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  • 🐦 नन्ही चिड़िया और बारिश की बूँद 🌧️

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    एक घने जंगल में चिंकी नाम की एक नन्ही चिड़िया रहती थी। वह बहुत प्यारी और चंचल थी, लेकिन उसे अपनी छोटी-सी ताकत पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।

     

    एक दिन जंगल में बहुत तेज़ बारिश हुई। बारिश इतनी ज़ोरदार थी कि पेड़ों की डालियाँ हिलने लगीं। चिंकी डरकर अपने घोंसले में छिप गई।

     

    बारिश रुकने के बाद उसने देखा कि एक छोटी-सी चींटी पानी की धारा में फँस गई है।

     

    चींटी चिल्लाई,

    “बचाओ! कोई मेरी मदद करो!”

     

    चिंकी ने सोचा,

    “मैं तो इतनी छोटी हूँ। मैं इसे कैसे बचा सकती हूँ?”

     

    फिर उसने हिम्मत जुटाई। उसने अपनी चोंच से एक छोटा-सा पत्ता उठाया और उसे चींटी के पास पानी में डाल दिया।

     

    चींटी किसी तरह उस पत्ते पर चढ़ गई और बहते-बहते किनारे तक पहुँच गई।

     

    चींटी ने मुस्कुराकर कहा,

    “धन्यवाद चिंकी! तुमने मेरी जान बचा ली।”

     

    चिंकी बहुत खुश हुई। उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा,

    “मैं छोटी जरूर हूँ, लेकिन किसी के काम तो आ सकती हूँ!”

     

    कुछ दिनों बाद जंगल में एक शिकारी आया। उसने चिंकी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया। चिंकी जैसे ही जाल के पास पहुँची, चींटी ने उसे देख लिया।

     

    चींटी तुरंत अपने साथियों को बुलाकर आई। सभी चींटियों ने मिलकर शिकारी के पैरों पर काटना शुरू कर दिया। शिकारी घबरा गया और वहाँ से भाग गया।

     

    चिंकी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

     

    वह बोली,

    “आज समझ आया कि छोटी-सी मदद भी कभी बेकार नहीं जाती।”

     

    चींटी मुस्कुराई और बोली,

    “और सच्ची दोस्ती में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता।”

     

     सीख:

     

    हमें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि हम छोटे हैं या हमारी मदद छोटी है। सच्चे मन से की गई छोटी-सी मदद भी किसी के लिए बहुत बड़ी बन सकती है। 

  • जिसे चाहा था अपनी जान से भी ज़्यादा

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जिसे चाहा था अपनी जान से भी ज़्यादा,

    वही आज अनजान सा लगता है,

    जिसके बिना एक पल भी मुश्किल था,

    आज उसके बिना जीना आसान सा लगता है।

  • हमने तो मोहब्बत में अपना सब कुछ हार दिया

    हमने तो मोहब्बत में अपना सब कुछ हार दिया

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    हमने तो मोहब्बत में अपना सब कुछ हार दिया,

    उसने बस मुस्कुराकर हमें किनारे कर दिया,

    जिसे समझा था अपनी ज़िंदगी की आख़िरी मंज़िल,

    उसने हमें रास्ते में ही छोड़ दिया।

  • तुझे भुलाने में पूरी उम्र लग गई

    तुझे भुलाने में पूरी उम्र लग गई

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तेरे बाद किसी से दिल लगाने की हिम्मत नहीं हुई,

    टूटे हुए दिल को फिर सजाने की हिम्मत नहीं हुई,

    तूने तो पल भर में भुला दिया हमें,

    और हमें तुझे भुलाने में पूरी उम्र लग गई।

  • तुमसे बिछड़कर

    तुमसे बिछड़कर

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दर्द इतना है कि आँखें भी नम नहीं होतीं,

    यादें इतनी हैं कि रातें कम नहीं होतीं,

    तुमसे बिछड़कर समझ आया ये इश्क़,

    हर किसी के नसीब में मोहब्बत पूरी नहीं होती।

  • एपिसोड 11: वंश का अंत – जब सोलह हज़ार रानियों के बाद भी कोई रेखा शेष न रही

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    द्वारका अब अपनी चरम वैभवशाली अवस्था में थी। अष्टभार्या के महल चमक रहे थे, सोलह हज़ार एक सौ प्रासादों में दीप जल रहे थे, और श्रीकृष्ण के पुत्र-पौत्रों की संख्या इतनी बढ़ चुकी थी कि यादव कुल पृथ्वी के सबसे शक्तिशाली वंशों में गिना जाने लगा था। लोग कहते थे कि यदुवंश का कोई अंत नहीं। रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न, जाम्बवती के पुत्र साम्ब, अन्य रानियों के पुत्र और फिर उनके भी पुत्र – सब मिलकर एक विशाल सैन्य और राजनीतिक शक्ति बन गए थे। बाहरी शत्रु अब यादवों का सामना करने से डरते थे।

     

    फिर भी एक प्रश्न बार-बार उठता था। कभी सभा में, कभी तट पर, कभी मंदिर के प्रांगण में कोई धीरे से पूछ बैठता – “यदि भगवान की इतनी रानियाँ हैं, इतने पुत्र हैं, इतना विस्तार है, तो भविष्य में उनका वंश क्यों नहीं चलेगा? क्या यदुवंश सदा अमर रहेगा?” अधिकांश लोग इस प्रश्न को टाल देते। वे कहते – “भगवान हैं, उनका वंश कैसे समाप्त होगा?” पर जो गहरी दृष्टि वाले थे, वे जानते थे कि लीला का अपना नियम होता है। जो उदय होता है, उसका अस्त भी निश्चित है। और श्रीकृष्ण की लीला में यह अस्त भी उतना ही आवश्यक था जितना उदय।

     

    कथा के अनुसार सोलह हज़ार एक सौ रानियों में से प्रत्येक ने दस-दस पुत्रों को जन्म दिया। संख्या इतनी विशाल हो गई कि यादव केवल एक कुल नहीं, एक राष्ट्र जैसे लगने लगे। इनमें प्रद्युम्न जैसे वीर थे, साम्ब जैसे तेजस्वी थे, अनिरुद्ध जैसे सुंदर और योग्य थे। अनिरुद्ध के पुत्र वज्र भी हुए। बाह्य दृष्टि से लग रहा था कि कृष्ण का रक्त रेखाओं में बहता रहेगा और द्वारका की शक्ति युगों तक अखंड रहेगी। पर भीतर-भीतर एक दूसरी धारा भी चल रही थी – अहंकार की धारा।

     

    जब किसी कुल को असाधारण बल, अतुल वैभव और निरंतर विजय मिलती है, तो धीरे-धीरे उसमें विनय कम होने लगती है। यादव युवा पीढ़ी में यही होने लगा। वे अपने पिता श्रीकृष्ण के प्रभाव से तो परिचित थे, पर उस प्रभाव के मूल में जो धर्म, संयम और लोकसंग्रह था, उसे भूलने लगे। वे सोचने लगे – हम स्वयं देवता हैं, हम अजेय हैं, हमारा शासन शाश्वत है। मदिरा, अभिमान और परस्पर स्पर्धा ने उनके भीतर की एकता को खोखला कर दिया। बाहर से वे एक वंश दिखते थे, भीतर से टूटने को तैयार थे।

     

    इसी बीच एक घटना घटी जिसने भविष्य के विनाश का बीज बो दिया। कुछ आर्ष मुनि द्वारका आए। साम्ब और अन्य यादव युवकों ने उन्हें परिहास का पात्र बनाने का निश्चय किया। उन्होंने साम्ब को गर्भवती स्त्री का वेश पहनाया और मुनियों से पूछा – “भगवन्, बताइए यह क्या जनेगी?” मुनियों ने दिव्य दृष्टि से देखा और कठोर वचन बोले। उन्होंने कहा कि इससे एक लोहे का मुसल उत्पन्न होगा, और उसी मुसल से तुम्हारे कुल का विनाश होगा। यादव हँसे, पर मुनिवरों का शाप मिथ्या नहीं होता।

     

    समय आने पर साम्ब के पास वास्तव में लोहे का एक मुसल उत्पन्न हुआ। भयभीत यादवों ने उसे पीसकर समुद्र में फेंक दिया। वे समझे अब शाप टल गया। पर भाग्य के विधान को कोई नहीं टाल सकता। उस लोहे के कण समुद्र तट पर बिखरे। वहाँ से एक घास उपजी जिसमें लोहे के अंश थे। उसी से आगे चलकर वही विनाशकारी अस्त्र तैयार होने वाला था। एक भाग जरा नामक व्याध के पास पहुँचा, जो आगे चलकर बाण का अग्रभाग बना।

