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  • एक दीवार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक दीवार, जिस पर वीर की आखिरी निशानी थी

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटा-सा गांव था—सूरजपुर। गांव के बीचों-बीच एक पुराना मकान था, जिसकी बाहरी दीवार बाकी घरों से बिल्कुल अलग थी। उस दीवार पर नीले रंग से बनी एक छोटी-सी तस्वीर थी—एक उड़ता हुआ पक्षी और उसके नीचे लिखा था—

     

    “हिम्मत कभी खत्म नहीं होती।”

     

    गांव के लोग उस दीवार के पास से गुजरते तो कुछ पल जरूर रुकते। क्योंकि वह तस्वीर किसी कलाकार ने नहीं बनाई थी।

     

    उसे बनाया था वीर ने।

     

    वीर गांव का एक सीधा-सादा और मेहनती लड़का था। उम्र मुश्किल से पच्चीस साल थी। उसे चित्र बनाने का बहुत शौक था। वह गांव की दीवारों पर छोटे-छोटे चित्र बनाता और बच्चों को भी चित्रकारी सिखाता था।

     

    उसका सपना था कि एक दिन गांव में बच्चों के लिए एक छोटी-सी कला की जगह बनाएगा।

     

    लेकिन वीर का सपना अधूरा रह गया।

     

    एक साल पहले वह शहर गया था। वहां नौकरी की तलाश में गया वीर वापस नहीं लौट सका। उसके साथ हुई एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गई।

     

    उस दिन से उसके परिवार के लिए जैसे समय रुक गया था।

     

    वीर की मां सरोज रोज शाम उसी दीवार के सामने बैठती थीं।

     

    लोग उनसे कहते, “माता जी, अब इस दीवार को रंगवा दीजिए। पुरानी हो गई है।”

     

    सरोज हर बार मना कर देतीं।

     

    “नहीं, इसे ऐसे ही रहने दो। यही तो मेरे वीर की आखिरी निशानी है।”

     

    वीर की छोटी बहन नंदिनी अपनी मां को देखती और चुप रहती।

     

    उसे भी वह दीवार बहुत प्यारी थी।

     

    एक दिन गांव के सरपंच ने घोषणा की कि मुख्य सड़क को चौड़ा करने के लिए पुराने मकान को तोड़ा जाएगा। उसके साथ वह दीवार भी टूटने वाली थी।

     

    यह सुनते ही नंदिनी परेशान हो गई।

     

    वह सरपंच के पास पहुंची।

     

    “काका, वो दीवार मत तुड़वाइए।”

     

    सरपंच ने समझाते हुए कहा, “बेटी, सड़क जरूरी है। दीवार को दूसरी जगह बना देंगे।”

     

    नंदिनी बोली, “लेकिन वीर भैया की आखिरी निशानी दूसरी जगह कैसे हो सकती है?”

     

    सरपंच के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    अगले दिन मजदूर दीवार नापने पहुंचे।

     

    सरोज दरवाजे के पास खड़ी होकर सब देखती रहीं।

     

    उनकी आंखों में आंसू थे।

     

    उन्होंने धीरे से दीवार को छुआ।

     

    “वीर… मैं तुम्हारी ये निशानी भी नहीं बचा पा रही।”

     

    नंदिनी ने मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, हम कोशिश करेंगे।”

     

    उस रात नंदिनी ने वीर की पुरानी चीजें निकालनी शुरू कीं।

     

    एक पुराने संदूक में उसे वीर की स्केचबुक मिली।

     

    उसमें गांव के कई चित्र बने थे।

     

    किसी पन्ने पर खेत थे, किसी पर नदी, किसी पर बच्चे।

     

    लेकिन आखिरी कुछ पन्नों पर एक ही तस्वीर बार-बार बनी थी।

     

    एक दीवार।

     

    और उसके सामने खेलते बच्चे।

     

    नंदिनी ने आखिरी पन्ना पलटा।

     

    नीचे वीर ने लिखा था—

     

    “अगर कभी मेरा बनाया चित्र मिट जाए, तो कोई बच्चा उसे फिर से बना दे। तस्वीर मिट सकती है, सपना नहीं।”

     

    नंदिनी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसे अचानक एक विचार आया।

     

    अगली सुबह उसने गांव के बच्चों को बुलाया।

     

    “तुम सब वीर भैया को जानते थे?”

     

    बच्चों ने सिर हिलाया।

     

    “तो क्या तुम उनकी दीवार बचाने में मेरी मदद करोगे?”

     

    सबने एक साथ कहा, “हां!”

     

    बच्चों ने गांव के लोगों से हस्ताक्षर करवाने शुरू किए।

     

    नंदिनी ने पंचायत में आवेदन दिया कि सड़क को थोड़ा मोड़कर उस दीवार को बचाया जाए।

     

    लेकिन सड़क बनाने वाली टीम ने साफ कह दिया कि नक्शे में बदलाव करना आसान नहीं होगा।

     

    नंदिनी निराश होकर घर लौट आई।

     

    उसे लगा कि शायद दीवार नहीं बच पाएगी।

     

    उस शाम वह दीवार के सामने बैठी थी।

     

    तभी उसे वीर की एक पुरानी बात याद आई।

     

    वीर अक्सर कहता था, “नंदू, अगर कोई रास्ता बंद हो जाए तो रोना मत। दूसरा रास्ता ढूंढना।”

     

    नंदिनी मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है भैया, दूसरा रास्ता ढूंढती हूं।”

     

    अगले दिन वह शहर के कार्यालय गई और अधिकारियों से मिली। उसने सड़क की योजना देखी और पता लगाया कि सड़क को थोड़ा आगे से मोड़ने पर दीवार बच सकती थी।

     

    उसने अधिकारियों को पुराने कागज और गांव वालों के हस्ताक्षर दिखाए।

     

    कई दिनों की भागदौड़ के बाद आखिरकार सड़क की योजना में छोटा-सा बदलाव कर दिया गया।

     

    दीवार बच गई।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    नंदिनी ने वीर की स्केचबुक में लिखी बात को सच करने का फैसला किया।

     

    उसने गांव के बच्चों के लिए उसी दीवार के पास एक छोटी-सी चित्रकारी की जगह बना दी।

     

    हर रविवार बच्चे वहां आते और दीवार के पास चित्र बनाते।

     

    कुछ ही महीनों में वह जगह रंग-बिरंगी तस्वीरों से भर गई।

     

    एक बच्चा दीवार पर सूरज बनाता।

     

    दूसरा नदी।

     

    कोई पेड़ बनाता तो कोई घर।

     

    एक दिन एक छोटी लड़की ने दीवार पर वही उड़ता हुआ पक्षी बनाया, जो वीर ने बनाया था।

     

    उसके नीचे उसने लिखा—

     

    “हिम्मत कभी खत्म नहीं होती।”

     

    सरोज ने वह तस्वीर देखी तो उनकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    नंदिनी ने पूछा, “मां, आप रो क्यों रही हैं?”

     

    सरोज मुस्कुराईं।

     

    “आज पहली बार ये दीवार मुझे वीर की याद दिलाकर दुखी नहीं कर रही।”

     

    नंदिनी ने मां की तरफ देखा।

     

    सरोज बोलीं, “अब लगता है मेरा बेटा यहां कहीं गया ही नहीं। देख, उसके सपने अभी भी यहीं हैं।”

     

    धीरे-धीरे उस जगह की पहचान पूरे गांव में बन गई।

     

    लोग उसे “वीर की दीवार” कहने लगे।

     

    कई साल बीत गए।

     

    नंदिनी ने वीर के सपने को आगे बढ़ाया। उसने गांव के बच्चों को चित्रकारी सिखानी शुरू कर दी।

     

    एक दिन शहर से कुछ लोग गांव आए। उन्होंने बच्चों की बनाई तस्वीरें देखीं और उनमें से कई बच्चों को आगे सीखने के लिए छात्रवृत्ति देने का फैसला किया।

     

    नंदिनी दीवार के सामने खड़ी होकर मुस्कुरा रही थी।

     

    उसे लगा जैसे वीर कहीं पास खड़ा होकर कह रहा हो—

     

    “देखा नंदू, मैंने कहा था ना… सपना मत छोड़ना।”

     

    नंदिनी ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    वही पुराना नीला पक्षी अब भी वहां था।

     

    रंग थोड़ा फीका पड़ चुका था, लेकिन तस्वीर मिटने का नाम नहीं ले रही थी।

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

     

    “भैया, तुम्हारी आखिरी निशानी अब सिर्फ ये दीवार नहीं है।”

     

    उसने सामने खेलते बच्चों की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी आखिरी निशानी अब इन बच्चों के सपने हैं।”

     

    हवा चली।

     

    दीवार पर बना पक्षी जैसे उड़ता हुआ दिखाई दिया।

     

    सरोज ने आसमान की तरफ देखा और मुस्कुराईं।

     

    वीर चला गया था, लेकिन उसकी सोच, उसकी मेहनत और उसका सपना गांव में जिंदा था।

     

    और वह पुरानी दीवार आज भी यही कहती थी—

     

    इंसान चला जाता है, लेकिन अगर वह किसी के जीवन में उम्मीद छोड़ जाए, तो उसकी निशानी कभी खत्म नहीं होती।

  • खुली किताब

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    खुली किताब, ना जाने क्या था वो राज

     

    शहर के एक पुराने मोहल्ले में काव्या नाम की एक लड़की रहती थी। उम्र करीब बाईस साल थी। वह शांत स्वभाव की थी और हर किसी से बहुत कम बात करती थी। मोहल्ले के लोग उसे देखकर अक्सर कहते, “काव्या तो खुली किताब है, उसके अंदर ऐसा क्या छिपा होगा जो किसी को पता ही नहीं?”

     

    काव्या का जीवन बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देता था। सुबह घर का काम, फिर कॉलेज और शाम को अपनी मां के साथ बैठकर बातें करना। लेकिन उसके कमरे की एक पुरानी लकड़ी की अलमारी ऐसी थी, जिसे वह किसी को छूने तक नहीं देती थी।

     

    उस अलमारी में एक मोटी-सी नीली डायरी रखी थी।

     

    वह डायरी काव्या हमेशा अपने साथ रखती थी।

     

    एक दिन उसकी सहेली रिया उसके घर आई।

     

    रिया ने मजाक करते हुए कहा, “तुम्हारी जिंदगी में कुछ तो ऐसा है जो तुम हमसे छिपा रही हो।”

     

    काव्या हंस दी।

     

    “ऐसा कुछ नहीं है।”

     

    रिया ने अलमारी की तरफ देखते हुए कहा, “फिर ये अलमारी हमेशा बंद क्यों रहती है?”

