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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 50

पढ़ने का समय : 10 मिनट

 तेरी मेरी दास्तान

 

एपिसोड – 50 : आरोही के पिता का रहस्य

 

अभय के हाथ में पकड़ा फोन कांप रहा था।

 

स्क्रीन पर एक तस्वीर थी।

 

तस्वीर में एक आदमी खड़ा था।

 

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

 

और उसके पीछे राजवीर खड़ा था।

 

लेकिन आरव की नजर उस आदमी पर नहीं…

 

उसके साथ खड़ी एक छोटी बच्ची पर थी।

 

आरव ने ध्यान से देखा।

 

वो बच्ची बिल्कुल आरोही जैसी दिख रही थी।

 

आरव ने हैरानी से पूछा—

 

“ये… आरोही है?”

 

अभय ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरोही की सांस रुक गई।

 

“लेकिन ये तस्वीर कब की है?”

 

अभय ने कहा—

 

“लगभग बीस साल पुरानी।”

 

आरोही ने तस्वीर अपने हाथ में ले ली।

 

“मुझे कुछ याद क्यों नहीं?”

 

अभय ने गंभीर आवाज में कहा—

 

“क्योंकि तुम्हें याद रखने ही नहीं दिया गया।”

 

आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

 

“मेरे साथ भी वही हुआ… जो आपके बच्चों के साथ हुआ?”

 

नैना ने धीरे से कहा—

 

“शायद उससे भी ज्यादा।”

 

 

 

आरोही के पिता कौन थे?

 

आरव ने अभय की तरफ देखा।

 

“आप जानते हैं इनके पिता को?”

 

“हां।”

 

“कौन थे?”

 

अभय कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला—

 

“उनका नाम था… समर प्रताप।”

 

आरोही ने सिर हिलाया।

 

“मेरे पापा का नाम समर ही था।”

 

“लेकिन वो तो…”

 

वह रुक गई।

 

आरव ने पूछा—

 

“क्या हुआ था उनके साथ?”

 

आरोही ने धीमी आवाज में कहा—

 

“मुझे बताया गया था कि एक हादसे में उनकी मौत हो गई थी।”

 

अभय ने कहा—

 

“वो हादसा नहीं था।”

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

“तो?”

 

“उनकी हत्या की गई थी।”

 

आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“किसने?”

 

अभय ने तस्वीर की तरफ देखा।

 

“जिसने तुम्हारे परिवार को बर्बाद किया।”

 

आरव ने पूछा—

 

“वही आदमी जो हमें धमका रहा है?”

 

अभय ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

 

 

असली नाम

 

अमन ने पूछा—

 

“उसका नाम क्या है?”

 

अभय ने कहा—

 

“विक्रम सिंघानिया।”

 

आरोही जैसे पत्थर की मूर्ति बन गई।

 

“सिंघानिया…?”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम उसे जानती हो?”

 

आरोही ने धीरे से कहा—

 

“हां।”

 

“वो मेरे पापा के सबसे करीबी दोस्त थे।”

 

आरव चौंक गया।

 

“क्या?”

 

आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“मेरे बचपन में वो हमारे घर आया करते थे।”

 

“मुझे चॉकलेट देते थे।”

 

“पापा उन्हें अपना भाई कहते थे।”

 

अभय ने कहा—

 

“और उसी भरोसे का फायदा उठाकर उसने तुम्हारे पिता को खत्म कर दिया।”

 

आरोही ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छुपा लिया।

 

आरव तुरंत उसके पास गया।

 

“आरोही।”

 

“मैं ठीक हूं।”

 

“नहीं, तुम ठीक नहीं हो।”

 

“तुम्हें इतना सब अकेले नहीं सहना पड़ेगा।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“अगर मेरे पिता की मौत में विक्रम का हाथ था… तो मैं भी उसे बेनकाब करूंगी।”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“हम दोनों मिलकर करेंगे।”

 

