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  • मेरी परछाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मेरी परछाई दिखाई दे रही है

     

    रात के करीब दस बज रहे थे। गाँव की गलियाँ धीरे-धीरे खाली हो चुकी थीं। सिया अपनी मौसी के घर से वापस लौट रही थी। उसके हाथ में एक छोटी-सी टॉर्च थी और रास्ते में पीली रोशनी वाले कुछ पुराने बल्ब जल रहे थे।

     

    सिया ने जैसे ही सड़क पर कदम रखा, उसे अपनी परछाई दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “कम से कम तुम तो मेरे साथ हो।”

     

    लेकिन अगले ही पल उसकी मुस्कान गायब हो गई।

     

    सिया की परछाई उसके साथ नहीं चल रही थी।

     

    वह सड़क पर आगे बढ़ी, लेकिन परछाई कुछ कदम पीछे रह गई।

     

    सिया रुक गई।

     

    परछाई भी रुक गई।

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    परछाई ने भी हाथ उठाया।

     

    सिया ने धीरे से सिर दाईं तरफ किया।

     

    परछाई ने भी किया।

     

    “शायद रोशनी की वजह से ऐसा लग रहा है,” उसने खुद से कहा।

     

    वह आगे बढ़ने लगी।

     

    लेकिन कुछ कदम बाद उसे फिर अजीब बात महसूस हुई।

     

    उसकी परछाई अब उसके पीछे नहीं, बल्कि उसके सामने थी।

     

    सिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने टॉर्च बंद कर दी।

     

    सड़क पर अंधेरा छा गया।

     

    फिर उसने टॉर्च दोबारा जलाई।

     

    परछाई गायब थी।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    वह तेजी से घर की ओर चलने लगी।

     

    जैसे ही वह अपने घर के दरवाजे के पास पहुँची, उसे दीवार पर अपनी परछाई दिखाई दी।

     

    लेकिन इस बार वह परछाई उसकी तरह नहीं दिख रही थी।

     

    सिया स्थिर खड़ी थी।

     

    परछाई धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर दरवाजे की तरफ इशारा कर रही थी।

     

    सिया पीछे हट गई।

     

    “तुम मुझे क्या बताना चाहती हो?”

     

    परछाई ने जैसे दीवार पर एक आकृति बनाई।

     

    वह एक पुराने संदूक जैसी लग रही थी।

     

    सिया ने घर के अंदर जाकर वही संदूक ढूँढ़ना शुरू किया।

     

    कुछ देर बाद उसे वह संदूक अपनी दादी के पुराने कमरे में मिला।

     

    संदूक पर मोटा ताला लगा था।

     

    सिया को याद आया कि दादी हमेशा कहती थीं—

     

    “इस संदूक को कभी मत खोलना।”

     

    लेकिन आज उसके मन में एक अजीब सवाल था।

     

    उसने ताला खोला।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कुछ तस्वीरें और एक छोटी डायरी रखी थी।

     

    सिया ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर उसकी दादी का नाम लिखा था।

     

    वह पढ़ने लगी।

     

    “अगर कभी तुम्हें अपनी परछाई सामान्य न लगे, तो डरना मत। इसका मतलब है कि वह तुम्हें कुछ याद दिलाना चाहती है।”

     

    सिया के हाथ काँप गए।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “कई साल पहले हमारे परिवार के साथ एक घटना हुई थी। उस घटना का सच इस घर में छिपा है।”

     

    सिया आगे पढ़ती गई।

     

    दादी ने लिखा था कि कई साल पहले गाँव में एक लड़की रहती थी, जिसका नाम नैना था। वह सिया की दादी की छोटी बहन थी।

     

    एक रात नैना अचानक गायब हो गई थी।

     

    गाँव वालों ने बहुत खोजा, लेकिन उसका पता नहीं चला।

     

    दादी ने कभी किसी को नहीं बताया कि नैना के गायब होने से पहले उसने उनसे क्या कहा था।

     

    सिया ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “नैना ने कहा था कि उसने पुराने कुएँ के पास किसी को देखा है। लेकिन वह इंसान नहीं था। वह उसकी अपनी परछाई जैसा था।”

     

    सिया डर गई।

     

    अचानक कमरे की दीवार पर फिर उसकी परछाई दिखाई दी।

     

    लेकिन इस बार परछाई दरवाजे की ओर नहीं, खिड़की की ओर इशारा कर रही थी।

     

    सिया ने खिड़की खोली।

     

    बाहर आँगन में चाँदनी फैली थी।

     

    उसे जमीन पर कुछ चमकता दिखाई दिया।

     

    वह बाहर गई।

     

    वहाँ एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

     

    सिया ने उसे उठाया।

     

    उसे याद आया कि दादी के पुराने फोटो में नैना के पैर में बिल्कुल ऐसी ही पायल थी।

     

    “तो नैना यहाँ आई थी?”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “सिया!”

     

    वह घबराकर पलटी।

     

    उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    सिया ने सब कुछ बता दिया।

     

    माँ कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारी दादी ने इस बात को सालों तक अपने दिल में रखा था।”

     

    “लेकिन नैना के साथ हुआ क्या था?”

     

    माँ ने कहा, “किसी को नहीं पता।”

     

    अगले दिन सिया अपनी माँ के साथ पुराने कुएँ के पास गई।

     

    कुएँ के आसपास झाड़ियाँ उगी हुई थीं।

     

    सिया ने जमीन पर वही परछाई देखी।

     

    इस बार परछाई कुएँ के पीछे बने पत्थर की दीवार की ओर इशारा कर रही थी।

     

    दोनों ने वहाँ मिट्टी हटाई।

     

    कुछ ही देर में उन्हें एक पुराना लकड़ी का बक्सा मिला।

     

    बक्से के अंदर कुछ तस्वीरें और एक पत्र था।

     

    पत्र नैना का था।

     

    उसमें लिखा था कि उसने गाँव छोड़ने का फैसला किया था क्योंकि उसे डर था कि एक जमीन के विवाद में कुछ लोग उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं। उसने अपनी बड़ी बहन यानी सिया की दादी को पत्र लिखा था, लेकिन वह पत्र कभी उन्हें मिला ही नहीं।

     

    पत्र के आखिर में लिखा था—

     

    “अगर मैं वापस न आऊँ तो मेरी चीजें संभालकर रखना। मैं चाहती हूँ कि एक दिन सच सबके सामने आए।”

     

    सिया की माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अब परिवार को समझ आया कि नैना के गायब होने के पीछे कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं थी।

     

    उस समय की परिस्थितियों और डर के कारण उसने गाँव छोड़ दिया था।

     

    लेकिन फिर वह गई कहाँ?

     

    यह सवाल अभी भी बाकी था।

     

    सिया ने पत्र को ध्यान से देखा।

     

    उसके पीछे एक छोटे शहर का पता लिखा था।

     

    परिवार ने उस पते पर संपर्क किया।

     

    कई दिनों बाद उन्हें जवाब मिला।

     

    वहाँ रहने वाली एक वृद्ध महिला ने बताया कि नैना कई साल पहले उनके शहर में आई थी। उसने अपना नाम बदल लिया था और वहीं अपना जीवन शुरू किया था।

     

    सबसे बड़ी बात—वह जीवित थी।

     

    सिया की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

     

    कुछ दिनों बाद नैना अपने पुराने गाँव लौटी।

     

    वह बहुत बूढ़ी हो चुकी थी, लेकिन अपनी बहन को देखते ही दोनों एक-दूसरे से गले मिलकर रो पड़ीं।

     

    सिया दूर खड़ी सब देख रही थी।

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम वही बच्ची हो?”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “मैं अब बड़ी हो गई हूँ।”

     

    नैना ने पूछा, “तुम्हें मेरा पता कैसे मिला?”

     

    सिया ने दीवार की तरफ देखा।

     

    वहाँ उसकी परछाई बिल्कुल सामान्य थी।

     

    वह बोली, “मेरी परछाई मुझे आपके पास ले आई।”

     

    नैना हल्के से हँसी।

     

    “कभी-कभी हमारी परछाई डराने नहीं आती। वह उन बातों की तरफ इशारा करती है जिन्हें हम भूल चुके होते हैं।”

     

    उस रात सिया अपने कमरे में बैठी थी।

     

    चाँदनी खिड़की से अंदर आ रही थी।

     

    दीवार पर उसकी परछाई साफ दिखाई दे रही थी।

     

    सिया ने हाथ उठाया।

     

    परछाई ने भी हाथ उठाया।

     

    अब सब सामान्य था।

     

    सिया मुस्कुराई और धीरे से बोली—

     

    “अब मुझे तुमसे डर नहीं लगता।”

     

    उस दिन से उसने समझ लिया था कि हर रहस्य भूत या डर से जुड़ा नहीं होता।

     

    कभी-कभी अतीत की कोई अधूरी कहानी हमारे सामने परछाई बनकर खड़ी हो जाती है।

     

    और जब हम उस परछाई से डरने के बजाय उसका पीछा करते हैं, तो उसके पीछे छिपा सच सामने आ जाता है।

     

    क्योंकि परछाई हमेशा डर का संकेत नहीं होती… कभी-कभी वह उस सच का रास्ता होती है, जिसे रोशनी में आने का इंतजार होता है।

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 51

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 51

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 51 : पुरानी हवेली का बंद कमरा

     

    पुरानी हवेली के सामने खड़ी काली गाड़ी का इंजन बंद हो चुका था।

     

    चारों तरफ अंधेरा था।

     

    हवा इतनी तेज चल रही थी कि हवेली की टूटी खिड़कियां बार-बार आपस में टकरा रही थीं।

     

    आरव ने हवेली के खुले दरवाजे को देखा।

     

    अंदर से विक्रम की आवाज अब भी गूंज रही थी—

     

    “आओ आरव… तुम्हारा इंतजार था।”

     

    आरव ने एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    शेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    शेखर ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “इस हवेली में कदम रखने के बाद वापस निकलना आसान नहीं होगा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अंदर आरोही है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तो मैं उसे छोड़कर नहीं जा सकता।”

     

    शेखर ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “इसीलिए विक्रम ने उसे चुना है।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    उसने अपनी मुट्ठी बांधी और हवेली के अंदर चला गया।

     

     

     

    हवेली के अंदर

     

    हवेली के अंदर कदम रखते ही दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    “शेखर?”

     

    शेखर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    लेकिन दरवाजा नहीं खुला।

     

    “ये लॉक हो गया है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम फंस गए।”

     

    शेखर ने चारों तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    तभी सामने की दीवार पर लगी सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

     

    सामने एक बड़ा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीच में एक कुर्सी पर आरोही बैठी थी।

     

    उसके हाथ बंधे हुए थे।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “आरोही!”

     

    आरोही ने सिर उठाया।

     

    “आरव!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ना चाहता था, लेकिन शेखर ने उसे रोक लिया।

     

    “रुको!”

     

    “क्यों?”

     

    “कुछ गड़बड़ है।”

     

    आरोही ने जोर से कहा—

     

    “आरव, पास मत आना!”

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    “आरोही?”

     

    उसने कांपती आवाज में कहा—

     

    “फर्श के नीचे कुछ है।”

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    फर्श पर छोटे-छोटे लाल निशान बने थे।

     

    शेखर ने तुरंत कहा—

     

    “पीछे हटो!”

     

    अगले ही पल फर्श के कुछ हिस्से से बिजली की चिंगारी निकली।

     

    अगर आरव एक कदम और आगे बढ़ता…

     

    तो शायद वह बच नहीं पाता।

     

     

     

    विक्रम सामने आया

     

    ऊपर की बालकनी से तालियों की आवाज आई।

     

    ताली… ताली… ताली…

     

    विक्रम धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    “शाबाश, शेखर।”

     

    शेखर ने बंदूक निकाल ली।

     

    “खेल खत्म हो चुका है, विक्रम।”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “तुम अब भी खुद को हीरो समझते हो?”

     

    “बीस साल तक मेरे साथ रहकर मेरे खिलाफ सबूत जमा करते रहे।”

     

    “लेकिन आखिर में यहां आए किसके साथ?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “आरव के साथ।”

     

    विक्रम ने आरव की तरफ देखा।

     

    “मुझे पता था।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा—

     

    “आरोही को क्यों उठाया?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हें यहां लाने का यही एक तरीका था।”

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    विक्रम धीरे-धीरे आरव के पास आया।

     

    “तुम्हारे पास जो चाबी है।”

     

    आरव ने अपनी जेब पर हाथ रखा।

     

    “ये?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर मैं नहीं दूं?”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “तो आरोही मरेगी।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “उसे हाथ भी मत लगाना।”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “तुम्हें अपनी कमजोरी का पता भी नहीं है, आरव।”

     

    आरव ने आरोही की तरफ देखा।

     

    आरोही ने आंखों से इशारा किया—

     

    “चाबी मत देना।”

     

    आरव समझ गया।

     

     

     

    आरोही का इशारा

     

    विक्रम ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “क्या कहा उसने?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    विक्रम आरोही के पास गया।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारा हीरो तुम्हें बचा लेगा?”