     

    काव्या का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “बस… इसमें पुरानी चीजें हैं।”

     

    रिया ने ज्यादा सवाल नहीं किया, लेकिन उसे समझ आ गया कि बात कुछ और है।

     

    उस रात काव्या अपने कमरे में बैठी डायरी खोलकर कुछ लिख रही थी।

     

    उसने लिखा—

     

    “आज फिर किसी ने उस अलमारी के बारे में पूछा। मुझे डर लग रहा है कि कहीं वह राज सबके सामने न आ जाए।”

     

    इतना लिखकर उसने डायरी बंद कर दी।

     

    अगले दिन कॉलेज में काव्या को एक अजीब-सा लिफाफा मिला।

     

    लिफाफे पर सिर्फ उसका नाम लिखा था।

     

    अंदर एक छोटी-सी चिट्ठी थी—

     

    “तुमने जिस राज को इतने साल छिपाकर रखा है, अब उसे छिपाना मुश्किल होगा।”

     

    काव्या के हाथ कांपने लगे।

     

    वह चिट्ठी तुरंत फाड़कर बैग में रख ली।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह चिट्ठी किसने भेजी।

     

    उस दिन वह सीधे घर पहुंची और कमरे की अलमारी खोली।

     

    नीली डायरी वहीं थी।

     

    लेकिन उसके नीचे रखा एक छोटा डिब्बा गायब था।

     

    काव्या घबरा गई।

     

    वह डिब्बा उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा राज था।

     

    उसमें एक पुरानी फोटो और एक अस्पताल की पर्ची थी।

     

    सत्रह साल पहले की।

     

    काव्या तब सिर्फ पांच साल की थी।

     

    उस दिन उसके पिता उसे लेकर कहीं गए थे और लौटकर कभी नहीं आए।

     

    परिवार ने सबको यही बताया था कि उनके पिता की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।

     

    लेकिन काव्या को बचपन से लगता था कि कहानी कुछ और है।

     

    उसकी मां ने हमेशा उस बात को टाल दिया था।

     

    कुछ साल पहले काव्या को घर की सफाई करते समय एक पुराना कागज मिला था। उसमें लिखा था कि उसके पिता का इलाज एक दूसरे शहर के अस्पताल में हुआ था।

     

    काव्या ने उस दिन से अपने पिता की सच्चाई जानने की कोशिश शुरू कर दी थी।

     

    उसने कई साल तक सबूत जमा किए।

     

    फोटो, पुराने कागज, अस्पताल की पर्चियां और कुछ चिट्ठियां।

     

    लेकिन वह अपनी मां को दुख नहीं देना चाहती थी।

     

    इसीलिए उसने सब कुछ उस नीली डायरी में छिपाकर रखा था।

     

    अब वह डिब्बा गायब था।

     

    काव्या ने अपनी मां से पूछा, “मां, मेरी पुरानी चीजों में से एक डिब्बा गायब है। आपने देखा है?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “नहीं।”

     

    काव्या ने मां की आंखों में देखा।

     

    उसे पहली बार लगा कि शायद मां कुछ जानती हैं।

     

    उस रात घर की घंटी बजी।

     

    बाहर एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।

     

    उसने काव्या को देखते ही कहा, “तुम बिल्कुल अपने पिता जैसी दिखती हो।”

     

    काव्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “आप मेरे पिता को जानते थे?”

     

    आदमी ने सिर हिलाया।

     

    “मैं उनका दोस्त था।”

     

    काव्या ने उसे अंदर बुलाया।

     

    आदमी ने बताया कि उसके पिता की मौत सड़क दुर्घटना में नहीं हुई थी।

     

    उस रात वे एक जरूरी कागज लेकर शहर से बाहर जा रहे थे। रास्ते में दुर्घटना हुई और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। अस्पताल पहुंचने के बाद कई दिनों तक उनका इलाज चला।

     

    “लेकिन फिर मां ने क्यों कहा कि उनकी मौत हो गई?”

     

    आदमी ने कहा, “क्योंकि तुम्हारे पिता की हालत बहुत खराब थी। उन्हें डर था कि अगर तुमसे मिलने की कोशिश करेंगे तो तुम्हारी मां और तुम्हें खतरा हो सकता है।”

     

    काव्या को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “खतरा किससे?”

     

    आदमी ने धीरे से जवाब दिया, “तुम्हारे पिता ने एक बड़ी धोखाधड़ी का सच पता लगाया था। कुछ लोग नहीं चाहते थे कि वह सच सामने आए।”

     

    काव्या की सांसें तेज हो गईं।

     

    तभी उसकी मां कमरे में आ गईं।

     

    मां की आंखों में आंसू थे।

     

    उन्होंने कहा, “अब बहुत हो गया।”

     

    काव्या ने मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, सच क्या है?”

     

    मां ने आखिरकार वह राज खोल दिया जिसे उन्होंने सत्रह साल से अपने दिल में दबाकर रखा था।

     

    काव्या के पिता की मौत दुर्घटना के कुछ दिनों बाद अस्पताल में हुई थी। लेकिन मरने से पहले उन्होंने एक सबूत अपनी पत्नी को सौंपा था।

     

    वह सबूत एक पुराने मामले में शामिल लोगों को बेनकाब कर सकता था।

     

    काव्या की मां ने उस सबूत को सुरक्षित रखा और काव्या से सारी बात इसलिए छिपाई क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि उनकी बेटी किसी खतरे में पड़े।

     

    काव्या की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “तो आपने मुझसे इतने साल झूठ क्यों बोला?”

     

    मां ने उसे गले लगाते हुए कहा, “क्योंकि मैं तुम्हें खोने से डरती थी।”

     

    कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर काव्या ने नीली डायरी उठाई।

     

    उसने आखिरी पन्ना खोला।

     

    वहां उसके पिता की लिखावट में कुछ शब्द थे—

     

    “अगर मेरी बेटी कभी यह पढ़े, तो उसे बताना कि मैंने उससे कभी कुछ छिपाना नहीं चाहा। मैं बस चाहता था कि वह सुरक्षित रहे।”

     

    काव्या ने डायरी सीने से लगा ली।

     

    उसे लगा जैसे इतने वर्षों बाद उसके पिता ने उससे बात की हो।

     

    अगले दिन काव्या और उसकी मां ने सारे सबूत पुलिस को सौंप दिए। पुराने मामले की जांच दोबारा शुरू हुई।

     

    काव्या के लिए सबसे बड़ा राज अब राज नहीं रहा था।

     

    उसने अपनी डायरी का आखिरी पन्ना खोला और लिखा—

     

    “मैं सच से भागती रही, लेकिन सच ने मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ा। आज समझ आया कि कुछ राज छिपाने के लिए नहीं, सही समय आने पर सामने लाने के लिए होते हैं।”

     

    काव्या सचमुच एक खुली किताब थी।

     

    लेकिन उस किताब का सबसे जरूरी पन्ना इतने वर्षों से बंद था।

     

    अब वह पन्ना खुल चुका था।

     

    और उसमें कोई डर नहीं था।

     

    सिर्फ एक पिता का अपनी बेटी के लिए अधूरा प्यार था, एक मां की मजबूरी थी और एक ऐसा सच था, जिसने काव्या को हमेशा के लिए बदल दिया था।

     

    उस दिन के बाद काव्या ने अपनी नीली डायरी बंद करके अलमारी में नहीं रखी।

     

    उसने उसे अपनी मेज पर रख दिया।

     

    क्योंकि अब उसे किसी राज को छिपाने की जरूरत नहीं थी।

  • मोटा आदमी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मोटा आदमी जिसे कोई काम का नहीं समझता

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में रमेश नाम का एक आदमी रहता था। उसकी उम्र करीब पैंतीस साल थी। रमेश का शरीर भारी था और उसका वजन बाकी लोगों से ज्यादा था। इसी वजह से मोहल्ले के लोग उसे अक्सर मजाक का निशाना बना लेते थे।

     

    कोई उसे देखकर हंसता तो कोई कहता, “अरे रमेश, तुमसे कौन-सा काम होगा?”

     

    रमेश बाहर से मुस्कुरा देता, लेकिन ऐसी बातें उसके दिल में चुभ जाती थीं।

     

    रमेश बचपन से ही थोड़ा भारी शरीर का था। स्कूल में बच्चे उसे अलग-अलग नामों से बुलाते थे। वह खेल में तेज नहीं था, इसलिए उसे टीम में सबसे आखिर में लिया जाता। समय के साथ उसने लोगों की बातें सुनना तो सीख लिया, लेकिन उन बातों को दिल से निकालना नहीं सीख पाया।

     

    उसके पिता की एक छोटी-सी साइकिल की दुकान थी। पिता के गुजर जाने के बाद रमेश ने दुकान संभाल ली।

     

    दुकान ज्यादा बड़ी नहीं थी, लेकिन रमेश को साइकिलों की अच्छी जानकारी थी। कौन-सा पुर्जा कहां लगेगा, किस आवाज से कौन-सी खराबी है और किस साइकिल में क्या दिक्कत है, वह तुरंत समझ जाता था।

     

    फिर भी मोहल्ले वालों को उसकी काबिलियत दिखाई नहीं देती थी।

     

    एक दिन एक ग्राहक अपनी साइकिल लेकर आया।

     

    उसने रमेश को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, “तुम ठीक करोगे?”

     

    रमेश मुस्कुराया, “हां, क्यों नहीं?”

     

    ग्राहक हंसते हुए बोला, “तुम खुद मुश्किल से चलते हो, साइकिल क्या ठीक करोगे?”

     

    पास खड़े दो लोग भी हंसने लगे।

     

    रमेश कुछ नहीं बोला।

     

    उसने साइकिल उठाई और कुछ ही मिनटों में खराबी ठीक कर दी।

     

    ग्राहक ने साइकिल चलाकर देखी।

     

    “अरे, ठीक तो कर दी!”

     

    रमेश ने कहा, “काम करने के लिए शरीर का आकार नहीं, हुनर चाहिए।”

     

    ग्राहक बिना कुछ बोले चला गया।

     

    एक दिन मोहल्ले में खबर फैली कि पास के मैदान में बच्चों के लिए साइकिल दौड़ होने वाली है। सभी बच्चे तैयारी करने लगे।

     

    रमेश भी मैदान के पास खड़ा बच्चों को देख रहा था।

     

    एक छोटा बच्चा बार-बार गिर रहा था। बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे।

     

    रमेश उसके पास गया।

     

    “गिरने से डरोगे तो चलाना कैसे सीखोगे?”

     

    बच्चे ने पूछा, “आप मुझे सिखाओगे?”

