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  • एपिसोड 6: रुक्मिणी का हस्तक्षेप – जब दान का बोझ भारी पड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    द्वारका के महल में समाचार हवा की तरह फैल गया। सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को एक ब्राह्मण को दान कर दिया है। और वह ब्राह्मण कोई और नहीं, स्वयं देवर्षि नारद हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि श्रीकृष्ण ने वह दान स्वीकार भी कर लिया था। अब वे नारद जी के दास के रूप में उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।

     

    जब यह समाचार रुक्मिणी तक पहुँचा तो उनके नेत्र विस्फारित हो गए। वे कुछ क्षण के लिए वहीं स्तब्ध खड़ी रह गईं। फिर उनके मुख से निकला, “सत्यभामा ने क्या किया? तीनों लोकों के स्वामी को… दान में दे दिया?” उनके हृदय में एक साथ कई भाव उठे – आश्चर्य, दुख और हल्की सी व्यथा। वे तुरंत अपने कक्ष से निकलीं और सत्यभामा के महल की ओर चल दीं।

     

    सत्यभामा उस समय फर्श पर बैठी रो रही थीं। उनका सारा अभिमान चूर-चूर हो चुका था। रुक्मिणी ने उन्हें देखा तो पास जाकर धीरे से कहा, “सत्यभामा, क्या यह सच है? तुमने सच में स्वामी को दान कर दिया?”

     

    सत्यभामा ने सिर उठाया। उनकी आँखें सूजी हुई थीं। वे रोते हुए बोलीं, “जीजा जी… मैंने बड़ी मूर्खता कर दी। नारद जी ब्राह्मण बनकर आए। उन्होंने भिक्षा माँगी। मेरे गर्व ने मुझे अंधा बना दिया। मैंने सोच लिया कि स्वामी कभी मेरा दान स्वीकार नहीं करेंगे। पर वे स्वीकार कर लिया। अब वे नारद जी के दास बनकर उनके पीछे जा रहे हैं।”

     

    रुक्मिणी का मुख गंभीर हो गया। वे बोलीं, “चलो। अभी नारद जी के पास चलते हैं। यह बात यहीं समाप्त नहीं हो सकती।”

     

    दोनों रानियाँ साथ-साथ नारद जी के अस्थायी निवास की ओर गईं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो दृश्य देखा, उससे उनके हृदय में और भी पीड़ा हुई। श्रीकृष्ण, जो तीनों लोकों के नाथ थे, जो द्वारका के राजा थे, जो स्वयं नारायण थे – वे नारद जी के चरण दबा रहे थे। उनके हाथ में चंवर था और वे नारद जी को हवा कर रहे थे। उनके मुख पर शांत भाव था, मानो यह सब उनकी लीला का ही एक अंग हो।

     

    रुक्मिणी का हृदय काँप उठा। वे आगे बढ़ीं और नारद जी के सामने खड़ी हो गईं। उनकी आवाज में दृढ़ता थी, पर सम्मान भी था। वे बोलीं, “नारद जी, यह क्या लीला रच रखी है आपने? ये मेरे स्वामी हैं। ये केवल सत्यभामा के पति नहीं हैं। ये मेरे भी पति हैं। आपने इन्हें अपना दास बनाने से पहले मुझसे भी तो पूछना चाहिए था।”

     

    नारद जी ने मुस्कुराते हुए रुक्मिणी की ओर देखा। उनकी आँखों में वह चंचल चमक थी जो सदैव लीला करते समय दिखाई देती थी। वे बोले, “रुक्मिणी, तुम ठीक कहती हो। सत्यभामा ने इन्हें दान दिया। इन्होंने स्वीकार भी कर लिया। पर तुम्हारा भी तो इन पर अधिकार है। अब बताओ, तुम्हारा इन पर कितना हिस्सा है?”

     

    रुक्मिणी कुछ क्षण चुप रहीं। नारद जी आगे बोले, “तुम अपना हिस्सा लेकर जा सकती हो। पर सत्यभामा का हिस्सा मेरे पास ही रहेगा। क्योंकि दिया हुआ दान वापस नहीं लिया जाता। यह धर्म की मर्यादा है।”

     

    सत्यभामा यह सुनकर और भी घबरा गईं। वे नारद जी के चरणों में गिर पड़ीं और बोलीं, “मुनिवर, मैंने गलती की। मेरे अभिमान ने मुझे बर्बाद कर दिया। आप दान वापस ले लीजिए। मैं आपको सोना-चाँदी, रत्न-राशि, सब कुछ दे दूँगी। पर मेरे स्वामी को छोड़ दीजिए।”

     

    नारद जी ने सिर हिलाया। “नहीं सत्यभामा। दान की हुई वस्तु वापस लेना महापाप है। अब तो केवल एक ही मार्ग है।”

     

    इतने में रुक्मिणी फिर बोलीं, “नारद जी, यदि हिस्से की बात है तो मेरा हिस्सा भी तो है। आप कैसे केवल सत्यभामा के दान को मानकर इन्हें अपने पास रख सकते हैं?”

     

    नारद जी ने दोनों रानियों की ओर देखा और कहा, “ठीक है। तो फिर इसका समाधान यही है कि सत्यभामा अपना हिस्सा यहाँ छोड़ जाएँ और रुक्मिणी अपना हिस्सा लेकर चली जाएँ। पर शरीर तो एक ही है। हिस्सा कैसे बाँटा जाएगा?”

     

    यह सुनकर सत्यभामा की समझ में कुछ आया। उनके मन में एक नया विचार उठा। वे अभी भी रो रही थीं, पर उनकी आवाज में अब थोड़ी दृढ़ता आ गई थी। वे उठीं और नारद जी के सामने खड़ी होकर बोलीं, “नारद जी, यदि आपको दान ही चाहिए तो ठीक है। मैं आपको दान दूँगी। मैं आपको इतना दूँगी कि आप उसे समेट भी नहीं पाएँगे।”

     

    यह सुनकर श्रीकृष्ण, जो अब तक चुपचाप खड़े चंवर झुला रहे थे, अचानक मुस्कुरा दिए। उनकी मुस्कान में वह दिव्य भाव था मानो वे जानते हों कि अब आगे क्या होने वाला है। उनकी मुस्कान देखकर नारद जी की आँखें और चमक उठीं।

     

    नारद जी ने सत्यभामा की ओर गंभीर दृष्टि से देखा और बोले, “सत्यभामा, सोच लीजिए। एक बार जो बात मुख से निकल जाएगी, फिर उसे वापस नहीं लिया जा सकेगा। आप अभी भी समय रहते सोच सकती हैं। दान का वचन बहुत भारी होता है।”

     

    सत्यभामा ने अपना दुपट्टा ठीक किया। उनकी आँखों में अभी भी अश्रु थे, पर अब उनमें एक अजीब सा निश्चय भी था। वे बोलीं, “नारद जी, मैं सोच चुकी हूँ। मेरे अभिमान ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया है। अब मैं वह सब कुछ दूँगी जो आप माँगेंगे। आप माँगिए। जो भी माँगना है, माँग लीजिए। मैं तैयार हूँ।”

     

    नारद जी ने एक बार फिर श्रीकृष्ण की ओर देखा। कृष्ण अभी भी मुस्कुरा रहे थे। मानो वे अपनी रानी के साहस पर प्रसन्न हों। नारद जी ने सत्यभामा से कहा, “ठीक है। जब तुम इतनी तैयार हो तो सुनो…”

     

    पर नारद जी ने अभी माँग नहीं की थी। वे सत्यभामा की आँखों में झाँक रहे थे। वे देखना चाहते थे कि सत्यभामा के गर्व का अंतिम अवशेष भी निकल चुका है या नहीं। सत्यभामा उनके सामने सिर झुकाए खड़ी थीं। उनके मुख पर पश्चाताप था, पर साथ ही एक अटल निश्चय भी था कि अब वे जो भी दान देंगी, वह ऐसा होगा जिससे नारद जी का मुख बंद हो जाए।

     

    रुक्मिणी भी वहाँ खड़ी सब कुछ देख रही थीं। उनके मन में कई भाव एक साथ चल रहे थे। वे जानती थीं कि सत्यभामा का स्वभाव उग्र है, पर आज उनका यह रूप देखकर वे आश्चर्यचकित थीं। उन्होंने सत्यभामा का हाथ पकड़ लिया और धीरे से कहा, “सत्यभामा, जो भी कहना हो सोच-समझकर कहना। वचन का भार बहुत भारी होता है।”

     

    सत्यभामा ने रुक्मिणी की ओर देखा और सिर हिलाया। फिर नारद जी की ओर मुड़कर बोलीं, “मुनिवर, अब देर मत कीजिए। आप माँगिए। मैं तैयार हूँ। इतना दूँगी कि आप उसे लेकर भी नहीं जा सकेंगे।”

     

    नारद जी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा। जब तुम इतने दृढ़ निश्चय के साथ कह रही हो तो मैं माँगता हूँ…”

     

    इतने में श्रीकृष्ण ने चंवर झुलाना बंद कर दिया। वे दोनों रानियों और नारद जी को बारी-बारी से देखने लगे। उनके नेत्रों में वह लीलामय भाव था जो तब दिखाई देता है जब कोई बड़ी लीला होने वाली हो। सत्यभामा अभी भी नारद जी के सामने खड़ी थीं। उनके हृदय की धड़कन तेज चल रही थी। वे जानती थीं कि अब जो माँगा जाएगा, उसे उन्हें देना ही होगा।

     

    रुक्मिणी ने आकाश की ओर दृष्टि उठाई मानो किसी अदृश्य शक्ति से प्रार्थना कर रही हों। नारद जी ने अपना कमंडल ठीक किया और सत्यभामा की ओर देखने लगे। वातावरण में एक अजीब सा तनाव छा गया था। लगता था मानो अगला शब्द पूरे द्वारका की दिशा बदलने वाला हो।

     

    सत्यभामा ने एक गहरी साँस ली और बोलीं, “नारद जी, अब आप बोलिए। मैं सुनने को तैयार हूँ।”

     

    नारद जी ने धीरे से अपने होठ खोले। पर जो माँग वे करने वाले थे, वह अभी बाकी थी। अभी तो केवल वचन की तैयारी पूरी हुई थी। दान का वास्तविक रूप अभी सामने आना बाकी था।

     

     

    और श्रीकृष्ण… वे अब भी मुस्कुरा रहे थे। मानो सब कुछ उनके खेल का ही एक अंग हो।

  • एपिसोड 5: सत्यभामा – जिसने अपने पति को दान कर दिया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    द्वारका नगरी में श्रीकृष्ण की अनेक रानियाँ थीं, पर उनमें से एक ऐसी थीं जिनका स्वभाव सबसे अधिक तेज और अभिमानी माना जाता था। उनका नाम था – सत्यभामा।

     

    सत्यभामा राजा सत्राजित की पुत्री थीं। सत्राजित के पास सूर्य भगवान का दिया हुआ अमूल्य रत्न था – श्यामंतक मणि। वह मणि प्रतिदिन सोने की वर्षा करती थी। उसी मणि के कारण सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ था। जब श्यामंतक मणि का प्रसंग चला और कृष्ण ने उस मणि को वापस दिलाया, तब सत्राजित ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री सत्यभामा को कृष्ण को समर्पित कर दिया। इस प्रकार सत्यभामा द्वारका की रानी बनीं।

     

    सत्यभामा रूपवती थीं, चतुर थीं और अत्यंत साहसी भी। वे कृष्ण से बहुत प्रेम करती थीं, पर उनका प्रेम थोड़ा अलग था। रुक्मिणी का प्रेम शांत और गंभीर था, तो सत्यभामा का प्रेम उग्र, अधिकारपूर्ण और कभी-कभी ईर्ष्या से भरा होता था। वे चाहती थीं कि कृष्ण केवल उन्हीं के हों। वे अक्सर गर्व से कहा करतीं, “कृष्ण मुझे सबसे अधिक प्रेम करते हैं। मैंने ही उन्हें सबसे अधिक सुखी रखा है।”

     

    उनके इस अभिमान को देवर्षि नारद अच्छी तरह जानते थे। नारद जी सदैव लीलाओं के सूत्रधार रहते थे। वे चाहते थे कि सत्यभामा के अभिमान को थोड़ा तोड़ा जाए और उन्हें सच्चे प्रेम का पाठ पढ़ाया जाए। एक दिन उन्होंने सोचा कि अब समय आ गया है।

     

    नारद जी ने ब्राह्मण का वेश धारण किया। साधारण वस्त्र, हाथ में कमंडल और मस्तक पर चंदन का टीका लगाकर वे द्वारका के महल में पहुँचे। द्वारपालों ने उन्हें रोका तो उन्होंने कहा, “मैं एक दरिद्र ब्राह्मण हूँ। मुझे रानी सत्यभामा से भिक्षा माँगनी है।”

     

    जब सत्यभामा को सूचना मिली तो वे प्रसन्न हो गईं। वे दानवीर के रूप में प्रसिद्ध होना चाहती थीं। उन्होंने ब्राह्मण को अपने कक्ष में बुलाया। नारद जी अंदर आए और आशीर्वाद दिया, “पुत्री, तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे जैसे दानशील के घर आकर मेरा जन्म सफल हो गया।”

     

    सत्यभामा मुस्कुराईं। उन्होंने दासी से कहा, “इस ब्राह्मण को स्वर्ण मुद्राएँ दो, रत्न दो, वस्त्र दो। इन्हें संतुष्ट करके विदा करो।”

     

    नारद जी ने हाथ जोड़कर कहा, “रानी, मुझे धन की आवश्यकता नहीं। मुझे रत्नों की भी इच्छा नहीं। मैं तो ऐसी भिक्षा माँगने आया हूँ जो संसार में सबसे दुर्लभ है।”

     

    सत्यभामा का अभिमान जाग उठा। वे गर्व से बोलीं, “हे ब्राह्मण देव! इस द्वारका में ऐसी कौन सी वस्तु है जो मैं आपको न दे सकूँ? बोलिए, क्या चाहिए? सोना चाहिए? हाथी चाहिए? रथ चाहिए? राज्य का एक भाग चाहिए? बोलिए, मैं तुरंत दे दूँगी।”

     

    नारद जी ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “रानी, मुझे आपका पति चाहिए।”

     

    कक्ष में अचानक सन्नाटा छा गया। सत्यभामा की आँखें चौड़ी हो गईं। वे अविश्वास से नारद की ओर देखने लगीं। “क्या कहा आपने? मेरे पति? श्रीकृष्ण को?”

