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  • अधूरा इश्क

    अधूरा इश्क

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

    अधूरा इश्क

    रागिनी को हमेशा से अंधेरे कमरों से अजीब-सी खींच महसूस होती थी।
    उसके नए किराए के घर में एक कमरा था जिसका दरवाज़ा ताला लगा था। मालिक ने कहा था “कभी मत खोलना।”

    एक रात बिजली चली और वही कमरे से हल्की दस्तक आई। रागिनी डरते हुए बोली “क…कौन?”

    अंदर से एक धीमी, टूटी आवाज़ आई “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”

    अगली बार बिजली जाने पर आवाज़ फिर आई।
    इस बार कमरे का ताला अपने आप गिरा।
    और अंदर था… सिर्फ़ अंधेरा।

    पर उसी अंधेरे में एक परछाई उभर रही थी एक लड़का… बेहद खूबसूरत, पर धुंध जैसा।

    उसने कहा “मेरा नाम आरव है… मैं इंसान नहीं हूँ, पर तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा।”

    रागिनी चाहकर भी उस कमरे से दूर नहीं रह पाती।
    आरव उसे हर रात मिलता कभी बातों में, कभी बस खामोशी में।

    रागिनी ने महसूस किया कि वह आरव की तरफ़ खिंच रही है… डर और प्यार के बीच फँसकर।

    आरव हमेशा कहता “मेरी दुनिया में मत आना रागिनी… वो अंधेरा तुम्हें वापस नहीं लौटने देगा।”

    एक दिन रागिनी ने पूछ ही लिया “तुम कौन हो? क्या हो?”

    आरव की आँखों में अजीब-सा दर्द चमका“एक गलती ने मुझे इस दुनिया के बीच कहीं अटका दिया है… ना मैं ज़िंदा हूँ, ना मरा हुआ।”

    रागिनी उससे और गहराई से जुड़ने लगी, वह डर खत्म हो चुका था। बस एक अजीब-सी मोहब्बत जन्म ले चुकी थी।

    अब रागिनी हर दिन सूरज ढलने का इंतज़ार करती।
    रात होते ही आरव उसके पास आ जाता उसे कहानियाँ सुनाता, कभी हवा बनकर उसके बालों को छूता, कभी उसके आँसू पोंछता।

    दोनों जानते थे ये रिश्ता नामुमकिन है। पर इश्क़ कभी इजाज़त थोड़े ही पूछता है।

    एक रात कमरे में सिर्फ आरव नहीं आया… उसके पीछे कुछ और भी था।

    काली, गुर्राती परछाइयाँ जो रागिनी पर झपट पड़ीं।

    आरव चिल्लाया “भागो! ये मेरी दुनिया के भूखे साए हैं—तुम्हें ले जाएँगे!”

    आरव ने उन्हें रोक लिया… पर उसके शरीर का आधा हिस्सा अंधेरे में गायब हो गया।

    रागिनी रो पड़ी “मैं तुम्हें खो दूँगी क्या?”

    आरव बोला “मैं पहले ही खो चुका हूँ…”

    आरव कमज़ोर पड़ने लगा। वह कहने लगा “रागिनी… जब तक मैं हूँ, तुम सुरक्षित हो। पर मेरा समय ख़त्म हो रहा है। इस कमरे को छोड़कर किसी और शहर चली जाओ।”

    पर रागिनी ने साफ़ कह दिया “इश्क़ भागता नहीं, लड़ता है।”

    उस रात हवा में अजीब सरसराहट थी। कमरा खुद-ब-खुद खुल गया। अंधेरा गाढ़ा और डरावना।

    आरव ने रागिनी का हाथ पकड़ लिया पहली और आखिरी बार… उसका स्पर्श ठंडा, पर गहरा था।

    “मेरे साथ मत आना…”

    पर रागिनी ने कहा “मैं अकेली रह ही नहीं सकती तुम्हारे बिना।”

    अंधेरा दोनों के चारों तरफ घूमने लगा।

    अगली सुबह घर का दरवाज़ा खुला मिला। कमरा बिल्कुल शांत। आरव की परछाई गायब थी। रागिनी भी गायब थी।

    बस दीवार पर उभरी एक धुँधली लाइन “अंधेरों में किया इश्क़… दोनों को उजाला कभी नहीं मिला।”

    कई साल बाद, उसी घर में नए किरायेदार आते हैं।
    पहली ही रात, बिजली जाती है… और बंद कमरे से आवाज़ आती है “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”

    इस बार कमरे में दो परछाइयाँ दिखाई देती हैं एक धुँधला लड़का… और उसके कंधे पर सिर रखे एक लड़की।

    दोनों की आँखों में एक ही बात उनकी कहानी कभी पूरी नहीं हुई… और शायद कभी होगी भी नहीं।

    “अंधेरों का इश्क़… अधूरा ही सही, पर अमर रहा।”

     

  • झूठी दीवार

    झूठी दीवार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    सूर्य अस्त हो रहा था, और उसकी अंतिम नारंगी किरणें, एक समय जीवंत रहे, पर अब मौन पड़े घर के आंगन में फैली हुई थीं। उस आंगन में, जहाँ कभी हँसी और खिलखिलाहट गूंजती थी, आज सिर्फ सन्नाटा था। यह घर था आदित्य का, और उस सन्नाटे का कारण था, उसका भाई—अर्जुन।

     

    आदित्य और अर्जुन दो भाई थे, जो एक ही पेड़ की दो मजबूत डालियों की तरह थे। दोनों में गहरा प्रेम था, उनका बचपन साझा सपनों और शरारतों से भरा था। उनके पिता ने उन्हें सिखाया था कि खून का रिश्ता दुनिया में सबसे पवित्र होता है।

     

    लेकिन समय के साथ, जीवन की दौड़ शुरू हुई। आदित्य बड़े थे, उन्होंने जल्द ही अपने पिता का व्यापार संभाल लिया और उसमें सफल हुए। अर्जुन ने पढ़ाई पूरी करके एक बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की। दोनों की राहें अलग थीं, पर मंजिल एक थी,बअपने परिवार की खुशी।

    समस्या तब शुरू हुई, जब उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े। पिता ने वसीयत बनाने का फैसला किया। उन्होंने व्यापार का एक बड़ा हिस्सा आदित्य को दिया, क्योंकि वह पहले से ही उसे संभाल रहे थे, और अर्जुन को पैतृक जमीन का एक मूल्यवान टुकड़ा और पर्याप्त धन दिया।

     

    अर्जुन को लगा कि उसके साथ अन्याय हुआ है। उसके दिल में यह बात बैठ गई कि पिता ने आदित्य को उससे अधिक प्यार किया, अधिक मूल्यवान समझा। उसने सोचा कि आदित्य ने पिता को प्रभावित किया होगा। उस रात, क्रोध और निराशा से भरे अर्जुन ने आदित्य से झगड़ा किया। उसने कठोर, अपमानजनक शब्द कहे, जिनकी उम्मीद आदित्य ने कभी नहीं की थी।

     

    “तुम हमेशा से पिता के पसंदीदा रहे हो, है ना? तुमने उन्हें फुसला लिया! यह न्याय नहीं है, यह छल है!” अर्जुन ने चिल्लाकर कहा था।

     

    आदित्य, जो अपने छोटे भाई से इतना प्रेम करता था, उन शब्दों से टूट गया। उसने बचाव करने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन ने सुनने से इंकार कर दिया। उसके दिल में एक ‘झूठी दीवार’ खड़ी हो गई थी, एक गलतफहमी, अहंकार और कड़वाहट की दीवार।

     

    उस झगड़े के बाद, अर्जुन ने वह घर छोड़ दिया। वह अपनी वसीयत का हिस्सा लेकर शहर के दूसरे छोर पर चला गया। उसके जाने से पहले, आदित्य ने उसे रोकने की कोशिश की थी, “अर्जुन, यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है। यह हमारा घर है, हमारा रिश्ता है! वापस आ जाओ।”

    “रिश्ता? अब कोई रिश्ता नहीं,” अर्जुन का जवाब एक नुकीले तीर की तरह था।

     

    उन दोनों भाइयों के बीच वर्षों का मौन पसर गया।

    पिता कुछ समय बाद गुजर गए। उनकी अंतिम इच्छा थी कि दोनों भाई मिल जाएं, पर ऐसा न हो सका। पिता के निधन ने आदित्य को अंदर तक झकझोर दिया, लेकिन अर्जुन अपने दुःख में भी अपनी ‘झूठी दीवार’ के पीछे छिपा रहा।

     

    आदित्य ने अपनी पत्नी, नेहा, और बच्चों के साथ जीवन व्यतीत करना जारी रखा, पर उसके चेहरे पर हमेशा एक उदासी छाई रहती थी। वह सफल था, लेकिन उसके घर का एक कोना हमेशा खाली रहता था। वह हर साल अर्जुन के जन्मदिन पर एक पत्र लिखता, पर कभी भेजता नहीं। बस उन पत्रों में अपनी भावनाओं और अपने दर्द को उतार देता।

     

    कई साल बीत गए। अर्जुन ने अपने हिस्से की जमीन पर एक छोटा सा घर बना लिया था, और वह अपने काम में व्यस्त हो गया था। बाहर से वह खुश दिखता था, पर रात की खामोशी में, उसे हमेशा आदित्य के चेहरे की निराशा याद आती थी। उसे पता था कि उसने गलती की थी। वसीयत वास्तव में न्यायपूर्ण थी, और उसके कठोर शब्द अनुचित थे। लेकिन अब अहंकार, उस ‘झूठी दीवार’ ने उसे जकड़ रखा था।

     

    फिर एक दिन, एक भयानक तूफान आया। अर्जुन का नया बना घर उस तूफान में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। वह बाल-बाल बचा, पर उसका सब कुछ बिखर गया था। वह अकेला, बेघर और टूटा हुआ महसूस कर रहा था।

    अगली सुबह, जब अर्जुन टूटी हुई छत के नीचे बैठा था, उसने एक कार को रुकते देखा। कार से एक जाना-पहचाना चेहरा उतरा, आदित्य।

     

    आदित्य ने बिना एक भी शब्द कहे अर्जुन की ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं, और चेहरे पर वर्षों पुराना दर्द झलक रहा था। वह सीधा अर्जुन के पास आया और उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    अर्जुन की ‘झूठी दीवार’ उस एक आलिंगन के स्पर्श से रेत के महल की तरह ढह गई। वर्षों से दबा हुआ पश्चाताप आंसुओं के रूप में बह निकला।

    “माफ़ कर दो भाई! मुझे माफ़ कर दो! मैंने बहुत बड़ी गलती की! मैंने तुम्हारे प्यार का अपमान किया! पिता का अपमान किया! मैं अंधा हो गया था!” अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    आदित्य ने उसे संभाला। उसकी आवाज़ में वर्षों का स्नेह भरा था। “अर्जुन, यह माफ़ी की बात नहीं है। यह मेरे भाई के वापस आने की बात है। मुझे पता था कि तुम एक दिन समझोगे। मैंने तुम्हें कभी दोष नहीं दिया।”

    आदित्य ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। उसने बताया कि कैसे उसने पैतृक घर को हमेशा उसी तरह बनाए रखा, यह सोचकर कि अर्जुन किसी भी पल वापस आ सकता है।

     

    जब अर्जुन वापस अपने पुराने घर के आंगन में पहुंचा, तो उसने देखा कि सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसने छोड़ा था। नेहा ने दौड़कर उसे गले लगाया, और बच्चे, जिन्हें उसने कभी देखा भी नहीं था, उत्सुकता से उसे देख रहे थे।

     

    सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब आदित्य उसे उसके पुराने कमरे में ले गया। कमरे की दीवार पर अब भी वह निशान था, जहाँ दोनों भाइयों ने बचपन में एक क्रिकेट मैच के बाद एक-दूसरे को ‘सर्वश्रेष्ठ दोस्त’ लिखा था।

    मेज पर एक पुरानी लकड़ी की पेटी रखी थी। आदित्य ने पेटी खोली। उसमें पिछले कई वर्षों के अन-भेजे गए पत्र थे।

     

    “यह क्या है?” अर्जुन ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।

    “ये वो ख़त हैं, जो मैंने हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर लिखे। माफ़ी मांगने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए कि यहाँ सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं,” आदित्य ने कहा।

     

    अर्जुन ने एक पत्र निकाला। तारीख 14 अगस्त, 2018।

    उसमें लिखा था: “अर्जुन, आज तुम्हारा जन्मदिन है। माँ ने तुम्हारी पसंद की खीर बनाई है। मैं तुम्हें मिस कर रहा हूँ। वह ज़मीन का टुकड़ा जो तुम्हें मिला था, वह सबसे उपजाऊ है। पिता ने हमेशा कहा था कि तुम एक अच्छे किसान बनोगे। लौट आओ, भाई। घर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”

     

    अर्जुन के दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसने अपने भाई के निःस्वार्थ प्रेम को ठुकराया था, जबकि आदित्य ने हर पल उसके लिए प्रार्थना की थी। माफ़ी सिर्फ शब्द नहीं थे; वे आदित्य के इन अन-भेजे गए पत्रों में, उसके वर्षों के इंतज़ार में, और उसके निस्वार्थ आलिंगन में समाए हुए थे।

     

    माफ़ी की वह घड़ी, तूफान से अधिक शक्तिशाली थी। वह ‘झूठी दीवार’ हमेशा के लिए गिर गई।

    अर्जुन ने उस रात खाना नहीं खाया। वह बस आदित्य के पास बैठा रहा, उस रिश्ते की गर्माहट महसूस कर रहा था जिसे उसने वर्षों पहले खो दिया था। उसने कसम खाई कि वह अपने जीवन के हर क्षण से उस गलती का प्रायश्चित करेगा। उसने सीखा कि सबसे बड़ी संपत्ति ज़मीन या पैसा नहीं, बल्कि अपने ही दिल में मौजूद निस्वार्थ प्रेम और माफ़ी देने की शक्ति है।

     

    और उस रात, उस आंगन में, जहाँ वर्षों से सन्नाटा था, फिर से एक भाई के वापस आने की खुशी और माफ़ी मिल जाने का सुकून, दोनों की शांतिपूर्ण साँसों में गूंज उठा।

     

    Lakshmi Kumari 

  • गुरुर

    गुरुर

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    गुरूर है मुझे खुद पर…

    मैं सबसे अलग हूँ।

    मैं सबके जैसी नहीं,

    और यही मेरी पहचान है।

    कोई चाहे या ना चाहे,

    मैं अकेले भी खुश हूँ।

    जैसी भी हूँ,

    अपने माँ-पापा की बेटी हूँ।

    मैं सबसे अलग हूँ,

    पर उनके लिए सबसे प्यारी हूँ।

    गुरूर है मुझे खुद पर…

    क्योंकि मैं जैसी हूँ, वैसी ही खुश हूँ।

  • कर्मों का फल

    कर्मों का फल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    गाँव का नाम था हरियाली, जहाँ लोग मेहनती और सच्चे थे। गाँव के बीचों-बीच एक विशाल बड़ का पेड़ था, जिसके नीचे सब लोग इकट्ठा होते थे। इस पेड़ के पास ही एक गरीब ब्राह्मण, नाम था उसका रामू, अपने छोटे से झोपड़े में रहता था। रामू का जीवन साधारण था, लेकिन उसके दिल में अच्छाई का वास था।

    रामू रोज़ सुबह उठकर अपने छोटे से बाग में काम करता, हल्का-फुल्का खेती करता और जो भी थोड़ा-बहुत कमा पाता, उसी से अपने परिवार कापालन करता। उसकी पत्नी, सीता, हमेशा उसकी मदद करती, और दोनों मिलकर अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की कोशिश करते थे। रामू का मानना था कि अपने कर्मों का फल जरूर मिलता है।

    एक दिन, गाँव में एक साधु महात्मा आए। गाँव के लोग उनके पास आए और उनसे आशीर्वाद मांगा। रामू भी साधु के पास पहुँचा। साधु ने रामू को देखा और कहा, “तुमhari मेहनत और ईमानदारी के फल तुम्हें जल्दी मिलेंगे।”

    कुछ दिनों बाद, रामू ने सोच लिया कि वह गाँव में थोड़ा और मेहनत कर के और पैसे इकट्ठा करेगा। उसने खेतों में ज्यादा मेहनत की, और उस साल फसल भी अच्छी हुई। रामू ने अपने मेहनत के फल को देखा और अपनी स्थिति में सुधार करने लगा।

    परंतु, गाँव के कुछ लोग उसकी सफलता से जलने लगे। उनमें से एक था उसका पड़ोसी, सुरेश। सुरेश का दिल जलन से भरा हुआ था और उसने सोच लिया कि वह रामू को नुकसान पहुँचाएगा। एक रात, सुरेश ने रामू के खेतों में आग लगा दी। अगली सुबह रामू ने देखा कि उसकी पूरी फसल जलकर राख हो गई है। रामू का दिल टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने साधु के वचनों को याद किया और कहा, “मेरे कर्मों का फल मुझे अवश्य मिलेगा, मुझे धैर्य रखना होगा।”

    रामू ने अपनी मेहनत से फिर से खेतों को तैयार किया और नई फसल बुवाई की। इस बार उसने सोचा कि उसे और भी सावधानी बरतनी होगी। उसने अपने परिवार को भी खेती में मदद करने के लिए प्रेरित किया और सबने मिलकर मेहनत की। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और रामू की फसल फिर से अच्छी हुई।

    इस बीच, सुरेश की स्थिति खराब होती गई। उसकी जमीन उगाही की कमी के कारण सूखने लगी, और उसका धंधा भी ठप्प हो गया। सुरेश ने रामू की सफलता को देखकर सोचा कि इसे पलटा जाना चाहिए। उसने रामू के खिलाफ गांव के लोगों में अफवाहें फैलाने की कोशिश की कि रामू ने जो भी काम किया है, उसमें कुछ छिपा हुआ है।

    लेकिन गाँव के लोग रामू की सच्चाई को जानते थे। उन्होंने सुरेश की बातों को खास नहीं माना। धीरे-धीरे, रामू की मेहनत और ईमानदारी की ख़ुशबू पूरे गाँव में फैल गई। लोग उसका सम्मान करने लगे। रामू ने अपने फसल को बेचकर पर्याप्त धन दौलत कमाई और अपनी स्थिति को मजबूत किया।

    सुरेश को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने रामू के पास जाकर माफी मांगी। रामू ने उसे माफ कर दिया और कहा, “हम सबके कर्मों का फल ही हमें दिखाई देता है, मैं बस अपने कर्मों पर ध्यान देता हूँ। तुम्हें भी यही करना चाहिए।”

    इस घटना ने गाँव के लोगों को यह सिखाया कि कर्मफल का सिद्धांत सचमुच काम करता है। रामू की मेहनत और सच्चाई ने उसे सफलता दिलाई, जबकि सुरेश की जलन और गलतियों ने उसे गिराया।

    गाँव में रामू की सच्चाई और मेहनत की चर्चा हर ओर होने लगी। लोग उसकी ईमानदारी और दयालुता को देखकर प्रेरित होते थे। बच्चे रामू के पास बैठकर उसकी दास्तानें सुनते और बड़े होकर उसकी तरह अच्छे कर्म करने का सपना देखते।

    रामू ने अपनी सफलताओं का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना शुरू कर दिया। उसने गाँव के गरीब किसानों को खेतों की तकनीक सिखाई, ताकि वे भी अच्छे से फसल उगा सकें। वह माहौल बनाकर उन्हें अपने धंधे में मदद कर रहा था।  धीरे-धीरे हरियाली गाँव एक खुशहाल और संपन्न गाँव में बदलने लगा।

    उसी बीच, सुरेश ने रामू से प्रेरित होकर अपने कर्मों पर पुनर्विचार करना शुरू किया। उसने अपनी गलतियों को स्वीकारा और गाँव के लोगों से माफी मांगने का निर्णय लिया। सुरेश ने रामू से मदद मांगी और कहा, “मैंने तुम्हारे प्रति गलत मानसिकता रखी। कृपया मुझे सिखाओ कि कैसे मैं भी अपनी स्थिति को सुधार सकता हूँ।”

    रामू ने सुरेश को सहारा दिया और उसे अपने साथ खेतों में ले गया। रामू ने सुरेश को मेहनत का महत्व समझाया और कहा, “सच्चा धन मेहनत, ईमानदारी और सद्भावना में है। यदि तुम अच्छे कर्म करोगे, तो तुम्हारा कर्मफल भी अच्छा होगा।”

    सुरेश ने रामू के साथ मिलकर मेहनत करने का निश्चय किया। दोनों ने मिलकर खेतों की बुनियाद को मजबूती दी। सुरेश ने अपनी संपत्ति को सही दिशा में लगाना सीखा और रामू की मदद से धीरे-धीरे उसकी स्थिति भी सुधारने लगी। अब दोनों किसान एक-दूसरे के मददगार बन गए थे।

    समय बीतता गया, और गाँव की स्थिति निरंतर सुधरती गई। अब हरियाली गाँव में खुशहाली, समर्पण, और एकता का माहौल था। गाँव के लोग एक-दूसरे का सहयोग करते और सच्चे रिश्ते बनाते। रामू और सुरेश की दोस्ती ने उदाहरण पेश किया कि किस तरह कर्मफल से जुड़े अच्छे कार्यों की बदौलत दोस्ती और भाईचारा स्थापित होते हैं।

    इस बीच, गाँव ने एक बड़ा उत्सव मनाने का निर्णय लिया। गाँव के लोगों ने फसल के अच्छे उत्पादन के लिए रामू और सुरेश को सम्मानित करने का कार्यक्रम रखा। सभी लोग इकट्ठा हुए। इस अवसर पर गाँव के सरपंच ने कहा, “आज हम सब यहाँ इस बात की गवाही देने के लिए इकट्ठा हुए हैं कि ईमानदारी और मेहनत का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। रामू और सुरेश ने हमें यह सिखाया है कि आत्मसमर्पण और सहयोग से हम सभी कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं।”

    रामू को सम्मानित किया गया, लेकिन उसने सुरेश को भी अपने साथ खड़ा किया। उसने कहा, “सच्ची पहचान और सफलता अकेले नहीं आते। ये हमारे सभी कर्मों का फल होते हैं। सुरेश ने भी अब बदलाव किया है और हमें उसके साथ खड़ा होना चाहिए।”

    सभी गाँव वाले तालियाँ बजाने लगे। सुरेश ने रामू की ओर देखते हुए कहा, “तुमने मुझे सिखाया कि खुद को बदलना कितना महत्वपूर्ण है। मुझे अपने कर्मों का फल समझ में आ गया है। अब मैं मेहनत और ईमानदारी से जीवन बिताने का वचन देता हूँ।”

    गाँव में उत्सव धूमधाम से मनाया गया। लोग एक-दूसरे के साथ नृत्य कर रहे थे, गीत गा रहे थे और खुशियों का आदान-प्रदान कर रहे थे। सब मिलकर यह महसूस कर रहे थे कि सच्चे कर्म हमेशा अच्छे फल लाते हैं।

    इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारे कर्म ही हमें पहचान देते हैं। अच्छाई का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन यदि हम सही रास्ते पर रहें,

    Lakshmi Kumari ,,,,,
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  • सोचने वाली बात है न…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    न्यायालय में दोनों पक्षों को 

    सच पता होता है

    असल में तो जज कटघरे में होता है।

     

    (बात बहुत गहरी है… 🥹)

  • सांझ की रोशनी में सौन्दर्य

    सांझ की रोशनी में सौन्दर्य

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    सुनो! तुम श्रृंगार ना किया करो,

    अपनी आंखों को यूं ना मुझे देख कर नीचे किया करो ,

    मैं पागल हूं तुम्हारी झील सी आंखों का

    मुझे और ना तुम्हारे लिए पागल किया करो ,

    कजरारी आंखें तुम्हारी देख कर दिल में बेताबी सी छाती है,

    सांझ की रोशनी में चमक तुम्हारे चेहरे की बढ़ जाती है,

    मैं कायल हूं तुम्हारी झील सी आंखों का,

    क्या इरादा रखती हो तुम मुझे डूब कर पार जाने का,

    ये काली घटाओं सी जुल्फ तुम्हारी,

    हार बनने को बेताब है गले का हमारी ,

    यूं जो माथे पर छोटी सी बिंदी जो

    तुम लगाती हो सच कहता हूं कि ,

    तुम जान मेरी लेकर जाती हो , 

    हल्की सी लाली लिए चेहरा तुम्हारा दमकता है,

    निकला ना करो तुम अकेले कहीं दिल मेरा डरता है ,

    ये जो हंसती हो औरों से मिलकर  ,

    नहीं जानती तुम कितना दिल मेरा जलता है ,

    मैं बंदिशों में तुम्हें नहीं बांध रहा हूं ,

    तुम इसे बंदिशें मत समझना ,

    ये दुनिया तुम्हारे लायक नहीं है,

    इसलिए मैं थोड़ा  सा ही सही तुम्हें

    लेकर सम्भल रहा हूं …!!

  • कोई कुछ नहीं बोलेगा

    कोई कुछ नहीं बोलेगा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शीला प्रिंसिपल मैम के सवाल का जवाब देना चाहती थी। पर वो बोलकर नहीं। ये देखते हुए की कोई कुछ नहीं बोल रहा है ।तो प्रिंसिपल मैम दुबारा फिर से,एक सवाल और दुहराईं….

    ” कहीं तुम लोगों ने मिलकर कमल को, पिट पिट कर बेहोश तो नहीं कर दी हो? सच्चाई क्या है? साफ साफ हमें बताओ तुम सब.”

    प्रिंसिपल मैम ने अपनी ऊंगली चारों लड़कियों के तरफ करतीं हुई आंखों में आंखे डाल कर,आवाज ऊंची करतीं हुई बोली थी।

    जब राधा को लगा कि अब मामला बिगड़ने लगी है। तो उसने अपने आप को ज्यादा देर रोक नहीं पाई और बोल पड़ी…

    ”  ऐसा कुछ भी नहीं है मैम , जो कुछ भी आप सब के सामने है ना मैम।सच्चाई इससे कहीं बहुत अलग है । “

    राधा प्रिंसिपल मैम को देखते हुए बोली थी। और फिर एक बार सभी के नज़र राधा पर आ कर टिक गई थी।

    शीला अपने मन में कुछ सोच रही थी। वो वहां से निकल कर धीरे-धीरे बाहर के तरफ चल दी थी। वो अपने पैर में लगी चोट के कारण ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। वो चलते हुए लंगड़ा कर चल रही थी। शीला पर कुछ लोगों को छोड़कर बाकी किसी की भी नजर नहीं थी। सभी लोगों का ध्यान कमल और उसके आसपास खड़ी लड़कीयों के उपर ही था। किसी ने भी शीला के उपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। वो लंगड़ाते हुए मीटिंग हॉल से बाहर निकल गई थी। चांदनी प्रिंसिपल मैम के पास जाती है। और उनके आंखों में आंखें डाल कर धीरे से बोलतीं है ।

    ”  कमल बहुत ही घटिया लड़का है। इसके व्यवहार लड़कीयों के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है।”

     चांदनी बात आगे बढ़ाते हुए बोली।

    ” इस ने राधा और रूपा के साथ बहुत हीं घटिया सलूक किया है।”

    जब रूपा देखी की चांदनी बात खोल दी है। तो वो भी बीच में कुद पड़ी, एक जोरदार लात कमल के कमर के पास मारी। लात लगने से कमल का शरीर हिल कर रह जाता है। यह देखकर कि रूपा ने कमल को लात मारी है। तो कुछ लोग आगे आते हैं,और रूपा को पकड़ कर साइड में कर देते हैं। रूपा का शरीर गुस्से से उबल रही थी। वो सभी को खा जाने वाली नज़रों से देख रही थी। उसके माथे पसीने से भीग गई थी। जब चांदनी प्रिंसिपल मैम से ये बात बोलीं थी। तो प्रिंसिपल मैम भी यह बात सुनकर दंग रह गईं थीं।

    और वो चांदनी के तरफ आश्चर्य से देखती हुई बोली।

    ” क्या हुआ है राधा और रूपा के साथ?बेटा तुम मुझे पुरी बात सच सच बताओ। कोई भी व्यक्ति हमारे कालेज के रूल रेगुलेशन को तोड़े,ये सब मैं बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं।”

    प्रिंसिपल मैम कड़क अंदाज में चांदनी के तरफ देखते हुए बोली थी।

    चांदनी बोली।

    ” मैं सच कह रही हूं मैम,कमल ने राधा और रूपा पर बहुत अत्याचार किया है।उन दोनों को रस्सियों से बांध कर पिटा है। बहुत बदसलूकी की है। उसके साथ  रेप करने की कोशिश किया है।” बोलते बोलते चांदनी के आंखों से आंसू बहने लगती है।

    प्रिंसिपल मैम अपने चेयर से उठ कर चांदनी के बहते आंसुओं को पोंछती है। और चांदनी को अपने गले से लगा लेती है। और बोलतीं हैं।

    ” अगर तुम्हारी बातों में सच्चाई है। तो मैं इसे छोड़ूंगी नहीं, इसे  सजा दिलवा कर रहूंगी।”

    और मुड़ कर प्रोफेसर दयानंद को आदेश देते हुए बोलती हैं।

    ” प्रोफेसर दयानंद जी। आप डाक्टर को फोन लगाइए, वो आकर कमल का चेक अप करे मामला बेहद संवेदनशील है।”

     प्रोफेसर दयानंद हड़बड़ाकर जल्दी से उठते हुए बोलता है।

    ” जी मैडम जी,अभी काल करके बात कर रहा हूं। 

    प्रिंसिपल मैम बोली।

    ” हां थोड़ा जल्दी किजिए, बच्चों के जिंदगी का सवाल है।”

    प्रोफेसर दयानंद अपने जेब में से अपना मोबाइल निकाल कर एक नम्बर डायल करता है। रिंगटोन बजने के बाद काल रिसीव होता है। प्रोफेसर दयानंद फोन पर बात करते हुए बोलता है।

    ” हैलो,हां जी डाक्टर शर्मा जी। आप कृपया करके जल्दी से कालेज में आ जाइए। यहां पर एक बच्चे की हालत गंभीर है।”

    फोन पर दूसरी तरफ से आवाज आती है।

    हैलो, प्रोफेसर दयानंद जी। हाउ आर यू क्या हुआ है? अच्छा ठीक है। मैं अभी निकलता हूं कालेज के लिए ,बस मैं जल्दी पहुंच हीं रहा हूं। आप मेरा इंतजार किजिए।”

    बोलकर डाक्टर शर्मा ने फोन कट कर दिया था।

    वहां मौजूद कुछ स्टूडेंट्स जो कमल के दोस्त थे। वो बिल्कुल भी मानने के लिए तैयार नहीं था कि कमल कभी भी यह घटिया हरकत कर सकता है। उसे लग रहा था कि, जरूर यह सब लड़कियां मिलकर कमल के साथ कोई साजिश कर रही है। उसको झूठ मूठ के जाल में फंसा रही है। एक लड़का जिसका नाम गोविंद था। वो जोर से बोल पड़ता है।

    ” नहीं यह सब झूठ है। मैं नहीं मानता इस तरह के बातों को, कमल कभी भी ऐसा घटिया हरकत कर हीं नहीं सकता है। मैं कमल को अच्छी तरह जानता हूं।”

    यह देखकर एक लड़का और उसके सपोर्ट में खड़ा हुआ और बोला।

    ” ये इन लड़कियों की साज़िश है। ये कमल को फसाना चाहतीं हैं। क्यों की कमल पैसे वाला है।”

     वह लड़का पूरी ताकत से चिल्लाकर बोल रहा था। इसका नाम विशाल है।

    ” विशाल ये तुम कैसी बातें कर रहे हो। कमल एक नंबर का कुत्ता कमीना घटिया इंसान है। वो राधा दीदी को बालात्कार करने वाला था। मेरी आंखों के सामने,सही टाइम पर आकर शीला दीदी और चांदनी दीदी ने उस राक्षस से राधा दीदी को बचा लिया। नहीं तो ये रेपिस्ट ना जाने क्या क्या करता हम दोनों के साथ।”

    रुपा विशाल को नफ़रत भरी नजरों से देखते हुए जोर से बोली थी।

    ” झूठ, तुम झूठ बोल रही हो। बहाना बना रही हो। तुम सब ने मिलकर कमल को मार मारकर बेहोश कर दी हो। अब सजा से बचने केलिए बहाने बना रही हो ।”

     विशाल रूपा के तरफ देखते हुए,वह भी ज़ोर से चीखते हुए बोल रहा था।

    ” सट अप, शांत हो जाओ तुम सब। कोई कुछ नहीं बोलेगा।”

    प्रिंसिपल मैम सभी को डांटते हुए जोर से बोली थी। सुनकर सभी लोग चुप हो गए थे। प्रिंसिपल मैम के आवाज बिना माइक के हीं पुरे मीटिंग हाल में गुंज रही थी। 

    इधर शीला मीटिंग हॉल में से बाहर निकल कर कॉलेज के दो नंबर गेट वाले रास्ते में लंगड़ाती हुई चली जा रही थी। बाहर तेज धूप निकली हुई थी। हल्की हल्की ठंडी हवा बह रही थी। जिससे शीला थोड़ा राहत महसूस कर रही थी। रास्ते के साइडों में हरे भरे पेड़ पौधे लगाए गए थे। जिससे रास्ते में कहीं कहीं छाया भी हो रही थी। शीला चलती हुई कॉलेज के दो नंबर गेट से बाहर निकल कर मार्केट वाले रास्ते में चलने लगती है। चलते चलते एक शॉप से पानी की बोतल खरीद कर आगे बढ़ गई थी। थोड़ी देर आगे चलने के बाद शीला को एक मेडिकल स्टोर दिखाई पड़ती है। शीला उसमें चली जाती है। शीला मेडिकल स्टोर के अंदर आ गई थी। अंदर आकर वो काउंटर पर बैठे आदमी के तरफ देखते हुए बोलती है।

    ” नमस्ते अंकल “

    सुनकर शीला के जवाब में वो आदमी भी बोलते हैं।

    ” नमस्ते बेटा , बोलिए बेटा क्या चाहिए आपको?”

    शीला के तरफ देखते हुए दुकान दार मुस्कुराते हुए बोला था।

    शीला अपनी पानी की बोतल काउंटर पर रख देती है।

    ” अंकल जी, मेरे फ्रेंड को न चोट लग गई है। और वो बेहोश है।ऐसी कोई मेडिसिन है। जिससे वो जल्दी से होश में आ जाए और वह ठीक हो जाए।”

    शीला दुकानदार को उनके तरफ देखते हुए बोली थी।

    ” हां ठीक है, मैं आपको एक दवाई दे रहा हूं। जिसको पिलाने से वो होश में भी आ जायेगा। और उसके बॉडी के अंदर बूस्टर का भी काम करेगा।..”

    शीला को इतना बोलकर वो दुकानदार अंकल अपने जगह से उठ कर दूसरे साइड दवाई लेने चला जाता है। शीला वहीं खड़ी होती है।

    तभी अजय दुकान में दाखिल होता है। और वो भी काउंटर पर आकर खड़ा होता है।उसका ध्यान अभी शीला पर नहीं गया था। वो डोर ओपन करके अंदर आ गया था। लेकिन उसका नजर शीला के लिए दवाई लेने जा रहे दुकानदार अंकल पर हीं था।

    आगे की कहानी पढ़िए कहानी के अगले भाग में……….. प्यार एक एहसास, नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड पर……..

  • छल ….!!

    छल ….!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तुम दूर हो मुझसे तो

    दूर ही रहो ना क्यों बेफिजूल की

    नजदीकियां बढा़ते हो ,क्या मिला है

    किसी को भी इश्क करके

    जो तुम मेरे पीछे पीछे आते हो,

    मै वाकिफ हूं तुमसे बेहतर ही

    फिर क्यों मुझे बहलाते हो,

    देखा है तुम्हें मैंने गैरों के संग

    भी फिर क्यों मुझे सब्जबाग

    दिखाते हो,

    माना इश्क ❤️ किया है मैंने तुमसे ,

    क्या इसलिए तुम मेरा फायदा उठाते हो,

    दूर दूर ही रहो ना तुम अब मुझसे,

    क्यों अपने झूठे इश्क का

    यकीन दिलाते हो,

    छल कपट से इश्क कभी

    मुकम्मल नहीं होता ,

    क्या हुआ जो अब मैं तन्हा हो जाऊंगी,

    बेशक दिल किलसता रहेगा

    तुम्हारे इन्तजार में ,

    फिर भी मैं भूल नहीं पाऊंगी

    तुम्हारे कपट भरे इजहार को ,

    सच्चाई सिर्फ मुझमें थी ,

    काश ! तुम भी सच्चे दिल से

    इकरार करते, मैं छोड़ देती ये

    जहां जो तुम मेरे साथ होते….!!

  • मेरा चांद…!!

    मेरा चांद…!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    रोशन है ऐ चांद तुमसे धरती का कोना- कोना,

    एक चांद मेरे पास भी है जिससे

    रोशन है मेरी जिंदगी का अंधियारा,

    ऐ चांद तुम पर बंदिशें है बादलों,

    बारिशों और आसमान में छाए धुंध की,

    मेरा चांद है मेरे पास मेरे हर लम्हें ,

    मेरे हर वजूद की परछाई में ,

    मैं तुम्हें देखूं जो बादलों से

    आ़खंमिचौली करता है,

    या उसे जो मेरे साथ मेरे हाथों

    में डालें हाथ एकटक तुम्हें निहारता है, 

    वो प्रमाण है मेरी जिंदगी की

    हर उधेड़बुन का,

    तुम्हीं बताओ अब उसे कैसे

    ना देखूं मैं तुमसे पहले ,

    तुम पर हक कविता शायरी

    करने का हक सबको मिला है  ,

    मेरा चांद मेरे दिल का चैन 

    उसने अपने सारे हक़ मेरे नाम किये,

    वो सिर्फ मेरा है  ,

    मेरे इस दिल ,जज़्बात ,ज़िन्दगी ,पर

    हक़ सिर्फ उसका है …!!

  • तकदीर का खेल

    तकदीर का खेल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट
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    तकदीर का खेल

    भूमिका

    तकदीर, किस्मत, भाग्य – ये शब्द इंसान की ज़िंदगी में उतने ही मायने रखते हैं, जितने मेहनत और हौसले। कोई अपनी मेहनत से तकदीर बदलने की कोशिश करता है, तो कोई इसे अपनी नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है। लेकिन क्या तकदीर सच में पहले से लिखी होती है, या इंसान अपने कर्मों से इसे बदल सकता है? यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो तकदीर के खेल में उलझा, संघर्ष किया, और अंत में अपनी मेहनत से अपनी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी।

    गंगा किनारे बसा एक छोटा सा गाँव “शिवपुर”। गाँव के बाहर कच्चे रास्ते पर एक झोपड़ी में रहता था अर्जुन। उम्र लगभग 25 साल, चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक, मगर किस्मत ने जैसे उसके हिस्से में संघर्ष ही लिख दिया था। माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे, और एक छोटी बहन राधा उसकी जिम्मेदारी थी।

    अर्जुन बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था, मगर गरीबी ने उसे ज्यादा आगे नहीं बढ़ने दिया। मजबूरी में उसे मजदूरी करनी पड़ी, ताकि बहन की देखभाल कर सके। गाँव के बड़े लोग कहते थे, “अरे अर्जुन, तकदीर में जो लिखा है, वही होगा। मेहनत कर भी लेगा तो क्या होगा?” लेकिन अर्जुन इस सोच को मानने को तैयार नहीं था

    दूसरा अध्याय: संघर्ष की राह

    अर्जुन का सपना था कि वह बहन को अच्छी शिक्षा दिलाए और खुद भी अपनी जिंदगी सुधार सके। लेकिन तकदीर बार-बार उसकी परीक्षा लेती रही।

    एक दिन गाँव के जमींदार रतनलाल ने अर्जुन को बुलाया।

    “अर्जुन, मेरी जमीन पर मजदूरी करेगा? अच्छा पैसा दूँगा।”

    अर्जुन के पास कोई और चारा नहीं था, उसने हामी भर दी। दिनभर खेतों में मेहनत करता और रात को थका-हारा घर लौटता। मगर मन में एक ही सवाल घूमता – क्या यह जिंदगी भर चलने वाला है?

    एक दिन उसकी मुलाकात रमेश से हुई, जो शहर में नौकरी करता था।

    “अर्जुन, तू बहुत मेहनती है, शहर चल, वहाँ अच्छा काम मिलेगा,” रमेश ने सुझाव दिया।

    अर्जुन के मन में उम्मीद की किरण जागी। उसने फैसला किया कि वह भी शहर जाएगा और अपनी तकदीर को आजमाएगा।

    अर्जुन अपनी बहन को पड़ोसी के पास छोड़कर शहर चला गया। वहाँ नौकरी की तलाश शुरू की, मगर हर जगह सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। बिना किसी जान-पहचान के उसे कोई काम नहीं मिल।

    एक दिन, जब अर्जुन भूखा-प्यासा सड़क किनारे बैठा था, तब एक व्यापारी महेश गुप्ता ने उसे देखा।

    “क्या हुआ बेटा? परेशान क्यों है?” महेश जी ने पूछा।

    अर्जुन ने अपनी पूरी कहानी सुना दी। महेश जी ने उसे अपनी दुकान पर काम दे दिया। धीरे-धीरे अर्जुन मेहनत करने लगा और अपनी ईमानदारी से महेश जी का विश्वास जीत लिया।

    अर्जुन अब दुकान में अच्छा काम करने लगा था। वह सिर्फ सेल्समैन नहीं, बल्कि व्यापार के हर पहलू को समझने लगा था। महेश जी ने उसकी लगन को देखकर उसे और बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी।

    कुछ सालों बाद, अर्जुन महेश जी का सबसे भरोसेमंद व्यक्ति बन गया। लेकिन तभी तकदीर ने एक और खेल खेला – महेश जी का अचानक देहांत हो गया। उनकी फैमिली को बिजनेस में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए उन्होंने दुकान बेचने का फैसला किया।

    अर्जुन के सामने बड़ा सवाल था – क्या वह अपनी अब तक की मेहनत को यूँ ही छोड़ दे? या कुछ बड़ा करने की सोचे?

    पाँचवाँ अध्याय: तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ?

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और अपनी सारी बचत और थोड़े पैसे उधार लेकर वही दुकान खरीद ली। अब वह खुद का मालिक बन चुका था। उसकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा।

    कुछ सालों में उसने अपने व्यापार को इतना बढ़ाया कि वह अब सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि कई दुकानों का मालिक बन चुका था। वह गाँव लौटा और अपनी बहन को अच्छे कॉलेज में पढ़ने भेजा।

    गाँव के लोग जो कभी उसे तकदीर का मारा समझते थे, अब कहते थे, “देखो, अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद लिखी!”

    निष्कर्ष: तकदीर बनती है मेहनत से

    अर्जुन की कहानी बताती है कि तकदीर का खेल असल में मेहनत का ही खेल है। अगर वह भी दूसरों की तरह तकदीर को दोष देकर बैठ जाता, तो उसकी जिंदगी वहीं खेतों में मजदूरी करते बीत जाती। लेकिन उसने अपने हौसले से, अपनी मेहनत से अपनी तकदीर खुद लिखी।

    तो, तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ? जवाब साफ है – तकदीर का खेल असल में मेहनत और संघर्ष की परीक्षा ही है!

    अर्जुन ने अपनी मेहनत से अपना व्यापार खड़ा कर लिया था, लेकिन ज़िंदगी में सफलता के साथ चुनौतियाँ भी आती हैं। जब उसका बिज़नेस अच्छा चलने लगा, तो कई लोगों की नज़रें उस पर टेढ़ी हो गईं।

    गाँव के जमींदार रतनलाल, जो कभी उसे मजदूरी के लिए बुलाते थे, अब उसकी बढ़ती सफलता से जलने लगे। उन्होंने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं कि अर्जुन ने गलत तरीकों से पैसा कमाया है।

    एक दिन गाँव की पंचायत में यह मामला उठा। रतनलाल ने कहा,

    “अर्जुन, तू गाँव का एक गरीब लड़का था, अचानक इतना अमीर कैसे बन गया? जरूर कोई बेईमानी की होगी!”

    अर्जुन चुपचाप सबकी बातें सुनता रहा। फिर उसने जवाब दिया,

    “मैंने दिन-रात मेहनत की, संघर्ष किया, शहर में धक्के खाए, तब जाकर इस मुकाम तक पहुँचा हूँ। अगर कोई यह साबित कर दे कि मैंने गलत तरीके से कुछ कमाया है, तो मैं खुद सारा व्यापार छोड़ दूँगा!”

    गाँव के बुजुर्ग जानते थे कि अर्जुन ईमानदार है। उन्होंने पंचायत में ही उसका समर्थन किया और कहा,

    “तकदीर उसी की बदलती है जो मेहनत करना जानता है। अर्जुन ने अपने कर्मों से अपना भाग्य लिखा है।”

    रतनलाल चुप हो गए, लेकिन अर्जुन समझ गया कि सफलता के साथ आलोचना भी मिलती है।

    इधर अर्जुन की बहन राधा ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली और उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। अर्जुन ने सोचा कि अब उसकी बहन की शादी करवा दी जाए। उसने राधा से पूछा,

    “क्या तुम किसी को पसंद करती हो, या फिर मैं तुम्हारे लिए अच्छा रिश्ता देखूं?”

    राधा थोड़ी संकोच में थी, फिर उसने कहा,

    “भइया, मेरा एक दोस्त है, जो बहुत अच्छा इंसान है। अगर आप मिलना चाहें, तो मैं उसे घर बुला सकती हूँ।”

    अर्जुन को खुशी हुई कि उसकी बहन अपने फैसले खुद लेने के लायक बन गई थी। उसने उस लड़के से मुलाकात की और जब देखा कि वह वाकई ईमानदार और मेहनती है, तो उसने शादी के लिए हाँ कर दी।

    शादी के दिन पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। अर्जुन को देखकर लोग कहते,

    “अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद बनाई और अब अपनी बहन की जिंदगी भी संवार दी!”

    राधा की शादी के बाद अर्जुन ने अपने बिज़नेस को और आगे बढ़ाने का फैसला किया। उसने गाँव के कई बेरोजगार युवाओं को अपने काम से जोड़ा और उन्हें नौकरी दी।

    अब वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गाँव की तकदीर बदलने की कोशिश कर रहा था। उसने गाँव में एक स्कूल भी खुलवाया, ताकि किसी और अर्जुन को अपनी पढ़ाई अधूरी न छोड़नी पड़े।

    धीरे-धीरे, गाँव के लोग भी मेहनत की अहमियत समझने लगे। वे भी किस्मत को कोसने के बजाय अपने हाथों से अपना भविष्य गढ़ने में जुट गए।

    एक दिन अर्जुन अपनी दुकान के बाहर बैठा था, जब एक बुजुर्ग ने आकर कहा,

    “बेटा, सच ही कहते हैं – तकदीर कोई लिखकर नहीं लाता, उसे मेहनत से गढ़ना पड़ता है। तूने यह साबित कर दिया!”

    अर्जुन मुस्कुराया और बोला,

    “हाँ काका, तकदीर का खेल असल में हमारे हाथ में ही होता है। अगर हम मेहनत करें, तो हम अपनी ज़िंदगी खुद बना सकते हैं।

    उस दिन अर्जुन को अहसास हुआ कि उसने सिर्फ अपनी तकदीर नहीं बदली, बल्कि अपने गाँव की सोच भी बदल दी थी। अब कोई भी तकदीर को कोसकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता था – सब मेहनत की ताकत को समझ चुके थे।

    और इस तरह, तकदीर का खेल अर्जुन की मेहनत के आगे हार गया।