     

    वर्ष बीतते गए। श्रीकृष्ण सब जानते थे। वे जानते थे कि यादवों का भार पृथ्वी पर अत्यंत बढ़ गया है। कभी देवताओं और पृथ्वी ने ही अनुरोध किया था कि पृथ्वी का भार कम किया जाए। कंस, जरासंध, नरकासुर जैसे अत्याचारियों का अंत हो चुका था, पर अब स्वयं यादव कुल अपनी शक्ति और अहंकार से पृथ्वी पर नया भार बनता जा रहा था। यदि यह वंश इसी रूप में चलता रहता तो आगे चलकर वही कुल धर्म की रक्षा के बजाय धर्म के लिए संकट बन सकता था। अतः विधान रचा गया कि यदुवंश का अंत उसके अपने हाथों हो।

     

    प्रभावती क्षेत्र में, समुद्र तट पर, यादवों का अंतिम जमावड़ा हुआ। मदिरा का प्रवाह बढ़ा, पुरानी मनमुटावें सामने आईं, वाक्य बाण बने और बाण अस्त्र बने। जो एक वंश था, वह दो खेमों में बँट गया। भाई ने भाई को नहीं पहचाना, पिता ने पुत्र को नहीं। जो मुसल शाप से उत्पन्न हुआ था, वही अब उनके हाथों में विनाश का साधन बन गया। थोड़े ही समय में विशाल यादव सैन्य शक्ति स्वयं नष्ट हो गई। प्रद्युम्न, साम्ब, अनिरुद्ध और असंख्य वीर उस युद्ध में गिर गए जो कोई बाहरी शत्रु नहीं, उनका अपना ही अहंकार लड़ रहा था।

     

    जब संहार हो चुका तो श्रीकृष्ण वन की ओर चले गए। वे जानते थे कि उनकी लीला का समय भी पूरा होने को है। एक वृक्ष के नीचे वे लेटे। जरा नामक व्याध ने उन्हें मृग समझकर बाण मारा। बाण उनके चरण में लगा। जरा भयभीत होकर आया, पर कृष्ण ने उसे अभय दिया। उन्होंने कहा कि यह भी विधान है। उन्होंने अपने शेष उत्तरदायित्व पूरे किए। वज्र को सुरक्षित स्थान दिया गया ताकि यदुवंश की एक पतली रेखा किसी रूप में बची रहे, पर वह रेखा आगे चलकर राजनीतिक शक्ति का स्रोत नहीं बनी। मुख्य वंश का अंत हो चुका था।

     

    अब मूल प्रश्न पर आते हैं – इतनी रानियाँ, इतने पुत्र होने के बाद भी श्रीकृष्ण का वंश क्यों नहीं चला?

     

    पहला उत्तर है – स्वयं उनका इच्छा। श्रीकृष्ण अवतार थे। अवतार का अर्थ है विशिष्ट प्रयोजन के लिए उतरना। प्रयोजन जब पूरा हो जाए तो रूप का संकोच भी आवश्यक हो जाता है। यदि उनका रक्त-वंश पृथ्वी पर दीर्घ काल तक राजशक्ति के रूप में बना रहता, तो लोग धर्म के बजाय कुल की पूजा करने लगते। वे कहते – हम कृष्ण के वंशज हैं, अतः हमारा अधिकार अखंड है। भगवान ने इस संभावना को ही समाप्त कर दिया। उन्होंने दिखाया कि पवित्रता कुल में नहीं, आचरण में होती है।

     

    दूसरा उत्तर है – भार का हरण। पृथ्वी ने जब भार से दबी अवस्था में प्रार्थना की थी, तब केवल राक्षसों का नाश पर्याप्त नहीं था। समय आने पर उन शक्तियों का भी संहार आवश्यक था जो शुरू में धर्म के पक्ष में थीं, पर बाद में अहंकार से अधर्म की ओर बढ़ सकती थीं। यादव उसी श्रेणी में आ गए। अतः उनका अंत भी कृष्ण लीला का हिस्सा बना।

     

    तीसरा उत्तर है – उपदेश। संसार को यह दिखाना था कि वैभव, संख्या और रक्त संबंध स्थायी नहीं होते। सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ और उनके पुत्र – यह सब होते हुए भी एक शाप, एक अहंकार और एक आंतरिक फूट पर्याप्त थी पूरे वंश को मिटा देने के लिए। जो लोग केवल वंश पर गर्व करते हैं, उन्हें यह कथा आईना दिखाती है।

     

    चौथा उत्तर भक्ति की दृष्टि से है। श्रीकृष्ण का वास्तविक वंश रक्त का नहीं, भाव का है। जो उनकी शरण में आता है, जो उनके नाम का जप करता है, जो उनके गुण गाता है – वही उनका वंशज है। प्रह्लाद दैत्य कुल में जन्मे, पर विष्णु के हो गए। विभीषण राक्षस कुल में जन्मे, पर राम के हो गए। उसी प्रकार कृष्ण का वंश उन लाखों-करोड़ों भक्तों में चलता है जो युगों बाद भी “राधे कृष्ण” कहते हैं। द्वारका का वैभव समाप्त हो गया, यादव सैन्य शक्ति समाप्त हो गई, पर भक्ति परंपरा अखंड चल रही है। यही उनका अटूट वंश है।

     

    पाँचवाँ उत्तर लीला की पूर्णता का है। यदि कृष्ण का वंश राजनीतिक रूप से चलता रहता तो उनकी कथा अधूरी रह जाती। लोग कहते – वे गए, पर उनका राज्य रह गया। अब कहते हैं – वे गए, और अपना सारा ऐश्वर्य भी समेट कर ले गए। पीछे केवल शिक्षा रह गई, केवल नाम रह गया, केवल धर्म रह गया। यह अधिक निर्मल विदाई है।

     

    कुछ लोग पूछते हैं कि फिर वज्र को क्यों बचाया गया। उत्तर है – पूर्ण शून्यता भी आवश्यक नहीं थी। एक पतली रेखा छोड़ दी गई ताकि इतिहास में यह कहा जा सके कि यदुवंश सर्वथा लुप्त नहीं हुआ, पर वह रेखा इतनी शक्तिशाली नहीं रही कि नया अहंकार खड़ा कर सके। संतुलन रखा गया।

     

    रानियों की दृष्टि से देखें तो यह अंत और भी करुण है। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी और अन्य रानियाँ जिन्होंने कृष्ण के साथ जीवन व्यतीत किया था, उन्होंने अपने पुत्रों और पौत्रों का संहार देखा। उनके प्रासाद सूने हो गए। पर पुराणों में उनके विलाप को मुख्य स्थान नहीं दिया गया, क्योंकि कथा का केंद्र व्यक्तिगत शोक नहीं, विधान की पूर्णता है। जो भगवान के साथ जीवन बिताती हैं, वे जानती हैं कि आने वाला भी उनका है और जाने वाला भी उनका है। फिर भी मानवीय हृदय पर चोट तो पड़ती ही है। यह चोट भी लीला का अंग है।

     

    आज जब कोई द्वारका जाता है तो विशाल प्रासादों के स्थान पर समुद्र और मंदिर पाता है। सोलह हज़ार एक सौ महलों का कोई अवशेष नहीं। अष्टभार्या के वैभव की कोई राजसी पंक्ति नहीं। केवल कृष्ण का नाम है, उनकी मूर्ति है, और भक्तों की भीड़ है। यही प्रमाण है कि उनका वंश समाप्त नहीं हुआ – केवल रूप बदल गया। पहले वह रक्त से चलता था, अब वह स्मरण से चलता है। पहले वह सिंहासन पर था, अब वह हृदय में है।

     

    इसलिए प्रश्न का उत्तर संक्षेप में यह है – श्रीकृष्ण की इतनी रानियाँ और पुत्र होने के बाद भी उनका राजकीय वंश इसलिए नहीं चला क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि वह चले। उन्होंने पृथ्वी का भार उतारा, अहंकार का नाश किया, रक्त-गर्व की संभावना समाप्त की, और अपनी वास्तविक संतति अर्थात् भक्त परंपरा को अमर छोड़ दिया। जो लोग केवल पुत्र-पौत्रों को वंश मानते हैं, वे संख्या गिनते हैं। जो लोग भाव को वंश मानते हैं, वे देखते हैं कि कृष्ण आज भी सबसे अधिक जीवित हैं।

