एपिसोड – 47 : मां सामने थी, फिर भी एक रहस्य बाकी था
“राजवीर… क्या तुम अब भी मुझसे डरते हो?”
बाहर से आई उस आवाज ने जैसे पूरे कमरे की सांसें रोक दीं।
राजवीर के हाथ से बंदूक नीचे गिर गई।
विहान की आंखें फैल गईं।
“मां…?”
वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।
लेकिन आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको।”
विहान ने बेचैनी से कहा—
“भाई, वो मां हैं!”
आरव ने कहा—
“हमें पक्का यकीन नहीं है।”
तभी बाहर से वही आवाज आई—
“विहान… इतने सालों बाद भी तुम मुझे पहचान नहीं पाए?”
विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।
“मुझे अपनी मां की आवाज कैसे भूल सकती है?”
वह आरव का हाथ छुड़ाकर दरवाजे तक पहुंच गया।
देवेंद्र ने भी उसे रोकना चाहा, लेकिन विहान ने कहा—
“अगर ये मेरी मां हैं और मैं फिर उनसे दूर हो गया… तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।”
उसने दरवाजा खोल दिया।
नैना सामने थी
दरवाजा खुलते ही सामने एक महिला खड़ी थी।
सफेद साड़ी।
चेहरे पर उम्र के निशान।
आंखों में आंसू।
लेकिन वही चेहरा…
वही आंखें…
वही आवाज।
विहान उसे देखते ही कुछ पल के लिए जम गया।
महिला ने धीरे से कहा—
“विहान…”
विहान के होंठ कांपे।
“मां…”
और अगले ही पल वह दौड़कर उनसे लिपट गया।
“मां!”
महिला ने उसे कसकर गले लगा लिया।
उसकी आंखों से भी आंसू बहने लगे।
“मेरा बच्चा…”
विहान फूट-फूटकर रोने लगा।
“आप कहां चली गई थीं मां?”
“मैंने आपको कितना ढूंढा।”
“मुझे लगा आप मर गईं।”
नैना ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“मैं मरना चाहती तो भी नहीं मर सकती थी।”
“क्यों?”
नैना ने धीरे से कहा—
“क्योंकि मुझे अपने बच्चों के पास वापस आना था।”
विहान ने पीछे मुड़कर आरव और अमन को देखा।
“मां… ये आरव है।”
नैना की नजर आरव पर गई।
उनकी आंखें भर आईं।
“मेरा गुड्डू…”
आरव की आंखों से आंसू बह निकले।
उसे बचपन की वही आवाज याद आई—
“गुड्डू, इतना मत रो… मां यहीं है।”
आरव धीरे-धीरे उनके पास गया।
“आप… सच में मेरी मां हैं?”
नैना ने अपने हाथ आगे बढ़ाए।
“आओ।”
आरव उनके गले लग गया।
नैना ने उसे कसकर पकड़ लिया।
“मेरा बच्चा… मैंने तुम्हें बहुत याद किया।”
आरव की आंखें बंद थीं।
उसके अंदर बरसों से खाली पड़ा एक कोना जैसे पहली बार भर गया था।
अमन की बारी
अमन कुछ दूर खड़ा सब देख रहा था।
नैना ने उसे देखा।
उनकी आंखों में फिर आंसू आ गए।
“अमन…”
अमन की आंखें भर आईं।
“आपको मेरा नाम भी याद है?”
नैना ने कहा—
“मां अपने बच्चे का नाम कैसे भूल सकती है?”
अमन उनके पास गया।
नैना ने उसे भी गले लगा लिया।
तीनों भाई पहली बार अपनी जन्मदात्री मां के साथ खड़े थे।
माधवी यह दृश्य देखकर रो रही थीं।
आरव ने उन्हें देखा।
“मां…”
नैना ने भी माधवी की तरफ देखा।
दोनों बहनों की आंखें मिलीं।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर नैना ने आगे बढ़कर माधवी को गले लगा लिया।
“दीदी…”
माधवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।
“मुझे लगा था तुम मर गई।”
नैना ने कहा—
“मैं भी यही चाहती थी कि तुम मुझे मरा हुआ समझो।”
माधवी ने हैरानी से पूछा—
“क्यों?”
नैना ने पीछे खड़े राजवीर की तरफ देखा।
“क्योंकि अगर तुम्हें पता चलता कि मैं जिंदा हूं… तो राजवीर तुम्हें भी नहीं छोड़ता।”
राजवीर का डर
राजवीर अब भी वहीं खड़ा था।
नैना ने उसकी तरफ देखा।
“इतने सालों बाद भी तुम वही हो।”
राजवीर ने धीरे से कहा—
“तुम्हें मर जाना चाहिए था।”
नैना मुस्कुराईं।
“तुम्हारी यही सबसे बड़ी गलती थी।”
“तुमने मुझे कमजोर समझा।”
राजवीर ने गुस्से में कहा—
“मैंने तुम्हें खत्म कर दिया था!”
नैना ने कहा—
“नहीं।”
“तुमने सिर्फ मुझे दुनिया की नजरों में खत्म किया था।”
“लेकिन मैं जिंदा थी।”
राजवीर पीछे हट गया।
“तुम्हें किसने बचाया?”
नैना ने जवाब नहीं दिया।
राजवीर ने चारों तरफ देखा।
“किसने?”
नैना ने कहा—
“उस आदमी ने, जिसे तुमने सबसे पहले अपना दुश्मन समझा था।”
राजवीर का चेहरा बदल गया।
“देवेंद्र?”
देवेंद्र आगे आया।
“हां।”
राजवीर हंस पड़ा।
“तुम दोनों ने मुझे इतने साल धोखा दिया?”
देवेंद्र ने कहा—
“नहीं। हमने तुम्हारी चाल को तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल किया।”
उस रात क्या हुआ था?
आरव ने पूछा—
“मां, उस रात आखिर हुआ क्या था?”
नैना कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“मुझे राजवीर के लोग उठा ले गए थे।”
“मुझे गोली लगी थी।”
“लेकिन मैं मरी नहीं।”
“देवेंद्र मुझे वहां से निकालकर ले गया।”
देवेंद्र ने कहा—
“मैं तुम्हें अस्पताल ले जाना चाहता था।”
नैना ने कहा—
“लेकिन तब तक राजवीर को पता चल चुका था कि मैं जिंदा हूं।”
“इसलिए मुझे एक गुप्त जगह पर रखा गया।”
आरव ने पूछा—
“इतने साल?”
“हां।”
“आप हमसे मिलने क्यों नहीं आईं?”
नैना की आंखों से आंसू बहने लगे।
“क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण तुम तीनों की जान खतरे में पड़े।”
अमन ने पूछा—
“लेकिन आपने हमें अकेला छोड़ दिया।”
नैना ने कहा—
“मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था।”
“मैं हर साल तुम्हारी खबर लेती थी।”
विहान ने कहा—
“तो आपने मुझे देखा था?”
नैना मुस्कुराईं।
“तुम्हें शायद याद भी नहीं होगा।”
“जब तुम छोटे थे, मैं दूर खड़ी होकर तुम्हें स्कूल जाते देखती थी।”
विहान की आंखों से आंसू निकल आए।
“मां…”
एक और बड़ा सच
आरव ने पूछा—
“मां, फिर आपने हमें एक-दूसरे से दूर क्यों रखा?”
नैना ने कहा—
“क्योंकि राजवीर तुम्हें ढूंढ रहा था।”
“उसे पता था कि तुम तीनों के पास मेरी संपत्ति और मेरे सबूतों की चाबी है।”
आरव ने अपनी जेब से वही चाबी निकाली।
“ये?”
नैना ने चाबी देखते ही कहा—
“हां।”
“इसे मैंने तुम्हारे लिए छोड़ा था।”
अमन ने पूछा—
“इससे क्या खुलेगा?”
नैना ने कहा—
“एक ऐसी जगह जहां तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए सब कुछ छुपाकर रखा है।”
आरव चौंका।
“पिता?”
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
नैना ने कहा—
“हां।”
“तुम्हारे पिता की असली वसीयत।”
विहान ने पूछा—
“और उसमें क्या है?”
नैना ने कहा—
“सिर्फ संपत्ति नहीं।”
“राजवीर के खिलाफ सबूत भी।”
राजवीर ने तुरंत कहा—
“नैना, तुम नहीं जानती कि तुम क्या कर रही हो।”
नैना उसकी तरफ मुड़ीं।
“इस बार मैं सब जानती हूं।”
राजवीर की आखिरी चाल
राजवीर ने अचानक अपनी जेब से एक छोटा रिमोट निकाला।
देवेंद्र की नजर उस पर पड़ गई।
“राजवीर!”
राजवीर मुस्कुराया।
“अगर मैं ये बटन दबा दूं…”
आरव ने पूछा—
“क्या होगा?”
राजवीर ने कहा—
“पूरी हवेली उड़ जाएगी।”
सबके चेहरे पर डर छा गया।
आरोही आरव के पास आ गई।
“आरव…”
देवेंद्र ने कहा—
“राजवीर, ऐसा मत करना।”
राजवीर हंसा।
“मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है।”
नैना आगे बढ़ीं।
“राजवीर, तुम्हें लगता है मैं इस बार भी डर जाऊंगी?”
“मैं मरने से नहीं डरती।”
राजवीर ने रिमोट का बटन दबाने के लिए उंगली बढ़ाई।
तभी पीछे से एक गोली चली।
धांय!
रिमोट उसके हाथ से गिर गया।
सबने पीछे देखा।
रुद्र खड़ा था।
उसके कंधे पर अभी भी चोट थी।
अमन ने हैरानी से कहा—
“रुद्र!”
रुद्र ने कहा—
“इस बार सही पक्ष में हूं।”
राजवीर ने गुस्से में उसे देखा।
“तू!”
रुद्र ने कहा—
“तुमने मुझे बहुत साल इस्तेमाल किया।”
“अब हिसाब बराबर होगा।”
राजवीर गिरफ्तार?
बाहर से पुलिस की गाड़ियों की आवाज आने लगी।
राजवीर चौंक गया।
“पुलिस?”
नैना ने कहा—
“हां।”
राजवीर ने उनकी तरफ देखा।
“तुमने पुलिस को बुलाया?”
नैना मुस्कुराईं।
“नहीं।”
फिर उन्होंने रुद्र की तरफ देखा।
“उसने।”
रुद्र ने कहा—
“मेरे पास तुम्हारे खिलाफ सारे सबूत हैं।”
राजवीर पीछे हटने लगा।
“तुम लोग मुझे नहीं पकड़ सकते।”
तभी शेखर ने अपने बंधे हाथों के बावजूद राजवीर को धक्का दिया।
राजवीर जमीन पर गिर पड़ा।
शेखर ने कहा—
“बहुत कर लिया।”
पुलिस अंदर घुस आई।
राजवीर को गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा।
“तुम सोचते हो खेल खत्म हो गया?”
आरव ने कहा—
“हां।”
राजवीर मुस्कुराया।
“नहीं… असली खेल तो अब शुरू होगा।”
मां के साथ पहली रात
राजवीर के जाने के बाद हवेली में पहली बार शांति थी।
तीनों भाई अपनी मां के आसपास बैठे थे।
विहान ने नैना का हाथ पकड़ा हुआ था।
अमन उनके पास बैठा था।
आरव थोड़ा दूर खड़ा था।
नैना ने उसे देखा।
“गुड्डू।”
आरव उनकी तरफ आया।
“जी?”
नैना ने कहा—
“तुम मुझसे नाराज हो?”
आरव की आंखें भर आईं।
“नहीं।”
“तुमने मुझे छोड़ दिया था।”
“लेकिन मुझे पता है क्यों।”
नैना ने उसका चेहरा छूते हुए कहा—
“मुझे माफ कर दो।”
आरव ने सिर उनकी गोद में रख दिया।
“मां को माफी नहीं मांगनी चाहिए।”
नैना रो पड़ीं।
अमन और विहान भी उनके पास आ गए।
चारों एक-दूसरे से लिपट गए।
आरोही दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।
लेकिन तभी माधवी उसके पास आईं।
उन्होंने धीरे से कहा—
“तुम आरव से बहुत प्यार करती हो।”
आरोही ने शर्म से सिर झुका लिया।
“जी।”
माधवी मुस्कुराईं।
“तो एक बात याद रखना।”
“क्या?”
माधवी ने कहा—
“आरव की जिंदगी अब सिर्फ प्यार की कहानी नहीं है… उसके अतीत का एक ऐसा राज बाकी है, जो उसे तुमसे भी दूर कर सकता है।”
आरोही चौंक गई।
“क्या मतलब?”
माधवी कुछ कहतीं, उससे पहले नैना ने उन्हें रोक दिया।
“माधवी… अभी नहीं।”
आरव ने पीछे मुड़कर देखा।
“क्या हुआ?”
नैना और माधवी एक-दूसरे को देखने लगीं।
नैना ने धीमे से कहा—
“आरव को अभी ये सच नहीं पता चलना चाहिए।”
आरव ने पूछा—
“कौन-सा सच?”
दोनों चुप रहीं।
तभी देवेंद्र के फोन पर एक मैसेज आया।
उसने मैसेज पढ़ा और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
आरव ने पूछा—
“क्या हुआ?”
देवेंद्र ने फोन छुपाने की कोशिश की।
लेकिन आरव ने फोन ले लिया।
मैसेज में सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“राजवीर गिरफ्तार हो गया है, लेकिन जिसने उसे आदेश दिए थे… वह अभी आजाद है।”
आरव की आंखें फैल गईं।
और नीचे एक नाम लिखा था—
“अभय।”
आरव के हाथ कांपने लगे।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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