🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

तुमसे वास्ता

पढ़ने का समय : 6 मिनट

मेरे तुमसे वास्ता

 

शहर के एक छोटे से मोहल्ले में आरव नाम का लड़का रहता था। वह बहुत शांत और कम बोलने वाला था। उसके पड़ोस में नैना रहती थी। दोनों बचपन से एक-दूसरे को जानते थे, लेकिन उनकी दोस्ती धीरे-धीरे एक खास रिश्ते में बदल गई थी—ऐसा रिश्ता जिसमें बिना कहे भी बहुत कुछ समझ आ जाता था।

 

नैना अक्सर आरव से कहती, “तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”

 

आरव मुस्कुराकर कहता, “क्योंकि तुम मेरी तरफ से भी बोल देती हो।”

 

नैना हँस पड़ती।

 

दोनों रोज शाम को मोहल्ले के पुराने पार्क में मिलते। कभी पढ़ाई की बातें होतीं, कभी भविष्य के सपने, और कभी बिना किसी खास वजह के घंटों बातें चलती रहतीं।

 

एक दिन नैना ने पूछा, “अगर मैं कभी बहुत दूर चली गई तो?”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला, “तो भी तुमसे मेरा वास्ता रहेगा।”

 

“कैसे?”

 

“यादों से।”

 

नैना ने हँसकर कहा, “बहुत फिल्मी हो।”

 

आरव भी हँस पड़ा।

 

लेकिन दोनों को नहीं पता था कि कुछ ही दिनों बाद यह बात उनके लिए सच बनने वाली थी।

 

नैना के पिता का दूसरे शहर में तबादला हो गया। पूरे परिवार को वहाँ जाना था।

 

नैना ने जब आरव को बताया तो उसकी आँखों में उदासी थी।

 

“मुझे अगले हफ्ते जाना है।”

 

आरव ने खुद को संभालते हुए पूछा, “इतनी जल्दी?”

 

“हाँ।”

 

कुछ देर दोनों चुप रहे।

 

फिर नैना ने कहा, “तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“वादा?”

 

“वादा।”

 

अगले हफ्ते नैना अपने परिवार के साथ चली गई।

 

पार्क वही था, पेड़ वही थे, लेकिन आरव को सब कुछ खाली-खाली लगता था।

 

वह रोज उसी बेंच पर बैठता जहाँ दोनों बैठा करते थे।

 

कुछ महीने बीत गए।

 

पहले दोनों फोन पर बात करते रहे, लेकिन धीरे-धीरे पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियों के कारण बातचीत कम होने लगी।

 

एक दिन आरव को नैना का संदेश मिला—

 

“तुम ठीक हो?”

 

आरव ने लिखा—

 

“हाँ। तुम?”

 

नैना ने जवाब दिया—

 

“मैं भी।”

 

बस इतनी-सी बात हुई।

 

आरव फोन रखकर सोचने लगा कि कभी दोनों घंटों बातें करते थे, और आज दो शब्द भी मुश्किल से निकलते हैं।

 

समय गुजरता गया।

 

आरव ने पढ़ाई पूरी की और अपने पिता की छोटी-सी दुकान संभालने लगा।

 

एक दिन दुकान पर एक बुजुर्ग महिला आईं।

 

उन्होंने कुछ सामान खरीदा और जाते-जाते एक पुराना लिफाफा गिरा दिया।

 

आरव ने लिफाफा उठाकर उन्हें दिया।

 

महिला ने कहा, “बेटा, धन्यवाद। इसमें मेरे लिए बहुत जरूरी चीज है।”

 

आरव ने पूछा, “क्या?”

 

महिला मुस्कुराईं।

 

“मेरे पति की पुरानी चिट्ठियाँ।”

 

आरव ने पहली बार महसूस किया कि कुछ चीजों की कीमत पैसे से नहीं होती।

 

उसी शाम उसे नैना की याद आई।

 

उसने फोन उठाया, लेकिन कॉल नहीं किया।

 

वह सोचने लगा, “शायद अब हमारे रास्ते अलग हैं।”

 

कुछ दिनों बाद आरव के पास एक पत्र आया।

 

पत्र नैना का था।

 

उसने लिखा था कि उसके पिता की नौकरी फिर से बदल गई है और अब वह अपने पुराने शहर लौटने वाली है।

 

आरव ने पत्र पढ़कर कई बार देखा।

 

उसके मन में पुरानी यादें ताजा हो गईं।

 

कुछ दिनों बाद नैना वापस आ गई।

 

लेकिन इस बार वह पहले जैसी नहीं थी।

 

वह अधिक समझदार और शांत हो गई थी।

 

दोनों पार्क में मिले।

 

नैना ने मुस्कुराकर कहा, “बहुत बदल गए हो।”

 

आरव बोला, “तुम भी।”

 

“मुझे लगा था तुम मुझे भूल गए।”

 

“तुम्हें क्या लगता है, मैं इतना जल्दी भूल सकता हूँ?”

 

नैना ने कुछ नहीं कहा।

 

दोनों कुछ देर चुपचाप बैठे रहे।

 

फिर नैना बोली, “तुम्हें याद है, मैंने पूछा था कि अगर मैं दूर चली गई तो?”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“और मैंने कहा था—मेरे तुमसे वास्ता रहेगा।”

 

नैना की आँखें नम हो गईं।

 

“वो बात मुझे हमेशा याद रही।”

 

आरव ने कहा, “लेकिन एक बात मैंने वहाँ से लौटकर समझी।”

 

“क्या?”

 

“रिश्ते सिर्फ रोज बात करने से नहीं बने रहते। अगर दिल में किसी की जगह सच्ची हो, तो दूरी भी उसे खत्म नहीं कर सकती।”

 

नैना ने धीरे से कहा, “शायद इसी वजह से मैं वापस आकर सबसे पहले तुमसे मिलने आई।”

 

दोनों के बीच फिर से दोस्ती की वही गर्माहट लौटने लगी।

 

लेकिन इस बार वे पहले से ज्यादा समझदार थे।

 

अब वे एक-दूसरे से हर दिन बात करने की जिद नहीं करते थे। जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे का साथ देते थे।

 

एक दिन आरव की दुकान में अचानक बड़ा नुकसान हो गया। वह बहुत परेशान था।

 

नैना को पता चला तो उसने कहा, “तुम अकेले क्यों परेशान हो रहे हो?”

 

आरव बोला, “मैं संभाल लूँगा।”

 

नैना ने कहा, “मुझे पता है। लेकिन किसी अपने का साथ लेना कमजोरी नहीं होती।”

 

उसने आरव के साथ मिलकर दुकान का हिसाब देखा। दोनों ने मिलकर नुकसान का कारण समझा और धीरे-धीरे दुकान फिर संभल गई।

 

कुछ महीने बाद नैना को फिर दूसरे शहर में नौकरी का मौका मिला।

 

इस बार उसने आरव से कहा, “मैं फिर जा रही हूँ।”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

नैना ने पूछा, “इस बार भी कहोगे कि हमारा वास्ता रहेगा?”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“अब कहने की जरूरत नहीं है। हम दोनों जानते हैं।”

 

नैना की आँखों में खुशी थी।

 

“सच।”

 

आरव बोला, “रिश्ता पास रहने से नहीं, भरोसे से चलता है।”

 

नैना चली गई।

 

लेकिन इस बार दोनों को डर नहीं था।

 

वे जानते थे कि जिंदगी उन्हें जहाँ भी ले जाए, उनके बीच सम्मान, विश्वास और अपनापन बना रहेगा।

 

कई साल बाद नैना फिर अपने शहर आई।

 

वह सीधे उसी पुराने पार्क में गई।

 

आरव पहले से वहाँ बैठा उसका इंतजार कर रहा था।

 

नैना ने हँसकर पूछा, “तुम्हें कैसे पता मैं यहाँ आऊँगी?”

 

आरव बोला, “कुछ जगहें हमें बुलाती नहीं, बस हमारा इंतजार करती हैं।”

 

दोनों उसी पुरानी बेंच पर बैठ गए।

 

नैना ने कहा, “कितना कुछ बदल गया।”

 

आरव ने पेड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “हाँ, लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलीं।”

 

“जैसे?”

 

आरव ने उसकी तरफ देखकर कहा—

 

“मेरे तुमसे वास्ता।”

 

नैना मुस्कुरा दी।

 

उसे अब समझ आ चुका था कि सच्चे रिश्तों को रोज साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती।

 

वे समय, दूरी और परिस्थितियों से गुजरकर और मजबूत होते हैं।

 

उनकी कहानी किसी बड़े वादे या दिखावे की कहानी नहीं थी।

 

वह बस दो ऐसे लोगों की कहानी थी, जिन्होंने एक-दूसरे की जिंदगी में जगह बनाई और फिर उस जगह का सम्मान करना सीखा।

 

क्योंकि कुछ रिश्ते नाम से नहीं, एहसास से पहचाने जाते हैं। और जिनसे दिल का सच्चा वास्ता हो, उनसे दूरी चाहे जितनी हो जाए, रिश्ता कभी सच में दूर नहीं होता।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *