द्वारका के महल में समाचार हवा की तरह फैल गया। सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को एक ब्राह्मण को दान कर दिया है। और वह ब्राह्मण कोई और नहीं, स्वयं देवर्षि नारद हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि श्रीकृष्ण ने वह दान स्वीकार भी कर लिया था। अब वे नारद जी के दास के रूप में उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।
जब यह समाचार रुक्मिणी तक पहुँचा तो उनके नेत्र विस्फारित हो गए। वे कुछ क्षण के लिए वहीं स्तब्ध खड़ी रह गईं। फिर उनके मुख से निकला, “सत्यभामा ने क्या किया? तीनों लोकों के स्वामी को… दान में दे दिया?” उनके हृदय में एक साथ कई भाव उठे – आश्चर्य, दुख और हल्की सी व्यथा। वे तुरंत अपने कक्ष से निकलीं और सत्यभामा के महल की ओर चल दीं।
सत्यभामा उस समय फर्श पर बैठी रो रही थीं। उनका सारा अभिमान चूर-चूर हो चुका था। रुक्मिणी ने उन्हें देखा तो पास जाकर धीरे से कहा, “सत्यभामा, क्या यह सच है? तुमने सच में स्वामी को दान कर दिया?”
सत्यभामा ने सिर उठाया। उनकी आँखें सूजी हुई थीं। वे रोते हुए बोलीं, “जीजा जी… मैंने बड़ी मूर्खता कर दी। नारद जी ब्राह्मण बनकर आए। उन्होंने भिक्षा माँगी। मेरे गर्व ने मुझे अंधा बना दिया। मैंने सोच लिया कि स्वामी कभी मेरा दान स्वीकार नहीं करेंगे। पर वे स्वीकार कर लिया। अब वे नारद जी के दास बनकर उनके पीछे जा रहे हैं।”
रुक्मिणी का मुख गंभीर हो गया। वे बोलीं, “चलो। अभी नारद जी के पास चलते हैं। यह बात यहीं समाप्त नहीं हो सकती।”
दोनों रानियाँ साथ-साथ नारद जी के अस्थायी निवास की ओर गईं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो दृश्य देखा, उससे उनके हृदय में और भी पीड़ा हुई। श्रीकृष्ण, जो तीनों लोकों के नाथ थे, जो द्वारका के राजा थे, जो स्वयं नारायण थे – वे नारद जी के चरण दबा रहे थे। उनके हाथ में चंवर था और वे नारद जी को हवा कर रहे थे। उनके मुख पर शांत भाव था, मानो यह सब उनकी लीला का ही एक अंग हो।
रुक्मिणी का हृदय काँप उठा। वे आगे बढ़ीं और नारद जी के सामने खड़ी हो गईं। उनकी आवाज में दृढ़ता थी, पर सम्मान भी था। वे बोलीं, “नारद जी, यह क्या लीला रच रखी है आपने? ये मेरे स्वामी हैं। ये केवल सत्यभामा के पति नहीं हैं। ये मेरे भी पति हैं। आपने इन्हें अपना दास बनाने से पहले मुझसे भी तो पूछना चाहिए था।”
नारद जी ने मुस्कुराते हुए रुक्मिणी की ओर देखा। उनकी आँखों में वह चंचल चमक थी जो सदैव लीला करते समय दिखाई देती थी। वे बोले, “रुक्मिणी, तुम ठीक कहती हो। सत्यभामा ने इन्हें दान दिया। इन्होंने स्वीकार भी कर लिया। पर तुम्हारा भी तो इन पर अधिकार है। अब बताओ, तुम्हारा इन पर कितना हिस्सा है?”
रुक्मिणी कुछ क्षण चुप रहीं। नारद जी आगे बोले, “तुम अपना हिस्सा लेकर जा सकती हो। पर सत्यभामा का हिस्सा मेरे पास ही रहेगा। क्योंकि दिया हुआ दान वापस नहीं लिया जाता। यह धर्म की मर्यादा है।”
सत्यभामा यह सुनकर और भी घबरा गईं। वे नारद जी के चरणों में गिर पड़ीं और बोलीं, “मुनिवर, मैंने गलती की। मेरे अभिमान ने मुझे बर्बाद कर दिया। आप दान वापस ले लीजिए। मैं आपको सोना-चाँदी, रत्न-राशि, सब कुछ दे दूँगी। पर मेरे स्वामी को छोड़ दीजिए।”
नारद जी ने सिर हिलाया। “नहीं सत्यभामा। दान की हुई वस्तु वापस लेना महापाप है। अब तो केवल एक ही मार्ग है।”
इतने में रुक्मिणी फिर बोलीं, “नारद जी, यदि हिस्से की बात है तो मेरा हिस्सा भी तो है। आप कैसे केवल सत्यभामा के दान को मानकर इन्हें अपने पास रख सकते हैं?”
नारद जी ने दोनों रानियों की ओर देखा और कहा, “ठीक है। तो फिर इसका समाधान यही है कि सत्यभामा अपना हिस्सा यहाँ छोड़ जाएँ और रुक्मिणी अपना हिस्सा लेकर चली जाएँ। पर शरीर तो एक ही है। हिस्सा कैसे बाँटा जाएगा?”