     

    नारद जी ने शांत भाव से कहा, “हाँ रानी। आपने कहा था कि इस घर में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आप न दे सकें। श्रीकृष्ण आपके सबसे प्रिय हैं, आपके सबसे मूल्यवान हैं। अतः मैं भिक्षा में उन्हें ही माँगता हूँ। यदि आप सच में दानवीर हैं तो अपने पति को मुझे दान कर दीजिए।”

     

    सत्यभामा कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गईं। उनके मन में हजारों विचार एक साथ उठने लगे। वे सोचने लगीं – यदि मैं मना कर दूँ तो यह ब्राह्मण कहेगा कि सत्यभामा केवल बातें बनाती है, वास्तव में दान नहीं करती। यदि मैं दे दूँ तो… मेरे कृष्ण मुझसे छिन जाएँगे। पर अभिमान ने उन्हें फिर से घेर लिया। उन्होंने सोचा – कृष्ण मुझसे इतना प्रेम करते हैं कि यह ब्राह्मण उन्हें लेकर भी नहीं जा सकेगा। कृष्ण स्वयं मना कर देंगे। और यदि यह ब्राह्मण उन्हें ले भी गया तो कृष्ण मुझे छोड़कर कैसे रहेंगे? वे अवश्य लौट आएंगे।

     

    इसी गर्व में सत्यभामा ने अपना सिर ऊँचा किया और बोलीं, “हे ब्राह्मण देव! आपने सही कहा। मेरे लिए मेरे पति से बढ़कर कोई वस्तु नहीं। और जब आपने भिक्षा माँगी है तो मैं कैसे मना कर सकती हूँ? मैं अपनी इच्छा से अपने पति श्रीकृष्ण को आपको दान करती हूँ।”

     

    नारद जी ने तुरंत कहा, “तो फिर जल से संकल्प कीजिए रानी। दान तभी पूर्ण होता है जब संकल्प किया जाए।”

     

    सत्यभामा ने दासी से जल का पात्र मँगवाया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर अभिमान ने उन्हें रोक रखा था। उन्होंने जल लिया और बोलीं, “आज इस ब्राह्मण को मैं अपने पति श्रीकृष्ण को दान स्वरूप प्रदान करती हूँ। अब ये मेरे नहीं, इन ब्राह्मण के हुए।”

     

    जैसे ही संकल्प के शब्द पूरे हुए, नारद जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “धन्य हो रानी! आपने सच में महान दान किया। अब मैं अपने दान को स्वीकार करने के लिए श्रीकृष्ण के पास चलता हूँ।”

     

    सत्यभामा अभी भी सोच रही थीं कि यह सब एक नाटक है। वे मान बैठी थीं कि कृष्ण इस दान को स्वीकार नहीं करेंगे। वे अपने कक्ष में बैठी इंतजार करने लगीं कि नारद जी खाली हाथ लौटेंगे और कहेंगे कि कृष्ण ने मना कर दिया।

     

    पर नारद जी सीधे वहाँ गए जहाँ कृष्ण विराजमान थे। उन्होंने जाकर कहा, “कृष्ण, आपकी पत्नी सत्यभामा ने आपको मुझे दान कर दिया है। अब आप मेरे हुए। चलिए मेरे साथ।”

     

    कृष्ण ने शांत भाव से सत्यभामा की ओर देखा। उनकी आँखों में हल्की सी मुस्कान थी, मानो वे सब कुछ पहले से जानते हों। उन्होंने कहा, “नारद जी, जब मेरी पत्नी ने संकल्प करके मुझे दान कर दिया है तो मैं कैसे मना कर सकता हूँ? दान की गई वस्तु वापस नहीं ली जाती। मैं तैयार हूँ।”

     

    जब सत्यभामा को यह समाचार मिला कि कृष्ण ने वास्तव में दान स्वीकार कर लिया है और नारद जी के साथ जाने को तैयार हैं, तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। अभिमान का महल एक पल में ढह गया। वे भागती हुई कृष्ण के कक्ष में आईं। उनके नेत्रों में आँसू भरे थे और आवाज काँप रही थी।

     

    “स्वामी… आप क्या कर रहे हैं? वह तो एक साधारण ब्राह्मण था। मैंने तो केवल… मैंने तो केवल…” सत्यभामा बोल नहीं पा रही थीं। गर्व के कारण उन्होंने जो शब्द कहे थे, वे अब उनके गले में काँटे बनकर चुभ रहे थे।

     

    कृष्ण ने शांत दृष्टि से उनकी ओर देखा और बोले, “सत्यभामा, तुमने स्वयं जल लेकर संकल्प किया था। अब तुम अपना शब्द वापस कैसे ले सकती हो? दान देकर पछताना धर्म नहीं है।”

     

    सत्यभामा के आँसू अब धारा बनकर बहने लगे। वे कृष्ण के चरणों में गिर पड़ीं और रोते हुए बोलीं, “स्वामी, मैंने मूर्खता की। मेरे अभिमान ने मुझे अंधा बना दिया। मैंने सोचा था कि आप मुझे कभी नहीं छोड़ेंगे। मैंने सोचा था कि मेरा प्रेम इतना बड़ा है कि कोई आपको मुझसे छीन नहीं सकता। पर मैं गलत थी। कृपया इस दान को स्वीकार न कीजिए। मैं वह सब कुछ दे दूँगी जो आप माँगेंगे, पर आप… आप मुझे छोड़कर मत जाइए।”

     

    नारद जी वहीं खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा, “रानी, अब देर हो चुकी है। संकल्प हो चुका है। श्रीकृष्ण अब मेरे हो गए हैं।”

     

    सत्यभामा बार-बार कृष्ण के चरण पकड़कर रो रही थीं। उनका सारा गर्व धुल चुका था। वे बार-बार कह रही थीं, “स्वामी, मैंने नहीं जाना था कि मेरे शब्द इतने भारी होंगे। मैंने नहीं जाना था कि दान की गई वस्तु इतनी जल्दी स्वीकार हो जाएगी। कृपया मुझे क्षमा करें।”

     

    कृष्ण ने धीरे से उन्हें उठाया। उनके मुख पर अभी भी वही शांत भाव था। वे बोले, “सत्यभामा, तुमने आज जो किया है उसके परिणाम तुम्हें भोगने होंगे। अब नारद जी मुझे लेकर जाएँगे। तुम सोचो कि जब पति ही न रहे तो पत्नी का क्या मूल्य रह जाता है।”

     

    सत्यभामा का हृदय टूट रहा था। वे बार-बार नारद जी के चरणों में गिरकर विनती कर रही थीं, “हे मुनिवर, आप दान वापस कर दीजिए। मैं आपको अपना सारा वैभव दे दूँगी। मैं आपको सोने के ढेर लगा दूँगी। पर मेरे पति को छोड़ दीजिए।”

     

    नारद जी ने शांत स्वर में कहा, “रानी, दान वापस नहीं होता। अब तो केवल एक ही उपाय है।”

     

    पर उस उपाय की बात आगे की है। अभी तो सत्यभामा अपने किए पर पछतावे के सागर में डूबी हुई थीं। उन्होंने गर्ववश अपने प्राणप्रिय पति को एक ब्राह्मण को दान कर दिया था। और वह दान स्वीकार भी हो चुका था।

     

    महल में सन्नाटा छा गया था। सत्यभामा रोते-रोते बार-बार उसी क्षण को कोस रही थीं जब उन्होंने जल लेकर संकल्प किया था। उनका अभिमान चूर-चूर हो चुका था। और श्रीकृष्ण… वे शांत खड़े नारद जी के साथ जाने को तैयार थे।

     

     

     

    यहीं तक की लीला आज पूरी हुई।

  • एपिसोड 4: रुक्मिणी का प्रश्न – क्या प्रेमिका पत्नी से बड़ी होती है?

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    द्वारका का वह संध्याकाल अत्यंत शांत था। समुद्र की लहरें महल की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं। आकाश में तारे धीरे-धीरे चमकने लगे थे। महल के भीतरी कक्ष में दीपक जल रहे थे। सोने के सिंहासन पर श्रीकृष्ण विराजमान थे। उनके मुख पर वह शांत मुस्कान थी जो सदैव उनके चेहरे पर रहती थी। गले में वैजयन्ती माला और हाथ में बाँसुरी थी, पर वे बाँसुरी नहीं बजा रहे थे। बस समुद्र की ओर देखते हुए मौन बैठे थे।

     

    रुक्मिणी देवी उस समय अपने कक्ष में थीं। पर उनका मन व्याकुल था। कई दिनों से उनके कानों में एक नाम बार-बार गूँज रहा था – राधा। दासी लोग बातें करतीं, सैनिक गोकुल की कथाएँ सुनाते, और कभी-कभी स्वयं कृष्ण भी किसी प्रसंग में ब्रज और राधा का नाम ले लेते। हर बार जब वह नाम आता, रुक्मिणी के हृदय में एक अजीब सा दर्द उठता। वे जानती थीं कि वे कृष्ण की धर्मपत्नी हैं, उनकी प्रधान रानी हैं, लक्ष्मी रूप हैं। फिर भी वह नाम… वह राधा नाम उनके मन को क्यों मथ देता था?

     

    आज वे अधिक देर तक सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने अपना दुपट्टा ठीक किया, माथे पर चंदन का टीका लगाया और धीरे-धीरे कृष्ण के कक्ष की ओर चल दीं। द्वार पर पहुँचकर उन्होंने संकेत किया। कृष्ण ने दृष्टि उठाई और मुस्कुराते हुए कहा, “आओ रुक्मिणी। आज तुम्हारे मुख पर कुछ चिंता की रेखाएँ दिख रही हैं। क्या बात है?”

     

    रुक्मिणी अंदर आईं। उन्होंने कृष्ण के चरणों में अपना सिर रख दिया। कृष्ण ने उन्हें उठाया और पास बिठाया। रुक्मिणी कुछ देर तक चुप रहीं। उनकी आँखों में अश्रु की रेखाएँ थीं, पर वे बह नहीं रहे थे। फिर उन्होंने धीरे से अपना सिर उठाया और कृष्ण की आँखों में आँखें डालकर कहा –

     

    “स्वामी… मैं आपकी पत्नी हूँ। आपने मुझे कुंडिनपुर से उठाकर यहाँ लाया। आपने मुझे अपनी रानी बनाया। मैं आपके घर की लक्ष्मी हूँ। मैंने आपको अपना सब कुछ अर्पण कर दिया। फिर भी… आपके हृदय में वह नाम क्यों बसा रहता है?”

     

    कृष्ण शांत रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस रुक्मिणी को देखते रहे।

     

    रुक्मिणी की आवाज काँप उठी। वे आगे बोलीं, “राधा… वह राधा। ब्रज की वह गोपिका। मैंने सुना है कि आप उसके नाम से ही भर जाते हैं। कभी-कभी रात को जब आप बाँसुरी बजाते हैं तो उस धुन में भी वही नाम छिपा लगता है। स्वामी, मैं पूछना चाहती हूँ… क्या एक प्रेमिका का रिश्ता पत्नी से बड़ा होता है? क्या मेरा पतिधर्म, मेरा समर्पण, मेरा प्रेम… उस प्रेमिका के प्रेम से छोटा है?”

     

    कक्ष में गहरा सन्नाटा छा गया। केवल समुद्र की लहरों की आवाज दूर से आ रही थी। कृष्ण ने धीरे से रुक्मिणी का हाथ अपने हाथ में लिया। उनके स्पर्श में वह वही ममता थी जो सदैव रहती थी। फिर वे बोले –

     

    “रुक्मिणी, तुम्हारा प्रश्न केवल तुम्हारा नहीं है। यह प्रश्न उस हर आत्मा का है जो प्रेम के दो रूपों के बीच उलझ जाती है। तुम सुनो… मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ।”

     

    कृष्ण की आवाज बहुत धीमी और गहरी थी। वे बोले, “राधा और तुम… दोनों मेरे जीवन के दो अलग-अलग अध्याय हो। तुम मेरी धर्मपत्नी हो। तुमने समाज के सामने मेरे साथ गृहस्थ आश्रम स्वीकार किया। तुमने मुझे पुत्र दिए। तुमने द्वारका के राज्य को लक्ष्मी का आशीर्वाद दिया। तुम्हारा प्रेम जिम्मेदारी से भरा है, कर्तव्य से भरा है, और त्याग से भरा है। जब मैं युद्ध पर जाता हूँ तो तुम मंदिर में बैठकर मेरी विजय की प्रार्थना करती हो। जब मैं लौटता हूँ तो पहले तुम्हारे चरण छूता हूँ। तुम मेरी अर्धांगिनी हो। यह सच है।”

     

    रुक्मिणी की आँखों में आँसू आ गए। वे बोलीं, “फिर वह राधा क्या है स्वामी? वह आपके हृदय में क्यों बसती है?”

     

    कृष्ण ने दृष्टि समुद्र की ओर कर ली। मानो वे दूर ब्रज को देख रहे हों। फिर बोले, “राधा… राधा प्रेम का वह रूप है जो किसी बंधन में नहीं बँधता। उसने मुझसे विवाह नहीं किया। उसने मुझसे कोई माँग नहीं की। उसने मुझसे राज्य नहीं माँगा, पुत्र नहीं माँगे, सुख नहीं माँगा। उसने केवल अपना हृदय दे दिया। जब मैं ब्रज छोड़कर आया तो वह रोई, पर उसने मुझे रोका नहीं। उसने कहा – ‘जाओ कान्हा, अपना धर्म निभाओ।’ जिस प्रेम में त्याग इतना गहरा हो कि वह अपने प्रिय को अपने पास बाँधने की इच्छा तक न करे… वह प्रेम साधारण नहीं होता।”

     

    रुक्मिणी अब जोर-जोर से रो रही थीं। वे बोलीं, “तो क्या मेरा प्रेम छोटा है? क्या मैंने कम त्याग किया? मैंने अपने भाई को छोड़ा, अपने पिता का राज्य छोड़ा, सब कुछ छोड़कर आपके रथ पर बैठ गई। क्या वह त्याग कुछ नहीं?”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथों से रुक्मिणी के आँसू पोंछे। उनकी आवाज में अपार कोमलता थी। “नहीं मेरी रानी। तुम्हारा त्याग छोटा नहीं है। तुम्हारा प्रेम भी महान है। पर दोनों प्रेम की दिशा अलग है। तुम्हारा प्रेम जैसे नदी का है जो किनारे बाँधकर बहती है – सुंदर, जीवनदायिनी और स्थिर। राधा का प्रेम जैसे वर्षा का है जो आकाश से बिना किसी बाँध के बरसती है। वह जहाँ गिरती है वहाँ सब कुछ उगा देती है, पर खुद किसी खेत की सीमा में नहीं बँधती।”

     

    कृष्ण थोड़ा रुके। फिर बोले, “रुक्मिणी, जब मैं बाँसुरी बजाता हूँ तो वह धुन ब्रज की याद दिलाती है। वह याद मुझे कमजोर नहीं करती। वह मुझे याद दिलाती है कि प्रेम कितना निर्मल हो सकता है। राधा ने मुझे सिखाया कि असली प्रेम वह है जिसमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ नहीं होता। केवल ‘तुम’ होता है। तुमने मुझे सिखाया कि प्रेम जिम्मेदारी भी होता है, साथ निभाना भी होता है, और समाज के बीच धर्मपूर्वक रहना भी होता है। दोनों आवश्यक हैं।”

     

    रुक्मिणी ने सिर उठाया। उनकी आँखों में अभी भी अश्रु थे, पर अब उनमें समझ की एक हल्की सी रोशनी भी थी। वे बोलीं, “स्वामी… क्या आप कभी राधा को भूल सकते हैं?”