     

    लीला समाप्त हुई, वंश समाप्त हुआ, द्वारका समुद्र में समा गई – पर जो बच गया वह अविनाशी है। नाम बच गया, धर्म बच गया, और वह प्रेम बच गया जो राधा से शुरू होकर सोलह हज़ार एक सौ हृदय तक फैला और फिर पूरे संसार में फैल गया। यही कारण है कि श्रीकृष्ण का वंश

    नहीं रहा, फिर भी वे कभी अकेले नहीं हुए।

  • एपिसोड 10: शेष अष्टभार्या और सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    द्वारका अब केवल एक नगरी नहीं रह गई थी। वह लीलाओं का केंद्र बन चुकी थी। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और कालिन्दी के बाद श्रीकृष्ण की लीला में और चार प्रधान रानियाँ आईं – मित्रविंदा, नाग्नजिती, भद्रा और लक्ष्मणा। इन आठों को ही अष्टभार्या कहा जाता है। इनके बाद एक और अद्भुत अध्याय आया – नरकासुर से छुड़ाई गई सोलह हज़ार एक सौ राजकन्याएँ, जिन्हें श्रीकृष्ण ने पत्नी रूप में स्वीकार किया। यह एपिसोड उन्हीं सबकी कथा है।

     

    मित्रविंदा अवन्ती देश की राजकुमारी थीं। कुछ कथाओं में वे वसुदेव जी की बहन राजधिदेवी की पुत्री मानी जाती हैं, अर्थात् श्रीकृष्ण की फुफेरी बहन। उनका स्वभाव शांत और सत्त्वगुण से भरा था। उनके भाई विंद और अनुविंद कृष्ण के विरोधी थे। उन्होंने निश्चय किया कि मित्रविंदा का विवाह किसी ऐसे राजा से होगा जो यादवों का पक्ष न ले। स्वयंवर रचा गया। अनेक राजा आए, पर मित्रविंदा का मन पहले से श्रीकृष्ण में बस चुका था। उन्होंने उनके गुण, पराक्रम और धर्म की रक्षा की कथाएँ सुन रखी थीं।

     

    स्वयंवर के दिन जब मित्रविंदा सभा में आईं तो उनका हृदय द्वारका की ओर ही खिंचा जा रहा था। श्रीकृष्ण समय पर पहुँचे। विंद और अनुविंद ने विरोध किया, अन्य राजाओं ने घेरने का प्रयास किया, पर कृष्ण ने मित्रविंदा का हाथ पकड़कर उन्हें रथ पर बिठा लिया। यह दृश्य रुक्मिणी हरण जैसा था, पर भाव अलग था। मित्रविंदा भय से नहीं, भक्ति और विश्वास से रथ पर बैठीं। द्वारका पहुँचकर उनका पाणिग्रहण हुआ। वे अष्टभार्या में वह रानी बनीं जो कम बोलती थीं, पर घर की मर्यादा और परिवार के स्नेह को बड़ी गहराई से संभालती थीं। कृष्ण के लिए वे अपनी ही वंश की पुत्री थीं, इसलिए उनका संबंध केवल पति-पत्नी का नहीं, कुल की आत्मीयता का भी था।

     

    नाग्नजिती को सत्य्या भी कहा जाता है। वे कोशल नरेश नाग्नजित् की पुत्री थीं। नाग्नजित् अत्यंत बलशाली राजा थे। उन्होंने अपनी पुत्री के स्वयंवर की एक कठिन शर्त रखी। राजसभा में सात उन्मत्त, भयंकर बैल छोड़े गए थे। जो वीर इन सातों को एक साथ वश में कर ले, वही नाग्नजिती का वर हो सकता था। अनेक राजकुमार आए, पर बैलों के सामने टिक न सके। कोई घायल हुआ, कोई भाग खड़ा हुआ।

     

    जब श्रीकृष्ण को यह समाचार मिला तो वे कोशल पहुँचे। नाग्नजिती महल की गवाक्ष से देख रही थीं। उनके मन में पहले से ही कृष्ण के प्रति आकर्षण और श्रद्धा थी। उन्होंने सोचा – यदि ये सातों बैल वश में कर सकें तो निश्चय ही ये साधारण नर नहीं। कृष्ण अखाड़े में उतरे। उन्होंने न तो घबराहट दिखाई, न गर्व। एक-एक कर सातों बैलों को उन्होंने अपने दिव्य बल से काबू में कर लिया। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि उन्होंने एक साथ सातों को बाँध दिया। सभा स्तब्ध रह गई। नाग्नजित् राजा ने प्रसन्न होकर पुत्री सौंप दी।

     

    नाग्नजिती सत्य्या नाम से द्वारका की रानी बनीं। उनका नाम “सत्य्या” इसलिए भी लिया जाता है क्योंकि उनके पिता और कुल सत्य और वीरता के पक्षधर थे। वे तेजस्विनी रानी थीं। रूप में तेज था, स्वभाव में दृढ़ता थी। वे सत्यभामा जैसी उग्र नहीं थीं, पर कमज़ोर भी नहीं थीं। कृष्ण के जीवन में वे उस शक्ति की प्रतीक बनीं जो परीक्षा में खरा उतरकर प्राप्त होती है। उनका विवाह प्रेम पत्र से नहीं, पराक्रम की कसौटी से हुआ था।

     

    भद्रा कैकेय देश की राजकुमारी थीं। कैकेय के राजकुमार उनके भाई थे। भद्रा का स्वभाव कोमल और शालीन था। कुछ पुराणों के अनुसार उनके भाइयों ने स्वयं उन्हें श्रीकृष्ण को समर्पित किया, क्योंकि वे जानते थे कि इससे बढ़कर वर और कुल और कोई नहीं हो सकता। कुछ कथाओं में उनका भी स्वयंवर बताया जाता है, जिसमें कृष्ण विजयी हुए।

     

    भद्रा जब द्वारका आईं तो महल में एक नई शांति आई। वे विवादों से दूर रहती थीं। रुक्मिणी का सम्मान करतीं, छोटी रानियों का ध्यान रखतीं और कृष्ण की सेवा में चुपचाप लीन रहतीं। उनका नाम “भद्रा” अर्थात् कल्याणमयी स्वयं उनके स्वभाव को दर्शाता था। वे अष्टभार्या में वह कड़ी थीं जो घर को सौम्यता देती है। उनका कृष्ण से संबंध वैभव या युद्ध की कथा जितना चर्चित नहीं, पर गृहस्थ धर्म की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। कृष्ण के अनेक रूप थे – योद्धा, राजा, सखा, भगवान। भद्रा के पास वे गृहस्थ पति के रूप में अधिक प्रकट होते थे।

     

    लक्ष्मणा मद्र देश की राजकुमारी थीं। कुछ ग्रंथों में उन्हें माद्री भी कहा गया है। उनके स्वयंवर की शर्त बड़ी विलक्षण थी। आकाश में एक मछली घुमाई गई थी और उसकी छाया जल में दिखाई दे रही थी। जो वीर केवल छाया देखकर मछली की आँख में बाण मार दे, वही लक्ष्मणा का वर कहलाए। यह शर्त अर्जुन के द्रौपदी स्वयंवर की याद दिलाती है। अनेक राजाओं ने प्रयास किया, पर सफलता नहीं मिली।

     

    श्रीकृष्ण ने धनुष उठाया। उन्होंने न केवल लक्ष्य भेदा, बल्कि वह भी ऐसी सहजता से किया मानो बाल लीला कर रहे हों। सभा में जयघोष गूँज उठा। मद्र नरेश ने पुत्री का हाथ कृष्ण के हाथ में दिया। लक्ष्मणा द्वारका पहुँचीं। वे रूपवती और चतुर थीं। अष्टभार्या में उनका स्थान उस रानी का था जो कला, लावण्य और राजसी शिष्टाचार को साथ लेकर आई थीं। कृष्ण के साथ उनका संबंध प्रेम और सम्मान दोनों से बँधा था। वे जानती थीं कि उनका वर केवल धनुर्धर नहीं, जगत् का आधार है।

     

