एपिसोड – 51 : पुरानी हवेली का बंद कमरा
पुरानी हवेली के सामने खड़ी काली गाड़ी का इंजन बंद हो चुका था।
चारों तरफ अंधेरा था।
हवा इतनी तेज चल रही थी कि हवेली की टूटी खिड़कियां बार-बार आपस में टकरा रही थीं।
आरव ने हवेली के खुले दरवाजे को देखा।
अंदर से विक्रम की आवाज अब भी गूंज रही थी—
“आओ आरव… तुम्हारा इंतजार था।”
आरव ने एक कदम आगे बढ़ाया।
शेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“क्या हुआ?”
शेखर ने धीमी आवाज में कहा—
“इस हवेली में कदम रखने के बाद वापस निकलना आसान नहीं होगा।”
आरव ने कहा—
“अंदर आरोही है।”
“मुझे पता है।”
“तो मैं उसे छोड़कर नहीं जा सकता।”
शेखर ने उसकी आंखों में देखा।
“इसीलिए विक्रम ने उसे चुना है।”
आरव कुछ नहीं बोला।
उसने अपनी मुट्ठी बांधी और हवेली के अंदर चला गया।
—
हवेली के अंदर
हवेली के अंदर कदम रखते ही दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
आरव ने पीछे देखा।
“शेखर?”
शेखर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।
लेकिन दरवाजा नहीं खुला।
“ये लॉक हो गया है।”
आरव ने कहा—
“मतलब हम फंस गए।”
शेखर ने चारों तरफ देखा।
“हां।”
तभी सामने की दीवार पर लगी सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।
सामने एक बड़ा कमरा दिखाई दिया।
कमरे के बीच में एक कुर्सी पर आरोही बैठी थी।
उसके हाथ बंधे हुए थे।
आरव की आंखें फैल गईं।
“आरोही!”
आरोही ने सिर उठाया।
“आरव!”
आरव उसकी तरफ दौड़ना चाहता था, लेकिन शेखर ने उसे रोक लिया।
“रुको!”
“क्यों?”
“कुछ गड़बड़ है।”
आरोही ने जोर से कहा—
“आरव, पास मत आना!”
आरव वहीं रुक गया।
“आरोही?”
उसने कांपती आवाज में कहा—
“फर्श के नीचे कुछ है।”
आरव ने नीचे देखा।
फर्श पर छोटे-छोटे लाल निशान बने थे।
शेखर ने तुरंत कहा—
“पीछे हटो!”
अगले ही पल फर्श के कुछ हिस्से से बिजली की चिंगारी निकली।
अगर आरव एक कदम और आगे बढ़ता…
तो शायद वह बच नहीं पाता।
—
विक्रम सामने आया
ऊपर की बालकनी से तालियों की आवाज आई।
ताली… ताली… ताली…
विक्रम धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।
उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
“शाबाश, शेखर।”
शेखर ने बंदूक निकाल ली।
“खेल खत्म हो चुका है, विक्रम।”
विक्रम हंस पड़ा।
“तुम अब भी खुद को हीरो समझते हो?”
“बीस साल तक मेरे साथ रहकर मेरे खिलाफ सबूत जमा करते रहे।”
“लेकिन आखिर में यहां आए किसके साथ?”
शेखर ने कहा—
“आरव के साथ।”
विक्रम ने आरव की तरफ देखा।
“मुझे पता था।”
आरव ने गुस्से में पूछा—
“आरोही को क्यों उठाया?”
विक्रम ने कहा—
“क्योंकि तुम्हें यहां लाने का यही एक तरीका था।”
“तुम्हें क्या चाहिए?”
विक्रम धीरे-धीरे आरव के पास आया।
“तुम्हारे पास जो चाबी है।”
आरव ने अपनी जेब पर हाथ रखा।
“ये?”
“हां।”
“और अगर मैं नहीं दूं?”
विक्रम मुस्कुराया।
“तो आरोही मरेगी।”
आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।
“उसे हाथ भी मत लगाना।”
विक्रम ने कहा—
“तुम्हें अपनी कमजोरी का पता भी नहीं है, आरव।”
आरव ने आरोही की तरफ देखा।
आरोही ने आंखों से इशारा किया—
“चाबी मत देना।”
आरव समझ गया।
—
आरोही का इशारा
विक्रम ने आरोही की तरफ देखा।
“क्या कहा उसने?”
