बके पास समान आंखें हैं लेकिन सबके पास समान दृष्टिकोण नहीं,
बस यही बात इंसान को इंसान से अलग करती है…देखने का नजरिया अपना अपना है वरना हर इंसान गलत ही नहीं होता… ✍️

बके पास समान आंखें हैं लेकिन सबके पास समान दृष्टिकोण नहीं,
बस यही बात इंसान को इंसान से अलग करती है…देखने का नजरिया अपना अपना है वरना हर इंसान गलत ही नहीं होता… ✍️

ना दोस्त है ना दुश्मन हैं
हमसे लड़ता कौन ?
ना तूफान हैं ना सैलाब हैं
हमसे डरता कौन ?
ना ग़ालिब हैं ना प्रेमचंद हैं
हमको पढ़ता कौन ?
ना साँसे हैं ना धड़कन हैं
हम पर मरता कौन ?

कहानी अब आगे,
रिशाल के चेहरे पर थकान के निशान कम होने लगते हैं और वह आराम से बैठ जाता है। वरुणा अग्निहोत्री की देखभाल से वह अपने तनाव को भूलने लगता है।
वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करती हैं और कहती हैं, “देखो, बेटा। माँ का प्यार कितना अच्छा होता है। तुम्हें कभी भी अपनी माँ की देखभाल की जरूरत नहीं होती।”
रिशाल मुस्कराता है और कहता है, “हाँ, माँ। तुम सबसे अच्छी माँ हो।”
वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के चेहरे को देखती हैं और मुस्कराती हैं। वह रिशाल के माथे को चूम लेती हैं और कहती हैं, “मेरा बेटा मुझे सबसे प्यारा है।” सबका ख्याल रहता है इसको और सबकी फ़िक्र भी रहती है, रभी तो मेरा बेटा सबसे अच्छा है इस दुनिया मे जो किसी के आँखों मे आंसू भी नहीं आने देता है |”
माँ की बाते सुन कर RA को अमानत के आंसू याद आ जाते है उसे याद आ जाता है की आज ही तो वो किसी के दर्द के कारण बना था |”
रिशाल को अपनी माँ का प्यार और लाड मिलती है, लेकिन उसका मन जो अमानत के आँखों के आंसू को सोचता है, वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है,
वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के चेहरे को देखती हैं और प्यार से पूछती हैं, “बेटा, आखिर बात क्या है? तुम इतना टेंशन में क्यों लग रहे हो? तुम्हारी माँ हूँ, तुम मुझे कुछ भी बता सकते हो।”
रिशाल: (हिचकिचाते हुए) “कुछ नहीं, माँ। बस काम की तनाव है।”
वरुणा अग्निहोत्री: (प्यार से) “नहीं, बेटा। तुम मुझे नहीं बता सकते कि यह सिर्फ काम की तनाव है। तुम्हारी आँखें बता रही हैं कि कुछ और है। तुम्हारे दिल में क्या है, बताओ मुझे।”
रिशाल: (माँ की बात सुनकर) “माँ… मैं नहीं जानता कि मैं क्या कहूँ।”
वरुणा अग्निहोत्री: (प्यार से) “बेटा, तुम मुझे कुछ भी बता सकते हो। मैं तुम्हारी माँ हूँ। मैं तुम्हें कभी भी निराश नहीं करूँगी। तुम्हारे लिए मैं हमेशा यहाँ हूँ।”
रिशाल वरुणा अग्निहोत्री की बात सुनकर अपने दिल की बात बताने की सोचता है, लेकिन वह अभी भी हिचकिचाता है…
क्या Ra बता पायेगा अपने माँ को अपने दिल मे हो रही इस हलचल को??
क्या वरुणा अग्निहोत्री करेंगी सपोर्ट अमानत को??
क्या Ra मागेगा माफ़ी अमानत से??
क्या होगा अमानत का रिएक्शन??
( मकान मालिक), अमानत के किराये का घर, सुबह के 10:00 बजे,
मकान मालिक, ” दरवाजा खोलो, कामचोरो… अभी तक क्या सोये हुए हो… मेरा पैसा दो कब से आ आकर थक चूका हु या तो पैसा दो या फिर अपने कामचोर भाई को लेके यहां से दफा हो जाओ!”
अमानत दरवाजे पर आवाज़ सुन अपने भाई को कहती है, ” तू फ़िक्र ना कर सब सही हो जायेगा ये अंकल तो ऐसे ही कहते है हमेशा तुम ये खाना खत्म कर और स्कूल के लिए तैयार हो जाओ मे बात कर के आती हु ठीक है |”
व्योम, ” ठीक है, दीदी,
अमानत दरवाजा खोल बाहर आ जाती है और दरवाजे को लगा देती है,
मकान मालिक, ” ये लो आ गयी कामचोर भाई की बहन जिसे करना तो कुछ नहीं है बस बहाना जितना बनवा लो आज न कोई भी बहाना नहीं चलेगा मुझे मेरा किराया चाहिए तो चाहिए वरना ये बोरिया बिस्तर लेके यहां से दफा हो जाओ अभी के अभी मुझे दूसरा किरायदार मिल गया है जो तुमसे ज़्यदा ही पैसे देने को तैयार है, और समय पर भी देने को तैयार है समझी ..
