एपिसोड – 48 : अभय का नाम सुनकर क्यों कांप गया देवेंद्र?
देवेंद्र के हाथ से फोन लगभग छूट ही गया।
स्क्रीन पर सिर्फ एक नाम था—
“अभय।”
आरव ने फोन को दोबारा देखा।
“अभय…?”
उसकी आवाज में हैरानी थी।
विहान भी तुरंत आरव के पास आ गया।
“अभय कौन?”
देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“पापा… अभय तो मेरे पिता थे।”
देवेंद्र की आंखों में दर्द उतर आया।
“हां।”
“तो फिर इस मैसेज का मतलब क्या है?”
देवेंद्र चुप रहा।
नैना भी अचानक गंभीर हो गईं।
माधवी ने उनकी तरफ देखा।
“नैना… अब हमें सच बताना होगा।”
नैना ने धीरे से सिर हिलाया।
“हां दीदी।”
आरव ने बेचैनी से पूछा—
“कौन-सा सच?”
नैना ने तीनों भाइयों को अपने पास बुलाया।
“तुम्हारे पिता अभय की मौत वैसी नहीं हुई थी, जैसी तुम्हें बताई गई।”
तीनों भाई एक साथ चौंक गए।
अभय की मौत का सच
अमन ने पूछा—
“तो हमारे पिता की मौत कैसे हुई थी?”
नैना ने गहरी सांस ली।
“अभय मरा नहीं था।”
विहान की आंखें फैल गईं।
“क्या?”
“जिस आदमी की लाश तुम्हें दिखाई गई थी… वो अभय नहीं था।”
आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“तो मेरे पिता जिंदा हैं?”
नैना ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
देवेंद्र ने कहा—
“हमें नहीं पता।”
आरव ने गुस्से में पूछा—
“आपको नहीं पता?”
देवेंद्र ने कहा—
“पच्चीस साल पहले अभय गायब हो गया था।”
“और तब से किसी ने उसे नहीं देखा।”
अमन ने पूछा—
“तो उसकी मौत की खबर किसने फैलाई?”
नैना ने राजवीर की तरफ इशारा किया।
“राजवीर ने।”
विहान ने कहा—
“लेकिन अभी जो मैसेज आया है, उसमें लिखा है कि राजवीर को आदेश देने वाला अभय था।”
नैना ने सिर हिलाया।
“यही सबसे बड़ा सवाल है।”
क्या अभय लौट आया है?
आरव ने फोन फिर देखा।
“अगर अभय जिंदा है… तो उसने राजवीर को आदेश क्यों दिया?”
देवेंद्र ने कहा—
“शायद वो वही अभय नहीं है जिसे हम जानते थे।”
आरव ने तुरंत कहा—
“ऐसा मत कहिए।”
“मेरे पिता बुरे इंसान नहीं थे।”
नैना ने आरव का हाथ पकड़ लिया।
“मैं जानती हूं।”
“तुम्हारे पिता ने मुझे बचाने के लिए अपनी जिंदगी खतरे में डाल दी थी।”
विहान ने पूछा—
“फिर वो गायब क्यों हुए?”
नैना की आंखों में दर्द था।
“क्योंकि उन्होंने एक ऐसा राज जान लिया था, जिसे जानने वाला कोई भी जिंदा नहीं बचता।”
अमन ने पूछा—
“क्या राज?”
नैना ने देवेंद्र की तरफ देखा।
देवेंद्र ने धीरे से कहा—
“तुम तीनों के जन्म का।”
तीनों भाई चौंक गए।
आरव ने पूछा—
“लेकिन हमने तो अभी सब जान लिया।”
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“जो तुम जानते हो… वो पूरी सच्चाई नहीं है।”
तीन बच्चों का असली रहस्य
आरव ने बेचैनी से पूछा—
“तो फिर क्या छुपाया गया है?”
नैना ने कहा—
“तुम तीनों का जन्म सिर्फ एक संयोग नहीं था।”
अमन ने पूछा—
“मतलब?”
“तुम तीनों को एक साथ पैदा होने की वजह थी।”
विहान ने पूछा—
“किसने तय किया था?”
नैना ने कहा—
“तुम्हारे नाना ने।”
आरव चौंका।
“नाना?”
“हां।”
“उन्होंने तुम्हें एक खास वजह से दुनिया में लाया था।”
आरव ने गुस्से में कहा—
“हम कोई योजना नहीं हैं।”
नैना की आंखों में आंसू आ गए।
“तुम मेरे बच्चे हो।”
“लेकिन उस समय हमारे परिवार पर बहुत बड़ा खतरा था।”
देवेंद्र ने कहा—
“तुम्हारे नाना ने एक ऐसी संपत्ति बनाई थी, जो सिर्फ तीन वारिसों को मिल सकती थी।”
अमन ने पूछा—
“तीन वारिस?”
“तुम तीनों।”
विहान ने कहा—
“लेकिन क्यों?”
देवेंद्र ने जवाब दिया—
“क्योंकि तीनों के पास उस संपत्ति की अलग-अलग चाबी थी।”
आरव ने अपनी जेब में रखी चाबी को देखा।
“तो ये सिर्फ एक चाबी नहीं है?”
नैना ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“ये पहली चाबी है।”
अमन ने पूछा—
“दूसरी?”
नैना ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे पास है।”
अमन ने चौंककर अपनी जेब टटोली।
उसे एक छोटा सा पुराना सिक्का मिला।
“ये?”
नैना ने कहा—
“हां।”
विहान ने पूछा—
“और तीसरी?”
नैना मुस्कुराईं।
“तुम्हारे पास है।”
विहान ने अपने गले में पहना लॉकेट छुआ।
“ये?”
नैना ने सिर हिलाया।
“यही।”
तीनों निशान
तीनों चीजों को एक साथ मेज पर रखा गया।
चाबी।
सिक्का।
और लॉकेट।
कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।
फिर अचानक तीनों चीजों पर बने निशान चमकने लगे।
आरोही ने हैरानी से कहा—
“ये कैसे?”
माधवी ने कहा—
“नैना ने ये सब इतने साल छुपाकर रखा था।”
नैना ने कहा—
“मैंने नहीं।”
सबने उनकी तरफ देखा।
“तो?”
नैना ने कहा—
“ये सब अभय ने छुपाया था।”
आरव के चेहरे पर हैरानी छा गई।
“अभय?”
“हां।”
“तो वो जिंदा थे?”
नैना ने कहा—
“मुझे पूरा विश्वास है कि वो जिंदा थे।”
तभी कमरे में रखी पुरानी मशीन अचानक चालू हो गई।
उसमें से एक आवाज आई—
“अगर तुम तीनों एक साथ ये संदेश सुन रहे हो, तो समझो मैं शायद तुम्हारे पास नहीं हूं।”
आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।
“पापा…”
वो आवाज अभय की थी।
अभय की रिकॉर्डिंग
रिकॉर्डिंग आगे चली—
“आरव… अमन… विहान…”
तीनों भाइयों की आंखों में आंसू आ गए।
“अगर तुम मेरी आवाज सुन रहे हो तो इसका मतलब है कि नैना तुम्हारे पास वापस आ चुकी है।”
नैना ने आंखें बंद कर लीं।
अभय की आवाज आगे आई—
“मैंने तुम तीनों को बचाने के लिए अपनी मौत का नाटक किया।”
आरव ने आंखें पोंछीं।
“लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं कितने समय तक छिपा रहूंगा।”
“राजवीर को लगता है कि मैंने सब कुछ खत्म कर दिया।”
“लेकिन असली खेल अभी बाकी है।”
देवेंद्र ने बेचैनी से कहा—
“अभय…”
रिकॉर्डिंग में अभय ने कहा—
“राजवीर सिर्फ एक मोहरा है।”
आरव की आंखें फैल गईं।
“तो फिर असली खिलाड़ी कौन है?”
जैसे ही अभय ये कहने वाला था—
रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।
अमन ने मशीन पर हाथ मारा।
“नहीं!”
विहान ने कहा—
“आगे क्यों नहीं चल रहा?”
देवेंद्र ने मशीन खोली।
“किसी ने रिकॉर्डिंग का आखिरी हिस्सा निकाल दिया है।”
आरव ने कहा—
“किसने?”
देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।
कमरे में कौन था?
आरोही अचानक बोली—
“एक मिनट।”
सब उसकी तरफ देखने लगे।
“जब ये रिकॉर्डिंग चली… तब कमरे में हम सब थे।”
“हां।”
“लेकिन रिकॉर्डिंग शुरू होने से पहले कमरे में कोई और भी था।”
आरव ने पूछा—
“कौन?”
आरोही ने धीरे से कहा—
“रुद्र।”
सबकी नजर रुद्र पर गई।
रुद्र चुप खड़ा था।
अमन ने तुरंत उसकी तरफ बंदूक तान दी।
“रिकॉर्डिंग का हिस्सा कहां है?”
रुद्र ने कहा—
“मेरे पास नहीं है।”
“झूठ!”
