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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 37

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 37

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

    ,एपिसोड – 37 : डॉक्टर का छुपा हुआ राज

     

     

    हवेली का दरवाजा जोर से बंद होते ही आरव, आरोही, अमन और रुद्र एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

     

    कुछ पल पहले तक उन्हें लगता था कि वे इस हवेली में शेखर और माधवी को ढूंढने आए हैं।

     

    लेकिन अब…

     

    उनके सामने एक ऐसा राज खड़ा था, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

     

    दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर में शेखर और अभय के साथ खड़ा तीसरा आदमी वही था, जिसे वे अपना मददगार समझते आए थे।

     

    डॉक्टर।

     

    आरव ने तस्वीर को दीवार से उतार लिया।

     

    “रुद्र…”

     

    रुद्र चुप रहा।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा—

     

    “तुमने कहा था कि ये वही आदमी है जिसने हमारी जिंदगी बर्बाद करने की साजिश रची थी। इसका मतलब क्या है?”

     

    रुद्र ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला, लेकिन तभी अंधेरे कमरे से डॉक्टर की आवाज आई—

     

    “मत पूछो, आरव।”

     

    चारों तरफ सन्नाटा छा गया।

     

    अमन ने तुरंत अपनी बंदूक निकाल ली।

     

    “बाहर आ!”

     

    कुछ सेकंड बाद सामने की सीढ़ियों पर डॉक्टर दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर वह नरमी नहीं थी, जो हमेशा दिखाई देती थी।

     

    उसकी आंखों में एक अजीब-सी कठोरता थी।

     

    आरव ने गुस्से से कहा—

     

    “आपने हमसे झूठ बोला।”

     

    डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा—

     

    “हां।”

     

    “आपने कहा था कि आपने मुझे और अमन को बचाया था।”

     

    “मैंने बचाया था।”

     

    “तो फिर ये तस्वीर?”

     

    डॉक्टर ने तस्वीर की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि उस रात मैं वहां था।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “मेरी मां को किसने मारा था?”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    कुछ पल तक वह चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “विराज ने गोली चलाई थी।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और आदेश?”

     

    डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “शेखर का?”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    अमन की मुट्ठियां कस गईं।

     

    “तो आप सब जानते थे!”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “मैं सब जानता था।”

     

     

     

    डॉक्टर की असली कहानी

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “फिर आपने इतने साल चुप्पी क्यों साधे रखी?”

     

    डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

     

    “क्योंकि मुझे अपनी जान से ज्यादा दो बच्चों की जान की चिंता थी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हमारी?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आपने हमारी यादें मिटाईं।”

     

    डॉक्टर की आंखों में दर्द आ गया।

     

    “अगर मैं ऐसा नहीं करता तो तुम दोनों आज जिंदा नहीं होते।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें बचाने के लिए हमारी यादें छीन लीं?”

     

    “हां।”

     

    “और फिर हमें झूठ बोलते रहे?”

     

    “क्योंकि सच तुम्हें फिर उसी नरक में ले जाता।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने पूछा—

     

    “उस रात आखिर हुआ क्या था?”

     

    डॉक्टर ने कमरे की एक पुरानी कुर्सी पर बैठते हुए कहा—

     

    “आज मैं तुम्हें पच्चीस साल पुरानी पूरी कहानी बताऊंगा।”

     

     

     

    पच्चीस साल पहले की रात

     

    डॉक्टर ने कहना शुरू किया—

     

    “उस रात अस्पताल में सिर्फ दो बच्चों का जन्म नहीं हुआ था।”

     

    “उस रात एक साम्राज्य का वारिस पैदा हुआ था।”

     

    आरव ध्यान से सुन रहा था।

     

    “शेखर उस समय एक बहुत बड़ा कारोबारी था। लेकिन उसके कारोबार के पीछे एक दूसरा चेहरा भी था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “सम्राट?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “शेखर ही सम्राट था।”

     

    आरव ने धीमे से कहा—

     

    “तो अभय?”

     

    डॉक्टर बोले—

     

    “अभय उसका छोटा भाई था।”

     

    “लेकिन हमें बताया गया कि अभय ही सम्राट है।”

     

    “यही तो शेखर की सबसे बड़ी चाल थी।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शेखर ने अपने अपराधों का इल्जाम अभय के ऊपर डाल दिया था।”

     

    आरव को सब समझ आने लगा।

     

    “इसलिए अभय ने खुद को खलनायक बना लिया।”

     

    “हां।”

     

    “ताकि शेखर का ध्यान मेरी तरफ से हट जाए।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

     

     

    सिया को क्या पता था?

     

    अमन बेचैनी से पूछ बैठा—

     

    “लेकिन मेरी मां को क्या पता चला था?”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “सिया को शेखर के गुप्त कारोबार के बारे में पता चल गया था।”

     

    “कैसे?”

     

    “क्योंकि वह शेखर की एक कंपनी में काम करती थी।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “मेरी मां?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया।”

     

    “क्योंकि उन्हें डर था कि तुम भी खतरे में आ जाओगे।”

     

    डॉक्टर ने आगे कहा—

     

    “सिया ने शेखर के खिलाफ सबूत इकट्ठा करना शुरू कर दिया।”

     

    “उसे लाल फाइल मिली।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा—

     

    “लाल फाइल में क्या था?”

     

    डॉक्टर बोले—

     

    “शेखर के सारे गैरकानूनी कारोबार, उसके गुप्त खातों की जानकारी, उसके लोगों के नाम और सबसे बड़ी बात…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उसके असली वारिस का नाम।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “मेरा?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

     

     

    आरव क्यों खतरा था?

     

    “शेखर को डर था कि अगर उसकी मौत हो गई तो उसका साम्राज्य किसी और के हाथ चला जाएगा।”

     

    “इसलिए उसने आरव को अपना उत्तराधिकारी बनाया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मैं तो बच्चा था।”

     

    “इसीलिए उसने तुम्हें इस्तेमाल किया।”

     

    “कैसे?”

     

    “तुम्हारी असाधारण याददाश्त का।”

     

    डॉक्टर ने बताया—

     

    “तुम्हें बचपन से ही चीजें याद रखने की आदत थी। शेखर तुम्हें कोड, रास्ते और जरूरी बातें दिखाता था।”

     

    “उसे पता था कि तुम भूलोगे नहीं।”

     

    आरव के चेहरे पर घृणा आ गई।

     

    “उसने मुझे इंसान नहीं समझा।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उसके लिए तुम उसका बेटा नहीं, उसकी सबसे सुरक्षित तिजोरी थे।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही की आंखों में उसके लिए सिर्फ प्यार था।

     

    “अब तुम्हें किसी के लिए तिजोरी बनने की जरूरत नहीं है।”

     

    आरव ने हल्की मुस्कान दी।

     

    “जब तुम मेरे साथ हो, मुझे किसी चीज से डर नहीं लगता।”

     

    अमन ने दोनों को देखा।

     

    “ये वक्त रोमांस करने का नहीं है।”

     

    आरोही ने उसे घूरकर देखा।

     

    “मैं तो बस उसे हिम्मत दे रही थी।”

     

    अमन मुस्कुरा दिया।

     

    “ठीक है, ठीक है।”

     

    कुछ पल के लिए माहौल हल्का हुआ।

     

    लेकिन डॉक्टर की अगली बात ने सबकी मुस्कान छीन ली।

     

     

     

    सबसे बड़ा धोखा

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “लेकिन लाल फाइल में सिर्फ शेखर के अपराध नहीं थे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और क्या था?”

     

    “एक सच ऐसा था, जिसे शेखर दुनिया से छुपाना चाहता था।”

     

    “कौन सा?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “आरव का जन्म।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरा जन्म?”

     

    “हां।”

     

    “मेरा जन्म इतना बड़ा राज क्यों था?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि शेखर तुम्हारा जैविक पिता नहीं था।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “क्या?”

     

    अमन ने भी डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “लेकिन अभी तो…”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “यही भ्रम शेखर ने जानबूझकर फैलाया।”

     

    आरव की आवाज कांपने लगी।

     

    “तो मेरे पिता कौन हैं?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “अभय।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तो ये सच है?”

     

    “हां।”

     

    “और अमन?”

     

    डॉक्टर कुछ पल चुप रहा।

     

    “अमन…”

     

    अमन आगे बढ़ा।

     

    “मेरे पिता कौन हैं?”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता भी अभय ही हैं।”

     

    अमन स्तब्ध रह गया।

     

    “तो हम दोनों…”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “सगे भाई हो।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “भाई…”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों कुछ पल तक चुपचाप एक-दूसरे को पकड़े रहे।

     

     

     

    लेकिन फिर सवाल उठा

     

    अमन ने अचानक पूछा—

     

    “अगर हम दोनों अभय के बेटे हैं तो शेखर ने क्यों कहा कि हम दोनों में से सिर्फ एक उसका बेटा है?”

     

    डॉक्टर चुप हो गया।

     

    आरव ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    “वो झूठ क्यों बोला?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि वह तुम्हें एक-दूसरे के खिलाफ करना चाहता था।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “ताकि हम आपस में लड़ें।”

     

    “हां।”

     

    आरव ने मुट्ठी भींच ली।

     

    “वो हमें कभी भाई नहीं बनना देना चाहता था।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “लेकिन शेखर तुम्हारी एक बात नहीं समझ पाया।”

     

    “क्या?”

     

    “खून से बड़ा रिश्ता भरोसे का होता है।”

     

    आरव और अमन एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

     

     

     

    विराज कहां है?

     

    रुद्र ने अचानक पूछा—

     

    “डॉक्टर, विराज अभी कहां है?”

     

    डॉक्टर का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “शेखर के साथ।”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “मुझे यही डर था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विराज सिर्फ शेखर का आदमी नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “वो शेखर का उत्तराधिकारी बनना चाहता है।”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “और अगर लाल फाइल उसे मिल गई तो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “वो पूरा साम्राज्य अपने नाम कर लेगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो हमें लाल फाइल पहले ढूंढनी होगी।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “लाल फाइल यहां नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर कहां है?”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पुराने कमरे में।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे कमरे में?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन वहां तो कुछ नहीं है।”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “तुमने कभी अपनी पुरानी लकड़ी की घोड़े वाली खिलौना गाड़ी देखी?”

     

    आरव के चेहरे पर अचानक बचपन की याद चमकी।

     

    “हां।”

     

    “उसके अंदर क्या था?”

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया।

     

    उसे एक दृश्य याद आया।

     

    छोटा आरव…

     

    लकड़ी का घोड़ा हाथ में लिए हुए…

     

    माधवी उसके सामने बैठी थीं।

     

    माधवी कह रही थीं—

     

    “इसे कभी किसी को मत देना।”

     

    आरव की आंखें खुल गईं।

     

    “मुझे याद है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “लाल फाइल उस खिलौने के अंदर थी।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन वो खिलौना अब वहां नहीं है।”

     

    आरव चौंका।

     

    “तो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शेखर उसे पहले ही ढूंढ चुका है।”

     

     

     

    आखिरी उम्मीद

     

    अचानक हवेली के बाहर गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।

     

    रुद्र खिड़की के पास गया।

     

    बाहर कई काली गाड़ियां खड़ी थीं।

     

    “वे आ गए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “शेखर के लोग।”

     

    डॉक्टर ने तुरंत कहा—

     

    “हमें पीछे के रास्ते से निकलना होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन लाल फाइल?”

     

    डॉक्टर ने आरव की तरफ देखा।

     

    “फाइल अभी भी तुम्हारे पास है।”

     

    आरव चौंका।

     

    “मेरे पास?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आपने कहा था कि शेखर उसे ले गया।”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “मैंने कहा था कि उसने खिलौना ले लिया।”

     

    “लेकिन फाइल?”

     

    डॉक्टर ने आरव के सीने की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारे अंदर छुपी यादों में।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शेखर ने खिलौना लिया।”

     

    “लेकिन लाल फाइल की असली जानकारी तुमने बचपन में याद कर ली थी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो फाइल की जरूरत ही नहीं?”

     

    “नहीं।”

     

    “सारा सच मेरे दिमाग में है?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे अचानक लाल रंग का एक कमरा दिखाई दिया।

     

    एक मेज…

     

    लाल फाइल…

     

    शेखर…

     

    अभय…

     

    सिया…

     

    माधवी…

     

    और एक छोटा-सा तिजोरी का दरवाजा।

     

    फिर एक नंबर उसकी आंखों के सामने चमका—

     

    1408

     

    आरव ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    “मुझे पासवर्ड याद आ गया।”

     

    रुद्र ने पूछा—

     

    “कौन सा?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “1408।”

     

    डॉक्टर का चेहरा बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    डॉक्टर ने डरते हुए कहा—

     

    “1408 कोई पासवर्ड नहीं है।”

     

    “तो क्या है?”

     

    डॉक्टर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “ये वो तारीख है जिस दिन तुम्हारे पिता ने पहली बार किसी को मरवाया था।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    तभी बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और डॉक्टर?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “मैं भी चलूंगा।”

     

    वे पीछे के दरवाजे की तरफ बढ़े।

     

    लेकिन जैसे ही आरव ने दरवाजा खोला…

     

    सामने शेखर खड़े थे।

     

    उनके साथ विराज भी था।

     

    शेखर के हाथ में लाल फाइल थी।

     

    उन्होंने फाइल ऊपर उठाई और मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “जिस चीज को तुम ढूंढ रहे हो, वो मेरे पास है, आरव।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    शेखर चौंके।

     

    आरव की आंखों में अब डर नहीं था।

     

    “असली फाइल मेरे पास है।”

     

    शेखर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    आरव ने आगे बढ़कर कहा—

     

    “क्योंकि मुझे सब याद आ गया है।”

     

    शेखर के चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    और विराज ने धीरे से अपनी बंदूक आरव की तरफ उठा दी।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 36

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 36

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 36 : शेखर का असली चेहरा

     

    “क्योंकि अब मेरा बेटा मुझे वापस चाहिए।”

     

    स्क्रीन पर शेखर की बदली हुई आवाज गूंजते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव की आंखें स्क्रीन पर जमी थीं।

     

    वह जिस आदमी को पूरी जिंदगी अपना पिता मानता आया था, वही आदमी अब किसी खतरनाक अपराधी की तरह उसके सामने था।

     

    आरोही ने धीरे से आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

     

    उसकी नजर सिर्फ स्क्रीन पर थी।

     

    “पापा… ये आप नहीं हो सकते।”

     

    स्क्रीन पर शेखर हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “यही तो गलती है, आरव। तुमने मुझे कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैंने आपको अपना पिता समझा।”

     

    “और मैंने तुम्हें अपना बेटा।”

     

    “तो फिर ये सब क्यों?”