.. to be continue…

कहानी के इस भाग में एक रहस्य से पर्दा उठता है। जिसका इंतजार लगभग सभी को रहता है। चलिए कहानी की ओर चलें…
” अब रोने की बारी उनकी है। जिसने तुम्हें रूलाने की कोशिश की है । अब तुम्हें रोने की कोई जरूरत नहीं है। “
शीला बोलती हुई,राधा को ढांढस बंधा रही थी। शीला और चांदनी दोनो मिलकर राधा और रूपा को रस्सी के बंधन से आजाद कर चुकी थी । चारो सहेलियां एक दुसरे से आपस में लिपट कर रोने लगी थी। अब इन सभी के जिन्दगी में जो दु:ख के बादल छाये थे वो अब छट चुके थे। इन सबके जिवन में तुफान लाने वाला सख्श धराशाई होकर बेसुध फर्श पर परा था।
“अब जब सब कुछ ठीक हो गया है तो, हमें यहां से चलना चाहिए।”
बोलकर चांदनी बारी बारी से तीनो के तरफ देखती है।
” हां हमें चलना चाहिए इससे पहले की कोई और प्रोबलम खड़ा हो हमें यहां से निकल जाना चाहिए।”
शीला भी अपने आप को शांत करते हुए आंख से आंसू के बुंद को साफ करते हुए बोली थी ।
” हां दीदी जायेंगे पर इसे ऐसे छोड़कर नहीं इसको इसके किए की सजा देने के बाद।”
रूपा कठोर होते हुए बोली थी। राधा को बहुत बरा सदमा लगा था। वो अभी भी बहुत डरी हुई थी। उसे अभी भी यकिन नही हो रहा था की सब कुछ नॉर्मल हो गया है। और वो मन ही मन अपने आप को कोस भी रही थी। की ये जो कुछ भी हुआ है, सब उसी के वजह से हुआ है। और वो उसी के वजह से आज रूपा और चांदनी शीला के जान का भी खतरा हो सकता था।
” क्या इसको ऐसे हीं छोड़ दोगे दीदी आप लोग?”
शीला और चांदनी के तरफ देखकर कमल के तरफ अपनी उंगली से इशारा करते हुए राधा बोली थी। और एक बार फीर राधा के आंख से आंसू बहने लगे थे।
” नहीं दीदी, हम लोग इस कमीने को छोड़ेंगे नहीं। बल्कि पुलिस में देंगे।”
रूपा राधा के आंख से आंसू पोंछते हुए बोली थी। रूपा की बात सुनकर सभी रूपा को आशचर्य से देखने लगे थे। तीनो के मन में एक साथ एक बात चली थी। की रूपा कितनी समझदार है, वो कितनी समझदारी की बात कर रही है। पर राधा रूपा को समझदार के साथ साथ बहुत हिम्मत वाली भी मानने लगी थी। आज जिस तरह से रूपा कमल के साथ डटकर मुकाबला की थी। उसको कमल से मार भी खानी परी थी। पर वो जिस तरह से अपना हिम्मत नहीं हारी थी। रूपा की यही सब गुण राधा के नजर में रूपा को महान बना रही थी।
अभी उधर ये सब चारो सहेलियों में चल हीं रहा था। कि इधर धीरे धीरे कमल के हांथ पैर हिलने लग गया था। उसको होस आने लगा था। कमल का आंख धीरे धीरे खुलता है। कमल का हालत बिल्कुल भी ठीक नहीं था। उसके बदन में अभी भी बहुत अ सहनीय दर्द हो रहा था। उसके मुंह से बहुत सारा खून भी बह गया था। ज्यादा खून बह जाने के कारण हीं कमल को होश नहीं आ पाया था। जब कमल का आंख खुलता है। तो वो नजर घुमाकर सभी लड़कियों के तरफ देखता है। वो कुछ बोलना चाहता है, पर वो कुछ भी बोल नहीं पाता हैं। उसके शरीर के अंदर इतनी भी शक्ती नहीं बच पाई थी। की वो कुछ बोल भी पाये। यही सब सोचकर कमल अपने आप को बहुत लाचार और कमजोर महसूस कर रहा था।
” इसको मीटिंग हॉल में लेकर चलते हैं। वहां ले जा कर प्रिंसिपल मैम के हवाले कर देते हैं। अब वही इसके साथ जो करना होगा करेंगे।”
शीला अपनी समझदारी से सभी के तरफ देखते हुए बोली थी।
” दीदी पुलिस को कॉल करके बुला लेते हैं ना, इसको पुलिस के हवाले कर देंगे।”
बोल कर रूपा शीला को प्रश्नवाचक मुद्रा में देखने लगी थी।
” नही इसको प्रिंसिपल मैम के पास लेकर चलते हैं।”
शीला रूपा को जबाव देते हुए बोली थी।
” नहीं दीदी इस भेड़िये को खुला छोड़ना ठीक नहीं होगा।”
रूपा शीला से बोली थी। कमल को होश में आने के बाद उसके दिमाग में एक हीं बात राऊंड मारते हुए चल रहा था। की ये दोनो क्लास रूम में कैसे आया था। और आकर उसका बना बनाया सारा खेल बिगाड़ दिया था। कमल का बात सही भी था। अगर उस टाइम शीला और चांदनी आ कर, कमल पर अटैक नहीं किया होता तो अभी सारा सिचुएशन उसके अंडर में होता। और शीला और चांदनी से उसको इतना मार नहीं पड़ा होता तो वो,अभी फर्श पर नहीं पड़ा होता।
” तुम दोनो अंदर कैसे आए?”