 

 

विक्रम की असली योजना

 

अभय ने कहा—

 

“विक्रम सिर्फ तुम्हारे पिता का दुश्मन नहीं था।”

 

“वो राजवीर और शेखर दोनों का इस्तेमाल करता था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“लेकिन राजवीर तो इतना ताकतवर था।”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“राजवीर ताकतवर था… लेकिन विक्रम उससे ज्यादा खतरनाक था।”

 

देवेंद्र ने कहा—

 

“विक्रम लोगों को पैसे से नहीं खरीदता था।”

 

“वो उनकी कमजोरियां खरीदता था।”

 

नैना ने कहा—

 

“और जिसने उसका साथ देने से मना किया…”

 

अभय ने बात पूरी की—

 

“वो गायब हो गया।”

 

विहान ने मुट्ठी भींच ली।

 

“तो इतने सालों से ये सब उसी की वजह से हुआ?”

 

अभय ने कहा—

 

“हां।”

 

“राजवीर सिर्फ उसका चेहरा था।”

 

 

 

विक्रम का फोन

 

अचानक आरव के फोन पर कॉल आया।

 

नंबर अनजान था।

 

आरव ने कॉल उठाया।

 

“कौन?”

 

दूसरी तरफ से वही आवाज आई—

 

“तुम्हें मेरे बारे में जानने की बहुत जल्दी है।”

 

आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

 

“विक्रम।”

 

आवाज में हंसी थी।

 

“आखिर नाम तो जान ही गए।”

 

आरव ने कहा—

 

“मेरी आरोही से दूर रहो।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि वो तुम्हारे खेल का हिस्सा नहीं है।”

 

विक्रम हंसा।

 

“गलत।”

 

“आरोही इस खेल की सबसे जरूरी कड़ी है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि उसके पास वो चीज है जो तुम्हारे पास नहीं।”

 

“क्या?”

 

विक्रम ने कहा—

 

“तुम्हारे नाना की आखिरी चाबी।”

 

आरव ने आरोही की तरफ देखा।

 

“उसके पास?”

 

विक्रम ने कहा—

 

“उसे खुद नहीं पता।”

 

फिर कॉल कट गया।

 

 

 

आरोही का लॉकेट

 

आरोही ने अपने गले में पहने लॉकेट को छुआ।

 

“क्या ये?”

 

अभय ने लॉकेट देखा।

 

उसका चेहरा बदल गया।

 

“ये तुम्हें किसने दिया?”

 

“मेरी मां ने।”

 

अभय ने कहा—

 

“इसे खोलो।”

 

आरोही ने लॉकेट खोला।

 

अंदर एक छोटी सी तस्वीर थी।

 

तस्वीर में उसके पिता समर थे।

 

लेकिन तस्वीर के पीछे एक छोटा सा निशान बना था।

 

वही निशान…

 

जो आरव की चाबी पर था।

 

आरव ने हैरानी से कहा—

 

“ये वही निशान है!”

 

अमन ने कहा—

 

“तो इसका मतलब…”

 

अभय ने कहा—

 

“आरोही भी इस रहस्य का हिस्सा है।”

 

आरोही ने पूछा—

 

“लेकिन क्यों?”

 

अभय ने कहा—

 

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हारे पास वो चीज छुपाई थी, जिसे विक्रम पिछले बीस साल से ढूंढ रहा है।”

 

 

 

छिपा हुआ पत्र

 

नैना ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

 

“इसे गर्म करो।”

 

आरोही ने चौंककर पूछा—

 

“क्या?”