     

    कृष्ण ने धीरे से सिर हिलाया। “नहीं। जैसे मैं तुम्हें नहीं भूल सकता, वैसे ही उसे भी नहीं भूल सकता। पर भूलने और हृदय में स्थान देने में अंतर है। राधा मेरे हृदय के उस हिस्से में है जहाँ कोई दूसरा प्रवेश नहीं कर सकता। वह हिस्सा केवल प्रेम के लिए है – निर्गुण, निराकार और अनंत। और तुम मेरे जीवन के उस हिस्से में हो जहाँ मैं पति हूँ, राजा हूँ और गृहस्थ हूँ। तुम मेरे दिन हो, राधा मेरी रात की स्मृति है। दोनों मिलकर ही मैं पूरा होता हूँ।”

     

    रुक्मिणी अब शांत हो चली थीं। उन्होंने कृष्ण का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया और बोलीं, “मुझे ईर्ष्या होती थी स्वामी। मुझे लगता था कि मैं अधूरी हूँ। लगता था कि आपकी पत्नी होकर भी मैं आपकी सबसे प्रिय नहीं हूँ। पर अब समझ में आया… प्रेम की तुलना नहीं होती। नदी और वर्षा दोनों जल देते हैं, पर उनका ढंग अलग है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने रुक्मिणी को अपने वक्ष से लगा लिया। “ठीक कहा तुमने। तुलना करना ही सबसे बड़ा भ्रम है। तुम मेरी लक्ष्मी हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं, वहाँ नारायण का वास अधूरा है। राधा मेरी भक्ति है। जहाँ भक्ति नहीं, वहाँ भगवान भी अधूरे हैं। तुम दोनों मिलकर मेरी लीला को पूर्ण करती हो।”

     

    कक्ष में दीपक की लौ हिल रही थी। बाहर समुद्र और जोर से गरज रहा था। रुक्मिणी ने कृष्ण के गले में बाहें डाल दीं और बोलीं, “स्वामी, आज के बाद मैं राधा के नाम से नहीं डरसँगी। मैं उन्हें प्रणाम करूँगी। क्योंकि उन्होंने आपको वह प्रेम दिया जो मैं नहीं दे सकती थी। और मैं आपको वह साथ देती हूँ जो वे नहीं दे सकती थीं। दोनों जरूरी हैं।”

     

    कृष्ण ने रुक्मिणी के माथे पर अपने होंठ रखे और बोले, “तुम सच्ची रानी हो रुक्मिणी। केवल द्वारका की नहीं, मेरे हृदय की भी। आज तुमने जो प्रश्न पूछा, उसने तुम्हें और महान बना दिया। ईर्ष्या से ऊपर उठकर समझ तक पहुँचना… यही तो सच्चा प्रेम है।”

     

    दोनों देर तक ऐसे ही बैठे रहे। कोई और शब्द नहीं बोला गया। केवल मौन था – वह मौन जिसमें सब कुछ कह दिया गया था। रुक्मिणी अब शांत थीं। उनके हृदय से वह काँटा निकल चुका था जो कई दिनों से चुभ रहा था। और कृष्ण… कृष्ण जानते थे कि उनकी पत्नी ने आज एक और सीढ़ी चढ़ ली है – प्रेम की उस सीढ़ी पर जहाँ केवल समझने वाले ही पहुँचते हैं।

     

    रात गहराती गई। दीपक धीरे-धीरे बुझने लगे। पर उस कक्ष में एक नई रोशनी जल उठी थी – समझ की, स्वीकार की और गहरे प्रेम की।

     

    रुक्मिणी ने अंतिम बार कहा, “स्वामी, अब आप बाँसुरी बजा सकते हैं। यदि उसमें राधा का नाम भी हो… तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। क्योंकि अब मैं जान गई हूँ कि वह नाम आपके हृदय का हिस्सा है, मेरे विरुद्ध नहीं।”

     

    कृष्ण ने बाँसुरी उठाई। और उस रात द्वारका के महल में जो धुन निकली, उसमें ब्रज भी था, द्वारका भी था… राधा भी थीं, और रुक्मिणी भी थीं।

     

     

  • एपिसोड 3: रुक्मिणी – जो लक्ष्मी बनकर आईं द्वारका

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    मथुरा में कंस का वध हो चुका था। कृष्ण अब केवल गोकुल के कान्हा नहीं रह गए थे। वे यदुवंश के रक्षक, धर्म के स्थापित करने वाले और द्वारका के भावी राजा बन चुके थे। समुद्र के बीचों-बीच उन्होंने एक अद्भुत नगरी बसाई – द्वारका। सोने की दीवारें, रत्नों के महल, और यमुना की जगह अब समुद्र की लहरें उनके चरण धोती थीं। पर उनके हृदय में अभी भी ब्रज की धूल और राधा की स्मृति बसी हुई थी। फिर भी लीला आगे बढ़नी थी।

     

    उधर, दक्षिण दिशा में विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर में एक अपूर्व सुंदरी जन्म ले चुकी थी। उसका नाम था – रुक्मिणी।

     

    रुक्मिणी राजा भीष्मक की पुत्री थीं। उनके बड़े भाई का नाम रुक्मी था, जो स्वभाव से घमंडी और महत्वाकांक्षी था। रुक्मिणी का रूप ऐसा था मानो स्वयं लक्ष्मी धरती पर अवतरित हो गई हों। श्याम वर्ण नहीं, बल्कि गौर वर्ण की वह राजकुमारी थीं। लंबे काले बाल, कमल जैसे नेत्र, और चलते समय ऐसी छवि मानो हिरणी वन में विचर रही हो। पर उनकी सबसे बड़ी सुंदरता उनके हृदय में थी। वे बचपन से ही भगवान विष्णु की परम भक्त थीं।

     

    जब रुक्मिणी किशोरावस्था में पहुंचीं, तो उनके कानों में एक नाम बार-बार पड़ने लगा – कृष्ण। यादव कुल के श्यामसुंदर, जिन्होंने कंस जैसे अत्याचारी का वध किया, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को एक अंगुली पर उठा लिया, और जिनकी बांसुरी की धुन से सारा ब्रज मोहित हो जाता था। राजकुमारियाँ जब उनकी कथाएँ सुनतीं तो मुग्ध हो जातीं, पर रुक्मिणी के हृदय में कुछ और ही घटित हुआ।

     

    एक दिन महल के उपवन में बैठी रुक्मिणी अपनी दासी से कह रही थीं, “सखी, क्या तुमने सुना है? द्वारका में जो कृष्ण रहते हैं, वे साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे तो स्वयं नारायण हैं।” दासी हँसी, “राजकुमारी, आप भी ना! कितने राजकुमार आपसे विवाह करना चाहते हैं, और आप किसी यादव की बात करती हैं?”

     

    रुक्मिणी मुस्कुराईं। उनके नेत्रों में एक अजीब चमक थी। “नहीं सखी। मैंने उनके गुण सुने हैं। वे सत्यवादी हैं, वे शरणागतवत्सल हैं, वे गरीबों के रक्षक हैं। रूप की बात तो बाद में आती है। पहले तो हृदय जीतना होता है। और मेरा हृदय तो उनके नाम से ही जीत लिया गया है।”

     

    धीरे-धीरे रुक्मिणी का प्रेम गहरा होता गया। वे प्रतिदिन मंदिर में जाकर विष्णु भगवान की पूजा करतीं और मन ही मन प्रार्थना करतीं, “हे नाथ! यदि आप वास्तव में कृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं, तो मुझे स्वीकार कीजिए। मैं आपको ही अपना पति बनाना चाहती हूँ।”

     

    पर यहाँ विघ्न भी थे। रुक्मिणी के भाई रुक्मी को कृष्ण से गहरा द्वेष था। वह चाहता था कि उसकी बहन शिशुपाल से विवाह करे। शिशुपाल चेदि देश का राजा था और कंस का मित्र रहा था। रुक्मी ने पिता भीष्मक को समझा-बुझाकर तय कर दिया कि रुक्मिणी का स्वयंवर होगा और उसमें शिशुपाल को ही वरमाला पहनाई जाएगी।

     

    जब रुक्मिणी को यह समाचार मिला तो उनके प्राण जैसे सूख गए। महल के भीतरी कक्ष में वे अकेली बैठी रोने लगीं। उनकी प्रिय दासी ने कहा, “राजकुमारी, आप कुछ कीजिए। नहीं तो आपकी इच्छा अधूरी रह जाएगी।”

     

    रुक्मिणी ने उस रात निर्णय लिया। उन्होंने एक ब्राह्मण को बुलाया। उसका नाम था सुंदर। रुक्मिणी ने अपने हाथों से एक पत्र लिखा। पत्र में शब्दों में आग थी और प्रेम था। उन्होंने लिखा –

     

    “श्रीकृष्णचंद्र को सादर प्रणाम।

    मैं रुक्मिणी, विदर्भराज भीष्मक की पुत्री, आपको अपना हृदय अर्पण करती हूँ। मैंने आपके गुणों को सुनकर आपको अपना पति चुना है। पर मेरे भाई रुक्मी मुझे शिशुपाल को सौंपना चाहते हैं। स्वयंवर के दिन जब मैं मंदिर जाऊँगी, तब आप आकर मुझे अपना लीजिए। यदि आप नहीं आए तो मैं अपनी जान दे दूँगी, क्योंकि आपके बिना जीने का कोई अर्थ नहीं।”

     

    पत्र को ब्राह्मण के हाथों में देते हुए रुक्मिणी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने कहा, “आप इसे स्वयं कृष्ण के हाथ में दीजिए। और उनसे कहना कि रुक्मिणी आपकी प्रतीक्षा कर रही है।”

     

    ब्राह्मण चल पड़े। कई दिनों की यात्रा के बाद वे द्वारका पहुँचे। कृष्ण उस समय सभा में बैठे थे। ब्राह्मण को देखकर वे स्वयं उठकर उनके पास गए और चरण छुए। जब ब्राह्मण ने रुक्मिणी का पत्र दिया तो कृष्ण ने उसे पढ़ा। पढ़ते-पढ़ते उनके मुख पर एक मधुर मुस्कान फैल गई।

     

    उन्होंने ब्राह्मण से कहा, “आप रुक्मिणी से कह देना कि मैं अवश्य आऊँगा। लक्ष्मी को नारायण कैसे छोड़ सकते हैं?”

     

    स्वयंवर का दिन आ गया। कुंडिनपुर में चारों ओर राजा-महाराजाओं का जमावड़ा था। शिशुपाल गर्व से भरा हुआ था। रुक्मी अपनी बहन को शिशुपाल की ओर ले जाने का सपना देख रहा था। भीष्मक राजा भी बाध्य होकर चुप थे।

     

    रुक्मिणी माता के मंदिर में पूजा करने गईं। लाल रंग के वस्त्रों में वे इतनी सुंदर लग रही थीं मानो स्वयं महालक्ष्मी हों। उनके हाथ में वरमाला थी, पर उनका हृदय द्वारका में था।

     

    ठीक उसी समय मंदिर के बाहर हलचल मच गई। एक रथ हवा की तरह उड़ता हुआ आया। रथ पर बैठे थे श्यामसुंदर कृष्ण। पीतांबर धारण किए, गले में वैजयन्ती माला, और मुख पर वह दिव्य तेज। उन्होंने रथ से उतरते ही रुक्मिणी का हाथ पकड़ लिया।

     

    रुक्मिणी ने जैसे ही कृष्ण को देखा, उनके नेत्रों से आँसू बह निकले – पर ये आँसू खुशी के थे। उन्होंने वरमाला कृष्ण के गले में डाल दी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। फिर कोलाहल मच गया।

     

    रुक्मी चिल्लाया, “कृष्ण! तुम मेरी बहन का हरण कैसे कर सकते हो?” शिशुपाल और अन्य राजाओं ने हथियार उठा लिए। पर कृष्ण ने रुक्मिणी को रथ पर बिठाया और रस्सियाँ पकड़ लीं। बलराम भी साथ थे। यादव सैनिकों ने शत्रुओं को रोका।

     

    रथ द्वारका की ओर दौड़ पड़ा। रास्ते में रुक्मी ने पीछा किया। उसने कृष्ण को ललकारा। दोनों में युद्ध हुआ। कृष्ण ने रुक्मी को हराया, पर रुक्मिणी के कहने पर उसकी जान छोड़ दी। केवल उसके सिर के बाल काट दिए और उसे अपमानित करके छोड़ दिया।

     

    जब रथ द्वारका पहुँचा तो सारी नगरी उत्सव में डूब गई। कृष्ण ने विधिवत रुक्मिणी के साथ विवाह किया। वे उनकी पत्नी बनीं – नहीं, उनकी प्रधान रानी बनीं। द्वारका के महल में लक्ष्मी आकर बस गईं।

     

    विवाह के बाद कृष्ण ने रुक्मिणी से कहा, “तुमने मेरे लिए सब कुछ त्याग दिया। अपने भाई को, अपने राज्य को, अपनी सुविधा को। तुम्हारा प्रेम राधा के प्रेम से भिन्न है, पर कम नहीं है। राधा का प्रेम आत्मसमर्पण था, तुम्हारा प्रेम साहस और भक्ति से भरा है।”

     

    रुक्मिणी मुस्कुराईं। उन्होंने कहा, “नाथ, मैं जानती हूँ कि आपके हृदय में ब्रज की राधा बसी हैं। मैं उनसे ईर्ष्या नहीं करती। मैं तो आपकी दासी हूँ। आपने मुझे स्वीकार किया, यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

     

    कृष्ण ने उनके माथे पर हाथ रखा और बोले, “रुक्मिणी, तुम मेरी लक्ष्मी हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं, वहाँ नारायण अधूरे हैं। तुम द्वारका की रानी बनकर रहो, और मेरी लीला में सदा साथ दो।”

     

    उस दिन के बाद रुक्मिणी कृष्ण की सबसे बड़ी सहयोगिनी बन गईं। वे उनकी सलाहकार थीं, उनकी पत्नी थीं, और उनकी परम भक्त थीं। जब भी कृष्ण युद्ध पर जाते, रुक्मिणी मंदिर में बैठकर उनकी विजय की प्रार्थना करतीं। जब वे लौटते तो पहले रुक्मिणी के ही चरण छुते।

     

    रुक्मिणी ने कृष्ण को एक पुत्र भी दिया – प्रद्युम्न, जो कामदेव के अवतार माने गए। उनके जीवन में सुख था, वैभव था, पर सबसे अधिक थी कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति।

     

    कभी-कभी रात के समय जब कृष्ण समुद्र के किनारे खड़े बांसुरी बजाते, तो रुक्मिणी दूर से देखतीं। वे जानती थीं कि वह धुन ब्रज के लिए है, राधा के लिए है। पर वे कभी बीच में नहीं आतीं। वे समझती थीं कि कृष्ण का हृदय इतना विशाल है कि उसमें राधा भी समा सकती हैं और रुक्मिणी भी।

     

    रुक्मिणी की कहानी केवल विवाह की नहीं है। यह उस नारी की कहानी है जिसने समाज की रीति-नीति के विरुद्ध जाकर अपने प्रेम को चुना। जिसने पत्र लिखकर भगवान को बुलाया। जिसने रथ पर बैठकर सब कुछ त्याग दिया। और जिसने अंत तक कृष्ण के चरणों में अपना सब कुछ अर्पण कर दिया।

     

    द्वारका के इतिहास में रुक्मिणी का नाम सदा स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा। क्योंकि वे केवल पत्नी नहीं थीं। वे कृष्ण की धर्मपत्नी थीं, उनकी लक्ष्मी थीं, और उनकी लीला की सहचरी थीं।

     

    और जब कभी कोई भक्त द्वारका जाता है, तो वह रुक्मिणी माता के मंदिर में अवश्य जाता है। वहाँ खड़े होकर कहता है, “माता, आपने साहस दिखाया था। आपने प्रेम को धर्म बनाया था। हमें भी उतना बल दीजिए।”

     

     

    क्योंकि रुक्मिणी केवल इतिहास की पात्र नहीं हैं। वे हर उस आत्मा का प्रतीक हैं जो भगवान को पाने के लिए सब कुछ छोड़ने को तैयार हो जाती है।

  • एपिसोड 2: बिछोह – जब यमुना भी रो पड़ी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    वृन्दावन अब पहले जैसा नहीं रहा था। प्रथम मिलन के बाद से राधा और कृष्ण का प्रेम दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा था। हर सुबह राधा बरसाना से दूध लेकर गोकुल आतीं और हर शाम कृष्ण अपनी गायों के साथ यमुना तट पर राधा का इंतजार करते। उनकी मुलाकातें अब छिपकर नहीं होती थीं। सखा-सहेलियाँ भी जान गई थीं कि राधा और कान्हा एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

     

    कई महीने ऐसे ही बीत गए। होली आई, जन्माष्टमी आई, राखी आई। हर त्योहार में दोनों का मिलन और भी मधुर होता गया। कृष्ण राधा के माथे पर चंदन लगाते, राधा कृष्ण के गले में वनमाला पहनातीं। कभी वे कुंज में छिपकर बैठते, कभी यमुना के जल में पैर डालकर घंटों बातें करते। उनका प्रेम इतना गहरा हो चुका था कि वृन्दावन की हवा में भी “राधे-कृष्ण” की गूंज सुनाई देने लगी थी।

     

    पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।

     

    एक दिन अचानक गोकुल में हलचल मच गई। मथुरा से अक्रूर जी आए थे। कंस ने उन्हें भेजा था। अक्रूर ने नंद बाबा से कहा, “कंस महाराज ने कान्हा और बलराम को मथुरा बुलाया है। वहाँ धनुष यज्ञ है। वे दोनों भाई अवश्य चलें।”

     

    नंद बाबा का हृदय काँप उठा। यशोदा माता तो जैसे पत्थर हो गईं। पर कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “माता, पिता… मुझे जाना ही होगा। कंस का अंत मेरे हाथों ही होना है। यह मेरा अवतार का उद्देश्य है।”

     

    समाचार हवा की तरह पूरे ब्रज में फैल गया। गोप-गोपियाँ रोने लगीं। गायें दुहना बंद कर बैठी रहीं। यमुना का जल जैसे भारी हो गया हो। पर सबसे अधिक पीड़ा हुई राधा को।

     

    जब राधा को यह बात पता चली तो वे जैसे मूच्छित हो गईं। ललिता और विशाखा ने उन्हें संभाला। राधा बार-बार एक ही बात दोहराती रहीं, “कान्हा… मेरे कान्हा जा रहे हैं? मुझसे दूर?”