यह सुनकर सत्यभामा की समझ में कुछ आया। उनके मन में एक नया विचार उठा। वे अभी भी रो रही थीं, पर उनकी आवाज में अब थोड़ी दृढ़ता आ गई थी। वे उठीं और नारद जी के सामने खड़ी होकर बोलीं, “नारद जी, यदि आपको दान ही चाहिए तो ठीक है। मैं आपको दान दूँगी। मैं आपको इतना दूँगी कि आप उसे समेट भी नहीं पाएँगे।”
यह सुनकर श्रीकृष्ण, जो अब तक चुपचाप खड़े चंवर झुला रहे थे, अचानक मुस्कुरा दिए। उनकी मुस्कान में वह दिव्य भाव था मानो वे जानते हों कि अब आगे क्या होने वाला है। उनकी मुस्कान देखकर नारद जी की आँखें और चमक उठीं।
नारद जी ने सत्यभामा की ओर गंभीर दृष्टि से देखा और बोले, “सत्यभामा, सोच लीजिए। एक बार जो बात मुख से निकल जाएगी, फिर उसे वापस नहीं लिया जा सकेगा। आप अभी भी समय रहते सोच सकती हैं। दान का वचन बहुत भारी होता है।”
सत्यभामा ने अपना दुपट्टा ठीक किया। उनकी आँखों में अभी भी अश्रु थे, पर अब उनमें एक अजीब सा निश्चय भी था। वे बोलीं, “नारद जी, मैं सोच चुकी हूँ। मेरे अभिमान ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया है। अब मैं वह सब कुछ दूँगी जो आप माँगेंगे। आप माँगिए। जो भी माँगना है, माँग लीजिए। मैं तैयार हूँ।”
नारद जी ने एक बार फिर श्रीकृष्ण की ओर देखा। कृष्ण अभी भी मुस्कुरा रहे थे। मानो वे अपनी रानी के साहस पर प्रसन्न हों। नारद जी ने सत्यभामा से कहा, “ठीक है। जब तुम इतनी तैयार हो तो सुनो…”
पर नारद जी ने अभी माँग नहीं की थी। वे सत्यभामा की आँखों में झाँक रहे थे। वे देखना चाहते थे कि सत्यभामा के गर्व का अंतिम अवशेष भी निकल चुका है या नहीं। सत्यभामा उनके सामने सिर झुकाए खड़ी थीं। उनके मुख पर पश्चाताप था, पर साथ ही एक अटल निश्चय भी था कि अब वे जो भी दान देंगी, वह ऐसा होगा जिससे नारद जी का मुख बंद हो जाए।
रुक्मिणी भी वहाँ खड़ी सब कुछ देख रही थीं। उनके मन में कई भाव एक साथ चल रहे थे। वे जानती थीं कि सत्यभामा का स्वभाव उग्र है, पर आज उनका यह रूप देखकर वे आश्चर्यचकित थीं। उन्होंने सत्यभामा का हाथ पकड़ लिया और धीरे से कहा, “सत्यभामा, जो भी कहना हो सोच-समझकर कहना। वचन का भार बहुत भारी होता है।”
सत्यभामा ने रुक्मिणी की ओर देखा और सिर हिलाया। फिर नारद जी की ओर मुड़कर बोलीं, “मुनिवर, अब देर मत कीजिए। आप माँगिए। मैं तैयार हूँ। इतना दूँगी कि आप उसे लेकर भी नहीं जा सकेंगे।”
नारद जी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा। जब तुम इतने दृढ़ निश्चय के साथ कह रही हो तो मैं माँगता हूँ…”
इतने में श्रीकृष्ण ने चंवर झुलाना बंद कर दिया। वे दोनों रानियों और नारद जी को बारी-बारी से देखने लगे। उनके नेत्रों में वह लीलामय भाव था जो तब दिखाई देता है जब कोई बड़ी लीला होने वाली हो। सत्यभामा अभी भी नारद जी के सामने खड़ी थीं। उनके हृदय की धड़कन तेज चल रही थी। वे जानती थीं कि अब जो माँगा जाएगा, उसे उन्हें देना ही होगा।
रुक्मिणी ने आकाश की ओर दृष्टि उठाई मानो किसी अदृश्य शक्ति से प्रार्थना कर रही हों। नारद जी ने अपना कमंडल ठीक किया और सत्यभामा की ओर देखने लगे। वातावरण में एक अजीब सा तनाव छा गया था। लगता था मानो अगला शब्द पूरे द्वारका की दिशा बदलने वाला हो।
सत्यभामा ने एक गहरी साँस ली और बोलीं, “नारद जी, अब आप बोलिए। मैं सुनने को तैयार हूँ।”
नारद जी ने धीरे से अपने होठ खोले। पर जो माँग वे करने वाले थे, वह अभी बाकी थी। अभी तो केवल वचन की तैयारी पूरी हुई थी। दान का वास्तविक रूप अभी सामने आना बाकी था।
और श्रीकृष्ण… वे अब भी मुस्कुरा रहे थे। मानो सब कुछ उनके खेल का ही एक अंग हो।