     

    रमेश ने मुस्कुराकर कहा, “जरूर।”

     

    अगले कुछ दिनों तक रमेश ने उस बच्चे को साइकिल चलाना सिखाया। बच्चा धीरे-धीरे अच्छा चलाने लगा।

     

    लेकिन मोहल्ले के लोग फिर भी रमेश को गंभीरता से नहीं लेते थे।

     

    एक शाम तेज बारिश शुरू हो गई। सड़क पर पानी भरने लगा। उसी समय मोहल्ले के एक घर में रहने वाली बुजुर्ग महिला की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

     

    उनका बेटा शहर से बाहर था।

     

    लोग घर के बाहर जमा हो गए, लेकिन कोई समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाए।

     

    रमेश तुरंत आगे आया।

     

    उसने पड़ोसी की मदद से महिला को सुरक्षित जगह पहुंचाया और डॉक्टर को बुलाने की व्यवस्था की।

     

    कुछ देर बाद डॉक्टर आ गए।

     

    महिला की हालत संभल गई।

     

    उनके बेटे ने फोन पर रमेश को धन्यवाद दिया।

     

    लेकिन रमेश ने कहा, “धन्यवाद की जरूरत नहीं। पड़ोसी होने का फर्ज था।”

     

    उस दिन कुछ लोगों को पहली बार महसूस हुआ कि जिसे वे बेकार समझते थे, वही मुश्किल समय में सबसे आगे खड़ा था।

     

    फिर भी रमेश के सामने सबसे बड़ी परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी दुकान के सामने एक बच्चा रोता हुआ आया।

     

    उसकी साइकिल चोरी हो गई थी।

     

    वह साइकिल उसके पिता ने बड़ी मेहनत से खरीदी थी।

     

    रमेश ने बच्चे को शांत किया और कहा, “तुम चिंता मत करो। हम उसे ढूंढेंगे।”

     

    रमेश ने आसपास की दुकानों से पूछताछ की। उसने लोगों से बात की और आखिरकार उसे पता चला कि साइकिल पास के पुराने गोदाम के पीछे दिखाई गई थी।

     

    वह वहां गया और साइकिल मिल गई।

     

    बच्चा खुशी से रमेश के गले लग गया।

     

    “आप बहुत अच्छे हो!”

     

    रमेश की आंखें नम हो गईं।

     

    उसे लगा जैसे किसी ने पहली बार उसके वजन को नहीं, बल्कि उसके दिल को देखा हो।

     

    कुछ महीनों बाद मोहल्ले में एक बड़ी समस्या आ गई।

     

    मुख्य सड़क पर एक पुराना पुल बारिश के कारण कमजोर हो गया था। रात के समय वहां से गुजरना खतरनाक था।

     

    कई लोग नगर निगम से शिकायत कर चुके थे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

     

    रमेश ने हार नहीं मानी।

     

    उसने मोहल्ले के लोगों को इकट्ठा किया और कहा, “अगर हम सब मिलकर लिखित शिकायत देंगे और रास्ते की तस्वीरें दिखाएंगे तो शायद बात जल्दी सुनी जाएगी।”

     

    लोगों ने उसकी बात मान ली।

     

    रमेश ने सबकी मदद से शिकायत तैयार करवाई।

     

    कुछ दिनों बाद अधिकारियों की टीम वहां पहुंची।

     

    पुल की मरम्मत शुरू हुई।

     

    मोहल्ले के लोगों को समझ आने लगा कि रमेश सिर्फ दुकान चलाने वाला आदमी नहीं था। वह समझदार था, मेहनती था और सबसे बढ़कर लोगों की मदद करने वाला था।

     

    एक दिन वही ग्राहक दुकान पर आया जिसने रमेश का मजाक उड़ाया था।

     

    उसने कहा, “रमेश भाई, मुझे आपसे माफी मांगनी है।”

     

    रमेश ने पूछा, “किस बात की?”

     

    “मैं आपको सिर्फ आपके शरीर से पहचानता था। मुझे लगा था कि आप किसी काम के नहीं। लेकिन अब समझ आया कि इंसान को देखकर नहीं, उसके काम देखकर पहचानना चाहिए।”

     

    रमेश मुस्कुराया।

     

    “कोई बात नहीं। बस आगे से किसी को उसके शरीर देखकर मत आंकना।”

     

    कुछ समय बाद रमेश ने अपनी दुकान के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “यहां साइकिल ही नहीं, हिम्मत भी ठीक की जाती है।”

     

    मोहल्ले के बच्चे अक्सर उसके पास आने लगे। वह उन्हें साइकिल ठीक करना सिखाता, जरूरतमंदों की मदद करता और बच्चों को समझाता कि किसी के रूप या शरीर का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।

     

    एक दिन वही छोटा बच्चा, जिसे रमेश ने साइकिल चलाना सिखाया था, दौड़ जीतकर आया।

     

    उसने अपनी ट्रॉफी रमेश के हाथ में रख दी।

     

    “ये आपकी है।”

     

    रमेश ने हंसकर कहा, “नहीं, ये तुम्हारी मेहनत है।”

     

    बच्चे ने कहा, “लेकिन अगर आप मुझे नहीं सिखाते तो मैं कभी जीत नहीं पाता।”

     

    रमेश कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे।

     

    जिस आदमी को कभी मोहल्ला “किसी काम का नहीं” समझता था, आज वही सबके लिए सबसे भरोसेमंद इंसान बन चुका था।

     

    रमेश ने उस दिन आईने में खुद को देखा।

     

    उसे अपना शरीर पहले जैसा ही दिखाई दिया।

     

    लेकिन आज पहली बार उसे अपने अंदर की काबिलियत भी दिखाई दे रही थी।

     

    उसे समझ आ गया था कि दुनिया चाहे जितने नाम दे, इंसान की असली पहचान उसके शरीर से नहीं, उसके कर्म, व्यवहार और दिल से होती है।

     

    और शायद यही उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत थी।

  • नन्हे बच्चे की परछाई

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    नन्हे बच्चे की परछाई

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। गांव के आखिरी छोर पर बना एक पुराना घर कई सालों से बंद पड़ा था। लोग उसे “परछाई वाला घर” कहते थे। उनका कहना था कि रात के समय उस घर की खिड़की पर एक छोटे बच्चे की परछाई दिखाई देती है।

     

    गांव के लोग उस घर के पास जाने से भी डरते थे।

     

    एक दिन शहर से आरव अपनी मां और छोटी बहन के साथ उसी गांव में अपने नाना के पुराने घर में रहने आया। आरव की उम्र चौदह साल थी। उसे भूत-प्रेत की बातें मजाक लगती थीं।

     

    पहली ही शाम उसने गांव के कुछ बच्चों से उस पुराने घर के बारे में सुना।

     

    एक बच्चा बोला, “वहां रात में मत जाना। एक नन्हे बच्चे की परछाई आती है।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “परछाई तो हर इंसान की होती है। इसमें डरने वाली क्या बात है?”

     

    बच्चे चुप हो गए।

     

    उस रात आरव अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था। अचानक उसकी नजर दूर उस पुराने घर पर पड़ी।

     

    घर की ऊपरी खिड़की पर हल्की-सी रोशनी थी।

     

    आरव ने आंखें सिकोड़कर देखा।

     

    खिड़की के सामने एक छोटे बच्चे जैसी परछाई खड़ी थी।

     

    आरव के चेहरे की हंसी गायब हो गई।

     

    परछाई कुछ पल वहीं खड़ी रही। फिर धीरे-धीरे उसने अपना हाथ उठाया और खिड़की के शीशे पर तीन बार दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव घबरा गया।

     

    उसी समय पीछे से उसकी मां की आवाज आई, “आरव, क्या हुआ?”

     

    आरव ने तुरंत पीछे देखा।

     

    “कुछ नहीं मां।”

     

    जब उसने दोबारा खिड़की की तरफ देखा तो वहां कोई परछाई नहीं थी।

     

    अगली सुबह आरव ने गांव के बूढ़े चौकीदार हरिया काका से उस घर के बारे में पूछा।

     

    हरिया काका कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “बहुत साल पहले उस घर में मोहन नाम का एक छोटा बच्चा रहता था। बहुत मासूम था। उसकी उम्र शायद सात साल रही होगी।”

     

    “फिर क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

     

    हरिया काका ने लंबी सांस ली।

     

    “एक रात घर में आग लग गई। उसके माता-पिता तो बाहर निकल आए, लेकिन बच्चा अंदर रह गया। उसके बाद से वह घर बंद कर दिया गया।”

     

    आरव के मन में उस परछाई का ख्याल घूमने लगा।

     

    “क्या लोग कहते हैं कि वही बच्चा दिखाई देता है?”

     

    हरिया काका ने सिर हिला दिया।

     

    “हां। लेकिन एक बात समझ नहीं आई आज तक… वह परछाई किसी को डराती नहीं। बस खिड़की पर खड़ी होती है और जैसे किसी का इंतजार करती है।”

     

    उस रात आरव सो नहीं पाया।

     

    करीब बारह बजे फिर वही ठक… ठक… ठक… की आवाज सुनाई दी।

     

    आरव ने खिड़की खोली।

     

    दूर पुराने घर की खिड़की में वही नन्ही परछाई दिखाई दे रही थी।

     

    इस बार वह हाथ से इशारा कर रही थी।

     

    जैसे आरव को बुला रही हो।

     

    आरव का डर धीरे-धीरे जिज्ञासा में बदल गया।

     

    अगली शाम वह चुपचाप पुराने घर के पास पहुंच गया।

     

    दरवाजा आधा खुला था।

     

    अंदर धूल जमी हुई थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। सीढ़ियों के पास एक टूटा हुआ लकड़ी का खिलौना पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    तभी ऊपर से बच्चे के हंसने जैसी बहुत धीमी आवाज आई।

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक छोटी-सी परछाई खड़ी थी।

     

    वह कुछ पल आरव को देखती रही।

     

    फिर मुड़ी और कमरे के अंदर चली गई।

     

    आरव भी उसके पीछे चला गया।

     

    कमरे में पहुंचकर उसे कुछ दिखाई नहीं दिया।

     

    लेकिन सामने की दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में एक छोटा बच्चा मुस्कुरा रहा था।

     

    आरव समझ गया।

     

    “मोहन…”

     

    अचानक कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    ठंडी हवा अंदर आई।

     

    दीवार पर फिर वही परछाई दिखाई दी।

     

    इस बार उसने जमीन की तरफ इशारा किया।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    फर्श के एक हिस्से पर लकड़ी का पुराना पट्टा लगा था।

     

    उसने उसे हटाया तो नीचे एक छोटी-सी लोहे की पेटी मिली।

     