     

    शेखर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि तुम सिर्फ मेरे बेटे नहीं हो, आरव।”

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “तो क्या हूं मैं?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम उस साम्राज्य के वारिस हो, जिसे मैंने पच्चीस साल पहले खड़ा किया था।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “तुम्हें शर्म नहीं आती?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत बोलो।”

     

    अमन चीखा—

     

    “मेरी मां की मौत में तुम्हारा हाथ था?”

     

    शेखर के चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तुम्हारी मां ने बहुत बड़ी गलती की थी।”

     

    “क्या गलती?”

     

    “उसने मेरे खिलाफ जाने की कोशिश की।”

     

    अमन की आंखें लाल हो गईं।

     

    “तुमने उसे मारा?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    अमन ने फिर पूछा—

     

    “बोलो!”

     

    शेखर ने धीरे से कहा—

     

    “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    अमन जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “तो हत्यारा कौन था?”

     

    शेखर की नजर विराज की तरफ गई।

     

    “वही।”

     

    विराज चुप खड़ा था।

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी मां को मारा?”

     

    विराज ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    अमन की मुट्ठियां कस गईं।

     

    लेकिन इस बार शेखर की आवाज आई—

     

    “लेकिन गोली चलाने का आदेश मेरा था।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

     

    शेखर हंसे।

     

    “मुझे तुम्हारी माफी की जरूरत नहीं।”

     

    आरव ने अभय की तरफ देखा।

     

    “तो आप कौन हैं?”

     

    अभय चुप था।

     

    “आपने मुझे इतने साल क्यों बचाया?”

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने मुझसे वादा लिया था।”

     

    “कौन-सा वादा?”

     

    “कि मैं तुम्हें शेखर से बचाऊंगा।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मतलब आप मेरे दुश्मन नहीं थे?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “फिर सम्राट कौन था?”

     

    अभय ने स्क्रीन की तरफ देखा।

     

    “शेखर।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो आपने खुद को सम्राट क्यों बताया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “क्योंकि शेखर को लगा कि अगर दुनिया मुझे सम्राट समझेगी, तो वह तुम्हें मेरे पीछे भेज देगा।”

     

    “और आप?”

     

    “मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

     

    आरव ने दर्द से कहा—

     

    “लेकिन आपने भी मुझसे झूठ बोला।”

     

    अभय ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कभी-कभी किसी की जान बचाने के लिए खुद को खलनायक बनना पड़ता है।”

     

    माधवी अब तक चुप थीं।

     

    आरव उनके पास गया।

     

    “मां, क्या आपको भी पता था?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “पापा असली सम्राट हैं?”

     

    “हां।”

     

    “और आपने मुझे उनसे बचाया?”

     

    माधवी रो पड़ीं।

     

    “मैंने तुम्हें सिर्फ उनसे नहीं…”

     

    वह रुक गईं।

     

    “पूरी दुनिया से बचाया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय शेखर ने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।”

     

    “मैंने?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे अंदर एक खास क्षमता थी।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “कैसी क्षमता?”

     

    माधवी ने जवाब नहीं दिया।

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम्हारी याददाश्त।”

     

    आरव चौंका।

     

    “मेरी?”

     

    “तुम बचपन में चीजें सिर्फ देखते नहीं थे।”

     

    “तो?”

     

    “तुम उन्हें कभी भूलते नहीं थे।”

     

    आरव को अचानक अपनी बचपन की धुंधली यादें समझ आने लगीं।

     

    लोगों के चेहरे।

     

    कमरों के रास्ते।

     

    कागजों पर लिखे शब्द।

     

    पासवर्ड।

     

    सब कुछ।

     

    अभय ने कहा—

     

    “शेखर ने तुम्हारी इसी क्षमता का इस्तेमाल किया।”

     

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

     

    “कैसे?”

     

    शेखर ने जवाब दिया—

     

    “तुम्हें याद नहीं होगा।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं तुम्हें छोटी-छोटी चीजें याद करवाता था।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम मेरे साम्राज्य के सारे गुप्त रास्ते, कोड और खातों को अपने दिमाग में सुरक्षित रखते थे।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “तो मैं…”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मेरी चलती-फिरती तिजोरी था।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में दर्द था।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “इसीलिए मुझे बचपन की बातें याद नहीं थीं।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम्हारी यादें मिटा दी गई थीं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    अभय ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “उसने।”

     

    स्क्रीन पर शेखर मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारी यादें वापस आ रही हैं, आरव।”

     

    “और मैं चाहता भी यही हूं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे अपनी आखिरी चाबी चाहिए।”

     

    “कौन-सी चाबी?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “तुम्हारे दिमाग में मेरे साम्राज्य की सबसे बड़ी तिजोरी का पासवर्ड है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन उसे कुछ याद नहीं।”

     

    शेखर हंसे।

     

    “याद आएगा।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “और अगर नहीं आया?”

     

    शेखर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तो उसकी मां मर जाएगी।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “मां को हाथ मत लगाना।”

     

    “फिर मेरे पास आओ।”

     

    “मैं आऊंगा।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा—

     

    “आरव, नहीं!”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    “वो जाल है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर भी?”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “अगर मैं नहीं गया तो मां मर जाएंगी।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मैं भी चलूंगी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें खतरे में नहीं डाल सकता।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “तुम्हें याद है तुमने मुझसे क्या कहा था?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    आरोही बोली—

     

    “तुमने कहा था कि अब से मेरी जिंदगी में जो भी आएगा, उसका सामना हम दोनों करेंगे।”

     

    आरव की आंखें नम हो गईं।

     

    “आरोही…”

     

    “मैं तुम्हें अकेला नहीं जाने दूंगी।”

     

    अमन भी आगे आया।

     

    “और मैं भी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये मेरा परिवार है।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “अब हमारा।”

     

    अभय ने दोनों भाइयों को देखा।

     

    उसकी आंखों में हल्की नमी थी।

     

    स्क्रीन पर शेखर ने कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    “तुम तीनों आ सकते हो।”

     

    “लेकिन एक शर्त है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “अभय तुम्हारे साथ नहीं आएगा।”

     

    अभय ने तुरंत कहा—

     

    “क्यों?”

     

    शेखर हंसा।

     

    “क्योंकि अगर तुम मेरे सामने आए तो मैं माधवी को गोली मार दूंगा।”

     

    माधवी ने चिल्लाकर कहा—

     

    “अभय, मत आना!”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैं अकेला नहीं आऊंगा।”

     

    शेखर बोला—

     

    “तुम्हारे साथ सिर्फ आरोही और अमन आ सकते हैं।”

     

    “और रुद्र?”

     

    “नहीं।”

     

    रुद्र ने तुरंत कहा—

     

    “मैं फिर भी जाऊंगा।”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था।”

     

    स्क्रीन बंद हो गई।

     

    कमरे में फिर खामोशी छा गई।

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “हमें शेखर की लोकेशन ढूंढनी होगी।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मुझे पता है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कहां?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “पुराना हवेली वाला घर।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “वही जहां मैं बचपन में रहता था?”

     

    “हां।”

     

    “वह तो बंद है।”

     

    “बाहर से।”

     

    अभय ने दीवार की तरफ देखा।

     

    “नीचे पूरा साम्राज्य चलता है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो हमें वहीं जाना होगा।”

     

    माधवी ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “बेटा…”

     

    आरव ने मां की तरफ देखा।

     

    “मैं आपको वापस लेकर आऊंगा।”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं—

     

    “अपने पिता पर भरोसा मत करना।”

     

    आरव चौंका।

     

    “किस पिता पर?”

     

    माधवी ने अभय की तरफ देखा।

     

    फिर बोलीं—

     

    “किसी पर नहीं।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    रात और गहरी हो चुकी थी।

     

    आरव, आरोही, अमन और रुद्र हवेली की तरफ बढ़ रहे थे।

     

    अभय पीछे रह गया।

     

    उसने जाते हुए आरव को सिर्फ इतना कहा—

     

    “बेटा…”

     

    आरव पलटा।

     

    अभय ने कहा—

     

    “अगर वहां तुम्हें मेरी और शेखर की कोई तस्वीर मिले… तो उसे ध्यान से देखना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उस तस्वीर में तुम्हारे सवाल का जवाब छिपा है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “मैं वापस आऊंगा।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मैं इंतजार करूंगा।”

     

    हवेली का दरवाजा खुला था।

     

    आरव ने अंदर कदम रखा।

     

    अजीब सन्नाटा था।

     

    दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    अमन एक तस्वीर के सामने रुक गया।

     

    “आरव… ये देखो।”

     

    आरव ने तस्वीर देखी।

     

    उसमें शेखर और अभय साथ खड़े थे।

     

    लेकिन उनके बीच एक तीसरा आदमी भी था।

     

    चेहरा आधा अंधेरे में था।

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “ये कौन है?”

     

    रुद्र ने तस्वीर देखते ही अपना चेहरा बदल लिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “रुद्र?”

     

    रुद्र चुप रहा।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “तुम इसे जानते हो?”

     

    रुद्र ने धीमे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “कौन है?”

     

    रुद्र ने जवाब देने से पहले लंबी सांस ली।

     

    फिर बोला—

     

    “यही वो आदमी है, जिसने तुम दोनों की जिंदगी बर्बाद करने की पूरी साजिश रची थी।”

     

    आरव ने तस्वीर को और करीब से देखा।

     

    चेहरा धीरे-धीरे रोशनी में आया।

     

    अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

     

    आरोही के मुंह से चीख निकल गई।

     

    क्योंकि तस्वीर में मौजूद तीसरा आदमी कोई अजनबी नहीं था।

     

    वह था—

     

    डॉक्टर।

     

    वही डॉक्टर…

     

    जिसने दावा किया था कि उसने आरव और अमन को बचाया था।

     

    और उसी पल पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अंधेरे में डॉक्टर की आवाज गूंजी—

     

    “अब तुम्हें मेरी पूरी कहानी सुननी होगी।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 35

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 35

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 35 : दो भाइयों में से असली बेटा कौन?

     

    कमरे में अंधेरा था।

     

    अभय की आवाज चारों तरफ गूंज रही थी—

     

    “अब यही पता करना है कि तुम दोनों में से मेरा असली बेटा कौन है।”

     

    आरव ने तुरंत कहा—

     

    “ये कैसी बकवास है? हम दोनों की जिंदगी से खेलना बंद करो!”

     

    अभय की हंसी सुनाई दी।

     

    “मैं खेल नहीं रहा, आरव। मैं तुम्हें तुम्हारी पहचान बता रहा हूं।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “हमें किसी पहचान की जरूरत नहीं है। हमारी मां ने हमें पाला है, वही हमारी पहचान है।”

     

    अभय कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “बहुत अच्छी बात कही।”

     

    अचानक कमरे की लाइट जल गई।

     

    सामने अभय खड़ा था।

     

    लेकिन इस बार उसके हाथ में बंदूक नहीं थी।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी फाइल थी।

     

    वह धीरे-धीरे दोनों के पास आया।

     

    “इस फाइल में तुम्हारे जन्म का सच है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो खोलो।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    “हां।”

     

    “सच सुनने के लिए तैयार हो?”

     

    आरव ने बिना झिझक कहा—

     

    “हां।”

     

    अमन भी उसके पास आकर खड़ा हो गया।

     

    “मैं भी।”

     

    अभय ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर दो जन्म प्रमाण-पत्र थे।

     

    एक पर लिखा था—

     

    आरव — जन्म: 14 अगस्त

     

    दूसरे पर—

     

    अमन — जन्म: 14 अगस्त

     

    आरोही हैरान रह गई।

     

    “दोनों की जन्मतिथि एक ही?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन हमें हमेशा बताया गया कि हम अलग-अलग परिवारों में पैदा हुए थे।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम दोनों एक ही रात पैदा हुए थे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और हमारी मां?”

     

    “अलग थीं।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो फिर तुम हम दोनों के पिता कैसे हो सकते हो?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यही तो इस कहानी का सबसे बड़ा रहस्य है।”

    अभय ने अगला पन्ना खोला।

     

    उसमें दो महिलाओं की तस्वीर थी।

     

    एक तस्वीर में माधवी थीं।

     

    दूसरी में सिया।

     

    आरव तस्वीर देखते ही चौंक गया।

     

    “तो मां और सिया एक-दूसरे को पहले से जानती थीं।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “सिर्फ जानती नहीं थीं।”

     

    “तो?”

     

    “दोनों ने मिलकर तुम्हें बचाया था।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    माधवी चुप रहीं।

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम्हारी मां और सिया ने एक समझौता किया था।”

     

    “कैसा समझौता?”

     

    “अगर मेरे दुश्मनों को मेरे बच्चों के बारे में पता चलता, तो दोनों बच्चों की जान खतरे में पड़ जाती।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो हमें अलग क्यों रखा गया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “ताकि कोई तुम्हें एक-दूसरे से जोड़ न सके।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन फिर हमें भाई जैसा रिश्ता क्यों महसूस होता है?”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि खून का रिश्ता तुम्हें बार-बार एक-दूसरे तक खींचता रहा।”

     

    अभय ने एक और कागज निकाला।

     

    “ये तुम्हारी डीएनए रिपोर्ट है।”

     

    आरव ने कागज ले लिया।

     

    उसकी नजर रिपोर्ट पर गई।

     

    वह पढ़ने लगा।

     

    कुछ सेकंड बाद उसका चेहरा बदल गया।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    अमन ने पढ़ा।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “ये…”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या लिखा है?”

     

    अमन कुछ नहीं बोला।

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “रिपोर्ट के मुताबिक…”

     

    वह रुक गया।

     

    अभय ने बात पूरी की—

     

    “तुम दोनों में से केवल एक मेरा बेटा है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन कौन?”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “यही तो तुम्हें खुद पता लगाना है।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा—

     

    “तुम्हें पता है।”

     

    “बिल्कुल।”

     

    “तो बताओ।”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर मैंने बता दिया, तो तुम दोनों में से एक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी।”

     

    अमन ने आरव की तरफ देखा।

     

    “भाई…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां?”