     

    आरोही ने बिना डरे कहा—

     

    “मुझे अपने आरव पर पूरा भरोसा है।”

     

    विक्रम का चेहरा कठोर हो गया।

     

    “प्यार।”

     

    “यही सबसे बड़ी कमजोरी होती है।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “प्यार इंसान को कमजोर नहीं… मजबूत बनाता है।”

     

    विक्रम ने उसे घूरा।

     

    आरव की आंखों में गर्व था।

     

     

     

    छुपा हुआ संदेश

     

    अचानक शेखर ने आरव के कान में धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारी मां ने जो लॉकेट दिया था, उसमें सिर्फ चिप नहीं थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और क्या?”

     

    “एक ट्रैकिंग डिवाइस।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “नैना को पता है कि हम यहां हैं।”

     

    आरव ने तुरंत अपना फोन निकाला।

     

    सिग्नल नहीं था।

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “फोन से नहीं।”

     

    उसने आरव की घड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “उसमें।”

     

    आरव ने अपनी घड़ी देखी।

     

    उसकी स्क्रीन पर एक छोटा लाल निशान चमक रहा था।

     

    LOCATION SHARED.

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “मां हमें ढूंढ रही हैं।”

     

     

     

    विक्रम की असली मांग

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “चाबी दो।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “पहले आरोही को छोड़ो।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है मैं इतना मूर्ख हूं?”

     

    “चाबी पहले।”

     

    आरव ने चाबी निकाल ली।

     

    विक्रम की नजर चाबी पर टिक गई।

     

    लेकिन तभी शेखर ने गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    विक्रम पीछे हट गया।

     

    आरव दौड़कर आरोही के पास पहुंचा।

     

    उसने उसके हाथ खोले।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “बहुत डर गई थी?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “तुम आ गए थे ना।”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

     

    लेकिन तभी…

     

    धांय!

     

    एक गोली दीवार से टकराई।

     

    विक्रम वहां नहीं था।

     

    शेखर ने चारों तरफ देखा।

     

    “वो भाग गया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “उसे जाने दो।”

     

    शेखर ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि अब हमें पता है वो क्या चाहता है।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    आरव ने चाबी अपनी जेब से निकाली।

     

    “ये।”

     

     

     

    लेकिन चाबी नकली थी

     

    विक्रम की आवाज अचानक पूरे कमरे में गूंजी—

     

    “आरव…”

     

    “तुमने मुझे जो चाबी दी थी…”

     

    “वो नकली थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    विक्रम सामने नहीं था।

     

    लेकिन उसकी आवाज चारों तरफ से आ रही थी।

     

    “तुम बहुत चालाक हो गए हो।”

     

    “लेकिन तुम्हें अभी ये नहीं पता कि असली चाबी किसके पास है।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “किसके?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे पास?”

     

    “तुम्हारे लॉकेट में।”

     

    आरोही ने तुरंत अपना लॉकेट पकड़ लिया।

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लॉकेट में सिर्फ सबूत नहीं छुपाया था।”

     

    “उन्होंने असली चाबी छुपाई थी।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तो इसी वजह से उसने आरोही को अगवा किया था।”

     

    विक्रम की आवाज आई—

     

    “बिल्कुल।”

     

     

     

    लॉकेट का दूसरा राज

     

    आरव ने आरोही का लॉकेट देखा।

     

    “इसे खोलो।”

     

    आरोही ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर लगी छोटी सी धातु की प्लेट हटाने पर एक बेहद छोटी चाबी दिखाई दी।

     

    अमन की कही बात आरव को याद आई—

     

    “तीनों के पास अलग-अलग चाबी है।”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “तो हमारे पास तीन चाबियां थीं।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “और अब ये तीनों मिलकर कुछ खोलेंगी।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “एक ऐसी जगह… जहां तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।”

     

    सबने पीछे देखा।

     

    दरवाजे पर नैना खड़ी थीं।

     

    उनके साथ देवेंद्र, माधवी, अमन और विहान भी थे।

     

    आरोही की आंखों में खुशी आ गई।

     

    “मां…”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हम तुम्हें लेने आए हैं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आपको पता था हम यहां हैं?”

     

    नैना मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारी घड़ी ने सब बता दिया।”

     

     

     

    विक्रम फिर सामने आया

     

    अचानक हवेली की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरा छा गया।

     

    फिर विक्रम की आवाज आई—

     

    “तुम सब यहां आ गए।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “अब तुम्हारा खेल खत्म।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “नैना… तुम्हें लगता है कि पच्चीस साल पहले मैं हार गया था?”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम सिर्फ भागी थीं।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “लेकिन इस बार मैं नहीं भागूंगी।”

     

    अचानक सामने स्क्रीन जल उठी।

     

    उस पर एक लाइव वीडियो चल रहा था।

     

    वीडियो में राजवीर जेल के कमरे में बैठा था।

     

    उसके सामने एक आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    “ये कौन है?”

     

    नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    देवेंद्र भी स्तब्ध रह गया।

     

    विहान ने पूछा—

     

    “मां?”

     

    नैना की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “ये आदमी… तुम्हारे नाना हैं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने स्क्रीन को देखा।

     

    “लेकिन आपने कहा था नाना की मौत हो चुकी है।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हमें भी यही लगता था।”

     

    स्क्रीन पर वो आदमी धीरे-धीरे कैमरे की तरफ मुड़ा।

     

    उसके चेहरे पर वही पुरानी कठोरता थी।

     

    और उसने कहा—

     

    “मेरे बच्चों… बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे ढूंढने में।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    विहान पीछे हट गया।

     

    अमन ने अविश्वास से कहा—

     

    “तो इतने सालों से हमारे नाना जिंदा थे?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    फिर स्क्रीन पर विक्रम दिखाई दिया।

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “अब तुम्हें चुनना होगा—तुम अपने नाना को बचाओगे या इस हवेली के अंदर छिपा वो सच खोजोगे, जिसके लिए तुम तीनों पैदा हुए थे।”

     

    आरव ने मुट्ठी भींच ली।

     

    उसकी नजर पहले अपनी मां पर गई…

     

    फिर आरोही पर…

     

    और आखिर में स्क्रीन पर मौजूद अपने नाना पर।

     

    उसे पहली बार समझ आया—

     

    ये लड़ाई सिर्फ उसके परिवार की नहीं थी।

     

    इसके पीछे एक ऐसा राज था…

     

    जो उसकी और आरोही की पूरी जिंदगी बदल सकता था।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 50

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 50

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड – 50 : आरोही के पिता का रहस्य

     

    अभय के हाथ में पकड़ा फोन कांप रहा था।

     

    स्क्रीन पर एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में एक आदमी खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    और उसके पीछे राजवीर खड़ा था।

     

    लेकिन आरव की नजर उस आदमी पर नहीं…

     

    उसके साथ खड़ी एक छोटी बच्ची पर थी।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    वो बच्ची बिल्कुल आरोही जैसी दिख रही थी।

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “ये… आरोही है?”

     

    अभय ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “लेकिन ये तस्वीर कब की है?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “लगभग बीस साल पुरानी।”

     

    आरोही ने तस्वीर अपने हाथ में ले ली।

     

    “मुझे कुछ याद क्यों नहीं?”

     

    अभय ने गंभीर आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हें याद रखने ही नहीं दिया गया।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरे साथ भी वही हुआ… जो आपके बच्चों के साथ हुआ?”

     

    नैना ने धीरे से कहा—

     

    “शायद उससे भी ज्यादा।”

     

     

     

    आरोही के पिता कौन थे?

     

    आरव ने अभय की तरफ देखा।

     

    “आप जानते हैं इनके पिता को?”

     

    “हां।”

     

    “कौन थे?”

     

    अभय कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “उनका नाम था… समर प्रताप।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “मेरे पापा का नाम समर ही था।”

     

    “लेकिन वो तो…”

     

    वह रुक गई।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ था उनके साथ?”

     

    आरोही ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “मुझे बताया गया था कि एक हादसे में उनकी मौत हो गई थी।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “वो हादसा नहीं था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “तो?”

     

    “उनकी हत्या की गई थी।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “किसने?”

     

    अभय ने तस्वीर की तरफ देखा।

     

    “जिसने तुम्हारे परिवार को बर्बाद किया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “वही आदमी जो हमें धमका रहा है?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

     

     

    असली नाम

     

    अमन ने पूछा—

     

    “उसका नाम क्या है?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम सिंघानिया।”

     

    आरोही जैसे पत्थर की मूर्ति बन गई।

     

    “सिंघानिया…?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम उसे जानती हो?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “वो मेरे पापा के सबसे करीबी दोस्त थे।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मेरे बचपन में वो हमारे घर आया करते थे।”

     

    “मुझे चॉकलेट देते थे।”

     

    “पापा उन्हें अपना भाई कहते थे।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “और उसी भरोसे का फायदा उठाकर उसने तुम्हारे पिता को खत्म कर दिया।”

     

    आरोही ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छुपा लिया।

     

    आरव तुरंत उसके पास गया।

     

    “आरोही।”

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

    “नहीं, तुम ठीक नहीं हो।”

     

    “तुम्हें इतना सब अकेले नहीं सहना पड़ेगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर मेरे पिता की मौत में विक्रम का हाथ था… तो मैं भी उसे बेनकाब करूंगी।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम दोनों मिलकर करेंगे।”

     

     

     

    विक्रम की असली योजना

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम सिर्फ तुम्हारे पिता का दुश्मन नहीं था।”

     

    “वो राजवीर और शेखर दोनों का इस्तेमाल करता था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन राजवीर तो इतना ताकतवर था।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “राजवीर ताकतवर था… लेकिन विक्रम उससे ज्यादा खतरनाक था।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “विक्रम लोगों को पैसे से नहीं खरीदता था।”

     

    “वो उनकी कमजोरियां खरीदता था।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “और जिसने उसका साथ देने से मना किया…”

     

    अभय ने बात पूरी की—

     

    “वो गायब हो गया।”

     

    विहान ने मुट्ठी भींच ली।

     

    “तो इतने सालों से ये सब उसी की वजह से हुआ?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “राजवीर सिर्फ उसका चेहरा था।”

     

     

     

    विक्रम का फोन

     

    अचानक आरव के फोन पर कॉल आया।

     

    नंबर अनजान था।

     

    आरव ने कॉल उठाया।

     

    “कौन?”

     

    दूसरी तरफ से वही आवाज आई—

     

    “तुम्हें मेरे बारे में जानने की बहुत जल्दी है।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “विक्रम।”

     

    आवाज में हंसी थी।

     

    “आखिर नाम तो जान ही गए।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मेरी आरोही से दूर रहो।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो तुम्हारे खेल का हिस्सा नहीं है।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “गलत।”

     

    “आरोही इस खेल की सबसे जरूरी कड़ी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसके पास वो चीज है जो तुम्हारे पास नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “तुम्हारे नाना की आखिरी चाबी।”

     

    आरव ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “उसके पास?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “उसे खुद नहीं पता।”

     

    फिर कॉल कट गया।

     

     

     

    आरोही का लॉकेट

     

    आरोही ने अपने गले में पहने लॉकेट को छुआ।

     

    “क्या ये?”

     

    अभय ने लॉकेट देखा।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “ये तुम्हें किसने दिया?”

     

    “मेरी मां ने।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “इसे खोलो।”

     

    आरोही ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर एक छोटी सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में उसके पिता समर थे।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे एक छोटा सा निशान बना था।

     

    वही निशान…

     

    जो आरव की चाबी पर था।

     

    आरव ने हैरानी से कहा—

     

    “ये वही निशान है!”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो इसका मतलब…”

     

    अभय ने कहा—

     

    “आरोही भी इस रहस्य का हिस्सा है।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हारे पास वो चीज छुपाई थी, जिसे विक्रम पिछले बीस साल से ढूंढ रहा है।”

     

     

     

    छिपा हुआ पत्र

     

    नैना ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    “इसे गर्म करो।”

     

    आरोही ने चौंककर पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “तस्वीर के पीछे लिखी स्याही साधारण नहीं है।”

     

    अभय ने पास रखी मोमबत्ती जलाई।

     

    तस्वीर को हल्की गर्मी मिली।

     

    धीरे-धीरे पीछे शब्द उभरने लगे।

     

    “मेरी बेटी के लिए…”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “पापा…”

     

    उसने आगे पढ़ा—

     

    “अगर कभी तुम्हें ये पत्र मिले, तो समझ लेना कि मैं तुम्हारे पास नहीं हूं।”

     

    आरोही रोने लगी।

     

    “पापा…”

     

    आरव उसके पीछे खड़ा था।

     

    पत्र आगे कहता था—

     

    “तुम्हारे पास जो लॉकेट है, उसे कभी किसी को मत देना।”

     

    “क्योंकि उसमें सिर्फ मेरी तस्वीर नहीं है।”

     

    आरोही ने लॉकेट को देखा।

     

    अचानक उसमें से एक बहुत छोटी सी चिप बाहर निकल आई।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये क्या है?”

