिन सच्चे रिश्ते दूरी से खत्म नहीं होते। भाई-बहन का प्यार वह रिश्ता है जो वर्षों की दूरी के बाद भी दिल में जिंदा रहता है। इसलिए मुश्किल समय में अपनों से दूर भागने के बजाय उनसे अपनी परेशानी साझा करनी चाहिए। अपने लोग हमारी कमजोरी नहीं, हमारी सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

  • फटी हुई राखी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    नंदिनी और उसका बड़ा भाई दीपक शहर की एक झुग्गी बस्ती में रहते थे। उनके पिता रिक्शा चलाते थे, लेकिन एक दुर्घटना के बाद उनका पैर खराब हो गया था। माँ घरों में काम करती थीं।

     

    घर में पैसे इतने कम थे कि कई बार रात का खाना भी नहीं बनता था।

     

    दीपक सिर्फ सत्रह साल का था, लेकिन उसने पढ़ाई छोड़कर एक गैराज में काम करना शुरू कर दिया था।

     

    नंदिनी अभी स्कूल में पढ़ती थी।

     

    दीपक का सपना था कि उसकी बहन खूब पढ़े और एक दिन अपने पैरों पर खड़ी हो।

     

    वह रोज गैराज में घंटों काम करता।

     

    हाथों पर तेल लगा रहता।

     

    कपड़े हमेशा मैले रहते।

     

    लेकिन जब वह घर आता और नंदिनी को किताब लेकर बैठा देखता, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।

     

    एक दिन नंदिनी ने कहा—

     

    “भैया, आपकी तबीयत खराब है। आज काम पर मत जाइए।”

     

    दीपक हँसा।

     

    “अगर मैं नहीं जाऊँगा तो तेरी किताबें कौन खरीदेगा?”

     

    नंदिनी चुप हो गई।

     

    उसने भाई के हाथों को देखा।

     

    हाथों पर जगह-जगह कटे के निशान थे।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “भैया, मैं पढ़ाई छोड़ देती हूँ।”

     

    दीपक ने तुरंत उसकी किताब बंद कर दी।

     

    “ये बात दोबारा मत कहना।”

     

    “लेकिन…”

     

    “तू पढ़ेगी। मेरी जिंदगी में अगर कोई सपना बचा है तो वह तू है।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    उसके पास राखी खरीदने के पैसे नहीं थे।

     

    उसने माँ से कहा—

     

    “माँ, मुझे थोड़े पैसे दे दो।”

     

    माँ ने खाली डिब्बा दिखा दिया।

     

    “बेटी, इस बार घर में कुछ नहीं है।”

     

    नंदिनी उदास हो गई।

     

    अगले दिन उसने अपनी पुरानी स्कूल ड्रेस का लाल धागा निकाला।

     

    उसने एक छोटे कपड़े के टुकड़े को मोड़कर राखी बना ली।

     

    बीच में उसने अपनी पुरानी पेंसिल की लाल रबर का छोटा टुकड़ा लगा दिया।

     

    राखी थोड़ी टेढ़ी थी।

     

    धागा भी जगह-जगह से उधड़ा हुआ था।

     

    लेकिन नंदिनी के लिए वह दुनिया की सबसे सुंदर राखी थी।

     

    रक्षाबंधन की सुबह दीपक काम पर जाने लगा।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “आज काम पर मत जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “आज मेरी राखी है।”

     

    दीपक मुस्कुराया।

     

    “अच्छा! तो जल्दी बाँध।”

     

    नंदिनी ने राखी बाँधी।

     

    दीपक ने अपनी जेब टटोली।

     

    उसके पास सिर्फ बीस रुपये थे।

     

    उसने बीस रुपये बहन के हाथ में रख दिए।

     

    नंदिनी ने तुरंत वापस कर दिए।

     

    “मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

     

    “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस एक वादा।”

     

    “बोल।”

     

    “आप कभी मुझे अकेला मत छोड़ना।”

     

    दीपक की आँखें भर आईं।

     

    उसने कहा—

     

    “जब तक मेरी साँस है, तू अकेली नहीं है।”

     

    कुछ दिनों बाद गैराज में काम करते हुए दीपक का हाथ मशीन में फँस गया।

     

    उसे अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने कहा कि हाथ में गंभीर चोट है और कुछ समय तक वह काम नहीं कर पाएगा।

     

    घर की आमदनी बंद हो गई।

     

    नंदिनी ने स्कूल के बाद घरों में काम करना शुरू कर दिया।

     

    दीपक को बहुत दुख हुआ।

     

    “मैंने तुझे पढ़ाने का वादा किया था।”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “आपने वादा तोड़ा नहीं है भैया। बस अब मैं भी आपका हाथ बँटा रही हूँ।”

     

    धीरे-धीरे दीपक ठीक होने लगा।

     

    लेकिन उसके हाथ में पहले जैसी ताकत नहीं रही।

     

    गैराज के मालिक ने उसे काम से निकाल दिया।

     

    दीपक टूट गया।

     

    एक रात उसने नंदिनी से कहा—

     

    “शायद अब मैं तुझे पढ़ा नहीं पाऊँगा।”

     

    नंदिनी ने उसकी हथेली पकड़ ली।

     

    “भैया, आपने मुझे किताबें नहीं दीं। आपने मुझे हिम्मत दी है। मैं खुद पढ़ूँगी।”

     

    उस दिन से नंदिनी ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

     

    वह स्कूल जाती, शाम को काम करती और रात में पढ़ाई करती।

     

    कई साल बाद उसने प्रतियोगी परीक्षा पास कर ली।

     

    उसे सरकारी नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह लेकर वह घर आई।

     

    उसने दीपक के सामने एक डिब्बा रखा।

     

    दीपक ने खोला।

     

    अंदर एक सुंदर घड़ी थी।

     

    “ये क्या है?”

     

    नंदिनी बोली—

     

    “आपके लिए।”

     

    दीपक ने घड़ी पहनने से मना कर दिया।

     

    “इतना महंगा सामान क्यों खरीदा?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि आपने मेरी जिंदगी का समय बदल दिया।”

     

    दीपक की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसी समय नंदिनी ने अपनी अलमारी से एक पुरानी चीज निकाली।

     

    वह वही फटी हुई राखी थी।

     

    दीपक ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    “तूने इसे संभालकर रखा?”

     

    नंदिनी बोली—

     

    “ये राखी नहीं है भैया। इसमें मेरा पूरा बचपन बंधा है।”

     

    दीपक ने काँपते हाथों से राखी को छुआ।

     

    उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    “मैंने तो सोचा था कि मैं तेरा भविष्य नहीं बना पाया।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “आपने बनाया है भैया। अगर उस दिन आप मुझे पढ़ने के लिए मजबूर नहीं करते, तो मैं आज यहाँ नहीं होती।”

     

    अगले रक्षाबंधन पर नंदिनी ने फिर भाई की कलाई पर राखी बाँधी।

     

    इस बार राखी बहुत सुंदर थी।

     

    लेकिन दीपक की नजर उसी पुरानी फटी राखी पर थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरे लिए सबसे कीमती राखी यही है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    दीपक ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि इसी ने मुझे याद दिलाया था कि गरीब आदमी के पास पैसा कम हो सकता है, लेकिन प्यार कभी कम नहीं होना चाहिए।”

     

    दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगे।

     

    उनकी झुग्गी वही थी।

     

    गरीबी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।

     

    लेकिन उस छोटे-से घर में अब उम्मीद बहुत बड़ी थी।

     

    सीख:

     

    रिश्तों की कीमत उनकी चमक से नहीं होती। एक फटी हुई राखी भी करोड़ों की दौलत से ज्यादा कीमती हो सकती है, अगर उसमें सच्चा प्यार और त्याग बंधा हो। जिंदगी में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने प्रियजनों का साथ और हिम्मत कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

  • दो रोटियाँ और एक राखी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    गाँव के आखिरी छोर पर एक टूटी-सी झोपड़ी थी। बरसात में जिसकी छत टपकती थी और गर्मियों में जिसके अंदर बैठना भी मुश्किल हो जाता था। उसी झोपड़ी में सोलह साल की मीरा और उसका छोटा भाई सोनू रहते थे।

     

    माँ-बाप दोनों को गुजरे कई साल हो चुके थे। रिश्तेदारों ने कुछ दिनों तक सहारा दिया, फिर सब अपने-अपने घर चले गए।

     

    मीरा ने तभी तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपने भाई को कभी अकेला नहीं छोड़ेगी।

     

    सुबह होते ही मीरा गाँव के बड़े घरों में बर्तन माँजने निकल जाती। बदले में कभी उसे पैसे मिलते, कभी बची हुई रोटियाँ।

     

    सोनू भी खाली नहीं बैठता था। वह गाँव की सब्जी मंडी में बोरे उठाता और जो थोड़े पैसे मिलते, उन्हें अपनी बहन के हाथ पर रख देता।

     

    एक दिन मीरा ने कहा—

     

    “सोनू, तू अभी छोटा है। इतना काम मत किया कर।”

     

    सोनू हँसकर बोला—

     

    “और आप अकेले काम करेंगी तो मुझे अच्छा लगेगा?”