    पेटी के अंदर कुछ पुराने कागज और एक डायरी थी।

     

    डायरी मोहन के पिता की थी।

     

    आरव ने कांपते हाथों से पन्ने पलटे।

     

    एक जगह लिखा था—

     

    “अगर कभी मेरे बेटे को कुछ हो जाए, तो दुनिया को सच जरूर बताना। उस रात घर में आग अपने आप नहीं लगी थी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    आगे लिखा था कि घर में रखी जमीन के कागजों को हड़पने के लिए किसी ने आग लगाई थी। लेकिन उसके पिता उस व्यक्ति का नाम लिख पाते, उससे पहले डायरी का आखिरी पन्ना फट चुका था।

     

    आरव समझ गया कि मोहन की परछाई किसी को डराने नहीं, बल्कि सच सामने लाने के लिए दिखाई देती थी।

     

    वह डायरी लेकर गांव के लोगों के पास गया।

     

    हरिया काका ने डायरी देखी तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं जानता था… मोहन की आत्मा बेवजह नहीं भटक रही।”

     

    गांव के पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए। आखिरकार पता चला कि उस समय जमीन पर कब्जा करने वाला व्यक्ति गांव का ही एक प्रभावशाली आदमी था। सबूत मिलने पर वर्षों पुराना सच सामने आ गया।

     

    कुछ दिनों बाद उस पुराने घर को ठीक करने का फैसला हुआ।

     

    लेकिन काम शुरू होने से पहले आरव आखिरी बार उस घर में गया।

     

    वही कमरा।

     

    वही खिड़की।

     

    वही सन्नाटा।

     

    आरव ने धीरे से कहा, “मोहन… तुम्हारा सच सबको पता चल गया।”

     

    कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर खिड़की पर हल्की रोशनी पड़ी।

     

    दीवार पर एक छोटी-सी परछाई दिखाई दी।

     

    इस बार वह डरी हुई नहीं थी।

     

    वह मुस्कुराती हुई लग रही थी।

     

    उसने धीरे से हाथ हिलाया।

     

    और फिर…

     

    परछाई हमेशा के लिए गायब हो गई।

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उस दिन उसे समझ आया कि हर परछाई डराने नहीं आती।

     

    कुछ परछाइयां अपना अधूरा सच पूरा करवाने आती हैं।

     

    कई साल बाद भी गांव के बुजुर्ग उस घर की कहानी सुनाते थे।लेकिन अब कोई उसे “परछाई वाला घर” नहीं कहता था।

     

    लोग उसे “मोहन का घर” कहते थे।

     

    और कहते थे—

     

    “जिस बच्चे की परछाई कभी सबको डराती थी, वही परछाई आखिर में पूरे गांव को एक बड़ा सच दिखाकर चली गई।”

  • एक मिस्ट्री जो सुलझी नहीं

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक मिस्ट्री जो सुलझी नहीं

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुरानी हवेली थी। लोग उसे “नीली हवेली” कहते थे। दिन में भी वह जगह कुछ अजीब लगती थी, लेकिन रात होते ही उसके बारे में तरह-तरह की बातें होने लगती थीं।

     

    कहा जाता था कि करीब बीस साल पहले उस हवेली में रहने वाला एक परिवार अचानक गायब हो गया था। घर में सामान तक वैसा ही पड़ा मिला था, जैसे लोग बस कुछ देर के लिए बाहर गए हों। मगर वे कभी वापस नहीं आए।

     

    सबसे अजीब बात यह थी कि उस घर की सबसे छोटी बच्ची की एक तस्वीर हवेली में मिली थी, लेकिन उसके बाद उस बच्ची का कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।

     

    बीस साल बाद मीरा उस हवेली के सामने खड़ी थी।

     

    मीरा बीस साल की एक शांत लेकिन जिज्ञासु लड़की थी। उसके हाथ में एक पुरानी भूरी डायरी थी, जो उसे अपनी नानी के पुराने सामान में मिली थी। डायरी के पहले ही पन्ने पर वही निशान बना था, जो नीली हवेली की दीवार पर भी बना हुआ था।

     

    मीरा ने धीरे से कहा,

    “आखिर इस निशान का राज क्या है?”

     

    तभी उसके पीछे से आवाज आई।

     

    “अगर तुम सच जानना चाहती हो, तो अंदर मत जाना।”

     

    मीरा पलटी। सामने एक रहस्यमयी युवक खड़ा था।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    युवक ने कुछ देर उसे देखा और बोला,

    “मुझे नाम से ज्यादा उस घर की कहानी पता है।”

     

    “तो फिर मुझे बताओ।”

     

    “हर कहानी बताने के लिए नहीं होती।”

     

    मीरा ने डायरी कसकर पकड़ ली।

     

    “लेकिन मैं जानना चाहती हूं कि इस निशान का मेरी जिंदगी से क्या संबंध है।”

     

    युवक का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि इसका तुम्हारी जिंदगी से संबंध है?”

     

    मीरा ने डायरी खोलकर उसे निशान दिखाया।

     

    “क्योंकि यही निशान मुझे बचपन से सपनों में दिखाई देता है।”

     

    युवक कुछ नहीं बोला।

     

    दोनों हवेली के अंदर चले गए।

     

    अंदर धूल से ढकी पुरानी मेजें, बंद खिड़कियां और दीवारों पर लगे धुंधले चित्र थे। मीरा धीरे-धीरे एक कमरे में पहुंची। वहां लकड़ी की एक पुरानी मेज रखी थी।

     

    मेज की दराज में उसे एक दूसरी डायरी मिली।

     

    डायरी खोलते ही मीरा के हाथ कांपने लगे।

     

    एक पन्ने पर एक छोटी बच्ची की तस्वीर चिपकी थी।

     

    मीरा तस्वीर को देखते ही चुप हो गई।

     

    वह बच्ची बिल्कुल उसी जैसी दिख रही थी।

     

    “ये… मैं हूं।”

     

    युवक ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    “नहीं। यह संभव नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह तस्वीर बीस साल पुरानी है।”

     

    मीरा की आंखों में सवाल थे।

     

    “तो फिर मैं इस तस्वीर में कैसे हो सकती हूं?”

     

    युवक ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहां वही रहस्यमयी निशान बना था और उसके नीचे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जब वह लौटेगी, सच फिर से जाग जाएगा।”

     

    मीरा ने पूछा,

    “वह कौन?”

     

    युवक ने जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक कमरे के बाहर कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    दोनों बाहर आए, लेकिन गलियारा खाली था।

     

    मीरा ने देखा कि दीवार पर लगा एक पुराना चित्र थोड़ा टेढ़ा था। उसने उसे सीधा किया तो पीछे एक छोटा सा कागज मिला।

     

    कागज पर लिखा था—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रही हो, वह तुम्हारे सबसे करीब है।”

     

    मीरा ने युवक की तरफ देखा।

     

    “क्या तुम जानते हो कि यहां क्या हुआ था?”

     

    वह कुछ देर चुप रहा।

     

    “मेरे पिता इस हवेली की देखभाल करते थे। उस रात उन्होंने मुझे घर से बाहर भेज दिया था। सुबह जब मैं वापस आया, तो पूरा परिवार गायब था।”

     

    “और तुम्हारे पिता?”

     

    “वह भी।”

     

    “फिर तुम इतने सालों से इस घर में क्यों आते रहे?”

     

    युवक ने धीमे स्वर में कहा,

    “क्योंकि मेरे पिता ने जाते वक्त मुझे एक बात कही थी।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर कभी वह लड़की वापस आए, तो उसे डायरी दे देना।”

     

    मीरा की सांस जैसे रुक गई।

     

    “कौन-सी लड़की?”

     

    युवक ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों बिल्कुल शांत रहे।

     

    मीरा ने डायरी का आखिरी पन्ना खोला। वहां एक नक्शा बना था। नक्शे में हवेली के नीचे बने किसी पुराने कमरे का रास्ता दिखाया गया था।

     

    दोनों उस रास्ते को ढूंढते हुए तहखाने तक पहुंचे।

     

    वहां एक लोहे का दरवाजा था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था।

     

    मीरा ने कांपते हाथ से निशान को छुआ।

     

    दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था। कमरे के बीच में लकड़ी की कुर्सी और उसके सामने एक पुराना आईना रखा था।

     

    आईने के नीचे एक कागज पड़ा था।

     

    मीरा ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “सच जानने से पहले यह तय कर लो कि तुम उसे सह पाओगी या नहीं।”

     

    मीरा ने युवक से कहा,

    “मैं पीछे नहीं हटूंगी।”

     

    वह धीरे से बोला,

    “तो फिर आईने के पीछे देखो।”

     

    मीरा ने आईना हटाया।

     

    पीछे दीवार पर दर्जनों तस्वीरें थीं।

     

    उन सभी तस्वीरों में वही बच्ची थी।

     

    कभी हवेली में।

     

    कभी किसी गांव में।

     

    कभी एक अनजान आदमी के साथ।

     

    लेकिन सबसे आखिरी तस्वीर देखकर मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उस तस्वीर में वही बच्ची एक महिला के साथ खड़ी थी।

     

    वह महिला मीरा की मां जैसी दिख रही थी।

     

    मीरा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी मां… यहां क्यों थी?”

     

    युवक ने तस्वीर हाथ में ली।

     

    “शायद तुम्हारी मां इस राज को जानती थीं।”

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं बताया।”

     

    तभी डायरी का एक छिपा हुआ पन्ना नीचे गिरा।

     

    उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

     

    “वह जिंदा है।”

     

    मीरा ने घबराकर पूछा,

    “कौन?”

     

    लेकिन इस बार युवक भी जवाब नहीं दे पाया।

     

    तभी बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    दोनों दौड़कर बाहर आए।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    मगर वहां कोई नहीं था।

     

    बस फर्श पर एक नया कागज पड़ा था।

     

    मीरा ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर तुम यहां तक पहुंच गई हो, तो समझो कहानी खत्म नहीं हुई… असली रहस्य अब शुरू हुआ है।”

     

    मीरा ने युवक की तरफ देखा।

     

    “इसका मतलब जिसने यह सब लिखा, वह अभी भी जिंदा है?”

     

    युवक ने धीमे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    “और मेरी मां?”

     

    “शायद वह भी इस राज का हिस्सा थीं।”

     

    “और वह बच्ची?”