     

    अभय ने उसे देखते ही कहा—

     

    “ये वही सबूत है, जिसके लिए इतने सालों से लोग मर रहे हैं।”

     

     

     

    पच्चीस साल पुराना वीडियो

     

    चिप को एक पुराने डिवाइस में लगाया गया।

     

    स्क्रीन चालू हुई।

     

    वीडियो में समर दिखाई दिए।

     

    उनकी आवाज साफ थी।

     

    “अगर ये वीडियो मेरी बेटी तक पहुंचा है, तो इसका मतलब है कि विक्रम मुझे नहीं ढूंढ पाया।”

     

    आरव ध्यान से देखने लगा।

     

    समर आगे बोले—

     

    “लेकिन मेरी बेटी अकेली नहीं है।”

     

    “उसकी जिंदगी उन तीन भाइयों से जुड़ी है…”

     

    आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    समर ने कहा—

     

    “आरव, अमन और विहान… तुम तीनों को अगर ये वीडियो दिख रहा है, तो मेरी बेटी की रक्षा करना।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “पापा आपको हमारे बारे में कैसे पता था?”

     

    वीडियो में समर ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे नाना और मैं एक ही मिशन पर काम कर रहे थे।”

     

    “वो तुम्हारे तीनों बेटों को बचाना चाहते थे।”

     

    “और मैं अपनी बेटी को।”

     

    फिर स्क्रीन पर एक नक्शा दिखाई दिया।

     

    उस पर एक जगह लाल निशान से घिरी हुई थी।

     

    “पुरानी हवेली।”

     

    समर की आखिरी बात थी—

     

    “वहीं वो चीज छिपी है, जो पूरे खेल को खत्म कर सकती है।”

     

    वीडियो बंद हो गया।

     

     

     

    हवेली जाने का फैसला

     

    आरव ने कहा—

     

    “हम वहां जाएंगे।”

     

    अभय ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विक्रम यही चाहता है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो फिर हम क्या करें?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “पहले हमें पता करना होगा कि विक्रम को हमारे हर कदम की खबर कैसे मिल रही है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “मतलब हमारे बीच कोई गद्दार है।”

     

    सब एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    विहान ने धीरे से कहा—

     

    “क्या रुद्र?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “मैं नहीं।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैं तुम पर अभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकता।”

     

    रुद्र ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हें भरोसा करने की जरूरत नहीं।”

     

    “बस इतना याद रखना… मैंने तुम्हारी जान दो बार बचाई है।”

     

    आरव चुप रहा।

     

     

     

    अचानक गायब आरोही

     

    कुछ देर बाद सभी अगले कदम की तैयारी करने लगे।

     

    आरोही बाहर चली गई।

     

    आरव ने सोचा वह अकेले कुछ देर रहना चाहती है।

     

    लेकिन पांच मिनट बाद भी वह वापस नहीं आई।

     

    “आरोही?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    आरव बाहर गया।

     

    “आरोही!”

     

    सन्नाटा।

     

    उसका फोन जमीन पर पड़ा था।

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    स्क्रीन पर एक वीडियो चल रहा था।

     

    विक्रम की आवाज आई—

     

    “मैंने कहा था उसे अकेले आने दो।”

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “नहीं…”

     

    अभय, अमन और विहान भी बाहर आ गए।

     

    नैना घबरा गईं।

     

    “आरोही कहां है?”

     

    आरव ने फोन कसकर पकड़ लिया।

     

    वीडियो में आरोही एक कमरे में बंधी हुई थी।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    विक्रम की आवाज आई—

     

    “आरव… अगर अपनी प्रेमिका को जिंदा देखना चाहते हो…”

     

    “तो आज रात पुरानी हवेली में अकेले आना।”

     

    आरव ने गुस्से में फोन जमीन पर फेंक दिया।

     

    “मैं उसे वापस लेकर आऊंगा।”

     

    अभय ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम अकेले नहीं जाओगे।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन उसने अकेले आने को कहा है।”

     

    अभय ने दृढ़ आवाज में कहा—

     

    “विक्रम की बात मानना सबसे बड़ी गलती होगी।”

     

    नैना ने आरव को गले लगा लिया।

     

    “बेटा, जल्दबाजी मत करना।”

     

    आरव की आंखों में सिर्फ एक बात थी—

     

    आरोही को बचाना।

     

     

     

    आखिरी मोड़

     

    रात होने लगी।

     

    पुरानी हवेली की ओर एक काली गाड़ी बढ़ रही थी।

     

    अंदर आरव बैठा था।

     

    लेकिन उसके साथ कोई और भी था।

     

    उसने अपना चेहरा कपड़े से ढक रखा था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    उस व्यक्ति ने कपड़ा हटाया।

     

    आरव उसे देखकर स्तब्ध रह गया।

     

    वो था…

     

    शेखर।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    उसने कहा—

     

    “मैं तुम्हें आरोही तक पहुंचाने आया हूं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम यहां कैसे?”

     

    शेखर ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि विक्रम को लगता है कि मैं उसका आदमी हूं।”

     

    “लेकिन असली बात ये है…”

     

    शेखर ने आरव की तरफ देखा।

     

    “मैं पिछले बीस साल से उसके खिलाफ सबूत जमा कर रहा हूं।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “तो फिर तुमने हमारे साथ इतना बड़ा खेल क्यों खेला?”

     

    शेखर ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि अगर विक्रम को पता चल जाता कि मैं तुम्हारे साथ हूं…”

     

    “तो वो सिर्फ आरोही को नहीं मारता।”

     

    “वो तुम्हारी मां नैना को भी मार देता।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “और अब हमें सिर्फ आरोही को नहीं बचाना… बल्कि उस इंसान को भी ढूंढना है जो हवेली के अंदर से विक्रम की मदद कर रहा है।”

     

    गाड़ी पुरानी हवेली के सामने रुक गई।

     

    आरव ने बाहर कदम रखा।

     

    हवेली के दरवाजे अपने आप खुल गए।

     

    अंदर से विक्रम की आवाज आई—

     

    “आओ आरव… तुम्हारा इंतजार था।”

     

    आरव ने मुट्ठी भींच ली।

     

    और अंधेरी हवेली के अंदर कदम रख दिया।

     

    जारी रहेगा…

  • नसीब खराब

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नसीब ही खराब है, क्या करूँ?

     

    एक छोटे से गाँव में रघु नाम का एक लड़का रहता था। उसकी उम्र करीब सोलह साल थी। रघु मेहनती था, लेकिन उसकी जिंदगी में एक के बाद एक परेशानियाँ आती रहती थीं। वह अक्सर अपने दोस्तों से कहता—

     

    “लगता है मेरा नसीब ही खराब है, मैं क्या करूँ?”

     

    गाँव के लोग भी उसे देखकर कहते, “बेचारा रघु, इसके साथ तो हमेशा उल्टा ही होता है।”

     

    रघु के पिता किसान थे। एक साल बारिश समय पर नहीं हुई और फसल खराब हो गई। अगले साल बारिश इतनी ज्यादा हुई कि खेत में पानी भर गया। तीसरे साल फसल अच्छी हुई तो बाजार में अनाज के दाम गिर गए।

     

    रघु के पिता हर बार मेहनत करते, लेकिन घर की हालत वैसी ही रहती।

     

    एक दिन रघु के पिता बीमार पड़ गए।

     

    रघु ने स्कूल छोड़कर पिता के साथ खेत में काम करना शुरू कर दिया।

     

    उसकी माँ ने कहा, “बेटा, पढ़ाई मत छोड़।”

     

    रघु बोला, “माँ, घर कैसे चलेगा?”

     

    माँ ने कहा, “मुश्किल समय हमेशा नहीं रहता।”

     

    रघु ने सिर झुका लिया।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में एक दुकानदार को काम करने वाले लड़के की जरूरत थी। रघु वहाँ काम करने लगा।

     

    लेकिन पहले ही दिन उससे गलती से तेल की एक बोतल गिर गई।

     

    दुकानदार गुस्से में बोला, “तुमसे तो एक काम भी ठीक से नहीं होता।”

     

    रघु चुप रहा।

     

    अगले दिन वह समय पर दुकान पहुँचा, लेकिन दुकान खुलने में देर हो गई। दुकानदार ने फिर उसे डाँट दिया।

     

    तीसरे दिन दुकान के बाहर रखा सामान बारिश में भीग गया।

     

    दुकानदार ने कहा, “बस बहुत हुआ। तुम काम छोड़ दो।”

     

    रघु घर लौटते हुए रास्ते में बैठ गया।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “नसीब ही खराब है मेरा। जहाँ जाता हूँ, वहीं परेशानी हो जाती है।”

     

    तभी गाँव के बाहर रहने वाले हरिदास बाबा वहाँ से गुजरे।

     

    उन्होंने रघु को उदास देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    रघु बोला, “कुछ नहीं बाबा। मेरा नसीब ही खराब है।”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “अच्छा? नसीब खराब है?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो चल मेरे साथ।”

     

    रघु उनके पीछे चल पड़ा।

     

    बाबा उसे एक सूखे खेत के पास ले गए।

     

    वहाँ जमीन बिल्कुल बंजर थी।

     

    बाबा ने पूछा, “अगर मैं इस खेत में बीज डाल दूँ तो क्या तुरंत फसल उग जाएगी?”

     

    रघु बोला, “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि पानी देना होगा, मिट्टी तैयार करनी होगी और देखभाल करनी होगी।”

     

    बाबा ने कहा, “तो फिर जिंदगी में भी सिर्फ बीज डालकर किस्मत को दोष क्यों देता है?”

     

    रघु चुप हो गया।

     

    बाबा ने कहा, “मुश्किलें तुम्हारा नसीब खराब होने का सबूत नहीं हैं। कई बार वे तुम्हें मजबूत बनाने का रास्ता होती हैं।”

     

    रघु ने पूछा, “लेकिन मैं करूँ क्या?”

     

    बाबा ने कहा, “जो कर सकते हो, वह करो। जो नहीं कर सकते, उसके लिए रोना बंद करो।”

     

    रघु ने उस दिन से एक नया फैसला किया।

     

    वह सुबह जल्दी उठता और खेत में पिता की मदद करता। दोपहर में पढ़ाई करता और शाम को गाँव के बढ़ई के पास काम सीखने जाता।

     

    बढ़ई ने पूछा, “तुम सीखना क्यों चाहते हो?”

     

    रघु बोला, “क्योंकि मैं सिर्फ किस्मत के भरोसे नहीं रहना चाहता।”

     

    बढ़ई मुस्कुराया।

     

    कुछ महीनों में रघु लकड़ी का छोटा-मोटा काम करने लगा।

     

    उसने एक दिन गाँव के बच्चों के लिए लकड़ी की छोटी मेज और कुर्सियाँ बनाईं।

     

    लोगों को उसका काम पसंद आया।

     

    एक स्कूल शिक्षक ने उससे कहा, “तुम्हारे हाथ में हुनर है।”

     

    रघु ने पहली बार महसूस किया कि शायद उसके अंदर भी कोई खासियत है।

     

    धीरे-धीरे उसे छोटे-छोटे काम मिलने लगे।

     

    एक दिन उसे पास के शहर से बड़ा काम मिला।

     

    लेकिन काम शुरू करने से एक दिन पहले उसकी सारी लकड़ी बारिश में भीग गई।

     

    रघु कुछ देर चुप रहा।

     

    पहले वाला रघु होता तो कहता—

     

    “नसीब ही खराब है।”

     

    लेकिन इस बार उसने ऐसा नहीं कहा।

     

    उसने खुद से कहा, “समस्या आई है, इसका रास्ता भी होगा।”

     

    उसने गाँव वालों से मदद माँगी।

     

    किसी ने सूखी लकड़ी दी, किसी ने औजार दिए और किसी ने काम में हाथ बँटाया।

     

    रघु ने रात-दिन मेहनत करके काम पूरा कर दिया।

     

    शहर का ग्राहक उसके काम से बहुत खुश हुआ।

     

    उसने रघु को तय रकम से ज्यादा पैसे दिए।

     

    रघु घर लौटकर पिता के हाथ में पैसे रखता हुआ बोला, “बाबा, आज समझ आया कि किस्मत से ज्यादा मेहनत काम आती है।”

     

    पिता की आँखें भर आईं।

     

    “मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    रघु ने अपनी छोटी-सी लकड़ी की दुकान खोल ली।

     

    अब गाँव के लोग उसके पास फर्नीचर बनवाने आते थे।

     

    एक दिन वही दुकानदार, जिसने कभी उसे काम से निकाल दिया था, रघु की दुकान पर आया।

     

    उसने कहा, “मुझे अपनी दुकान के लिए नई अलमारियाँ बनवानी हैं।”

     

    रघु मुस्कुराया।

     

    “जरूर बनाऊँगा।”

     

    दुकानदार ने संकोच से पूछा, “तुमने मुझे माफ कर दिया?”