कमल दर्द से कराहते हुए हिम्मत करते हुए शीला और चांदनी से अपनी बात पुछ हीं लिया था। ये आवाज चारो सहेलियों के कान में जैसे ही गई सभी आशचर्य से उस आती हुई आवाज के तरफ मुड़कर देखी। सभी सहेलियों के चेहरे के हाव भाव एक दम से बदल गये थे। सभी एक्शन मोड में आ गयी थी। सभी एक साथ एक बार फिर से कमल पर अटैक करने चल पड़ी थी। यह सीन देखकर कमल के होश उड़ गये थे। डर के मारे उसके पसीने छुटने लगे थे। वो सोचने लगा अब उसके शरीर में और मार बर्दास्त करने की छमता नहीं है। अब अगर और मार पड़ा तो वो जिन्दा बच नहीं पायेगा। इसी लिए अब वो दिमाग से काम लेना चाहा। कमल हिम्मत करके उठकर बैठ गया था।
” तो तुम्हें जानना है। की हम क्लास रूम के अंदर कैसे आए?”
चांदनी कमल पर चीखते हुए जोर से बोली थी।
” हां इसे बता हीं देते हैं। की हम दोनो क्लास रूम के अंदर कैसे आए।”
शीला चांदनी के तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर बोली थी। हालाकी राधा और रूपा भी कमल के इस सवाल का जबाव जानना चाहती थी। वो दोनो भी अपनी दीदी के तरफ देखने लगी थी। सभी चलकर कमल के पास पहूंच गये थे। रूपा का लात कमल के पीठ पर पड़ता है। जो कमल अभी अभी उठकर बैठा हीं था। एक भारी चीख कमल के मुंह से निकल जाता है।
” पहले इसको इसके सवाल का जबाव सुनने दो बहन, फिर उसके बाद तुम इस पर अपना बॉक्सिंग का प्रेक्टिस कर लेना।”
शीला रूपा को रोकते हुए बोली थी। सुनकर रूपा रूक जाती है।
“इसमें तुम्हारी हीं बेवकूफी है भेड़िए।”
चांदनी गुस्से से दांत पीस कर कमल के तरफ मुड़कर बोली थी।
” मैं चाहती तो, तुम्हें वहीं सबक सीखा सकती थी। जब तुम्हें रस्सी और डंडा लिये क्लास रूम के तरफ आते हुए देखी थी। और छुपकर तुम्हारा पीछा करने लगी थी।”
बीना रूके शीला बोलते रही।
” .मैं जानना चाहती थी। की आखिर बात क्या है। तुम रस्सी और डंडे लेकर क्या करने वाले हो। और सोने पे सुहागा तो तब हुआ, जब तुम्हारा दोनो हांथ खाली नहीं होने के वजह से तुमने दरवाजा लॉक नहीं किया। इसी बात का फायदा हमने उठायी और दोनो भीतर आके दरवाजे बंद कर ली थी। ताकी तुम्हें भी बचकर भागने नहीं दूं।”
चांदनी ने कमल को पुरी बात बतायी थी ।
” दीदी जब आप पहले हीं आ गईं थी तो, आपने हमें पहले हीं क्यों नहीं बचाई थी। आप अपनी आंखों के सामने हमें रस्सी से बंधते और पिटते हुए देखी थी।”
रूपा बोलकर शीला और चांदनी के तरफ सवालिया नजर से देखने लगी थी।
” इसका मतलब, दीदी मैं आपके आंखों के सामने बेहोश हुई थी।”
राधा भी शीला और चांदनी से सवाल की थी। इस पर शीला और चांदनी कुछ भी नहीं बोलती है। बस दोनो अपना शर हां में हिला देती है।
ये सुनकर कमल के पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी थी। उसमे अब हिम्मत भी नहीं थी। की वो उन सब से फाइट कर सके तो उसने अपनी जान बचाने का एक तरीका निकाला जो एक हारा हुआ हर इंसान लगभग यही करता है। और कमल ने भी वही किया था। वो झुक कर शीला के पैर पकर लिया था।
” मुझे माफ कर दो,मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गयी है। प्लीज मुझे माफ कर दो और मुझे जाने दो।”
कमल शीला के पैरों में गिरकर नाक रगड़ते हुए बोला था।
” कमीने सुअर की औलाद, तुम्हें माफ कर दूं। निकल गयी सारी हेकड़ी, अब रेप नहीं करेगा मेरी दीदी का हां।”
रूपा गुस्से में अपनी आंखे लाल करते हुए कमल से बोली थी । और धमा धम दो लात उसको रसीद करदी थी। कमल रूपा के पैर की चोट खा कर पुरी तरह से हिल गया था। अब उसको समझ आने लगा था। की उसकी ग़लती छोटी नहीं है।
” अब पछतावा आ रहा है। अपने किये पर पहले ये क्यों नहीं सोचा अपना अंजाम ये सब करने से पहले।”
चांदनी जो राधा के कंधे में अपनी बांह डाली हुई थी। कमल से बोली थी।
“माफी तो तुम्हें मिलने से रही, पर तुम्हे जेल जरूर मिलेगी।”
रूपा कमल को बाल से खींचते हुए बोली थी।
” अब इसके साथ बहस करने से, कोई फायदा नही है दीदी।”
कहानी और भी मजेदार होने वाली है ! पढिए अगले भाग में….प्यार एक अहसास

कहानी अब आगे,
वरुणा देवी रिशाल के चेहरे को देखती हैं और पूछती हैं, “रिशाल, क्या हुआ? तुम कहीं और ही लग रहे हो।”
रिशाल जल्दी से अपने आप को संभालता है और कहता है, “माँ, मीटिंग तो ठीक रही। बस थोड़ा थकान है।”
वरुणा देवी रिशाल की बात मानती हैं और कहती हैं, “ठीक है, बेटा। तुम आराम करो।
लेकिन रिशाल का मन अमानत के साथ ही रहता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है, वह अमानत की मासूमियत और उसकी आँखों में आंसू को याद करता है और उसके लिए अपने दिल में एक अजीब सा हलचल महसूस करता है…:
वरुणा देवी रिशाल के चेहरे को जब देखती हैं तो उसे लगता है कि वह किसी बात से परेशान है। वह रिशाल के पास जाती हैं और पूछती हैं, “रिशाल, क्या सब ठीक है? तुम्हारे चेहरे पर तनाव दिख रहा है। क्या तुम मुझे कुछ बताना चाहते हो?”
