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मेरी परछाई

पढ़ने का समय : 6 मिनट

मेरी परछाई दिखाई दे रही है

 

रात के करीब दस बज रहे थे। गाँव की गलियाँ धीरे-धीरे खाली हो चुकी थीं। सिया अपनी मौसी के घर से वापस लौट रही थी। उसके हाथ में एक छोटी-सी टॉर्च थी और रास्ते में पीली रोशनी वाले कुछ पुराने बल्ब जल रहे थे।

 

सिया ने जैसे ही सड़क पर कदम रखा, उसे अपनी परछाई दिखाई दी।

 

वह मुस्कुराई।

 

“कम से कम तुम तो मेरे साथ हो।”

 

लेकिन अगले ही पल उसकी मुस्कान गायब हो गई।

 

सिया की परछाई उसके साथ नहीं चल रही थी।

 

वह सड़क पर आगे बढ़ी, लेकिन परछाई कुछ कदम पीछे रह गई।

 

सिया रुक गई।

 

परछाई भी रुक गई।

 

उसने हाथ उठाया।

 

परछाई ने भी हाथ उठाया।

 

सिया ने धीरे से सिर दाईं तरफ किया।

 

परछाई ने भी किया।

 

“शायद रोशनी की वजह से ऐसा लग रहा है,” उसने खुद से कहा।

 

वह आगे बढ़ने लगी।

 

लेकिन कुछ कदम बाद उसे फिर अजीब बात महसूस हुई।

 

उसकी परछाई अब उसके पीछे नहीं, बल्कि उसके सामने थी।

 

सिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

उसने टॉर्च बंद कर दी।

 

सड़क पर अंधेरा छा गया।

 

फिर उसने टॉर्च दोबारा जलाई।

 

परछाई गायब थी।

 

“ये क्या हो रहा है?”

 

वह तेजी से घर की ओर चलने लगी।

 

जैसे ही वह अपने घर के दरवाजे के पास पहुँची, उसे दीवार पर अपनी परछाई दिखाई दी।

 

लेकिन इस बार वह परछाई उसकी तरह नहीं दिख रही थी।

 

सिया स्थिर खड़ी थी।

 

परछाई धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर दरवाजे की तरफ इशारा कर रही थी।

 

सिया पीछे हट गई।

 

“तुम मुझे क्या बताना चाहती हो?”

 

परछाई ने जैसे दीवार पर एक आकृति बनाई।

 

वह एक पुराने संदूक जैसी लग रही थी।

 

सिया ने घर के अंदर जाकर वही संदूक ढूँढ़ना शुरू किया।

 

कुछ देर बाद उसे वह संदूक अपनी दादी के पुराने कमरे में मिला।

 

संदूक पर मोटा ताला लगा था।

 

सिया को याद आया कि दादी हमेशा कहती थीं—

 

“इस संदूक को कभी मत खोलना।”

 

लेकिन आज उसके मन में एक अजीब सवाल था।

 

उसने ताला खोला।

 

अंदर पुराने कपड़े, कुछ तस्वीरें और एक छोटी डायरी रखी थी।

 

सिया ने डायरी खोली।

 

पहले पन्ने पर उसकी दादी का नाम लिखा था।

 

वह पढ़ने लगी।

 

“अगर कभी तुम्हें अपनी परछाई सामान्य न लगे, तो डरना मत। इसका मतलब है कि वह तुम्हें कुछ याद दिलाना चाहती है।”

 

सिया के हाथ काँप गए।

 

अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“कई साल पहले हमारे परिवार के साथ एक घटना हुई थी। उस घटना का सच इस घर में छिपा है।”

 

सिया आगे पढ़ती गई।

 

दादी ने लिखा था कि कई साल पहले गाँव में एक लड़की रहती थी, जिसका नाम नैना था। वह सिया की दादी की छोटी बहन थी।

 

एक रात नैना अचानक गायब हो गई थी।

 

गाँव वालों ने बहुत खोजा, लेकिन उसका पता नहीं चला।

 

दादी ने कभी किसी को नहीं बताया कि नैना के गायब होने से पहले उसने उनसे क्या कहा था।

 

सिया ने अगला पन्ना पलटा।

 

वहाँ लिखा था—

 

“नैना ने कहा था कि उसने पुराने कुएँ के पास किसी को देखा है। लेकिन वह इंसान नहीं था। वह उसकी अपनी परछाई जैसा था।”

 

सिया डर गई।

 

अचानक कमरे की दीवार पर फिर उसकी परछाई दिखाई दी।

 

लेकिन इस बार परछाई दरवाजे की ओर नहीं, खिड़की की ओर इशारा कर रही थी।

 

सिया ने खिड़की खोली।

 

बाहर आँगन में चाँदनी फैली थी।

 

उसे जमीन पर कुछ चमकता दिखाई दिया।

 

वह बाहर गई।

 

वहाँ एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

 

सिया ने उसे उठाया।

 

उसे याद आया कि दादी के पुराने फोटो में नैना के पैर में बिल्कुल ऐसी ही पायल थी।

 

“तो नैना यहाँ आई थी?”

 

तभी पीछे से आवाज आई—

 

“सिया!”

 

वह घबराकर पलटी।

 

उसकी माँ खड़ी थीं।

 

सिया ने सब कुछ बता दिया।

 

माँ कुछ देर चुप रहीं।

 

फिर बोलीं, “तुम्हारी दादी ने इस बात को सालों तक अपने दिल में रखा था।”

 

“लेकिन नैना के साथ हुआ क्या था?”

 

माँ ने कहा, “किसी को नहीं पता।”

 

अगले दिन सिया अपनी माँ के साथ पुराने कुएँ के पास गई।

 

कुएँ के आसपास झाड़ियाँ उगी हुई थीं।

 

सिया ने जमीन पर वही परछाई देखी।

 

इस बार परछाई कुएँ के पीछे बने पत्थर की दीवार की ओर इशारा कर रही थी।

 

दोनों ने वहाँ मिट्टी हटाई।

 

कुछ ही देर में उन्हें एक पुराना लकड़ी का बक्सा मिला।

 

बक्से के अंदर कुछ तस्वीरें और एक पत्र था।

 

पत्र नैना का था।

 

उसमें लिखा था कि उसने गाँव छोड़ने का फैसला किया था क्योंकि उसे डर था कि एक जमीन के विवाद में कुछ लोग उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं। उसने अपनी बड़ी बहन यानी सिया की दादी को पत्र लिखा था, लेकिन वह पत्र कभी उन्हें मिला ही नहीं।

 

पत्र के आखिर में लिखा था—

 

“अगर मैं वापस न आऊँ तो मेरी चीजें संभालकर रखना। मैं चाहती हूँ कि एक दिन सच सबके सामने आए।”

 

सिया की माँ की आँखों में आँसू आ गए।

 

अब परिवार को समझ आया कि नैना के गायब होने के पीछे कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं थी।

 

उस समय की परिस्थितियों और डर के कारण उसने गाँव छोड़ दिया था।

 

लेकिन फिर वह गई कहाँ?

 

यह सवाल अभी भी बाकी था।

 

सिया ने पत्र को ध्यान से देखा।

 

उसके पीछे एक छोटे शहर का पता लिखा था।

 

परिवार ने उस पते पर संपर्क किया।

 

कई दिनों बाद उन्हें जवाब मिला।

 

वहाँ रहने वाली एक वृद्ध महिला ने बताया कि नैना कई साल पहले उनके शहर में आई थी। उसने अपना नाम बदल लिया था और वहीं अपना जीवन शुरू किया था।

 

सबसे बड़ी बात—वह जीवित थी।

 

सिया की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

 

कुछ दिनों बाद नैना अपने पुराने गाँव लौटी।

 

वह बहुत बूढ़ी हो चुकी थी, लेकिन अपनी बहन को देखते ही दोनों एक-दूसरे से गले मिलकर रो पड़ीं।

 

सिया दूर खड़ी सब देख रही थी।

 

नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“तुम वही बच्ची हो?”

 

सिया मुस्कुराई।

 

“मैं अब बड़ी हो गई हूँ।”

 

नैना ने पूछा, “तुम्हें मेरा पता कैसे मिला?”

 

सिया ने दीवार की तरफ देखा।

 

वहाँ उसकी परछाई बिल्कुल सामान्य थी।

 

वह बोली, “मेरी परछाई मुझे आपके पास ले आई।”

 

नैना हल्के से हँसी।

 

“कभी-कभी हमारी परछाई डराने नहीं आती। वह उन बातों की तरफ इशारा करती है जिन्हें हम भूल चुके होते हैं।”

 

उस रात सिया अपने कमरे में बैठी थी।

 

चाँदनी खिड़की से अंदर आ रही थी।

 

दीवार पर उसकी परछाई साफ दिखाई दे रही थी।

 

सिया ने हाथ उठाया।

 

परछाई ने भी हाथ उठाया।

 

अब सब सामान्य था।

 

सिया मुस्कुराई और धीरे से बोली—

 

“अब मुझे तुमसे डर नहीं लगता।”

 

उस दिन से उसने समझ लिया था कि हर रहस्य भूत या डर से जुड़ा नहीं होता।

 

कभी-कभी अतीत की कोई अधूरी कहानी हमारे सामने परछाई बनकर खड़ी हो जाती है।

 

और जब हम उस परछाई से डरने के बजाय उसका पीछा करते हैं, तो उसके पीछे छिपा सच सामने आ जाता है।

 

क्योंकि परछाई हमेशा डर का संकेत नहीं होती… कभी-कभी वह उस सच का रास्ता होती है, जिसे रोशनी में आने का इंतजार होता है।

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