     

    रघु ने कहा, “आपने मुझे काम से निकाला था, लेकिन उसी दिन मुझे समझ आया था कि मुझे अपना रास्ता खुद बनाना होगा।”

     

    दुकानदार ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम सच में बदल गए हो।”

     

    रघु बोला, “मैं बदला नहीं हूँ। बस अब हर परेशानी को नसीब का नाम नहीं देता।”

     

    कुछ समय बाद गाँव में एक बड़ी समस्या आई। तेज बारिश से पुल टूट गया और कई घरों का रास्ता बंद हो गया।

     

    रघु ने गाँव वालों के साथ मिलकर लकड़ी का अस्थायी पुल बनाया।

     

    गाँव के मुखिया ने कहा, “रघु, तुमने आज पूरे गाँव की मदद की है।”

     

    रघु ने मुस्कुराकर कहा, “जब मैं परेशान था, तब गाँव वालों ने भी मेरी मदद की थी।”

     

    उस शाम रघु हरिदास बाबा से मिलने गया।

     

    बाबा पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    रघु ने कहा, “बाबा, आपने उस दिन मुझे जो बात बताई थी, वह मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “क्या बात?”

     

    रघु बोला, “नसीब खराब है या अच्छा, यह सोचते रहने से कुछ नहीं बदलता। असली सवाल यह है कि जो हमारे हाथ में है, उसे हम कितना अच्छा करते हैं।”

     

    बाबा ने सिर हिलाया।

     

    “अब तुम समझ गए हो।”

     

    रघु आसमान की तरफ देखने लगा।

     

    उसकी जिंदगी में अब भी परेशानियाँ आती थीं। कभी काम कम मिलता, कभी नुकसान होता, कभी कोई योजना सफल नहीं होती।

     

    लेकिन अब वह हर बार एक ही बात कहता—

     

    “नसीब को कोसने से अच्छा है, एक बार और कोशिश करूँ।”

     

    और यही कोशिश धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बदलती गई।

     

    क्योंकि रघु ने आखिर समझ लिया था—

     

    नसीब रास्ता दिखा सकता है, लेकिन उस रास्ते पर चलना हमारे अपने हाथ में होता है।

  • टिफिन से निकला हैरानी वाला

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    एक बच्चे के टिफिन से निकला ऐसा कि सब हैरान रह गए

     

    शहर के एक छोटे-से स्कूल में आरव नाम का दस साल का बच्चा पढ़ता था। वह बहुत शांत स्वभाव का था। पढ़ाई में ठीक था, खेलकूद में भी अच्छा था, लेकिन उसकी एक आदत सबको थोड़ी अजीब लगती थी—वह रोज अपना टिफिन अकेले में खाता था।

     

    बाकी बच्चे मैदान में या अपनी कक्षा के बाहर दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाते, लेकिन आरव अक्सर स्कूल के पीछे लगे पुराने नीम के पेड़ के पास चला जाता।

     

    उसकी दोस्त मीरा ने एक दिन पूछा, “तुम रोज यहाँ अकेले क्यों आते हो?”

     

    आरव मुस्कुराकर बोला, “बस ऐसे ही।”

     

    “टिफिन में ऐसा क्या होता है जो किसी को दिखाना नहीं चाहते?”

     

    आरव ने तुरंत टिफिन बंद कर दिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    मीरा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ।

     

    अगले दिन लंच की घंटी बजते ही सभी बच्चे अपने-अपने टिफिन खोलकर बैठ गए। आरव फिर नीम के पेड़ के नीचे चला गया।

     

    मीरा चुपचाप उसके पीछे चली गई।

     

    आरव ने इधर-उधर देखा और टिफिन खोला।

     

    मीरा दूर से देख रही थी।

     

    अचानक टिफिन के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

     

    “चूँ… चूँ…”

     

    मीरा की आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “आरव!”

     

    आरव घबरा गया।

     

    “तुम यहाँ कैसे आई?”

     

    मीरा ने टिफिन की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारे टिफिन से आवाज क्यों आ रही है?”

     

    आरव कुछ बोलता, उससे पहले टिफिन का ढक्कन थोड़ा-सा हिला।

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    “इसके अंदर क्या है?”

     

    आरव ने धीरे से ढक्कन खोला।

     

    अंदर खाने के पास एक बहुत छोटा-सा घायल गौरैया का बच्चा बैठा था।

     

    उसके पंखों पर धूल लगी थी और वह ठीक से उड़ नहीं पा रहा था।

     

    मीरा हैरान रह गई।

     

    “तुम इसे टिफिन में लेकर आते हो?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने इसे तीन दिन पहले स्कूल के बाहर देखा था। यह जमीन पर गिरा हुआ था। मुझे डर लगा कि कोई इसे कुचल देगा। मैं इसे घर ले जाना चाहता था, लेकिन माँ ने कहा कि स्कूल के पास ही इसके लिए सुरक्षित जगह बना दूँ। इसलिए मैं रोज इसे थोड़ा खाना और पानी देता हूँ।”

     

    मीरा ने प्यार से गौरैया को देखा।

     

    “लेकिन टिफिन में क्यों?”

     

    आरव बोला, “क्योंकि घर से निकलते समय मेरे पास कोई दूसरा डिब्बा नहीं था। मुझे लगा था कि थोड़ी देर के लिए इसमें रख दूँगा। फिर इसे पेड़ के पास छोड़ दूँगा।”

     

    मीरा ने कहा, “तुम्हें टीचर को बताना चाहिए था।”

     

    आरव ने डरते हुए कहा, “मुझे लगा वे इसे बाहर छोड़ देंगे।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “यहाँ क्या हो रहा है?”

     

    दोनों ने पलटकर देखा।

     

    उनकी कक्षा की शिक्षिका सीमा मैडम वहाँ खड़ी थीं।

     

    मीरा ने सारी बात बता दी।

     

    मैडम ने गौरैया के बच्चे को देखा और तुरंत कहा, “इसे टिफिन में रखना ठीक नहीं है। इसे सुरक्षित और खुली जगह चाहिए।”

     

    आरव परेशान हो गया।

     

    “मैडम, इसे बचा लीजिए।”

     

    सीमा मैडम मुस्कुराईं।

     

    “हम सब मिलकर इसे बचाएँगे।”

     

    उन्होंने स्कूल के माली को बुलाया। नीम के पेड़ की एक सुरक्षित शाखा पर एक छोटा-सा घोंसला बनाया गया। गौरैया के बच्चे को उसमें रखा गया और पास में पानी भी रखा गया।

     

    अगले दिन जब आरव स्कूल आया, तो उसने देखा कि घोंसले के पास एक बड़ी गौरैया बैठी थी।

     

    “मैडम! शायद इसकी माँ आ गई!”

     

    सब बच्चे खुशी से वहाँ जमा हो गए।

     

    लेकिन तभी एक और हैरान करने वाली बात हुई।

     

    वह बड़ी गौरैया उड़कर स्कूल की खिड़की पर गई और कुछ देर वहीं बैठी रही। फिर वह नीम के पेड़ के पास लौट आई।

     

    आरव चुपचाप उसे देखता रहा।

     

    सीमा मैडम बोलीं, “लगता है उसे पता है कि उसके बच्चे को किसने बचाया।”

     

    अगले कुछ दिनों तक स्कूल के बच्चे उस छोटे पक्षी की देखभाल करने लगे।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    एक सप्ताह बाद स्कूल में वार्षिक कार्यक्रम था। सभी बच्चे अपने माता-पिता के साथ आए थे। मंच के पीछे सजावट की जा रही थी।

     

    तभी अचानक बिजली चली गई।

     

    स्कूल का पिछला हिस्सा अंधेरे में डूब गया।

     

    उसी समय एक बच्चा चिल्लाया—

     

    “कोई अंदर फँसा है!”

     

    पता चला कि स्कूल की स्टोर रूम में एक छोटा बच्चा खेलते-खेलते चला गया था और दरवाजा गलती से बंद हो गया था।

     

    शिक्षक उसे ढूँढ़ रहे थे, लेकिन अंधेरा होने के कारण कुछ समझ नहीं आ रहा था।

     

    आरव को अचानक नीम के पेड़ की तरफ से गौरैया की तेज आवाज सुनाई दी।

     

    वह पेड़ के पास गया।

     

    गौरैया बार-बार उड़कर स्कूल के पीछे बने स्टोर रूम की खिड़की की तरफ जा रही थी।

     

    आरव चिल्लाया, “मैडम! यह उधर जा रही है!”

     

    सब लोग उसके पीछे गए।

     

    स्टोर रूम की छोटी खिड़की के पास पहुँचकर उन्हें अंदर से बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी।

     

    तुरंत दरवाजा खोला गया और बच्चे को बाहर निकाल लिया गया।

     

    सभी ने राहत की साँस ली।

     

    आरव ने उस छोटी गौरैया की तरफ देखा।

     

    “तुमने फिर मदद कर दी।”

     

    सीमा मैडम ने आरव के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “आज तुम्हारे टिफिन से निकली छोटी-सी जान ने पूरे स्कूल को हैरान कर दिया।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    मीरा बोली, “और मुझे तो पहले लगा था कि आरव अपने टिफिन में कोई रहस्यमयी चीज छिपाकर लाता है।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “रहस्यमयी तो थी।”

     

    “क्या?”

     

    आरव ने गौरैया की तरफ देखकर कहा—

     

    “उसमें एक छोटी-सी जान थी, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था।”

     

    उस दिन स्कूल में एक नया नियम बनाया गया।

     

    हर कक्षा में पक्षियों के लिए पानी का बर्तन रखा जाएगा और स्कूल के पेड़ों को बिना जरूरत नहीं काटा जाएगा।

     

    आरव का टिफिन भी अब पहले जैसा नहीं रहा था।

     

    पहले उसमें सिर्फ खाना होता था।

     

    अब उसमें एक छोटी-सी कहानी छिपी थी—एक ऐसी कहानी, जिसने पूरे स्कूल को सिखाया कि किसी छोटी-सी जान की मदद करना भी बहुत बड़ा काम हो सकता है।

     

    और सबसे खास बात यह थी कि जिस टिफिन को देखकर एक दिन सब हैरान हुए थे, उसी टिफिन ने बच्चों को एक बहुत बड़ी सीख दी—

     

    दया कभी छोटी नहीं होती। कभी-कभी हमारी छोटी-सी मदद किसी की पूरी दुनिया बचा सकती है।

  • हवेली वाला शैतान

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    हवेली वाला शैतान

     

    एक छोटे से गाँव के बाहर एक पुराना जंगल था। लोग उसे काली घाटी का जंगल कहते थे। दिन में भी वहाँ जाने से लोग डरते थे, क्योंकि जंगल के बीच एक टूटी हुई हवेली खड़ी थी। हवेली की खिड़कियाँ हमेशा बंद रहती थीं और उसके दरवाजे पर मोटी जंग लगी जंजीर लटकती रहती थी।

     

    गाँव में एक बात मशहूर थी।

     

    “उस हवेली में शैतान रहता है।”

     

    लोग कहते थे कि कई साल पहले वहाँ एक रहस्यमयी आदमी आया था। वह किसी से बात नहीं करता था और हमेशा हवेली में बंद रहता था। एक रात अचानक हवेली से अजीब आवाजें आने लगीं। उसके बाद वह आदमी कभी दिखाई नहीं दिया।

     

    तब से लोग उसे शैतान कहने लगे।

     

    गाँव में रहने वाली सोलह साल की राधा इन बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं करती थी। उसकी दादी अक्सर उसे जंगल से दूर रहने के लिए कहती थीं।

     

    एक शाम राधा अपनी बकरी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जंगल के किनारे पहुँच गई। बकरी आगे बढ़ती हुई उसी पुरानी हवेली की तरफ चली गई।

     

    “अरे रुक!” राधा उसके पीछे दौड़ी।

     

    बकरी हवेली के टूटे दरवाजे के अंदर चली गई।

     

    राधा ने डरते हुए अंदर कदम रखा।

     

    अंदर बहुत अंधेरा था।

     

    “मेरी बकरी कहाँ है?”

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    राधा घबरा गई।

     

    वह वापस जाने लगी, तभी पीछे से भारी आवाज आई—

     

    “यहाँ क्यों आई हो?”

     

    राधा पलटकर खड़ी हो गई।

     

    सामने एक लंबा-सा काला साया खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अंधेरे में साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    राधा डरते हुए बोली, “मैं… अपनी बकरी लेने आई हूँ।”

     

    साया कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने हाथ से दूसरी तरफ इशारा किया।

     

    “वहाँ है।”

     

    राधा ने देखा, उसकी बकरी सीढ़ियों के पास खड़ी थी।

     

    वह बकरी को लेकर तुरंत बाहर जाने लगी।

     

    तभी साया बोला, “रुको।”

     

    राधा रुक गई।

     

    “गाँव वालों से कहना… इस हवेली के पास मत आना।”

     

    राधा ने पूछा, “क्यों?”

     

    साया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    राधा वहाँ से भागकर घर पहुँच गई।

     

    उस रात उसने दादी को सब बताया।

     

    दादी का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “तूने उसे देखा?”