आरव ने कहा—
“कुछ नहीं।”
विक्रम आरोही के पास गया।
“तुम्हें लगता है तुम्हारा हीरो तुम्हें बचा लेगा?”
आरोही ने बिना डरे कहा—
“मुझे अपने आरव पर पूरा भरोसा है।”
विक्रम का चेहरा कठोर हो गया।
“प्यार।”
“यही सबसे बड़ी कमजोरी होती है।”
आरोही ने मुस्कुराकर कहा—
“नहीं।”
“प्यार इंसान को कमजोर नहीं… मजबूत बनाता है।”
विक्रम ने उसे घूरा।
आरव की आंखों में गर्व था।
—
छुपा हुआ संदेश
अचानक शेखर ने आरव के कान में धीरे से कहा—
“तुम्हारी मां ने जो लॉकेट दिया था, उसमें सिर्फ चिप नहीं थी।”
आरव ने पूछा—
“और क्या?”
“एक ट्रैकिंग डिवाइस।”
आरव की आंखें फैल गईं।
“तो?”
शेखर ने कहा—
“नैना को पता है कि हम यहां हैं।”
आरव ने तुरंत अपना फोन निकाला।
सिग्नल नहीं था।
शेखर मुस्कुराया।
“फोन से नहीं।”
उसने आरव की घड़ी की तरफ इशारा किया।
“उसमें।”
आरव ने अपनी घड़ी देखी।
उसकी स्क्रीन पर एक छोटा लाल निशान चमक रहा था।
LOCATION SHARED.
आरव ने राहत की सांस ली।
“मां हमें ढूंढ रही हैं।”
—
विक्रम की असली मांग
विक्रम ने कहा—
“चाबी दो।”
आरव ने कहा—
“पहले आरोही को छोड़ो।”
विक्रम हंसा।
“तुम्हें लगता है मैं इतना मूर्ख हूं?”
“चाबी पहले।”
आरव ने चाबी निकाल ली।
विक्रम की नजर चाबी पर टिक गई।
लेकिन तभी शेखर ने गोली चला दी।
धांय!
विक्रम पीछे हट गया।
आरव दौड़कर आरोही के पास पहुंचा।
उसने उसके हाथ खोले।
“तुम ठीक हो?”
आरोही ने सिर हिलाया।
“हां।”
“बहुत डर गई थी?”
आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“तुम आ गए थे ना।”
आरव ने उसे गले लगा लिया।
“मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”
लेकिन तभी…
धांय!
एक गोली दीवार से टकराई।
विक्रम वहां नहीं था।
शेखर ने चारों तरफ देखा।
“वो भाग गया।”
आरव ने कहा—
“उसे जाने दो।”
शेखर ने पूछा—
“क्यों?”
आरव ने कहा—
“क्योंकि अब हमें पता है वो क्या चाहता है।”
आरोही ने पूछा—
“क्या?”
आरव ने चाबी अपनी जेब से निकाली।
“ये।”
—
लेकिन चाबी नकली थी
विक्रम की आवाज अचानक पूरे कमरे में गूंजी—
“आरव…”
“तुमने मुझे जो चाबी दी थी…”
“वो नकली थी।”
आरव चौंक गया।
विक्रम सामने नहीं था।
लेकिन उसकी आवाज चारों तरफ से आ रही थी।
“तुम बहुत चालाक हो गए हो।”
“लेकिन तुम्हें अभी ये नहीं पता कि असली चाबी किसके पास है।”
आरोही ने पूछा—
“किसके?”
विक्रम ने कहा—
“तुम्हारे पास।”
आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मेरे पास?”