    इन चारों के आने के बाद अष्टभार्या पूर्ण हुईं – रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी, मित्रविंदा, नाग्नजिती, भद्रा और लक्ष्मणा। आठों अलग-अलग दिशाओं, अलग-अलग स्वभावों और अलग-अलग प्रकार की भक्ति का प्रतिनिधित्व करती थीं। कोई त्याग से आई, कोई पत्र लिखकर, कोई युद्ध के बाद, कोई तप से, कोई स्वयंवर की शर्त से, कोई कुल के समर्पण से। भगवान की लीला में एक ही रूप काफी नहीं था। आठ प्रधान भावों को आठ रानियों के रूप में स्थान दिया गया।

     

    अब वह प्रसंग आता है जो लोगों को सबसे अधिक आश्चर्य में डालता है – सोलह हज़ार एक सौ पत्नियाँ।

     

    प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर था, जिसे भौमासुर भी कहते हैं। वह पृथ्वी पुत्र कहा जाता था और अत्यंत अत्याचारी था। उसने देवताओं को भी त्रस्त कर रखा था। इंद्र की छत्र-मणि, कर्णकुंडल और अनेक दिव्य वस्तुएँ उसने छीन ली थीं। सबसे बड़ा पाप यह था कि उसने पृथ्वी के विभिन्न देशों से सोलह हज़ार एक सौ राजकन्याओं और स्त्रियों को बंदी बना रखा था। वे राजकन्याएँ उसके अंतःपुर में बंद थीं। उनका जीवन अपमान, भय और निराशा से भरा था। समाज की दृष्टि में बंदीगृह से निकली कन्या का सम्मान बचाना कठिन माना जाता था। नरकासुर उन्हें अपनी संपत्ति समझता था।

     

    देवताओं और पृथ्वी की पुकार जब चरम पर पहुँची तो श्रीकृष्ण द्वारका से निकले। कई कथाओं में सत्यभामा भी साथ गईं। गरुड़ पर सवार होकर कृष्ण प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। नगर के चारों ओर अग्निमय परकोटे, पाश और असुर सेना थी। कृष्ण ने एक-एक कर रक्षा-कवच तोड़े, मुर नामक राक्षस का वध किया और अंत में नरकासुर से युद्ध किया। युद्ध भीषण था। नरकासुर का बल अपार था, पर अधर्म का अंत निश्चित था। श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। सत्यभामा ने भी उस युद्ध में वीरता दिखाई, ऐसी कथाएँ प्रचलित हैं।

     

    जब बंदीगृह के द्वार खुले तो सोलह हज़ार एक सौ स्त्रियाँ बाहर आईं। उनके मुख पर मुक्ति की खुशी थी, पर आँखों में एक गहरा भय भी था। वे कृष्ण के सामने आकर नतमस्तक हुईं। उनकी प्रार्थना केवल मुक्त होने की नहीं थी। वे बोलीं, “नाथ, आपने हमें नरकासुर के कारागार से निकाला। पर संसार हमें कैसे स्वीकार करेगा? लोग कहेंगे ये उस असुर के घर रही हैं। हमारे पिता के घर लौटने पर भी कलंक का बोझ रहेगा। हमारा धर्म, हमारा सम्मान, हमारा भविष्य – सब संकट में है। आप त्रिलोकी के नाथ हैं। यदि आप हमें स्वीकार कर लें तो हमारा जीवन पुनः पवित्र और सुरक्षित हो जाएगा।”

     

    यह प्रार्थना साधारण नहीं थी। इसमें पीड़ा थी, लाचारी थी और विश्वास भी था। श्रीकृष्ण समझ गए। उन्होंने उन कन्याओं को वस्तु या भोग की दृष्टि से नहीं देखा। उन्होंने उन्हें उस समाज की पीड़िताओं के रूप में देखा जिनका सम्मान बचाना भी धर्म था। उन्होंने कहा, “तुम निर्दोष हो। तुम्हारा दोष नहीं, असुर का पाप था। मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। तुम मेरी पत्नियाँ कहलाओगी। तुम्हें द्वारका में सम्मान, सुरक्षा और गृहस्थ का अधिकार मिलेगा।”

     

    यह स्वीकार करना साधारण विवाह नहीं था। श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया और ऐश्वर्य से एक साथ अनेक रूप धारण किए। प्रत्येक रानी को अपना पति अलग-अलग प्रासाद में प्राप्त हुआ। हर एक को ऐसा अनुभव हुआ मानो कृष्ण केवल उसी के हैं। यह लीला इसलिए हुई ताकि कोई उपेक्षित न रह जाए। सोलह हज़ार एक सौ प्रासाद बने, सोलह हज़ार एक सौ घर triस्थ जीवन से भर गए। उन रानियों ने पुत्र भी जन्म दिए। भागवत में आता है कि प्रत्येक के दस-दस पुत्र हुए। यह संख्या लीला की विशालता को दर्शाती है, केवल गिनती को नहीं।

     

    अब प्रश्न यह है – वे पत्नियाँ क्यों थीं?

     

    पहला कारण था सम्मान की रक्षा। उस युग की सामाजिक व्यवस्था में बंदी बनाई गई राजकन्याओं का सामान्य विवाह कठिन था। भगवान ने उन्हें अपनी पत्नी बनाकर उनका कलंक मिटाया, उन्हें राजसी गरिमा दी।

     

    दूसरा कारण था शरणागति। उन्होंने कृष्ण को पति रूप में वरना चाहा। भगवान भक्त की पुकार ठुकराते नहीं। चाहे भक्त एक हो या सोलह हज़ार एक सौ।

     

    तीसरा कारण था लीला का विस्तार। कृष्ण केवल आठ भावों तक सीमित नहीं थे। वे अनंत हैं। अनंत पत्नियाँ उनके अनंत रूपों की ओर संकेत करती हैं। एक भगवान, अनेक हृदय, एक साथ सबमें पूर्ण उपस्थिति – यही तो उनकी विशेषता है।

     

    चौथा कारण था अधर्म के परिणाम को धर्म में बदलना। नरकासुर ने स्त्रियों को संपत्ति बनाया। कृष्ण ने उसी प्रसंग को मुक्ति और मर्यादा का प्रसंग बना दिया। अत्याचार का अंत केवल वध से नहीं हुआ, पीड़िताओं के जीवन को पुनर्स्थापित करके हुआ।

     

    इन सोलह हज़ार एक सौ रानियों के व्यक्तिगत नाम पुराणों में विस्तार से नहीं मिलते, जैसा अष्टभार्या के मिलते हैं। वे सामूहिक रूप में स्मरण की जाती हैं। यह भी एक संदेश है – भगवान की दृष्टि में नामहीन पीड़िता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी प्रधान रानी। रुक्मिणी महल की लक्ष्मी थीं, सत्यभामा तेज थीं, जाम्बवती प्राचीन भक्ति थीं, कालिन्दी तप थीं – और ये सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ करुणा थीं।

     

    द्वारका अब अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती थी। एक ओर आठ प्रधान महल, दूसरी ओर हज़ारों प्रासाद। कोई पूछ सकता था कि एक पुरुष इतने संबंध कैसे निभाए। उत्तर लीला में छिपा है। श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम हैं। समय, स्थान और रूप उनके अधीन हैं। वे एक काल में अनेक स्थानों पर पूर्ण रूप से उपस्थित रह सकते हैं। इसलिए यह कथा सामान्य गृहस्थ की नाप-तोल से नहीं देखी जाती। यह ऐश्वर्य और करुणा की कथा है।

     

    अष्टभार्या और सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ मिलाकर श्रीकृष्ण के दांपत्य जीवन का पूरा चित्र बनता है। आठ मुख्य स्तंभ हैं – अलग-अलग प्रदेशों, अलग-अलग परीक्षाओं और अलग-अलग स्वभावों से आए हुए। शेष रानियाँ उस विशाल करुणा का विस्तार हैं जो पीड़ित को भी अपना बना लेती है। कोई रानी प्रेम से आई, कोई पत्र से, कोई युद्ध से, कोई तप से, कोई स्वयंवर से, कोई पिता के समर्पण से, और कोई कारागार की मुक्ति से। मार्ग अलग थे, गंतव्य एक था – कृष्ण के चरण।

     

    इस संपूर्ण विस्तार का सार यही है कि श्रीकृष्ण का संबंध केवल एक भाव तक सीमित नहीं। राधा में निर्गुण प्रेम है, रुक्मिणी में धर्म और लक्ष्मी भाव है, सत्यभामा में तेज और अधिकार है, जाम्बवती में युगों की भक्ति है, कालिन्दी में तप और पवित्रता है, मित्रविंदा में पारिवारिक स्नेह है, नाग्नजिती में पराक्रम से प्राप्त सत्य है, भद्रा में कल्याण है, लक्ष्मणा में लक्ष्य-भेदन का वैभव है, और सोलह हज़ार एक सौ रानियों में शरणागत वत्सलता है।

     

    जो यह पूछता है कि इतनी पत्नियाँ क्यों थीं, उसे संख्या के पीछे का धर्म देखना चाहिए। भगवान ने भोग के लिए गृह नहीं भरे। उन्होंने हर प्रकार की आत्मा को स्थान दिया – राजसी, तपोमयी, अभिमानिनी, शांता, पीड़िता और शरणागता। द्वारका इसीलिए वैकुंठ धरती पर उतरी मानी गई, क्योंकि वहाँ कोई अंतःपुर की कैद नहीं रह गई, कोई राजकन्या अनाथ नहीं रह गई, और कोई भक्त यह नहीं कह सकी कि मेरे लिए स्थान नहीं बचा।

     

    यही अष्टभार्या और सोलह हज़ार एक सौ रानियों की कथा का मर्म है।

  • एपिसोड 9: कालिन्दी – यमुना जो कृष्ण की रानी बनीं

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    भारत की पवित्र नदियों में यमुना का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। वह केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक दिव्य चेतना है। उसी यमुना को जब मानव रूप में प्रकट किया गया तो उनका नाम पड़ा – कालिन्दी। कालिन्दी श्रीकृष्ण की अष्टभार्या में से एक थीं। उनकी कथा जल की तरह गहन और भक्ति की तरह निर्मल है।

     

    कालिन्दी सूर्य देव की पुत्री थीं। सूर्य की पत्नी संज्ञा से उनका जन्म हुआ था। उनके भाई यमराज थे, जो धर्मराज कहलाते हैं। कालिन्दी का वर्ण श्याम था, ठीक वैसे ही जैसे यमुना का जल गहरा और श्यामल दिखाई देता है। बचपन से ही उनमें विलक्षण गुण थे। वे चंचल नहीं थीं, बल्कि गंभीर और एकाग्र थीं। जब अन्य देवकन्याएँ विलास और वैभव की बातें करतीं, कालिन्दी एकांत में बैठकर ध्यान करतीं।

     

    एक दिन उन्होंने नारद जी से श्रीकृष्ण की कथा सुनी। नारद जी ने बताया कि द्वापर युग में स्वयं नारायण कृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं। वे गोकुल में लीलाएँ कर चुके हैं, मथुरा में कंस का वध कर चुके हैं और अब द्वारका में राज्य कर रहे हैं। कालिन्दी ने जब कृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं का वर्णन सुना तो उनका हृदय जैसे थम गया। उन्होंने उसी क्षण निश्चय कर लिया – “मैं इन्हीं को पति के रूप में पाऊँगी। इनके अलावा और कोई मुझे स्वीकार नहीं।”

     

    कालिन्दी ने कठोर तप शुरू कर दिया। वे हिमालय की ऊँची कंदराओं में चली गईं। वहाँ उन्होंने सूर्य के सामने खड़े होकर तपस्या की। गर्मी हो या सर्दी, वर्षा हो या आँधी – वे अडिग रहीं। वर्षों तक वे केवल वायु पीकर रहीं। उनका शरीर कृश हो गया, पर उनकी भक्ति और प्रबल होती गई। वे प्रतिदिन प्रार्थना करतीं, “हे कृष्ण, हे यदुनाथ, हे द्वारकाधीश! यदि मैं सच में आपकी अनन्या दासी हूँ तो मुझे अपनाइए। मैं जल रूप में युगों से आपकी लीलाओं की साक्षी रही हूँ। अब मुझे अपनी पत्नी बनाकर मेरे तप को सफल कीजिए।”

     

    उनकी तपस्या से तीनों लोक प्रभावित हो गए। सूर्य देव स्वयं आकर बोले, “पुत्री, तुम इतना कठोर तप क्यों कर रही हो? कोई भी देवता या राजा तुम्हें पति के रूप में पाकर कृतार्थ हो जाएगा।”

     

    कालिन्दी ने सिर झुकाते हुए कहा, “पिता, मैंने अपना हृदय पहले ही श्रीकृष्ण को दे दिया है। अब मैं किसी और को स्वीकार नहीं कर सकती। या तो वे मुझे स्वीकार करें, या मैं इस शरीर को यहीं त्याग दूँ।”

     

    सूर्य देव समझ गए कि उनकी पुत्री का निश्चय अटल है। वे मौन हो गए।

     

    इधर द्वारका में श्रीकृष्ण सब जानते थे। भक्त की पुकार उन्हें कभी अनसुनी नहीं रहती। एक दिन वे अपने सारथि दारुक के साथ रथ पर बैठकर निकले। रथ सीधे उस स्थान की ओर बढ़ा जहाँ कालिन्दी तपस्या कर रही थीं। जब रथ पहुँचा तो कालिन्दी ध्यान में डूबी हुई थीं। उनके चारों ओर तेज फैला हुआ था। कृष्ण रथ से उतरे और धीरे से उनके पास गए।

     

    “कालिन्दी,” कृष्ण ने मधुर स्वर में पुकारा।

     

    कालिन्दी की समाधि टूटी। उन्होंने आँखें खोलीं तो सामने स्वयं वे खड़े थे जिनके लिए उन्होंने वर्षों तप किया था। श्याम वर्ण, पीतांबर, गले में वनर्माला और मुख पर वह दिव्य मुस्कान। कालिन्दी के नेत्रों में अश्रु भर आए। वे तत्काल भूमि पर गिरकर उनके चरणों में झुक गईं।

     

    “नाथ… आप आ गए,” उनकी आवाज काँप रही थी। “मैंने सोचा था कि मेरा तप अधूरा रह जाएगा। आपने कृपा कर दी।”

     

    कृष्ण ने उन्हें उठाया और बोले, “कालिन्दी, तुम्हारी भक्ति ने मुझे खींच लिया। तुमने शरीर की सुध-बुध खोकर मेरा स्मरण किया। जो भक्त इतनी तन्मयता से पुकारता है, मैं उसके पास बिना बुलाए चला जाता हूँ। आज मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ।”

     

    कालिन्दी ने सिर उठाकर देखा। उनके नेत्रों में विश्वास और प्रेम दोनों थे। वे बोलीं, “स्वामी, मैं यमुना हूँ। मैंने आपकी बाल लीलाएँ देखी हैं। जब आप गोकुल में थे तो मैंने अपने जल से आपके चरण धोए हैं। जब आपने कालीय नाग को नथना तो मेरा जल विषैला हो गया था, पर आपकी कृपा से फिर शुद्ध हो गया। अब आप मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम जल रूप में मेरी लीला की साक्षी रही हो। अब मानव रूप में मेरी धर्मपत्नी बनो। द्वारका तुम्हारा नया घर होगा।”

     

    उसी पावन स्थल पर श्रीकृष्ण ने कालिन्दी के साथ विवाह रचाया। कोई विशाल समारोह नहीं हुआ, कोई राजसी ठाठ नहीं था। केवल दो हृदय थे – एक अनंत के और एक तपोमय के। सूर्य देव ने आकाश से पुष्प वर्षा की और यमराज ने दूर खड़े होकर प्रणाम किया।

     

    कालिन्दी द्वारका आईं। वहाँ की अन्य रानियाँ पहले तो आश्चर्यचकित हुईं कि यह श्यामवर्णा रानी कौन हैं जिनके नेत्रों में नदी जैसी गहराई है। पर जब उन्होंने कालिन्दी का शांत स्वभाव, उनकी सेवा भावना और कृष्ण के प्रति उनकी अनन्य भक्ति देखी तो सभी उन्हें सम्मान देने लगीं।

     

    कालिन्दी अन्य रानियों से अलग थीं। वे कम बोलती थीं। महल के कोलाहल से दूर रहना पसंद करती थीं। वे अक्सर महल के उस भाग में बैठी रहतीं जहाँ से समुद्र दिखाई देता था। कभी-कभी वे श्रीकृष्ण से कहतीं, “स्वामी, समुद्र कितना विशाल है, पर मेरा मन तो अब भी उस यमुना तट पर भटकता है जहाँ आपने बाल लीलाएँ की थीं।”

     

    कृष्ण उत्तर देते, “कालिन्दी, यमुना और तुम अब एक नहीं रहे। तुम मेरे साथ हो, अतः यमुना भी मेरे साथ है। तुम्हारे रूप में वह पवित्रता द्वारका में आ गई है।”

     

    कालिन्दी ने कृष्ण को पुत्र भी दिए। उनके पुत्रों में श्रुत और अन्य वीर योद्धा हुए। पर कालिन्दी मातृत्व में भी भक्ति को नहीं भूलीं। वे अपने पुत्रों को सदैव यही शिक्षा देतीं कि उनके पिता साधारण राजा नहीं, बल्कि तीनों लोकों के आधार हैं।

     

    एक बार सत्यभामा ने हल्के स्वर में कहा, “कालिन्दी, तुम इतनी शांत कैसे रहती हो? हमें तो छोटी-छोटी बातों में भी ईर्ष्या हो जाती है, पर तुम्हारे मुख पर कभी विकार नहीं आता।”

     

    कालिन्दी मुस्कुराईं और बोलीं, “बहन, मैं नदी हूँ। नदी का स्वभाव होता है बहना, न रुकना। मैंने तप करके स्वामी को पाया है। अब मुझे और क्या चाहिए? जो मिल गया है वह अनंत है। अनंत को पाकर फिर अल्पकालिक भावों में उलझना मूर्खता है।”

     

    कृष्ण जब भी कालिन्दी के कक्ष में जाते तो एक अजीब शांति अनुभव करते। रुक्मिणी के पास धर्म और गंभीरता थी, सत्यभामा के पास तेज और अधिकार था, जाम्बवती के पास प्राचीन भक्ति थी – पर कालिन्दी के पास वह गहराई थी जो केवल जल में होती है। वे कृष्ण के मन के भावों को बिना कहे समझ जाती थीं।

     

    कभी-कभी कृष्ण उनसे कहते, “कालिन्दी, तुम मुझे याद दिलाती हो कि मैं केवल द्वारकाधीश नहीं, बल्कि वह भी हूँ जो कभी यमुना तट पर गाय चरता था।”

     

    कालिन्दी उत्तर देतीं, “नाथ, आप चाहे जहाँ रहें, मैं तो वही रहूँगी – आपकी चरणरज को धारण करने वाली। चाहे नदी रूप में, चाहे रानी रूप में।”

     

    इस प्रकार कालिन्दी का जीवन श्रीकृष्ण के साथ भक्ति, समर्पण और गहन शांति से भरपूर रहा। वे अष्टभार्या में सबसे कम चर्चित रानी कही जाती हैं, पर उनकी कथा सबसे अधिक गहरी है। क्योंकि उन्होंने न रूप का अहंकार किया, न वैभव का, न अधिकार का। उन्होंने केवल तप किया और पा लिया।

     

    आज भी जब कोई यमुना तट पर खड़ा होता है तो लगता है मानो कालिन्दी अभी भी वहीं कहीं मौजूद हैं – अपने प्रभु की प्रतीक्षा में, या फिर उनके स्मरण में डूबी हुई। क्योंकि जो नदी भगवान की पत्नी बन जाए, उसका जल कभी साधारण नहीं रह जाता। वह जल फिर स्पर्श मात्र से पाप हर लेने वाला हो जाता है।

     

    कालिन्दी की कथा हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम माँगने से नहीं, तप और समर्पण से मिलता है। और जब वह मिल जाए तो फिर किसी और इच्छा की आवश्यकता नहीं रहती है। 

  • एपिसोड 8: जाम्बवती – जो रीछराज की पुत्री होकर भी कृष्ण की रानी बनीं

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    द्वारका की कथाओं में जब अष्टभार्या की बात आती है तो एक नाम अवश्य लिया जाता है – जाम्बवती। वे श्रीकृष्ण की प्रधान रानियों में से एक थीं। पर उनकी कहानी अन्य रानियों से बिलकुल अलग थी। वे किसी राजा की पुत्री नहीं थीं, न ही किसी सामान्य वंश की। वे थीं – जाम्बवान की पुत्री। और जाम्बवान कोई साधारण प्राणी नहीं थे। वे त्रेता युग से जीवित रीछराज थे, जिन्हें स्वयं भगवान राम ने वरदान दिया था।

     

    जाम्बवान का जन्म उस समय हुआ था जब समुद्र मंथन हो रहा था। वे अत्यंत बलशाली, बुद्धिमान और भगवान राम के परम भक्त थे। राम-रावण युद्ध में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राम ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया था कि वे त्रेता से द्वापर तक जीवित रहेंगे और अंत में स्वयं राम को ही फिर से देखेंगे। जाम्बवान उसी वरदान के कारण द्वापर युग तक जीवित थे। वे एक गुफा में अपनी पत्नी और पुत्री जाम्बवती के साथ रहते थे।

     

    जाम्बवती का रूप विचित्र सुंदर था। रीछ वंश में जन्म लेने के कारण उनका वर्ण श्याम था, पर उनके नेत्रों में अपूर्व चमक और गंभीरता थी। वे बचपन से ही पिता के मुख से राम कथा सुनती आ रही थीं। वे जानती थीं कि उनके पिता किसी साधारण व्यक्ति के भक्त नहीं, बल्कि स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनन्य सेवक हैं। जाम्बवती के हृदय में भी उसी भक्ति का बीज बोया जा चुका था।

     

    इधर द्वारका में एक दूसरी कथा चल रही थी – श्यामंतक मणि की।

     

    राजा सत्राजित को सूर्य भगवान से एक दिव्य मणि मिली थी। वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना उत्पन्न करती थी। सत्राजित ने वह मणि अपने भाई प्रसेन को पहनाई। प्रसेन मणि पहनकर वन में घूमने गए। वहाँ एक सिंह ने उन्हें मार डाला और मणि को ले लिया। उसी सिंह को जाम्बवान ने मारकर मणि अपने कब्जे में कर ली और अपनी गुफा में ले आए। वे उसे अपनी पुत्री जाम्बवती के खेलने के लिए दे दिया करते थे।

     

    जब प्रसेन वापस नहीं लौटे तो लोगों में चर्चा होने लगी कि कृष्ण ने लोभवश मणि के लिए प्रसेन की हत्या कर दी है। कृष्ण का नाम खराब हो रहा था। यदुवंशी और अन्य लोग भी संदेह करने लगे। कृष्ण ने निश्चय किया कि वे स्वयं इस कलंक को धोएँगे। वे प्रसेन के मार्ग का अनुसरण करते हुए वन में पहुँचे। वहाँ उन्होंने सिंह के पंजों के निशान देखे और फिर जाम्बवान की विशाल गुफा के द्वार तक पहुँच गए।

     

    गुफा के अंदर से बच्चों के खेलने की आवाज आ रही थी। कृष्ण अंदर घुसे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक छोटी बालिका श्यामंतक मणि को लेकर खेल रही है। वही बालिका जाम्बवती थीं। कृष्ण ने मणि की ओर हाथ बढ़ाया तो जाम्बवान बाहर निकल आए।

     

    जाम्बवान ने कृष्ण को देखा और उन्हें सामान्य मनुष्य समझकर ललकारा, “कौन है जो मेरी गुफा में घुस आया है? क्या तुम मणि चुराने आए हो?”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “हे जाम्बवान, यह मणि सत्राजित की है। मैं इसे वापस लेकर अपना कलंक धोना चाहता हूँ।”

     

    जाम्बवान को यह बात स्वीकार नहीं हुई। वे क्रुद्ध हो गए। दोनों में घमासान युद्ध शुरू हो गया। वह युद्ध साधारण नहीं था। जाम्बवान त्रेता युग के योद्धा थे। उनके प्रहार से पर्वत काँप उठते थे। कृष्ण भी सामान्य रूप में नहीं लड़ रहे थे। दोनों का युद्ध सत्ताईस दिनों तक निरंतर चला। दिन-रात एक जैसे बीत रहे थे। गुफा के बाहर द्वारका के लोग चिंतित थे कि कृष्ण अभी तक वापस क्यों नहीं लौटे।

     

    जाम्बवती इन सब दिनों में भयभीत होकर एक कोने में बैठी अपने पिता और उस अज्ञात योद्धा को देखती रहीं। उनके मन में एक अजीब भाव उठ रहा था। वह श्याम वर्ण का पुरुष जितना बलशाली था, उतना ही सुंदर और दिव्य भी लग रहा था। उनकी दृष्टि बार-बार कृष्ण पर चली जाती थी।

     

    अट्ठाईसवें दिन जाम्बवान थक चुके थे। उनके सारे अस्त्र-शस्त्र व्यर्थ हो चुके थे। कृष्ण ने अंत में उन्हें भूमि पर पटक दिया। जाम्बवान हार मानकर भूमि पर गिर पड़े। उसी क्षण उनकी आँखें खुल गईं। उन्होंने कृष्ण के मुख पर वह तेज देखा जो उन्होंने कभी अयोध्या में राम के मुख पर देखा था।

     

    जाम्बवान का कंठ अवरुद्ध हो गया। वे काँपते हुए बोले, “आप… आप तो मेरे राम हैं! हे रघुनंदन, हे जानकीनाथ! आपने मुझे फिर से दर्शन दिए। मैं अंधा हो गया था। मैं आपको पहचान नहीं पाया।”

     

    वे रोते हुए कृष्ण के चरणों में गिर पड़े। कृष्ण ने उन्हें उठाया और गले लगाया। बोले, “जाम्बवान, तुम मेरे पुराने सेवक हो। तुम्हारा बल और भक्ति दोनों अद्वितीय हैं। अब उठो।”

     

    जाम्बवान ने मणि कृष्ण के चरणों में रख दी और कहा, “नाथ, यह मणि आपकी ही है। इसे वापस ले जाइए। पर मैं केवल मणि देकर संतुष्ट नहीं हो सकता। मेरी सबसे अमूल्य वस्तु आपको अर्पण करता हूँ।”

     

    उन्होंने जाम्बवती को बुलाया। जाम्बवती उस समय घूँघट निकालकर खड़ी थीं। उनके नेत्रों में अश्रु और भक्ति दोनों थे। जाम्बवान ने कहा, “नाथ, यह मेरी पुत्री जाम्बवती है। मैं इसे आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। आप इसे स्वीकार कीजिए। यह आपकी दासी बनेगी।”

     

    कृष्ण ने जाम्बवती की ओर देखा। जाम्बवती ने सिर झुकाते हुए कहा, “स्वामी, मैं आपके चरणों की धूल माँगती हूँ। यदि आप स्वीकार करें तो मैं जीवन भर आपकी सेवा करूँगी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराते हुए जाम्बवान से कहा, “जाम्बवान, तुम्हारी भक्ति ने आज मुझे बाँध लिया। मैं तुम्हारी पुत्री को स्वीकार करता हूँ।”

     

    उसी गुफा में, उसी दिव्य वातावरण में श्रीकृष्ण ने जाम्बवती का पाणिग्रहण किया। कोई राजसी ठाठ-बाट नहीं था, कोई स्वयंवर नहीं था, कोई रथ की भागदौड़ नहीं थी। केवल भक्ति थी, समर्पण था और एक पिता का असीम प्रेम था जिसने अपनी पुत्री को स्वयं भगवान को सौंप दिया।

     

    जब कृष्ण जाम्बवती और श्यामंतक मणि के साथ द्वारका लौटे तो सारा नगर आश्चर्यचकित रह गया। लोगों ने देखा कि कृष्ण के साथ एक नई रानी आई हैं जिनका रूप अलग है, पर जिनके नेत्रों में गहरी शांति और भक्ति है। सत्राजित को मणि वापस मिली और कृष्ण का सारा कलंक धुल गया।

     

    जाम्बवती द्वारका की रानी बन गईं। वे अन्य रानियों की तुलना में कम बोलती थीं। उनका स्वभाव शांत, गंभीर और अत्यंत भक्तवत् था। वे कृष्ण की सेवा में हमेशा तत्पर रहतीं। जब कृष्ण युद्ध पर जाते तो जाम्बवती घंटों मंदिर में बैठकर प्रार्थना करतीं। वे जानती थीं कि उनके पति साधारण नहीं, स्वयं वे हैं जिनके चरणों में उनके पिता ने युगों तक सेवा की थी।

     

    समय आने पर जाम्बवती ने कृष्ण को एक पुत्र दिया जिसका नाम साम्ब रखा गया। साम्ब बड़ा होकर अत्यंत बलशाली और रूपवान हुआ। जाम्बवती की मातृत्व और पत्नीत्व दोनों ही भूमिकाएँ भक्ति से ओतप्रोत रहीं।

     

    कभी-कभी रात के समय जब कृष्ण उनके कक्ष में आते तो जाम्बवती पूछ बैठतीं, “स्वामी, क्या आप सच में वे ही राम हैं जिनकी कथा मेरे पिता सुनाया करते थे?”

     

    कृष्ण मुस्कुराते हुए कहते, “जाम्बवती, नाम और रूप बदलते रहते हैं। पर जो भक्त का है, वह सदा उसी का रहता है। तुम्हारे पिता ने मुझे राम रूप में देखा, तुम मुझे कृष्ण रूप में देख रही हो। अंत में दोनों एक ही हैं।”

     

    जाम्बवती इन शब्दों को सुनकर कृतार्थ हो जातीं। वे समझ गई थीं कि उनका विवाह किसी राजसी समझौते या रूप के आकर्षण से नहीं हुआ था। उनका विवाह भक्ति की नींव पर हुआ था। उनके पिता ने उन्हें दान में नहीं दिया था, बल्कि स्वयं भगवान को अर्पण किया था।

     

    द्वारका के इतिहास में जाम्बवती का नाम इसलिए अमर हो गया क्योंकि वे उस सेतु थीं जो त्रेता और द्वापर को जोड़ता था। वे उस भक्ति की प्रतीक थीं जो बल और अहंकार के बाद भी बची रहती है। जब जाम्बवान हार गए तब उनकी भक्ति जीती, और उसी भक्ति ने उनकी पुत्री को भगवान की पत्नी बना दिया।

     

    आज भी जब कोई भक्त जाम्बवती का नाम लेता है तो याद आता है कि भगवान को पाने के लिए न रूप चाहिए, न वैभव, न राजसी ठाठ। केवल सच्ची पहचान और पूर्ण समर्पण काफी है। जाम्बवान ने पहचाना और दे दिया। जाम्बवती

    ने स्वीकार किया और अपना लिया। यही उनकी कथा का सार है।

     

  • एपिसोड 7: तुलाधार – जब तीनों लोकों का भार तौला गया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    नारद जी ने सत्यभामा की आँखों में देखा और शांत स्वर में बोले, “सत्यभामा, तुमने कहा था कि तुम इतना दान दोगी कि मैं उसे समेट भी नहीं पाऊँगा। तो सुनो मेरी माँग। जितने वजन के श्रीकृष्ण हैं, उतने वजन का दान मुझे दे दो। चाहे वह सोना हो, चाँदी हो, हीरा हो, मोती हो या अनाज हो – जो तुम्हारी इच्छा हो। बस उनका वजन पूरा उतरना चाहिए।”

     

    यह सुनते ही सत्यभामा के मुख पर पहले की उदासी गायब हो गई। उनके नेत्रों में एक नई चमक आ गई। वे सोचने लगीं – केवल वजन भर का दान? इतना तो कुछ भी नहीं। मेरे पिता के श्यामंतक मणि से प्रतिदिन सोने की वर्षा होती थी। द्वारका का खजाना तो अथाह है। स्वामी का वजन भला कितना होगा? वे तो सामान्य मनुष्य जैसे दिखते हैं। इतना सोना तो मैं तुरंत दे दूँगी।

     

    वे प्रसन्न होकर बोलीं, “नारद जी, आप को बस इतना ही चाहिए? केवल उनके वजन भर का दान? ठीक है। मैं दूँगी। अभी दूँगी। आप निश्चिंत रहिए।”

     

    नारद जी ने फिर एक बार चेतावनी दी, “सत्यभामा, सोच लो। एक बार तुला पर बैठ गए तो फिर पीछे नहीं हटा जा सकता।”

     

    सत्यभामा ने गर्व भरे स्वर में कहा, “मैं सोच चुकी हूँ मुनिवर। आप आज्ञा दीजिए। तराजू लगवाया जाए।”

     

    तुरंत द्वारका के महल में हलचल मच गई। सत्यभामा के आदेश से एक विशाल तुलाधार तैयार किया गया। दो बड़े-बड़े पलड़े थे। एक पलड़े पर श्रीकृष्ण को विराजमान किया जाना था और दूसरे पर दान की सामग्री रखी जानी थी। सारे खजांची, सैनिक और दासीगण दौड़ने लगे। सोने के ढेर लगाए जाने लगे, चाँदी की थालियाँ लाई जाने लगीं, हीरे-मोती के पिटारे खोले जाने लगे।

     

    रुक्मिणी दूर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनके मुख पर चिंता थी। वे जानती थीं कि श्रीकृष्ण को तौलना साधारण बात नहीं। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे मौन खड़ी लीला का अंग बनकर देखती रहीं।

     

    जब सब तैयार हो गया तो नारद जी ने कहा, “अब श्रीकृष्ण को एक पलड़े पर बिठाओ।”

     

    श्रीकृष्ण शांत भाव से उस पलड़े पर जा बैठे। उनके मुख पर वही मधुर मुस्कान थी। मानो वे बच्चों का कोई खेल देख रहे हों। उन्होंने अपने दोनों चरण तुला पर रखे और सहज भाव से बैठ गए। दूसरे पलड़े पर सत्यभामा ने स्वयं पहले सोने की ईंटें रखनी शुरू कीं। एक… दो… दस… पचास… सौ। पलड़ा हिला तक नहीं।

     

    सत्यभामा की दासी ने और सोना लाकर रखा। फिर भी तुला में कोई हलचल नहीं हुई। सत्यभामा का माथा अब भी आश्वस्त था। उन्होंने कहा, “और लाओ। खजाने से और सोना निकालो।”

     

    ढेर के ढेर सोना आने लगा। चाँदी की बड़ी-बड़ी टिकियाँ रखी गईं। हीरों के पिटारे खाली किए गए। मोतियों की मालाएँ डाल दी गईं। पर तुला का पलड़ा एक इंच भी ऊपर नहीं उठा। श्रीकृष्ण जैसे बैठे थे वैसे ही बैठे रहे। उनके वजन का तिल भर भी प्रभाव नहीं दिखा।

     

    अब सत्यभामा के माथे पर पसीना आ गया। वे स्वयं नीचे उतरकर खजांचियों को आज्ञा देने लगीं, “और लाओ! महल का सारा सोना लाओ। रानियों के आभूषण लाओ। कुछ भी मत छोड़ो।”

     

    रानियों के गहने उतारे जाने लगे। सत्यभामा ने अपने स्वयं के गले का हार उतारकर तुला पर रख दिया। फिर भी कुछ नहीं हुआ। वे अब घबरा रही थीं। उन्होंने नारद जी की ओर देखा। नारद जी शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे।

     

    सत्यभामा ने आवाज उठाई, “खजांची! राज्य का सारा खजाना यहाँ लाओ। एक भी मुद्रा पीछे मत छोड़ना।”

     

    अब तो द्वारका का अथाह खजाना तुला के दूसरे पलड़े पर डाला जाने लगा। सोने के कलश, रत्नों के संदूक, चाँदी के सिंहासन तक लाकर रख दिए गए। पूरा आँगन सोने-चाँदी से पट गया। पर तुला का पलड़ा जहाँ था वहीं रहा। श्रीकृष्ण का पलड़ा जरा भी नहीं हिला।

     

    सत्यभामा के पैर अब काँप रहे थे। उनके नेत्रों में अविश्वास और भय दोनों एक साथ थे। वे बार-बार तुला को देखतीं और फिर श्रीकृष्ण के मुख की ओर। कृष्ण शांत बैठे हुए थे। उनके नेत्र आधे बंद थे मानो वे ध्यान में हों। उनके मुख पर न गर्व था, न लज्जा। केवल एक अद्भुत शांति थी।

     

    अंत में सत्यभामा ने हार मानते हुए नारद जी से कहा, “मुनिवर… यह क्या हो रहा है? इतना वैभव डाल दिया… पूरा राज्य का खजाना डाल दिया… फिर भी तुला नहीं हिली। मेरे स्वामी का वजन ही नहीं उतर रहा।”

     

    नारद जी ने धीरे से कहा, “सत्यभामा, अब समझ में आया? जिन्हें तुमने साधारण पति समझकर दान कर दिया था, क्या वे साधारण हैं? तीनों लोक जिनके एक रोम में समा जाते हैं, क्या उन्हें सोने-चाँदी से तौला जा सकता है?”

     

    सत्यभामा की आँखों से आँसू बह निकले। वे तुला के पास जाकर बैठ गईं और रोते हुए बोलीं, “अब समझ में आया नारद जी… अब समझ में आया। इन्हें कोई नहीं तौल सकता। ये त्रिलोकीनाथ हैं। ये अनंत हैं। इनका आदि नहीं, अंत नहीं। मैं कितना सोना डालती, कैसे इनका वजन पूरा कर सकती थी?”

     

    वे श्रीकृष्ण की ओर देखने लगीं। उनके नेत्रों में पश्चाताप की नदी बह रही थी। वे बोलीं, “स्वामी… मैंने आपको कितना छोटा समझा था। मैंने सोचा था कि आप मेरे पति हैं, मेरे अधिकार की वस्तु हैं। मैंने सोचा था कि आपका वजन भी साधारण मनुष्यों जैसा होगा। पर आप तो… आप तो उस पार हैं जहाँ न सोना पहुँचता है, न चाँदी, न कोई भी वैभव।”

     

    रुक्मिणी पास आकर सत्यभामा के कंधे पर हाथ रखकर खड़ी हो गईं। उनके नेत्रों में करुणा थी। वे कुछ नहीं बोलीं। केवल मौन भाव से सत्यभामा का दुख बाँट रही थीं।

     

    सत्यभामा अब जोर-जोर से रो रही थीं। वे बार-बार कह रही थीं, “नारद जी, अब क्या होगा? मैं इनका वजन कैसे पूरा करूँ? मेरे पास और कुछ नहीं बचा। राज्य का सारा खजाना डाल दिया। फिर भी तुला एक इंच नहीं उठी। अब मैं क्या करूँ?”

     

    नारद जी ने शांत स्वर में कहा, “सत्यभामा, अब तुम्हें सत्य दिखाई दे गया है। जिन्हें तुमने दान में दे दिया था, वे केवल तुम्हारे पति नहीं। वे पूरे ब्रह्मांड के आधार हैं। उनकी एक उंगली पर गोवर्धन टिक गया था। उनके एक रोम में अनंत ब्रह्मांड हैं। उन्हें तौलने का विचार ही मूढ़ता था।”

     

    सत्यभामा ने श्रीकृष्ण के चरणों की ओर देखा। वे अभी भी तुला पर विराजमान थे। उनके चरण कमल जैसे शांत थे। सत्यभामा ने उन चरणों की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, “स्वामी… क्षमा कीजिए। मेरे अभिमान ने मुझे अंधा बना दिया था। मैंने आपको नापने की कोशिश की। पर आप नापे नहीं जा सकते। आप तो अनंत हैं।”

     

    पूरे आँगन में सन्नाटा छा गया था। सोने-चाँदी के ढेर इधर-उधर बिखरे पड़े थे। तुला का एक पलड़ा श्रीकृष्ण के भार से अटल खड़ा था और दूसरा पलड़ा वैभव से लदा होने के बावजूद हल्का था। यह दृश्य स्वयं में एक महान शिक्षा बन चुका था।

     

    सत्यभामा अब पूरी तरह टूट चुकी थीं। उनका गर्व धूल में मिल चुका था। वे समझ चुकी थीं कि श्रीकृष्ण को न तो दान में दिया जा सकता है और न ही किसी भी वस्तु से तौला जा सकता है। वे त्रिलोकी के स्वामी हैं। उनका वास्तविक भार केवल प्रेम और भक्ति से ही उतर सकता है – पर वह बात अभी उनके मन में पूरी तरह नहीं आई थी। अभी तो केवल यही समझ आई थी कि वे असमर्थ हैं।

     

    नारद जी ने अंतिम बार सत्यभामा की ओर देखा और बोले, “अब तुम जान गई हो कि जिन्हें तुमने हल्के में लिया था, वे कितने भारी हैं।”

     

     

    सत्यभामा ने केवल सिर झुकाया। उनके मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। आँसू ही उनकी भाषा बन चुके थे।