 

“तस्वीर के पीछे लिखी स्याही साधारण नहीं है।”

 

अभय ने पास रखी मोमबत्ती जलाई।

 

तस्वीर को हल्की गर्मी मिली।

 

धीरे-धीरे पीछे शब्द उभरने लगे।

 

“मेरी बेटी के लिए…”

 

आरोही की आंखें भर आईं।

 

“पापा…”

 

उसने आगे पढ़ा—

 

“अगर कभी तुम्हें ये पत्र मिले, तो समझ लेना कि मैं तुम्हारे पास नहीं हूं।”

 

आरोही रोने लगी।

 

“पापा…”

 

आरव उसके पीछे खड़ा था।

 

पत्र आगे कहता था—

 

“तुम्हारे पास जो लॉकेट है, उसे कभी किसी को मत देना।”

 

“क्योंकि उसमें सिर्फ मेरी तस्वीर नहीं है।”

 

आरोही ने लॉकेट को देखा।

 

अचानक उसमें से एक बहुत छोटी सी चिप बाहर निकल आई।

 

अमन ने कहा—

 

“ये क्या है?”

 

अभय ने उसे देखते ही कहा—

 

“ये वही सबूत है, जिसके लिए इतने सालों से लोग मर रहे हैं।”

 

 

 

पच्चीस साल पुराना वीडियो

 

चिप को एक पुराने डिवाइस में लगाया गया।

 

स्क्रीन चालू हुई।

 

वीडियो में समर दिखाई दिए।

 

उनकी आवाज साफ थी।

 

“अगर ये वीडियो मेरी बेटी तक पहुंचा है, तो इसका मतलब है कि विक्रम मुझे नहीं ढूंढ पाया।”

 

आरव ध्यान से देखने लगा।

 

समर आगे बोले—

 

“लेकिन मेरी बेटी अकेली नहीं है।”

 

“उसकी जिंदगी उन तीन भाइयों से जुड़ी है…”

 

आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

 

समर ने कहा—

 

“आरव, अमन और विहान… तुम तीनों को अगर ये वीडियो दिख रहा है, तो मेरी बेटी की रक्षा करना।”

 

आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“पापा आपको हमारे बारे में कैसे पता था?”

 

वीडियो में समर ने कहा—

 

“क्योंकि तुम्हारे नाना और मैं एक ही मिशन पर काम कर रहे थे।”

 

“वो तुम्हारे तीनों बेटों को बचाना चाहते थे।”

 

“और मैं अपनी बेटी को।”

 

फिर स्क्रीन पर एक नक्शा दिखाई दिया।

 

उस पर एक जगह लाल निशान से घिरी हुई थी।

 

“पुरानी हवेली।”

 

समर की आखिरी बात थी—

 

“वहीं वो चीज छिपी है, जो पूरे खेल को खत्म कर सकती है।”

 

वीडियो बंद हो गया।

 

 

 

हवेली जाने का फैसला

 

आरव ने कहा—

 

“हम वहां जाएंगे।”

 

अभय ने तुरंत कहा—

 

“नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि विक्रम यही चाहता है।”

 

आरव ने कहा—

 

“तो फिर हम क्या करें?”

 

अभय ने कहा—

 

“पहले हमें पता करना होगा कि विक्रम को हमारे हर कदम की खबर कैसे मिल रही है।”

 

अमन ने कहा—

 

“मतलब हमारे बीच कोई गद्दार है।”

 

सब एक-दूसरे को देखने लगे।

 

विहान ने धीरे से कहा—

 

“क्या रुद्र?”

 

रुद्र ने कहा—

 

“मैं नहीं।”

 

आरव ने कहा—

 

“मैं तुम पर अभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकता।”

 

रुद्र ने सिर झुका लिया।

 

“तुम्हें भरोसा करने की जरूरत नहीं।”

 

“बस इतना याद रखना… मैंने तुम्हारी जान दो बार बचाई है।”

 

आरव चुप रहा।

 

 

 

अचानक गायब आरोही

 

कुछ देर बाद सभी अगले कदम की तैयारी करने लगे।

 

आरोही बाहर चली गई।

 

आरव ने सोचा वह अकेले कुछ देर रहना चाहती है।

 

लेकिन पांच मिनट बाद भी वह वापस नहीं आई।

 

“आरोही?”