     

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू बस पढ़ाई कर। मैं चाहती हूँ तू बड़ा आदमी बने।”

     

    सोनू बोला—

     

    “मैं बड़ा आदमी नहीं बनना चाहता।”

     

    “तो क्या बनना चाहता है?”

     

    “आपका सहारा।”

     

    मीरा कुछ नहीं बोल पाई।

     

    उसने सोनू को सीने से लगा लिया।

     

    उनके पास गरीबी बहुत थी, लेकिन प्यार की कोई कमी नहीं थी।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    गाँव के बाजार में राखियों की दुकानें सज गई थीं।

     

    सोनू अपनी बहन के लिए राखी खरीदना चाहता था।

     

    उसने कई दिनों तक पैसे बचाए थे।

     

    एक दिन वह बाजार गया।

     

    एक सुंदर-सी राखी उसे पसंद आई।

     

    दुकानदार ने कहा—

     

    “दस रुपये की है।”

     

    सोनू ने अपनी जेब टटोली।

     

    उसके पास सिर्फ आठ रुपये थे।

     

    वह उदास होकर दुकान से लौट आया।

     

    घर पहुँचकर मीरा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “मुझसे झूठ मत बोल।”

     

    सोनू ने धीरे से कहा—

     

    “आपके लिए राखी खरीदना चाहता था, लेकिन पैसे कम पड़ गए।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “मेरे लिए राखी की जरूरत नहीं है।”

     

    सोनू बोला—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तू मेरे लिए ही तो सबसे कीमती है।”

     

    सोनू ने कहा—

     

    “लेकिन राखी तो बाँधनी पड़ेगी।”

     

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा—

     

    “ठीक है, इस बार मैं खुद बना लूँगी।”

     

    उस रात मीरा ने अपनी पुरानी लाल चुनरी का एक टुकड़ा निकाला।

     

    उसने उसे धागे में बाँधा और बीच में गेहूँ का एक छोटा-सा दाना चिपका दिया।

     

    सोनू ने देखा तो हँस पड़ा।

     

    “ये कैसी राखी है?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “गरीबों की राखी।”

     

    सोनू ने राखी को हाथ में लिया।

     

    “नहीं दीदी, ये सबसे अमीर राखी है।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    लेकिन अगले दिन घर में खाने के लिए कुछ नहीं था।

     

    दोनों सुबह से भूखे थे।

     

    शाम को मीरा को एक घर से दो रोटियाँ मिलीं।

     

    वह रोटियाँ लेकर झोपड़ी में आई।

     

    सोनू की आँखें चमक उठीं।

     

    “दीदी, आज तो दावत है।”

     

    मीरा हँस पड़ी।

     

    “हाँ, आज दावत है।”

     

    उसने एक रोटी सोनू को दी और दूसरी खुद रख ली।

     

    सोनू ने अपनी रोटी का आधा हिस्सा तोड़कर मीरा की तरफ बढ़ाया।

     

    “आप भी खाओ।”

     

    “नहीं, मुझे भूख नहीं है।”

     

    “झूठ।”

     

    “सच कह रही हूँ।”

     

    सोनू बोला—

     

    “आप हमेशा झूठ बोलती हो जब खाना कम होता है।”

     

    मीरा चुप हो गई।

     

    उसकी आँखें भर आईं।

     

    सोनू ने रोटी का आधा टुकड़ा उसकी हथेली पर रख दिया।

     

    “आपने मुझे माँ की तरह पाला है। अब मुझे भी आपका ख्याल रखने दो।”

     

    मीरा रोते हुए रोटी खाने लगी।

     

    उस रात दोनों ने पहली बार महसूस किया कि गरीबी पेट को भूखा रख सकती है, लेकिन दिल को गरीब नहीं बना सकती।

     

    रक्षाबंधन का दिन आ गया।

     

    सुबह मीरा ने सोनू को नहलाया।

     

    घर में मिठाई नहीं थी।

     

    उसने गुड़ का छोटा-सा टुकड़ा पानी में घोलकर उसे मीठा पानी पिला दिया।

     

    फिर सोनू के सामने बैठकर उसकी कलाई पर वही राखी बाँध दी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “भगवान से बस यही चाहती हूँ कि तू हमेशा खुश रहे।”

     

    सोनू ने पूछा—

     

    “और आप?”

     

    “मेरी खुशी तो तू है।”

     

    सोनू ने बहन के पैर छुए।

     

    फिर अपनी जेब से कुछ निकाला।

     

    वह पाँच रुपये थे।

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “ये क्या है?”

     

    “आपके लिए।”

     

    “मेरे पास तो सब कुछ है।”

     

    “क्या?”

     

    “तू।”

     

    सोनू मुस्कुराया।

     

    दोनों गले लग गए।

     

    कुछ महीने बाद गाँव में भयंकर बाढ़ आ गई।

     

    नदी का पानी धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ने लगा।

     

    लोग अपने घर छोड़कर ऊँची जगहों पर जाने लगे।

     

    मीरा ने सोनू का हाथ पकड़ा और बोली—

     

    “चल, हमें भी निकलना होगा।”

     

    लेकिन सोनू का पैर कीचड़ में फिसल गया।

     

    वह पानी में गिर पड़ा।

     

    मीरा बिना सोचे पानी में कूद गई।

     

    उसने सोनू को पकड़ लिया।

     

    पानी का बहाव बहुत तेज था।

     

    मीरा ने पूरी ताकत लगाकर भाई को किनारे की ओर धकेला।

     

    “सोनू! भाग!”

     

    सोनू रोते हुए बोला—

     

    “दीदी, आप भी चलो!”

     

    मीरा ने उसे धक्का देकर सुरक्षित जगह पहुँचा दिया।

     

    लेकिन खुद पानी के तेज बहाव में बह गई।

     

    “दीदी!”

     

    सोनू चीखता रहा।

     

    गाँव के लोगों ने मीरा को खोजने की बहुत कोशिश की।

     

    कई घंटे बाद उसे नदी के किनारे बेहोश हालत में पाया गया।

     

    सोनू उसके पास बैठकर लगातार रो रहा था।

     

    “दीदी, आँखें खोलो…”

     

    कुछ देर बाद मीरा ने आँखें खोलीं।

     

    सोनू ने उसे गले लगा लिया।

     

    “आप मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    मीरा ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “पगले, तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँगी?”

     

    उस दिन सोनू ने मन ही मन फैसला किया कि अब वह अपनी बहन को कभी दुखी नहीं होने देगा।

     

    समय बीतता गया।

     

    सोनू ने पढ़ाई के साथ मेहनत भी की।

     

    वह बड़ा हुआ और शहर में नौकरी करने लगा।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आया।

     

    मीरा झोपड़ी के बाहर बैठी थी।

     

    सोनू ने उसके सामने एक नया घर बनाने के कागज रख दिए।

     

    मीरा हैरान रह गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    सोनू मुस्कुराया।

     

    “हमारा नया घर।”

     

    मीरा की आँखें भर आईं।

     

    “लेकिन इतने पैसे?”

     

    “आपने मुझे बचपन में दो रोटियाँ देकर बड़ा किया था। आज मेरी बारी है आपका पेट भरने की।”

     

    अगले रक्षाबंधन पर सोनू ने अपनी बहन के सामने एक बड़ी-सी मिठाई की दुकान से खरीदी हुई राखी रखी।

     

    मीरा ने उसे देखा और मुस्कुराकर पूछा—

     

    “इतनी महंगी राखी?”

     

    सोनू बोला—

     

    “नहीं दीदी। महंगी तो वह राखी थी जो आपने मेरी कलाई पर उस दिन बाँधी थी।”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “वह?”

     

    सोनू ने अपनी जेब से वही पुरानी, सूखी और थोड़ी-सी टूटी राखी निकाली।

     

    “मैंने इसे आज तक संभालकर रखा है।”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    सोनू बोला—

     

    “उस राखी में आपका प्यार बंधा था। और वही प्यार मुझे आज यहाँ तक लेकर आया।”

     

    मीरा ने भाई की कलाई पर नई राखी बाँधी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।

     

    उस दिन उनके घर में बहुत सारी मिठाई थी।

     

    लेकिन दोनों ने सबसे पहले दो रोटियाँ बनाई।

     

    एक मीरा ने खाई।

     

    एक सोनू ने।

     

    क्योंकि उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत आज भी वही दो रोटियाँ थीं, जिनमें एक-दूसरे के लिए बचाया हुआ प्यार था।

     

    सीख:

     

    गरीबी इंसान से बहुत कुछ छीन सकती है, लेकिन सच्चा प्यार नहीं छीन सकती। भाई-बहन का रिश्ता तब और मजबूत हो जाता है जब दोनों अपनी जरूरत से पहले एक-दूसरे की जरूरत के बारे में सोचते हैं। जीवन में पैसा कम हो सकता है, लेकिन अगर घर में प्रेम और अपनापन है, तो इंसान कभी सच में गरीब नहीं होता।

  • बहन की राखी और भाई का अधूरा सपना

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    शहर से बहुत दूर एक छोटा-सा गाँव था, जहाँ कच्ची गलियों और मिट्टी के घरों के बीच एक गरीब परिवार रहता था। उस परिवार में सिर्फ दो भाई-बहन थे—अमन और उसकी छोटी बहन गुड़िया।

     

    अमन गुड़िया से पाँच साल बड़ा था। पिता के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी अमन के कंधों पर आ गई थी। माँ पहले ही बीमारी के कारण बिस्तर पर रहती थीं। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।

     

    अमन ने पढ़ाई छोड़ दी और गाँव के पास एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करने लगा।

     

    हर सुबह वह अँधेरे में उठता, सूखी रोटी पानी में भिगोकर खाता और काम पर निकल जाता।

     

    गुड़िया अक्सर दरवाजे पर खड़ी होकर उसे जाते हुए देखती।

     

    वह पूछती, “भैया, आप स्कूल क्यों नहीं जाते?”

     

    अमन मुस्कुराकर कहता, “मेरा स्कूल तो अब यही है।”

     

    गुड़िया समझ नहीं पाती थी।

     

    एक दिन उसने फिर पूछा, “आप बड़े होकर क्या बनना चाहते थे?”

     

    अमन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा, “डॉक्टर।”

     

    गुड़िया की आँखें चमक उठीं।

     

    “तो बनो ना भैया।”

     

    अमन ने उसकी ओर देखा और धीरे से बोला—

     

    “अब तू पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना। मेरा सपना तू पूरा करना।”

     

    गुड़िया ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके मन में भाई की बात बस गई।

     

    वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    स्कूल की फीस बहुत कम थी, फिर भी उनके लिए वह रकम बड़ी थी।

     

    कई बार अमन के पास घर का राशन खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे, लेकिन वह गुड़िया की फीस किसी न किसी तरह जमा कर देता।

     

    एक दिन गुड़िया ने देखा कि अमन के पैरों में चप्पल नहीं थी।

     

    उसने पूछा, “भैया, आपकी चप्पल कहाँ है?”

     

    अमन हँसकर बोला, “टूट गई थी।”

     

    “नई क्यों नहीं लेते?”

     

    “ले लूँगा।”

     

    लेकिन वह “ले लूँगा” कभी नहीं आया।

     

    अमन हर बार अपनी जरूरत से पहले गुड़िया की जरूरत पूरी करता।

     

    सर्दियों की रात में जब गुड़िया के पास गर्म कपड़े नहीं होते, अमन अपनी पुरानी चादर उसे दे देता।

     

    जब गुड़िया बीमार पड़ती, वह पूरी रात उसके सिरहाने बैठा रहता।

     

    और जब भी गुड़िया कहती—

     

    “भैया, आप बहुत अच्छे हो।”

     

    अमन बस इतना कहता—

     

    “तू खुश रह, बस यही मेरी कमाई है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    गुड़िया दसवीं कक्षा में पहुँच गई।

     

    स्कूल में उसका नाम जिले के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में आने लगा।

     

    अमन को उस पर बहुत गर्व था।

     

    लेकिन उसके मन में एक चिंता भी थी।

     

    गुड़िया की आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना जरूरी था।

     

    शहर में रहने, किताबों और कॉलेज की फीस के लिए बहुत पैसे चाहिए थे।

     

    एक शाम गुड़िया ने डरते हुए कहा—

     

    “भैया, अगर पैसे नहीं हैं तो मैं आगे नहीं पढ़ूँगी।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ऐसा दोबारा मत कहना।”

     

    “लेकिन भैया…”

     

    “तू पढ़ेगी। चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।”

     

    उस रात अमन देर तक घर नहीं आया।

     

    अगले दिन गुड़िया ने देखा कि अमन की आँखों के नीचे काले निशान थे।

     

    वह बोली, “भैया, आप रात में सोए नहीं?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “थोड़ा काम ज्यादा था।”

     

    असलियत यह थी कि अमन ने रात में भी मजदूरी शुरू कर दी थी।

     

    दिन में ईंट-भट्ठा और रात में ट्रक से सामान उतारने का काम।

     

    उसका शरीर टूट जाता, लेकिन बहन की पढ़ाई नहीं टूटने देता।

     

    कुछ महीनों बाद गुड़िया को शहर के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया।

     

    वह बहुत खुश थी।

     

    लेकिन उसी दिन उसने देखा कि अमन अपनी पुरानी साइकिल बेचकर उसके लिए किताबें खरीद रहा है।

     

    गुड़िया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “भैया, मेरी वजह से आपने अपनी साइकिल भी बेच दी?”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “साइकिल तो फिर आ जाएगी। तेरी जिंदगी में मौका बार-बार नहीं आएगा।”

     

    रक्षाबंधन नजदीक था।

     

    गुड़िया शहर में थी और अमन गाँव में।

     

    गुड़िया ने फोन किया—

     

    “भैया, मैं इस बार राखी बाँधने जरूर आऊँगी।”

     

    अमन बोला—

     

    “नहीं, तू अपनी पढ़ाई कर। मैं समझ जाऊँगा।”

     

    “नहीं भैया। राखी तो मैं आपके हाथ पर ही बाँधूँगी।”

     

    लेकिन रक्षाबंधन से एक दिन पहले गुड़िया के कॉलेज में परीक्षा थी।

     

    वह चाहकर भी घर नहीं आ सकी।

     

    उसने फोन किया।

     

    “भैया, मुझे माफ कर दो। मैं इस बार नहीं आ पाऊँगी।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “पगली, परीक्षा ज्यादा जरूरी है। मेरी राखी अगले साल बाँध देना।”

     

    गुड़िया रोने लगी।

     

    “आप नाराज तो नहीं हो?”

     

    “तुझसे कभी नाराज हो सकता हूँ क्या?”

     

    फोन कट गया।

     

    अमन ने अपनी आँखें पोंछ लीं।

     

    उस रात उसने अकेले चूल्हा जलाया।

     

    एक सूखी रोटी बनाई और सामने रखी अपनी बहन की पुरानी तस्वीर देखकर बोला—

     

    “तू बस पढ़ती रह गुड़िया। मेरा सपना पूरा कर देना।”

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    गुड़िया ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया।

     

    वह डॉक्टर बनने की राह पर थी।

     

    अमन के चेहरे पर गर्व था।

     

    लेकिन उसका शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा था।

     

    लगातार मेहनत ने उसकी सेहत खराब कर दी थी।

     

    एक दिन काम करते समय वह बेहोश होकर गिर पड़ा।

     

    उसे अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने बताया कि उसे आराम की सख्त जरूरत है।

     

    गुड़िया को खबर मिली तो वह तुरंत गाँव आई।

     

    अपने भाई को अस्पताल के बिस्तर पर देखकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “भैया…”

     

    अमन ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “तू आ गई?”

     

    “हाँ।”

     

    “पढ़ाई छोड़कर तो नहीं आई?”

     

    गुड़िया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी पढ़ाई से ज्यादा जरूरी आप हो।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “नहीं। तू डॉक्टर बनेगी। यही मेरा सपना है।”

     

    गुड़िया ने उसका हाथ अपने माथे से लगा लिया।

     

    उसने रोते हुए कहा—

     

    “भैया, मैं डॉक्टर बनूँगी। लेकिन सबसे पहले आपका इलाज करूँगी।”

     

    कुछ दिनों बाद अमन की हालत सुधरने लगी।

     

    गुड़िया वापस शहर चली गई।

     

    उसने दिन-रात मेहनत की।

     

    आखिरकार वह डॉक्टर बन गई।

     

    जब वह पहली बार डॉक्टर का सफेद कोट पहनकर गाँव लौटी, तो अमन दरवाजे पर खड़ा था।

     

    गुड़िया ने दूर से ही उसे देखा और दौड़कर गले लग गई।

     

    “भैया… आपका सपना पूरा हो गया।”

     

    अमन की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “नहीं गुड़िया… मेरा सपना नहीं। तू मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी बन गई।”

     

    फिर गुड़िया ने अपनी जेब से एक राखी निकाली।

     

    उसने अमन की कलाई पर राखी बाँधी और बोली—

     

    “ये सिर्फ राखी नहीं है भैया। ये उस भाई के लिए है जिसने अपना सपना छोड़कर मेरी जिंदगी बना दी।”

     

    अमन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब तू उन गरीब बच्चों का इलाज करना जिनके पास पैसे नहीं हैं।”

     

    गुड़िया ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “वादा है भैया।”

     

    उस दिन दोनों की आँखों में आँसू थे।

     

    लेकिन उन आँसुओं में दर्द नहीं था।

     

    उनमें वर्षों के संघर्ष की जीत थी।

     

    सीख:—-सच्चा भाई वही है जो अपनी खुशियों और सपनों का त्याग करके बहन के भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश करे। रिश्तों की सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि त्याग और विश्वास है। अगर किसी अपने का सपना पूरा करने के लिए हमें अपनी कुछ इच्छाएँ छोड़नी पड़ें, तो वह त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

  • भाई की कलाई पर आखिरी राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में मिट्टी की दीवारों वाला एक छोटा-सा घर था। घर इतना गरीब था कि बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था और गर्मियों में मिट्टी की दीवारें भी तपने लगती थीं। उस घर में बारह साल की राधा और उसका छोटा भाई मोहन रहते थे।

     

    माँ को गुजरे पाँच साल हो चुके थे और पिता भी बीमारी के कारण दुनिया छोड़ चुके थे। अब दोनों भाई-बहन ही एक-दूसरे का सहारा थे।

     

    मोहन उम्र में राधा से दो साल छोटा था, लेकिन अपनी बहन का ख्याल बिल्कुल एक बड़े भाई की तरह रखता था।

     

    राधा गाँव के घरों में काम करके किसी तरह दोनों के लिए खाना जुटाती थी। कभी उसे दो रोटियाँ मिलतीं, कभी आधी रोटी से ही गुजारा करना पड़ता।

     

    मोहन गाँव के पास एक चाय की दुकान पर काम करता था। सुबह से शाम तक गिलास धोता, चाय पहुँचाता और बदले में उसे थोड़े-से पैसे मिलते।

     

    उनकी गरीबी बहुत थी, लेकिन दोनों के बीच प्यार उससे भी बड़ा था।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    गाँव की सभी लड़कियाँ बाजार से रंग-बिरंगी राखियाँ खरीद रही थीं। किसी की राखी पर मोती लगे थे, किसी पर चमकदार फूल।

     

    राधा भी बाजार के सामने से गुजरी।

     

    उसकी नजर एक सुंदर-सी लाल राखी पर जाकर रुक गई।

     

    दुकानदार ने कहा, “ले लो बिटिया, बहुत सुंदर है। सिर्फ बीस रुपये की है।”

     

    राधा ने अपनी मुट्ठी में दबे सिक्के देखे।

     

    उसके पास सिर्फ सात रुपये थे।

     

    वह मुस्कुराई और बोली, “अगली बार ले लूँगी।”

     

    दुकानदार ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।

     

    राधा घर लौट आई।

     

    मोहन ने पूछा, “दीदी, बाजार गई थीं?”

     

    “हाँ।”

     

    “मेरे लिए राखी लाई?”

     

    राधा ने मुस्कुराकर कहा, “तुम्हें कैसी राखी चाहिए?”

     

    मोहन हँसते हुए बोला, “ऐसी राखी जिसमें सबसे ज्यादा प्यार हो।”

     

    राधा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “फिर तो मैं तुम्हारे लिए दुनिया की सबसे अच्छी राखी बनाऊँगी।”

     

    रात को मोहन सो गया।

     

    राधा ने घर के कोने में रखे पुराने कपड़ों को देखा। उसने अपनी माँ की पुरानी लाल साड़ी का एक छोटा टुकड़ा निकाला।

     

    उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसे माँ की याद आ गई।

     

    माँ हर रक्षाबंधन पर मोहन की कलाई में राखी बाँधते हुए कहती थीं—

     

    “मेरे बेटे, अपनी बहन का हमेशा ख्याल रखना।”

     

    राधा ने साड़ी के उस टुकड़े को धीरे-धीरे काटा और उससे राखी बनाने लगी।

     

    उसने एक पुराने धागे में लाल कपड़ा बाँधा और बीच में अपनी टूटी हुई चूड़ी का छोटा-सा टुकड़ा लगा दिया।

     

    राखी सुंदर नहीं थी।

     

    लेकिन उसमें माँ की याद, बहन का प्यार और पूरे घर की भावनाएँ बंधी थीं।

     

    रक्षाबंधन की सुबह राधा ने मोहन को नहलाया।

     

    घर में मिठाई नहीं थी।

     

    उसने चूल्हे पर थोड़ा-सा गुड़ गर्म किया और आटे की छोटी-सी मीठी रोटी बना दी।

     

    मोहन ने पूछा, “दीदी, आज इतना अच्छा खाना?”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    “आज रक्षाबंधन है ना।”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    उसने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाले।

     

    “ये लो।”

     

    राधा ने पूछा, “कहाँ से आए?”

     

    मोहन बोला, “कल दुकान मालिक ने दिए थे।”

     

    “लेकिन तुमने अपने लिए कुछ नहीं खरीदा?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    मोहन ने हँसकर कहा—

     

    “मुझे क्या चाहिए? मेरी दीदी मेरे पास है, वही काफी है।”

     

    राधा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसने मोहन को अपने सामने बैठाया।

     

    उसकी कलाई पर वही लाल राखी बाँधी जो उसने माँ की साड़ी से बनाई थी।

     

    राखी बाँधते हुए राधा बोली—

     

    “भगवान से मेरी बस एक ही प्रार्थना है कि अगले जन्म में भी तू ही मेरा भाई बने।”

     

    मोहन ने तुरंत कहा—

     

    “और मैं हर जन्म में तेरा भाई बनूँगा।”

     

    दोनों गले लगकर रोने लगे।

     

    लेकिन उस दिन मोहन ने राधा से एक बात छिपाई थी।

     

    वह पिछले कई दिनों से बहुत बीमार था।

     

    चाय की दुकान पर काम करते समय उसे कई बार चक्कर आते थे। दुकान मालिक ने उसे आराम करने को कहा, लेकिन मोहन जानता था कि अगर वह काम नहीं करेगा तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा।

     

    रक्षाबंधन के दो दिन बाद मोहन अचानक दुकान पर बेहोश होकर गिर पड़ा।

     

    दुकानदार उसे अस्पताल ले गया।

     

    डॉक्टर ने बताया कि मोहन को गंभीर बीमारी है और इलाज के लिए बहुत पैसे चाहिए।

     

    यह सुनकर राधा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने गाँव के लोगों से मदद माँगी।

     

    किसी ने पाँच रुपये दिए, किसी ने दस।

     

    लेकिन इलाज के लिए पैसे बहुत कम थे।

     

    राधा ने अपनी माँ की बची हुई आखिरी निशानी—एक छोटी-सी चाँदी की पायल—बेच दी।

     

    फिर भी पैसे पूरे नहीं हुए।

     

    एक रात मोहन ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “दीदी…”

     

    “हाँ भाई?”

     

    “अगर मैं ठीक न हो पाया तो रोना मत।”

     

    राधा चिल्लाई—

     

    “ऐसा मत बोल!”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “तूने मुझे हमेशा कहा है ना कि भगवान पर भरोसा रखना चाहिए।”

     

    राधा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तू ठीक होगा। मैं भगवान से लड़कर भी तुझे वापस लाऊँगी।”

     

    अगले दिन गाँव के स्कूल के शिक्षक को यह बात पता चली। उन्होंने गाँव वालों को इकट्ठा किया।

     

    सभी ने मिलकर मोहन के इलाज के लिए पैसे जमा किए।

     

    आखिरकार मोहन का इलाज शुरू हुआ।

     

    कई दिनों बाद उसकी हालत सुधरने लगी।

     

    राधा अस्पताल के बाहर बैठकर भगवान का धन्यवाद कर रही थी।

     

    उसने अपनी कलाई देखी।

     

    उसे याद आया कि मोहन ने रक्षाबंधन पर उससे कहा था—

     

    “हर जन्म में तेरा भाई बनूँगा।”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    उसने आसमान की ओर देखकर कहा—

     

    “भगवान, मेरा भाई मुझे दे दिया… अब मैं कुछ नहीं माँगती।”

     

    कुछ महीनों बाद मोहन पूरी तरह ठीक हो गया।

     

    वह फिर से चाय की दुकान पर जाने लगा।

     

    लेकिन इस बार गाँव के शिक्षक ने उसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी भी ले ली।

     

    राधा को भी सिलाई का काम मिल गया।

     

    धीरे-धीरे दोनों की जिंदगी बदलने लगी।

     

    कई साल बीत गए।

     

    मोहन बड़ा होकर शहर में नौकरी करने लगा।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आया।

     

    उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा था।

     

    राधा ने पूछा, “इसमें क्या है?”

     

    मोहन ने डिब्बा खोला।

     

    उसमें एक सुंदर चाँदी की राखी थी।

     

    मोहन ने वह राखी राधा के हाथ में रख दी।

     

    “दीदी, उस साल तूने माँ की पुरानी साड़ी से मुझे राखी बाँधी थी। आज मैं चाहता हूँ कि तू मेरी तरफ से यह राखी रख ले।”

     

    राधा की आँखें भर आईं।

     

    मोहन ने कहा—

     

    “उस दिन तूने मेरी कलाई पर सिर्फ राखी नहीं बाँधी थी। तूने मुझे जीने की वजह दी थी।”

     

    राधा ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।

     

    वे उस प्यार के आँसू थे जिसने गरीबी को हरा दिया था।

     

    (सीख)

     

    भाई-बहन का रिश्ता धन-दौलत से नहीं, बल्कि प्यार, त्याग और विश्वास से मजबूत होता है। महंगी राखी या बड़े उपहार रिश्ते की कीमत तय नहीं करते। सच्चा प्यार वह है जो मुश्किल समय में बिना किसी स्वार्थ के एक-दूसरे का हाथ थामे रखे।

  • बहन की राखी और भाई की मजबूरी

    बहन की राखी और भाई की मजबूरी

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    बहन की राखी और भाई की मजबूरी

     

    गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में सीमा अपनी माँ के साथ रहती थी। उसका बड़ा भाई रमेश शहर में मजदूरी करता था। पिता के गुजर जाने के बाद रमेश ही घर की जिम्मेदारी संभाल रहा था।

     

    हर साल रक्षा बंधन पर रमेश किसी भी हालत में घर जरूर आता था। सीमा पूरे साल उस दिन का इंतज़ार करती थी।

     

    इस बार भी रक्षा बंधन से कुछ दिन पहले सीमा ने बाजार से एक सुंदर-सी राखी खरीदी। राखी को देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    वह माँ से बोली,

    “माँ, इस बार भैया आएँगे तो मैं उन्हें यही राखी बाँधूँगी। फिर भैया से अपनी पसंद की मिठाई भी बनवाऊँगी।”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ बेटी, तेरा भैया जरूर आएगा।”

     

    लेकिन माँ के चेहरे की चिंता सीमा से छिपी नहीं थी।

     

    उधर शहर में रमेश एक निर्माण स्थल पर काम कर रहा था। अचानक काम के दौरान उसके पैर में चोट लग गई। डॉक्टर ने कुछ दिनों तक आराम करने की सलाह दी। कई दिनों तक काम न करने के कारण उसकी मजदूरी भी रुक गई।

     

    रमेश के पास घर लौटने के लिए किराए तक के पैसे नहीं थे।

     

    रक्षा बंधन से एक दिन पहले सीमा ने भाई को फोन किया।

     

    “भैया, कब आ रहे हो? मैंने आपके लिए राखी खरीदी है।”

     

    कुछ पल तक रमेश चुप रहा। फिर बोला,

    “सीमा… इस बार शायद मैं घर नहीं आ पाऊँगा।”

     

    सीमा की आवाज़ धीमी हो गई।

    “क्यों भैया?”

     

    रमेश ने अपनी परेशानी छिपाते हुए कहा,

    “बस काम बहुत है। छुट्टी नहीं मिल रही।”

     

    फोन कटने के बाद रमेश की आँखें भर आईं। वह जानता था कि सीमा को उसकी सच्चाई पता चल गई तो वह और दुखी होगी।

     

    अगली सुबह सीमा ने राखी की थाली सजाई। माँ ने पूछा,

    “बेटी, तूने खाना क्यों नहीं खाया?”

     

    सीमा ने कहा,

    “भैया आते तो पहले उन्हें खिलाती।”

     

    दोपहर हो गई। फिर शाम भी होने लगी, लेकिन रमेश नहीं आया।

     

    सीमा बार-बार घर के दरवाजे की ओर देखती रही।

     

    तभी डाकिया एक छोटा-सा पैकेट लेकर आया।

     

    “सीमा के नाम है।”

     

    सीमा ने पैकेट खोला। उसमें एक नई साड़ी, कुछ मिठाई और एक छोटा-सा पत्र था।

     

    पत्र में लिखा था—

     

    “प्यारी सीमा,

    इस बार तेरी कलाई पर राखी बाँधने के लिए मैं सामने नहीं हूँ। इसका मुझे बहुत दुख है। लेकिन मजबूरी ने मुझे रोक लिया। तू मेरी कलाई पर राखी नहीं बाँध पा रही है, फिर भी याद रखना, तेरी राखी का धागा मेरे दिल से बंधा है।

    जल्द ही घर आऊँगा।

    तेरा भैया, रमेश।”

     

    पत्र पढ़ते-पढ़ते सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने राखी को अपने सीने से लगा लिया और बोली,

    “माँ, भैया नहीं आए तो क्या हुआ… उनकी मजबूरी तो हमारे साथ ही है।”

     

    माँ ने बेटी को गले लगा लिया।

     

    कुछ दिनों बाद रमेश वापस गाँव आया। उसके हाथ में ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन बहन के लिए एक छोटी-सी चॉकलेट जरूर थी।

     

    सीमा उसे देखते ही दौड़कर भाई से लिपट गई।

     

    रमेश बोला,

    “माफ कर दे बहना, उस दिन तेरी राखी नहीं बंधवा पाया।”

     

    सीमा ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “भैया, राखी तो उस दिन भी आपके हाथ में बंधी थी… बस धागा मेरी कलाई से नहीं, मेरे दिल से बंधा था।”

     

    रमेश की आँखों में आँसू आ गए।

     

    सीमा ने राखी निकाली और इस बार अपने भाई की कलाई पर बाँध दी।

     

    रमेश ने बहन के सिर पर हाथ रखकर कहा,

    “जब तक मैं हूँ, तुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूँगा।”

     

    सीमा मुस्कुराई।

     

    उस दिन दोनों ने समझा कि रक्षा बंधन सिर्फ राखी बाँधने का त्योहार नहीं, बल्कि उस रिश्ते का नाम है जिसमें दूरियाँ और मजबूरियाँ भी भाई-बहन के प्यार को कमजोर नहीं कर सकतीं।

     

    सीख: सच्चे रिश्ते हालात के मोहताज नहीं होते। मजबूरी इंसान को दूर कर सकती है, लेकिन सच्चा प्यार दिलों को हमेशा करीब रखता है।

  • गरीब बहन की राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गरीब बहन की सबसे कीमती राखी

     

    “भैया, इस बार मेरी राखी थोड़ी सस्ती है… लेकिन इसमें प्यार पूरा है।”

     

    गुड़िया ने अपनी हथेली में रखी राखी को देखते हुए धीरे से कहा।

     

    राखी बहुत साधारण थी। कुछ रंगीन धागे थे, बीच में कागज से बना छोटा-सा फूल और किनारे पर दो मोती।

     

    बाजार से खरीदी हुई महंगी राखियों जैसी उसमें चमक नहीं थी।

     

    लेकिन उसे बनाने में गुड़िया ने अपनी पूरी रात लगा दी थी।

     

    उसका भाई मोहन शहर में एक छोटी-सी दुकान पर काम करता था। घर में मां और छोटी बहन गुड़िया ही थे।

