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टिफिन से निकला हैरानी वाला

पढ़ने का समय : 5 मिनट

एक बच्चे के टिफिन से निकला ऐसा कि सब हैरान रह गए

 

शहर के एक छोटे-से स्कूल में आरव नाम का दस साल का बच्चा पढ़ता था। वह बहुत शांत स्वभाव का था। पढ़ाई में ठीक था, खेलकूद में भी अच्छा था, लेकिन उसकी एक आदत सबको थोड़ी अजीब लगती थी—वह रोज अपना टिफिन अकेले में खाता था।

 

बाकी बच्चे मैदान में या अपनी कक्षा के बाहर दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाते, लेकिन आरव अक्सर स्कूल के पीछे लगे पुराने नीम के पेड़ के पास चला जाता।

 

उसकी दोस्त मीरा ने एक दिन पूछा, “तुम रोज यहाँ अकेले क्यों आते हो?”

 

आरव मुस्कुराकर बोला, “बस ऐसे ही।”

 

“टिफिन में ऐसा क्या होता है जो किसी को दिखाना नहीं चाहते?”

 

आरव ने तुरंत टिफिन बंद कर दिया।

 

“कुछ नहीं।”

 

मीरा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ।

 

अगले दिन लंच की घंटी बजते ही सभी बच्चे अपने-अपने टिफिन खोलकर बैठ गए। आरव फिर नीम के पेड़ के नीचे चला गया।

 

मीरा चुपचाप उसके पीछे चली गई।

 

आरव ने इधर-उधर देखा और टिफिन खोला।

 

मीरा दूर से देख रही थी।

 

अचानक टिफिन के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

 

“चूँ… चूँ…”

 

मीरा की आँखें बड़ी हो गईं।

 

“आरव!”

 

आरव घबरा गया।

 

“तुम यहाँ कैसे आई?”

 

मीरा ने टिफिन की तरफ इशारा किया।

 

“तुम्हारे टिफिन से आवाज क्यों आ रही है?”

 

आरव कुछ बोलता, उससे पहले टिफिन का ढक्कन थोड़ा-सा हिला।

 

मीरा पीछे हट गई।

 

“इसके अंदर क्या है?”

 

आरव ने धीरे से ढक्कन खोला।

 

अंदर खाने के पास एक बहुत छोटा-सा घायल गौरैया का बच्चा बैठा था।

 

उसके पंखों पर धूल लगी थी और वह ठीक से उड़ नहीं पा रहा था।

 

मीरा हैरान रह गई।

 

“तुम इसे टिफिन में लेकर आते हो?”

 

आरव ने सिर झुका लिया।

 

“मैंने इसे तीन दिन पहले स्कूल के बाहर देखा था। यह जमीन पर गिरा हुआ था। मुझे डर लगा कि कोई इसे कुचल देगा। मैं इसे घर ले जाना चाहता था, लेकिन माँ ने कहा कि स्कूल के पास ही इसके लिए सुरक्षित जगह बना दूँ। इसलिए मैं रोज इसे थोड़ा खाना और पानी देता हूँ।”

 

मीरा ने प्यार से गौरैया को देखा।

 

“लेकिन टिफिन में क्यों?”

 

आरव बोला, “क्योंकि घर से निकलते समय मेरे पास कोई दूसरा डिब्बा नहीं था। मुझे लगा था कि थोड़ी देर के लिए इसमें रख दूँगा। फिर इसे पेड़ के पास छोड़ दूँगा।”

 

मीरा ने कहा, “तुम्हें टीचर को बताना चाहिए था।”

 

आरव ने डरते हुए कहा, “मुझे लगा वे इसे बाहर छोड़ देंगे।”

 

तभी पीछे से आवाज आई—

 

“यहाँ क्या हो रहा है?”

 

दोनों ने पलटकर देखा।

 

उनकी कक्षा की शिक्षिका सीमा मैडम वहाँ खड़ी थीं।

 

मीरा ने सारी बात बता दी।

 

मैडम ने गौरैया के बच्चे को देखा और तुरंत कहा, “इसे टिफिन में रखना ठीक नहीं है। इसे सुरक्षित और खुली जगह चाहिए।”

 

आरव परेशान हो गया।

 

“मैडम, इसे बचा लीजिए।”

 

सीमा मैडम मुस्कुराईं।

 

“हम सब मिलकर इसे बचाएँगे।”

 

उन्होंने स्कूल के माली को बुलाया। नीम के पेड़ की एक सुरक्षित शाखा पर एक छोटा-सा घोंसला बनाया गया। गौरैया के बच्चे को उसमें रखा गया और पास में पानी भी रखा गया।

 

अगले दिन जब आरव स्कूल आया, तो उसने देखा कि घोंसले के पास एक बड़ी गौरैया बैठी थी।

 

“मैडम! शायद इसकी माँ आ गई!”

 

सब बच्चे खुशी से वहाँ जमा हो गए।

 

लेकिन तभी एक और हैरान करने वाली बात हुई।

 

वह बड़ी गौरैया उड़कर स्कूल की खिड़की पर गई और कुछ देर वहीं बैठी रही। फिर वह नीम के पेड़ के पास लौट आई।

 

आरव चुपचाप उसे देखता रहा।

 

सीमा मैडम बोलीं, “लगता है उसे पता है कि उसके बच्चे को किसने बचाया।”

 

अगले कुछ दिनों तक स्कूल के बच्चे उस छोटे पक्षी की देखभाल करने लगे।

 

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

 

एक सप्ताह बाद स्कूल में वार्षिक कार्यक्रम था। सभी बच्चे अपने माता-पिता के साथ आए थे। मंच के पीछे सजावट की जा रही थी।

 

तभी अचानक बिजली चली गई।

 

स्कूल का पिछला हिस्सा अंधेरे में डूब गया।

 

उसी समय एक बच्चा चिल्लाया—

 

“कोई अंदर फँसा है!”

 

पता चला कि स्कूल की स्टोर रूम में एक छोटा बच्चा खेलते-खेलते चला गया था और दरवाजा गलती से बंद हो गया था।

 

शिक्षक उसे ढूँढ़ रहे थे, लेकिन अंधेरा होने के कारण कुछ समझ नहीं आ रहा था।

 

आरव को अचानक नीम के पेड़ की तरफ से गौरैया की तेज आवाज सुनाई दी।

 

वह पेड़ के पास गया।

 

गौरैया बार-बार उड़कर स्कूल के पीछे बने स्टोर रूम की खिड़की की तरफ जा रही थी।

 

आरव चिल्लाया, “मैडम! यह उधर जा रही है!”

 

सब लोग उसके पीछे गए।

 

स्टोर रूम की छोटी खिड़की के पास पहुँचकर उन्हें अंदर से बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी।

 

तुरंत दरवाजा खोला गया और बच्चे को बाहर निकाल लिया गया।

 

सभी ने राहत की साँस ली।

 

आरव ने उस छोटी गौरैया की तरफ देखा।

 

“तुमने फिर मदद कर दी।”

 

सीमा मैडम ने आरव के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “आज तुम्हारे टिफिन से निकली छोटी-सी जान ने पूरे स्कूल को हैरान कर दिया।”

 

सभी बच्चे हँसने लगे।

 

मीरा बोली, “और मुझे तो पहले लगा था कि आरव अपने टिफिन में कोई रहस्यमयी चीज छिपाकर लाता है।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“रहस्यमयी तो थी।”

 

“क्या?”

 

आरव ने गौरैया की तरफ देखकर कहा—

 

“उसमें एक छोटी-सी जान थी, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था।”

 

उस दिन स्कूल में एक नया नियम बनाया गया।

 

हर कक्षा में पक्षियों के लिए पानी का बर्तन रखा जाएगा और स्कूल के पेड़ों को बिना जरूरत नहीं काटा जाएगा।

 

आरव का टिफिन भी अब पहले जैसा नहीं रहा था।

 

पहले उसमें सिर्फ खाना होता था।

 

अब उसमें एक छोटी-सी कहानी छिपी थी—एक ऐसी कहानी, जिसने पूरे स्कूल को सिखाया कि किसी छोटी-सी जान की मदद करना भी बहुत बड़ा काम हो सकता है।

 

और सबसे खास बात यह थी कि जिस टिफिन को देखकर एक दिन सब हैरान हुए थे, उसी टिफिन ने बच्चों को एक बहुत बड़ी सीख दी—

 

दया कभी छोटी नहीं होती। कभी-कभी हमारी छोटी-सी मदद किसी की पूरी दुनिया बचा सकती है।

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