 

कोई जवाब नहीं।

 

आरव बाहर गया।

 

“आरोही!”

 

सन्नाटा।

 

उसका फोन जमीन पर पड़ा था।

 

आरव ने फोन उठाया।

 

स्क्रीन पर एक वीडियो चल रहा था।

 

विक्रम की आवाज आई—

 

“मैंने कहा था उसे अकेले आने दो।”

 

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

“नहीं…”

 

अभय, अमन और विहान भी बाहर आ गए।

 

नैना घबरा गईं।

 

“आरोही कहां है?”

 

आरव ने फोन कसकर पकड़ लिया।

 

वीडियो में आरोही एक कमरे में बंधी हुई थी।

 

उसकी आंखों में आंसू थे।

 

विक्रम की आवाज आई—

 

“आरव… अगर अपनी प्रेमिका को जिंदा देखना चाहते हो…”

 

“तो आज रात पुरानी हवेली में अकेले आना।”

 

आरव ने गुस्से में फोन जमीन पर फेंक दिया।

 

“मैं उसे वापस लेकर आऊंगा।”

 

अभय ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम अकेले नहीं जाओगे।”

 

आरव ने कहा—

 

“लेकिन उसने अकेले आने को कहा है।”

 

अभय ने दृढ़ आवाज में कहा—

 

“विक्रम की बात मानना सबसे बड़ी गलती होगी।”

 

नैना ने आरव को गले लगा लिया।

 

“बेटा, जल्दबाजी मत करना।”

 

आरव की आंखों में सिर्फ एक बात थी—

 

आरोही को बचाना।

 

 

 

आखिरी मोड़

 

रात होने लगी।

 

पुरानी हवेली की ओर एक काली गाड़ी बढ़ रही थी।

 

अंदर आरव बैठा था।

 

लेकिन उसके साथ कोई और भी था।

 

उसने अपना चेहरा कपड़े से ढक रखा था।

 

आरव ने पूछा—

 

“तुम कौन हो?”

 

उस व्यक्ति ने कपड़ा हटाया।

 

आरव उसे देखकर स्तब्ध रह गया।

 

वो था…

 

शेखर।

 

लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

 

उसने कहा—

 

“मैं तुम्हें आरोही तक पहुंचाने आया हूं।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तुम यहां कैसे?”

 

शेखर ने धीमी आवाज में कहा—

 

“क्योंकि विक्रम को लगता है कि मैं उसका आदमी हूं।”

 

“लेकिन असली बात ये है…”

 

शेखर ने आरव की तरफ देखा।

 

“मैं पिछले बीस साल से उसके खिलाफ सबूत जमा कर रहा हूं।”

 

आरव ने हैरानी से पूछा—

 

“तो फिर तुमने हमारे साथ इतना बड़ा खेल क्यों खेला?”

 

शेखर ने जवाब दिया—

 

“क्योंकि अगर विक्रम को पता चल जाता कि मैं तुम्हारे साथ हूं…”

 

“तो वो सिर्फ आरोही को नहीं मारता।”

 

“वो तुम्हारी मां नैना को भी मार देता।”

 

आरव की आंखें फैल गईं।

 

“क्या?”

 

शेखर ने कहा—

 

“और अब हमें सिर्फ आरोही को नहीं बचाना… बल्कि उस इंसान को भी ढूंढना है जो हवेली के अंदर से विक्रम की मदद कर रहा है।”

 

गाड़ी पुरानी हवेली के सामने रुक गई।

 

आरव ने बाहर कदम रखा।

 

हवेली के दरवाजे अपने आप खुल गए।

 

अंदर से विक्रम की आवाज आई—

 

“आओ आरव… तुम्हारा इंतजार था।”

 

आरव ने मुट्ठी भींच ली।

 

और अंधेरी हवेली के अंदर कदम रख दिया।

 

जारी रहेगा…

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