     

    पिता का कई साल पहले निधन हो चुका था।

     

    मोहन ने तभी पढ़ाई छोड़ दी थी।

     

    उस समय गुड़िया बहुत छोटी थी।

     

    मोहन ने मां से कहा था,

     

    “आप चिंता मत करना। गुड़िया की पढ़ाई नहीं रुकेगी।”

     

    उस दिन से मोहन सुबह दुकान पर जाता और देर रात घर लौटता।

     

    गुड़िया पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    वह हमेशा कहती,

     

    “भैया, एक दिन मैं बड़ी नौकरी करूंगी।”

     

    मोहन हंसकर कहता,

     

    “और तब मुझे काम नहीं करने देना।”

     

    गुड़िया तुरंत बोलती,

     

    “हां, सबसे पहले आपकी दुकान बंद करवाऊंगी।”

     

    दोनों हंस पड़ते।

     

    लेकिन इस साल घर की हालत पहले से ज्यादा खराब थी।

     

    माँ की दवाइयों का खर्च बढ़ गया था।

     

    मोहन कई दिनों से परेशान था।

     

    एक रात गुड़िया ने उसे मां की दवाइयों के बारे में दुकानदार से उधार मांगते हुए सुन लिया।

     

    “भाई, दो दिन का समय दे दो। पैसे मिलते ही दे दूंगा।”

     

    दुकानदार ने कहा,

     

    “मोहन, अब और उधार मुश्किल है।”

     

    गुड़िया चुपचाप कमरे में लौट आई।

     

    उसने अपनी छोटी-सी गुल्लक निकाली।

     

    गुल्लक तोड़ी।

     

    अंदर सिर्फ सत्ताईस रुपये थे।

     

    वह उन पैसों को देखकर उदास हो गई।

     

    “इनसे तो राखी भी नहीं आएगी।”

     

    फिर उसके मन में एक विचार आया।

     

    उसने पुराने धागे निकाले।

     

    दो मोती खोजे।

     

    एक पुराने गिफ्ट रैपर से कागज काटकर छोटा-सा फूल बनाया।

     

    और रातभर बैठकर अपने भाई के लिए राखी बना दी।

     

    अगली सुबह मोहन दुकान जाने लगा तो गुड़िया ने पूछा,

     

    “भैया, रक्षाबंधन पर छुट्टी मिलेगी?”

     

    मोहन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तेरे लिए तो छुट्टी लेनी पड़ेगी।”

     

    “सच?”

     

    “हां।”

     

    गुड़िया खुशी से बोली,

     

    “लेकिन मेरे पास आपके लिए बहुत महंगा गिफ्ट नहीं है।”

     

    मोहन ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस तू खुश रह।”

     

    गुड़िया मुस्कुरा दी।

     

    लेकिन उसी शाम घर में एक बड़ी परेशानी आ गई।

     

    माँ की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    मोहन उन्हें अस्पताल ले गया।

     

    डॉक्टर ने कुछ जांचें लिख दीं।

     

    दवा और जांच का खर्च सुनकर मोहन परेशान हो गया।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “कितने पैसे चाहिए?”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “तू इसकी चिंता मत कर।”

     

    लेकिन गुड़िया समझ गई कि पैसे बहुत ज्यादा हैं।

     

    उसने अपनी पढ़ाई की किताबों के बीच रखा एक लिफाफा निकाला।

     

    उसमें उसकी छात्रवृत्ति से बचाए हुए पैसे थे।

     

    उसने सारे पैसे मोहन को दे दिए।

     

    “ये ले लो।”

     

    मोहन ने हैरानी से पूछा,

     

    “ये कहां से आए?”

     

    “मेरी पढ़ाई के लिए थे।”

     

    “नहीं। ये मैं नहीं लूंगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तेरी पढ़ाई ज्यादा जरूरी है।”

     

    गुड़िया ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “भैया, आपने मेरी पूरी जिंदगी की चिंता की है। आज मुझे आपकी चिंता करने दीजिए।”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    अंततः इलाज हुआ।

     

    माँ कुछ दिनों में ठीक होने लगीं।

     

    लेकिन रक्षाबंधन का दिन आ गया।

     

    गुड़िया ने सुबह जल्दी उठकर पूजा की थाली सजाई।

     

    उसने वही साधारण राखी थाली में रखी।

     

    मोहन उसके सामने बैठा।

     

    गुड़िया ने तिलक लगाया।

     

    फिर राखी उठाई।

     

    “भैया, आंखें बंद करो।”

     

    मोहन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    गुड़िया ने राखी उसकी कलाई पर बांध दी।

     

    मोहन ने आंखें खोलीं।

     

    राखी देखकर वह कुछ पल चुप रहा।

     

    “ये तूने बनाई?”

     

    गुड़िया ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    गुड़िया हंस पड़ी।

     

    “झूठ बोल रहे हो।”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    मोहन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “क्या है?”

     

    “तेरे लिए।”

     

    अंदर एक सुंदर-सी किताब थी।

     

    गुड़िया की आंखें चमक उठीं।

     

    “ये तो बहुत महंगी होगी।”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “तेरी किताबों से महंगी कोई चीज नहीं।”

     

    गुड़िया किताब को सीने से लगाकर बैठ गई।

     

    फिर उसने भाई की कलाई को देखा।

     

    “भैया, एक बात बताऊं?”

     

    “बोल।”

     

    “मैंने ये राखी बहुत सस्ते सामान से बनाई है।”

     

    “तो?”

     

    “लेकिन मेरे लिए ये सबसे महंगी राखी है।”

     

    मोहन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    गुड़िया ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि इसे बनाते समय मैंने सोचा था कि अगर मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो क्या हुआ… मेरे पास आपका प्यार तो है।”

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने बहन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “गुड़िया, तूने मुझे आज बहुत बड़ा गिफ्ट दिया है।”

     

    “क्या?”

     

    “ये याद दिलाया कि अमीर होने के लिए बहुत पैसे नहीं चाहिए।”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “फिर?”

     

    “बस घर में ऐसे लोग होने चाहिए, जो मुश्किल में साथ खड़े रहें।”

     

    तभी मां ने दोनों को पास बुलाया।

     

    उन्होंने राखी देखकर कहा,

     

    “मोहन, ये राखी संभालकर रखना।”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “इसे कभी नहीं उतारूंगा।”

     

    गुड़िया हंसते हुए बोली,

     

    “कुछ दिन बाद तो धागा खुद टूट जाएगा।”

     

    मोहन ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “धागा टूटेगा… वादा नहीं।”

     

    साल बीतते गए।

     

    गुड़िया ने पढ़ाई पूरी की।

     

    उसे शहर के एक बड़े अस्पताल में नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह मिलने के बाद वह सीधे बाजार गई।

     

    उसने एक सुंदर डिब्बा खरीदा।

     

    घर आकर मोहन के सामने रखा।

     

    “भैया, ये आपके लिए।”

     

    मोहन ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक महंगी घड़ी थी।

     

    वह चौंक गया।

     

    “इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी?”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “याद है, आपने कहा था कि मैं बड़ी नौकरी करूंगी तो आपको काम नहीं करने दूंगी?”

     

    मोहन हंस पड़ा।

     

    “हां।”

     

    “तो अब दुकान बंद।”

     

    मोहन की आंखें भर आईं।

     

    “पगली…”

     

    गुड़िया ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    उसकी नजर उस पुराने धागे पर पड़ी जो अब भी राखी के साथ बचा हुआ था।

     

    वह पूरी राखी नहीं थी।

     

    बस एक छोटा-सा धागा बचा था।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “आपने इसे अब तक संभालकर रखा?”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “तूने कहा था ना, इसमें प्यार पूरा है।”

     

    गुड़िया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने भाई को गले लगा लिया।

     

    उस दिन मोहन ने महसूस किया कि उसकी बहन ने उसे कोई महंगी घड़ी नहीं दी थी।

     

    उसने तो सालों पहले ही एक ऐसी राखी दे दी थी जिसकी कीमत पैसे से नहीं लगाई जा सकती थी।

     

    क्योंकि कुछ राखियां सोने-चांदी से नहीं बनतीं।

     

    वे बनती हैं छोटे-से धागे, सच्चे प्यार और उस भरोसे से…

     

    जो कहता है—

     

    “मुश्किल चाहे कितनी भी बड़ी हो, मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूंगी।”

  • एक अंजान भाई के नाम राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक अनजान भाई के नाम राखी

     

    “दीदी, अगर आपका कोई भाई नहीं है… तो ये राखी किसके लिए है?”

     

    दस साल की छवि ने दुकान के सामने खड़े छोटे बच्चे को देखा और मुस्कुराकर बोली,

     

    “पता नहीं… शायद किसी ऐसे भाई के लिए, जो अभी मुझे मिला नहीं है।”

     

    बच्चा हंसकर आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन छवि के हाथ में पकड़ी वह राखी उसके लिए सिर्फ राखी नहीं थी।

     

    हर साल वह एक राखी खरीदती थी।

     

    और हर साल वही सवाल उसके मन में उठता—

     

    “मेरा भाई आखिर कहां है?”

     

    छवि के पास अपने परिवार की कोई पुरानी तस्वीर नहीं थी। उसे सिर्फ इतना पता था कि बचपन में उसकी माँ के साथ एक छोटा लड़का भी रहता था।

     

    माँ उसे हमेशा “तेरा भैया” कहती थीं।

     

    लेकिन छवि को उसका चेहरा याद नहीं था।

     

    एक दिन उसने माँ से पूछा था,

     

    “माँ, मेरा भाई कहां है?”

     

    माँ की आंखें भर आई थीं।

     

    “बहुत दूर।”

     

    “कब आएगा?”

     

    “जब भगवान चाहेंगे।”

     

    बस यही जवाब उसे हमेशा मिला।

     

    साल गुजरते गए।

     

    छवि बड़ी हो गई।

     

    माँ की तबीयत भी अब पहले जैसी नहीं रहती थी।

     

    एक दिन माँ ने उसे अपने पास बुलाया।

     

    “छवि, मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ है।”

     

    उन्होंने पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटा छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    छवि ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में एक छोटी बच्ची और लगभग पांच साल का लड़का खड़ा था।

     

    लड़के के हाथ में राखी बंधी थी।

     

    छवि तस्वीर देखते ही चुप हो गई।

     

    “माँ… ये?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “तेरा भाई है।”

     

    “नाम?”

     

    “आर्यन।”

     

    छवि ने तस्वीर सीने से लगा ली।

     

    “वो कहां है?”

     

    माँ की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तेरे पिता के गुजरने के बाद हालात बहुत खराब हो गए थे। आर्यन को उसके मामा अपने साथ ले गए थे। फिर संपर्क टूट गया।”

     

    छवि ने पूछा,

     

    “आपने उसे ढूंढा नहीं?”

     

    “बहुत कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “किस्मत ने साथ नहीं दिया।”

     

    उस रात छवि ने तस्वीर अपने तकिए के नीचे रख ली।

     

    अगले दिन उसने इंटरनेट और पुराने कागजों की मदद से आर्यन को ढूंढना शुरू किया।

     

    कई नाम मिले।

     

    कई पते मिले।

     

    लेकिन कोई पक्का सुराग नहीं मिला।

     

    फिर उसे एक पुराने स्कूल रिकॉर्ड में एक नाम मिला—

     

    आर्यन मिश्रा।

     

    पता था—एक छोटे से शहर का।

     

    छवि ने तुरंत वहां जाने का फैसला किया।

     

    कई घंटों की यात्रा के बाद वह उस पते पर पहुंची।

     

    वहां अब एक छोटी-सी किताबों की दुकान थी।

     

    छवि ने दुकानदार से पूछा,

     

    “क्या यहां आर्यन नाम का कोई आदमी रहता था?”

     

    दुकानदार ने उसे गौर से देखा।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    “मैं… उसकी बहन हूं।”

     

    दुकानदार कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने सामने बैठे एक युवक की तरफ इशारा किया।

     

    “वो रहा।”

     

    छवि की धड़कन रुक गई।

     

    युवक लगभग तीस साल का था।

     

    सादा कपड़े, शांत चेहरा और आंखों में एक अजीब-सी उदासी।

     

    छवि धीरे-धीरे उसके पास गई।

     

    “आपका नाम आर्यन है?”

     

    उसने किताब से नजर उठाई।

     

    “जी।”

     

    छवि ने कांपते हाथों से पुरानी तस्वीर उसके सामने रख दी।

     

    आर्यन ने तस्वीर देखी।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “ये तस्वीर… आपको कहां मिली?”

     

    “माँ के पास।”

     

    आर्यन खड़ा हो गया।

     

    “माँ?”

     

    छवि की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हां… हमारी माँ।”

     

    आर्यन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    छवि ने धीरे से कहा,

     

    “मैं छवि हूं।”

     

    आर्यन ने उसे देखा।

     

    कुछ पल बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “मेरी छोटी बहन?”

     

    छवि ने सिर हिला दिया।

     

    अगले ही पल आर्यन ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    पंद्रह साल की दूरी कुछ ही सेकंड में खत्म हो गई।

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “माँ कैसी हैं?”

     

    “कमजोर हो गई हैं।”

     

    “मैंने उन्हें बहुत याद किया।”

     

    “उन्होंने भी।”

     

    आर्यन ने आंखें पोंछीं।

     

    “मुझे लगा था शायद वो मुझे भूल गई होंगी।”

     

    छवि ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “माँ आपको हर रक्षाबंधन याद करती थीं।”

     

    आर्यन की नजर उसके हाथ में पकड़ी राखी पर पड़ी।

     

    “ये किसके लिए है?”

     

    छवि ने राखी आगे कर दी।

     

    “आपके लिए।”

     

    आर्यन ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    छवि ने राखी बांधते हुए कहा,

     

    “मैं हर साल एक राखी खरीदती थी।”

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे विश्वास था कि एक दिन मेरा भाई मुझे जरूर मिलेगा।”

     

    आर्यन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

     

    “मैं भी हर साल एक राखी संभालकर रखता था।”

     

    छवि ने हैरानी से पूछा,

     

    “किसकी?”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी।”

     

    “लेकिन मैंने तो आपको कोई राखी भेजी ही नहीं।”

     

    “मुझे पता था।”

     

    “फिर?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मैं बाजार से राखी खरीदता था और खुद से कहता था कि जब मेरी बहन मिलेगी, तब उसकी कलाई पर बांधूंगा।”

     

    छवि कुछ बोल नहीं पाई।

     

    दोनों भाई-बहन उसी दुकान के बाहर बैठ गए।

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तुम्हें बचपन की कुछ बातें याद हैं?”

     

    छवि ने हंसकर कहा,

     

    “बस इतना कि आप मेरी चॉकलेट चुरा लेते थे।”

     

    आर्यन जोर से हंसा।

     

    “अच्छा! ये याद है?”

     

    “हां।”

     

    “तो मैं मान गया कि तू सच में मेरी बहन है।”

     

    छवि भी हंस पड़ी।

     

    कुछ देर बाद दोनों माँ के पास लौटने के लिए निकल पड़े।

     

    दरवाजा खुलते ही माँ की नजर आर्यन पर पड़ी।

     

    वह कुछ सेकंड उसे देखती रहीं।

     

    फिर उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “आर्यन…”

     

    आर्यन उनके पैरों में बैठ गया।

     

    “माँ… देर हो गई।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “लेकिन तू आ गया।”

     

    छवि एक तरफ खड़ी मुस्कुरा रही थी।

     

    उसने देखा कि आर्यन की कलाई पर राखी चमक रही थी।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “तूने राखी बांधी?”

     

    छवि ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आर्यन ने बहन की तरफ देखकर कहा,

     

    “और इस बार ये राखी कभी नहीं उतारूंगा।”

     

    छवि मुस्कुराई।

     

    “भैया, राखी कुछ दिन बाद खुद टूट जाएगी।”

     

    “तो?”

     

    “नई बांध दूंगी।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “हर साल?”

     

    “हर साल।”

     

    उस दिन छवि ने अपनी जिंदगी में पहली बार महसूस किया कि उसके पास सिर्फ एक भाई नहीं था।

     

    उसके पास खोई हुई यादों का एक पूरा संसार वापस आ गया था।

     

    रात को उसने अपनी पुरानी डायरी खोली और लिखा—

     

    “आज मैंने एक अनजान इंसान की कलाई पर राखी बांधी थी। लेकिन राखी बंधते ही वह अनजान नहीं रहा। वह मेरा भाई बन गया।”

     

    फिर उसने नीचे एक और लाइन लिखी—

     

    “कभी-कभी रिश्ते जन्म से नहीं, पहचान से मिलते हैं… और कभी एक छोटी-सी राखी किसी खोए हुए रिश्ते को वापस घर ले आती है।”

     

    अगली सुबह आर्यन ने छवि को आवाज दी।

     

    “छोटी!”

     

    छवि दौड़कर आई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आर्यन ने एक राखी उसके हाथ में रखी।

     

    “अगली राखी के लिए इसे संभालकर रखना।”

     

    छवि ने पूछा,

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    • आर्यन मुस्कुराया।

     

    “अब मैं तुझे सिर्फ एक रक्षाबंधन का भाई नहीं बनना चाहता।”

     

    छवि ने उसकी बात समझते हुए मुस्कुराकर कहा,

     

    “फिर?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “पूरी जिंदगी का भाई।”

     

    छवि ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “वादा?”

    आर्यन ने कहा,

    “वादा।”

     

    और उस दिन एक बहन की बरसों पुरानी तलाश खत्म हुई।

     

    उसकी राखी को आखिरकार अपनी कलाई मिल गई थी।

     

    और एक भाई को…

     

    अपनी बहन।

  • गरीब बहन की राखी

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    गरीब बहन की राखी

     

    रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला था। पूरे गांव में खुशी का माहौल था। हर घर में मिठाइयां बन रही थीं और बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सजे हुए थे।

     

    लेकिन गांव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में रहने वाली गुड़िया के घर में कोई खुशी नहीं थी।

     

    गुड़िया बहुत गरीब थी। उसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। उसका छोटा भाई मोहन ही उसका एकमात्र सहारा था। मोहन शहर में मजदूरी करता था और बड़ी मुश्किल से दोनों का गुजारा चलता था।

     

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले गुड़िया बाजार गई। उसने कई सुंदर राखियां देखीं, लेकिन उनके दाम सुनकर चुपचाप वापस लौटने लगी।

     

    रास्ते में उसकी नजर एक छोटी-सी साधारण राखी पर पड़ी। दुकानदार ने कहा,

    “बहन, ये सिर्फ दस रुपये की है।”

     

    गुड़िया ने अपनी मुट्ठी खोली। उसके पास केवल आठ रुपये थे।

     

    वह उदास होकर बोली,

    “भैया, दो रुपये कम हैं… क्या मैं ये राखी आठ रुपये में ले सकती हूं?”

     

    दुकानदार ने उसकी आंखों में आंसू देखे और मुस्कुराकर राखी उसके हाथ में रख दी।

     

    “ले जा बेटी, आज ये राखी मेरी तरफ से।”

     

    गुड़िया की आंखें खुशी से भर आईं।

     

    अगले दिन सुबह मोहन घर पहुंचा। उसके कपड़े पुराने थे और चेहरा थकान से भरा हुआ था।

     

    गुड़िया ने मुस्कुराते हुए उसकी कलाई पर राखी बांधी और बोली,

    “भैया, मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है। बस ये राखी है… और मेरा ढेर सारा प्यार।”

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने बहन को गले लगाते हुए कहा,

    “तूने मुझे दुनिया की सबसे कीमती चीज दी है, गुड़िया। ये राखी मेरे लिए सोने से भी ज्यादा कीमती है।”

     

    गुड़िया ने पूछा,

    “भैया, तुम मेरे लिए क्या लाए हो?”

     

    मोहन कुछ नहीं बोला। उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा पैकेट निकाला।

     

    गुड़िया ने पैकेट खोला तो उसमें नई चप्पल थी।

     

    गुड़िया हैरान होकर बोली,

    “भैया! ये कितने की है?”

     

    मोहन मुस्कुराया,

    “बहन के लिए चीजों की कीमत नहीं देखी जाती।”

     

    गुड़िया की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    कुछ दिन बाद मोहन को शहर में एक अच्छी नौकरी मिल गई। उसकी मेहनत देखकर मालिक ने उसे स्थायी काम दे दिया।

     

    मोहन ने सबसे पहले अपनी बहन को शहर बुलाया और कहा,

    “अब मेरी बहन को गरीबी में नहीं रहना पड़ेगा।”

     

    गुड़िया मुस्कुराई और बोली,

    “मुझे महंगे कपड़े या बड़ा घर नहीं चाहिए भैया। बस हर रक्षाबंधन पर मेरी कलाई में राखी बंधवाने के लिए तुम मेरे पास रहना।”

     

    मोहन ने बहन का हाथ पकड़कर कहा,

    “जब तक मेरी सांस चलेगी, मैं तेरी रक्षा का वादा निभाऊंगा।”

     

    उस दिन दोनों भाई-बहन की आंखों में आंसू थे, लेकिन उन आंसुओं में दुख नहीं, बल्कि प्यार और भरोसा था।

     

    सीख:

    राखी की कीमत उसके धागे या उसकी कीमत से नहीं होती। राखी की असली कीमत भाई-बहन के प्यार, विश्वास और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने में होती है।

  • कर्मों का हिसाब

    कर्मों का हिसाब

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कर्मों का हिसाब

     

    एक छोटे से गाँव में रमेश नाम का एक आदमी रहता था। वह बहुत अमीर था, लेकिन उसका दिल गरीब था। गाँव में कोई जरूरतमंद मदद माँगने आता तो वह उसे खाली हाथ लौटा देता।

     

    रमेश का पड़ोसी हरि गरीब किसान था। एक साल उसकी फसल बर्बाद हो गई। घर में खाने तक के पैसे नहीं थे। हरि ने रमेश से कुछ पैसे उधार माँगे।

     

    रमेश ने हँसते हुए कहा,

    “मेरे पास पैसे पेड़ पर नहीं उगते। अपनी परेशानी खुद संभालो।”

     

    हरि निराश होकर घर लौट गया। उसकी पत्नी ने कहा, “भगवान सब देख रहे हैं। आज नहीं तो कल हर किसी को अपने कर्मों का हिसाब देना पड़ता है।”

     

    समय बीतता गया। रमेश का कारोबार खूब बढ़ा। उसने शहर में बड़ी दुकान खोल ली और गाँव के गरीब लोगों को नीचा दिखाने लगा।

     

    एक दिन रमेश शहर से गाँव लौट रहा था। रास्ते में उसकी गाड़ी अचानक खराब हो गई। रात काफी हो चुकी थी। सड़क सुनसान थी। रमेश मदद के लिए इधर-उधर देखने लगा।

     

    तभी एक आदमी लालटेन लेकर वहाँ पहुँचा।

     

    वह कोई और नहीं, हरि था।

     

    रमेश ने शर्मिंदा होकर कहा,

    “हरि… मेरी मदद कर दो।”

     

    हरि ने बिना कोई पुरानी बात याद दिलाए उसकी मदद की। उसने गाड़ी ठीक करवाने के लिए मैकेनिक बुलाया और रमेश को अपने घर ले गया।

     

    रमेश की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने कहा,

    “हरि, मैंने तुम्हें उस समय मदद से मना कर दिया था, फिर भी तुमने मेरी मदद की। तुम मुझसे अच्छे इंसान हो।”

     

    हरि मुस्कुराया और बोला,

    “भाई, मैं तुम्हारे कर्मों का हिसाब रखने वाला कौन होता हूँ? उसका हिसाब तो ऊपर वाला रखता है।”

     

    कुछ दिनों बाद रमेश के कारोबार में अचानक बहुत बड़ा नुकसान हो गया। उसके पास कुछ भी नहीं बचा। जिन लोगों के साथ उसने कभी घमंड किया था, उनमें से किसी ने उसका साथ नहीं दिया।

     

    उस समय हरि ही उसके पास खड़ा रहा।

     

    हरि ने उसे अपने खेत में काम करने का मौका दिया। धीरे-धीरे रमेश ने मेहनत करना सीखा और समझ गया कि पैसा इंसान को बड़ा नहीं बनाता, उसके कर्म उसे बड़ा बनाते हैं।

     

    एक दिन रमेश गाँव के मंदिर के सामने खड़ा होकर बोला—

     

    “मैंने जिंदगी भर दूसरों को छोटा समझा। आज समझ आया कि इंसान जितना दूसरों के साथ करता है, जिंदगी किसी न किसी रूप में उसका हिसाब जरूर लौटाती है।”

     

    उस दिन से रमेश बदल गया। उसने गरीबों की मदद करना शुरू कर दिया और कभी किसी जरूरतमंद को खाली हाथ नहीं लौटाया।

     

    कहानी की सीख:

    अच्छे कर्म का फल देर से मिल सकता है, लेकिन मिलता जरूर है। और बुरे कर्मों का हिसाब भी जिंदगी किसी न किसी मोड़ पर जरूर चुकाती है।