     

    युवक ने मीरा की तरफ देखा।

     

    “शायद वह तुम थीं… या शायद किसी ने तुम्हें यह विश्वास दिलाया कि तुम वही बच्ची हो।”

     

    मीरा कुछ बोल नहीं पाई।

     

    अगले दिन पुलिस को हवेली बिल्कुल खाली मिली।

     

    मेज पर सिर्फ दो डायरी थीं।

     

    मीरा और वह रहस्यमयी युवक कहीं नहीं थे।

     

    आज बीस साल बाद भी नीली हवेली बंद है।

     

    लोग कहते हैं कि कभी-कभी रात में उसके अंदर से पन्ने पलटने की आवाज आती है।

     

    कभी किसी लड़की की धीमी आवाज सुनाई देती है—

     

    “सच आखिर है क्या?”

     

    और हवेली की दीवार पर बना वह रहस्यमयी निशान आज भी वैसा ही है।

     

    किसी को नहीं पता कि मीरा कहां गई।

     

    किसी को यह भी नहीं पता कि उस तस्वीर वाली बच्ची वास्तव में कौन थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल…

     

    क्या मीरा उस रहस्य को सुलझाने गई थी, या वह खुद उस रहस्य का सबसे बड़ा हिस्सा थी?

     

    आज तक इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला।

     

    यह एक ऐसी मिस्ट्री है… जो शुरू तो हुई, लेकिन कभी सुलझी नहीं।

  • कान्हा की छोटी कटोरी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    कान्हा की छोटी कटोरी और रहस्यमयी निशान

     

    सुबह की सुनहरी धूप नंद भवन के आँगन में फैल रही थी। कान्हा जल्दी-जल्दी उठकर बाहर आए। उनके मन में सबसे पहले वही छोटी मिट्टी की कटोरी थी, जिसे उन्होंने कुम्हार चाचा के यहाँ अपने हाथों से बनाया था।

     

    कल शाम तक वह कटोरी आँगन के एक कोने में सुरक्षित रखी थी। कान्हा ने सोचा था कि आज उसमें पानी भरकर छोटू और चंदू को पिलाएँगे।

     

    लेकिन आँगन में पहुँचते ही वे रुक गए।

     

    कटोरी वहाँ नहीं थी।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “अरे! मेरी कटोरी कहाँ गई?”

     

    गौरी भी उनके पीछे आ गई थी।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कल मैंने इसे यहीं रखा था।”

     

    उन्होंने जमीन पर ध्यान से देखा। थोड़ी दूर मिट्टी में छोटे-छोटे निशान बने थे।

     

    गौरी नीचे बैठ गई।

     

    “देखो!”

     

    कान्हा ने निशानों को देखा।

     

    “ये तो किसी चीज को घसीटकर ले जाने के निशान हैं।”

     

    एक दोस्त भी वहाँ पहुँच गया।

     

    उसने कहा—

     

    “क्या कोई कटोरी चुराकर ले गया?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “पहले ये पता लगाएँगे कि कटोरी यहाँ से कैसे गई। बिना जाने किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए।”

     

    सभी बच्चे निशानों के पीछे चल पड़े।

     

    निशान आँगन से निकलकर कच्ची गली में जा रहे थे।

     

    कुछ दूर जाकर निशान एक बड़े बरगद के पेड़ के पास पहुँच गए।

     

    वहाँ जमीन पर कटोरी का एक छोटा सा मिट्टी का टुकड़ा पड़ा था।

     

    कान्हा ने उसे उठाया।

     

    “ये मेरी कटोरी का हिस्सा है।”

     

    गौरी ने पूछा—

     

    “तो कटोरी टूट गई?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “शायद नहीं। ये सिर्फ किनारे का छोटा टुकड़ा है।”

     

    तभी बरगद के ऊपर से कुछ पत्ते नीचे गिरे।

     

    सभी बच्चों ने ऊपर देखा।

     

    एक बंदर डाल पर बैठा था।

     

    उसके हाथ में कान्हा की कटोरी थी!

     

    वह कटोरी को कभी देखता, कभी अपनी नाक के पास ले जाता।

     

    एक दोस्त चिल्लाया—

     

    “अरे! यही ले गया!”

     

    बंदर घबराकर दूसरी डाल पर चला गया।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “शायद इसे भी कटोरी पसंद आ गई।”

     

    बंदर ने कटोरी को ऊपर उठाया।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “भाई, वो मेरी है।”

     

    बंदर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने सोचा कि अगर वे शोर करेंगे तो बंदर कटोरी गिरा सकता है।

     

    उन्होंने सबको शांत रहने का इशारा किया।

     

    फिर पास में पड़े कुछ फल उठाए।

     

    उन्होंने एक फल जमीन पर रखा।

     

    बंदर ने नीचे देखा।

     

    कान्हा ने दूसरा फल थोड़ी दूर रखा।

     

    बंदर की नजर फल पर टिक गई।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें फल चाहिए?”

     

    बंदर धीरे-धीरे नीचे की डाल पर आया।

     

    कान्हा ने फल थोड़ा आगे किया।

     

    बंदर ने कटोरी को पकड़े-पकड़े नीचे झाँका।

     

    कान्हा ने दूसरा फल रख दिया।

     

    बंदर ने आखिरकार कटोरी नीचे रख दी और फल उठा लिया।

     

    कान्हा ने तुरंत कटोरी उठा ली।

     

    उन्होंने देखा कि कटोरी थोड़ी खरोंच गई थी, लेकिन सही सलामत थी।

     

    “मिल गई!”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    गौरी ने पूछा—

     

    “तुमने उससे कटोरी छीनी क्यों नहीं?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर मैं उसे डराता तो वह कटोरी गिरा सकता था। समझदारी से काम लेने पर दोनों को अपना सामान मिल गया।”

     

    तभी बंदर पेड़ से नीचे आया और कान्हा की ओर देखने लगा।

     

    कान्हा ने उसे एक और फल दे दिया।

     

    “ये तुम्हारे लिए। लेकिन मेरी कटोरी दोबारा मत ले जाना।”

     

    बंदर ने फल लिया और पेड़ पर वापस चला गया।

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    वापस लौटते समय कान्हा अपनी कटोरी को बहुत सावधानी से पकड़े हुए थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब इसे कहाँ रखोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जहाँ बंदर न पहुँच सके।”

     

    गौरी हँसकर बोली—

     

    “और चंदू?”

     

    कान्हा ने पीछे देखा।

     

    चंदू उनकी तरफ आ रहा था।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे भी दूर रखना पड़ेगा।”

     

    चंदू ने जैसे उनकी बात सुन ली और मुँह फेरकर दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    सभी हँस पड़े।

     

    घर पहुँचकर कान्हा ने कटोरी यशोदा मैया को दिखाई।

     

    “मैया, मिल गई!”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कहाँ थी?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बताई।

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हारी कटोरी तो आज खूब घूम आई।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। पहले मेरे पास, फिर बंदर के पास और अब फिर मेरे पास।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अब इसे ठीक जगह रखना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    उन्होंने कटोरी को एक ऊँची शेल्फ पर रख दिया।

     

    फिर छोटू और चंदू को पानी पिलाने के लिए दूसरी कटोरी ले आए।

     

    दोपहर में कान्हा अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे।

     

    तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! बरगद के पेड़ के पास फिर वही बंदर आया है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “वह किसी चीज से खेल रहा है।”

     

    सभी बच्चे फिर बरगद की ओर गए।

     

    बंदर इस बार अकेला नहीं था। उसके पास दो छोटे बंदर और थे।

     

    कान्हा ने देखा कि उनमें से एक छोटा बंदर कमजोर लग रहा था।

     

    वह बाकी दोनों से अलग बैठा था।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “शायद इसे चोट लगी है।”

     

    उन्होंने पास जाने की कोशिश नहीं की।

     

    नंद बाबा को बुलाया गया।

     

    नंद बाबा ने दूर से देखा और कहा—

     

    “शायद इसका पैर थोड़ा परेशान है। हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हम कुछ कर सकते हैं?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “पास में फल रख सकते हैं और जगह शांत छोड़ सकते हैं।”

     

    कान्हा और दोस्तों ने कुछ फल पेड़ के नीचे रख दिए।

     

    फिर सभी पीछे हट गए।

     

    थोड़ी देर बाद छोटे बंदर ने धीरे-धीरे नीचे आकर फल उठाया।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब ये ठीक हो जाएगा।”

     

    शाम होने तक बच्चे वहीं नहीं रुके। वे घर लौट आए।

     

    रात में कान्हा आँगन में बैठे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज फिर बंदर से दोस्ती कर ली?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “उसने मेरी कटोरी चुराई थी।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर हमने फल देकर कटोरी वापस ले ली।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “और बदले में उसे फल भी दे दिया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारा मन भी तुम्हारी कटोरी जैसा है।”

     

    कान्हा ने हैरानी से पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “जितना बाँटो, उतना ही सुंदर लगता है।”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो कल से मैं अपना मन भी सबके साथ बाँटूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ फेरा।

     

    रात गहरी हो गई।

     

    दूर कहीं गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा सोने ही वाले थे कि बाहर से किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “कान्हा! जल्दी बाहर आओ!”

     

    कान्हा उठ बैठे।

     

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “आसमान में बहुत सारे रंग दिखाई दे रहे हैं!”

     

    कान्हा तुरंत बाहर आए।

     

    सब बच्चे आँगन से आसमान की ओर देखने लगे।

     

    बादलों के पीछे चाँदनी और तारों की रोशनी मिलकर आसमान को अद्भुत बना रही थी।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “कल हम सब सुबह-सुबह पहाड़ी पर चलेंगे। वहाँ से सूर्योदय देखेंगे।”

     

    दोस्तों ने खुशी से हामी भरी।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उस पहाड़ी की राह में एक पुराना रास्ता था, जहाँ एक छोटी सी रहस्यमयी घंटी की आवाज सुनाई देती थी।

     

    कान्हा को अगले दिन उसी आवाज का पीछा करना था।

  • कान्हा और टूटी हुई मटकी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और टूटी हुई मटकी

     

    वृंदावन की उस सुबह सूरज धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था। गलियों में गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और घरों से ताजे दूध की खुशबू आ रही थी। कान्हा अपने दोस्तों और गौरी के साथ फूलों की मालाएँ बना रहे थे।

     

    तभी गाँव के दूसरी ओर से एक घबराई हुई आवाज सुनाई दी—

     

    “अरे! मेरी मटकी गिर गई!”

     

    कान्हा तुरंत उठ खड़े हुए।

     

    “चलो!”

     

    सभी बच्चे दौड़कर वहाँ पहुँचे।

     

    एक गोपी जमीन पर बैठी अपनी टूटी हुई मटकी को देख रही थीं। मटकी का एक हिस्सा टूट गया था और उसमें रखा दूध मिट्टी में फैल गया था।

     

    गोपी बहुत दुखी थीं।

     

    “इतनी मेहनत से दूध निकाला था। सब व्यर्थ हो गया।”

     

    कान्हा उनके पास बैठ गए।

     

    “चाची, आप परेशान मत हो।”

     

    गोपी बोलीं—

     

    “लेकिन अब क्या होगा? मेरे पास दूसरी मटकी भी नहीं है।”

     

    कान्हा ने टूटे हुए बर्तन को देखा।

     

    “इसे अभी जोड़ नहीं सकते, लेकिन दूध को बचाया जा सकता है।”

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “जल्दी से साफ बर्तन लाओ।”

     

    दो बच्चे पास के घर से एक खाली बर्तन ले आए।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जो दूध बचा है, उसे इसमें डाल दो।”

     

    गोपी ने सावधानी से बचा हुआ दूध दूसरे बर्तन में डाल दिया।

     

    काफी दूध मिट्टी में जा चुका था, लेकिन थोड़ा बच गया था।

     

    गोपी ने कहा—

     

    “कम से कम इतना तो बच गया।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “जो बच गया, उसके लिए खुश होना चाहिए।”

     

    तभी नंद बाबा वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    गोपी ने पूरी बात बताई।

     

    नंद बाबा ने टूटी मटकी देखी।

     

    “इसे किसने रखा था?”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “मैंने इसे आँगन के किनारे रखा था। शायद बिल्ली के पीछे भागते हुए चंदू ने इसे धक्का दे दिया।”

     

    कान्हा ने तुरंत चंदू की तरफ देखा।

     

    चंदू कुछ दूर खड़ा था।

     

    उसकी छोटी घंटी धीरे-धीरे बज रही थी।

     

    टन…

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “चंदू, क्या तुमने मटकी गिराई?”

     

    चंदू ने सिर झुका लिया।

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    लेकिन कान्हा ने उन्हें रोक दिया।

     

    “हँसो मत।”

     

    उन्होंने चंदू को समझाया—

     

    “अगर तुम्हें किसी चीज से खेलना हो तो रास्ते से दूर खेलना चाहिए।”

     

    फिर कान्हा गोपी के पास गए।

     

    “चाची, इसे जानबूझकर नहीं गिराया।”

     

    गोपी ने चंदू को देखा।

     

    उनका गुस्सा कम हो गया।

     

    “हाँ, लगता है गलती से हुआ।”

     

    उन्होंने चंदू के सिर पर हाथ फेर दिया।

     

    चंदू ने उनकी हथेली सूँघी।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब इसे समझ आ गया होगा।”

     

    गोपी बोलीं—

     

    “लेकिन मेरी मटकी टूट गई।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हम आपके लिए नई मटकी लाएँगे।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ, आज ही कुम्हार के घर से एक नई मटकी ले आएँगे।”

     

    गोपी ने राहत की साँस ली।

     

    “धन्यवाद।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन उससे पहले हम यह दूध साफ करेंगे।”

     

    सभी बच्चों ने मिलकर आँगन साफ करना शुरू किया।

     

    किसी ने पानी डाला, किसी ने मिट्टी समतल की और किसी ने टूटे हुए टुकड़े एक तरफ रखे।

     

    गौरी ने कहा—

     

    “इन टुकड़ों का क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने उन्हें देखा।

     

    “फेंकेंगे नहीं।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “कुम्हार चाचा से पूछेंगे। शायद इन्हें देखकर वे समझ सकें कि मटकी कहाँ से कमजोर थी।”

     

    नंद बाबा ने उनकी बात सुनी तो मुस्कुराए।

     

    “बहुत अच्छा विचार है।”

     

    दोपहर में सभी कुम्हार के घर पहुँचे।

     

    कुम्हार चाचा ने टूटी मटकी देखी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “मटकी के इस हिस्से में मिट्टी ठीक से नहीं लगी थी। इसलिए चोट लगते ही टूट गई।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या इसे दोबारा बनाया जा सकता है?”

     

    कुम्हार बोले—

     

    “मिट्टी को फिर से गूँधकर दूसरी चीज बनाई जा सकती है।”

     

    कान्हा खुश हुए।

     

    “तो इसे बेकार नहीं कहना चाहिए।”

     

    कुम्हार मुस्कुराए।

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    उन्होंने बच्चों को चाक पर नई मिट्टी रखकर दिखाई।

     

    चाक घूमने लगा।

     

    घुर्र… घुर्र…

     

    धीरे-धीरे मिट्टी का आकार बदलने लगा।

     

    कान्हा मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे।

     

    “इतनी साधारण मिट्टी से मटकी कैसे बन जाती है?”

     

    कुम्हार बोले—

     

    “मिट्टी को आकार देने के लिए धैर्य चाहिए। थोड़ा पानी, सही दबाव और लगातार ध्यान।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मतलब जल्दी करेंगे तो मटकी बिगड़ सकती है?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने यह बात ध्यान से याद कर ली।

     

    फिर उन्होंने पूछा—

     

    “क्या मैं भी बना सकता हूँ?”

     

    कुम्हार हँस पड़े।

     

    “क्यों नहीं?”

     

    कान्हा चाक के पास बैठ गए।

     

    उन्होंने मिट्टी को हाथ लगाया।

     

    पहले तो मिट्टी एक तरफ फैल गई।

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    कान्हा बोले—

     

    “हँसो मत! मैं सीख रहा हूँ।”

     

    उन्होंने फिर कोशिश की।

     

    इस बार मिट्टी थोड़ी सी ऊपर उठी।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “देखो!”

     

    लेकिन अगले ही पल आकार फिर बिगड़ गया।

     

    कान्हा खुद हँस पड़े।

     

    “ये मुझसे नाराज है।”

     

    कुम्हार ने कहा—

     

    “मिट्टी नाराज नहीं होती। उसे समय चाहिए।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तो मैं इसे समय दूँगा।”

     

    काफी कोशिश के बाद उन्होंने एक छोटी सी कटोरी बना ली।

     

    वह बिल्कुल गोल नहीं थी।

     

    लेकिन कान्हा बहुत खुश थे।

     

    उन्होंने उसे उठाकर कहा—

     

    “ये मेरी है!”

     

    कुम्हार बोले—

     

    “हाँ। इसे सूखने देना। फिर इसे पकाकर मजबूत कर देंगे।”

     

    कान्हा ने कटोरी गोपी को देने की बात कही।

     

    “इसमें आप छोटू और चंदू के लिए पानी रख सकती हैं।”

     

    गोपी की आँखों में खुशी आ गई।

     

    “तुमने इतनी छोटी चीज में भी मेरे लिए खुशी ढूँढ़ ली।”

     

    शाम को सब घर लौटे।

     

    कान्हा ने चंदू को अपनी बनाई हुई कटोरी दिखाई।

     

    “देखो, ये तुम्हारे लिए है। लेकिन इसे गिराना मत!”

     

    चंदू ने कटोरी सूँघी।

     

    कान्हा तुरंत उसे थोड़ा दूर कर बोले—

     

    “पहले सूखने दो!”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    उस रात यशोदा ने कान्हा से पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “टूटी हुई चीज हमेशा बेकार नहीं होती। उसे फिर से काम में लाया जा सकता है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “और?”

     

    “गलती हो जाए तो उसे छिपाना नहीं चाहिए। उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।”

     

    यशोदा ने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “आज तुमने बहुत अच्छी बात सीखी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    बाहर आँगन में छोटू और चंदू की घंटियाँ बज रही थीं।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा ने आँखें बंद करते हुए कहा—

     

    “कल मैं दोनों को नई कटोरी में पानी पिलाऊँगा।”

     

    लेकिन अगले दिन सुबह जब कान्हा आँगन में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि उनकी बनाई हुई कटोरी गायब थी।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “मेरी कटोरी कहाँ गई?”

     

    गौरी ने जमीन पर कुछ छोटे-छोटे मिट्टी के निशान देखे।

     

    “कान्हा, शायद कोई इसे लेकर गया है।”

     

    कान्हा नीचे झुक गए।

     

    निशान आँगन से बाहर जा रहे थे।

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

     

    “लगता है हमारी अगली खोज शुरू हो गई।”

     

    और वे उन निशानों के पीछे चल पड़े।

  • कान्हा और रास्ता भूली गाय

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और रास्ता भूली गाय

     

    अगली सुबह वृंदावन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रात की बारिश के बाद मिट्टी से मीठी खुशबू उठ रही थी। नंद बाबा रोज की तरह गायों को चराने के लिए तैयार कर रहे थे।

     

    कान्हा भी जल्दी उठकर आँगन में पहुँच गए।

     

    छोटू और चंदू उन्हें देखते ही उनके पास आ गए।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “तुम दोनों तो मुझसे पहले ही तैयार हो!”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आज गायों को गाँव के पश्चिम वाले मैदान में ले जाना है। वहाँ घास बहुत हरी है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “मैं भी चलूँ?”

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना कि कोई गाय बहुत दूर न चली जाए।”

     

    कान्हा ने गंभीर होकर कहा—

     

    “मैं सबका ध्यान रखूँगा।”

     

    सभी गायें धीरे-धीरे मैदान की तरफ चल पड़ीं।

     

    कान्हा कभी किसी बछड़े के पास जाते, कभी किसी गाय को रास्ते से भटकने से रोकते।

     

    उनके दोस्त भी मदद कर रहे थे।

     

    दोपहर के करीब नंद बाबा ने गायों को एक जगह इकट्ठा करना शुरू किया।

     

    उन्होंने एक-एक करके गिनती की।

     

    “एक… दो… तीन…”

     

    फिर अचानक वे रुक गए।

     

    “एक गाय कम है।”

     

    कान्हा तुरंत चौकन्ने हो गए।

     

    “कौन सी?”

     

    नंद बाबा ने चारों तरफ देखा।

     

    “सुरभि नहीं दिखाई दे रही।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “वही सफेद गाय?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने ध्यान से सुना।

     

    दूर कहीं से बहुत हल्की घंटी की आवाज आ रही थी।

     

    टन…

     

    कान्हा ने हाथ उठाया।

     

    “बाबा! उधर से आवाज आ रही है।”

     

    नंद बाबा ने ध्यान लगाया।

     

    कुछ पल बाद उन्हें भी घंटी सुनाई दी।

     

    “हाँ, आवाज उसी तरफ से है।”

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ उस दिशा में चल पड़े।

     

    रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ था।

     

    कुछ दूर जाने पर घंटी की आवाज फिर सुनाई दी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा बोले—

     

    “वह ज्यादा दूर नहीं है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “घंटी की आवाज तेज हो रही है।”

     

    वे आगे बढ़ते गए।

     

    लेकिन अचानक रास्ता दो दिशाओं में बँट गया।

     

    एक रास्ता नदी की तरफ जाता था और दूसरा घने पेड़ों की तरफ।

     

    घंटी की आवाज दोनों तरफ से आती हुई लग रही थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब किस तरफ जाएँ?”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    उन्होंने जमीन पर देखा।

     

    मिट्टी पर गाय के खुरों के निशान थे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “इधर।”

     

    सब उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें घास कुचली हुई दिखाई दी।

     

    “गाय यहाँ से गई है।”

     

    तभी फिर आवाज आई।

     

    टन…

     

    कान्हा दौड़ पड़े।

     

    पेड़ों के बीच एक खुला स्थान था।

     

    वहाँ सुरभि खड़ी थी।

     

    लेकिन वह अकेली नहीं थी।

     

    उसके पास एक छोटा सा बछड़ा भी था।

     

    कान्हा ने हैरानी से पूछा—

     

    “ये कौन है?”

     

    नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने बछड़े को देखा और मुस्कुराए।

     

    “शायद सुरभि ने इसे यहाँ पाया है।”

     

    बछड़ा बहुत छोटा था और अपनी माँ से अलग लग रहा था।

     

    कान्हा उसके पास बैठ गए।

     

    “तुम यहाँ अकेले कैसे आए?”

     

    बछड़े ने धीरे से आवाज की।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “इसकी माँ कहाँ है?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “शायद हमें इसकी माँ भी ढूँढ़नी होगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो आज दो खोज करनी होंगी।”

     

    सब बच्चे हँस पड़े।

     

    लेकिन इस बार कान्हा बहुत ध्यान से बछड़े को देखते रहे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “पहले इसे सुरभि के साथ सुरक्षित गाँव ले चलते हैं। फिर इसकी माँ ढूँढ़ेंगे।”

     

    नंद बाबा ने सिर हिलाया।

     

    सुरभि आगे चलने लगी और बछड़ा उसके साथ।

     

    कान्हा दोनों के पीछे चलते रहे।

     

    वापस मैदान में पहुँचकर उन्होंने बाकी गायों को देखा।

     

    एक गाय बार-बार बछड़े की ओर देखने लगी।

     

    कान्हा ने गौर किया।

     

    “बाबा, ये गाय इसे देख रही है।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “शायद इसे पहचानती है।”

     

    बछड़ा धीरे-धीरे उस गाय की ओर बढ़ा।

     

    गाय ने उसे सूँघा और उसके पास खड़ी हो गई।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “बाबा! शायद यही इसकी माँ है!”

     

    बछड़ा अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया।

     

    गाय ने उसे प्यार से चाटा।

     

    कान्हा खुशी से ताली बजाने लगे।

     

    “मिल गई!”

     

    दोस्त भी खुशी से चिल्लाए।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “देखा कान्हा? कभी-कभी किसी को सही जगह पहुँचाने के लिए बस ध्यान से देखना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ। अगर हमने ध्यान नहीं दिया होता तो ये दोनों अलग रह जाते।”

     

    शाम को गायों को वापस गाँव लाया गया।

     

    सुरभि भी अपने झुंड के साथ लौट आई।

     

    कान्हा ने उसकी घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    “अब तुम रास्ता नहीं भूलना।”

     

    सुरभि ने जैसे जवाब में सिर हिलाया।

     

    घर पहुँचकर यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने सारी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तो आज तुमने दो दोस्तों को उनके परिवार से मिलाया।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ मैया।”

     

    फिर छोटू और चंदू आ गए।

     

    कान्हा ने दोनों को देखकर कहा—

     

    “तुम दोनों भी कभी रास्ता मत भूलना।”

     

    चंदू ने कान्हा की धोती को हल्का सा खींचा।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अच्छा, तुम मुझे ही रास्ता दिखाओगे?”

     

    यशोदा भी हँसने लगीं।

     

    उस रात कान्हा आँगन में बैठे थे। आसमान साफ था और तारों की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    उन्होंने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, क्या हर किसी का कोई अपना होता है?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “हाँ बेटा। परिवार हो, दोस्त हों या कोई ऐसा जो हमारी चिंता करे—हर किसी को अपनापन चाहिए।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो हमें किसी को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “यही तो सबसे बड़ी बात है।”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मैया, कल मैं सब गायों के लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है। लेकिन फूल तोड़ते समय पौधे को नुकसान मत पहुँचाना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “गिरे हुए फूल इकट्ठे करेंगे।”

     

    “बहुत अच्छे।”

     

    अगली सुबह कान्हा और उनके दोस्त पेड़ों के नीचे गिरे हुए फूल इकट्ठे करने लगे।

     

    गौरी भी उनके साथ थी।

     

    सब मिलकर फूलों की छोटी-छोटी मालाएँ बनाने लगे।

     

    कान्हा ने एक माला सुरभि के गले में डाली।

     

    फिर दूसरी छोटू के गले में।

     

    चंदू अपनी माला पहनने से पहले ही उसे सूँघने लगा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे खाना मत!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी गाँव के दूसरी तरफ से तेज आवाज आई।

     

    “बचाओ! मेरी मटकी गिर गई!”

     

    सभी बच्चे उस तरफ दौड़े।

     

    वहाँ एक गोपी की बड़ी मटकी जमीन पर गिर गई थी और उसके अंदर का दूध बहने लगा था।

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “जल्दी से कपड़ा लाओ!”

     

    सभी बच्चे मदद करने लगे।

     

    लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उस मटकी के गिरने के पीछे एक छोटी सी गलती थी, जो अगले अध्याय में पूरे गाँव को एक नई सीख देने वाली थी।

  • रहस्मयी फूलों के निशान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    रहस्मयी फूलों का निशान

     

    सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में धूप की हल्की किरणें फैल रही थीं। यशोदा मैया रसोई का काम कर रही थीं। तभी उनकी नजर एक मटकी पर पड़ी।

     

    मटकी के ऊपर फूलों की पंखुड़ियों से एक अजीब सा निशान बना हुआ था।

     

    यशोदा कुछ पल उसे देखती रहीं।

     

    “ये किसने बनाया?”

     

    पास खेल रहे कान्हा ने तुरंत सिर उठाया।

     

    “क्या हुआ मैया?”

     

    यशोदा ने उन्हें बुलाया।

     

    “इधर आओ और देखो।”

     

    कान्हा मटकी के पास पहुँचे। उन्होंने निशान को बहुत ध्यान से देखा।

     

    वह गोल आकार का था और उसके चारों ओर छोटी-छोटी पंखुड़ियाँ लगी थीं।

     

    कान्हा ने अपनी ठुड्डी पर हाथ रखा।

     

    “हम्म…”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ये किसी ने जानबूझकर बनाया है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”

     

    “क्योंकि पंखुड़ियाँ एक जैसी दूरी पर लगी हैं।”

     

    दोस्त हैरान होकर बोला—

     

    “तुमने ये कैसे देख लिया?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि मैं ध्यान से देख रहा हूँ।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “बस ध्यान रखना कि किसी की चीज खराब मत करना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “हम सिर्फ पता लगाएंगे कि इसे किसने बनाया।”

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर निकले।

     

    उन्होंने आँगन में चारों तरफ देखा।

     

    जमीन पर कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ पड़ी थीं।

     

    कान्हा ने एक पंखुड़ी उठाई।

     

    “ये वही फूल है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “ये फूल कहाँ मिलता है?”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “यमुना के पास।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तो निशान बनाने वाला शायद वहीं से आया होगा।”

     

    सभी बच्चे यमुना की ओर चल पड़े।

     

    रास्ते में छोटू और चंदू भी उनके पीछे आ गए।

     

    कान्हा ने उन्हें देखा।

     

    “तुम दोनों फिर आ गए?”

     

    छोटू की घंटी बजी।

     

    टन…

     

    कान्हा हँसे।

     

    “ठीक है, तुम भी चलो।”

     

    यमुना किनारे पहुँचकर उन्होंने वही फूल देखा।

     

    वहाँ कई पंखुड़ियाँ जमीन पर बिखरी हुई थीं।

     

    कान्हा नीचे बैठ गए।

     

    “यहाँ से कोई फूल लेकर गया है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन कौन?”

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    उन्हें मिट्टी पर छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    वे निशान नदी से दूर एक कच्चे रास्ते की ओर जा रहे थे।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो।”

     

    सभी उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें एक छोटा सा पेड़ दिखाई दिया। पेड़ के नीचे फूलों की पंखुड़ियों का ढेर था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “यहाँ कोई फूल जमा करता है।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    सभी बच्चे चौंक गए।

     

    एक छोटी लड़की पेड़ के पीछे से बाहर आई।

     

    उसके हाथ में फूलों की टोकरी थी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं फूल इकट्ठे करती हूँ।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या तुम नंद भवन गई थीं?”

     

    लड़की चुप हो गई।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “मटकी पर फूलों का निशान तुमने बनाया था?”

     

    लड़की ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं आपको बुलाना चाहती थी।”

     

    कान्हा हैरान हुए।

     

    “हमें?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन सीधे बुला सकती थीं।”

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “मैं आपको जानती नहीं थी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब जानती हो।”

     

    लड़की भी मुस्कुरा दी।

     

    उसने टोकरी से एक सुंदर फूल निकाला।

     

    “मैं आपको ये देना चाहती थी।”

     

    कान्हा ने फूल लिया।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    फिर लड़की ने बताया कि वह अपनी माँ के साथ गाँव के बाहर रहती है। उसकी माँ बीमार होने के कारण घर से बाहर कम निकल पाती थीं। वह रोज फूल इकट्ठे करके गाँव की गोपियों को देती थी।

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो तुमने मटकी पर निशान क्यों बनाया?”

     

    लड़की बोली—

     

    “मैं चाहती थी कि आप मुझे पहचान लें।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अब तो पहचान लिया।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन तुम्हें डर नहीं लगा कि मैया नाराज होंगी?”

     

    लड़की ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे लगा था शायद कोई मुझे समझेगा नहीं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर किसी से बात करनी हो तो छिपकर निशान बनाने की जरूरत नहीं। सीधे आ जाना।”

     

    लड़की ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “हम इसे भी दोस्त बना लेते हैं।”

     

    सभी बच्चों ने हामी भरी।

     

    तभी चंदू लड़की की फूलों वाली टोकरी के पास गया और उसे सूँघने लगा।

     

    लड़की हँस पड़ी।

     

    “ये भी फूल पसंद करता है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे हर चीज पसंद है।”

     

    चंदू ने टोकरी को नाक से हल्का सा धक्का दिया।

     

    फूल थोड़े बिखर गए।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चंदू!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    कान्हा और उनके दोस्तों ने मिलकर फूल फिर से टोकरी में रख दिए।

     

    लड़की ने कहा—

     

    “धन्यवाद।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “दोस्त धन्यवाद नहीं कहते।”

     

    फिर वे सब गाँव की ओर लौटने लगे।

     

    रास्ते में कान्हा ने लड़की से पूछा—

     

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    “मेरा नाम गौरी है।”

     

    “गौरी, तुम्हें फूल बहुत पसंद हैं?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो कल हमारे साथ फूलों की माला बनाना।”

     

    गौरी ने खुशी से सिर हिलाया।

     

    घर पहुँचने पर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।

     

    “मिल गया रहस्य?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ।”

     

    उन्होंने गौरी की कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “तो तुमने एक नई दोस्त बना ली।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उन्होंने मटकी पर बने फूलों के निशान को साफ कर दिया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “इसे मिटा क्यों रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब इसकी जरूरत नहीं। गौरी सीधे हमारे घर आएगी।”

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    अगले दिन गौरी सच में नंद भवन आई।

     

    उसने फूलों की बड़ी टोकरी लाई थी।

     

    कान्हा और उसके दोस्तों ने फूलों की माला बनानी शुरू की।

     

    किसी की माला छोटी बनी, किसी की टेढ़ी।

     

    कान्हा की माला में एक फूल बार-बार निकल जाता।

     

    गौरी हँसकर बोली—

     

    “कान्हा, तुमसे माला नहीं बन रही।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं तो जानबूझकर इसे ऐसा बना रहा हूँ।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “झूठ!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    आखिर में उन्होंने मिलकर एक सुंदर माला बनाई।

     

    कान्हा ने उसे छोटू के गले में डाल दिया।

     

    छोटू की घंटी के साथ फूल भी झूलने लगे।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “देखो, आज छोटू सबसे सुंदर लग रहा है।”

     

    चंदू ने भी आगे आकर माला सूँघी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम्हारे लिए भी बनाएँगे।”

     

    शाम तक पूरा आँगन फूलों की खुशबू से भर गया।

     

    उस दिन कान्हा ने एक छोटी सी बात सीखी—

     

    कभी-कभी कोई अजीब हरकत परेशानी पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि किसी तक पहुँचने की कोशिश में की जाती है। इसलिए किसी बात को समझने से पहले उसके पीछे की वजह जानना जरूरी है।

     

    रात को यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जिसे मदद चाहिए, उसे डरना नहीं चाहिए। और हमें भी किसी को बिना समझे गलत नहीं समझना चाहिए।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार से हाथ रखा।

     

    “बहुत अच्छी बात सीखी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए और सो गए।

     

    लेकिन अगली सुबह वृंदावन में एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।

     

    नंद बाबा की कुछ गायें चरते-चरते बहुत दूर निकल गई थीं। उनमें से एक छोटी गाय रास्ता भूल गई थी।

     

    कान्हा ने उसकी घंटी की आवाज सुनी।

     

    उन्होंने तुरंत कहा—

     

    “ये आवाज गाँव की तरफ से नहीं आ रही।”

     

    और फिर कान्हा अपने दोस्तों के साथ उस घंटी की आवाज का पीछा करने निकल पड़े।

     

  • कान्हा और यमुना की बहती नाव

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और यमुना की बहती नाव

     

    शाम का समय था। यमुना के किनारे ठंडी हवा चल रही थी। कान्हा अपनी पतंग समेटकर घर लौटने ही वाले थे कि उनका दोस्त दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! जल्दी चलो!”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “हमारी गेंद नाव में रह गई है और नाव किनारे से छूटकर पानी में चली गई!”

     

    कान्हा ने यमुना की ओर देखा। सचमुच एक छोटी सी नाव धीरे-धीरे पानी के साथ दूर जा रही थी। उसमें बच्चों की लाल गेंद पड़ी थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब गेंद वापस नहीं मिलेगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “गेंद तो मिल सकती है, लेकिन पहले ये देखना होगा कि नाव कहाँ जा रही है।”

     

    सब बच्चे किनारे पर खड़े होकर नाव को देखने लगे।

     

    नाव बहुत दूर नहीं गई थी, लेकिन पानी का बहाव तेज था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हम पानी में नहीं उतरेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तो फिर गेंद कैसे आएगी?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    उन्हें किनारे पर पड़ी एक लंबी बाँस की लकड़ी दिखाई दी।

     

    “इससे कोशिश कर सकते हैं।”

     

    उन्होंने बाँस उठाया, लेकिन नाव अभी भी काफी दूर थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये वहाँ तक नहीं पहुँचेगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो कोई और तरीका सोचते हैं।”

     

    तभी नंद बाबा वहाँ पहुँच गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने सारी बात बताई।

     

    नंद बाबा ने नदी की ओर देखा।

     

    “नाव को पकड़ने की कोशिश मत करना। पानी का बहाव तेज है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “बाबा, फिर गेंद?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “गेंद से ज्यादा जरूरी तुम सब हो।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ बाबा।”

     

    उन्होंने नाव को ध्यान से देखा।

     

    नाव किनारे से दूर जाकर एक शांत हिस्से की तरफ बढ़ रही थी।

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “अगर हवा इसी दिशा में रही तो नाव थोड़ी देर में उस दूसरे किनारे के पास जा सकती है।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “तो हम वहीं से उसे पकड़ सकते हैं!”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन मेरे साथ।”

     

    सभी बच्चे नंद बाबा के साथ सुरक्षित रास्ते से आगे बढ़ने लगे।

     

    कान्हा बार-बार नाव को देखते।

     

    “अभी वहाँ है!”

     

    कुछ देर बाद नाव धीरे-धीरे किनारे की तरफ आने लगी।

     

    नंद बाबा ने एक लंबी रस्सी ली और किनारे पर खड़े होकर उसे नाव की तरफ बढ़ाया।

     

    इस बार नाव पास थी।

     

    उन्होंने सावधानी से रस्सी नाव के अगले हिस्से में अटका दी।

     

    धीरे-धीरे नाव किनारे खिंच आई।

     

    कान्हा ने अंदर झाँका।

     

    “गेंद!”

     

    उन्होंने गेंद उठा ली।

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए।

     

    “मिल गई!”

     

    कान्हा ने गेंद दोस्त को दे दी।

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “तुम्हारी वजह से मिल गई।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “नहीं, बाबा की वजह से।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “और तुम्हारी समझदारी की वजह से भी।”

     

    वापस लौटते समय कान्हा चुप थे।

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या सोच रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आज समझ आया कि हर चीज को पाने के लिए तुरंत दौड़ना जरूरी नहीं। पहले सोचना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बिल्कुल। यही समझदारी है।”

     

    अगले दिन बच्चों ने तय किया कि वे यमुना किनारे खेलेंगे, लेकिन इस बार पानी से थोड़ी दूरी पर।

     

    कान्हा ने गेंद हाथ में ली और कहा—

     

    “आज हम ऐसा खेल खेलेंगे जिसमें कोई पानी के पास नहीं जाएगा।”

     

    सबने हामी भरी।

     

    खेल शुरू हुआ।

     

    कान्हा गेंद एक दोस्त को देते, दोस्त दूसरे को।

     

    कुछ देर बाद गेंद अचानक एक पेड़ के पीछे जा गिरी।

     

    एक बच्चा उसे लेने दौड़ा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “रुको! धीरे जाना।”

     

    बच्चा रुक गया।

     

    कान्हा खुद उसके साथ गए।

     

    वहाँ गेंद के पास एक छोटा पक्षी बैठा था।

     

    उसका पंख शायद किसी सूखी टहनी में उलझ गया था।

     

    कान्हा धीरे से बैठ गए।

     

    “डरो मत।”

     

    उन्होंने नंद बाबा को बुलाया।

     

    नंद बाबा ने सावधानी से टहनी हटाई।

     

    पक्षी आजाद होकर उड़ गया।

     

    कान्हा उसे आसमान में जाते हुए देखते रहे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “आज तो हमारी गेंद से ज्यादा काम पक्षी का हो गया।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “गेंद तो फिर मिल जाती। इसे मदद की जरूरत थी।”

     

    शाम होते-होते सभी बच्चे घर लौटने लगे।

     

    रास्ते में कान्हा ने देखा कि छोटू और चंदू उनके पीछे-पीछे आ रहे हैं।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम दोनों यहाँ कैसे?”

     

    दोनों बछड़ों की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अच्छा! अब तुम भी हमारे साथ खेलना चाहते हो?”

     

    चंदू आगे बढ़ा और कान्हा की गेंद सूँघने लगा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे मत खाना!”

     

    दोस्त जोर से हँसने लगे।

     

    चंदू ने गेंद को नाक से धक्का दिया और गेंद लुढ़कती हुई दूर चली गई।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़े।

     

    “अरे चंदू!”

     

    छोटू भी पीछे दौड़ पड़ा।

     

    कुछ ही क्षणों में पूरा रास्ता बच्चों और दोनों बछड़ों की दौड़ से भर गया।

     

    घर पहुँचने पर यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज फिर क्या शरारत हुई?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज हमने किसी की गेंद बचाई, एक पक्षी की मदद की और चंदू ने गेंद को फिर भगा दिया।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तो आज का दिन अच्छा रहा।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    उस रात कान्हा आँगन में लेटे हुए आसमान के तारों को देख रहे थे।

     

    उन्होंने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, क्या तारे भी कभी रास्ता भूलते हैं?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “शायद नहीं। वे अपनी जगह चमकते रहते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “फिर अगर कोई रास्ता भूल जाए तो?”

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “उसे रास्ता दिखाने वाला कोई न कोई जरूर मिल जाता है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उन्हें छोटू, चंदू, अपने दोस्त और आज मिला वह छोटा पक्षी याद आ गया।

     

    उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन अगले दिन सुबह वृंदावन में एक और हलचल मचने वाली थी।

     

    नंद बाबा के आँगन में रखी मटकी पर किसी ने फूलों की पंखुड़ियों से एक अजीब सा निशान बना दिया था।

     

    यशोदा मैया ने उसे देखा तो हैरान रह गईं।

     

    “ये किसने बनाया?”

     

    कान्हा ने निशान देखा।

     

    उनके चेहरे पर शरारती मुस्कान आ गई।

     

    “मैया… मुझे लगता है हमें इसका रहस्य पता लगाना पड़ेगा।”

     

    और इस बार निशान उन्हें वृंदावन की एक ऐसी जगह तक ले जाने वाला था, जहाँ बच्चों ने पहले कभी जाने की हिम्मत नहीं की थी।