     

    “अगर मैं तुम्हारा भाई नहीं हुआ तो?”

     

    आरव ने तुरंत कहा—

     

    “तो भी तुम मेरे भाई रहोगे।”

     

    अमन की आंखें भर आईं।

     

    “और अगर तुम मेरे भाई नहीं हुए?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तब भी।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।

     

    आरोही की आंखों में भी आंसू आ गए।

     

    अभय उन्हें देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार कोई भावना दिखाई दी।

     

    शायद गर्व।

     

    शायद दर्द।

     

    आरव मां के पास गया।

     

    “मां, आप जानती थीं कि हम दोनों में से कौन अभय का बेटा है?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “आपको पता है?”

     

    “हां।”

     

    “तो बताइए।”

     

    माधवी रोने लगीं।

     

    “मैं नहीं बता सकती।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैंने वादा किया था।”

     

    “किससे?”

     

    माधवी ने अभय की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता से।”

     

    आरव ने अभय की तरफ देखा।

     

    “आपने मां से भी सच छुपाने को कहा?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    माधवी ने तुरंत कहा—

     

    “अभय ने मुझे मजबूर नहीं किया था।”

     

    “तो फिर?”

     

    माधवी बोलीं—

     

    “मैंने खुद वादा किया था।”

     

    “क्यों?”

     

    माधवी ने आरव का चेहरा पकड़ लिया।

     

    “क्योंकि उस रात अगर मैंने सच बता दिया होता…”

     

    उनकी आवाज टूट गई।

     

    “तो तुम दोनों में से एक बच्चा आज जिंदा नहीं होता।”

     

    अचानक दीवार के पीछे से बीप की आवाज आने लगी।

     

    रुद्र तुरंत चौकन्ना हो गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    अभय का चेहरा बदल गया।

     

    उसने तुरंत कहा—

     

    “सब पीछे हटो।”

     

    कुछ ही सेकंड बाद—

     

    धड़ाम!

     

    दीवार का एक हिस्सा टूट गया।

     

    धुआं कमरे में भर गया।

     

    आरोही खांसने लगी।

     

    आरव ने उसे अपनी तरफ खींच लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    रुद्र ने चारों तरफ देखा।

     

    “कोई बाहर से हमला कर रहा है।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विराज।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “उसे लाल फाइल चाहिए।”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “उसे सिर्फ फाइल नहीं चाहिए।”

     

    “फिर?”

     

    “वो चाहता है कि तुम दोनों एक-दूसरे के खिलाफ हो जाओ।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि तुम दोनों मिलकर उससे ज्यादा ताकतवर हो।”

     

    अचानक कमरे की स्क्रीन चालू हो गई।

     

    विराज दिखाई दिया।

     

    उसके चेहरे पर वही खतरनाक मुस्कान थी।

     

    “अभय…”

     

    अभय ने स्क्रीन की तरफ देखा।

     

    “विराज।”

     

    विराज हंसा।

     

    “तुमने आखिरकार अपने बच्चों को सच बता ही दिया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तुम्हें हमसे क्या चाहिए?”

     

    विराज ने कहा—

     

    “मुझे सिर्फ लाल फाइल चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उस फाइल में मेरी बर्बादी का राज है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तुमने मेरी मां को मारा।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    फिर बोला—

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखें लाल हो गईं।

     

    “मैं तुम्हें छोड़ूंगा नहीं।”

     

    विराज हंसा।

     

    “पहले अपने पिता को तो पहचान लो।”

     

    अभय की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “विराज, तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है।”

     

    विराज ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    फिर स्क्रीन पर एक वीडियो चला।

     

    उसमें शेखर दिखाई दे रहे थे।

     

    वो एक कुर्सी से बंधे हुए थे।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “पापा!”

     

    विराज ने कहा—

     

    “अगर लाल फाइल नहीं मिली, तो शेखर मरेंगे।”

     

    शेखर ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    “आरव… मेरी बात सुनो।”

     

    आरव स्क्रीन के पास चला गया।

     

    “पापा!”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “जो कुछ भी हो रहा है, उसमें अभय की हर बात पर भरोसा मत करना।”

     

    अभय ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    शेखर ने आगे कहा—

     

    “और लाल फाइल…”

     

    वह रुक गए।

     

    विराज ने उन्हें थप्पड़ मारा।

     

    “बोलो!”

     

    शेखर ने फिर कहा—

     

    “लाल फाइल में जो लिखा है… वो पूरा सच नहीं है।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “उसमें एक नाम झूठा लिखा गया है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसका?”

     

    शेखर ने स्क्रीन की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “अभय का।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने धीरे से अभय की तरफ देखा।

     

    अभय के चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “पापा… मेरा मतलब… अभय…”

     

    वह खुद ही रुक गया।

     

    “क्या ये सच है?”

     

    अभय ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरव ने जोर से पूछा—

     

    “क्या लाल फाइल में आपका नाम झूठा लिखा है?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “हां।”

     

    अमन चौंका।

     

    “तो तुम असली सम्राट नहीं हो?”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल बाद उसने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तो असली सम्राट कौन है?”

     

    अभय ने जवाब नहीं दिया।

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “मुझे लगता है अब समय आ गया है।”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “रुद्र…”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “तुम्हें सच बताना ही होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन है असली सम्राट?”

     

    रुद्र ने गहरी सांस ली।

     

    फिर धीरे-धीरे कहा—

     

    “जिसे तुमने इतने साल अपना सबसे बड़ा रक्षक समझा…”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    रुद्र ने आगे कहा—

     

    “वही असली सम्राट है।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा—

     

    “कौन?”

     

    रुद्र की नजर सीधे…

     

    शेखर पर गई।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “पापा…?”

     

    अभय ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं!”

     

    लेकिन उसी पल स्क्रीन पर बंधे शेखर मुस्कुराए।

     

    उनकी आंखों में एक अजीब चमक थी।

     

    उन्होंने कैमरे की तरफ देखा और कहा—

     

    “बहुत देर कर दी, अभय।”

     

    फिर शेखर ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

     

    और उनकी आवाज पूरी तरह बदल गई—

     

    “क्योंकि अब मेरा बेटा मुझे वापस चाहिए।”

     

    आरव के हाथ से लाल फाइल गिर गई।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 34

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 34

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 34 : पिता के रूप में सबसे बड़ा दुश्मन

     

    “कैसे हो, बेटा?”

     

    अभय की आवाज सुरंग में गूंज उठी।

     

    आरव उसे बस देखता रह गया।

     

    जिस चेहरे को उसने कभी नहीं देखा था, आज वही चेहरा उसके सामने था।

     

    वही आदमी…

     

    जिसे वह इतने सालों से अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता रहा।

     

    वही आदमी…

     

    जिससे उसके परिवार ने उसे बचाकर रखा था।

     

    और अब उसकी मां खुद कह चुकी थी—

     

    “यही तुम्हारा पिता है।”

     

    आरव के होंठ कांपने लगे।

     

    “आप…”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “हां।”

     

    “आप ही सम्राट हैं?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तो इतने सालों से मैं जिससे लड़ रहा था…”

     

    अभय ने बात पूरी की—

     

    “वो तुम्हारा अपना पिता था।”

     

    अमन ने तुरंत बंदूक तान दी।

     

    “तुमने सिया को मारा!”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां ने खुद अपने लिए मौत चुनी थी।”

     

    अमन गुस्से में उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “झूठ!”

     

    रुद्र ने उसे पकड़ लिया।

     

    “अमन, अभी नहीं।”

     

    अमन चीखा,

     

    “मुझे छोड़ो!”

     

    अभय शांत खड़ा रहा।

     

    उसके चेहरे पर डर का नाम तक नहीं था।

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां… आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”

     

    “लेकिन आप जानती थीं कि मेरे पिता कौन हैं।”

     

    “हां।”

     

    “और ये भी कि ये सम्राट हैं?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो आपने मुझे इतने साल झूठ में क्यों रखा?”

     

    माधवी उसके पास आईं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता को तुमसे एक खास चीज चाहिए थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभय खुद जवाब देने लगा।

     

    “तुम।”

     

    आरव उसकी तरफ देखने लगा।

     

    अभय ने कहा,

     

    “मुझे लाल फाइल से ज्यादा तुम्हारी जरूरत थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उस फाइल में जो सच था, वो तुम्हारे अंदर भी छिपा था।”

     

    आरव को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “मेरे अंदर?”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें बचपन में जो कुछ भूलाया गया था, वो सिर्फ यादें नहीं थीं।”

     

    “तो क्या था?”

     

    “एक राज।”

     

    अचानक आरव के सिर में तेज दर्द होने लगा।

     

    उसकी आंखों के सामने तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक छोटा कमरा…

     

    माधवी रो रही थीं…

     

    सिया उसके पास खड़ी थीं…

     

    अमन भी वहीं था।

     

    दोनों बच्चे एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे।

     

    और सामने अभय खड़ा था।

     

    छोटे आरव ने उससे पूछा था—

     

    “आप हमें क्यों मारना चाहते हो?”

     

    अभय की आवाज गूंजी—

     

    “क्योंकि तुम दोनों मेरे रास्ते में हो।”

     

    आरव ने आंखें खोल दीं।

     

    वह जमीन पर बैठ गया।

     

    आरोही तुरंत उसके पास आई।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब याद आ रहा है।”

     

    अमन उसके पास आ गया।

     

    “क्या याद आया?”

     

    आरव ने अभय की तरफ देखा।

     

    “तुमने हमें बचपन में मारने की कोशिश की थी।”

     

    अभय कुछ नहीं बोला।

     

    आरव की आंखों में नफरत भर गई।

     

    “तुम मेरे पिता हो… फिर भी तुमने मुझे मारना चाहा?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्योंकि उस वक्त तुम मेरे बेटे नहीं थे।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या?”

     

    अभय धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम मेरे बेटे थे… लेकिन मेरे दुश्मन भी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं एक बच्चा था!”

     

    “बच्चे कभी-कभी सबसे बड़े राज लेकर पैदा होते हैं।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “ये कैसी बकवास है?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी उस राज का हिस्सा हो।”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आखिर वो राज है क्या?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “पच्चीस साल पहले एक समझौता हुआ था।”

     

    “किसके बीच?”

     

    “शेखर, सिया और मेरे बीच।”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा,

     

    “अभय, अब बस करो।”

     

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

     

    “नहीं माधवी। अब सच पूरा होगा।”

     

     

    अभय ने कहा,

     

    “उस समय मेरे पास बहुत ताकत थी।”

     

    “लेकिन सिया के पास मेरे खिलाफ सबूत थे।”

     

    “शेखर ने सिया का साथ दिया।”

     

    “माधवी ने बच्चों को छिपाया।”

     

    “और फिर…”

     

    वह रुक गया।

     

    “एक रात सब कुछ बदल गया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “सिया ने तुम्हें और अमन को एक ऐसी चीज दिखाई थी, जिसे तुम दोनों ने अपनी आंखों से देखा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “हमने क्या देखा था?”

     

    अभय ने जवाब दिया—

     

    “तुमने लाल फाइल देखी थी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “बस?”

     

    “नहीं।”

     

    अभय की नजर दोनों पर गई।

     

    “तुमने उस फाइल के अंदर एक तस्वीर भी देखी थी।”

     

    अमन की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “कौन-सी तस्वीर?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “तुम दोनों के पिता की।”

     

    अमन स्तब्ध रह गया।

     

    “मेरे पिता की?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो मेरे पिता कौन हैं?”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “मैं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “और अमन के?”

     

    अभय ने अमन की तरफ देखा।

     

    कुछ पल चुप रहने के बाद बोला—

     

    “वो भी मैं हूं।”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “नहीं!”

     

    माधवी ने तुरंत कहा,

     

    “अभय, झूठ मत बोलो!”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    अमन ने अपनी मां की डायरी याद की।

     

    सिया ने कभी उसके पिता का नाम साफ नहीं बताया था।

     

    बस इतना कहा था—

     

    “तुम्हारे पिता से दूर रहना।”

     

    अमन ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “तो मेरी मां और तुम…”

     

    अभय ने कहा,

     

    “हम एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने नजरें झुका लीं।

     

    अभय बोला—

     

    “लेकिन सिया ने मुझे छोड़ दिया।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसे मेरे अंदर का राक्षस दिखाई देने लगा था।”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “तो मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    “मेरी मां ऐसी नहीं थी।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां बहुत अच्छी थी।”

     

    “तो फिर तुमने उसे क्यों मारा?”

     

    अभय कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैंने नहीं मारा।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    “सिया की मौत के पीछे कोई और था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “विराज?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तो तुमने उसे बचाया क्यों नहीं?”

     

    अभय की आंखों में पहली बार दर्द आया।

     

    “क्योंकि जब तक मुझे सच पता चला… बहुत देर हो चुकी थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “पापा कहां हैं?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारा मतलब शेखर से है?”

     

    “हां।”

     

    “वो अभी जिंदा हैं।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “मुझे उनसे मिलना है।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मिलोगे।”

     

    “कहां?”

     

    “उसी जगह जहां ये कहानी शुरू हुई थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कहां?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आरव के बचपन वाला घर।”

     

    आरव चौंका।

     

    “वो घर तो बीस साल पहले जल गया था।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “घर जला था।”

     

    “लेकिन उसके नीचे का कमरा नहीं।”

     

    अभय ने सुरंग की दीवार पर हाथ रखा।

     

    एक गुप्त दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर सीढ़ियां थीं।

     

    “नीचे चलो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “वहां क्या है?”

     

    “तुम्हारे बचपन का आखिरी सच।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “और अगर ये जाल हुआ?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तो तुम मुझे मार देना।”

     

    अमन ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

     

    “मैं मार दूंगा।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    वे सब नीचे उतरने लगे।

     

    माधवी सबसे पीछे थीं।

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आंटी, आप ठीक हैं?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    “किससे?”

     

    माधवी ने धीमे से कहा—

     

    “सच से।”

     

     

    करीब दस मिनट बाद वे एक पुराने कमरे में पहुंचे।

     

    आरव कमरे को देखते ही रुक गया।

     

    “ये…”

     

    उसकी आंखों में बचपन की यादें लौटने लगीं।

     

    यही वह जगह थी जहां वह बचपन में खेलता था।

     

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर अभी भी लगी थी।

     

    उसमें आरव, माधवी और शेखर थे।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे एक और आदमी खड़ा था।

     

    अभय।

     

    आरव ने तस्वीर उतारी।

     

    पीछे एक छोटा कागज चिपका था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिस दिन आरव को सच पता चलेगा, उसी दिन दूसरा बच्चा वापस आएगा।”

     

    अमन ने पढ़ते ही कहा,

     

    “दूसरा बच्चा?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “शायद।”

     

    अचानक कमरे की दूसरी दीवार खुल गई।

     

    अंदर एक पुराना बक्सा रखा था।

     

    आरव ने बक्सा खोला।

     

    उसमें…

     

    एक लाल फाइल थी।

     

    सबकी आंखें फैल गईं।

     

    आरव ने फाइल उठाई।

     

    अभय ने कहा—

     

    “यही है वो चीज जिसके लिए इतने सालों से लोग एक-दूसरे को मारते रहे।”

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर दो नाम थे—

     

    आरव

     

    अमन

     

    और नीचे एक तीसरा नाम।

     

    आरव की आंखें उस नाम पर टिक गईं।

     

    उसने धीरे से पढ़ा—

     

    “वास्तविक उत्तराधिकारी…”

     

    आगे का शब्द देखकर आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्या लिखा है?”

     

    आरव ने फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    अमन ने पढ़ा।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    क्योंकि वहां लिखा था—

     

    “आरव और अमन में से केवल एक ही अभय का जैविक पुत्र है।”

     

    आरोही ने हैरानी से कहा,

     

    “तो दूसरा…?”

     

    अचानक पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अभय की आवाज आई—

     

    “अब यही पता करना है कि तुम दोनों में से मेरा असली बेटा कौन है।”

     

    और उसी पल कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में एक आवाज गूंजी—

     

    “और याद रखना… गलत जवाब देने वाले की मौत होगी।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 33

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 33

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 33 : विराज का नया चेहरा

     

    तहखाने में अचानक छाई खामोशी को विराज की धीमी हंसी ने तोड़ दिया।

     

    आरव की नजर सामने खड़े विराज पर थी।

     

    उसके पीछे कई हथियारबंद लोग खड़े थे।

     

    दूसरी तरफ रुद्र अपनी बंदूक ताने हुए था।

     

    अमन आरव के पास खड़ा था और आरोही ने डर के बावजूद खुद को संभाल रखा था।

     

    कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।

     

    फिर आरव ने विराज से पूछा—

     

    “तुम यहां क्यों आए हो?”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि इस कहानी का सबसे जरूरी हिस्सा अभी बाकी है।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने मेरी मां को मरवाया!”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम अब भी वही गलती कर रहे हो।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “हर मौत का जिम्मेदार मुझे समझना।”

     

    अमन उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “अगर आज तुमने एक कदम भी आगे बढ़ाया तो—”

     

    रुद्र ने उसे रोक दिया।

     

    “अमन, रुक जाओ।”

     

    विराज ने रुद्र की तरफ देखा।

     

    “तुमने आखिरकार अपना असली पक्ष चुन ही लिया।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “मैंने कभी तुम्हारा पक्ष नहीं चुना था।”

     

    विराज की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “फिर आज देखता हूं तुम किसके लिए मरते हो।”

    अब तक घायल आर्यन दीवार के सहारे खड़ा था।

     

    उसने विराज को देखते ही कहा,

     

    “तुम यहां कैसे पहुंचे?”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जिस रास्ते से तुम आए थे।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मैंने वह रास्ता बंद कर दिया था।”

     

    विराज हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारे बनाए रास्ते सिर्फ तुम्हें पता हैं?”

     

    आर्यन की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “लाल फाइल चाहिए थी तुम्हें।”

     

    “अभी भी चाहिए।”

     

    “लेकिन वो मेरे पास नहीं है।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मुझे पता है।”

     

    आर्यन चौंका।

     

    “फिर?”

     

    विराज ने आरव की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि वो उसके पास है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं है।”

     

    “तुम्हें सच में कुछ याद नहीं?”

     

    “नहीं।”

     

    विराज धीरे-धीरे आरव के करीब आया।

     

    “तुम्हें अपने बचपन की कुछ बातें याद हैं?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    “एक लाल रंग का कमरा?”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “एक महिला…”

     

    उसने अचानक अपना सिर पकड़ लिया।

     

    कुछ धुंधली तस्वीरें उसके दिमाग में घूमने लगीं।

     

    एक छोटा बच्चा…

     

    गोद में बैठी माधवी…

     

    एक लाल फाइल…

     

    और एक आवाज—

     

    “इसे कभी किसी को मत देना।”

     

    आरव ने आंखें खोल दीं।

     

    आरोही तुरंत उसके पास आई।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने माथा पकड़ रखा था।

     

    “मुझे कुछ याद आया।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था।”

     

    आरव ने धीरे-धीरे कहा,

     

    “मैं बहुत छोटा था।”

     

    “मां मेरे कमरे में आई थीं।”

     

    “उनके हाथ में एक फाइल थी।”

     

    “उन्होंने वो फाइल…”

     

    वह रुक गया।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “कहां रखी थी?”

     

    आरव ने आंखें बंद कीं।

     

    “मेरे कमरे में।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “कहां?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    तभी आरोही ने पूछा,

     

    “क्या तुम्हें अपने कमरे की कोई और चीज याद है?”

     

    आरव ने कुछ पल सोचा।

     

    “एक लकड़ी का घोड़ा।”

     

    आरोही चौंकी।

     

    “लकड़ी का घोड़ा?”

     

    “हां।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “क्या उसके अंदर कुछ छिपाया गया था?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद।”

     

    विराज की आंखें चमक उठीं।

     

    “अब हम सही रास्ते पर हैं।”

     

    अचानक आर्यन ने गोली चलाने की कोशिश की।

     

    रुद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों के बीच हाथापाई शुरू हो गई।

     

    विराज पीछे हट गया।

     

    “आर्यन!”

     

    आर्यन चिल्लाया,

     

    “लाल फाइल तुम्हें नहीं मिलेगी!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं तुमसे डरता हूं?”

     

    “तुम मेरे बिना कुछ नहीं हो।”

     

    “गलत।”

     

    विराज ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तुम मेरे रास्ते का सिर्फ पहला पत्थर थे।”

     

    आर्यन का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने कहा—

     

    “सम्राट की गद्दी अब मेरी है।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “तो तुम दोनों अलग हो?”

     

    विराज हंसा।

     

    “हम कभी एक नहीं थे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर तुम इतने साल साथ क्यों रहे?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि दुश्मन को हराने के लिए पहले उसके सबसे करीब जाना पड़ता है।”

     

    रुद्र ने अचानक कहा,

     

    “विराज, तुम्हें लाल फाइल नहीं मिलेगी।”

     

    विराज ने उसे देखा।

     

    “क्यों?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि शेखर ने उसे बहुत पहले ही नष्ट कर दिया था।”

     

    सब चौंक गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लाल फाइल अब कागजों का बंडल नहीं है।”

     

    “फिर?”

     

    “उसमें जो जानकारी थी, वो दूसरी जगह सुरक्षित है।”

     

    विराज ने गुस्से में पूछा,

     

    “कहां?”

     

    रुद्र ने आरव की तरफ देखा।

     

    “उसके पास।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे पास?”

     

    रुद्र ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हें बचपन में जो यादें मिटा दी गईं… उन्हीं में लाल फाइल का पूरा सच छिपा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “यादें कैसे मिटाई गईं?”

     

    डॉक्टर ने धीमे से कहा,

     

    “दवाइयों से।”

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें सब याद रहता तो तुम आठ साल की उम्र में ही मार दिए जाते।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “और मुझे?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “तुम्हारी यादें भी मिटाई गई थीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम दोनों ने कुछ ऐसा देखा था जो किसी बच्चे को नहीं देखना चाहिए था।”

     

    अमन ने बेचैनी से पूछा,

     

    “क्या?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “तुम दोनों ने सिया की हत्या होते देखी थी।”

     

    अमन जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “मैं…”

     

    उसकी आंखों के सामने अचानक एक दृश्य चमका।

     

    सिया जमीन पर गिरी हुई थी।

     

    एक आदमी उसके सामने खड़ा था।

     

    और दो छोटे बच्चे एक कोने में छिपे हुए थे।

     

    एक बच्चा रो रहा था।

     

    दूसरा उसका हाथ पकड़े हुए था।

     

    अमन ने आंखें खोल दीं।

     

    “मैंने देखा था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अमन ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “मां को गोली मारने वाला आदमी… आर्यन नहीं था।”

     

    सब चौंक गए।

     

    आर्यन भी स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कमरे में थे।”

     

    आर्यन का चेहरा बदल गया।

     

    “लेकिन गोली किसी और ने चलाई थी।”

     

    विराज अचानक शांत हो गया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “विराज…”

     

    विराज की आंखों में पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “वो आदमी…”

     

    उसने आंखें बंद कीं।

     

    “वो आदमी…”

     

    कुछ सेकंड बाद उसकी नजर सीधे विराज पर जाकर टिक गई।

     

    “तुम थे।”

     

    तहखाने में सन्नाटा छा गया।

     

    विराज ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरव उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “तुमने मेरी मां जैसी सिया को क्यों मारा?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि वो बहुत कुछ जानती थी।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे जन्म का सच।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने मेरी मां को मारा!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन रुद्र ने उसे रोक लिया।

     

    “अमन!”

     

    अमन चीखा,

     

    “मुझे छोड़ो!”

     

    “अभी नहीं।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम मुझे मार सकते हो।”

     

    अमन रुक गया।

     

    “लेकिन उससे तुम्हारी मां वापस नहीं आएगी।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तुम इंसान नहीं हो।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “इंसानियत ने मुझे बहुत पहले छोड़ दिया था।”

     

    आर्यन ने अचानक जमीन से अपनी बंदूक उठा ली।

     

    उसने विराज पर गोली चलाई।

     

    धांय!

     

    विराज एक तरफ झुक गया।

     

    गोली दीवार में लगी।

     

    रुद्र ने आर्यन को जमीन पर गिरा दिया।

     

    आर्यन चिल्लाया,

     

    “तुमने सिया को मारा था!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “लेकिन लाल फाइल में तुम्हारे खिलाफ सबूत है।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तो?”

     

    “इसलिए तो मुझे आरव चाहिए।”

     

    आरव चौंका।

     

    “मुझे?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हारे दिमाग में वो जगह है जहां फाइल छिपी है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हें कभी नहीं बताऊंगा।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें बताना नहीं पड़ेगा।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं तुम्हें याद दिला दूंगा।”

     

    विराज ने हाथ उठाया।

     

    उसके आदमी तुरंत आरोही की तरफ बढ़े।

     

    आरव चिल्लाया—

     

    “उसे हाथ मत लगाना!”

     

    आरोही को दो लोगों ने पकड़ लिया।

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “उसे छोड़ो!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अब तुम समझे?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी कमजोरी।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा था।

     

    “आरोही को छोड़ दो।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लाल फाइल का सच बताओ।”

     

    “मुझे नहीं पता!”

     

    “तो इसे गोली मार दूंगा।”

     

    आरव चिल्लाया,

     

    “नहीं!”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “मेरी चिंता मत करो।”

     

    “आरोही!”

     

    “तुम्हें सच ढूंढना है।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “मुझे तुम पर भरोसा है।”

     

    विराज ने बंदूक आरोही की तरफ कर दी।

     

    तभी…

     

    धांय!

     

    गोली चली।

     

    सबकी सांसें रुक गईं।

     

    आरोही नीचे गिर गई।

     

    आरव चीख पड़ा—

     

    “आरोही!”

     

    वह उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन अगले ही पल सामने खड़ा आदमी गिर पड़ा।

     

    उसके हाथ से बंदूक जमीन पर जा गिरी।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    रुद्र बंदूक पकड़े खड़ा था।

     

    “गोली मैंने चलाई।”

     

    विराज ने गुस्से में रुद्र की तरफ देखा।

     

    “तुम!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “मैंने कहा था… मैं तुम्हारे साथ नहीं हूं।”

     

    रुद्र ने आरोही को उठाया।

     

    “उसे कुछ नहीं हुआ।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    गोली उसके पास खड़े आदमी को लगी थी।

     

    आरोही सुरक्षित थी।

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “मुझे लगा…”

     

    “कुछ नहीं हुआ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “अब यहां से निकलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “और विराज?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उसे मैं संभालूंगा।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं है।”

     

    आरव ने विराज की तरफ देखा।

     

    “ये मेरी मां, अमन की मां और हमारे परिवार की कहानी है।”

     

    अमन उसके पास आकर खड़ा हो गया।

     

    “इस बार हम साथ लड़ेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “भाई?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “भाई।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    लेकिन तभी…

     

    तहखाने की छत से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    दीवार का एक हिस्सा टूटकर गिरा।

     

    धूल के बीच एक छोटा लोहे का बॉक्स दिखाई दिया।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    बॉक्स पर वही निशान था—

     

    A-17

     

    अमन ने कहा,

     

    “ये वही है।”

     

    आरव ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुरानी फोटो थी।

     

    एक छोटी चाबी।

     

    और एक कागज।

     

    आरव ने कागज खोला।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो समझो कि तुम्हारा असली पिता अभी जिंदा है।”

     

    आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्या लिखा है?”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “मेरा असली पिता…”

     

    उसने कागज नीचे कर दिया।

     

    और तभी पीछे से एक आवाज आई—

     

    “हां, आरव… तुम्हारा असली पिता जिंदा है।”

     

    सबने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजे पर…

     

    शेखर खड़े थे।

     

    लेकिन उनके हाथ में बंदूक थी।

     

    और उनकी बंदूक का निशाना…

     

    आरव पर था।

     