     

    “हाँ।”

     

    “कैसा था?”

     

    “पता नहीं दादी। बहुत डरावना था।”

     

    दादी ने तुरंत कहा, “कल से उस जंगल की तरफ बिल्कुल मत जाना।”

     

    लेकिन अगले दिन गाँव में एक और बात फैल गई।

     

    गाँव के मुखिया का बेटा मोहन गायब हो गया था।

     

    लोगों ने कहा, “उसे शैतान उठा ले गया!”

     

    सभी लोग जंगल की तरफ जाने लगे।

     

    राधा भी भीड़ के पीछे-पीछे चल पड़ी।

     

    हवेली के पास पहुँचते ही उसे जमीन पर मोहन की चप्पल दिखाई दी।

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    मुखिया चिल्लाया, “देखा! मैंने कहा था न, यह शैतान ही है!”

     

    कुछ लोगों ने हवेली पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए।

     

    अचानक हवेली की खिड़की खुली।

     

    वही काला साया दिखाई दिया।

     

    “रुक जाओ!”

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    मुखिया बोला, “मेरे बेटे को कहाँ छिपाया है?”

     

    साये ने कहा, “तुम्हारा बेटा यहाँ नहीं है।”

     

    “झूठ!”

     

    तभी राधा ने ध्यान दिया कि साये की आवाज में डर नहीं, बल्कि चिंता थी।

     

    वह आगे बढ़ी।

     

    “अगर मोहन यहाँ नहीं है, तो वह कहाँ है?”

     

    साये ने जंगल के अंदर एक पहाड़ी की ओर देखा।

     

    “पुरानी खदान के पास।”

     

    लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    राधा ने पूछा, “आपको कैसे पता?”

     

    साये ने कहा, “क्योंकि मैं उसे बचाकर वहाँ से लाया था। लेकिन रास्ते में वह बेहोश हो गया।”

     

    मुखिया चौंक गया।

     

    “तो तुमने मेरे बेटे को बचाया?”

     

    साया चुप रहा।

     

    कुछ लोग उसके साथ खदान की ओर चल पड़े।

     

    वहाँ पहुँचकर उन्होंने मोहन को एक सुरक्षित जगह पर पाया। वह डरा हुआ था, लेकिन ठीक था।

     

    मुखिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने पूछा, “तुमने मेरे बेटे की जान क्यों बचाई?”

     

    साये ने कहा, “क्योंकि वह बच्चा था। और बच्चों की गलती की सजा उन्हें नहीं मिलनी चाहिए।”

     

    अब लोगों को पहली बार लगा कि शायद कहानी कुछ और है।

     

    राधा ने हिम्मत करके पूछा, “आप असल में हैं कौन?”

     

    साया धीरे-धीरे आगे आया।

     

    उसने अपना चेहरा दिखाया।

     

    वह कोई राक्षस नहीं था।

     

    वह एक बूढ़ा आदमी था, जिसकी आँखों में गहरी उदासी थी।

     

    उसका नाम हरिदास था।

     

    उसने बताया कि कई साल पहले वह इसी गाँव का वैद्य था। एक बीमारी के दौरान उसने गाँव के बहुत से लोगों की मदद की थी। लेकिन एक रात हवेली में आग लग गई। लोगों ने बिना सच जाने उस पर आरोप लगा दिया कि उसने जानबूझकर आग लगाई है।

     

    गाँव वालों ने उसे शैतान कहना शुरू कर दिया।

     

    हरिदास ने गाँव छोड़ने के बजाय हवेली में ही रहना चुना। उसने लोगों से दूरी बना ली, लेकिन चुपचाप जरूरतमंदों की मदद करता रहा।

     

    “मैंने कई बार लोगों को बचाया,” उसने कहा, “लेकिन किसी ने कभी मेरा चेहरा नहीं देखा। इसलिए मेरे बारे में कहानियाँ बनती रहीं।”

     

    राधा की आँखें भर आईं।

     

    “तो आप शैतान नहीं हैं?”

     

    हरिदास हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “शैतान तो लोगों के डर ने मुझे बना दिया था।”

     

    मुखिया ने सिर झुका लिया।

     

    “हमने तुम्हें बिना जाने दोषी समझ लिया।”

     

    हरिदास ने कहा, “गलती मान लेना भी बड़ी बात है।”

     

    उस दिन गाँव वालों ने हवेली के बाहर जमा डर और अफवाहों को खत्म करने का फैसला किया।

     

    कुछ दिनों बाद हवेली को साफ किया गया। वहाँ एक छोटा-सा इलाज का कमरा बनाया गया, जहाँ हरिदास गाँव के लोगों की मदद करने लगा।

     

    राधा रोज उसके पास जाती और दवाइयाँ पहुँचाने में मदद करती।

     

    एक दिन उसने पूछा, “बाबा, आपको कभी बुरा नहीं लगा कि सब आपको शैतान कहते थे?”

     

    हरिदास ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, “बुरा तो बहुत लगा। लेकिन अगर मैं भी नफरत करने लगता, तो फिर उनमें और मुझमें फर्क क्या रहता?”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    उस दिन के बाद गाँव में एक नई कहावत मशहूर हो गई—

     

    किसी के चेहरे से उसका सच मत तय करो। कभी-कभी जिसे दुनिया शैतान कहती है, उसके अंदर सबसे ज्यादा इंसानियत छिपी होती है।

     

    और पुरानी हवेली?

     

    वह अब डर की जगह नहीं रही थी।

     

    वहाँ हर शाम बच्चों की हँसी सुनाई देती थी।

     

    और हरिदास, जिसे कभी पूरा गाँव “शैतान” कहता था, अब उसी गाँव के लिए सबसे भरोसेमंद इंसान बन चुका था।

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 49

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 49

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 49 : अभय के साथ कौन था?

    मंदिर के बाहर एक के बाद एक गाड़ियों की हेडलाइट्स दिखाई दे रही थीं।

    अंधेरी रात अचानक रोशनी से भर गई।

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

    “इतनी सारी गाड़ियां?”

    अमन ने बंदूक संभालते हुए कहा—

    “लगता है हम अकेले नहीं हैं।”

    विहान ने अभय की तरफ देखा।

    “पापा… ये लोग कौन हैं?”

    अभय ने तुरंत मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया।

    “तुम लोगों को यहां नहीं आना चाहिए था।”

    आरव उसके पास आया।

    “हम आपको ढूंढते हुए यहां आए हैं।”

    “आप पच्चीस साल से कहां थे?”

    अभय की आंखों में दर्द उतर आया।

    “तुम्हें मुझसे सवाल करने का पूरा हक है।”

    “लेकिन अभी हमारे पास सवालों के जवाब देने का वक्त नहीं है।”

    बाहर किसी ने जोर से मंदिर का दरवाजा पीटा।

    धड़ाम!

    नैना घबरा गईं।

    “ये लोग यहां तक पहुंच गए।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन हैं ये?”

    अभय ने धीरे से कहा—

    “वही लोग, जिनसे मैं पिछले पच्चीस साल से तुम्हें बचा रहा हूं।”


    मंदिर का गुप्त रास्ता

    अभय ने मंदिर की दीवार के पास जाकर एक पत्थर हटाया।

    पत्थर हटते ही दीवार का एक हिस्सा खुल गया।

    अंदर अंधेरी सुरंग दिखाई दी।

    अमन ने हैरानी से पूछा—

    “यहां रास्ता है?”

    अभय ने कहा—

    “हां।”

    विहान ने पूछा—

    “आपको ये रास्ता कैसे पता?”

    अभय हल्का सा मुस्कुराया।

    “क्योंकि तुम्हारे नाना ने ये मंदिर बनवाया था।”

    आरव चौंक गया।

    “नाना ने?”

    “हां।”

    “और ये सुरंग?”

    “उनकी आखिरी सुरक्षा।”

    अभय ने सबको अंदर जाने का इशारा किया।

    “जल्दी करो।”

    सभी सुरंग में उतरने लगे।

    सबसे आखिर में आरव रुका।

    उसने अभय की तरफ देखा।

    “पापा।”

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

    “हां?”

    “इस बार आप हमें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।”

    अभय की आंखें नम हो गईं।

    “अब नहीं।”


    सुरंग में पहली बातचीत

    कुछ दूर जाने के बाद सभी रुक गए।

    बाहर की आवाजें अब सुनाई नहीं दे रही थीं।

    आरव ने सबसे पहले सवाल किया—

    “अब बताइए।”

    अभय चुप रहा।

    “आप जिंदा थे तो हमें छोड़ क्यों दिया?”

    अभय ने गहरी सांस ली।

    “मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं।”

    “मैं दूर रहकर तुम्हारी रक्षा करता रहा।”

    अमन ने कहा—

    “कैसी रक्षा?”

    “तुम्हारे हर कदम पर नजर रखता था।”

    विहान की आवाज भर्रा गई।

    “तो फिर एक बार भी हमारे सामने क्यों नहीं आए?”

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

    “क्योंकि अगर मैं सामने आता… तो तुम तीनों उसी दिन खतरे में पड़ जाते।”

    आरव ने पूछा—

    “किससे?”

    अभय ने कहा—

    “तुम्हारे अपने परिवार से।”

    तीनों भाई चौंक गए।


    परिवार में ही दुश्मन

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    अभय ने सीधे जवाब नहीं दिया।

    “जिस आदमी ने राजवीर को आदेश दिए…”

    “वही आदमी तुम्हारे परिवार के बहुत करीब है।”

    आरोही ने पूछा—

    “क्या वो माधवी जी हैं?”

    नैना ने तुरंत कहा—

    “नहीं।”

    अभय ने सिर हिलाया।

    “माधवी निर्दोष है।”

    “देवेंद्र?”

    अभय कुछ पल चुप रहा।

    देवेंद्र ने खुद कहा—

    “मुझ पर शक करना है तो करो।”

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

    “देवेंद्र पर भी भरोसा किया जा सकता है।”

    आरव ने पूछा—

    “तो कौन?”

    अभय ने कहा—

    “अभी उसका नाम लेना सही नहीं होगा।”

    अमन झुंझला गया।

    “पच्चीस साल से यही सुन रहे हैं!”

    “कोई पूरा सच क्यों नहीं बताता?”

    अभय ने अमन के कंधे पर हाथ रखा।

    “क्योंकि कुछ सच्चाइयां इतनी खतरनाक होती हैं कि उन्हें जानना भी मौत को बुलावा देना होता है।”


    आरोही की चिंता

    आरोही अब तक चुप थी।

    अचानक उसने कहा—

    “लेकिन बाहर जो लोग आए हैं, उन्हें हमारे यहां होने की खबर कैसे मिली?”

    सब एक-दूसरे को देखने लगे।

    अभय ने गंभीरता से कहा—

    “यही सबसे बड़ी समस्या है।”

    आरव ने पूछा—

    “मतलब?”

    “हमारे साथ कोई ऐसा व्यक्ति था, जिसने हमारी लोकेशन बताई।”

    अमन तुरंत रुद्र की तरफ देखने लगा।

    रुद्र ने कहा—

    “इस बार मैंने कोई संदेश नहीं भेजा।”

    विहान ने कहा—

    “तो फिर कौन?”

    अभय ने धीरे से कहा—

    “तुम्हारे फोन में से किसी एक की लोकेशन ट्रैक की गई है।”

    आरव ने अपना फोन निकाला।

    “मेरे फोन में?”

    अभय ने कहा—

    “हां।”

    आरोही ने तुरंत अपना फोन देखा।

    “मेरे फोन में भी कुछ अजीब नहीं है।”

    अमन ने कहा—

    “मेरे में भी नहीं।”

    विहान ने अपना फोन आगे किया।

    अभय ने उसे देखा और अचानक उसका चेहरा बदल गया।

    “ये फोन तुम्हें किसने दिया?”

    विहान ने कहा—

    “कुछ महीने पहले।”

    “किसने?”

    विहान चुप हो गया।

    नैना ने पूछा—

    “विहान?”

    विहान ने धीरे से कहा—

    “राजवीर ने।”


    एक बड़ा झटका

    अभय तुरंत पीछे हट गया।

    “इसे फेंक दो!”

    विहान ने फोन जमीन पर पटक दिया।

    लेकिन देर हो चुकी थी।

    फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

    उस पर एक संदेश आया—

    “बहुत अच्छा… तुम लोग आखिर मेरे पास पहुंच ही गए।”

    नीचे सिर्फ एक नाम लिखा था—

    “शेखर।”

    आरव ने हैरानी से कहा—

    “शेखर?”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन शेखर तो पुलिस के कब्जे में था।”

    अभय ने कहा—

    “वो पुलिस के कब्जे में नहीं है।”

    “क्या?”

    “जिसे तुमने पुलिस के हवाले किया था…”

    अभय की आंखें गंभीर हो गईं।

    “वो शेखर था ही नहीं।”


    नकली शेखर

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

    “तो हमारे साथ कौन था?”

    अभय ने कहा—

    “शेखर का आदमी।”

    अमन ने गुस्से में कहा—

    “मतलब असली शेखर कहां है?”

    अभय ने जवाब दिया—

    “राजवीर के पास।”

    नैना ने कहा—

    “नहीं…”

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

    “हां।”

    “असली शेखर अभी भी जिंदा है।”

    आरव ने कहा—

    “तो फिर जिसे हमने देखा…”

    “वो सिर्फ एक मोहरा था।”

    देवेंद्र ने सिर पकड़ लिया।

    “इतने सालों से ये लोग हमसे एक कदम आगे हैं।”

    अभय ने कहा—

    “क्योंकि हमारे बीच कोई उनकी मदद कर रहा है।”


    अचानक हमला

    सुरंग के ऊपर जोरदार धमाका हुआ।

    धड़ाम!

    धूल नीचे गिरने लगी।

    आरोही डरकर आरव से लिपट गई।

    आरव ने उसे संभालते हुए कहा—

    “डरो मत।”

    अभय ने कहा—

    “हमें जल्दी निकलना होगा।”

    सभी आगे बढ़ने लगे।

    लेकिन तभी सुरंग के दूसरे छोर से भी कदमों की आवाज आने लगी।

    अमन ने बंदूक निकाल ली।

    “उधर भी लोग हैं।”

    अभय ने चारों तरफ देखा।

    “हम फंस गए।”

    विहान ने पूछा—

    “अब?”

    अभय ने दीवार की तरफ इशारा किया।

    “एक रास्ता और है।”

    उसने दीवार पर हाथ रखा।

    कुछ दबाते ही फर्श का एक हिस्सा खुल गया।

    नीचे सीढ़ियां थीं।

    आरव ने कहा—

    “आपको ये सब रास्ते कैसे पता हैं?”

    अभय ने कहा—

    “क्योंकि मैंने ये रास्ते तुम्हारे नाना के साथ बनाए थे।”


    नाना की आखिरी इच्छा

    सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए आरव ने पूछा—

    “मेरे नाना कैसे इंसान थे?”

    अभय ने मुस्कुराते हुए कहा—

    “बहुत सख्त।”

    अमन हंस पड़ा।

    “हमसे भी ज्यादा?”

    “बहुत ज्यादा।”

    विहान ने पूछा—

    “और वो हमें क्यों बचाना चाहते थे?”

    अभय कुछ पल चुप रहा।

    फिर बोला—

    “क्योंकि उन्हें पता था कि एक दिन तुम तीनों मिलकर उस साम्राज्य को खत्म करोगे जिसे राजवीर और उसके साथियों ने बनाया था।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन-सा साम्राज्य?”

    अभय ने कहा—

    “एक ऐसा साम्राज्य जो सिर्फ पैसों का नहीं था… लोगों की जिंदगी पर कब्जे का था।”


    आरव और आरोही

    कुछ देर बाद सब एक छोटे कमरे में पहुंचे।

    अभय ने दरवाजा बंद कर दिया।

    आरोही चुपचाप आरव के पास बैठी थी।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “तुम डर गई?”

    आरोही ने कहा—

    “हां।”

    “लेकिन तुम्हारे साथ हूं।”

    आरव ने हल्की मुस्कान दी।

    “तुम्हें पता है, इन सबके बीच एक चीज अच्छी हुई है।”

    “क्या?”

    “मुझे मेरी मां मिल गई।”

    आरोही ने कहा—

    “और पिता भी।”

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “और तुम।”

    आरोही मुस्कुराई।

    “मैं तो पहले से तुम्हारे साथ हूं।”

    आरव ने धीरे से कहा—

    “मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”

    आरोही ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

    “तो मुझे कभी छोड़ना मत।”

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

    तभी पीछे से अमन की आवाज आई—

    “भाई, यहां भी शुरू हो गए?”

    आरव मुस्कुरा दिया।

    “तू चुप कर।”

    आरोही शर्म से मुस्कुरा दी।


    देवेंद्र का कबूलनामा

    अचानक देवेंद्र ने कहा—

    “आरव।”

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

    “क्या हुआ?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “तुम्हें एक और बात जाननी चाहिए।”

    “क्या?”

    “तुम्हारे पिता के गायब होने के पीछे…”

    उन्होंने अभय की तरफ देखा।

    “मेरी गलती भी थी।”

    अभय ने सिर झुका लिया।

    आरव चौंक गया।

    “आपने क्या किया था?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “मैंने अभय को उस रात एक जगह बुलाया था।”

    “लेकिन वहां राजवीर पहले से मौजूद था।”

    “उसे मेरे बारे में सब पता था।”

    अभय ने कहा—

    “अगर देवेंद्र उस रात मुझे नहीं बुलाता, तो शायद मैं बच जाता।”

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

    “मैंने तुम्हें खतरे में डाल दिया।”

    अभय ने कहा—

    “लेकिन तुमने बाद में मेरी जिंदगी बचाई।”

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

    आरव ने महसूस किया कि उनके बीच सिर्फ दोस्ती नहीं…

    पच्चीस साल पुराना अपराधबोध भी था।


    असली दुश्मन का पहला संकेत

    अचानक कमरे की दीवार पर लगी पुरानी स्क्रीन चालू हो गई।

    सभी चौंक गए।

    स्क्रीन पर एक धुंधला चेहरा दिखाई दिया।

    आवाज आई—

    “अभय…”

    अभय का चेहरा सख्त हो गया।

    “तुम?”

    आरव ने पूछा—

    “आप इसे जानते हैं?”

    अभय ने कोई जवाब नहीं दिया।

    स्क्रीन पर मौजूद आदमी हंसा।

    “तुम अपने बेटों को मेरे बारे में बताने से डर रहे हो?”

    अभय ने कहा—

    “उन्हें इसमें मत घसीटो।”

    आवाज आई—

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

    फिर स्क्रीन पर तीन तस्वीरें दिखाई दीं।

    आरव की।

    अमन की।

    विहान की।

    और उसके बाद चौथी तस्वीर आई।

    आरोही की।

    आरव का चेहरा बदल गया।

    “तुमने आरोही की तस्वीर क्यों दिखाई?”

    स्क्रीन पर आदमी ने कहा—

    “क्योंकि कहानी सिर्फ तुम्हारे परिवार की नहीं है।”

    आरोही पीछे हट गई।

    “मेरी?”

    आवाज आई—

    “तुम्हारे पिता ने भी उस रात एक सौदा किया था।”

    आरोही की सांस रुक गई।

    “मेरे पिता?”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “आरोही, तुम ठीक हो?”

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

    “मुझे कुछ नहीं पता।”

    स्क्रीन पर आदमी ने कहा—

    “अगर सच जानना है तो कल रात अकेली पुराने महल में आना।”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “वह अकेली कहीं नहीं जाएगी।”

    आवाज हंसी।

    “मुझे पता था तुम यही कहोगे।”

    फिर स्क्रीन पर आखिरी लाइन दिखाई दी—

    “आरव… अगर आरोही मेरे पास नहीं आई, तो अगली बार निशाना उसकी मां होगी।”

    स्क्रीन बंद हो गई।

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

    “आरव… मुझे लगता है मेरे परिवार में भी कोई ऐसा राज है, जिसके बारे में मुझे कुछ नहीं बताया गया।”

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

    “जो भी सच होगा, हम साथ मिलकर जानेंगे।”

    अभय ने गंभीर आवाज में कहा—

    “नहीं, आरव।”

    सबकी नजर उसकी तरफ गई।

    अभय ने कहा—

    “अगर वो आदमी आरोही के परिवार तक पहुंच चुका है… तो समझ लो, हमारा असली दुश्मन अब बहुत करीब है।”

    और उसी वक्त अभय के फोन पर एक तस्वीर आई।

    तस्वीर देखकर उसके हाथ कांपने लगे।

    वो तस्वीर…

    आरोही के पिता की थी।

    और उसके पीछे खड़ा था—

    वही आदमी, जिसकी आवाज अभी स्क्रीन पर सुनाई दी थी।

    जारी रहेगा…

     

  • जादुई पक्षियों की नगरी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई पक्षियों की नगरी

     

    बहुत दूर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच एक ऐसी नगरी थी, जिसके बारे में इंसानों की दुनिया में बहुत कम लोग जानते थे। उस नगरी का नाम था पंखलोक। वहाँ घर पत्थरों से नहीं, बल्कि रंग-बिरंगे पंखों, चमकती बेलों और पेड़ों की मजबूत शाखाओं से बने थे। वहाँ इंसान नहीं, बल्कि तरह-तरह के जादुई पक्षी रहते थे।

     

    किसी के पंख नीले थे, किसी के लाल, किसी के चाँदी जैसे सफेद और किसी के सुनहरे। हर पक्षी के पास कोई न कोई खास शक्ति थी। कोई बारिश बुला सकता था, कोई अंधेरे में रास्ता दिखा सकता था और कोई घायल पक्षियों को अपनी मीठी आवाज से शांत कर सकता था।

     

    उस नगरी की रानी थी पंखरानी सुरम्या। उसके पंख मोर के पंखों जैसे रंग-बिरंगे थे और उसके माथे पर एक छोटा-सा चमकता मुकुट था।

     

    पंखलोक में एक पुरानी परंपरा थी। नगरी के बीचों-बीच एक विशाल पेड़ था, जिसे जीवन-वृक्ष कहा जाता था। उसके पत्ते कभी नहीं सूखते थे। कहा जाता था कि जब तक जीवन-वृक्ष हरा रहेगा, तब तक पंखलोक सुरक्षित रहेगा।

     

    लेकिन एक दिन अचानक जीवन-वृक्ष के पत्ते मुरझाने लगे।

     

    पक्षियों में डर फैल गया।

     

    “रानी माँ, ये क्या हो रहा है?” एक छोटी चिड़िया ने घबराकर पूछा।

     

    सुरम्या ने पेड़ को ध्यान से देखा। उसके चेहरे की चिंता बढ़ गई।

     

    “मुझे लगता है किसी ने जीवन-वृक्ष की जादुई रोशनी चुरा ली है।”

     

    सभा में सन्नाटा छा गया।

     

    उसी समय एक बूढ़ा उल्लू आगे आया। उसका नाम था उलूक बाबा।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा, “रानी, कई साल पहले एक काला पक्षी इस नगरी से निकाला गया था। उसका नाम था कालपंख। वह जादुई शक्ति चाहता था। हो सकता है वह वापस आ गया हो।”

     

    सुरम्या ने पूछा, “लेकिन वह कहाँ है?”

     

    उलूक बाबा ने पहाड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “काले पहाड़ के उस पार उसकी गुफा है। वहाँ जाना आसान नहीं है।”

     

    सभा में कोई पक्षी आगे नहीं आया।

     

    तभी एक छोटी-सी नीली चिड़िया आगे बढ़ी।

     

    उसका नाम था नीरा।

     

    नीरा आकार में छोटी थी, लेकिन उसके अंदर बहुत साहस था।

     

    “मैं जाऊँगी,” उसने कहा।

     

    कुछ पक्षी हँसने लगे।

     

    “तुम? इतनी छोटी होकर?”

     

    नीरा ने शांत होकर कहा, “बड़ा शरीर हमेशा बड़ी हिम्मत नहीं देता।”

     

    रानी सुरम्या मुस्कुराई।

     

    “नीरा, रास्ता बहुत कठिन है।”

     

    “मुझे पता है,” नीरा बोली, “लेकिन अगर मैं कोशिश ही न करूँ तो जीवन-वृक्ष को कौन बचाएगा?”

     

    रानी ने उसे एक चमकता हुआ पंख दिया।

     

    “जब भी तुम्हें रास्ता न मिले, यह पंख तुम्हें सही दिशा दिखाएगा।”

     

    नीरा उड़ चली।

     

    पहले उसने घने बादलों का जंगल पार किया। वहाँ पेड़ों के बीच इतनी धुंध थी कि कुछ दिखाई नहीं देता था। तभी उसे दूर से रोने की आवाज सुनाई दी।

     

    नीरा नीचे उतरी तो एक नन्हा सफेद पक्षी काँटों में फँसा हुआ था।

     

    “मुझे बचा लो,” वह बोला।

     

    नीरा ने बिना देर किए काँटों को हटाया और उसे बाहर निकाल दिया।

     

    सफेद पक्षी ने कहा, “तुमने मेरी मदद की है। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”

     

    उसका नाम था चांदू।

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    कुछ दूर जाकर उन्हें एक चौड़ी नदी मिली। पानी बहुत तेज था।

     

    चांदू बोला, “हम इसे पार कैसे करेंगे?”

     

    नीरा ने अपना चमकता पंख पानी के ऊपर रखा। अचानक पानी शांत हो गया और नदी के बीच एक रास्ता बन गया।

     

    दोनों नदी पार कर गए।

     

    आखिर वे काले पहाड़ तक पहुँचे।

     

    पहाड़ के अंदर एक विशाल गुफा थी। वहाँ चारों तरफ काली धुंध फैली हुई थी।

     

    अचानक गुफा के अंदर से भारी आवाज आई।

     

    “कौन आया है?”