विहान ने कहा—
“तुम पहले भी हमें धोखा दे चुके हो।”
रुद्र ने हाथ ऊपर कर दिए।
“इस बार मैं सच बोल रहा हूं।”
आरव ने पूछा—
“तो फिर तुम्हें क्या पता है?”
रुद्र कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“अभय जिंदा है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव ने धीरे से पूछा—
“कहां?”
रुद्र ने कहा—
“मैं नहीं जानता।”
“लेकिन?”
रुद्र ने कहा—
“वो मुझे हर महीने एक संदेश भेजता था।”
आखिरी संदेश
“क्या लिखा था?”
रुद्र ने अपने फोन से एक पुराना संदेश दिखाया।
उसमें लिखा था—
“जब मेरे तीनों बेटे एक साथ होंगे, उन्हें पुराने शिव मंदिर तक ले जाना।”
आरव ने पूछा—
“कौन-सा मंदिर?”
रुद्र ने कहा—
“शहर से बाहर वाला।”
नैना अचानक घबरा गईं।
“नहीं!”
सब उनकी तरफ देखने लगे।
“क्या हुआ?”
नैना ने कहा—
“वहां मत जाना।”
आरव ने पूछा—
“क्यों?”
नैना ने कांपती आवाज में कहा—
“क्योंकि उसी मंदिर में…”
वह रुक गईं।
विहान ने पूछा—
“क्या?”
नैना की आंखों से आंसू बह निकले।
“उसी मंदिर में तुम्हारे पिता अभय को आखिरी बार देखा गया था।”
आरव ने तुरंत कहा—
“तो हमें वहीं जाना होगा।”
नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं बेटा।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर अभय वहां है…”
वह कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“तो वो अकेला नहीं होगा।”
मंदिर की ओर
रात गहरी हो चुकी थी।
फिर भी आरव, अमन, विहान और आरोही मंदिर जाने के लिए तैयार थे।
देवेंद्र ने कहा—
“मैं भी चलूंगा।”
नैना ने कहा—
“मैं भी।”
माधवी ने तुरंत कहा—
“नैना, तुम्हें नहीं जाना चाहिए।”
नैना ने कहा—
“पच्चीस साल भाग चुकी हूं।”
“अब नहीं।”
आरव ने मां का हाथ पकड़ लिया।
“इस बार हम सब साथ चलेंगे।”
कुछ देर बाद गाड़ियां मंदिर की ओर बढ़ने लगीं।
रास्ते में आरव चुप था।
आरोही ने पूछा—
“क्या सोच रहे हो?”
“अगर पापा सच में जिंदा हैं…”
“तो?”
“मैं उनसे बहुत सारे सवाल पूछूंगा।”
आरोही मुस्कुराई।
“और अगर वो तुम्हें गले लगा लें?”
आरव की आंखें नम हो गईं।
“तो शायद मेरी जिंदगी पूरी हो जाएगी।”
मंदिर में इंतजार
रात के करीब बारह बजे सभी मंदिर पहुंच गए।
चारों तरफ सन्नाटा था।
हवा तेज चल रही थी।
मंदिर के अंदर एक दीपक जल रहा था।
आरव धीरे-धीरे अंदर गया।
दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।
उस तस्वीर में अभय था।
आरव की आंखें भर आईं।
“पापा…”
अचानक मंदिर के पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।
ठक… ठक… ठक…
अमन ने बंदूक निकाल ली।
विहान ने भी हथियार संभाल लिया।
आरोही आरव के पास खड़ी हो गई।
देवेंद्र ने सबको पीछे रहने का इशारा किया।
अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।
चेहरा कपड़े से ढका हुआ था।
आरव ने कहा—
“कौन हो?”
आदमी ने धीरे-धीरे चेहरा खोला।
तीनों भाइयों की आंखें फैल गईं।
देवेंद्र के मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला—
“अभय…”
आरव की आंखों से आंसू बह निकले।
“पापा…”
अभय ने तीनों बेटों को देखा।
लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।
बल्कि…
डर था।
उसने धीरे से कहा—
“तुम तीनों को यहां नहीं आना चाहिए था।”
आरव ने पूछा—
“क्यों?”
अभय ने पीछे अंधेरे की तरफ देखा।
फिर बोला—
“क्योंकि जिसने मुझे इतने साल कैद करके रखा… वो जान चुका है कि तुम तीनों यहां हो।”
और मंदिर के बाहर अचानक दर्जनों गाड़ियों की हेडलाइट्स दिखाई देने लगीं।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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