    जारी रहेगा…

  • खंडहर घर का रहस्य

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    खंडहर घर का रहस्य

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटा-सा गाँव था—रामपुर। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना खंडहर घर था, जिसे लोग “काली हवेली” कहते थे। हवेली कभी बहुत सुंदर हुआ करती थी, लेकिन कई सालों से बंद पड़ी थी। उसकी दीवारों पर बेलें चढ़ चुकी थीं, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और लकड़ी का बड़ा दरवाजा हमेशा आधा खुला रहता था।

     

    गाँव के लोग उस घर के पास से गुजरने से भी डरते थे।

     

    कहा जाता था कि कई साल पहले उस हवेली में रघुवीर नाम का एक अमीर आदमी रहता था। उसकी पत्नी और एक छोटी बेटी थी। एक रात अचानक वह परिवार गाँव छोड़कर चला गया। उसके बाद वे कभी वापस नहीं आए।

     

    लोगों ने तरह-तरह की बातें बनानी शुरू कर दीं।

     

    कोई कहता, “उस घर में रात को किसी के रोने की आवाज आती है।”

     

    कोई कहता, “खिड़की में एक औरत का साया दिखाई देता है।”

     

    लेकिन इन बातों की सच्चाई किसी को पता नहीं थी।

     

    उसी गाँव में 20 साल का अमन रहता था। वह इन डरावनी बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक शाम उसका दोस्त रोहित बोला, “अमन, तू सच में उस हवेली में जाने की सोच रहा है?”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “हाँ। आखिर देखूँ तो सही कि वहाँ ऐसा क्या है जिससे पूरा गाँव डरता है।”

     

    रोहित ने उसे रोकते हुए कहा, “पागल मत बन। रात में वहाँ मत जाना।”

     

    अमन ने मजाक में कहा, “अगर भूत मिला तो उसे भी नमस्ते कर दूँगा।”

     

    रात करीब दस बजे अमन हाथ में टॉर्च लेकर हवेली की ओर निकल पड़ा।

     

    हवा तेज थी। रास्ते में पेड़ों की शाखाएँ हिल रही थीं।

     

    हवेली के पास पहुँचते ही अमन के कदम थोड़े धीमे हो गए।

     

    दरवाजा हवा से धीरे-धीरे हिल रहा था।

     

    चर्ररर…

     

    अमन ने दरवाजा धक्का देकर खोला।

     

    अंदर बहुत अंधेरा था।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। फर्श पर धूल जमी थी। एक कोने में टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी।

     

    अमन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    अमन चौंक गया।

     

    उसने टॉर्च ऊपर की तरफ की।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह सीढ़ियों के पास पहुँचा।

     

    तभी उसे लगा जैसे किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “बचाओ…”

     

    अमन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने सोचा शायद हवा की आवाज होगी।

     

    लेकिन फिर वही आवाज आई—

     

    “बचाओ…”

     

    इस बार वह साफ सुनाई दी।

     

    अमन ने आवाज की दिशा में टॉर्च घुमाई।

     

    एक पुराने कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला था।

     

    वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।

     

    दरवाजा खोलते ही उसे एक पुरानी अलमारी दिखाई दी।

     

    कमरे में एक लकड़ी की मेज भी थी।

     

    मेज पर धूल के बीच एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    अमन ने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कोई यह डायरी पढ़ रहा है, तो शायद मेरा सच अब सामने आ जाएगा।”

     

    अमन ध्यान से पढ़ने लगा।

     

    डायरी रघुवीर की थी।

     

    उसमें लिखा था कि वह बहुत साल पहले अपनी पत्नी और बेटी के साथ इस घर में रहता था। एक दिन उसे पता चला कि गाँव का एक प्रभावशाली आदमी उसकी जमीन हड़पना चाहता है।

     

    रघुवीर ने जमीन देने से मना कर दिया।

     

    उसके बाद उसे लगातार धमकियाँ मिलने लगीं।

     

    एक रात रघुवीर ने डायरी में लिखा—

     

    “मुझे डर है कि मेरे परिवार के साथ कुछ गलत हो सकता है। अगर मेरे साथ कुछ हुआ तो यह डायरी सच बताएगी।”

     

    अमन का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    वह आगे पढ़ने लगा।

     

    अचानक डायरी का एक पन्ना गायब था।

     

    अमन ने अलमारी खोलकर देखी।

     

    अंदर कुछ पुराने कागज पड़े थे।

     

    उन्हीं कागजों के बीच उसे एक छोटी-सी चिट्ठी मिली।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “हम घर छोड़कर नहीं गए थे। हमें जाने के लिए मजबूर किया गया था।”

     

    अमन को समझ आया कि गाँव में जो कहानी सालों से सुनाई जा रही थी, वह शायद झूठ थी।

     

    तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने टॉर्च बंद कर दी।

     

    कदमों की आवाज धीरे-धीरे पास आने लगी।

     

    दरवाजा अपने आप थोड़ा खुला।

     

    अमन डर गया।

     

    दरवाजे पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    अमन ने पूछा, “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा, “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

     

    “मुझे इस घर का सच जानना है।”

     

    बूढ़ा कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “सच जानना चाहते हो तो मेरे साथ चलो।”

     

    वह अमन को हवेली के पीछे बने एक छोटे कमरे में ले गया।

     

    वहाँ एक पुराना संदूक रखा था।

     

    बूढ़े ने संदूक खोला।

     

    उसमें कई पुराने कागज और तस्वीरें थीं।

     

    बूढ़े ने कहा, “मैं रघुवीर का छोटा भाई हूँ।”

     

    अमन हैरान रह गया।

     

    “तो रघुवीर जी कहाँ गए?”

     

    बूढ़े ने गहरी सांस ली।

     

    “वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ गाँव छोड़कर दूसरे शहर चले गए थे। उन्हें डर था कि उनकी जान को खतरा है। लेकिन उन्होंने कभी इस घर को बेचने की कोशिश नहीं की।”

     

    “फिर लोग क्यों कहते हैं कि उनके परिवार के साथ कुछ बुरा हुआ?”

     

    बूढ़े ने कहा, “क्योंकि असली बात किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की।”

     

    अमन ने पूछा, “और यह रोने की आवाज?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “वह कोई भूत नहीं है।”

     

    उसने हवेली की पिछली दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “बारिश के दिनों में दीवार के अंदर लगी पुरानी पाइप में हवा फंसती है। उससे आवाज निकलती है। कभी-कभी वह किसी के रोने जैसी लगती है।”

     

    अमन को विश्वास नहीं हुआ।

     

    लेकिन बूढ़े ने उसे वह जगह दिखाई।

     

    वहाँ सच में एक पुरानी पाइप थी, जो हवा चलने पर अजीब आवाज कर रही थी।

     

    अमन ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल अभी भी था।

     

    “फिर इस हवेली को खंडहर क्यों छोड़ दिया गया?”

     

    बूढ़े ने कहा, “क्योंकि रघुवीर की बेटी ने कभी वापस आकर यहाँ रहने से मना कर दिया। उसे इस घर से जुड़ी यादें डराती थीं। धीरे-धीरे घर टूटता गया और लोगों ने उसमें भूत की कहानी जोड़ दी।”

     

    अमन ने डायरी बंद की।

     

    उसे लगा कि उसने केवल एक खंडहर घर का रहस्य नहीं खोजा, बल्कि एक परिवार का दबा हुआ सच भी सामने ला दिया था।

     

    अगले दिन उसने गाँव के लोगों को सारी बात बताई।

     

    पहले किसी ने विश्वास नहीं किया।

     

    लेकिन जब उसने रघुवीर की डायरी और पुराने कागज सबके सामने रखे, तो लोगों को अपनी गलती समझ आई।

     

    गाँव के बुजुर्गों ने कहा, “हमने बिना सच जाने उस घर को भूतों का घर बना दिया।”

     

    अमन ने कहा, “कई बार डर उस चीज से नहीं होता जो सच में मौजूद है। डर उन कहानियों से पैदा होता है जिन्हें हम बिना जाने सच मान लेते हैं।”

     

    कुछ दिनों बाद गाँव वालों ने मिलकर उस पुराने घर की सफाई शुरू कर दी।

     

    घर पूरी तरह ठीक तो नहीं हो सका, लेकिन उसकी खिड़कियाँ ठीक कर दी गईं और बाहर का आँगन साफ कर दिया गया।

     

    हवेली अब भी पुरानी थी, मगर उसमें डर नहीं था।

     

    अमन जब आखिरी बार वहाँ गया तो उसने वही कमरा देखा जहाँ उसे डायरी मिली थी।

     

    मेज पर उसने एक छोटा-सा कागज रखा।

     

    उस पर लिखा—

     

    “हर खंडहर डरावना नहीं होता। कुछ खंडहर सिर्फ अपने अंदर छिपी पुरानी कहानी सुनाने का इंतजार करते हैं।”

     

    अमन बाहर आया।

     

    सूरज ढल रहा था।

     

    हवा में पेड़ों की पत्तियाँ हिल रही थीं।

     

    हवेली अब भी खड़ी थी।

     

    लेकिन आज गाँव के लोगों की नजर में वह भूतों का घर नहीं थी।

     

    वह एक ऐसी जगह बन चुकी थी, जिसने पूरे गाँव को एक बात सिखा दी थी—

     

    डर को सच मान लेने से पहले सच को जानना जरूरी है।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 32

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 32

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 32 : तहखाने में मां की आवाज

     

    “अमन…”

     

    तहखाने के अंधेरे से आई उस आवाज ने अमन के पैरों तले जमीन खिसका दी।

     

    वह सीढ़ियों के सामने खड़ा रह गया।

     

    उसकी आंखों में आंसू भर आए।

     

    “मां…?”

     

    आरव ने अमन के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “अमन, हो सकता है ये कोई रिकॉर्डिंग हो।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं…”

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “क्योंकि मेरी मां मुझे इसी तरह बुलाती थी।”

     

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    अस्पताल के गलियारे में धुआं तेजी से भर रहा था।

     

    “हमें जल्दी करना होगा।”

     

    बूढ़े डॉक्टर ने कहा,

     

    “नीचे चलो। ऊपर ज्यादा देर रुकना सुरक्षित नहीं है।”

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “आप भी हमारे साथ चलिए।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “मैं इतने साल इसी दिन का इंतजार कर रहा था।”

     

    चारों लोग अंधेरी सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

    सीढ़ियां बहुत पुरानी थीं।

     

    हर कदम के साथ नीचे से ठंडी हवा ऊपर आ रही थी।

     

    अमन सबसे आगे था।

     

    उसकी आंखें अंधेरे में किसी चीज को खोज रही थीं।

     

    “मां…”

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल पास से आई।

     

    अमन दौड़ने लगा।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको!”

     

    “मुझे मेरी मां के पास जाना है।”

     

    “पहले सोचेंगे।”

     

    “मैंने पच्चीस साल इंतजार किया है!”

     

    अमन ने हाथ छुड़ा लिया।

     

    “अब अगर वो सच में मेरी मां हैं तो मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    आरोही भी साथ थी।

     

    तहखाने के आखिर में एक लोहे का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर लिखा था—

     

    ROOM 00

     

    अमन दरवाजे के सामने जाकर रुक गया।

     

    “ये कमरा…”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “इसी कमरे में सिया को रखा गया था।”

     

    अमन की सांसें तेज हो गईं।

     

    “लेकिन उसकी मौत तो…”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “वही तो सबसे बड़ा झूठ था।”

     

    डॉक्टर ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के अंदर एक पुराना बेड था।

     

    एक टेबल।

     

    कुछ दवाइयां।

     

    और दीवार पर लगी एक बड़ी तस्वीर।

     

    तस्वीर में सिया थी।

     

    अमन धीरे-धीरे तस्वीर के पास गया।

     

    “मां…”

     

    उसने तस्वीर को छुआ।

     

    अचानक उसके पीछे लगी दीवार से हल्की आवाज आई।

     

    टिक… टिक…

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये कैसी आवाज है?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “ये रिकॉर्डिंग सिस्टम है।”

     

    अमन ने तुरंत पूछा,

     

    “कहां?”

     

    डॉक्टर ने दीवार के एक हिस्से को दबाया।

     

    दीवार खुल गई।

     

    अंदर एक पुराना रिकॉर्डर रखा था।

     

    डॉक्टर ने उसे चालू किया।

     

    कुछ सेकंड तक शोर आया।

     

    फिर…

     

    सिया की आवाज सुनाई दी।

     

    “अगर ये रिकॉर्डिंग अमन तक पहुंची है, तो शायद मैं अब इस दुनिया में नहीं हूं।”

     

    अमन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    सिया की आवाज आगे आई—

     

    “अमन, तुम्हें मेरी मौत की बहुत सारी कहानियां सुनाई जाएंगी।”

     

    “कोई कहेगा कि तुम्हारे पिता ने मुझे मारा।”

     

    “कोई कहेगा कि शेखर जिम्मेदार था।”

     

    “कोई कहेगा कि आरव के परिवार की वजह से मैं मरी।”

     

    “लेकिन तुम किसी की बात पर विश्वास मत करना।”

     

    अमन ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “मां…”

     

    रिकॉर्डिंग चलती रही।

     

    “सच सिर्फ एक है।”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद सिया बोली—

     

    “मेरी मौत के पीछे एक ऐसा इंसान है, जिसे मैंने अपना भाई समझा।”

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “कौन?”

     

    रिकॉर्डिंग में सिया ने नाम लेने की कोशिश की।

     

    “वो…”

     

    फिर अचानक रिकॉर्डिंग में तेज आवाज आई।

     

    जैसे कोई दरवाजा तोड़कर अंदर आया हो।

     

    सिया चीखी—

     

    “तुम यहां कैसे आए?”

     

    फिर एक पुरुष की आवाज सुनाई दी।

     

    “तुम बहुत ज्यादा जान चुकी हो, सिया।”

     

    अमन ने रिकॉर्डर को कसकर पकड़ लिया।

     

    “ये आवाज…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसकी है?”

     

    अमन ने सिर उठाया।

     

    उसके चेहरे पर गुस्सा था।

     

    “मैंने ये आवाज पहले सुनी है।”

     

    “कहां?”

     

    “सम्राट की आवाज में।”

     

    रिकॉर्डिंग में पुरुष की आवाज फिर आई—

     

    “लाल फाइल कहां है?”

     

    सिया ने जवाब दिया,

     

    “तुम्हें कभी नहीं मिलेगी।”

     

    “तो तुम्हारे बच्चे मरेंगे।”

     

    “मेरे बच्चे?”

     

    सिया घबरा गई।

     

    “तुम्हें पता है?”

     

    “मुझे सब पता है।”

     

    “अमन को हाथ मत लगाना!”

     

    “और दूसरा बच्चा?”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर सिया की आवाज कांप गई।

     

    “आरव को कुछ मत करना।”

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    सिया आगे बोली—

     

    “वो सिर्फ एक बच्चा है।”

     

    पुरुष ने कहा,

     

    “दोनों बच्चे मेरे रास्ते का सबसे बड़ा खतरा हैं।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल रहे थे।

     

    “मां ने मुझे बचाने के लिए…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हम दोनों को।”

     

    तभी रिकॉर्डिंग में सिया की चीख सुनाई दी।

     

    और रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

     

    अमन ने रिकॉर्डर जमीन पर रख दिया।

     

    “तो मेरी मां ने हम दोनों को बचाने की कोशिश की थी।”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन वो आदमी कौन था?”

     

    डॉक्टर चुप रहे।

     

    आरव ने कहा,

     

    “आप जानते हैं।”

     

    डॉक्टर ने नजरें झुका लीं।

     

    “हां।”

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “आर्यन।”

     

    अमन चौंका।

     

    “सम्राट?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन रुद्र ने कहा था कि सम्राट का असली नाम आर्यन है।”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “रुद्र ने तुम्हें आधा सच बताया।”

     

    “और पूरा सच?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “आर्यन सिर्फ सम्राट का नाम नहीं था।”

     

    “तो?”

     

    “वो शेखर का छोटा भाई था।”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “क्या?”

     

    डॉक्टर ने बताया,

     

    “शेखर और आर्यन दो भाई थे।”

     

    “आर्यन हमेशा से अपने बड़े भाई से ईर्ष्या करता था।”

     

    “शेखर के पास परिवार था, इज्जत थी और व्यापार था।”

     

    “आर्यन के पास सिर्फ लालच था।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “और सिया?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “सिया आर्यन को अपना भाई मानती थी।”

     

    “लेकिन आर्यन ने ही उसे धोखा दिया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर पापा का नाम उस फाइल में क्यों था?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “क्योंकि अस्पताल के रिकॉर्ड आर्यन ने शेखर के नाम पर बनवाए थे।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “तो पापा निर्दोष हैं?”

     

    डॉक्टर ने तुरंत कहा,

     

    “इतना आसान नहीं है।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि शेखर को सब पता था।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा,

     

    “क्या पता था?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “कि आर्यन अस्पताल में क्या करने वाला है।”

     

    “फिर उन्होंने रोका क्यों नहीं?”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि शेखर उस वक्त आर्यन के खिलाफ सबूत जुटा रहे थे।”

     

    अमन चिल्लाया,

     

    “लेकिन मेरी मां मर रही थी!”

     

    “शेखर ने उसे बचाने की कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “वो देर से पहुंचे।”

     

    अमन की आंखें लाल हो गईं।

     

    “देर से?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “क्योंकि उन्हें रास्ते में रोक लिया गया था।”

     

    “किसने?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “विराज ने।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तो विराज भी इसमें था?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “विराज ने शेखर को रोका?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसे लाल फाइल चाहिए थी।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मतलब विराज और आर्यन दोनों लाल फाइल के पीछे थे।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन एक और बात है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “लाल फाइल में सिर्फ विराज और आर्यन के अपराध नहीं थे।”

     

    “तो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उसमें शेखर का भी एक राज था।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “कौन सा राज?”

     

    डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक ऊपर से जोरदार धमाका हुआ।

     

    पूरा तहखाना हिल गया।

     

    छत से धूल गिरने लगी।

     

    आरोही चिल्लाई,

     

    “हमें यहां से निकलना होगा!”

     

    ऊपर से धुआं नीचे आने लगा।

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “अस्पताल में आग तेजी से फैल रही है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “दूसरा रास्ता?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “एक रास्ता है।”

     

    उन्होंने कमरे के पीछे लगी दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “वहां से बाहर निकल सकते हैं।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “और आप?”

     

    डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं भी चलूंगा।”

     

    वे सभी दीवार के पीछे बने रास्ते से आगे बढ़ने लगे।

     

    कुछ ही कदम चले थे कि पीछे से आवाज आई—

     

    “इतनी जल्दी जा रहे हो?”

     

    सब रुक गए।

     

    अंधेरे में किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    टॉर्च की रोशनी सामने गई।

     

    एक आदमी धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    काले कपड़े।

     

    हाथ में बंदूक।

     

    चेहरे पर मुस्कान।

     

    अमन ने उसे देखते ही कहा—

     

    “आर्यन!”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “बहुत अच्छे, बेटा।”

     

    अमन का चेहरा गुस्से से भर गया।

     

    “मेरी मां को तुमने मारा।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां ने खुद अपनी मौत चुनी थी।”

     

    अमन उसकी तरफ बढ़ा।

     

    आरव ने रोक लिया।

     

    “अमन!”

     

    आर्यन हंसा।

     

    “तुम दोनों बिल्कुल अपनी मां जैसे हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मां-पापा कहां हैं?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तुम्हारे माता-पिता सुरक्षित हैं।”

     

    “उन्हें छोड़ दो।”

     

    “छोड़ दूंगा।”

     

    “कब?”

     

    “जब मुझे लाल फाइल मिल जाएगी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं है।”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तो?”

     

    “क्योंकि लाल फाइल तुम्हारे पास कभी थी ही नहीं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “फिर?”

     

    आर्यन ने कहा—

     

    “लाल फाइल तुम्हारी मां के पास है।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “मां?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “लेकिन मां को तो…”

     

    “माधवी ने उसे पच्चीस साल से छुपा रखा है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “झूठ!”

     

    आर्यन ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में माधवी थीं।

     

    उनके हाथ में लाल फाइल थी।

     

    आरव ने तस्वीर देखते ही कहा—

     

    “ये कब की है?”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे जन्म की रात।”

     

    आरोही ने तस्वीर गौर से देखी।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “तस्वीर के पीछे कुछ लिखा है।”

     

    आरव ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे सिर्फ एक लाइन थी—

     

    “जिसे बचाने के लिए झूठ बोला, उसी के हाथों सच छिपाया।”

     

    आरव की समझ में कुछ नहीं आया।

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “अब तुम समझ रहे होगे कि तुम्हारी मां ने तुमसे इतना कुछ क्यों छुपाया।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम मेरी मां को बदनाम कर रहे हो।”

     

    आर्यन हंसा।

     

    “मैं नहीं।”

     

    उसने अपनी जेब से फोन निकाला।

     

    स्क्रीन पर लाइव वीडियो चल रहा था।

     

    माधवी और शेखर एक कमरे में बंधे हुए थे।

     

    माधवी रो रही थीं।

     

    फिर आर्यन ने कैमरा उनकी तरफ किया।

     

    “माधवी।”

     

    माधवी ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    उनकी आंखें आरव को देखते ही भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    आरव चिल्लाया,

     

    “मां!”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा—

     

    “बेटा, आर्यन की बात मत मानना!”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तो फिर तुम ही बता दो।”

     

    माधवी चुप हो गईं।

     

    आरव ने कहा,

     

    “मां, लाल फाइल कहां है?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वह कुछ कहने ही वाली थीं कि…

     

    पीछे से शेखर ने जोर से कहा—

     

    “माधवी! नहीं!”

     

    माधवी ने शेखर की तरफ देखा।

     

    फिर आरव की तरफ।

     

    और आखिरकार बोलीं—

     

    “आरव… लाल फाइल मेरे पास नहीं है।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तो किसके पास है?”

     

    माधवी ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “तुम्हारे पास।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “मेरे?”

     

    माधवी बोलीं—

     

    “तुम्हारे जन्म के समय मैंने वो फाइल तुम्हारे साथ ही छुपा दी थी।”

     

    आरव ने अपनी तरफ देखा।

     

    “लेकिन मेरे पास तो कुछ नहीं।”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास है…”

     

    वह रो पड़ीं।

     

    “बस तुम्हें पता नहीं कि वो कहां है।”

     

    आर्यन ने कैमरा बंद कर दिया।

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखकर कहा—

     

    “अब ढूंढो, आरव… क्योंकि अगर तुम्हें लाल फाइल नहीं मिली, तो अगली बार तुम्हारी मां जिंदा नहीं रहेगी।”

     

    आर्यन ने बंदूक उठाई।

     

    और तभी…

     

    पीछे से एक गोली चली।

     

    धांय!

     

    आर्यन के हाथ से बंदूक गिर गई।

     

    सबने पीछे मुड़कर देखा।

     

    अंधेरे में एक आदमी खड़ा था।

     

    हाथ में बंदूक।

     

    चेहरे पर खून के निशान।

     

    अमन ने पहचानते ही कहा—

     

    “रुद्र!”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “आरव, अमन… मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    रुद्र ने गंभीर आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मैं अकेला नहीं आया हूं।”

     

    अंधेरे में उसके पीछे कई हथियारबंद लोग दिखाई दिए।

     

    और उनमें सबसे आगे खड़ा था…

     

    विराज।

     

    जारी रहेगा…

  • महादेव ओर भोला भक्त

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    महादेव और उनका भोला भक्त

     

    हिमालय की पहाड़ियों से दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगाँव। गाँव बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन वहाँ के लोग भगवान शिव के बड़े भक्त थे। गाँव के बीचों-बीच एक बहुत पुराना शिव मंदिर था। मंदिर की दीवारें पुरानी थीं, छत पर जगह-जगह घास उग आई थी, लेकिन शिवलिंग के सामने जलता दीपक कभी बुझता नहीं था।

     

    उसी गाँव में भोला नाम का एक गरीब युवक रहता था। उसका नाम भले ही भोला था, लेकिन उसका दिल भी बिल्कुल भोला था। वह किसी के साथ बुरा नहीं करता था और भगवान शिव को अपना सबसे बड़ा सहारा मानता था।

     

    भोला के पास धन नहीं था। उसके पास खेती के लिए थोड़ी-सी जमीन थी, जिस पर वह मेहनत करके अपना और अपनी बूढ़ी माँ का पेट पालता था।

     

    हर सुबह वह सूरज निकलने से पहले उठता, नदी से पानी भरकर लाता और शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाता।

     

    मंदिर के पुजारी अक्सर कहते, “भोला, तुम रोज इतनी सुबह क्यों आते हो? कभी देर से भी आ जाया करो।”

     

    भोला हंसकर कहता, “पंडित जी, महादेव के पास जाने में देर कैसी?”

     

    पुजारी मुस्कुरा देते।

     

    भोला की एक खास आदत थी। वह भगवान शिव से कभी अपने लिए धन या बड़ा घर नहीं मांगता था।

     

    वह हमेशा कहता—

     

    “महादेव, मेरी माँ को स्वस्थ रखना। मेरे गाँव के किसी इंसान को भूखा मत रखना। बाकी जो है, मैं संभाल लूँगा।”

     

    एक साल गाँव में बारिश बहुत कम हुई। खेत सूखने लगे। तालाब में पानी कम हो गया। किसानों के चेहरों पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।

     

    भोला की फसल भी खराब होने लगी।

     

    उसकी माँ ने कहा, “बेटा, इस बार फसल नहीं हुई तो घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।”

     

    भोला ने माँ को ढांढस देते हुए कहा, “चिंता मत करो माँ। भोलेनाथ सब ठीक करेंगे।”

     

    लेकिन इस बार परेशानी बढ़ती गई।

     

    गाँव के कई घरों में अनाज खत्म होने लगा।

     

    एक दिन गाँव के मुखिया ने घोषणा की, “जिसके पास अनाज बचा है, वह जरूरतमंदों की मदद करे।”

     

    भोला के घर में भी बहुत कम अनाज था। उसकी माँ ने चुपचाप अपना हिस्सा बचाकर पड़ोस की एक विधवा महिला को दे दिया।

     

    भोला ने पूछा, “माँ, आपने अपना खाना क्यों दे दिया?”

     

    माँ बोलीं, “बेटा, भूखे को खाना देना महादेव की सेवा है।”

     

    भोला मुस्कुरा दिया।

     

    अगले दिन उसने भी अपने घर में बचा थोड़ा-सा अनाज गाँव के गरीब परिवारों में बाँट दिया।

     

    उस रात उसकी माँ ने पूछा, “अब हमारे लिए क्या बचा?”

     

    भोला हँसकर बोला, “महादेव हैं ना।”

     

    माँ ने उसे देखा।

     

    “बेटा, भगवान पर भरोसा अच्छी बात है, लेकिन मेहनत भी करनी चाहिए।”

     

    भोला ने सिर हिलाया।

     

    अगले दिन वह गाँव के सूखे तालाब के पास गया। उसने देखा कि तालाब पूरी तरह मिट्टी से भर गया था।

     

    उसने सोचा, “अगर बारिश हुई तो पानी कहाँ जमा होगा?”

     

    उसने फावड़ा उठाया और अकेले तालाब की सफाई शुरू कर दी।

     

    लोग उसे देखकर हँसने लगे।

     

    एक आदमी बोला, “भोला, तू अकेला पूरा तालाब साफ करेगा?”

     

    भोला हँसकर बोला, “मैं अकेला शुरू तो कर सकता हूँ।”

     

    वह सुबह से शाम तक काम करता रहा।

     

    दूसरे दिन दो बच्चे उसके साथ आ गए।

     

    तीसरे दिन तीन किसान।

     

    धीरे-धीरे पूरा गाँव उसके साथ जुड़ गया।

     

    कुछ दिनों में तालाब काफी गहरा और साफ हो गया।

     

    लेकिन आसमान अब भी साफ था।

     

    बारिश का कोई नामोनिशान नहीं था।

     

    एक शाम भोला मंदिर पहुँचा।

     

    उसने शिवलिंग के सामने बैठकर कहा, “महादेव, मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। अब जो ठीक समझो, वही करना।”

     

    उस रात भोला को एक सपना आया।

     

    उसने देखा कि एक साधु उसके सामने खड़े हैं।

     

    साधु ने कहा, “भक्त, तुम भगवान से क्या मांगते हो?”

     

    भोला बोला, “कुछ नहीं।”

     

    साधु ने पूछा, “कुछ भी नहीं?”

     

    “बस इतना कि मेरे गाँव के लोग सुरक्षित रहें।”

     

    साधु मुस्कुराए।

     

    “अगर तुम्हें धन मिल जाए तो?”

     

    भोला बोला, “जरूरतमंदों में बाँट दूँगा।”

     

    “अगर तुम्हें बहुत बड़ा घर मिल जाए?”

     

    “जिसके पास घर नहीं है, उसे दे दूँगा।”

     

    साधु ने पूछा, “और अगर भगवान स्वयं तुम्हारे सामने आ जाएँ?”

     

    भोला की आँखों में चमक आ गई।

     

    “तो उनके चरणों में बैठकर बस यही कहूँगा कि मुझे हमेशा उनकी सेवा करने लायक बनाए रखें।”

     

    साधु मुस्कुराए और धीरे-धीरे गायब हो गए।

     

    सुबह भोला की आँख खुली।

     

    उसे अपना सपना याद था।

     

    वह मंदिर पहुँचा।

     

    जैसे ही उसने मंदिर का दरवाजा खोला, वहाँ उसे एक अजनबी साधु बैठे दिखाई दिए।

     

    भोला ने उन्हें प्रणाम किया।

     

    साधु ने पूछा, “तुम रोज यहाँ आते हो?”

     

    “जी।”

     

    “क्या मांगते हो?”

     

    भोला ने मुस्कुराकर कहा, “कुछ नहीं।”

     

    साधु ने कहा, “तो फिर यहाँ क्यों आते हो?”

     

    भोला बोला, “जिससे प्रेम हो, उसके पास जाने के लिए कोई मांग जरूरी नहीं होती।”

     

    साधु उसकी ओर देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने पूछा, “अगर तुम्हें अपने लिए कुछ मांगने का मौका मिले तो?”

     

    भोला ने कुछ पल सोचा।

     

    “तो मैं माँ की लंबी उम्र मांगूँगा।”

     

    साधु बोले, “अपने लिए कुछ नहीं?”

     

    “मेरी खुशी तो माँ की खुशी में है।”

     

    साधु ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “तुम सच में भोले हो।”

     

    भोला मुस्कुरा दिया।

     

    तभी मंदिर के अंदर तेज प्रकाश फैल गया।

     

    भोला ने आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ क्षण बाद उसने आँखें खोलीं तो साधु वहाँ नहीं थे।

     

    शिवलिंग के सामने एक बेलपत्र रखा था, जबकि मंदिर में उस समय कोई और मौजूद नहीं था।

     

    भोला की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    वह समझ गया कि उसके महादेव ने उसकी परीक्षा ली थी।

     

    उसी समय बाहर आसमान में बादल गरजने लगे।

     

    कुछ ही देर में तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    गाँव के लोग खुशी से घरों से बाहर निकल आए।

     

    बारिश का पानी सीधे उसी साफ किए गए तालाब में भरने लगा।

     

    किसानों के चेहरे पर खुशी लौट आई।

     

    भोला मंदिर के बाहर खड़ा बारिश देख रहा था।

     

    उसकी माँ उसके पास आईं।

     

    “देखा बेटा, महादेव ने सुन ली।”

     

    भोला मुस्कुराया।

     

    “माँ, महादेव ने सिर्फ हमारी प्रार्थना नहीं सुनी। उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि प्रार्थना के साथ कर्म करना जरूरी है।”

     

    कुछ महीनों बाद गाँव की फसल अच्छी हुई।

     

    गाँव में फिर खुशियाँ लौट आईं।

     

    मुखिया ने भोला को सम्मानित करना चाहा, लेकिन उसने मना कर दिया।

     

    उसने कहा, “मैंने कुछ नहीं किया। मैंने तो बस वही किया जो मेरे महादेव मुझे सिखाते हैं।”

     

    पुजारी ने मुस्कुराकर कहा, “यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी है भोला।”

     

    सालों बाद भी देवगाँव में भोला की कहानी सुनाई जाती रही।

     

    लोग कहते थे कि महादेव अपने भक्तों की परीक्षा जरूर लेते हैं, लेकिन सच्चे भक्त की पहचान उसकी मांगों से नहीं, उसके कर्मों से होती है।

     

    भोला ने कभी महादेव से धन नहीं मांगा।

     

    उसने कभी अपने लिए महल नहीं मांगा।

     

    उसने केवल दूसरों की खुशी मांगी।

     

    और शायद इसी वजह से महादेव ने उसे वह दिया जो किसी धन से नहीं खरीदा जा सकता—

     

    अटूट विश्वास।

     

    आज भी देवगाँव के उस पुराने शिव मंदिर में सावन के दिनों में जब घंटियाँ बजती हैं, तो बुजुर्ग बच्चों को भोला की कहानी सुनाते हैं और कहते हैं—

     

    “महादेव को पाने के लिए बड़ा भक्त बनने की जरूरत नहीं। बस मन सच्चा रखो, कर्म अच्छे रखो और किसी जरूरतमंद की मदद करने से कभी पीछे मत हटो। भोलेनाथ अपने भोले भक्त का हाथ कभी नहीं छोड़ते।”

     

    और मंदिर में फिर वही आवाज गूंजती है—

     

    “हर हर महादेव!”

  • सावन का पावन महीना

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सावन का पावन महीना

     

    सावन का महीना शुरू होते ही देवपुर गाँव का माहौल बिल्कुल बदल गया था। चारों तरफ हरियाली दिखाई देने लगी थी। सुबह-सुबह मंदिर की घंटियाँ सुनाई देतीं और गलियों में “हर हर महादेव” की आवाज गूंजती रहती। गाँव के लोग भगवान शिव के मंदिर में जल चढ़ाने के लिए दूर-दूर से आते थे।

     

    इसी गाँव में 19 साल की गौरी अपनी माँ के साथ रहती थी। गौरी भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थी। हर सावन वह सुबह जल्दी उठकर मंदिर जाती और शिवलिंग पर जल चढ़ाती।

     

    उस साल सावन शुरू होते ही गौरी ने अपनी माँ से कहा, “माँ, इस बार मैं पूरे महीने रोज मंदिर जाऊँगी।”

     

    माँ मुस्कुराकर बोलीं, “जा बेटा, लेकिन पूजा के साथ घर के काम और अपनी पढ़ाई भी मत भूलना।”

     

    गौरी हँसकर बोली, “सब संभाल लूँगी माँ।”

     

    गाँव के पुराने शिव मंदिर के बारे में एक मान्यता थी कि सावन में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। मंदिर बहुत पुराना था। लोग कहते थे कि वर्षों पहले एक साधु ने वहाँ तपस्या की थी और तभी से उस स्थान पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी हुई है।

     

    सावन के पहले सोमवार को मंदिर में बहुत भीड़ थी। गौरी भी हाथ में जल का लोटा लेकर लाइन में खड़ी थी।

     

    उसके आगे एक बूढ़ी महिला खड़ी थी। महिला बहुत कमजोर लग रही थी और उसके हाथ में पूजा की छोटी-सी थाली थी।

     

    अचानक भीड़ में किसी ने उसे धक्का दे दिया।

     

    उसकी थाली जमीन पर गिर गई।

     

    गौरी तुरंत झुक गई और सारी चीजें उठाकर थाली में रख दीं।

     

    बूढ़ी महिला ने कहा, “बेटी, भगवान तुम्हारा भला करें।”

     

    गौरी मुस्कुराकर बोली, “अम्मा, इसमें भला करने वाली क्या बात है? आप अकेली हैं, इसलिए आपकी मदद करना मेरा फर्ज है।”

     

    बूढ़ी महिला ने गौरी की तरफ ध्यान से देखा और कहा, “याद रखना बेटी, भगवान को चढ़ाया हुआ जल तभी सार्थक होता है जब किसी प्यासे के लिए दिल में पानी बचा हो।”

     

    गौरी को यह बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उसने उसे मन में रख लिया।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में बारिश बहुत कम होने लगी।

     

    सावन का महीना था, लेकिन बादल आते और बिना बरसे चले जाते। खेतों में पानी की कमी होने लगी। गाँव के किसान परेशान हो गए।

     

    गौरी के पिता भी किसान थे।

     

    एक शाम उन्होंने चिंता में कहा, “अगर कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।”

     

    माँ बोलीं, “भोलेनाथ सब ठीक करेंगे।”

     

    पिता ने कहा, “विश्वास तो है, लेकिन हमें अपनी तरफ से भी कोशिश करनी होगी।”

     

    अगले दिन गाँव के मंदिर में विशेष पूजा रखी गई। सभी लोग भगवान शिव से अच्छी बारिश की प्रार्थना करने लगे।

     

    गौरी भी मंदिर पहुँची।

     

    पूजा के बाद उसने देखा कि मंदिर के बाहर कुछ बच्चे प्यास से परेशान बैठे थे।

     

    गौरी ने तुरंत अपने घर से पानी लाकर बच्चों को पिलाया।

     

    उसकी माँ ने पूछा, “तुम अपना पानी बच्चों को क्यों दे आई?”

     

    गौरी ने कहा, “माँ, भगवान के लिए तो हमने जल चढ़ा दिया। अब अगर सामने कोई प्यासा हो और हम उसे पानी न दें तो हमारी पूजा का क्या मतलब?”

     

    माँ कुछ पल उसे देखती रहीं।

     

    फिर मुस्कुराईं।

     

    “तू सही समझने लगी है बेटी।”

     

    अगले दिन गौरी ने गाँव के कुछ युवाओं को इकट्ठा किया।

     

    उसने कहा, “हम सिर्फ बारिश का इंतजार क्यों करें? गाँव का पुराना तालाब साफ कर लेते हैं। अगर बारिश हुई तो पानी बचा रहेगा।”

     

    कुछ लोगों ने उसका मजाक उड़ाया।

     

    एक आदमी बोला, “तुम बच्चों से गाँव चलेगा?”

     

    गौरी ने शांत होकर कहा, “गाँव किसी एक आदमी से नहीं चलता काका। सब मिलकर काम करें तो मुश्किल भी छोटी हो जाती है।”

     

    शुरुआत में केवल चार लोग उसके साथ आए।

     

    उन्होंने तालाब की सफाई शुरू कर दी।

     

    धीरे-धीरे दूसरे लोग भी जुड़ते गए।

     

    तीन दिन में आधा तालाब साफ हो चुका था।

     

    चौथे दिन सुबह आसमान में काले बादल दिखाई दिए।

     

    गाँव के लोग खुशी से बाहर निकल आए।

     

    लेकिन बारिश नहीं हुई।

     

    शाम तक बादल छंट गए।

     

    कुछ लोग निराश हो गए।

     

    एक किसान बोला, “शायद भगवान हमसे नाराज हैं।”

     

    गौरी ने कहा, “भगवान नाराज हैं या नहीं, यह हम नहीं जानते। लेकिन हमें अपना काम नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    उस रात गौरी मंदिर गई।

     

    वहाँ वही बूढ़ी महिला बैठी थी, जिससे वह सावन के पहले सोमवार को मिली थी।

     

    महिला ने पूछा, “बेटी, परेशान क्यों है?”

     

    गौरी ने कहा, “गाँव में पानी की बहुत जरूरत है। हम कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बारिश नहीं हो रही।”

     

    बूढ़ी महिला मुस्कुराई।

     

    “तुमने अपना काम कर दिया?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर चिंता क्यों?”

     

    गौरी चुप रही।

     

    बूढ़ी महिला ने कहा, “भक्ति का मतलब केवल मांगना नहीं होता। कभी-कभी भगवान हमें किसी की मदद करने का मौका देकर हमारी परीक्षा लेते हैं।”

     

    गौरी को अचानक पहले दिन कही गई उनकी बात याद आई।

     

    “भगवान को चढ़ाया हुआ जल तभी सार्थक होता है जब किसी प्यासे के लिए दिल में पानी बचा हो।”

     

    अगली सुबह गौरी ने गाँव वालों से कहा कि हर घर अपने हिस्से का थोड़ा पानी बचाए और तालाब में पानी जमा करने की व्यवस्था करे।

     

    लोगों ने उसकी बात मान ली।

     

    कुछ ही दिनों में तालाब तैयार हो गया।

     

    और फिर सावन की एक रात अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    बादल जमकर बरसे।

     

    गाँव की गलियाँ पानी से भर गईं।

     

    तालाब पानी से लबालब हो गया।

     

    किसानों के चेहरे पर खुशी लौट आई।

     

    गौरी के पिता ने आसमान की तरफ हाथ जोड़कर कहा, “भोलेनाथ की कृपा हो गई।”

     

    गौरी मुस्कुराई।

     

    “हाँ पिताजी, लेकिन अगर हमने तालाब साफ नहीं किया होता तो इतना पानी भी हमारे काम नहीं आता।”

     

    पिता ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तूने हमें बड़ी बात सिखा दी।”

     

    सावन का आखिरी सोमवार आया।

     

    मंदिर में पहले से भी ज्यादा भीड़ थी।

     

    गौरी शिवलिंग पर जल चढ़ाने पहुँची।

     

    इस बार उसके हाथ में जल का लोटा था, लेकिन उसके मन में एक अलग ही शांति थी।

     

    उसने आँखें बंद करके कहा—

     

    “भोलेनाथ, मुझे धन या बड़ी खुशी नहीं चाहिए। बस इतनी शक्ति देना कि जब कोई दुखी हो तो मैं उसकी मदद कर सकूँ और जब मुश्किल आए तो हार न मानूँ।”

     

    मंदिर के बाहर वही बूढ़ी महिला खड़ी थी।

     

    गौरी ने उसे देखकर मुस्कुराया।

     

    महिला ने कहा, “अब समझी सावन का असली अर्थ?”

     

    गौरी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ अम्मा। सावन सिर्फ भगवान शिव को जल चढ़ाने का महीना नहीं है। यह अपने भीतर करुणा, सेवा और विश्वास जगाने का महीना भी है।”

     

    बूढ़ी महिला मुस्कुराई।

     

    “यही तो शिव भक्ति है।”

     

    गौरी ने उनके पैर छूने चाहे, लेकिन महिला ने उसे रोक दिया।

     

    अगले ही पल गौरी ने देखा कि वहाँ कोई नहीं था।

     

    वह हैरान होकर आसपास देखने लगी।

     

    मंदिर के पुजारी ने पूछा, “किसे ढूंढ रही हो?”

     

    गौरी ने बूढ़ी महिला के बारे में बताया।

     

    पुजारी कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “बेटी, उस उम्र की एक महिला कई साल पहले इसी मंदिर में आया करती थीं। कहते हैं, वह हर सावन जरूरतमंदों को पानी पिलाती थीं। अब तो उन्हें गुजरे बहुत साल हो गए।”

     

    गौरी स्तब्ध रह गई।

     

    उसने मंदिर के शिवलिंग की ओर देखा।

     

    उसके हाथ अपने आप जुड़ गए।

     

    उस दिन उसे लगा कि शायद भगवान हमेशा किसी चमत्कार के रूप में सामने नहीं आते।

     

    कभी वे किसी भूखे के रूप में आते हैं।

     

    कभी किसी प्यासे के रूप में।

     

    कभी किसी बूढ़े की सीख बनकर।

     

    और कभी किसी छोटे-से काम के जरिए हमें सही रास्ता दिखाते हैं।

     

    सावन का महीना समाप्त हो गया, लेकिन देवपुर गाँव में एक नई परंपरा शुरू हो गई।

     

    अब हर सावन गाँव के लोग मंदिर में जल चढ़ाने के साथ-साथ गरीबों के लिए पानी की व्यवस्था करते, तालाब साफ करते और जरूरतमंदों की मदद करते।

     

    गौरी हर साल सबसे आगे रहती।

     

    और जब कोई उससे पूछता कि “सावन इतना पावन क्यों है?”

     

    तो वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “क्योंकि सावन हमें सिर्फ भोलेनाथ के चरणों में झुकना नहीं सिखाता, बल्कि किसी जरूरतमंद के सामने अपना हाथ बढ़ाना भी सिखाता है। भगवान शिव को सच्ची श्रद्धा वही है, जिसमें पूजा के साथ सेवा और विश्वास भी हो।”

     

    और फिर पूरे गाँव में एक साथ आवाज गूंजती—

     

    “हर हर महादेव!”

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 31

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 31

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 31 : पुराने अस्पताल का बंद कमरा

     

    रात के करीब ग्यारह बज चुके थे।

     

    पुराने सिटी अस्पताल की इमारत अंधेरे में किसी डरावने खंडहर जैसी दिखाई दे रही थी। जगह-जगह टूटी खिड़कियां, दीवारों पर उखड़ा हुआ प्लास्टर और चारों तरफ फैली खामोशी उस रात को और भी भयावह बना रही थी।

     

    आरव अस्पताल के मुख्य गेट के सामने खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही फोन था, जिसमें कुछ देर पहले उसके माता-पिता की तस्वीर आई थी।

     

    माधवी और शेखर दोनों कुर्सियों से बंधे हुए थे।

     

    आरव के अंदर गुस्सा उबल रहा था।

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हुई।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां?”

     

    “तुम अंदर अकेले नहीं जाओगे।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “लेकिन उसने साफ कहा है कि मुझे अकेले आना है।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “और तुम उसकी बात मानोगे?”

     

    “अगर मां-पापा की जान खतरे में हो तो हां।”

     

    आरोही ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें अगर कुछ हो गया तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “तुम्हें पता है, जब से तुम मेरी जिंदगी में आई हो… मुझे पहली बार किसी को खोने का डर लगा है।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “तो मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    आरव ने उसके माथे पर हल्का सा हाथ रखा।

     

    “मैं वापस आऊंगा।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    पीछे खड़ा अमन उन्हें देख रहा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    “तुम दोनों को देखकर लगता है कि इस दुनिया में अभी भी कुछ अच्छा बचा है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और तुम?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं भी कोशिश करूंगा कि कुछ अच्छा बचा रहे।”

     

    तीनों धीरे-धीरे अस्पताल के अंदर दाखिल हुए।

     

    रुद्र बाहर ही रुक गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम अंदर नहीं आ रहे?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “मुझे बाहर से निगरानी करनी है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि सम्राट सिर्फ अंदर नहीं है।”

     

    रुद्र ने चारों तरफ देखा।

     

    “उसके लोग पूरे इलाके में हैं।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि मैं उनमें से कई को पहचानता हूं।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “सावधान रहना।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम भी।”

     

    आरव, आरोही और अमन अंदर चले गए।

     

    अंदर जाते ही अमन रुक गया।

     

    उसकी आंखों के सामने जैसे धुंधली-सी तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक महिला…

     

    गोद में बच्चा…

     

    जलता हुआ कमरा…

     

    लोगों की चीखें…

     

    और एक आवाज—

     

    “अमन को लेकर भागो!”

     

    अमन ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    आरव तुरंत उसके पास आया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मुझे… कुछ याद आया।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं यहां पहले भी आया हूं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “लेकिन तुम तो बहुत छोटे थे।”

     

    अमन ने दीवार को छूते हुए कहा,

     

    “कुछ जगहें यादों को संभालकर रखती हैं।”

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “मेरी मां यहीं मरी थी।”

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “इस बार तुम अकेले नहीं हो।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

     

    वे अस्पताल की पहली मंजिल पर पहुंचे।

     

    वहां पुराने मरीजों के रिकॉर्ड वाले कमरे थे।

     

    अमन ने एक दरवाजा देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    RECORD ROOM

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर सैकड़ों पुरानी फाइलें थीं।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमें सिया की फाइल ढूंढनी होगी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “इतनी सारी फाइलों में कैसे?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मुझे तारीख याद है।”

     

    “कौन सी?”

     

    “14 अगस्त।”

     

    आरव ने फाइलें देखना शुरू किया।

     

    कुछ देर बाद आरोही को एक फाइल मिली।

     

    उस पर लिखा था—

     

    Patient: Siya

     

    अमन के हाथ कांपने लगे।

     

    “मां…”

     

    उसने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    स्थिति: गंभीर

     

    दूसरे पन्ने पर—

     

    बच्चा सुरक्षित।

     

    तीसरे पन्ने पर एक लाल मुहर थी—

     

    DEAD

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “ये सब झूठ था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “मेरी मां की मौत की रिपोर्ट।”

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने फाइल का आखिरी पन्ना दिखाया।

     

    उस पर डॉक्टर के हस्ताक्षर थे।

     

    लेकिन उसके नीचे लिखा था—

     

    “मृत्यु की पुष्टि नहीं हुई।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मतलब…”

     

    अमन ने फाइल बंद कर दी।

     

    “मेरी मां शायद उस रात मरी ही नहीं थी।”

    तभी कमरे के पीछे से हल्की आवाज आई।

     

    ठक… ठक…

     

    तीनों चौंक गए।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये आवाज कहां से आई?”

     

    अमन ने दीवार की तरफ देखा।

     

    “वहां।”

     

    आरव ने दीवार पर हाथ मारा।

     

    आवाज अंदर से आ रही थी।

     

    “यहां कोई कमरा है।”

     

    उन्होंने दीवार के पास रखी पुरानी अलमारी हटाई।

     

    पीछे एक छोटा दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर कोई ताला नहीं था।

     

    आरव ने उसे खोला।

     

    अंदर पूरी तरह अंधेरा था।

     

    अमन ने टॉर्च जलाई।

     

    कमरे के बीच में एक पुरानी कुर्सी थी।

     

    और कुर्सी पर…

     

    एक टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    अमन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    उसने रिकॉर्डर उठाया।

     

    उस पर एक कागज चिपका था—

     

    “मेरे बेटे अमन के लिए।”

     

    अमन की सांस रुक गई।

     

    “मां…”

     

    उसने रिकॉर्डर चलाया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर आया।

     

    फिर एक महिला की कांपती आवाज सुनाई दी।

     

    “अमन… अगर तुम कभी ये आवाज सुन रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं तुम्हारे पास नहीं हूं।”

     

    अमन की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    आरव और आरोही भी चुपचाप सुनने लगे।

     

    सिया की आवाज आगे आई—

     

    “मैं चाहती हूं कि तुम नफरत में अपनी जिंदगी बर्बाद मत करना।”

     

    अमन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मां…”

     

    रिकॉर्डिंग में सिया कह रही थी—

     

    “तुम्हें शायद बताया जाएगा कि तुम्हारी मां की मौत के लिए आरव का परिवार जिम्मेदार था।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    अमन ने रिकॉर्डर कसकर पकड़ लिया।

     

    “लेकिन ये सच नहीं है।”

     

    अमन की सांस तेज हो गई।

     

    “तो फिर कौन?”

     

    रिकॉर्डिंग में सिया की आवाज आई—

     

    “जिसने मुझे सबसे ज्यादा धोखा दिया… वो वही था जिस पर मैंने सबसे ज्यादा भरोसा किया।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “कौन?”

     

    सिया आगे बोली—

     

    “उसका नाम है…”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

     

    अमन ने रिकॉर्डर को थपथपाया।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने कहा,

     

    “शायद टेप खराब है।”

     

    अमन ने उसे दोबारा चलाया।

     

    कुछ नहीं हुआ।

     

    तभी कमरे के कोने में एक छोटी लाल बत्ती जल उठी।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “हमें यहां से निकलना चाहिए।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ये कमरा हमें रिकॉर्डिंग सुनाने के लिए नहीं खोला गया था।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    आरोही ने ऊपर लगे कैमरे की तरफ इशारा किया।

     

    “हमें देखने के लिए खोला गया था।”

     

    अचानक कमरे की लाइट जल गई।

     

    दीवार पर लगा स्क्रीन चालू हुआ।

     

    स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।

     

    काला सूट।

     

    चेहरे पर हल्की मुस्कान।

     

    आरव ने कहा,

     

    “सम्राट।”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “आखिर तुम यहां पहुंच ही गए।”

     

    अमन गुस्से में बोला,

     

    “मेरी मां की रिकॉर्डिंग पूरी क्यों नहीं होने दी?”

     

    सम्राट ने कहा,

     

    “क्योंकि कुछ सच समय से पहले सुनना खतरनाक होता है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “सामने आ!”

     

    “जल्द।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मेरे माता-पिता कहां हैं?”

     

    सम्राट ने स्क्रीन पर दूसरी तस्वीर दिखाई।

     

    माधवी और शेखर अभी भी बंधे हुए थे।

     

    लेकिन इस बार उनके पास एक और आदमी खड़ा था।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “रुद्र?”

     

    अमन भी चौंक गया।

     

    सम्राट हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारा रक्षक तुम्हारे साथ है?”

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला और रुद्र को कॉल किया।

     

    फोन नहीं उठा।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “रुद्र फोन नहीं उठा रहा।”

     

    स्क्रीन पर सम्राट बोला—

     

    “क्योंकि रुद्र अब मेरे साथ है।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा,

     

    “झूठ!”

     

    सम्राट मुस्कुराया।

     

    “तो खुद जाकर देख लो।”

     

    आरव, आरोही और अमन तेजी से दूसरी मंजिल की तरफ दौड़े।

     

    वहां एक कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    अंदर कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर खून के निशान थे।

     

    आरोही ने घबराकर कहा,

     

    “आरव…”

     

    आरव नीचे झुका।

     

    उसने खून को छुआ।

     

    “ये ताजा है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “रुद्र का?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “पता नहीं।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “रुद्र का नहीं।”

     

    तीनों पलटे।

     

    दरवाजे पर एक बूढ़ा डॉक्टर खड़ा था।

     

    उसके हाथ में पुरानी फाइल थी।

     

    अमन ने पूछा,

     

    “आप कौन हैं?”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “मैं वही डॉक्टर हूं जिसने तुम्हें जन्मते देखा था।”

     

    अमन की आंखें फैल गईं।

     

    “आप…”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “हमें सच्चाई चाहिए।”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “सच्चाई सुनने के लिए तुम्हें तैयार रहना होगा।”

     

    “मैं तैयार हूं।”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “तुम दोनों के जन्म की रात अस्पताल में आग नहीं लगी थी।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “आग लगाई गई थी।”

     

    “किसने?”

     

    डॉक्टर ने आरव और अमन दोनों को देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “तुम्हारे जन्म से पहले ही तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    डॉक्टर ने जवाब दिया—

     

    “जिसने आदेश दिया था, उसका नाम रिकॉर्ड में है।”

     

    उसने फाइल आरव को दी।

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर कई नाम थे।

     

    लेकिन आखिरी नाम देखकर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उसने फाइल हाथ से गिरा दी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    आरोही ने फाइल उठाई।

     

    उसकी आंखें भी फैल गईं।

     

    क्योंकि उस फाइल में लिखा था—

     

    आदेश देने वाला: शेखर।

     

    अमन ने फाइल छीन ली।

     

    “नहीं!”

     

    डॉक्टर चुपचाप खड़ा रहा।

     

    आरव की आंखों में आंसू थे।

     

    “पापा ऐसा नहीं कर सकते।”

     

    तभी डॉक्टर ने कहा—

     

    “कागज पर नाम शेखर का है।”

     

    “लेकिन असली आदेश…”

     

    वह रुक गया।

     

    “किसका था?”

     

    डॉक्टर ने धीमे से कहा—

     

    “ये जानने के लिए तुम्हें तहखाने में जाना होगा।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “वहां क्या है?”

     

    डॉक्टर ने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “सिया की आखिरी गवाही।”

     

    उसी वक्त ऊपर से जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरी इमारत हिल गई।

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    डॉक्टर चिल्लाया—

     

    “जल्दी करो! सम्राट ने अस्पताल में आग लगा दी है!”

     

    धुआं पूरे गलियारे में फैलने लगा।

     

    अमन ने कहा—

     

    “तहखाना कहां है?”

     

    डॉक्टर ने फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    “यहीं नीचे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन रास्ता?”

     

    डॉक्टर ने फर्श पर एक छिपा हुआ लीवर दबाया।

     

    फर्श का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुलने लगा।

     

    नीचे अंधेरी सीढ़ियां दिखाई दीं।

     

    और उसी समय…

     

    अंधेरे तहखाने से एक महिला की आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    अमन वहीं जम गया।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “ये…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अमन ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “ये मेरी मां की आवाज है।”

     

    जारी रहेगा…