रिशाल वरुणा देवी की बात सुनता है, लेकिन वह कुछ नहीं बताता। वह जल्दी से एक बहाना बनाता है और कहता है, “माँ, मेरा सर दर्द कर रहा है। मुझे लगता है कि मैं थोड़ा थक गया हूँ। मैं कुछ देर अकेले में आराम करना चाहता हूँ।”
रिशाल अपने हाथ में रखे हुए अमानत के बाल के टुकड़े को देखता है और सोचता है,
वरुणा अग्निहोत्री जब अपने बेटे के सर दर्द की बात सुनती है, तो तुरंत घर के नौकर, रामू को आवाज़ लगाती है, “रामू, रामू! जल्दी आओ और मुझे तेल लेकर आओ। रिशाल को सर दर्द हो रहा है।”
रामू वरुणा देवी की आवाज़ सुनकर जल्दी से आता है और पूछता है, “मैम, कौन सा तेल लाऊं? कोकोनट का या बदाम का?”
वरुणा देवी कहती हैं, “बदाम का तेल लाओ। और जल्दी करो। रिशाल को आराम करना है ।”
रामू बदाम का तेल लेकर आता है और वरुणा देवी को देता है। वरुणा देवी तेल को लेकर रिशाल के कमरे में जाती हैं और उसके सर पर तेल से मालिश करने को कहती हैं,
वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करने के लिए कहती हैं, “बेटा, मैं तुम्हारे माथे की मालिश कर दूँ। इससे तुम्हारा सर दर्द कम होगा।”
लेकिन रिशाल मना कर देता है, “नहीं, माँ। मैं ठीक हूँ। तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए।”
वरुणा अग्निहोत्री रिशाल की बात नहीं मानती और कहती हैं, “नहीं, बेटा। तुम्हारी सेहत मेरे लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट है। मैं तुम्हारे माथे की मालिश करूँगी।”
वरुणा अग्निहोत्री रिशाल को अपने पैरों के पास बैठने के लिए कहती हैं और खुद बेड पर बैठ जाती हैं। वह रिशाल के माथे पर तेल लगाती हैं और धीरे-धीरे मालिश करने लगती हैं,
रिशाल अपनी माँ की चम्पी से खुश होता है, लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही रहता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है,
वरुणा अग्निहोत्री रिशाल के माथे की मालिश करती हैं और कहती हैं, “बेटा, तुम्हें आराम करना चाहिए । मैं तुम्हारे लिए खाना भिजवा दूंगी ऊपर ही । तुम्हें कुछ नहीं करना है। बस आराम करो।”
रिशाल वरुणा देवी की बात मानता है और आराम करने लगता है। लेकिन उसके मन मे अमानत के साथ बीते पल ही रहता है…
वरुणा अग्निहोत्री की चम्पी धीरे-धीरे रिशाल को भी अच्छा लगने लगता है।
.. to be continue….

अमानत ने रिशाल की बात सुनी और उसकी आँखों में आंसू आ गए।
“मुझे माफ कर दीजिए, मैं आपको नहीं जानती थी। मैं सिर्फ अपने भाई के साथ घूमने आई थी, और उसकी साथ खेलते हुए बस गलती से आपसे टकरा गयी मे माफ़ी मांगती हु pls माफ कर दीजिये “
रिशाल ने अमानत को देखा और उसकी मासूमियत को देखकर उसका गुस्सा थोड़ा कम हो गया । लेकिन फिर भी वो अपने गुस्से को कण्ट्रोल नहीं कर पाया और वो गुस्सा अमानत पर निकल दी उसे काफ़ी कुछ सुना कर |”
अमानत ने रिशाल की बात सुनी जिससे उसके आँखों में आंसू आ गए। वह अपने भाई के साथ वहाँ से चली गई, लेकिन रिशाल की बातें उसके दिल में बस गईं…
रिशाल ने अमानत को वहाँ से जाने दिया और अपनी मीटिंग में चला गया। लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही था। वह अमानत की मासूमियत और उसकी आँखों में आंसू देखकर थोड़ा परेशान हो गया था।
मीटिंग खत्म होने के बाद, रिशाल अपने घर चला गया। लेकिन उसका मन अमानत के बारे में ही सोच रहा था। वह अपनी शर्ट के बटन को देखकर अचानक रुक गया। उसमें एक बाल फंसा हुआ था, जो अमानत का था।
रिशाल को वो बाल को देख, अमानत की याद आ जाती है और वो उसी मे खो जाता है । वह सोच रहा था कि क्या उसने अमानत के साथ ठीक बर्ताव किया था। उसने अमानत को रुला दिया था, और अब उसे इसका अफसोस हो रहा था।
रिशाल ने अपनी शर्ट उतारी और उस बाल को अपने हाथ में लिया। वह अमानत के बारे में सोच रहा था, और उसकी मासूमियत को याद कर रहा था।
तभी एंट्री होती है,
वरुणा देवी, रिशाल की माँ, कमरे में आती हैं और रिशाल को अपने हाथ में कुछ पकड़े हुए देखती हैं। वह उसके पास जाती हैं और पूछती हैं,
वरुणा अग्निहोत्री, “क्या है यह, रिशाल? तुम क्या कर रहे हो?”
रिशाल जल्दी से उस बाल के टुकड़े को अपने हाथ में छिपा लेता है और कहता है, “कुछ नहीं, माँ। बस एक छोटी सी चीज़।”
वरुणा देवी को लगता है कि रिशाल कुछ छिपा रहा है, लेकिन वह कुछ नहीं कहतीं। वह रिशाल के चेहरे को देखती हैं और पूछती हैं, “क्या हूआ सब ठीक है न , रिशाल? तुम थोड़े परेशान लग रहे हो।”
रिशाल वरुणा देवी को देखता है और मुस्कराता है, “हाँ, माँ। सब ठीक है। बस थोड़ा थकान है।”
वरुणा देवी रिशाल की बात मानती हैं और कहती हैं, “ठीक है, बेटा। तुम आराम करो। मैं तुम्हारे लिए चाय मंगवा देती हूँ।”
जैसे ही वरुणा देवी जाती हैं, रिशाल अपने हाथ में छिपाए हुए बाल के टुकड़े को देखता है और अमानत के बारे में सोचता है। वह सोचता है कि क्या वह अमानत से मिलने के लिए जा सकता है और उससे माफ़ी मांग सकता है, क्युकी कहीं न कहीं उसने गुस्से मे अमानत को कुछ ज़्यदा ही सुना दिया था और अब RA को उसकी लिए गिलट हो रहा था |”
वरुणा देवी रिशाल के लिए चाय लाती है और रिशाल के पास आकर बैठती हैं और पूछती हैं, “आज की मीटिंग कैसी रही, रिशाल? क्या हूआ सब ठीक रहा न ?”
रिशाल को माँ की मीटिंग की बात सुन जुहू बिच पर हुई इंसिडेंट अमानत की याद आ जाती है और वह उसी में खो जाता है। वह वरुणा देवी की बात को सुनता है, लेकिन उसका मन अमानत के साथ ही रहता है।
… to be continue….

🌺 “जय हनुमान: अटूट भक्ति का प्रकाश” 🌺
संकट के हर अंधेरे में, तुम दीप बनकर आते हो,
भटके हुए हर राही को, तुम राह सच्ची दिखाते हो।
जय बजरंगबली, जय अंजनी के लाल,
तुमसे ही जग में जगमग है हर एक उजियाल।
राम नाम की ज्योति लिए, तुमने जग को राह दिखाई,
भक्ति, शक्ति और सेवा की, सच्ची परिभाषा समझाई।
तुमसे ही साहस मिलता है, तुमसे ही विश्वास,
हर संकट में तुम बन जाते हो जीवन की आस।
जब-जब मन घबराया है, तुमने ही थाम लिया,
डगमगाते कदमों को तुमने, फिर से थाम लिया।
तुम हो शक्ति के सागर, तुम हो दया के धाम,
तुमसे ही जीवित रहता है हर दिल में श्रीराम।
तुमने लंका जलाकर भी, अहंकार को हराया,
सच्चे धर्म की खातिर तुमने, हर अत्याचार मिटाया।
तुम हो वीरता की पहचान, तुम हो भक्ति की मिसाल,
हर युग में गूंजेगा सदा— “जय हनुमान, जय बजरंगबली” का कमाल।
इस पावन दिन पर हम सब, सिर झुकाकर ये कहते हैं,
हे पवनसुत, तुमसे ही हम जीवन जीना सीखते हैं।
हमारे हर दुख को हर लो, हर भय को दूर भगाओ,
अपने चरणों में जगह देकर, जीवन सफल बनाओ।
जय-जय हनुमान, संकट मोचन, कृपा की वर्षा करो,
हम सबके जीवन में सदा, सुख-शांति का सागर भरो।
तेरे नाम का दीप जले, हर दिल के हर कोने में,
हनुमान जयंती की महिमा गूंजे, इस सारे जग के सोने में।
जय श्री हनुमान 🌺🌺🙏🙏🌹🌹
पढ़ने का समय : 4 मिनट
बरसात की हल्की-हल्की फुहारें शहर की सड़कों को जैसे कोई पुराना गीत सुना रही थीं। हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू घुली हुई थी, और उसी खुशबू के बीच खड़ा था आरव—अपनी छतरी को थामे, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।
वो इंतज़ार किसी साधारण व्यक्ति का नहीं था, बल्कि उसकी “संगिनी” का था—मीरा।
मीरा… एक नाम, जो उसके दिल में धड़कनों की तरह बस गया था।
आरव और मीरा की मुलाकात कोई फिल्मी अंदाज़ में नहीं हुई थी। न कोई टकराना, न कोई किताब गिरना। उनकी कहानी शुरू हुई थी एक साधारण-सी लाइब्रेरी में, जहाँ दोनों किताबों के बीच अपने-अपने ख्वाब ढूंढने आते थे।
पहली बार जब आरव ने मीरा को देखा था, वो खिड़की के पास बैठी थी। बारिश की बूंदें कांच पर गिर रही थीं, और वो अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वो इस दुनिया में होते हुए भी कहीं और हो।
आरव ने कई बार चाहा कि वो उससे बात करे, लेकिन हर बार कुछ न कुछ उसे रोक देता। शायद झिझक, या शायद डर कि कहीं वो उस खूबसूरत खामोशी को तोड़ न दे।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
एक दिन, मीरा की डायरी अचानक उसके हाथ से गिर गई। आरव पास ही खड़ा था, उसने तुरंत डायरी उठाकर उसे दी।
“थैंक यू,” मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा।
उस मुस्कान में कुछ ऐसा था, जिसने आरव के दिल को छू लिया।
“तुम… रोज़ यहां आती हो?” आरव ने हिम्मत जुटाकर पूछा।
मीरा ने हल्का-सा सिर हिलाया, “हाँ, ये जगह मुझे सुकून देती है।”
उस दिन से शुरू हुई उनकी बातचीत धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई।
दोनों घंटों साथ बैठते, किताबों पर चर्चा करते, और कभी-कभी बस चुपचाप खिड़की से बाहर गिरती बारिश को देखते रहते।
मीरा को कविताएं लिखना पसंद था, और आरव को उन कविताओं को पढ़ना।
“तुम्हारी कविताओं में इतनी गहराई क्यों होती है?” एक दिन आरव ने पूछा।
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्योंकि हर शब्द में एक अधूरी कहानी छुपी होती है।”
आरव को ये जवाब हमेशा सोच में डाल देता।
धीरे-धीरे, उसे एहसास होने लगा कि मीरा सिर्फ उसकी दोस्त नहीं रही। वो उसकी आदत बन गई थी। उसकी हर सुबह, हर शाम, हर ख्वाब में बस मीरा ही थी।
लेकिन मीरा… वो हमेशा थोड़ी रहस्यमयी रहती।
कभी बहुत करीब, तो कभी अचानक दूर।
एक दिन, जब बारिश हो रही थी, दोनों लाइब्रेरी से बाहर निकले।
“चलो, आज बिना छतरी के भीगते हैं,” मीरा ने अचानक कहा।
आरव हैरान था, “तुम्हें बारिश पसंद है?”
“बहुत… क्योंकि ये हर दर्द को धो देती है,” मीरा ने आसमान की ओर देखते हुए कहा।
दोनों भीगते हुए सड़क पर चलते रहे। उस दिन, पहली बार आरव ने मीरा का हाथ पकड़ा।
मीरा ने उसे नहीं रोका।
उस पल में, जैसे समय ठहर गया था।
लेकिन हर खूबसूरत कहानी में एक मोड़ जरूर आता है।
कुछ दिनों बाद, मीरा अचानक लाइब्रेरी आना बंद कर दी।
आरव हर दिन उसका इंतज़ार करता, लेकिन वो नहीं आई।
उसने फोन किया, मैसेज किए—लेकिन कोई जवाब नहीं।
उसकी दुनिया जैसे थम गई थी।
एक दिन, आखिरकार उसे मीरा का एक मैसेज मिला—
“मुझसे मिलने मत आना… ये हमारी आखिरी बात है।”
आरव के हाथ कांप गए।
“क्यों?” उसने तुरंत जवाब दिया।
लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
दिन बीतते गए, और आरव अंदर से टूटता गया।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि मीरा ने ऐसा क्यों किया।
आखिरकार, उसने तय किया कि वो सच्चाई जानकर ही रहेगा।
वो मीरा के घर पहुंचा।
दरवाजा उसकी माँ ने खोला।
“तुम आरव हो?” उन्होंने पूछा।
“जी…”
उनकी आंखों में आंसू थे।
“मीरा… अब इस शहर में नहीं है,” उन्होंने धीमे से कहा।
आरव का दिल जैसे रुक गया।
“क्या मतलब?”
उन्होंने उसे अंदर बुलाया और एक डायरी उसके हाथ में दी।
“ये उसने तुम्हारे लिए छोड़ी है।”
आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।
उसमें लिखा था—
“आरव,
अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी हूं।
मैंने तुम्हें सच नहीं बताया… क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी।
मुझे एक गंभीर बीमारी है, और मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।
मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझे इस हालत में देखो।
तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ खुशियां होनी चाहिए, दर्द नहीं।
तुम मेरी सबसे खूबसूरत याद हो… और हमेशा रहोगे।
तुम्हारी संगिनी,
मीरा।”
हर शब्द के साथ आरव की आंखों से आंसू गिरते गए।
अब उसे समझ आया कि मीरा क्यों दूर हो गई थी।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
कुछ महीनों बाद…
वही लाइब्रेरी, वही खिड़की, वही बारिश।
आरव अकेला बैठा था, हाथ में मीरा की डायरी लिए।
वो हर दिन वहां आता, जैसे मीरा अब भी वहीं बैठी हो।
उसने धीरे से डायरी खोली और एक नई कविता लिखी—
“तुम गई नहीं हो,
तुम यहीं कहीं हो…
हर बारिश की बूंद में,
हर खामोशी के सुकून में।
तुम मेरी संगिनी थी,
हो… और हमेशा रहोगी।”
उसने खिड़की से बाहर देखा।
बारिश अब भी हो रही थी।
और उस बारिश में, उसे ऐसा लगा जैसे मीरा मुस्कुरा रही हो।
क्योंकि कुछ प्यार कहानियां खत्म नहीं होतीं…
वो बस यादों में बदल जाती हैं—हमेशा के लिए।

पढ़ने का समय : 6 मिनट
गाँव का नाम था ‘सपनों की नगरी’। यहाँ लोग अपने अपने सपनों के पीछे भागते थे। इस गाँव की रौनक वहाँ के चौक में लगी हाट से होती थी, जहाँ हर सप्ताह स्थानीय किसान अपनी उपज बेचने आते थे। लेकिन इस हाट से सभी का ध्यान खींचता था एक छोटा सा पत्थर का मंदिर, जिसे ‘सपनों का मंदिर’ कहा जाता था। मान्यता थी कि इस मंदिर में जो भी व्यक्ति सच्चे मन से अपनी इच्छाएँ माँगता, उसकी इच्छाएँ पूरी होती थीं।
रीता, एक जिज्ञासु और साहसी लड़की थी, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए जी जान से मेहनत कर रही थी। उसकी एक साल की छोटी बहन, नीतू, हमेशा उसकी छाया बनकर रहती थी। रीता का सपना एक दिन एक बड़ी विद्या केंद्र खोलने का था, जहाँ गाँव के सारे बच्चे पढ़ाई कर सकें। उसके पास कुछ इरादा और सपने थे, लेकिन पैसे और संसाधनों की कमी ने उसके रास्ते में रुकावट डाल रखी थी।
एक दिन, रीता ने तय किया कि वह सपनों के मंदिर में जाकर अपनी इच्छा मांगेगी। उसने सोचा, “अगर मेरी इच्छा पूरी हो जाए और मुझे धन मिल जाए, तो मैं गाँव के बच्चों के लिए एक अच्छा स्कूल खोल सकूंगी।” वह डरती थी, लेकिन उसकी इच्छा ने उसे साहस दिया।
वह मंदिर पहुँची और आँखें बंद करके प्रार्थना करने लगी। “हे भगवान, मुझे अपने सपने को पूरा करने के लिए मदद करो। कृपया मुझे धन और संसाधन दो ताकि मैं अपनी बहन और दोस्तों के लिए एक स्कूल खोल सकूं।”
तभी अचानक एक हल्की ऊर्जा फैली। रीता ने आँखें खोलीं और देखा कि उसके पास एक पुराना आदमी खड़ा था। वह उसे देखकर मुस्कुराया। “बेटी, मैंने तुम्हारी प्रार्थना सुनी। लेकिन तुम्हें यह समझना होगा कि सपने सच करने के लिए केवल इच्छाएँ माँगने से नहीं, बल्कि मेहनत और संकल्प से पूरे होते हैं।”
रीता ने गंभीरता से उसकी बात सुनी। “लेकिन कैसे, बाबाजी? मुझे नहीं पता कि मैं कहाँ से शुरू करूँ।”
बाबाजी ने कहा, “तुम्हारे सपने की शुरुआत यहीं से होती है, अपने इरादे और मेहनत से। जो तुम्हारी असली यात्रा है, वही अंत हैं।”
रीता ने उसकी बात सुनी और सोचने लगी। बाबाजी ने कहा, “तुम्हें तुम्हारी यात्रा में साहस और सहारा देने के लिए कुछ कदम उठाने होंगे।”
रीता ने अगले दिन से अपनी योजना बनाने की ठानी। उसने गाँव में बच्चों के लिए एक छोटे से ट्यूशन क्लास खोला। वह जानती थी कि यह एक चुनौतीपूर्ण काम होगा, लेकिन उसने कभी हार मानने की सोची नहीं। उसने अपने घर के आँगन में ही ट्यूशन क्लास शुरू किया।
पहला दिन आया। बहुत कम बच्चे आए। उन्हें शिक्षिका की कमी के कारण डर लगा। लेकिन रीता ने निराश नहीं हुई। उसने अपने तरीके से सबको तंग करने के बजाय प्यार से पढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाया। धीरे-धीरे, बच्चे आने लगे। उसकी मेहनत रंग लाई।
कुछ महीने बाद, राजू, जो गाँव का सबसे गरीब लड़का था, उसके पास आया। “दीदी, मैं भी पढ़ना चाहता हूँ, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।” रीता ने उसे देखा और कहा, “कोई बात नहीं राजू, तुम यहाँ आ सकते हो। पढ़ाई भी मुफ्त होगी।”
इस तरह, गाँव के और भी बच्चे आने लगे। रीता ने उनके लिए न केवल शिक्षा का आदान-प्रदान किया, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मकता भरने का कार्य किया। उसकी कड़ी मेहनत से अब गाँव के बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि जागृत हुई।
एक दिन, रीता ने सोचा कि उसे अब एक बड़ी जगह की आवश्यकता है।
रीता ने अपने छोटे ट्यूशन क्लास से जो सफलता प्राप्त की थी, उसके बल पर उसने एक योजना बनाई। वह सोचने लगी, “अगर मैं एक बड़ी जगह की व्यवस्था कर सकूं, तो और भी बच्चे यहाँ पढ़ने आ सकते हैं।” लेकिन उसे समझ आ गया कि इसके लिए उसे अधिक संसाधनों की जरूरत होगी।
वह अपनी छोटी बहन नीतू को लेकर फिर से सपनों के मंदिर गई। वहाँ पहुँचकर उसने फिर से प्रार्थना की। “हे भगवान, मुझे मार्गदर्शन दो। मैं कड़ी मेहनत करूँगी, लेकिन मुझे एक अच्छी जगह की आवश्यकता है।” प्रार्थना के बाद, उसने अपने दोस्तों और पड़ोसियों से बात करने का निर्णय लिया।
गाँव के बुजुर्गों के पास जाकर उसने बताया कि वह बड़ा स्कूल खोलने का इरादा रखती है। गाँव के लोगों ने उसके जज़्बे की सराहना की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इसके लिए बड़ा धन और जमीन की आवश्यकता होगी।
तब उसने एक विचार किया। “यदि मैं यहाँ के सभी किसानों से संपर्क करूँ और उनसे कहूँ कि वे अपनी फसलें स्कूल के विकास के लिए योगदान दें, तो शायद यह काम आसान हो सकता है।”
वह गाँव में सबसे पहले अपने पड़ोसी किसान, चंदर भैया के पास गई। “चंदर भैया, क्या आप मेरी बात सुन सकते हैं? मैं गाँव में एक स्कूल खोलना चाहती हूँ और इसके लिए आपकी मदद की आवश्यकता है। क्या आप अपनी फसल में से थोड़ा सा दान कर सकते हैं?”
चंदर भैया ने उसकी बात सुनी और कहा, “बेटी, यह बहुत अच्छा विचार है। मैं अपनी फसल का एक हिस्सा तुम्हें दूंगा। लेकिन बस यह सुनिश्चित करो कि तुम बच्चों को अच्छी शिक्षा दें।”
रीता को चंदर भैया का समर्थन मिला। उसके बाद, उसने धीरे-धीरे और किसानों से संपर्क किया और आश्चर्यजनक रूप से गाँव के कई किसानों ने उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया। कुछ ने अनाज दिया, जबकि कुछ ने पैसे।
एक महीने के भीतर, रीता के पास कुछ पैसे इकट्ठा हो गए, और अब उसे जमीन के लिए सोचना था। वह गांव के बाहर एक छोटे से खाली मैदान की ओर गई, जो पहले से ही इस्तेमाल नहीं हो रहा था। उसने अपने विचार को वहाँ के निवासियों के सामने रखा।
“अगर हम यह जगह एक स्कूल के लिए इस्तेमाल करें, तो यह सारे गाँव के बच्चों के भविष्य के लिए बेहतर होगा। हम यहाँ खेतों से मिली फसल को बेचकर स्कूल के लिए अनुदान इकट्ठा कर सकते हैं।”
गाँव के लोग रीता के उत्साह से प्रभावित हुए और उन्होंने सामूहिक रूप से यह जगह स्कूल के लिए देने का निर्णय लिया। अब रीता को यकीन हो गया था कि उसकी मेहनत और इरादे रंग लाने लगे थे।
अब रीता ने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया। उसने एक बोर्ड का निर्माण किया और उसमें स्कूल का नाम ‘सपनों का स्कूल’ रखा। उसके बाद, उसने बच्चों के लिए ट्यूशन स्टाफ का चयन किया। गाँव में और भी कई शिक्षित लोग थे, जिन्होंने रीता के लिए मदद करने का आश्वासन दिया।
वित्तीय मदद प्राप्त करने के लिए, उन्होंने एक कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया। गाँव के लोग उत्सुकता से कार्यक्रम में शामिल हुए, जिसमें नितू ने एक नृत्य पेश किया और अन्य बच्चों ने गीत गाए।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य गाँव वाले को स्कूल के महत्व और शिक्षा के लाभों के बारे में जागरूक करना था। जैसे ही कार्यक्रम समाप्त हुआ, गाँव के प्रमुख ने घोषणा की, “हम सभी को मिलकर सपनों के स्कूल को सफल बनाना होगा।”
कार्यक्रम के बाद, रीता ने गाँव के लोगों से फिर से संपर्क किया और अपनी जरूरतों के बारे में बताया। गाँव के लोगों ने अपना-अपना सहयोग देने का वादा किया।
अब स्टाफ में शिक्षक और शिक्षिकाओं की भर्ती शुरू हुई। कई लोग आगे आए और अपने अनुभव साझा किए।
ऐसे ही रीता अंत से शुरुआत की एक सपने की जो उसने पूरा भी किया।
Lakshmi Kumari