     

    नीरा ने हिम्मत करके कहा, “मैं नीरा हूँ। जीवन-वृक्ष की रोशनी वापस लेने आई हूँ।”

     

    अंधेरे में दो चमकती आँखें दिखाई दीं।

     

    कालपंख सामने आ गया।

     

    वह बहुत बड़ा काला पक्षी था। उसके पंखों से जैसे धुआँ निकल रहा था।

     

    “तुम मुझे रोकने आई हो?” उसने हँसते हुए पूछा।

     

    “मैं तुम्हें रोकने नहीं,” नीरा बोली, “तुम्हें समझाने आई हूँ।”

     

    कालपंख कुछ पल चुप रहा।

     

    “समझाने? मुझे?”

     

    “हाँ। तुमने जीवन-वृक्ष की रोशनी क्यों चुराई?”

     

    कालपंख ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि इस नगरी में किसी ने मुझे स्वीकार नहीं किया। मैं भी शक्तिशाली बनना चाहता था। जब सबने मुझे कमजोर समझा, तो मैंने सोचा कि अगर मेरे पास सबसे बड़ी शक्ति होगी, तो सब मुझसे डरेंगे।”

     

    नीरा ने कहा, “डर से सम्मान नहीं मिलता।”

     

    कालपंख ने गुस्से में पंख फड़फड़ाए।

     

    “तुम मुझे क्या समझाओगी?”

     

    तभी गुफा की छत से पत्थर गिरने लगा। कालपंख ने नीरा और चांदू को धक्का देकर सुरक्षित जगह कर दिया।

     

    नीरा ने देखा कि कालपंख बुरा बनना नहीं चाहता था। वह बस अपने अकेलेपन से परेशान था।

     

    नीरा बोली, “अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो मेरे साथ पंखलोक चलो।”

     

    कालपंख ने हैरानी से पूछा, “क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे?”

     

    “शायद तुरंत नहीं,” नीरा बोली, “लेकिन तुम्हें एक मौका जरूर मिलना चाहिए।”

     

    कालपंख ने कुछ देर सोचा। फिर उसने जीवन-वृक्ष की रोशनी से भरा चमकता पत्थर बाहर निकाला।

     

    “ले जाओ इसे।”

     

    तीनों पंखलोक लौट आए।

     

    जैसे ही रोशनी जीवन-वृक्ष में वापस रखी गई, सूखे पत्ते फिर से हरे हो गए। पूरे पंखलोक में रंग-बिरंगी रोशनी फैल गई।

     

    पक्षी खुशी से उड़ने लगे।

     

    रानी सुरम्या ने कालपंख की ओर देखा।

     

    “तुम वापस क्यों आए?”

     

    कालपंख ने सिर झुकाकर कहा, “क्योंकि एक छोटी-सी चिड़िया ने मुझे बताया कि शक्ति पाने से ज्यादा जरूरी है किसी का विश्वास पाना।”

     

    रानी कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने कहा, “गलती बड़ी थी, लेकिन उसे सुधारने की इच्छा भी बड़ी है।”

     

    उस दिन से कालपंख को पंखलोक में रहने की अनुमति मिल गई।

     

    नीरा को नगरी की सबसे बहादुर चिड़िया का सम्मान दिया गया।

     

    लेकिन नीरा ने पुरस्कार लेते हुए कहा, “मैं अकेली बहादुर नहीं थी। चांदू ने मेरा साथ दिया और कालपंख ने अपनी गलती स्वीकार की। असली जादू यही है कि जब कोई गिर जाए, तो उसे उठने का मौका दिया जाए।”

     

    उस दिन से पंखलोक में एक नया नियम बना।

     

    किसी को उसकी कमजोरी के कारण छोटा नहीं समझा जाएगा।

     

    और कहते हैं, आज भी उन ऊँचे पहाड़ों के बीच अगर किसी को रात में रंग-बिरंगे पक्षियों की आवाज सुनाई दे, तो समझ लेना कि कहीं पास ही पंखलोक की नगरी है।

     

    वहाँ आज भी जीवन-वृक्ष हरा है, आसमान में जादुई पक्षी उड़ते हैं और हर सुबह सूरज की पहली किरण उनके पंखों पर पड़कर पूरी नगरी को सोने जैसा चमका देती है।

     

    पंखलोक का सबसे बड़ा रहस्य कोई जादुई पेड़ या चमकता पत्थर नहीं था।

     

    उस नगरी का असली जादू था—दया, दोस्ती और किसी को बदलने का एक मौका देना।

  • सुनहरी छोटी चिड़िया

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सुनहरी छोटी चिड़िया

     

    एक घने जंगल के किनारे बसे छोटे-से गाँव में गौरी नाम की एक लड़की रहती थी। गौरी बहुत दयालु थी। उसे पेड़-पौधों और जानवरों से बहुत लगाव था। उसके घर के पीछे एक पुराना बरगद का पेड़ था, जहाँ रोज तरह-तरह की चिड़ियाँ आकर बैठती थीं।

     

    एक सुबह गौरी ने पेड़ के नीचे एक अजीब-सी चमक देखी। उसने पास जाकर देखा तो वहाँ एक छोटी-सी चिड़िया बैठी थी। उसके पंख बिल्कुल सुनहरे थे। सूरज की रोशनी पड़ते ही उसके पंख ऐसे चमकते जैसे किसी ने उन पर सोना चढ़ा दिया हो।

     

    गौरी उसे देखकर हैरान रह गई।

     

    “तुम कितनी सुंदर हो!” उसने धीरे से कहा।

     

    चिड़िया ने अपनी गर्दन घुमाई और गौरी की ओर देखा। फिर वह उड़कर उसके कंधे पर आ बैठी।

     

    गौरी मुस्कुराई। “डरना मत, मैं तुम्हें कुछ नहीं करूँगी।”

     

    उस दिन से वह सुनहरी चिड़िया रोज गौरी के घर आने लगी। गौरी उसे बाजरे के दाने खिलाती और उसके लिए मिट्टी के छोटे कटोरे में पानी रखती। उसने उसका नाम रख दिया—सोना।

     

    कुछ दिनों में गौरी और सोना के बीच ऐसी दोस्ती हो गई, जैसे वे एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों।

     

    लेकिन गाँव में एक लालची आदमी भी रहता था, जिसका नाम धनराज था। उसने एक दिन सोना को गौरी के घर के पास देखा। सुनहरे पंख देखकर उसकी आँखों में लालच आ गया।

     

    “अगर मैं इस चिड़िया को पकड़ लूँ,” धनराज मन ही मन बोला, “तो इसे शहर में बहुत पैसे में बेच सकता हूँ।”

     

    अगले दिन उसने जंगल में एक जाल बिछा दिया।

     

    सोना रोज की तरह गौरी के घर आई और फिर जंगल की ओर उड़ गई। रास्ते में वह धनराज के जाल में फँस गई।

     

    चिड़िया घबराकर फड़फड़ाने लगी।

     

    उसी समय गौरी उसे ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँच गई। उसने जाल देखा तो तुरंत दौड़कर सोना को बाहर निकाला।

     

    धनराज झाड़ियों के पीछे छिपा सब देख रहा था।

     

    गौरी ने सोना को अपनी हथेलियों में लेकर कहा, “तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं?”

     

    सोना ने प्यार से उसकी उंगली पर अपनी चोंच रखी।

     

    धनराज बाहर आया और बोला, “वह चिड़िया मुझे दे दो।”

     

    गौरी ने कहा, “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसके पंख सोने के हैं। मैं उसे बेचकर बहुत अमीर बन सकता हूँ।”

     

    गौरी ने सिर हिलाया। “वह कोई चीज नहीं है जिसे बेचा जाए। वह एक जीव है।”

     

    धनराज गुस्से में बोला, “तुम मुझे रोक नहीं सकती।”

     

    वह चला गया, लेकिन उसके मन का लालच और बढ़ गया।

     

    उस रात गाँव में तेज आँधी आई। बारिश इतनी हुई कि नदी का पानी बढ़ने लगा। गाँव के कई घरों में पानी घुसने लगा। लोग अपने सामान को सुरक्षित जगह ले जाने लगे।

     

    गौरी भी अपने माता-पिता की मदद कर रही थी। तभी सोना अचानक तेज आवाज में चहचहाने लगी। वह बार-बार गाँव के पुराने रास्ते की ओर उड़ती और फिर लौट आती।

     

    गौरी को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “क्या हुआ सोना?”

     

    चिड़िया फिर उसी दिशा में उड़ गई।

     

    गौरी उसके पीछे चल पड़ी। थोड़ी दूर जाकर उसने देखा कि नदी का एक किनारा टूट चुका था और पानी तेजी से गाँव की ओर आ रहा था।

     

    गौरी घबराकर चिल्लाई, “सब लोग जल्दी बाहर आओ! पानी गाँव में आने वाला है!”

     

    लोगों ने उसकी बात सुनी और ऊँची जगह की ओर जाने लगे। कुछ ही देर में नदी का पानी उसी रास्ते से बहता हुआ गाँव में आ गया।

     

    गाँव वालों को समझ आ गया कि अगर उन्हें पहले चेतावनी न मिलती तो बड़ा नुकसान हो सकता था।

     

    सबने गौरी की तारीफ की।

     

    गौरी ने मुस्कुराकर सोना की ओर देखा। “मुझे नहीं, इसे धन्यवाद दो।”

     

    लेकिन धनराज चुप था। उसके मन में अभी भी लालच था।

     

    अगली सुबह उसने सोना को पकड़ने की आखिरी कोशिश की। उसने गौरी के घर के पास दाने बिखेर दिए और पीछे छिपकर बैठ गया।

     

    सोना दाने खाने आई, लेकिन तभी उसकी नजर धनराज पर पड़ गई। वह तुरंत उड़ गई।

     

    धनराज उसके पीछे भागा। भागते-भागते वह जंगल के अंदर बहुत दूर निकल गया। अचानक उसका पैर एक गड्ढे में फँस गया और वह नीचे गिर पड़ा।

     

    “बचाओ!” वह चिल्लाया।

     

    आसपास कोई नहीं था।

     

    सोना ने उसकी आवाज सुनी। वह उड़कर गाँव की ओर गई और जोर-जोर से गौरी के घर के ऊपर चक्कर लगाने लगी।

     

    गौरी समझ गई कि कुछ हुआ है।

     

    वह सोना के पीछे जंगल की ओर दौड़ी। थोड़ी देर बाद उसे धनराज गड्ढे में फँसा दिखाई दिया।

     

    गौरी ने गाँव वालों को बुलाया और सबने मिलकर धनराज को बाहर निकाल लिया।

     

    धनराज शर्म से सिर झुका कर खड़ा रहा।

     

    उसने गौरी से कहा, “जिस चिड़िया को मैं पैसे के लिए पकड़ना चाहता था, उसी ने आज मेरी जान बचाई।”

     

    गौरी बोली, “सोना ने तुम्हें इसलिए नहीं बचाया कि तुम अच्छे हो। उसने इसलिए बचाया क्योंकि उसका दिल तुम्हारी तरह लालची नहीं है।”

     

    धनराज की आँखें झुक गईं।

     

    उस दिन के बाद उसने कभी सोना को पकड़ने की कोशिश नहीं की। बल्कि उसने गाँव में पेड़ लगाने शुरू कर दिए और पक्षियों के लिए पानी के बर्तन रखने लगा।

     

    धीरे-धीरे गाँव में हर घर की छत पर पानी और दाने रखे जाने लगे।

     

    सोना अब भी रोज गौरी के घर आती थी। लेकिन एक दिन वह सुबह-सुबह गौरी के सामने आकर देर तक चहचहाती रही। फिर उसने आसमान की ओर उड़ान भरी।

     

    गौरी समझ गई कि शायद अब सोना अपने परिवार के पास लौटना चाहती है।

     

    उसने हाथ हिलाकर कहा, “जाओ सोना। जहाँ भी रहना, खुश रहना।”

     

    सोना कुछ दूर जाकर फिर वापस लौटी। उसने एक बार गौरी के सिर के ऊपर चक्कर लगाया और फिर जंगल की ओर उड़ गई।

     

    उसके जाने के बाद भी जब कभी सूरज की पहली किरण बरगद के पेड़ पर पड़ती, उसकी एक सुनहरी चमक गौरी को दिखाई देती।

     

    गौरी मुस्कुराकर कहती, “सोना कहीं गई नहीं है… वह बस आसमान के उस पार से मुझे याद करती है।”

     

    और सचमुच, उस दिन से गाँव के लोग कहते थे कि जब भी किसी के दिल में सच्ची दया होती है, जंगल में एक छोटी-सी सुनहरी चिड़िया जरूर दिखाई देती है।

     

    कहते हैं, वह चिड़िया सोने की नहीं थी।

     

    उसके पंख सुनहरे थे, लेकिन उसका दिल उससे भी ज्यादा कीमती था।

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 48

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 48

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 48 : अभय का नाम सुनकर क्यों कांप गया देवेंद्र?

    देवेंद्र के हाथ से फोन लगभग छूट ही गया।

    स्क्रीन पर सिर्फ एक नाम था—

    “अभय।”

    आरव ने फोन को दोबारा देखा।

    “अभय…?”

    उसकी आवाज में हैरानी थी।

    विहान भी तुरंत आरव के पास आ गया।

    “अभय कौन?”

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “पापा… अभय तो मेरे पिता थे।”

    देवेंद्र की आंखों में दर्द उतर आया।

    “हां।”

    “तो फिर इस मैसेज का मतलब क्या है?”

    देवेंद्र चुप रहा।

    नैना भी अचानक गंभीर हो गईं।

    माधवी ने उनकी तरफ देखा।

    “नैना… अब हमें सच बताना होगा।”

    नैना ने धीरे से सिर हिलाया।

    “हां दीदी।”

    आरव ने बेचैनी से पूछा—

    “कौन-सा सच?”

    नैना ने तीनों भाइयों को अपने पास बुलाया।

    “तुम्हारे पिता अभय की मौत वैसी नहीं हुई थी, जैसी तुम्हें बताई गई।”

    तीनों भाई एक साथ चौंक गए।


    अभय की मौत का सच

    अमन ने पूछा—

    “तो हमारे पिता की मौत कैसे हुई थी?”

    नैना ने गहरी सांस ली।

    “अभय मरा नहीं था।”

    विहान की आंखें फैल गईं।

    “क्या?”

    “जिस आदमी की लाश तुम्हें दिखाई गई थी… वो अभय नहीं था।”

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

    “तो मेरे पिता जिंदा हैं?”

    नैना ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

    देवेंद्र ने कहा—

    “हमें नहीं पता।”

    आरव ने गुस्से में पूछा—

    “आपको नहीं पता?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “पच्चीस साल पहले अभय गायब हो गया था।”

    “और तब से किसी ने उसे नहीं देखा।”

    अमन ने पूछा—

    “तो उसकी मौत की खबर किसने फैलाई?”

    नैना ने राजवीर की तरफ इशारा किया।

    “राजवीर ने।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन अभी जो मैसेज आया है, उसमें लिखा है कि राजवीर को आदेश देने वाला अभय था।”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “यही सबसे बड़ा सवाल है।”


    क्या अभय लौट आया है?

    आरव ने फोन फिर देखा।

    “अगर अभय जिंदा है… तो उसने राजवीर को आदेश क्यों दिया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “शायद वो वही अभय नहीं है जिसे हम जानते थे।”

    आरव ने तुरंत कहा—

    “ऐसा मत कहिए।”

    “मेरे पिता बुरे इंसान नहीं थे।”

    नैना ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

    “मैं जानती हूं।”

    “तुम्हारे पिता ने मुझे बचाने के लिए अपनी जिंदगी खतरे में डाल दी थी।”

    विहान ने पूछा—

    “फिर वो गायब क्यों हुए?”

    नैना की आंखों में दर्द था।

    “क्योंकि उन्होंने एक ऐसा राज जान लिया था, जिसे जानने वाला कोई भी जिंदा नहीं बचता।”

    अमन ने पूछा—

    “क्या राज?”

    नैना ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    देवेंद्र ने धीरे से कहा—

    “तुम तीनों के जन्म का।”

    तीनों भाई चौंक गए।

    आरव ने पूछा—

    “लेकिन हमने तो अभी सब जान लिया।”

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “जो तुम जानते हो… वो पूरी सच्चाई नहीं है।”


    तीन बच्चों का असली रहस्य

    आरव ने बेचैनी से पूछा—

    “तो फिर क्या छुपाया गया है?”

    नैना ने कहा—

    “तुम तीनों का जन्म सिर्फ एक संयोग नहीं था।”

    अमन ने पूछा—

    “मतलब?”

    “तुम तीनों को एक साथ पैदा होने की वजह थी।”

    विहान ने पूछा—

    “किसने तय किया था?”

    नैना ने कहा—

    “तुम्हारे नाना ने।”

    आरव चौंका।

    “नाना?”

    “हां।”

    “उन्होंने तुम्हें एक खास वजह से दुनिया में लाया था।”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “हम कोई योजना नहीं हैं।”

    नैना की आंखों में आंसू आ गए।

    “तुम मेरे बच्चे हो।”

    “लेकिन उस समय हमारे परिवार पर बहुत बड़ा खतरा था।”

    देवेंद्र ने कहा—

    “तुम्हारे नाना ने एक ऐसी संपत्ति बनाई थी, जो सिर्फ तीन वारिसों को मिल सकती थी।”

    अमन ने पूछा—

    “तीन वारिस?”

    “तुम तीनों।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन क्यों?”

    देवेंद्र ने जवाब दिया—

    “क्योंकि तीनों के पास उस संपत्ति की अलग-अलग चाबी थी।”

    आरव ने अपनी जेब में रखी चाबी को देखा।

    “तो ये सिर्फ एक चाबी नहीं है?”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “ये पहली चाबी है।”

    अमन ने पूछा—

    “दूसरी?”

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हारे पास है।”

    अमन ने चौंककर अपनी जेब टटोली।

    उसे एक छोटा सा पुराना सिक्का मिला।

    “ये?”

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    विहान ने पूछा—

    “और तीसरी?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हारे पास है।”

    विहान ने अपने गले में पहना लॉकेट छुआ।

    “ये?”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “यही।”


    तीनों निशान

    तीनों चीजों को एक साथ मेज पर रखा गया।

    चाबी।

    सिक्का।

    और लॉकेट।

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

    फिर अचानक तीनों चीजों पर बने निशान चमकने लगे।

    आरोही ने हैरानी से कहा—

    “ये कैसे?”

    माधवी ने कहा—

    “नैना ने ये सब इतने साल छुपाकर रखा था।”

    नैना ने कहा—

    “मैंने नहीं।”

    सबने उनकी तरफ देखा।

    “तो?”

    नैना ने कहा—

    “ये सब अभय ने छुपाया था।”

    आरव के चेहरे पर हैरानी छा गई।

    “अभय?”

    “हां।”

    “तो वो जिंदा थे?”

    नैना ने कहा—

    “मुझे पूरा विश्वास है कि वो जिंदा थे।”

    तभी कमरे में रखी पुरानी मशीन अचानक चालू हो गई।

    उसमें से एक आवाज आई—

    “अगर तुम तीनों एक साथ ये संदेश सुन रहे हो, तो समझो मैं शायद तुम्हारे पास नहीं हूं।”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    “पापा…”

    वो आवाज अभय की थी।


    अभय की रिकॉर्डिंग

    रिकॉर्डिंग आगे चली—

    “आरव… अमन… विहान…”

    तीनों भाइयों की आंखों में आंसू आ गए।

    “अगर तुम मेरी आवाज सुन रहे हो तो इसका मतलब है कि नैना तुम्हारे पास वापस आ चुकी है।”

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

    अभय की आवाज आगे आई—

    “मैंने तुम तीनों को बचाने के लिए अपनी मौत का नाटक किया।”

    आरव ने आंखें पोंछीं।

    “लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं कितने समय तक छिपा रहूंगा।”

    “राजवीर को लगता है कि मैंने सब कुछ खत्म कर दिया।”

    “लेकिन असली खेल अभी बाकी है।”

    देवेंद्र ने बेचैनी से कहा—

    “अभय…”

    रिकॉर्डिंग में अभय ने कहा—

    “राजवीर सिर्फ एक मोहरा है।”

    आरव की आंखें फैल गईं।

    “तो फिर असली खिलाड़ी कौन है?”

    जैसे ही अभय ये कहने वाला था—

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

    अमन ने मशीन पर हाथ मारा।

    “नहीं!”

    विहान ने कहा—

    “आगे क्यों नहीं चल रहा?”

    देवेंद्र ने मशीन खोली।

    “किसी ने रिकॉर्डिंग का आखिरी हिस्सा निकाल दिया है।”

    आरव ने कहा—

    “किसने?”

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।


    कमरे में कौन था?

    आरोही अचानक बोली—

    “एक मिनट।”

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

    “जब ये रिकॉर्डिंग चली… तब कमरे में हम सब थे।”

    “हां।”

    “लेकिन रिकॉर्डिंग शुरू होने से पहले कमरे में कोई और भी था।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    आरोही ने धीरे से कहा—

    “रुद्र।”

    सबकी नजर रुद्र पर गई।

    रुद्र चुप खड़ा था।

    अमन ने तुरंत उसकी तरफ बंदूक तान दी।

    “रिकॉर्डिंग का हिस्सा कहां है?”

    रुद्र ने कहा—

    “मेरे पास नहीं है।”

    “झूठ!”

    विहान ने कहा—

    “तुम पहले भी हमें धोखा दे चुके हो।”

    रुद्र ने हाथ ऊपर कर दिए।

    “इस बार मैं सच बोल रहा हूं।”

    आरव ने पूछा—

    “तो फिर तुम्हें क्या पता है?”

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

    फिर बोला—

    “अभय जिंदा है।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    आरव ने धीरे से पूछा—

    “कहां?”

    रुद्र ने कहा—

    “मैं नहीं जानता।”

    “लेकिन?”

    रुद्र ने कहा—

    “वो मुझे हर महीने एक संदेश भेजता था।”


    आखिरी संदेश

    “क्या लिखा था?”

    रुद्र ने अपने फोन से एक पुराना संदेश दिखाया।

    उसमें लिखा था—

    “जब मेरे तीनों बेटे एक साथ होंगे, उन्हें पुराने शिव मंदिर तक ले जाना।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन-सा मंदिर?”

    रुद्र ने कहा—

    “शहर से बाहर वाला।”

    नैना अचानक घबरा गईं।

    “नहीं!”

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

    “क्या हुआ?”

    नैना ने कहा—

    “वहां मत जाना।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

    “क्योंकि उसी मंदिर में…”

    वह रुक गईं।

    विहान ने पूछा—

    “क्या?”

    नैना की आंखों से आंसू बह निकले।

    “उसी मंदिर में तुम्हारे पिता अभय को आखिरी बार देखा गया था।”

    आरव ने तुरंत कहा—

    “तो हमें वहीं जाना होगा।”

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “नहीं बेटा।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि अगर अभय वहां है…”

    वह कुछ पल चुप रहीं।

    फिर बोलीं—

    “तो वो अकेला नहीं होगा।”


    मंदिर की ओर

    रात गहरी हो चुकी थी।

    फिर भी आरव, अमन, विहान और आरोही मंदिर जाने के लिए तैयार थे।

    देवेंद्र ने कहा—

    “मैं भी चलूंगा।”

    नैना ने कहा—

    “मैं भी।”

    माधवी ने तुरंत कहा—

    “नैना, तुम्हें नहीं जाना चाहिए।”

    नैना ने कहा—

    “पच्चीस साल भाग चुकी हूं।”

    “अब नहीं।”

    आरव ने मां का हाथ पकड़ लिया।

    “इस बार हम सब साथ चलेंगे।”

    कुछ देर बाद गाड़ियां मंदिर की ओर बढ़ने लगीं।

    रास्ते में आरव चुप था।

    आरोही ने पूछा—

    “क्या सोच रहे हो?”

    “अगर पापा सच में जिंदा हैं…”

    “तो?”

    “मैं उनसे बहुत सारे सवाल पूछूंगा।”

    आरोही मुस्कुराई।

    “और अगर वो तुम्हें गले लगा लें?”

    आरव की आंखें नम हो गईं।

    “तो शायद मेरी जिंदगी पूरी हो जाएगी।”


    मंदिर में इंतजार

    रात के करीब बारह बजे सभी मंदिर पहुंच गए।

    चारों तरफ सन्नाटा था।

    हवा तेज चल रही थी।

    मंदिर के अंदर एक दीपक जल रहा था।

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

    उस तस्वीर में अभय था।

    आरव की आंखें भर आईं।

    “पापा…”

    अचानक मंदिर के पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

    अमन ने बंदूक निकाल ली।

    विहान ने भी हथियार संभाल लिया।

    आरोही आरव के पास खड़ी हो गई।

    देवेंद्र ने सबको पीछे रहने का इशारा किया।

    अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

    चेहरा कपड़े से ढका हुआ था।

    आरव ने कहा—

    “कौन हो?”

    आदमी ने धीरे-धीरे चेहरा खोला।

    तीनों भाइयों की आंखें फैल गईं।

    देवेंद्र के मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला—

    “अभय…”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    “पापा…”

    अभय ने तीनों बेटों को देखा।

    लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।

    बल्कि…

    डर था।

    उसने धीरे से कहा—

    “तुम तीनों को यहां नहीं आना चाहिए था।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    अभय ने पीछे अंधेरे की तरफ देखा।

    फिर बोला—

    “क्योंकि जिसने मुझे इतने साल कैद करके रखा… वो जान चुका है कि तुम तीनों यहां हो।”

    और मंदिर के बाहर अचानक दर्जनों गाड़ियों की हेडलाइट्स दिखाई देने लगीं।

    जारी रहेगा…