     

    उस रात राधा ने आँखें नहीं मूंदीं। वे बार-बार अपने हृदय पर हाथ रखकर पूछतीं, “यह हृदय अब किसके लिए धड़केगा?” सुबह होते-होते उन्होंने निर्णय लिया। वे कान्हा से आखिरी बार मिलेंगी।

     

    अगले दिन अक्रूर जी का रथ गोकुल के द्वार पर खड़ा था। बलराम पहले से तैयार थे। कृष्ण ने यशोदा माता के चरण छुए। माता रोते-रोते कह रही थीं, “कान्हा, तुम जल्दी लौटना… मेरा मक्खन चुराता छोरा जल्दी लौटना।” कृष्ण ने माता के आँसू पोंछे और कहा, “माता, मैं शरीर से दूर जा रहा हूँ, पर आत्मा से कभी नहीं जाऊँगा।”

     

    फिर कृष्ण अपने सखाओं से मिले। सभी रो रहे थे। सुदामा ने कहा, “कान्हा, तुम्हारे बिना यह ब्रज सूना हो जाएगा।” कृष्ण ने सभी को गले लगाया।

     

    अब बारी थी राधा की।

     

    कृष्ण जानते थे कि राधा कहीं पास ही होंगी। वे चुपचाप यमुना तट की ओर चल दिए। वहाँ कदंब के पेड़ के नीचे राधा खड़ी थीं। उनके नेत्रों में आँसू भरे थे, होंठ काँप रहे थे। वे कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनके पास गईं और उनके चरणों में गिर पड़ीं।

     

    “कान्हा… तुम सच में जा रहे हो?” राधा की आवाज काँप रही थी।

     

    कृष्ण ने उन्हें उठाया। उनके अपने नेत्र भी गीले थे। उन्होंने राधा का मुख अपने दोनों हाथों में लिया और कहा, “राधे… मुझे जाना ही होगा। यह मेरी लीला है। कंस का वध करना है, धर्म की स्थापना करनी है। मैं यदि नहीं जाऊँगा तो अधर्म और बढ़ेगा।”

     

    राधा रोते हुए बोलीं, “धर्म… अधर्म… ये सब मुझे नहीं समझ आते कान्हा। मुझे तो केवल इतना पता है कि तुम्हारे बिना मेरा जीना असंभव है। तुम चले गए तो यह यमुना सूख जाएगी, ये कुंज मुरझा जाएंगे, मेरा हृदय पत्थर हो जाएगा।”

     

    कृष्ण ने उन्हें अपने वक्ष से लगा लिया। दोनों देर तक ऐसे ही खड़े रहे। आसपास की हवा भी जैसे रुक गई हो। फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “राधे, सुनो… मैं शरीर से मथुरा जा रहा हूँ, पर तुम मेरे हृदय से कभी बाहर नहीं जा सकतीं। तुम मेरी आत्मा हो। जहाँ मैं रहूँगा, वहाँ तुम्हारा नाम मेरे होठों पर रहेगा। हर श्वास में तुम्हारा स्मरण होगा।”

     

    राधा ने सिर उठाया। उनके आँसू कृष्ण के वस्त्रों को भिगो रहे थे। वे बोलीं, “फिर भी तुम जा रहे हो। लोग कहेंगे राधा को छोड़कर कान्हा चले गए। क्या हमारा प्रेम इतना कमजोर था?”

     

    कृष्ण की आँखों से एक आँसू बह निकला। उन्होंने कहा, “नहीं राधे। हमारा प्रेम इतना मजबूत है कि बिछोह भी इसे और गहरा कर देगा। लोग शरीर के मिलन को प्रेम समझते हैं। पर असली प्रेम तो वह है जो बिछोह में भी बना रहे। तुम ब्रज में रहोगी, मैं द्वारका में। पर दोनों जगह एक ही प्रेम साँस लेगा।”

     

    राधा ने कृष्ण की बांसुरी अपने हाथ में ली। वह बांसुरी जो इतने दिनों से उनके हृदय की धड़कन बन चुकी थी। वे बोलीं, “यह बांसुरी मेरे पास रखो। जब तुम दूर होगे तो मैं इसे देखकर तुम्हें याद करूँगी। और तुम… तुम जब भी बांसुरी बजाओगे, तो याद रखना कि राधा कहीं दूर खड़ी तुम्हारी धुन सुन रही है।”

     

    कृष्ण ने बांसुरी राधा के हाथ में ही रहने दी। उन्होंने अपनी वनमाला उतारी और राधा के गले में पहनानी चाही, पर राधा ने रोक दिया। “नहीं कान्हा… यह माला तुम्हारे गले में ही रहनी चाहिए। जब लोग तुम्हें देखेंगे तो कहेंगे कि यह माला राधा ने पहनाई थी।”

     

    दोनों फिर चुप हो गए। शब्दों की कोई जरूरत नहीं थी। केवल नेत्र ही सब कुछ कह रहे थे। राधा ने अचानक कृष्ण के चरण छुए और कहा, “एक वचन दो कान्हा… कि तुम कभी मुझे भूलोगे नहीं।”

     

    कृष्ण ने राधा को फिर से गले लगाया और बोले, “राधे, जब तक सूरज निकलेगा, जब तक यमुना बहेगी, जब तक ब्रज की धूल रहेगी… तब तक मैं तुम्हें नहीं भूल सकता। तुम मेरे प्राण हो। प्राण भला कैसे भूले जाते हैं?”

     

    उसी समय अक्रूर जी का स्वर सुनाई दिया, “कान्हा… रथ तैयार है। देर हो रही है।”

     

    कृष्ण ने राधा से अपने को अलग किया। यह क्षण दोनों के लिए असह्य था। राधा के पैर काँप रहे थे। वे गिर न जाएँ, इसलिए ललिता और विशाखा ने उन्हें संभाल लिया। कृष्ण ने एक अंतिम बार राधा की ओर देखा। उनकी आँखों में अपार प्रेम और अपार वेदना दोनों साथ-साथ थे।

     

    फिर वे रथ की ओर चल दिए।

     

    रथ चल पड़ा। पहिए धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ने लगे। गोप-गोपियाँ रथ के पीछे-पीछे दौड़ने लगीं। कोई चीख रहा था, कोई रो रहा था। गायें रंभाने लगीं। यशोदा माता बेहोश हो गईं। नंद बाबा का हृदय जैसे टूट गया हो।

     

    पर राधा… राधा वहीं कदंब के पेड़ के नीचे खड़ी रहीं। वे दौड़ी नहीं। वे चिल्लाईं नहीं। केवल खड़े-खड़े देखती रहीं जैसे रथ धीरे-धीरे उनकी आँखों से ओझल होता जा रहा है। उनके हाथ में कृष्ण की बांसुरी थी। आँसू उनकी आँखों से लगातार बह रहे थे, पर वे पोंछती तक नहीं थीं।

     

    जब रथ दृष्टि से पूरी तरह गायब हो गया, तब राधा ने धीरे से बांसुरी को अपने हृदय से लगा लिया और बोलीं, “जाओ कान्हा… जाओ। अपना धर्म निभाओ। पर याद रखना… यहाँ ब्रज में एक राधा बैठी तुम्हारा इंतजार करेगी। चाहे जन्म बीत जाएँ, चाहे युग बीत जाएँ… मेरा इंतजार खत्म नहीं होगा।”

     

    उस दिन के बाद से वृन्दावन बदल गया।

     

    यमुना का जल पहले जैसा स्वच्छ नहीं रहा। लगता था मानो नदी भी रो रही हो। कुंज के फूल मुरझाने लगे। गायें दूध देना कम कर गईं। गोपियाँ अब हँसती नहीं थीं। और राधा… राधा अब पहले जैसी नहीं रहीं।

     

    वे पूरे दिन उस कदंब के पेड़ के नीचे बैठी रहतीं जहाँ अंतिम बार कान्हा से मिली थीं। कभी बांसुरी को देखतीं, कभी यमुना की ओर टकटकी लगाए रहतीं। ललिता उन्हें समझाती, “सखी, रोओ मत। कान्हा जरूर लौटेंगे।” पर राधा केवल सिर हिला देतीं।

     

    रात को जब सारा ब्रज सो जाता, तो राधा अकेली यमुना तट पर चली जातीं। वहाँ बैठकर वे धीरे-धीरे गातीं –

     

    “कान्हा तुमने छोड़ दिया ब्रज को…

    छोड़ दिया राधा को…

    अब यह हृदय कहाँ जाएगा…

    अब यह प्रेम किसे सौंपूँगी…”

     

    उनकी आवाज में इतना दर्द होता कि यमुना का जल भी थम सा जाता। हवा भी जैसे उनकी पीड़ा सुनने के लिए रुक जाती।

     

    दिन बीतते गए। समाचार आने लगे कि कृष्ण ने कंस का वध कर दिया। मथुरा में वे राजा बन गए। फिर द्वारका नगरी बसाई। रुक्मिणी से विवाह हुआ। फिर सत्यभामा से। समाचार पर समाचार आते रहे। पर राधा के पास केवल एक ही समाचार आता – कान्हा अब ब्रज नहीं लौटेंगे।

     

    फिर भी राधा ने प्रतीक्षा नहीं छोड़ी।

     

    वे कहतीं, “शरीर से भले ही दूर हों, पर मेरा कान्हा मुझे कभी नहीं छोड़ सकता। वह मेरे भीतर रहता है। हर साँस में, हर धड़कन में।”

     

    और सच में… जब भी कोई भक्त राधा-कृष्ण का नाम लेता, जब भी कोई बांसुरी की धुन सुनता, जब भी कोई यमुना तट पर बैठकर प्रेम की बात करता… तो लगता मानो राधा और कृष्ण अभी भी वहीं कहीं मौजूद हैं।

     

    क्योंकि उनका बिछोह शरीर का था।

    आत्मा का नहीं।

     

    और जो प्रेम आत्मा से जुड़ा हो,

    वह कभी बिछड़ नहीं सकता।

     

  • एपिसोड 1: प्रथम मिलन – यमुना के तट पर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एपिसोड 1: प्रथम मिलन – यमुना के तट प

     

    वृन्दावन की भूमि उस समय स्वर्ग से भी अधिक सुंदर लगती थी। वर्षा ऋतु अभी-अभी विदा हुई थी और शरद् का स्वच्छ आकाश नीले रंग से चमक रहा था। यमुना नदी का जल स्वच्छ और शांत बह रहा था। दोनों तटों पर कदंब, तमाल और आम के वृक्ष अपनी छाया फैलाए खड़े थे। गोप-गोपियों के हंसी-खेल की गूंज दूर-दूर तक फैल रही थी, पर आज का दिन कुछ और ही विशेष होने वाला था।

     

    उस दिन गोकुल के नंद बाबा के आंगन में बालक कृष्ण अपनी सखाओं के साथ खेल रहे थे। उनकी आयु लगभग ग्यारह-बारह वर्ष की थी, पर उनके नेत्रों में वह दिव्य चमक थी जो सामान्य बालक में नहीं होती। मां यशोदा ने उन्हें दूध-दही खिलाया, गले में वनमाला पहनाई और कहा, “कान्हा, आज यमुना तट पर ज्यादा देर मत लगाना। शाम होते-होते लौट आना।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। उनके मुख पर वह मधुर मुस्कान थी जिससे सारी सृष्टि मोहित हो जाती थी। वे बांसुरी लेकर सखाओं सुदामा, मधुमंगल, श्रीदाम और सुबल के साथ यमुना की ओर चल पड़े। रास्ते में वे गायों को हांकते जा रहे थे। उनकी बांसुरी की धुन इतनी मधुर थी कि पेड़-पौधे भी झूमने लगते थे और पक्षी चुपचाप सुनने लगते थे।

     

    उधर बरसाना की ओर, वृषभानु बाबा की पुत्री राधा भी अपनी सहेलियों के साथ यमुना तट पर जा रही थीं। राधा उस समय किशोरावस्था में थीं। उनका रूप ऐसा था मानो लक्ष्मी स्वयं धरती पर उतर आई हों। श्याम वर्ण के बालों में वेणी बंधी हुई, माथे पर सिंदूर की जगह चंदन का टीका, गले में मोतियों की माला और पीतांबर रंग का घाघरा-चोली। उनके नेत्रों में वह भाव था जो प्रेम और करुणा दोनों को एक साथ समेटे हुए थे।

     

    राधा की सहेलियाँ – ललिता, विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा और रंगदेवी – उनके साथ थीं। ललिता ने कहा, “सखी, आज तुम्हारा मन किसी और ही लोक में घूम रहा है। क्या बात है?”

     

    राधा ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “कुछ नहीं सखी… बस यमुना का जल आज बहुत स्वच्छ लग रहा है।” पर वास्तव में उनके हृदय में एक अजीब सी बेचैनी थी। रात भर उन्हें स्वप्न में एक श्याम वर्ण का बालक बांसुरी बजाता दिखाई दिया था। उसकी धुन इतनी मधुर थी कि जागने के बाद भी वह उनके कानों में गूंज रही थी।

     

    जब राधा और उसकी सहेलियाँ यमुना के घाट पर पहुंचीं, तब कृष्ण भी दूसरी ओर से घाट पर आ चुके थे। गायें पानी पी रही थीं और सखागण पेड़ों की छाया में बैठकर फल खा रहे थे। कृष्ण ने बांसुरी अपने होठों पर रखी और एक धीमी, मधुर धुन बजानी शुरू की।

     

    वह धुन…

     

    जैसे ही वह स्वर यमुना के जल पर तैरता हुआ राधा तक पहुंचा, उनके कदम रुक गए। उनके हृदय की धड़कन अचानक तेज हो गई। ललिता ने पीछे से पुकारा, “राधे! क्या हुआ?” पर राधा कुछ सुन ही नहीं पा रही थीं। उनकी दृष्टि उस दिशा में चली गई जहाँ से बांसुरी की आवाज आ रही थी।

     

    कृष्ण ने भी अपनी आँखें उठाईं। और उसी क्षण…

     

    समय थम गया।

     

    दोनों की दृष्टि एक-दूसरे से टकराई। यमुना का जल बहना बंद हो गया हो ऐसा आभास हुआ। हवा में अचानक मधु की सुगंध फैल गई। पेड़ों के पत्ते हिलना बंद हो गए। सखा और सहेलियाँ यह देखकर अचंभित रह गए कि दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे हैं मानो युगों-युगों से एक-दूसरे को खोज रहे हों।

     

    कृष्ण की बांसुरी उसके होठों से अलग हो गई। उन्होंने धीरे से कहा, मानो स्वयं से बात कर रहे हों, “तुम… तुम वही हो ना?”