“तुम्हारे लॉकेट में।”
आरोही ने तुरंत अपना लॉकेट पकड़ लिया।
आरव ने कहा—
“नहीं।”
विक्रम हंसा।
“तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लॉकेट में सिर्फ सबूत नहीं छुपाया था।”
“उन्होंने असली चाबी छुपाई थी।”
शेखर ने कहा—
“तो इसी वजह से उसने आरोही को अगवा किया था।”
विक्रम की आवाज आई—
“बिल्कुल।”
—
लॉकेट का दूसरा राज
आरव ने आरोही का लॉकेट देखा।
“इसे खोलो।”
आरोही ने लॉकेट खोला।
अंदर लगी छोटी सी धातु की प्लेट हटाने पर एक बेहद छोटी चाबी दिखाई दी।
अमन की कही बात आरव को याद आई—
“तीनों के पास अलग-अलग चाबी है।”
आरव ने धीरे से कहा—
“तो हमारे पास तीन चाबियां थीं।”
शेखर ने कहा—
“और अब ये तीनों मिलकर कुछ खोलेंगी।”
आरोही ने पूछा—
“क्या?”
तभी पीछे से आवाज आई—
“एक ऐसी जगह… जहां तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।”
सबने पीछे देखा।
दरवाजे पर नैना खड़ी थीं।
उनके साथ देवेंद्र, माधवी, अमन और विहान भी थे।
आरोही की आंखों में खुशी आ गई।
“मां…”
नैना ने कहा—
“हम तुम्हें लेने आए हैं।”
आरव ने पूछा—
“आपको पता था हम यहां हैं?”
नैना मुस्कुराईं।
“तुम्हारी घड़ी ने सब बता दिया।”
—
विक्रम फिर सामने आया
अचानक हवेली की सारी लाइटें बंद हो गईं।
अंधेरा छा गया।
फिर विक्रम की आवाज आई—
“तुम सब यहां आ गए।”
नैना ने कहा—
“हां।”
“अब तुम्हारा खेल खत्म।”
विक्रम हंसा।
“नैना… तुम्हें लगता है कि पच्चीस साल पहले मैं हार गया था?”
“नहीं।”
“तुम सिर्फ भागी थीं।”
नैना ने कहा—
“लेकिन इस बार मैं नहीं भागूंगी।”
अचानक सामने स्क्रीन जल उठी।
उस पर एक लाइव वीडियो चल रहा था।
वीडियो में राजवीर जेल के कमरे में बैठा था।
उसके सामने एक आदमी खड़ा था।
आरव ने ध्यान से देखा।
“ये कौन है?”
नैना का चेहरा अचानक बदल गया।
देवेंद्र भी स्तब्ध रह गया।
विहान ने पूछा—
“मां?”
नैना की आंखों से आंसू निकल आए।
“नहीं…”
आरव ने पूछा—
“क्या हुआ?”
नैना ने कांपती आवाज में कहा—
“ये आदमी… तुम्हारे नाना हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव ने स्क्रीन को देखा।
“लेकिन आपने कहा था नाना की मौत हो चुकी है।”
नैना ने कहा—
“हमें भी यही लगता था।”
स्क्रीन पर वो आदमी धीरे-धीरे कैमरे की तरफ मुड़ा।
उसके चेहरे पर वही पुरानी कठोरता थी।
और उसने कहा—
“मेरे बच्चों… बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे ढूंढने में।”
आरव की सांस रुक गई।
विहान पीछे हट गया।
अमन ने अविश्वास से कहा—
“तो इतने सालों से हमारे नाना जिंदा थे?”
नैना ने सिर हिलाया।
“हां।”
फिर स्क्रीन पर विक्रम दिखाई दिया।
विक्रम ने कहा—
“अब तुम्हें चुनना होगा—तुम अपने नाना को बचाओगे या इस हवेली के अंदर छिपा वो सच खोजोगे, जिसके लिए तुम तीनों पैदा हुए थे।”
आरव ने मुट्ठी भींच ली।
उसकी नजर पहले अपनी मां पर गई…
फिर आरोही पर…
और आखिर में स्क्रीन पर मौजूद अपने नाना पर।
उसे पहली बार समझ आया—
ये लड़ाई सिर्फ उसके परिवार की नहीं थी।
इसके पीछे एक ऐसा राज था…
जो उसकी और आरोही की पूरी जिंदगी बदल सकता था।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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