     

    राधा कुछ बोल न सकीं। उनके नेत्रों में अश्रु भर आए, पर वे अश्रु दुख के नहीं, अपार आनंद के थे। वे धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनके पैर जैसे स्वयं ही उस ओर जा रहे थे। ललिता और विशाखा ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, पर राधा ने केवल हाथ हिलाकर संकेत किया कि वे कुछ न बोलें।

     

    दोनों के बीच की दूरी कम होती गई। जब वे एक-दूसरे के निकट पहुंचे तो कृष्ण ने धीरे से अपना दाहिना हाथ बढ़ाया। राधा ने भी अपना बायाँ हाथ आगे किया। दोनों के हाथ हवा में मिले… और उसी क्षण एक दिव्य प्रकाश चारों ओर फैल गया। यमुना का जल सोने के समान चमक उठा। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “मैंने तुम्हें युगों से खोजा है। प्रत्येक जन्म में, प्रत्येक लोक में… और आज यहाँ, यमुना के इस तट पर, मैंने तुम्हें पा लिया।”

     

    राधा की आँखों से अश्रु बह निकले। उन्होंने धीरे से उत्तर दिया, “और मैंने भी तुम्हें खोजा है कान्हा… प्रत्येक श्वास में, प्रत्येक धड़कन में। आज जब तुम्हारी बांसुरी ने पुकारा, तो मेरा हृदय पहचान गया कि वह आवाज मेरी ही है।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। कोई और शब्द नहीं बोले। बस नेत्रों से ही सारा प्रेम कह दिया। वह प्रेम जो शरीर का नहीं, आत्मा का था। जो इस लोक का नहीं, लोकों के पार का था।

     

    सखा मधुमंगल जो स्वभाव से थोड़े चंचल थे, आगे बढ़े और बोले, “अरे कान्हा! यह कौन है? इतनी सुंदर तो मैंने कभी नहीं देखी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह राधा है… मेरी राधा।”

     

    ललिता ने भी आगे बढ़कर कहा, “और यह कान्हा है… हमारी राधा के कान्हा।”

     

    उस दिन दोनों ने बहुत देर तक यमुना के तट पर समय बिताया। कृष्ण ने राधा के लिए बांसुरी बजाई। राधा ने कृष्ण के बालों में फूल लगाए। उन्होंने एक-दूसरे से बचपन की बातें कीं, गोकुल और बरसाना की बातें कीं। कृष्ण ने बताया कि कैसे वे मक्खन चुराते हैं और राधा ने हँसते हुए कहा कि वे भी कभी-कभी दूध में पानी मिला देती हैं।

     

    सूरज ढलने लगा था। आकाश में लालिमा फैल गई थी। यशोदा माता का डर कृष्ण के मन में था, और वृषभानु बाबा का डर राधा के मन में। दोनों को लौटना था।

     

    बिछड़ने से पहले कृष्ण ने राधा का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “राधे, आज जो मिलन हुआ है, वह केवल इस जन्म का नहीं है। यह तो केवल आरंभ है। तुम मेरी प्राण हो, मेरी आत्मा हो। जब तक यह सृष्टि है, तब तक हमारा यह प्रेम रहेगा।”

     

    राधा ने भी उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “कान्हा, मैं तुम्हारी छाया बनकर रहूँगी। चाहे तुम गोकुल में रहो या द्वारका में, चाहे तुम ग्वाला बने रहो या राजा… मेरा हृदय सदैव तुम्हारे पास रहेगा।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को अंतिम बार देखा। फिर कृष्ण अपनी गायों और सखाओं के साथ गोकुल की ओर चल दिए, और राधा अपनी सहेलियों के साथ बरसाना की ओर।

     

    पर उस दिन के बाद से…

     

    हर शाम जब कृष्ण बांसुरी बजाते, तो राधा यमुना तट पर आ जातीं। और हर सुबह जब राधा दूध लेकर गोकुल जातीं, तो रास्ते में कृष्ण उनसे मिलने आ जाते। उनका प्रेम दिन-ब-दिन गहरा होता गया। वह प्रेम जो शब्दों से परे था, जो लोक-लाज से ऊपर था, जो केवल दो आत्माओं के मिलन का नाम था।

     

    यमुना आज भी उस मिलन की साक्षी है। कदंब के वृक्ष आज भी उस दिन की बातें करते हैं। और जब कभी कोई भक्त वृन्दावन आता है और यमुना के तट पर बैठता है, तो उसे आज भी कभी-कभी वह मधुर बांसुरी की धुन सुनाई दे जाती है… और साथ ही राधा की हल्की सी हंसी भी।

     

    क्योंकि जो मिलन दिव्य होता है, वह कभी समाप्त नहीं होता। वह तो केवल रूप बदल-बदल कर सदा बना रहता है।

     

     

     

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

     

    (भाग 15 — वृंदावन की मधुर बाल-लीलाओं का भावपूर्ण समापन)

     

     

     

    वृंदावन में एक ऐसी सुबह हुई, जैसी पहले कभी नहीं हुई थी।

     

    आकाश साफ था।

     

    यमुना का जल शांत था।

     

    कदंब के वृक्षों पर पक्षी मधुर स्वर में चहचहा रहे थे।

     

    गायें अपने बछड़ों के पास खड़ी थीं और उनके गले में बँधी घंटियाँ हवा के साथ धीरे-धीरे बज रही थीं।

     

    वृंदावन की गलियाँ वही थीं।

     

    नंद बाबा का भवन वही था।

     

    यशोदा मैया का आँगन वही था।

     

    गोवर्धन पर्वत भी उसी प्रकार खड़ा था।

     

    लेकिन फिर भी…

     

    सब कुछ जैसे बदल गया था।

     

    क्योंकि उन गलियों में आज कृष्ण की शरारती हँसी पहले जैसी नहीं गूँज रही थी।

     

    वही कन्हैया, जो कभी सुबह होते ही घर से बाहर भाग जाते थे, आज कुछ अधिक शांत दिखाई दे रहे थे।

     

    यशोदा मैया उन्हें देखतीं तो उनका हृदय भर आता।

     

    उन्हें याद आता—

     

    जब कृष्ण बहुत छोटे थे, तब वह उनकी उँगली पकड़कर चलते थे।

     

    कभी लड़खड़ाते हुए गिर जाते।

     

    फिर उठकर मैया की ओर देखते और हँस देते।

     

    मैया उन्हें गोद में उठा लेतीं।

     

    “मेरा लाल!”

     

    और कृष्ण उनकी गोद में सिर रखकर मुस्कुरा देते।

     

    समय कितनी जल्दी बीत गया था।

     

    कल तक जो बालक माखन की मटकी के लिए घर-घर घूमता था, वही अब बड़ा होने लगा था।

     

    यशोदा मैया को अपनी हर पुरानी बात याद आने लगी।

     

    कभी कृष्ण माखन चुराकर भागते थे।

     

    कभी गोपियाँ शिकायत लेकर आती थीं।

     

    “मैया! तुम्हारा कन्हैया हमारे घर का सारा माखन खा गया।”

     

    यशोदा मैया कृष्ण को बुलातीं—

     

    “कन्हैया!”

     

    कृष्ण दूर खड़े होकर मासूम चेहरा बना लेते।

     

    “मैया, मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    मैया कहतीं,

     

    “तो फिर माखन कहाँ गया?”

     

    कृष्ण कहते,

     

    “बिल्ली खा गई होगी।”

     

    गोपियाँ हँसने लगतीं।

     

    कृष्ण भी मुस्कुराते।

     

    वही नटखटपन…

     

    वही मुस्कान…

     

    वही बड़ी-बड़ी आँखें…

     

    सब कुछ जैसे कल की ही बात हो।

     

    फिर यशोदा मैया को वह दिन याद आया जब उन्होंने कृष्ण को रस्सी से बाँधने का प्रयास किया था।

     

    कितनी रस्सियाँ जोड़ ली थीं, फिर भी वह छोटी पड़ जाती थीं।

     

    लेकिन जब कृष्ण ने स्वयं अपने भक्त के प्रेम को स्वीकार किया, तब वही अनंत भगवान एक छोटी-सी रस्सी से बँध गए।

     

    यशोदा मैया की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा—

     

    “मेरे लाल, तुम कितने बड़े हो, यह मैं कभी समझ नहीं पाई। मेरे लिए तो तुम हमेशा मेरे बच्चे ही रहे।”

     

    वह मुस्कुराईं।

     

    “और शायद यही मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

     

    उधर कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ बैठे थे।

     

    सुदामा, श्रीदामा और दूसरे सखा उन्हें घेरकर बैठे थे।

     

    एक बालक बोला,

     

    “कन्हैया, याद है जब हम सब जंगल में खो गए थे?”

     

    दूसरा बोला,

     

    “और याद है जब तुमने हमें इतना हँसाया था कि हमारे पेट में दर्द होने लगा था?”

     

    तीसरा हँसते हुए बोला,

     

    “और जब तुमने मेरा भोजन चुरा लिया था?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “मैंने कब चुराया था?”

     

    सब एक साथ बोले,

     

    “तुम हमेशा यही कहते हो!”

     

    चारों ओर हँसी गूँज उठी।

     

    लेकिन उस हँसी के भीतर एक हल्की-सी उदासी भी थी।

     

    सब जानते थे कि बचपन हमेशा नहीं रहता।

     

    दिन बदलते हैं।

     

    ऋतुएँ बदलती हैं।

     

    समय आगे बढ़ता है।

     

    और बचपन की स्मृतियाँ धीरे-धीरे कहानी बन जाती हैं।

     

    लेकिन कृष्ण की बाल-लीलाएँ साधारण स्मृतियाँ नहीं थीं।

     

    वह तो वृंदावन के जीवन का प्राण बन चुकी थीं।

     

    एक गाय कृष्ण को देखकर रंभाने लगी।

     

    कृष्ण उसके पास गए।

     

    उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    गाय ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    मानो वह कह रही हो—

     

    “कन्हैया, हमें छोड़कर मत जाना।”

     

    कृष्ण ने उसके माथे को सहलाया।

     

    उनकी आँखों में भी प्रेम था।

     

    वृंदावन की गायें कृष्ण से कितना प्रेम करती थीं, यह कोई शब्दों में नहीं बता सकता।

     

    जब कृष्ण वन में जाते, गायें उनके पीछे चल पड़तीं।

     

    जब कृष्ण बाँसुरी बजाते, तो वे चरना भूलकर उनकी ओर देखने लगतीं।

     

    जब कृष्ण देर से लौटते, तो उनके आने तक जैसे पूरा वन प्रतीक्षा करता रहता।

     

    यमुना भी कृष्ण से कम प्रेम नहीं करती थी।

     

    उसके तट पर कृष्ण ने कितने ही दिन बिताए थे।

     

    कभी सखाओं के साथ खेलते।

     

    कभी पानी में उतर जाते।

     

    कभी कदंब वृक्ष पर चढ़ते।

     

    और कभी अपनी बाँसुरी बजाकर वातावरण को ऐसा मधुर बना देते कि पक्षी तक चुप हो जाते।

     

    यमुना की लहरें आज भी उनके चरणों को याद करती थीं।

     

    कालिय नाग का विष भी जिस यमुना को दूषित कर चुका था, उसी यमुना को कृष्ण ने अपने स्पर्श से फिर निर्मल किया था।

     

    और फिर गोवर्धन…

     

    वह पर्वत तो कृष्ण की बाल-लीला का साक्षी बन चुका था।

     

    जब इंद्र के क्रोध से वृंदावन पर भयंकर वर्षा हुई थी, तब नंदलाल ने अपनी छोटी-सी उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया था।

     

    उस दिन वृंदावनवासियों ने देखा था कि प्रेम के लिए ईश्वर किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।

     

    कृष्ण ने उन्हें केवल वर्षा से नहीं बचाया था।

     

    उन्होंने उनके मन से भय भी निकाल दिया था।

     

    यही कृष्ण थे।

     

    जो संकट में रक्षा करते थे।

     

    जो दुख में मुस्कान देते थे।

     

    जो रोते हुए को हँसा देते थे।

     

    जो अहंकार को झुका देते थे।

     

    जो शत्रु को भी सुधारने का अवसर देते थे।

     

    और जो अपने भक्तों के लिए स्वयं बालक बन जाते थे।

     

    यशोदा मैया धीरे-धीरे बाहर आईं।

     

    कृष्ण को देखकर कुछ पल उन्हें निहारती रहीं।

     

    फिर उन्होंने पुकारा,

     

    “कन्हैया!”

     

    कृष्ण तुरंत उनकी ओर मुड़े।

     

    “जी मैया?”

     

    यशोदा ने कहा,

     

    “इधर आओ।”

     

    कृष्ण उनके पास गए।

     

    मैया ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया।

     

    कृष्ण शांत रहे।

     

    यशोदा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “लाला… तू चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, मेरे लिए हमेशा वही छोटा-सा कन्हैया रहेगा।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “मैया, मैं कहीं नहीं जाऊँगा।”

     

    यशोदा ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।

     

    लेकिन समय अपनी गति से चलता रहा।

     

    कृष्ण को वृंदावन से आगे जाना था।

     

    उनकी लीला का अगला अध्याय उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

     

    लेकिन वृंदावन के लिए यह विदाई केवल किसी बालक की विदाई नहीं थी।

     

    यह उनके हृदय के एक हिस्से की विदाई थी।

     

    ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर खड़े थे।

     

    श्रीदामा की आँखें नम थीं।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “कन्हैया, क्या तुम हमें भूल जाओगे?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अपने सखा को कोई भूल सकता है क्या?”

     

    एक अन्य बालक बोला,

     

    “फिर हमारे साथ खेलने कौन आएगा?”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “जब भी तुम मुझे याद करोगे, मैं तुम्हारे पास रहूँगा।”

     

    बालक ने पूछा,

     

    “सच?”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “बिल्कुल सच।”

     

    उसने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    वृंदावन के पेड़ जैसे मौन होकर यह दृश्य देख रहे थे।

     

    हवा धीरे-धीरे चल रही थी।

     

    यमुना की लहरें किनारे से टकरा रही थीं।

     

    ऐसा लग रहा था मानो पूरा वृंदावन कृष्ण को रोकना चाहता हो।

     

    लेकिन लीला को आगे बढ़ना था।

     

    कृष्ण ने एक बार पीछे मुड़कर वृंदावन को देखा।

     

    उनकी आँखों के सामने सब कुछ था—

     

    नंद बाबा का घर।

     

    यशोदा मैया का आँगन।

     

    गोपियों की गलियाँ।

     

    गायों के झुंड।

     

    ग्वाल-बालों की हँसी।

     

    यमुना का तट।

     

    गोवर्धन पर्वत।

     

    कदंब के वृक्ष।

     

    माखन की मटकी।

     

    और उनके बचपन की अनगिनत स्मृतियाँ।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    फिर उन्होंने अपनी बाँसुरी उठाई।

     

    बाँसुरी के होंठों से लगते ही एक मधुर धुन निकली।

     

    वह धुन इतनी करुण और मधुर थी कि जैसे पूरा वृंदावन कुछ क्षण के लिए स्थिर हो गया।

     

    गायें रुक गईं।

     

    पक्षी चुप हो गए।

     

    हवा थम-सी गई।

     

    यमुना की लहरें भी जैसे उस संगीत को सुनने लगीं।

     

    यशोदा मैया ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उनके कानों में वही स्वर गूँज रहा था।

     

    उनके हृदय में वही बालक बस रहा था।

     

    नंद बाबा की आँखों में भी आँसू थे।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा—

     

    “लाला, तू जहाँ भी रहे, सुखी रहे।”

     

    कृष्ण की बाँसुरी की धुन धीरे-धीरे दूर होती गई।

     

    लेकिन वह धुन वृंदावन से कभी गई नहीं।

     

    क्योंकि कुछ ध्वनियाँ कानों से नहीं, हृदय से सुनी जाती हैं।

     

    कृष्ण की बाल-लीलाएँ भी ऐसी ही थीं।

     

    वे केवल एक समय की घटनाएँ नहीं थीं।

     

    वे प्रेम की ऐसी कथाएँ थीं जो युगों-युगों तक मनुष्य के हृदय को छूती रहेंगी।

     

    जब कोई माँ अपने बच्चे को प्यार से गले लगाएगी, उसमें यशोदा का वात्सल्य दिखाई देगा।

     

    जब कोई मित्र अपने मित्र के लिए सब कुछ छोड़ देगा, उसमें कृष्ण और ग्वाल-बालों की मित्रता दिखाई देगी।

     

    जब कोई प्रकृति का सम्मान करेगा, उसमें गोवर्धन पूजा का संदेश दिखाई देगा।

     

    जब कोई अहंकार छोड़कर प्रेम को अपनाएगा, उसमें इंद्र की सीख दिखाई देगी।

     

    जब कोई संकट में किसी की रक्षा करेगा, उसमें गोवर्धन धारण करने वाले कृष्ण की झलक दिखाई देगी।

     

    और जब कोई अपने हृदय में भगवान को प्रेम से पुकारेगा…

     

    तो शायद उसे भी वही बाँसुरी सुनाई देगी।

     

    वह बाँसुरी जो कहती है—

     

    “मैं तुम्हारे पास हूँ।”

     

    वृंदावन की मिट्टी में कृष्ण के चरणों के निशान जैसे हमेशा के लिए अंकित हो गए।

     

    कदंब के वृक्ष उनकी प्रतीक्षा करते रहे।

     

    यमुना उनकी स्मृति सँजोए बहती रही।

     

    गायें उनकी राह देखती रहीं।

     

    ग्वाल-बाल उनकी बातें करते रहे।

     

    और यशोदा मैया…

     

    वह तो हर सुबह अपने आँगन में जैसे आज भी अपने कन्हैया को खोजती थीं।

     

    कभी माखन की मटकी देखतीं तो मुस्कुरा देतीं।

     

    कभी आँगन में किसी बच्चे की हँसी सुनतीं तो पलटकर देखतीं।

     

    कभी किसी को “कन्हैया” पुकारते सुनतीं तो उनका हृदय धड़क उठता।

     

    क्योंकि माँ का प्रेम समय से बँधा नहीं होता।

     

    बच्चा दूर चला जाए, फिर भी माँ की गोद में उसकी जगह खाली नहीं होती।

     

    कृष्ण भी वृंदावन से दूर गए होंगे…

     

    लेकिन वृंदावन कभी कृष्ण से दूर नहीं हुआ।

     

    कृष्ण के लिए वृंदावन केवल एक स्थान नहीं था।

     

    वह प्रेम था।

     

    वह माँ का आँचल था।

     

    वह मित्रों की हँसी थी।

     

    वह गायों की ममता थी।

     

    वह यमुना की लहरें थीं।

     

    वह गोवर्धन की छाया थी।

     

    वह बालपन था।

     

    और शायद इसी कारण आज भी जब कोई प्रेम से कृष्ण का नाम लेता है, तो उसके साथ “वृंदावन” का नाम अपने आप जुड़ जाता है।

     

    राधे-कृष्ण।

     

    दो नाम।

     

    एक प्रेम।

     

    एक अनंत कथा।

     

    और इस कथा का सबसे सुंदर रहस्य यही है कि भगवान को पाने के लिए हमेशा बड़े-बड़े यज्ञ, तप या कठिन साधना ही आवश्यक नहीं।

     

    कभी-कभी एक माँ का निष्कलंक प्रेम ही पर्याप्त होता है।

     

    एक मित्र की सच्ची मित्रता ही पर्याप्त होती है।

     

    एक भक्त की सरल पुकार ही पर्याप्त होती है।

     

    कृष्ण ने अपने बचपन की लीलाओं से यही तो सिखाया—

     

    ईश्वर को पाने का सबसे सरल मार्ग प्रेम है।

     

    जहाँ प्रेम है, वहाँ कृष्ण हैं।

     

    जहाँ करुणा है, वहाँ कृष्ण हैं।

     

    जहाँ सच्ची मित्रता है, वहाँ कृष्ण हैं।

     

    जहाँ किसी के आँसू पोंछने वाला हृदय है, वहाँ कृष्ण हैं।

     

    और जहाँ कोई पूरे विश्वास से कहता है—

     

    “हे नंदलाल, मेरे साथ रहना…”

     

    वहाँ कृष्ण कभी दूर नहीं जाते।

     

    वृंदावन की कथा समाप्त नहीं होती।

     

    क्योंकि कृष्ण की कथा कभी समाप्त हो ही नहीं सकती।

     

    उनकी बाल-लीलाएँ समाप्त हो सकती हैं, लेकिन उनका प्रेम नहीं।

     

    उनका बचपन बीत सकता है, लेकिन उनकी मुस्कान नहीं।

     

    उनकी बाँसुरी की धुन दूर जा सकती है, लेकिन उसकी गूँज भक्त के हृदय से कभी नहीं जाती।

     

    आज भी जब भोर के समय वृंदावन की गलियों में हवा चलती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई धीरे से पुकार रहा हो—

     

    “कन्हैया…”

     

    और शायद उसी क्षण किसी को दूर से बाँसुरी की बहुत हल्की-सी धुन सुनाई देती है।

     

    यमुना की लहरें जैसे कहती हैं—

     

    “वह यहीं है।”

     

    गोवर्धन जैसे कहता है—

     

    “वह यहीं है।”

     

    वृंदावन की धूल जैसे कहती है—

     

    “वह यहीं है।”

     

    और प्रेम से भरा हर हृदय कहता है—

     

    “हाँ… मेरा नंदलाल आज भी यहीं है।”

     

    यही थी हमारे नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाओं की यात्रा।

     

    एक नन्हे बालक के रूप में गोकुल में आगमन से लेकर…

     

    यशोदा मैया की गोद तक…

     

    पूतना के उद्धार से लेकर…

     

    शकटासुर और तृणावर्त के अंत तक…

     

    माखन चोरी और मटकी फोड़ने की शरारतों से लेकर…

     

    यशोदा मैया के प्रेम में बँधने तक…

     

    यमलार्जुन वृक्षों के उद्धार से लेकर…

     

    ग्वाल-बालों के साथ हँसी-खेल तक…

     

    माटी के छोटे-से कण में पूरा ब्रह्मांड दिखाने से लेकर…

     

    ब्रह्मा जी के मोह को दूर करने तक…

     

    कालिय नाग के विष को समाप्त करने से लेकर…

     

    गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी-सी उँगली पर धारण करने तक…

     

    हर लीला हमें एक ही बात सिखाती है—

     

    कृष्ण को समझना कठिन है,

    लेकिन कृष्ण को प्रेम करना बहुत सरल है।

     

    इसलिए जब भी जीवन में कोई कठिनाई आए…

     

    जब मन उदास हो…

     

    जब रास्ता समझ न आए…

     

    बस आँखें बंद करके अपने मन से कहना—

     

    “हे नंदलाल, जैसे आपने वृंदावन की रक्षा की थी, वैसे ही मेरे हृदय की भी रक्षा करना।

    मेरे भीतर का भय दूर करना।

    मेरे भीतर का अहंकार मिटाना।

    और मेरे हृदय में अपने प्रेम की थोड़ी-सी जगह बना लेना।”

     

    शायद तब…

     

    कहीं बहुत दूर से…

     

    यमुना की लहरों के पार…

     

    कदंब के वृक्षों के बीच…

     

    गोवर्धन की छाया में…

     

    आपको भी एक मधुर बाँसुरी सुनाई दे—

     

    “मैं यहीं हूँ…”

     

    और तब समझ लेना—

     

    नंदलाल की बाल-लीलाएँ समाप्त नहीं हुईं।

    वे आज भी उस हर हृदय में चल रही हैं,

    जहाँ कृष्ण के लिए सच्चा प्रेम है।

     

    जय श्रीकृष्ण।❤️❤️

     

    जय नंदलाल।❤️❤️

     

    🙏||राधे राधे||❤️❤️

     

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

     

     

     

    (भाग 14 — गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला)

     

     

     

     

    वृंदावन में शरद ऋतु का सुहावना समय था। आकाश निर्मल था। यमुना की लहरें चाँदनी में चमकती थीं और गोवर्धन पर्वत के आसपास हरी-हरी घास की चादर बिछी हुई थी।

     

     

    गायों के झुंड उस घास को चरते हुए दूर तक फैल जाते और उनके गले में बँधी घंटियों की मधुर ध्वनि पूरे वन में गूँजती। वृंदावन का जीवन प्रकृति के साथ बहुत गहराई से जुड़ा था। गायें थीं, दूध था, दही था, माखन था। वन था, पर्वत था, यमुना थी। और इन सबके बीच नंदलाल थे, जिनकी मुस्कान से पूरा वृंदावन जैसे जीवित हो उठता था। उसी समय नंद बाबा के घर में एक विशेष तैयारी शुरू हो गई। आँगन में स्त्रियाँ तरह-तरह के पकवान बनाने लगीं। कहीं खीर बन रही थी। कहीं पूरियाँ तली जा रही थीं। कहीं दही मथा जा रहा था। कहीं माखन निकाला जा रहा था। बड़े-बड़े पात्रों में दूध रखा गया था। वृंदावन के लोग उत्साह से एक-दूसरे के घर जा रहे थे। कृष्ण ने यह सब देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने नंद बाबा के पास जाकर पूछा, “बाबा, आज हमारे घर में इतनी सारी तैयारियाँ क्यों हो रही हैं?” नंद बाबा ने कहा, “लाला, आज हम देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे हैं।”

     

     

    कृष्ण ने भोलेपन से पूछा, “इंद्र की पूजा क्यों?” नंद बाबा बोले, “बेटा, इंद्र देव वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से वर्षा होती है। वर्षा से खेतों में अन्न उगता है, घास उगती है और हमारी गायों को भोजन मिलता है। इसलिए हम हर वर्ष उनकी पूजा करते हैं।” कृष्ण कुछ क्षण सोचते रहे। फिर उन्होंने पूछा, “लेकिन बाबा, हमारी गायें कहाँ चरती हैं?” “गोवर्धन पर्वत के पास।”

     

     

    “उन्हें घास कौन देता है?” “गोवर्धन।” “उन्हें जल कहाँ मिलता है?” “गोवर्धन के आसपास की धाराओं और यमुना से।” कृष्ण फिर बोले, “तो फिर बाबा, हमें गोवर्धन पर्वत का धन्यवाद नहीं करना चाहिए?”

     

     

     

    नंद बाबा चुप हो गए। कृष्ण ने आगे कहा, “हमारा जीवन गायों से है। गायों का जीवन घास और जल से है। गोवर्धन हमें घास देता है, वन देता है, जल देता है और हमारी गायों को आश्रय देता है। फिर हम उस गोवर्धन की पूजा क्यों न करें?” वृंदावन के कुछ बड़े-बुजुर्ग भी वहाँ आ गए। किसी ने कहा, “कन्हैया की बात में तो तर्क है।” किसी ने कहा, “लेकिन इंद्र की पूजा तो हमारे पूर्वजों से चली आ रही है।” कृष्ण मुस्कुराए।

     

     

    “बाबा, मेरा कहना है कि हम प्रकृति और अपने कर्म का सम्मान करें। हम गोवर्धन की पूजा करें, गायों की सेवा करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। यही हमारे जीवन का आधार है।”

     

     

     

    नंद बाबा अपने पुत्र को देखते रहे। कृष्ण की बातें एक छोटे बालक की बातें थीं, लेकिन उनमें गहरा सत्य छिपा था। अंततः नंद बाबा ने कहा, “ठीक है लाला। इस बार हम गोवर्धन पूजा करेंगे।” और फिर पूरा वृंदावन गोवर्धन पूजा की तैयारी में लग गया। अनेक प्रकार के पकवान बनाए गए। दूध, दही, घी, माखन, मिठाइयाँ, फल और अनगिनत व्यंजन सजाए गए। गायों को स्नान कराया गया। उनके सींगों पर रंग लगाया गया। उनके गले में सुंदर मालाएँ पहनाई गईं। बच्चे खुशी से इधर-उधर दौड़ रहे थे। कृष्ण के चेहरे पर अद्भुत प्रसन्नता थी। वृंदावन के लोग गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने पर्वत की पूजा की। भोग अर्पित किया।

     

     

    और कृष्ण ने सबको प्रेम से समझाया, “प्रकृति का सम्मान करो। गायों की सेवा करो। धरती को माँ मानो।” लेकिन दूसरी ओर देवराज इंद्र को जब यह पता चला कि वृंदावनवासियों ने उनकी पूजा नहीं की, तो उनका अहंकार भड़क उठा। उन्होंने क्रोध से कहा, “इन लोगों ने मेरी पूजा छोड़ दी?” इंद्र को लगा कि वृंदावनवासियों ने उनका अपमान किया है।

     

     

    उनके भीतर क्रोध बढ़ता गया। उन्होंने आदेश दिया, “ऐसे बादलों को भेजो जो प्रलयंकारी वर्षा कर सकें।” आकाश में अचानक घने बादल छाने लगे। वृंदावन के लोगों को कुछ समझ नहीं आया। सुबह तक जो आकाश साफ था, वह देखते ही देखते काले बादलों से भर गया।

     

     

    बिजलियाँ चमकने लगीं। बादल भयंकर गर्जना करने लगे। फिर वर्षा शुरू हुई। पहले बूंदें पड़ीं। फिर पानी तेज हुआ। और देखते ही देखते ऐसी मूसलाधार वर्षा होने लगी कि धरती जल में डूबने लगी। वृंदावन के रास्तों पर पानी भर गया। गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं। बछड़े अपनी माताओं से चिपक गए। छोटे बच्चे रोने लगे। यशोदा मैया ने कृष्ण को अपने पास बुलाया। “कन्हैया! यह कैसी वर्षा है?” कृष्ण ने बाहर देखा। उनके चेहरे पर चिंता नहीं थी। वह शांत थे। नंद बाबा घबराकर बोले, “लोगों को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना होगा।”

     

     

     

    लेकिन चारों ओर जल ही जल था। कहीं आश्रय नहीं। कहीं सुरक्षा नहीं। वर्षा और तेज होती जा रही थी। हवा इतनी तीव्र थी कि बड़े-बड़े वृक्ष झुकने लगे। गायें रंभाने लगीं। वृंदावनवासी कृष्ण के पास आने लगे। “कन्हैया! अब हमारी रक्षा कौन करेगा?” यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी बाँहों में भरना चाहा। लेकिन कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मैया, चिंता मत करो।” “सबकी रक्षा होगी।” कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की ओर देखा।

     

     

     

    फिर उन्होंने धीरे से कहा, “जब पर्वत हमारी रक्षा करता है, तो आज पर्वत ही हमारी ढाल बनेगा।” और देखते ही देखते कृष्ण गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने अपना छोटा-सा बायाँ हाथ उठाया। और फिर… जिसे देखकर सभी की साँसें थम गईं— कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी-सी कनिष्ठिका उँगली पर उठा लिया! पूरा पर्वत उनके हाथ पर ऐसे टिक गया जैसे कोई हल्की-सी वस्तु हो। वृंदावनवासी स्तब्ध रह गए। किसी के मुँह से शब्द नहीं निकल रहा था।

     

     

    फिर कृष्ण ने पुकारा, “आओ!

     

     

    सब लोग गोवर्धन के नीचे आ जाओ।” नंद बाबा बोले, “लाला… यह तुमने क्या कर दिया?” कृष्ण हँसकर बोले, “बाबा, आप सब चिंता मत कीजिए।” लोग धीरे-धीरे पर्वत के नीचे आने लगे। गायें आईं। बछड़े आए।

     

     

    बच्चे आए। वृद्ध आए। स्त्रियाँ आईं। पूरा वृंदावन गोवर्धन पर्वत के नीचे आ गया। कृष्ण एक हाथ से पर्वत उठाए खड़े थे। उनका दूसरा हाथ कमर पर था। चेहरे पर वही मधुर मुस्कान। यशोदा मैया बार-बार उन्हें देख रही थीं। उनके मन में चिंता थी— “मेरा छोटा-सा लाल इतनी देर तक पर्वत कैसे उठाए रखेगा?” उन्होंने धीरे से कहा, “कन्हैया, थक तो नहीं गए?” कृष्ण हँसे। “नहीं मैया।” बलराम जी मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “मैया, कन्हैया को कुछ नहीं होगा।” वृंदावन के लोग आश्चर्य से कृष्ण को देखते रहे। किसी ने कहा, “यह तो स्वयं भगवान हैं।”

     

     

     

    किसी ने कहा, “हमारा कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं।” किसी ने हाथ जोड़ लिए। कोई कृष्ण की जय-जयकार करने लगा। सात दिन तक वर्षा होती रही। सात दिन तक कृष्ण गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े रहे। न उन्हें भूख लगी। न प्यास। न थकान। ग्वाल-बालों को तो यह भी चिंता होने लगी कि कहीं कृष्ण का हाथ दुख न जाए। एक बालक बोला, “कन्हैया, हम भी पर्वत को सहारा देते हैं।” उसने अपनी छोटी-सी लकड़ी उठाई और पर्वत की ओर कर दी। दूसरे बालकों ने भी ऐसा ही किया।

     

     

    कृष्ण हँस पड़े। “हाँ-हाँ, तुम सब भी सहारा दो।” अब सभी बच्चे अपनी-अपनी लकड़ियों से गोवर्धन को सहारा देने लगे। वृंदावन के लोग इस दृश्य को देखकर मुस्कुराने लगे। कृष्ण ने किसी को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अकेले सबकी रक्षा कर रहे हैं। वह सबको अपने साथ जोड़ रहे थे। उधर देवराज इंद्र का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगा। उन्होंने देखा कि उनकी सारी शक्ति भी कृष्ण के सामने व्यर्थ हो गई। वर्षा रुक नहीं रही थी, लेकिन वृंदावन सुरक्षित था। इंद्र को समझ आने लगा कि जिसे वह एक साधारण बालक समझ रहे थे, वह कोई सामान्य शक्ति नहीं है।

     

     

     

    उनका अहंकार टूटने लगा। उन्होंने बादलों को वर्षा रोकने का आदेश दिया। धीरे-धीरे आकाश साफ होने लगा। बादल हटने लगे। सूर्य की किरणें धरती पर उतर आईं। यमुना फिर चमकने लगी। पक्षियों ने फिर से उड़ना शुरू किया। वृंदावनवासियों ने बाहर देखा। वर्षा समाप्त हो चुकी थी। कृष्ण ने धीरे से गोवर्धन पर्वत को उसी स्थान पर रख दिया। सभी लोग बाहर आए। गायें आनंद से रंभाने लगीं।

     

     

     

    ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर इकट्ठे हो गए। यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया। “मेरा लाल!” नंद बाबा की आँखें भी भर आईं। उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ रखा। “लाला, तुमने आज पूरे वृंदावन की रक्षा कर दी।” कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “बाबा, मैंने कुछ नहीं किया। गोवर्धन ने सबकी रक्षा की।” लेकिन सब जानते थे कि गोवर्धन को उठाने वाला कौन था। कुछ ही समय बाद देवराज इंद्र स्वयं कृष्ण के सामने आए। उनका सिर झुका हुआ था। उनके भीतर का अहंकार समाप्त हो चुका था। उन्होंने कृष्ण से कहा, “प्रभु, मुझे क्षमा कीजिए।

     

     

    मैंने अपने पद और शक्ति का अभिमान किया। मैं यह भूल गया कि संसार की सारी शक्तियाँ भी आपकी ही इच्छा से चलती हैं।” कृष्ण ने उन्हें क्षमा कर दिया। इंद्र ने कृष्ण को प्रणाम किया। और उस दिन से वृंदावन में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व हो गया। लोग समझ गए कि प्रकृति की रक्षा करना, गायों की सेवा करना और धरती के प्रति कृतज्ञ रहना भी ईश्वर की उपासना का ही एक रूप है। संध्या होने लगी।

     

     

     

    आकाश में हल्की लालिमा छा गई। गोवर्धन पर्वत सूर्य की अंतिम किरणों में चमक रहा था। कृष्ण अपने ग्वाल-बालों के साथ बैठे थे। एक बालक बोला, “कन्हैया, तुमने तो सच में पहाड़ उठा लिया!” कृष्ण हँसते हुए बोले, “अच्छा? तुम लोग तो लकड़ी से उसे सहारा दे रहे थे।” सब हँस पड़े। यशोदा मैया दूर से अपने लाल को देख रही थीं। उनके लिए कृष्ण आज भी वही नन्हा बालक था, जो कभी माखन चुराता था, कभी मटकी फोड़ता था और कभी उनकी गोद में सिर रखकर सो जाता था। लेकिन वृंदावन जान चुका था कि नंदलाल की लीलाएँ साधारण नहीं थीं। उनकी हर शरारत के पीछे प्रेम था। हर संकट के पीछे कोई संदेश था। और हर लीला में भक्तों के लिए कोई गहरा रहस्य छिपा था।

     

     

     

    समय बीतता गया। कृष्ण की बाल-लीलाएँ बढ़ती गईं। कभी वह ग्वाल-बालों के साथ वन में खेलते। कभी गायों के पीछे दौड़ते। कभी यमुना के तट पर बैठकर बाँसुरी बजाते। कभी माखन के लिए मैया से रूठते। कभी गोपियों को अपनी शरारतों से परेशान करते। वृंदावन का हर दिन कृष्ण के कारण उत्सव बन गया था। लेकिन बाल्यकाल का समय भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। वह नन्हा कन्हैया, जिसकी उँगली पकड़कर यशोदा मैया चलना सिखाती थीं, अब वृंदावन की सीमाओं से बाहर जाने वाली एक बड़ी लीला की ओर बढ़ रहा था।

     

     

    ग्वाल-बालों की हँसी… यशोदा की पुकार… नंद बाबा का वात्सल्य… गायों की घंटियाँ… यमुना की लहरें… गोवर्धन की छाया… और कृष्ण की मधुर मुस्कान— इन सबमें एक ऐसी स्मृति बसने वाली थी, जिसे वृंदावन कभी भूल नहीं पाएगा। क्योंकि बाल-लीलाओं का यह सुंदर अध्याय अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा था। आने वाले समय में नंदलाल की बाल-छवि धीरे-धीरे किशोर कृष्ण के रूप में बदलने लगेगी।

     

     

    लेकिन क्या वृंदावन उन्हें कभी भूल पाएगा? क्या यशोदा मैया उस नटखट बालक के बिना रह पाएँगी? क्या ग्वाल-बाल उस सखा की शरारतों को भूल पाएँगे? और क्या वृंदावन की गलियाँ कभी फिर वैसी ही रहेंगी, जब उनमें कृष्ण की पायल की रुनझुन सुनाई नहीं देगी? इन प्रश्नों के उत्तर हमारी इस श्रृंखला के अंतिम भाग में छिपे हैं। जहाँ हम फिर लौटेंगे उन्हीं गलियों में… जहाँ नंदलाल की हँसी गूँजती थी। उसी यमुना तट पर… जहाँ वह अपने सखाओं के साथ खेलते थे। उसी नंद भवन में… जहाँ यशोदा मैया उन्हें पुकारती थीं।

     

    और उसी वृंदावन में… जहाँ हर कण आज भी जैसे यही कहता है— “कृष्ण केवल यहाँ रहे नहीं थे…

     

    कृष्ण ने तो पूरे वृंदावन को अपने प्रेम में बसा लिया था।”

     

    लेकिन अभी एक आखिरी कथा शेष है। एक ऐसा भावपूर्ण समापन, जिसमें न कोई राक्षस होगा, न कोई युद्ध… बस होगा नंदलाल का प्रेम।

     

     

     

    माँ यशोदा का वात्सल्य… ग्वाल-बालों की मित्रता… गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम… गायों की ममता… यमुना की लहरों का स्नेह… और वृंदावन की मिट्टी में हमेशा के लिए बस जाने वाली कृष्ण की स्मृतियाँ।

     

     

     

    अगले और अंतिम भाग में हम जानेंगे—

     

    “वृंदावन की मधुर बाल-लीलाओं का भावपूर्ण समापन” और शायद उस अंतिम कथा के बाद जब आप आँखें बंद करेंगे… तो आपको भी कहीं दूर से एक मधुर बाँसुरी सुनाई दे…

     

    “राधे… राधे…”

     

    Be Continue….

  • कृष्ण ने बिना कहे समझ लिया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अध्याय 9 — कृष्ण ने बिना कहे समझ लिया

     

    सुदामा कृष्ण के सामने चुपचाप खड़े थे।

     

    कृष्ण उनकी तरफ देख रहे थे। उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी, जो सुदामा ने गुरुकुल के दिनों में न जाने कितनी बार देखी थी।

     

    लेकिन आज सुदामा के चेहरे पर खुशी के साथ झिझक भी थी।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “सुदामा… इतने साल बाद मेरे पास आए हो और फिर भी मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”

     

    सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।

     

    “नहीं कृष्ण, ऐसी कोई बात नहीं है।”

     

    कृष्ण हल्के से मुस्कुराए।

     

    “तुम्हें मैं आज का कृष्ण लग रहा हूँ क्या?”

     

    सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मैं वही हूँ जो गुरुकुल में तुम्हारे साथ बैठकर खाना खाता था। वही जो तुम्हारे हिस्से की रोटी भी चुपके से खा जाता था।”

     

    सुदामा हँस पड़े।

     

    “और फिर जब गुरुजी पूछते थे कि खाना किसने खाया, तो तुम बड़ी मासूम शक्ल बना लेते थे।”

     

    कृष्ण भी हँस पड़े।

     

    “अरे, तुम भी तो मेरा नाम नहीं लेते थे।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों पुराने दिनों में खो गए।

     

    लेकिन फिर सुदामा की मुस्कान गायब हो गई।

     

    कृष्ण ने यह देख लिया।

     

    उन्होंने पास जाकर सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    “सुदामा, मुझे सच बताओ। घर पर सब ठीक है?”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोले।

     

    कृष्ण ने फिर पूछा,

     

    “भाभी कैसी हैं?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “ठीक हैं।”

     

    “बच्चे?”

     

    “ठीक हैं।”

     

    कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा।

     

    “और तुम?”

     

    यह सवाल सुनते ही सुदामा चुप हो गए।

     

    काफी देर तक उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।

     

    कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने बस सुदामा के कंधे पर हाथ रख दिया।

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “कृष्ण…”

     

    “हाँ, बोलो।”

     

    “मैं तुमसे कुछ माँगने नहीं आया था।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “मैं बस तुमसे मिलने आया था।”

     

    “ये भी मुझे पता है।”

     

    सुदामा ने हैरानी से पूछा,

     

    “फिर तुम बार-बार पूछ क्यों रहे हो?”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “क्योंकि दोस्ती में कुछ बातें पूछनी नहीं पड़तीं, बस महसूस करनी पड़ती हैं।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे कपड़े बहुत कुछ बता रहे हैं सुदामा। तुम्हारा चेहरा भी। तुम्हारी आवाज भी।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मैंने बहुत कोशिश की कृष्ण।”

     

    “किस बात की?”

     

    “अपने परिवार को खुश रखने की।”

     

    सुदामा कुछ देर रुके।

     

    “मैंने बच्चों को पढ़ाया। जो मिला, उसमें घर चलाया। कभी किसी से शिकायत नहीं की। लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि घर में खाने तक की परेशानी हो गई।”

     

    कृष्ण चुपचाप सुनते रहे।

     

    सुदामा बोले,

     

    “मेरी पत्नी ने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा। बच्चों ने भी कभी जिद नहीं की। लेकिन उनकी आँखों में सब दिखता था।”

     

    कृष्ण की आँखें भी नम हो गईं।

     

    “तो तुम इतने सालों तक अकेले यह सब सहते रहे?”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “तुम्हारी दोस्ती की याद थी ना।”

     

    कृष्ण ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “और तुमने सोचा कि मुझे कुछ नहीं बताओगे?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम द्वारका के राजा हो कृष्ण। तुम्हारे पास कितने काम होंगे। मैं अपनी परेशानी लेकर तुम्हारे पास कैसे आता?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा,

     

    “राजा?”

     

    वह थोड़ा मुस्कुराए।

     

    “मेरे लिए तुम अभी भी वही सुदामा हो जो मेरे साथ गुरुकुल में पेड़ के नीचे बैठता था।”

     

    सुदामा की आँखों में आँसू थे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “तुमने मुझे अपना दोस्त समझकर आने में भी इतना समय लगा दिया।”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोल पाए।

     

    तभी कृष्ण ने देखा कि सुदामा के पैर यात्रा की वजह से थके हुए थे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “पहले बैठो।”

     

    “नहीं कृष्ण, मैं ठीक हूँ।”

     

    “तुम्हारी ये ‘मैं ठीक हूँ’ वाली आदत अभी तक नहीं गई?”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    कृष्ण ने अपने सेवकों से पानी मंगवाया और खुद सुदामा के पास बैठ गए।

     

    सुदामा घबरा गए।

     

    “कृष्ण, तुम ये क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज मुझे अपने दोस्त की सेवा करने दो।”

     

    “लेकिन तुम राजा हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और तुम मेरे दोस्त हो। आज मेरे लिए यही सबसे बड़ी बात है।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    कृष्ण ने उनके थके हुए पैरों को पानी से धोया।

     

    सुदामा बार-बार उन्हें रोकने की कोशिश करते रहे।

     

    “कृष्ण, ऐसा मत करो।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “जब मैं गुरुकुल में गलती करता था और तुम मेरा काम अपने ऊपर ले लेते थे, तब तो तुमने मुझे कभी रोका नहीं।”

     

    सुदामा कुछ बोल नहीं पाए।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज मेरी बारी है।”

     

    कुछ देर बाद दोनों साथ बैठ गए।

     

    कृष्ण ने फिर वही छोटा-सा पोटली उठाई जो सुदामा अपने साथ लाए थे।

     

    “वैसे एक बात बताओ।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम मेरे लिए क्या लाए हो?”

     

    सुदामा झेंप गए।

     

    “कुछ खास नहीं।”

     

    कृष्ण ने पोटली खोल ली।

     

    उसमें थोड़ा-सा चिवड़ा था।

     

    कृष्ण के चेहरे पर ऐसी खुशी आई जैसे उन्हें कोई बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो।

     

    उन्होंने थोड़ा चिवड़ा उठाया और खाने लगे।

     

    “अरे वाह! यही तो चाहिए था।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “कृष्ण, ये बहुत साधारण है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “साधारण?”

     

    उन्होंने मुस्कुराकर सुदामा की तरफ देखा।

     

    “जिसमें दोस्त का प्यार हो, वह साधारण कैसे हो सकता है?”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    कृष्ण ने उन्हें देखकर कहा,

     

    “आज तुम मेरे पास खाली हाथ नहीं आए सुदामा। तुम अपने साथ हमारी दोस्ती की वही खुशबू लेकर आए हो, जो गुरुकुल में थी।”

     

    सुदामा ने सिर उठाकर कृष्ण को देखा।

     

    उन्हें लगा जैसे इतने सालों का सारा दुख धीरे-धीरे हल्का हो रहा हो।

     

    लेकिन कृष्ण के मन में कुछ और था।

     

    वह अपने दोस्त को बिना माँगे ही सब कुछ देना चाहते थे।

     

    सुदामा ने कुछ नहीं माँगा।

     

    उन्होंने अपने दुख की पूरी बात भी नहीं कही।

     

    लेकिन कृष्ण सब समझ चुके थे।

     

    रात काफी हो चुकी थी।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “सुदामा, आज तुम यहीं आराम करो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “नहीं कृष्ण, सुबह मुझे वापस जाना है।”

     

    कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “ठीक है। लेकिन जाने से पहले मुझे एक वादा करना होगा।”

     

    “कैसा वादा?”

     

    “अब कभी अपने दोस्त से मिलने में इतनी देर मत करना।”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    “वादा।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    कभी गुरुकुल में साथ रहने वाले दो दोस्त आज अलग-अलग दुनिया में खड़े थे।

     

    लेकिन उनके बीच की दोस्ती वैसी ही थी।

     

    अगली सुबह सुदामा जब द्वारका से अपने घर लौटने के लिए निकले, तो उनके मन में एक ही सवाल था—

     

    कृष्ण ने मुझे इतना प्यार तो दिया… लेकिन क्या मेरे घर की हालत भी बदलेगी?

     

    उन्हें अभी नहीं पता था कि कृष्ण ने उनके लिए क्या सोच रखा था।

     

    और जब सुदामा अपने गाँव के पास पहुँचे…

     

    तो उन्हें दूर से कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर वह अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं कर पाए।

     

    क्रमशः…

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

    (भाग 13 — कालिय नाग का दमन)

     

     

    वृंदावन की धरती पर उस दिन सुबह कुछ उदास-सी थी।सूरज आकाश में चमक रहा था, पेड़ों पर पक्षी भी चहचहा रहे थे, गायें अपने बछड़ों के साथ वन की ओर जा रही थीं, फिर भी वातावरण में एक अनजाना भय पसरा हुआ था।

     

    उस भय का कारण था—यमुना।

     

    वही यमुना, जिसके किनारे बैठकर कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ हँसते-खेलते थे।

     

    वही यमुना, जिसके जल में कभी वृंदावन के बच्चे खेला करते थे।

     

    वही यमुना, जिसकी लहरें कृष्ण के चरणों को छूकर स्वयं को धन्य समझती थीं।

     

    लेकिन अब यमुना का एक बड़ा भाग विष से भर चुका था।

     

    उस स्थान के आसपास की हवा तक भारी हो गई थी।

     

    कहा जाता था कि यमुना के उस हिस्से में एक विशाल नाग रहता है—कालिय।

     

    उसके शरीर से निकलने वाला विष इतना भयंकर था कि जल में रहने वाले जीव मरने लगे थे। वृक्ष सूख गए थे। पक्षी उस स्थान के ऊपर से उड़ते तो विषैली वायु के कारण नीचे गिर पड़ते।

     

    वृंदावन के लोग उस ओर जाने से भी डरते थे।

     

    नंद बाबा ने कई बार ग्वाल-बालों को समझाया था,

     

    “बच्चो, उस ओर मत जाना। यमुना के उस हिस्से के पास जाना सुरक्षित नहीं है।”

     

    यशोदा मैया भी कृष्ण को बार-बार समझाती थीं,

     

    “लाला, तुम अपने सखाओं के साथ वन में खेलो, लेकिन यमुना के उस विषैले स्थान के पास मत जाना।”

     

    कृष्ण हर बार मुस्कुराकर कहते,

     

    “हाँ मैया, मैं नहीं जाऊँगा।”

     

    लेकिन कृष्ण की आँखों में एक ऐसी चमक होती, जिसे यशोदा मैया पढ़ नहीं पाती थीं।

     

    उन्हें क्या पता था कि कृष्ण के मन में कुछ और ही चल रहा है।

     

    एक दिन कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ वन में खेल रहे थे।

     

    किसी के हाथ में गेंद थी, कोई बाँस की छोटी-सी छड़ी लेकर खेल रहा था और कोई पेड़ से गिरे फलों को इकट्ठा कर रहा था।

     

    बलराम जी भी उनके साथ थे।

     

    खेलते-खेलते उनकी गेंद उछलकर दूर चली गई।

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “कन्हैया! गेंद उधर चली गई।”

     

    कृष्ण ने उस दिशा में देखा।

     

    गेंद धीरे-धीरे लुढ़कती हुई उसी ओर चली गई जहाँ यमुना का विषैला क्षेत्र था।

     

    कुछ बालक डरकर रुक गए।

     

    “वहाँ मत जाना।”

     

    दूसरा बोला,

     

    “नंद बाबा ने मना किया है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    उनकी दृष्टि यमुना के उस काले पड़ चुके जल पर टिक गई।

     

    लहरें शांत थीं।

     

    लेकिन उस शांति के भीतर एक भयंकर विष छिपा था।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “यह यमुना तो सबकी माँ जैसी है। इसका जल इतना विषैला क्यों हो गया?”

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “कन्हैया, इसी में कालिय नाग रहता है। कहते हैं वह बहुत बड़ा और भयंकर है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो फिर उससे मिलना चाहिए।”

     

    ग्वाल-बाल घबरा गए।

     

    “नहीं कन्हैया!”

     

    “तुम वहाँ नहीं जाओगे।”

     

    “नंद बाबा हमें बहुत डाँटेंगे।”

     

    बलराम जी कृष्ण को समझाने लगे,

     

    “कन्हैया, अभी लौट चलो।”

     

    कृष्ण ने दाऊ की ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में दृढ़ता थी।

     

    “दाऊ, इस विष के कारण कितने जीव परेशान हैं। यमुना का जल सबके लिए है। यदि कोई इसे विषैला बना दे तो क्या हमें चुप रहना चाहिए?”

     

    बलराम कृष्ण को देखते रहे।

     

    वह जानते थे कि कृष्ण जो ठान लेते हैं, उसे कोई आसानी से रोक नहीं सकता।

     

    कृष्ण आगे बढ़े।

     

    यमुना के तट पर एक विशाल कदंब का वृक्ष था।

     

    कृष्ण उस वृक्ष पर चढ़ गए।

     

    ग्वाल-बाल नीचे खड़े होकर उन्हें देखते रहे।

     

    “कन्हैया! नीचे आ जाओ!”

     

    लेकिन कृष्ण मुस्कुराते रहे।

     

    उन्होंने ऊपर से यमुना के जल को देखा।

     

    फिर अचानक—

     

    उन्होंने कदंब के वृक्ष से यमुना में छलाँग लगा दी।

     

    “छपाक!”

     

    यमुना का जल चारों ओर उछल पड़ा।

     

    ग्वाल-बाल भय से चिल्ला उठे।

     

    “कृष्ण!”

     

    “कन्हैया!”

     

    “अरे! कृष्ण यमुना में कूद गए!”

     

    यमुना का शांत जल अचानक भयंकर रूप से हिलने लगा।

     

    लहरें उठने लगीं।

     

    मानो यमुना के भीतर कोई विशाल शक्ति जाग गई हो।

     

    जल के भीतर कालिय नाग ने कृष्ण की उपस्थिति अनुभव कर ली थी।

     

    वह क्रोधित होकर बाहर आया।

     

    उसका शरीर विशाल था।

     

    उसके अनेक फन थे।

     

    उसकी आँखों से क्रोध की ज्वाला निकल रही थी।

     

    उसके फनों से विष की भयंकर लपटें उठ रही थीं।

     

    जैसे ही उसने कृष्ण को देखा, वह फुफकारा।

     

    यमुना का जल काँप उठा।

     

    ग्वाल-बाल भयभीत होकर पीछे हट गए।

     

    लेकिन कृष्ण शांत थे।

     

    उन्होंने कालिय को देखकर कहा,

     

    “कालिय! तुमने इस पवित्र यमुना को विषैला क्यों बना दिया?”

     

    कालिय ने भयंकर फुफकार भरते हुए कृष्ण को अपनी पूँछ से घेर लिया।

     

    उसने कृष्ण को अपने विशाल शरीर में जकड़ लिया।

     

    ग्वाल-बालों ने यह दृश्य देखा तो उनके प्राण सूख गए।

     

    एक बालक रोते हुए बोला,

     

    “कन्हैया को नाग ने पकड़ लिया!”

     

    दूसरा दौड़ते हुए बोला,

     

    “चलो! नंद बाबा को बताते हैं!”

     

    कुछ ही देर में यह समाचार पूरे वृंदावन में फैल गया।

     

    “कृष्ण यमुना में चले गए!”

     

    “कालिय नाग ने उन्हें पकड़ लिया!”

     

    “कृष्ण संकट में हैं!”

     

    यशोदा मैया ने जैसे ही यह सुना, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह दौड़ पड़ीं।

     

    “मेरा कन्हैया!”

     

    नंद बाबा भी उनके पीछे दौड़े।

     

    वृंदावन के स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बालक सब यमुना की ओर चल पड़े।

     

    यशोदा रोते हुए कह रही थीं,

     

    “मेरे लाल को कुछ नहीं होना चाहिए।”

     

    उनकी आँखों के सामने वही दृश्य था—

     

    कृष्ण कालिय नाग के विशाल शरीर में जकड़े हुए थे।

     

    मैया का हृदय फटने लगा।

     

    वह यमुना में उतरने लगीं।

     

    “मैं अपने लाल को लेकर आऊँगी!”

     

    नंद बाबा ने उन्हें रोक लिया।

     

    “यशोदा! रुको!”

     

    लेकिन एक माँ को कौन रोक सकता था?

     

    उधर बलराम जी शांत खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर चिंता नहीं थी।

     

    वह जानते थे कि यह लीला क्या है।

     

    उन्होंने नंद बाबा और यशोदा मैया से कहा,

     

    “चिंता मत करो। कृष्ण को कुछ नहीं होगा।”

     

    यशोदा ने आँसुओं से भरी आँखों से बलराम को देखा।

     

    “दाऊ! तुम कैसे कह सकते हो?”

     

    बलराम मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि कन्हैया को कोई हरा नहीं सकता।”

     

    उधर कालिय ने कृष्ण को और कसकर जकड़ लिया।

     

    वह सोच रहा था कि अब यह बालक बच नहीं सकता।

     

    लेकिन अचानक कृष्ण का शरीर भारी होने लगा।

     

    इतना भारी कि कालिय के लिए उन्हें पकड़े रखना कठिन हो गया।

     

    कृष्ण ने अपना शरीर विस्तृत कर लिया।

     

    कालिय का बंधन ढीला पड़ने लगा।

     

    और अगले ही क्षण कृष्ण उसके फनों से निकलकर उसके ऊपर जा खड़े हुए।

     

    कालिय क्रोध से भर उठा।

     

    उसने एक के बाद एक अनेक फन उठाए।

     

    कृष्ण ने उसके एक फन पर अपना पैर रखा।

     

    फिर दूसरे पर।

     

    फिर तीसरे पर।

     

    और देखते ही देखते वह उसके सभी फनों पर नृत्य करने लगे।

     

    कृष्ण के चरण जैसे ही कालिय के फनों पर पड़ते, उसका विष कम होने लगता।

     

    कालिय जितना फन उठाता, कृष्ण उतनी ही सहजता से दूसरे फन पर पहुँच जाते।

     

    यमुना की लहरें ताल देने लगीं।

     

    देवताओं ने आकाश से यह दृश्य देखा तो आश्चर्यचकित हो उठे।

     

    गंधर्वों के वाद्य बजने लगे।

     

    देवताओं ने पुष्पों की वर्षा आरंभ कर दी।

     

    वृंदावन के लोग यह अद्भुत दृश्य देखकर स्तब्ध थे।

     

    जिस कालिय से पूरा क्षेत्र काँपता था, आज वही कृष्ण के चरणों के नीचे विवश पड़ा था।

     

    कृष्ण के मुख पर मुस्कान थी।

     

    उनका नृत्य ऐसा लग रहा था मानो स्वयं यमुना की लहरें उनके चरणों के साथ नृत्य कर रही हों।

     

    कालिय के फन एक-एक करके झुकने लगे।

     

    उसकी शक्ति समाप्त होने लगी।

     

    अब उसके भीतर क्रोध नहीं, भय था।

     

    वह समझ गया—

     

    “यह कोई साधारण बालक नहीं है।”

     

    उसकी पत्नियाँ, जिन्हें नाग-पत्नियाँ कहा जाता था, हाथ जोड़कर कृष्ण के सामने आईं।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे।

     

    उन्होंने प्रार्थना की,

     

    “प्रभु! हमारे पति से भूल हुई है। वह अपने विष और अहंकार में अंधा हो गया था। कृपा करके उसे क्षमा कर दीजिए।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर उन्होंने कालिय की ओर देखा।

     

    “कालिय, तुम्हारा यहाँ रहना उचित नहीं है। तुम्हारे विष से यमुना और उसके आसपास का जीवन नष्ट हो रहा है।”

     

    कालिय ने सिर झुका दिया।

     

    कृष्ण बोले,

     

    “तुम यहाँ से चले जाओ। समुद्र की ओर चले जाओ। वहाँ जाकर रहो।”

     

    कालिय ने धीरे से अपना सिर झुका दिया।

     

    अब उसके भीतर कोई विरोध नहीं था।

     

    कृष्ण ने उसके फन से अपना चरण हटा लिया।

     

    कालिय ने पहली बार राहत की साँस ली।

     

    उसने हाथ जोड़कर कृष्ण को प्रणाम किया।

     

    कृष्ण ने उसे आशीर्वाद दिया।

     

    और कालिय अपनी पत्नियों तथा परिवार के साथ यमुना छोड़कर चला गया।

     

    जैसे ही कालिय वहाँ से गया, यमुना का जल धीरे-धीरे निर्मल होने लगा।

     

    विष का प्रभाव कम होने लगा।

     

    जल में फिर से जीवन लौटने लगा।

     

    पक्षी वापस आने लगे।

     

    हवा में फिर से सुगंध भर गई।

     

    वृक्षों पर हरियाली लौटने लगी।

     

    और यमुना जैसे स्वयं मुस्कुराकर कृष्ण के चरणों को धन्यवाद देने लगी।

     

    तट पर खड़ी यशोदा मैया अपने लाल को देखते ही दौड़ पड़ीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया।

     

    “कन्हैया!”

     

    उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से मैया की ओर देखा।

     

    “मैया… मैंने तो यमुना को साफ किया।”

     

    यशोदा मैया उन्हें सीने से लगाकर रोती रहीं।

     

    “तुम मुझे एक दिन बहुत रुलाओगे।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    नंद बाबा भी कृष्ण को देखकर प्रसन्न हो गए।

     

    वृंदावन के सभी लोग जय-जयकार करने लगे।

     

    “कृष्ण कन्हैया लाल की जय!”

     

    “नंदलाल की जय!”

     

    “यशोदा मैया के लाल की जय!”

     

    चारों ओर आनंद छा गया।

     

    लेकिन इस लीला का अर्थ केवल इतना नहीं था कि कृष्ण ने एक नाग का दमन किया।

     

    कालिय केवल एक नाग नहीं था।

     

    उसका विष अहंकार का प्रतीक था।

     

    जिस प्रकार कालिय ने यमुना को अपने विष से भर दिया था, उसी प्रकार मनुष्य का अहंकार उसके हृदय को विषैला बना देता है।

     

    लेकिन जब हृदय में कृष्ण के चरण पड़ते हैं, तब वह विष भी समाप्त होने लगता है।

     

    कृष्ण ने कालिय को नष्ट नहीं किया।

     

    उन्होंने उसके अहंकार को नष्ट किया।

     

    उसे जीवन का एक नया अवसर दिया।

     

    यही तो कृष्ण हैं—

     

    दुष्टता का अंत करते हैं, लेकिन प्रायश्चित करने वाले को क्षमा भी देते हैं।

     

    उस शाम वृंदावन में दीप जलाए गए।

     

    यमुना का जल फिर से चमक रहा था।

     

    कृष्ण अपने सखाओं के साथ बैठे थे।

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “कन्हैया, आज तो तुम सचमुच बहुत बड़े वीर निकले!”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “अच्छा? तो कल कौन वीर बनेगा?”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    बलराम ने कृष्ण की ओर देखा और मुस्कुराए।

     

    वृंदावन में फिर वही आनंद लौट आया था।

     

    लेकिन कृष्ण की लीलाओं का प्रवाह अभी रुकने वाला नहीं था।

     

    कुछ ही समय बाद वृंदावन के लोगों के जीवन में एक ऐसी घटना आने वाली थी, जिसे कोई भूल नहीं पाएगा।

     

    हर वर्ष की तरह उस समय वृंदावन के लोग देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी करने लगे थे।

     

    बड़े-बड़े पकवान बनने लगे।

     

    दूध, दही, घी और माखन के भोग सजाए जाने लगे।

     

    सबको विश्वास था कि इंद्र प्रसन्न होंगे तो वर्षा होगी और उनकी गायों तथा खेतों को जीवन मिलेगा।

     

    लेकिन नंदलाल ने इस पर एक प्रश्न उठाया—

     

    “क्या हमें इंद्र की पूजा करनी चाहिए, या उस गोवर्धन पर्वत की, जो हमारी गायों को घास देता है, जल देता है और हमारी रक्षा करता है?”

     

    कृष्ण के इस प्रश्न से पूरा वृंदावन सोच में पड़ गया।

     

    किसी को नहीं पता था कि नंदलाल की यह छोटी-सी बात आगे चलकर देवराज इंद्र के अहंकार को चुनौती देगी।

     

    फिर आकाश में घने बादल छा जाएँगे…

     

    बिजलियाँ गरजेंगी…

     

    वृंदावन पर भयंकर वर्षा टूट पड़ेगी…

     

    और तब सबकी रक्षा के लिए नंदलाल अपने नन्हे हाथ की एक उँगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लेंगे।

     

    लेकिन प्रश्न यह था—

     

    क्या सचमुच एक छोटा-सा बालक पूरे पर्वत को अपनी उँगली पर उठा सकता है?

     

    और यदि उठा सकता है…

     

    तो सात दिनों तक वृंदावनवासियों की रक्षा कैसे करेगा नंदलाल?

     

    यही जानने के लिए अगली लीला की प्रतीक्षा कीजिए—

     

    भाग 14 — गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला