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  • राखी का वो आखिरी धागा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राखी का वो आखिरी धागा

    सावन की हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। शहर की एक छोटी-सी गली में बने पुराने से घर की खिड़की के पास नैना चुपचाप बैठी थी। उसके हाथ में एक सुंदर-सी राखी थी, जिसे उसने पूरे दो दिन लगाकर खुद बनाया था।

     

    राखी में लाल और पीले रंग के धागे थे और बीच में एक छोटा-सा चाँदी का मोती लगा था।

     

    नैना बार-बार दरवाजे की तरफ देखती और फिर अपनी राखी को देखने लगती।

     

    उसकी माँ रसोई से बोलीं,

    “नैना, बेटा… कब तक दरवाजे को देखती रहेगी? शायद इस बार भी तेरा भाई नहीं आ पाएगा।”

     

    नैना ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “नहीं माँ, भैया जरूर आएंगे।”

     

    “हर साल यही कहती है।”

     

    नैना कुछ पल चुप रही।

     

    फिर धीरे से बोली,

    “इस बार उन्होंने खुद कहा है कि राखी पर जरूर आएंगे।”

     

    उसका भाई अमन पिछले चार साल से दूसरे शहर में नौकरी कर रहा था। पहले वह हर रक्षाबंधन पर घर जरूर आता था। लेकिन पिछले दो सालों से काम का बहाना बनाकर नहीं आ पाया था।

     

    नैना को उससे शिकायत थी।

     

    बहुत ज्यादा।

     

    लेकिन उससे भी ज्यादा उसे अपने भाई की याद आती थी।

     

    बचपन में दोनों की खूब लड़ाई होती थी।

     

    कभी नैना अमन की किताब छिपा देती, तो कभी अमन उसकी गुड़िया के बाल काट देता।

     

    माँ दोनों को डांटतीं और कुछ देर बाद दोनों फिर साथ बैठकर खाना खाने लगते।

     

    एक बार नैना को तेज बुखार हुआ था। रातभर अमन उसके सिरहाने बैठा रहा था।

     

    नैना ने उस समय पूछा था,

    “भैया, आप सोते क्यों नहीं?”

     

    अमन ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था,

    “तू ठीक हो जा, फिर मैं पूरी जिंदगी सो लूंगा।”

     

    नैना हंस पड़ी थी।

     

    आज भी वह बात उसे याद थी।

     

    तभी बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई।

     

    नैना तुरंत उठकर दरवाजे की तरफ भागी।

     

    “भैया!”

     

    लेकिन दरवाजे पर दूध वाला खड़ा था।

     

    नैना का चेहरा उतर गया।

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा और कुछ नहीं कहा।

     

    रात हो गई।

     

    अमन का फोन भी बंद आ रहा था।

     

    नैना ने राखी अपने पास रख ली।

     

    उस रात वह ठीक से सो नहीं पाई।

     

    अगली सुबह रक्षाबंधन था।

     

    घर में बाकी सब तैयारियां चल रही थीं, लेकिन नैना के मन में बस एक ही सवाल था—

     

    “क्या भैया सच में आएंगे?”

     

    दोपहर तक अमन का कोई फोन नहीं आया।

     

    नैना ने खुद फोन लगाया।

     

    इस बार फोन बजा।

     

    उसने जल्दी से फोन कान पर लगाया।

     

    “हैलो भैया?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर एक आदमी की आवाज आई।

     

    “क्या आप अमन की बहन बोल रही हैं?”

     

    नैना का दिल धक से रह गया।

     

    “जी… लेकिन आप कौन?”

     

    आवाज आई—

     

    “मैं अस्पताल से बोल रहा हूँ।”

     

    नैना के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    “अमन को क्या हुआ?”

     

    “आप घबराइए मत… उनका छोटा-सा एक्सीडेंट हुआ है।”

     

    “वो ठीक हैं ना?”

     

    “अभी डॉक्टर उनका इलाज कर रहे हैं।”

     

    नैना की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने तुरंत माँ को बताया।

     

    कुछ ही देर में दोनों अस्पताल के लिए निकल गए।

     

    अस्पताल पहुंचकर नैना भागते हुए रिसेप्शन पर पहुंची।

     

    “अमन… अमन शर्मा… उनका एक्सीडेंट हुआ है।”

     

    नर्स ने कुछ जानकारी लेने के बाद कहा,

    “ऑपरेशन चल रहा है। आप बाहर इंतजार कीजिए।”

     

    नैना वहीं फर्श के पास लगी कुर्सी पर बैठ गई।

     

    उसके हाथ में अब भी वही राखी थी।

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    “बेटा, भगवान सब ठीक करेंगे।”

     

    नैना ने राखी को कसकर पकड़ लिया।

     

    “माँ… मैंने भैया से बहुत नाराजगी रखी है।”

     

    “तो क्या हुआ?”

     

    “मैंने उनसे कितनी बार कहा था कि मुझे फोन किया करो… लेकिन मैं खुद भी कई बार उनसे ठीक से बात नहीं करती थी।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “रिश्तों में छोटी-छोटी नाराजगी होती रहती है।”

     

    कई घंटे बीत गए।

     

    आखिरकार डॉक्टर बाहर आए।

     

    “अमन की हालत अब खतरे से बाहर है। लेकिन उन्हें कुछ समय आराम की जरूरत होगी।”

     

    नैना ने राहत की सांस ली।

     

    कुछ देर बाद उसे अमन से मिलने दिया गया।

     

    अमन आंखें बंद किए लेटा था।

     

    नैना उसके पास जाकर बैठ गई।

     

    उसने धीरे से उसका हाथ पकड़ा।

     

    “भैया…”

     

    अमन ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।

     

    उसे देखते ही हल्की मुस्कान आई।

     

    “तू… रो रही है?”

     

    नैना ने गुस्से में कहा,

    “आपको क्या लगता है? मैं नाचूंगी?”

     

    अमन हल्का-सा हंसने लगा।

     

    “मुझे पता था… तू मुझे डांटेगी।”

     

    “आपने आने का वादा किया था।”

     

    “मैं आया तो हूं।”

     

    “लेकिन अस्पताल में!”

     

    दोनों कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर अमन ने कमजोर आवाज में पूछा,

    “राखी लाई है?”

     

    नैना ने अपनी मुट्ठी खोली।

     

    वही लाल-पीली राखी देखकर अमन की आंखों में चमक आ गई।

     

    “इतनी सुंदर राखी… मेरे लिए?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    उसने धीरे से अमन की कलाई पर राखी बांधी।

     

    अमन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    नैना बोली—

     

    “इस बार मैं कोई बड़ा गिफ्ट नहीं मांगूंगी।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस एक वादा।”

     

    “बोल।”

     

    “अगले रक्षाबंधन पर मुझे अस्पताल में राखी नहीं बांधनी पड़ेगी।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    उसने नैना का हाथ पकड़कर कहा,

     

    “वादा।”

     

    कुछ दिन बाद अमन घर वापस आ गया।

     

    लेकिन उस हादसे ने दोनों भाई-बहन को बदल दिया था।

     

    अब छोटी-छोटी बातों पर नाराजगी नहीं होती थी।

     

    अमन हर शाम अपनी बहन को फोन करता।

     

    नैना भी उसकी आवाज सुनकर मुस्कुरा देती।

     

    एक साल बाद फिर रक्षाबंधन आया।

     

    नैना सुबह से दरवाजे पर बैठी थी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर चिंता नहीं थी।

     

    अचानक दरवाजा खुला।

     

    अमन सामने खड़ा था।

     

    हाथ में मिठाई का डिब्बा था।

     

    “मैडम, राखी बांधने का समय हो गया है।”

     

    नैना की आंखें भर आईं।

     

    वह दौड़कर भाई के गले लग गई।

     

    “आप सच में आ गए।”

     

    अमन ने हंसते हुए कहा,

     

    “इस बार कोई हादसा नहीं। सीधे घर आया हूं।”

     

    नैना ने राखी बांधी।

     

    अमन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    उसमें एक चांदी का छोटा-सा कंगन था।

     

    “तेरे लिए।”

     

    नैना ने कहा,

    “मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    “तो?”

     

    “बस ऐसे ही हर साल आते रहना।”

     

    अमन कुछ नहीं बोला।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    और दोनों की आंखों में एक ही बात थी—

     

    राखी सिर्फ एक धागा नहीं होती।

     

    वह बचपन की याद होती है।

     

    वह हजारों झगड़ों के बाद भी बचा हुआ प्यार होती है।

     

    और कभी-कभी…

     

    वही छोटा-सा धागा किसी रिश्ते को टूटने से बचा लेता है।

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 53 : देवेंद्र का वो राज, जिसने सबको हिला दिया

     

     

    स्क्रीन बंद हो चुकी थी।

     

    लेकिन उस पर दिखाई दिया आखिरी चेहरा अब भी सबकी आंखों के सामने था।

     

    देवेंद्र।

     

    कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि किसी की सांसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे अपनी बंदूक देवेंद्र की तरफ कर दी।

     

    “एक सवाल का जवाब दीजिए।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप गद्दार हैं?”

     

    देवेंद्र की आंखें भर आईं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा—

     

    “तो मेरे नाना ने आपका नाम क्यों लिया?”

     

    देवेंद्र चुप रहा।

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “और आपने कहा कि आपने मेरी मां को बचाने के लिए झूठ बोला था?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “आरव…”

     

    “मां, आप चुप रहिए।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “आज मुझे सब जानना है।”

     

    “पच्चीस साल से हर कोई मुझसे कुछ न कुछ छुपाता रहा है।”

     

    “पहले पापा… फिर आप… फिर देवेंद्र अंकल।”

     

    “अब और नहीं।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “ठीक है।”

     

    “आज सब बता देता हूं।”

     

    उन्होंने नैना की तरफ देखा।

     

    “लेकिन ये सच सुनना आसान नहीं होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें सच चाहिए।”

     

    विहान ने भी कहा—

     

    “चाहे कितना भी दर्दनाक क्यों न हो।”

     

    देवेंद्र ने गहरी सांस ली।

     

    “पच्चीस साल पहले… तुम्हारे नाना को पता चला था कि विक्रम उनके कारोबार के अंदर से ही उन्हें बर्बाद कर रहा है।”

     

    “उन्होंने अभय और समर को इसकी जांच करने को कहा।”

     

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत इकट्ठे किए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन हमें पता चला कि विक्रम को सब कुछ पता चल चुका है।”

     

    “उसने अभय को मारने की कोशिश की।”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “उस रात…”

     

    देवेंद्र की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैं अभय को बचाकर एक सुरक्षित जगह ले गया।”

     

    “लेकिन उसी रात मुझे नैना का फोन आया।”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नैना ने मुझे बताया कि वो गर्भवती है।”

     

    आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    देवेंद्र आगे बोले—

     

    “विक्रम को ये पता चल गया था कि नैना के बच्चे भविष्य में उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”

     

    “उसने नैना और उसके बच्चों को खत्म करने की योजना बना ली।”

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    “मैं अपने बच्चों को खोना नहीं चाहती थी।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “इसलिए हमने एक योजना बनाई।”

     

    “नैना की मौत की झूठी खबर फैलाई गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन आप हमें कैसे बचाते रहे?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम तीनों को अलग-अलग जगह भेज दिया गया।”

     

    “ताकि अगर एक जगह हमला हो, तो बाकी दोनों बच सकें।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “इसलिए हम तीनों अलग हुए थे?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हमारी योजना लगभग सफल थी।”

     

    “लेकिन एक गलती हो गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “विक्रम को पता चल गया कि अभय जिंदा है।”

     

    “उसने अभय का पीछा किया।”

     

    अभय ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “और मैं पकड़ा गया।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको किसने बचाया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “समर ने।”

     

    आरोही अचानक चौंक गई।

     

    “मेरे पापा?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “समर ने अपनी जान देकर मुझे बचाया।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तो पापा की मौत…”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मेरी वजह से हुई।”

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा—

     

    “ऐसा मत कहिए।”

     

    अभय की आवाज टूट गई।

     

    “अगर मैं उस रात वहां नहीं होता… तो शायद समर जिंदा होता।”

     

    आरव ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “आपने जानबूझकर कुछ नहीं किया।”

     

    आरव ने देवेंद्र से पूछा—

     

    “लेकिन फिर नाना ने आपको गद्दार क्यों कहा?”

     

    देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि मैंने उनके साथ एक झूठ बोला था।”

     

    “क्या झूठ?”

     

    “मैंने उन्हें बताया कि नैना मर चुकी है।”

     

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन वो जिंदा थीं।”

     

    “हां।”

     

    “नाना को क्यों नहीं बताया?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि तब तक विक्रम ने नाना के घर में अपने आदमी भेज दिए थे।”

     

    “मुझे शक था कि नाना की पूरी टीम में कोई गद्दार है।”

     

    “अगर मैंने उन्हें सच बताया होता, तो नैना की लोकेशन विक्रम तक पहुंच जाती।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    “तो आपने नाना से झूठ बोला…”

     

    “नैना को बचाने के लिए?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    नैना ने कहा—

     

    “मुझे तुम्हारे बचपन का हर पल याद है।”

     

    “मैं तुमसे दूर थी… लेकिन तुम्हें भूलकर नहीं।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “मां, हमें लगा था आपने हमें छोड़ दिया।”

     

    नैना ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    अमन भी उनके पास आ गया।

     

    आरव कुछ कदम दूर खड़ा रहा।

     

    नैना ने हाथ बढ़ाया।

     

    “गुड्डू…”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह धीरे-धीरे मां के पास गया और उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस एक बात का वादा कीजिए।”

     

    “क्या?”

     

    “अब मुझसे कोई सच मत छुपाइए।”

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “वादा।”

     

    आरोही अब भी चुप थी।

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “बेटी।”

     

    आरोही ने उनकी तरफ देखा।

     

    “जी?”

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी वक्त में मुझे एक बात कही थी।”

     

    आरोही की सांस थम गई।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “उन्होंने कहा था कि अगर कभी उनकी बेटी आरव के पास पहुंचे… तो उसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “उन्होंने मेरे बारे में सोचा था?”

     

    “आखिरी सांस तक।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “चाहे कितनी भी मुश्किल आए?”

     

    “चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो।

     

    अमन ने विषय बदलते हुए कहा—

     

    “अब हमें तहखाने तक पहुंचना होगा।”

     

    विहान ने अपना लॉकेट निकाला।

     

    “कोड मेरे पास है।”

     

    आरव ने अपनी चाबी निकाली।

     

    आरोही ने अपने लॉकेट से छोटी चाबी निकाल ली।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “लेकिन हमें पुराने महल तक पहुंचना होगा।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम भी वहीं जाएगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उसे कैसे पता चलेगा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि उसके पास भी एक चाबी है।”

     

    सब चौंक गए।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम ने पच्चीस साल पहले तुम्हारे नाना से एक चाबी चुराई थी।”

     

    “लेकिन वो अधूरी थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो वो हमारे पीछे क्यों है?”

     

    “क्योंकि उसके बिना उसका हिस्सा बेकार है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम तीनों की चाबियां उसके लिए जरूरी हैं।”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    रात के करीब तीन बजे सभी पुराने महल पहुंचे।

     

    महल बाहर से पूरी तरह वीरान दिखाई दे रहा था।

     

    टूटी हुई दीवारें।

     

    बंद खिड़कियां।

     

    और चारों तरफ घना अंधेरा।

     

    विहान ने कहा—

     

    “क्या सच में यहां तहखाना है?”

     

    देवेंद्र ने सूखे कुएं की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    सभी कुएं के पास पहुंचे।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    अभय ने कहा—

     

    “नीचे उतरना होगा।”

     

    अमन ने रस्सी निकाली।

     

    सब एक-एक करके नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आखिर में आरव और आरोही उतरे।

     

    जैसे ही दोनों नीचे पहुंचे…

     

    उनके सामने एक विशाल लोहे का दरवाजा था।

     

    उस पर तीन निशान बने थे।

     

    एक चाबी का।

     

    एक सिक्के का।

     

    और एक लॉकेट का।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही है।”

     

    आरव ने पहली चाबी लगाई।

     

    क्लिक।

     

    अमन ने अपना सिक्का एक छोटे से स्लॉट में लगाया।

     

    क्लिक।

     

    विहान ने कोड डाला—

     

    1…7…2…5

     

    आखिर में आरोही ने अपनी छोटी चाबी लगाई।

     

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर…

     

    घर्ररर…

     

    लोहे का भारी दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    लेकिन दीवारों पर सैकड़ों फाइलें रखी थीं।

     

    वीडियो रिकॉर्डिंग।

     

    पुराने कागजात।

     

    तस्वीरें।

     

    और एक बड़ा लोहे का बॉक्स।

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये सबूत हैं।”

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “यही वो सब कुछ है, जिसके लिए पच्चीस साल तक लोग मरते रहे।”

     

    आरोही एक फाइल उठाने लगी।

     

    तभी उसके नीचे से एक पुरानी तस्वीर गिर गई।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें चार लोग खड़े थे—

     

    अभय।

     

    समर।

     

    देवेंद्र।

     

    और…

     

    विक्रम।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।

     

    आरव ने पढ़ा—

     

    “हम चारों ने मिलकर ये साम्राज्य बनाया था।”

     

    अमन ने हैरानी से कहा—

     

    “मतलब विक्रम अकेला नहीं था?”

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप भी इसमें थे?”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “फिर आपने हमसे झूठ क्यों बोला?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि शुरुआत में हम चारों दोस्त थे।”

     

    “लेकिन बाद में विक्रम बदल गया।”

     

    “वो ताकत का भूखा हो गया।”

     

    “और मैंने उससे अलग होने की कोशिश की।”

     

    आरव ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।

     

    तभी लोहे के बॉक्स के अंदर से हल्की सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सबकी नजर बॉक्स पर टिक गई।

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “इसमें क्या है?”

     

    आरव ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुराना टेप रिकॉर्डर था।

     

    उस पर एक कागज रखा था।

     

    आरव ने कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिस दिन मेरे बच्चे इस बॉक्स तक पहुंचेंगे, उन्हें आखिरी सच जानना होगा।”

     

    नीचे हस्ताक्षर थे—

     

    अभय।

     

    आरव ने रिकॉर्डर चलाया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।

     

    फिर अभय की आवाज आई—

     

    “आरव… अगर तुम ये सुन रहे हो, तो समझ लो कि विक्रम ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    अभय की आवाज आगे आई—

     

    “हमारे परिवार में ही एक ऐसा इंसान है, जिसने विक्रम से भी बड़ा खेल खेला है।”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने का दरवाजा बाहर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अंधेरे में विक्रम की आवाज गूंजी—

     

    “अब तुम सब वहीं रहोगे… जब तक मुझे वो फाइल नहीं मिल जाती।”

     

    आरव ने अंधेरे में आरोही का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    और उसे पहली बार एहसास हुआ—

     

    असली दुश्मन शायद उनके बिल्कुल बीच में था।

     

    जारी रहेगा…

  • सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    रवि एक मेहनती और खुशमिजाज लड़का था। वह अपने परिवार के साथ रहता था और भविष्य में कुछ बड़ा करने का सपना देखता था।

     

    कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों ने मज़ाक-मज़ाक में उसे सिगरेट पीने के लिए कहा। रवि ने पहले मना किया, लेकिन दोस्तों के दबाव में आकर उसने एक सिगरेट पी ली।

     

    उसे लगा कि यह बस एक बार की बात है। लेकिन धीरे-धीरे वही एक सिगरेट उसकी रोज़ की आदत बन गई।

     

    कुछ महीनों बाद रवि बिना सिगरेट के बेचैन रहने लगा। पढ़ाई और काम में उसका मन कम लगने लगा। घरवालों ने समझाया, लेकिन वह हर बार कहता, “मैं जब चाहूँगा, छोड़ दूँगा।”

     

    समय बीतता गया। उसकी सेहत और पैसे दोनों पर असर पड़ने लगा। सबसे ज्यादा दुख उसके माता-पिता को होता था, जो अपने बेटे को इस आदत से परेशान देखते थे।

     

    एक दिन रवि ने अपने पिता को चुपचाप रोते हुए देखा। पिता ने सिर्फ इतना कहा, “बेटा, हमें तुम्हारे पैसों की नहीं, तुम्हारी जिंदगी की चिंता है।”

     

    ये शब्द रवि के दिल में उतर गए।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह अपनी इस आदत से बाहर निकलने की कोशिश करेगा। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उसने परिवार का साथ लिया और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से मदद भी ली।

     

    कई दिनों की मेहनत के बाद रवि ने सिगरेट से दूरी बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी फिर पटरी पर आने लगी।

     

    रवि ने समझ लिया कि लत कभी छोटी नहीं होती। शुरुआत चाहे मज़ाक में हो, लेकिन उसका असर जिंदगी पर बहुत बड़ा हो सकता है।

     

    सीख: गलत आदत को “बस एक बार” कहकर शुरू करना आसान है, लेकिन उससे बाहर निकलने के लिए हिम्मत, परिवार का साथ और सही मदद जरूरी होती है।

  • सिगरेट की लत

    सिगरेट की लत

    पढ़ने का समय : 2 मिनट
    • रमेश एक मेहनती लड़का था। वह अपने परिवार से बहुत प्यार करता था। दोस्तों के साथ बैठते समय उसने पहली बार सिगरेट पी। दोस्तों ने कहा, “एक बार पीने से कुछ नहीं होता।”

     

    रमेश ने भी यही सोचा। लेकिन धीरे-धीरे एक सिगरेट रोज की आदत बन गई। फिर दो, फिर तीन… अब बिना सिगरेट के उसका मन बेचैन रहने लगा।

     

    उसकी माँ अक्सर कहतीं, “बेटा, ये सिगरेट छोड़ दे। हमें तेरी सेहत की चिंता होती है।”

     

    रमेश हर बार कहता, “माँ, छोड़ दूँगा… बस थोड़ा समय दो।”

     

    एक दिन सीढ़ियाँ चढ़ते समय रमेश जल्दी थक गया। उसे समझ आया कि जिस चीज को वह मज़ाक समझकर शुरू किया था, वही अब उसकी जिंदगी पर असर डाल रही थी।

     

    उस रात उसने अपनी माँ की बात याद की। उसने फैसला किया कि वह इस आदत से छुटकारा पाने की कोशिश करेगा। उसने अपने भरोसेमंद परिवारवालों से मदद ली और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेने का निर्णय किया।

     

    कई दिनों तक मुश्किल हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    कुछ समय बाद उसकी जिंदगी बदलने लगी। उसे महसूस हुआ कि असली आज़ादी वही है, जब इंसान किसी बुरी आदत का गुलाम न रहे।

     

    कहानी की सीख:

    सिगरेट की शुरुआत भले ही छोटी लगे, लेकिन निकोटीन की लत पकड़ सकती है। इसलिए शुरुआत ही न करना सबसे अच्छा है। और अगर किसी को लत लग चुकी हो, तो शर्मिंदा होने के बजाय किसी भरोसेमंद बड़े या स्वास्थ्यकर्मी से मदद लेना बेहतर है।

  • 🧚‍♀️ जादुई परियों की कहानी 🧚‍♀️

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के ठीक बारह बजे, जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, तभी आसमान से एक चमकता हुआ सितारा टूटकर धरती पर आ गिरा। लेकिन वह साधारण सितारा नहीं था। उसके गिरते ही जंगल के बीचों-बीच हजारों सुनहरी रोशनियाँ जगमगा उठीं और हवा में किसी के धीरे-धीरे हँसने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही… क्या कोई हमें ढूँढ़ पाएगा?”

     

    अगली सुबह दस साल की मीरा ने अपने खिड़की के पास एक चमकीला सुनहरा पंख पड़ा देखा। पंख को हाथ में लेते ही वह गर्म हो गया और उसमें से एक बहुत धीमी आवाज़ आई—

     

    “मीरा… हमें तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    मीरा की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    पंख से आवाज़ आई, “हम जादुई परियाँ हैं… और हमारा जादुई राज्य खतरे में है!”

     

    मीरा डरने के बजाय उत्साहित हो गई। उसने पंख को अपनी छोटी-सी लाल थैली में रखा और बिना किसी को बताए जंगल की ओर चल पड़ी।

     

    गाँव के बाहर एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। दादी हमेशा कहती थीं कि उसके आगे वाला जंगल रहस्यमयी है और वहाँ कभी अकेले नहीं जाना चाहिए। लेकिन आज मीरा के मन में डर से ज्यादा उस आवाज़ को जानने की इच्छा थी।

     

    जैसे ही वह बरगद के पेड़ के पास पहुँची, पेड़ के तने पर एक चमकता हुआ दरवाज़ा दिखाई दिया। दरवाज़े पर लिखा था—

     

    “जिसके मन में सच्चाई और दया हो, वही अंदर आ सकता है।”

     

    मीरा ने दरवाज़े को छुआ।

     

    अचानक तेज रोशनी हुई और वह एक अनोखी दुनिया में पहुँच गई।

     

    वहाँ आसमान गुलाबी था, बादल रुई जैसे सफेद थे और पेड़ों पर फूलों की जगह छोटे-छोटे सितारे खिले हुए थे। नदियों का पानी चाँदी की तरह चमक रहा था। रंग-बिरंगी तितलियाँ हवा में उड़ रही थीं और छोटे-छोटे खरगोश अपने कानों से जादुई घंटियाँ बजा रहे थे।

     

    तभी सामने से चार सुंदर परियाँ उड़ती हुई आईं।

     

    सबसे आगे नीले पंखों वाली परी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “स्वागत है, मीरा। मैं नीलपरी हूँ।”

     

    उसके साथ गुलाबी पंखों वाली परी बोली, “मैं फूलपरी हूँ।”

     

    पीले पंखों वाली परी ने कहा, “मेरा नाम सूरजपरी है।”

     

    और सबसे छोटी हरे पंखों वाली परी बोली, “मैं वनपरी हूँ।”

     

    मीरा ने पूछा, “आप लोगों को मेरी मदद क्यों चाहिए?”

     

    नीलपरी का चेहरा अचानक उदास हो गया।

     

    “हमारे जादुई राज्य का ‘सतरंगी रत्न’ चोरी हो गया है। उसके बिना हमारे जंगल के फूल मुरझा रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं और हमारी जादुई रोशनी धीरे-धीरे खत्म हो रही है।”

     

    “रत्न किसने चुराया?” मीरा ने पूछा।

     

    वनपरी ने धीरे से कहा, “काली गुफा में रहने वाला छायादानव।”

     

    मीरा थोड़ी घबराई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।

     

    “अगर मैं आपकी मदद कर सकती हूँ, तो मैं जरूर करूँगी।”

     

    चारों परियाँ खुशी से उसके चारों ओर उड़ने लगीं।

     

    उन्होंने मीरा को एक जादुई नक्शा दिया। नक्शे पर तीन जगह चमक रही थीं—फुसफुसाती नदी, उल्टा पहाड़ और चाँदनी गुफा।

     

    “इन तीन स्थानों को पार करके ही छायादानव की गुफा तक पहुँचा जा सकता है,” नीलपरी ने बताया।

     

    सबसे पहले वे फुसफुसाती नदी के पास पहुँचे। नदी का पानी लगातार बातें कर रहा था।

     

    “जो सच बोलेगा, वही आगे जाएगा… जो झूठ बोलेगा, वह यहीं रह जाएगा…”

     

    नदी ने मीरा से पूछा, “तुम यहाँ क्यों आई हो?”

     

    मीरा ने कहा, “मैं अपने लिए कोई जादू लेने नहीं आई। मैं इन परियों की मदद करने आई हूँ।”

     

    नदी चमक उठी और उसके बीच एक पुल बन गया।

     

    इसके बाद वे उल्टे पहाड़ के पास पहुँचे। वहाँ पेड़ नीचे और जड़ें ऊपर थीं। पहाड़ का रास्ता बहुत कठिन था। मीरा कई बार फिसली, लेकिन सूरजपरी और वनपरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    आखिर वे चाँदनी गुफा तक पहुँच गए।

     

    गुफा के अंदर इतनी अंधेरी थी कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। तभी मीरा ने अपनी थैली से सुनहरा पंख निकाला। पंख चमका और पूरा रास्ता रोशन हो गया।

     

    अचानक एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “कौन है जो मेरी गुफा में आने की हिम्मत कर रहा है?”

     

    सामने एक विशाल काला साया दिखाई दिया।

     

    वह छायादानव था।

     

    उसके हाथ में सतरंगी रत्न चमक रहा था।

     

    परियाँ डरकर पीछे हट गईं, लेकिन मीरा आगे बढ़ी।

     

    “वह रत्न वापस कर दो।”

     

    दानव जोर से हँसा।

     

    “तुम मुझे आदेश दोगी? मैं इस रत्न की शक्ति से पूरे जादुई राज्य को अपना गुलाम बना सकता हूँ!”

     

    मीरा ने ध्यान से उसे देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन कहीं न कहीं बहुत गहरी उदासी भी थी।

     

    मीरा ने पूछा, “तुमने यह रत्न चुराया क्यों?”

     

    दानव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि… मुझे कोई अपना नहीं मानता।”

     

    सभी परियाँ चौंक गईं।

     

    दानव ने कहा, “मैं भी कभी इस जादुई राज्य का रक्षक था। लेकिन एक दिन मेरी जादुई शक्ति खत्म हो गई। सभी परियों ने मुझे कमजोर समझकर दूर कर दिया। तब से मैं इस अंधेरी गुफा में अकेला रहता हूँ।”

     

    मीरा को उस पर दया आ गई।

     

    उसने कहा, “गलती करने पर किसी को हमेशा के लिए अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। अगर तुम रत्न वापस कर दो, तो क्या तुम हमारे साथ वापस चलोगे?”

     

    छायादानव ने पहली बार किसी को अपने लिए इतना प्यार से बोलते सुना था।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसने सतरंगी रत्न मीरा के हाथ में रख दिया।

     

    “क्या… क्या परियाँ मुझे स्वीकार करेंगी?”

     

    नीलपरी आगे आई और मुस्कुराई।

     

    “अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो तुम्हारे लिए हमारे राज्य में हमेशा जगह है।”

     

    छायादानव ने सिर झुका दिया।

     

    “मैं वादा करता हूँ।”

     

    जैसे ही सतरंगी रत्न अपने स्थान पर वापस रखा गया, पूरे जादुई राज्य में अद्भुत परिवर्तन होने लगा।

     

    सूखे फूल फिर से खिल उठे। नदियाँ चाँदी की तरह चमकने लगीं। आसमान में सात रंगों का विशाल इंद्रधनुष बन गया। हजारों छोटी परियाँ आसमान में उड़ने लगीं और चारों ओर घंटियों जैसी मधुर आवाज़ गूँजने लगी।

     

    परियों की रानी भी वहाँ आईं। उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखकर कहा—

     

    “तुमने केवल हमारा राज्य नहीं बचाया, बल्कि एक अकेले हृदय में भी रोशनी जलाई है। यही सच्चा जादू है।”

     

    रानी ने मीरा को एक छोटी-सी चमकती हुई डिबिया दी।

     

    “जब भी किसी जरूरतमंद की सच्चे मन से मदद करोगी, यह डिबिया एक सुनहरी रोशनी से भर जाएगी।”

     

    मीरा ने डिबिया अपने पास रख ली।

     

    अब उसे अपने घर लौटना था।

     

    नीलपरी ने उसे वही सुनहरा पंख दिया और कहा, “जब भी तुम्हें हमारी याद आए, इसे चाँदनी में रखना।”

     

    मीरा मुस्कुराई और अपने गाँव लौट आई।

     

    सुबह जब उसकी आँख खुली तो वह अपने बिस्तर पर थी। उसे लगा शायद यह सब सपना था।

     

    लेकिन उसकी मुट्ठी में सुनहरा पंख अब भी मौजूद था।

     

    मीरा खिड़की के पास गई। दूर जंगल के ऊपर एक छोटा-सा इंद्रधनुष चमक रहा था।

     

    तभी हवा में एक परिचित आवाज़ आई—

     

    “सच्चे दिल से किया गया अच्छा काम कभी जादू से कम नहीं होता।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    उस दिन से उसने हर जरूरतमंद की मदद करना शुरू कर दिया। और हर बार उसकी छोटी-सी जादुई डिबिया थोड़ी और चमकने लगती।

     

    कहते हैं, आज भी उस गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के पास रात में कभी-कभी सुनहरी रोशनी दिखाई देती है।

     

    शायद वे परियाँ आज भी वहाँ रहती हैं।

     

    और शायद वे ऐसे ही किसी बच्चे का इंतज़ार कर रही हैं, जिसके दिल में सच्चाई, दया और दूसरों की मदद करने का साहस हो।

     

    क्योंकि असली जादू परियों के पंखों में नहीं…

     

    हमारे अच्छे दिल में छिपा होता है।

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 52 : नाना जिंदा थे, लेकिन कैद में क्यों?

    स्क्रीन पर दिखाई दे रहे उस चेहरे को देखकर आरव की आंखें जम गईं।

    वो चेहरा…

    जिसे उसने सिर्फ पुरानी तस्वीरों में देखा था।

    जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था कि उसकी मौत कई साल पहले हो चुकी है।

    उसके नाना।

    लेकिन आज वो सामने थे।

    जिंदा।

    और किसी अनजान जगह पर कैद।

    नैना की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

    “पापा…”

    स्क्रीन पर बैठे बूढ़े आदमी ने अपनी बेटी की आवाज सुनकर आंखें बंद कर लीं।

    फिर धीरे से कहा—

    “नैना… मेरी बच्ची।”

    नैना अपने आंसू रोक नहीं पाईं।

    “आपने हमें इतने साल क्यों नहीं बताया कि आप जिंदा हैं?”

    वो कुछ पल चुप रहे।

    फिर बोले—

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता… तो तुम सबको बचाना मुश्किल हो जाता।”

    आरव आगे बढ़ा।

    “नाना… आपको किसने कैद किया है?”

    स्क्रीन के पीछे खड़ा विक्रम मुस्कुराया।

    “अभी इतनी जल्दी क्यों?”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “विक्रम!”

    “उन्हें छोड़ दो।”

    विक्रम ने कहा—

    “तुम मुझे आदेश देने की स्थिति में नहीं हो।”

    “तुम्हारे नाना के पास वो आखिरी राज है, जिसकी तलाश में तुम लोग पिछले पच्चीस साल से भटक रहे हो।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन-सा राज?”

    विक्रम ने मुस्कुराकर कहा—

    “तुम्हारे जन्म का।”


    नाना ने बताई सच्चाई

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “नाना, क्या ये सच कह रहा है?”

    नाना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

    “हां।”

    तीनों भाइयों के चेहरे पर सवाल थे।

    नाना ने कहा—

    “तुम तीनों का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था।”

    “लेकिन तुम्हारे जन्म के कुछ ही समय बाद मुझे पता चला कि हमारे परिवार के खिलाफ एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है।”

    विहान ने पूछा—

    “किसका?”

    “विक्रम का।”

    विक्रम हंसा।

    “अधूरी कहानी मत सुनाओ।”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “आज मैं पूरी कहानी बताऊंगा।”

    विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया।


    पच्चीस साल पुराना राज

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता अभय और समर एक ही काम पर थे।”

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के गैरकानूनी कारोबार के सबूत जुटाए थे।”

    आरव ने पूछा—

    “फिर?”

    “विक्रम को इसका पता चल गया।”

    “उसने पहले समर को निशाना बनाया।”

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

    “मेरे पापा…”

    नाना ने कहा—

    “समर ने अपनी बेटी को बचाने के लिए सबूत तुम्हारे पास रखे।”

    “लेकिन विक्रम ने उसे ढूंढ लिया।”

    आरोही ने पूछा—

    “तो पापा ने मेरे लॉकेट में चाबी क्यों छुपाई?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि वो जानता था कि अगर उसे कुछ हो गया… तो एक दिन तुम बड़ी होकर उस सच तक पहुंचोगी।”

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।


    अभय की बारी

    नाना आगे बोले—

    “जब विक्रम ने अभय को खत्म करने की कोशिश की, तब अभय ने अपनी मौत का नाटक किया।”

    अभय ने सिर झुका लिया।

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “पापा…”

    अभय ने कहा—

    “मुझे तुम्हें सच बताना चाहिए था।”

    आरव की आवाज भर्रा गई।

    “आपने इतने साल हमसे दूरी क्यों रखी?”

    अभय ने कहा—

    “क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

    “मुझे डर था कि अगर विक्रम को पता चला कि तुम मेरे बच्चे हो… तो वो तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा।”

    आरव ने कहा—

    “लेकिन मैं आपका बेटा हूं।”

    “मुझे आपकी जरूरत थी।”

    अभय की आंखें भर आईं।

    “मुझे भी तुम्हारी जरूरत थी, बेटा।”

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ खामोशी थी।

    फिर आरव ने आगे बढ़कर अपने पिता को गले लगा लिया।

    अभय ने उसे कसकर पकड़ लिया।


    नाना की असली योजना

    अमन ने पूछा—

    “अगर आप सब जानते थे तो हमें तीन अलग-अलग चाबियां क्यों दी गईं?”

    नाना मुस्कुराए।

    “क्योंकि मैंने जानबूझकर ऐसा किया।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि मैं जानता था कि अगर एक व्यक्ति के पास पूरा राज होगा, तो विक्रम उसे खत्म कर देगा।”

    “इसलिए मैंने राज को तीन हिस्सों में बांट दिया।”

    विहान ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।

    “और ये तीसरी चाबी?”

    नाना ने कहा—

    “हां।”

    “तीनों चाबियां मिलकर एक दरवाजा खोलती हैं।”

    आरव ने पूछा—

    “कहां का?”

    नाना ने कहा—

    “पुराने महल के नीचे बने गुप्त तहखाने का।”

    देवेंद्र अचानक बोल पड़ा—

    “वही तहखाना?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “हां, देवेंद्र।”

    देवेंद्र का चेहरा गंभीर हो गया।

    आरव ने पूछा—

    “आप उस जगह के बारे में जानते हैं?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “हां।”

    “लेकिन मैंने सोचा था वो जगह हमेशा के लिए बंद हो चुकी है।”

    नाना ने कहा—

    “वो कभी बंद नहीं हुई।”

    “वो सिर्फ सही लोगों का इंतजार कर रही थी।”


    विक्रम क्यों डरा हुआ था?

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “अगर उस तहखाने में इतना बड़ा राज है, तो विक्रम हमें वहां जाने क्यों नहीं दे रहा?”

    विक्रम ने तुरंत कहा—

    “क्योंकि वहां कुछ ऐसा है जिसे बाहर आना नहीं चाहिए।”

    आरव मुस्कुराया।

    “मतलब वहां हमारे खिलाफ कुछ नहीं… तुम्हारे खिलाफ है।”

    विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।

    नाना ने कहा—

    “बिल्कुल।”

    “वहां विक्रम के पूरे साम्राज्य के सबूत हैं।”

    “नाम।”

    “हिसाब।”

    “कागजात।”

    “और उन सभी लोगों के वीडियो, जिन्हें उसने रास्ते से हटाया।”

    अमन ने कहा—

    “तो फिर पुलिस को दे देते हैं।”

    नाना ने कहा—

    “अगर हम उस तहखाने तक पहुंच गए तो।”


    विक्रम का आखिरी दांव

    विक्रम ने कैमरे के सामने कदम बढ़ाया।

    “तुम लोग बहुत खुश हो रहे हो।”

    “लेकिन तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे नाना अभी मेरे कब्जे में हैं।”

    नैना ने गुस्से में कहा—

    “उन्हें छोड़ दो।”

    “तुम्हें जो चाहिए, मैं दूंगी।”

    विक्रम हंसा।

    “मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।”

    “मुझे सिर्फ आरव चाहिए।”

    नैना चौंक गईं।

    “आरव?”

    विक्रम ने कहा—

    “हां।”

    “क्योंकि उस तहखाने का आखिरी ताला वही खोल सकता है।”

    आरव ने पूछा—

    “मैं?”

    नाना ने आंखें बंद कर लीं।

    “मुझे डर था कि ये दिन आएगा।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैंने उस ताले में तुम्हारा खून इस्तेमाल किया था।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।


    आरव की विरासत

    आरव ने अविश्वास से पूछा—

    “मेरे खून का?”

    “हां।”

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम्हारे पिता की संपत्ति का असली वारिस तुम हो।”

    अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

    आरव ने कहा—

    “लेकिन हम तीनों भाई हैं।”

    “हां।”

    “तो सिर्फ मैं क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम सबसे बड़े हो।”

    “तुम्हारे पिता ने कानूनी वारिस के रूप में तुम्हारा नाम रखा था।”

    “लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारे भाइयों का कोई हक नहीं।”

    “तुम तीनों मिलकर ही उस विरासत को पूरा कर सकते हो।”

    अमन ने कहा—

    “तो हम तीनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”

    नाना मुस्कुराए।

    “यही बात तुम्हें सबसे ताकतवर बनाती है।”


    आरोही का सच

    अचानक नाना की नजर आरोही पर गई।

    “और तुम।”

    आरोही चौंक गई।

    “जी?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता ने अपनी बेटी को सिर्फ एक चाबी नहीं दी थी।”

    “उन्होंने तुम्हें इस परिवार से जोड़ने वाला एक सबूत भी दिया था।”

    आरोही ने पूछा—

    “क्या?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता समर और अभय सिर्फ दोस्त नहीं थे।”

    आरव ने चौंककर पूछा—

    “तो?”

    “वे दोनों एक ही मिशन पर काम कर रहे थे।”

    “और उन्होंने फैसला किया था कि अगर उन्हें कुछ हो गया…”

    “तो उनके बच्चे एक-दूसरे की रक्षा करेंगे।”

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

    नाना ने मुस्कुराकर कहा—

    “शायद इसी वजह से तुम दोनों इतने करीब आए।”

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “चाहे अतीत कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं हूं।”

    आरोही ने धीरे से कहा—

    “मैं भी नहीं।”


    तहखाने का रास्ता

    नाना ने कहा—

    “अब मेरी बात ध्यान से सुनो।”

    “पुराने महल के पीछे एक सूखा कुआं है।”

    “उसके नीचे एक लोहे का दरवाजा है।”

    “वहीं से तहखाने का रास्ता शुरू होता है।”

    आरव ने पूछा—

    “और तीन चाबियां?”

    “पहली चाबी तुम्हारे पास।”

    “दूसरी अमन के पास।”

    “तीसरी आरोही के लॉकेट में।”

    विहान चौंका।

    “लेकिन मेरी चाबी?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हारी चाबी चाबी नहीं है।”

    “वो उस दरवाजे का कोड है।”

    विहान ने अपने लॉकेट को देखा।

    उसमें कुछ अंक खुदे हुए थे।

    1-7-2-5

    देवेंद्र ने कहा—

    “ये वही नंबर है!”

    आरव ने पूछा—

    “क्या?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “अभय की पुरानी फाइल में यही नंबर था।”


    नाना की आखिरी चेतावनी

    नाना ने गंभीर होकर कहा—

    “लेकिन ध्यान रखना।”

    “तहखाने में सिर्फ सबूत नहीं हैं।”

    “वहां एक इंसान भी है।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने कहा—

    “वो व्यक्ति जिसने पच्चीस साल पहले मुझे धोखा दिया था।”

    नैना चौंक गईं।

    “पापा!”

    “आपने मुझे कभी नहीं बताया।”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम उस सच से दूर रहो।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन है वो?”

    नाना ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “तुम उसे जानते हो।”

    “बहुत करीब से।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने सिर्फ इतना कहा—

    “देवेंद्र।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    सभी की नजर देवेंद्र पर टिक गई।

    देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।

    नैना ने अविश्वास से कहा—

    “देवेंद्र?”

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

    आरव ने बंदूक निकाल ली।

    “पापा के दोस्त…”

    “क्या आप गद्दार हैं?”

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

    “आरव… बात वैसी नहीं है जैसी दिख रही है।”

    अभय भी चौंक गया।

    “देवेंद्र?”

    नाना ने कहा—

    “उसने मुझे धोखा दिया था।”

    देवेंद्र ने कांपती आवाज में कहा—

    “मैंने धोखा नहीं दिया था।”

    “मैंने किसी को बचाने के लिए झूठ बोला था।”

    आरव ने पूछा—

    “किसे?”

    देवेंद्र ने धीरे से नैना की तरफ देखा।

    नैना की आंखें फैल गईं।

    देवेंद्र ने कहा—

    “नैना को।”

    नैना स्तब्ध रह गईं।

    और तभी स्क्रीन अचानक बंद हो गई।

    विक्रम की आखिरी आवाज गूंजी—

    “अब समझे, आरव? इस परिवार में कोई भी वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है।”

    स्क्रीन काली हो गई।

    आरव की नजर देवेंद्र और नैना के बीच घूम रही थी।

    उसे पहली बार लगा—

    शायद उसके परिवार का सबसे बड़ा राज अभी खुलना बाकी है।

    जारी रहेगा…

  • मुसीबत से शिकायत

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मुसीबत से शिकायत

     

    ए मुसीबत, अब तो छोड़ दे हमें,

    अपनों की तरह क्यों चिपक गई है तू हमसे?

    जहाँ जाएँ, तू पीछे-पीछे चली आती है,

    हर खुशी के दरवाज़े पर दस्तक दे जाती है।

    हमने भी अब तुझसे लड़ना सीख लिया है,

    हर आँसू को हँसकर सहना सीख लिया है।

    एक दिन ये वक्त भी बदल जाएगा,

    और तू नहीं, हमारी खुशी हमारे साथ रह जाएगी।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part 7

     

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

     

    अग्नि ने मैसेज पढ़ा और फोन वापिस टेबल पर रख दिया और अपने लिए ड्रिंक बनाने लगा। लेकिन वो शायद कुछ सोच भी रहा था। 

     

    शुभम ने उसकी हरकत नोटिस कर ली। “क्या हुआ?”

     

    अग्नि, “कुछ नहीं।”

     

    शुभम ने पूछा, “किसका मैसेज था?”

     

    अग्नि बोला, “ऑफिस का।”

     

    शुभम ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ देखा। “वेदा का?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “तुझे उसका नाम कैसे पता?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “भाई, मैं तेरा दोस्त हूँ। तेरी सेक्रेटरी के बारे में इतना तो जानता ही हूँ कि वो पिछले तीन साल से तेरे साथ काम कर रही है।”

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया। शुभम ने मुस्कुराकर पूछा, “वैसे कैसी है?”

     

    अग्नि ने सामान्य स्वर में कहा, “कौन?”

     

    शुभम कूल अंदाज में, “वेदा।”

     

    अग्नि ने कंधे उचकाए, “मुझे क्या पता?”

     

    “अच्छा?” शुभम ने शरारत से कहा, “अभी दो मिनट पहले तक तू बता रहा था कि तुझे एक समझदार, सादगी पसंद लड़की चाहिए…”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम।”

     

    शुभम, “हाँ भाई?”

     

    अग्नि बोला, “अपनी बकवास बंद कर।” क्योंकि वो समझ गया था कि शुभम कहना क्या चाह रहा है,लेकिन उसे शुभम की बात बुरी भी नहीं लगी। 

     

    शुभम हँस पड़ा। लेकिन अग्नि के मन में पहली बार एक विचार आया। 

    एक ऐसा विचार जिसे उसने तुरंत अपने दिमाग से निकालने की कोशिश की।

     

    वेदा शर्मा।

     

    अग्नि ने गिलास में ड्रिंक डाली और उसे धीरे-धीरे घुमाने लगा।

     

    शुभम अब भी उसे ही देख रहा था। “क्या सोच रहा है?”

     

    अग्नि ने गिलास होंठों तक ले जाते हुए कहा, “कुछ नहीं।” लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी सहजता नहीं थी।

     

    शुभम ने भौंहें उठाईं। “तू जब ‘कुछ नहीं’ बोलता है ना, तब समझ आता है कि दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “तू मेरा दिमाग पढ़ना कब से सीख गया?”

     

    “जब से तू मेरा दोस्त बना है।” शुभम ने आराम से सोफे की पीठ से सिर टिकाया। “वैसे एक बात बता… तेरी सेक्रेटरी शादीशुदा तो नहीं है?”

     

    अग्नि ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “नहीं।” जवाब इतना जल्दी आया कि शुभम के चेहरे पर शरारती मुस्कान और गहरी हो गई।

    “ओहो… तो जानकारी पूरी है।”

     

    अग्नि ने गिलास टेबल पर रख दिया। “शुभम।”

     

    शुभम, “अरे मैं तो बस पूछ रहा था।”

     

    अग्नि, “और मैं बस जवाब दे रहा हूँ।” 

     

    शुभम, “ चल तू अब ज्यादा मत सोच, मैं कुछ करता हूँ।”

     

    अग्नि में हां में सिर हिलाया और बोला, “ बस इसी जवाब की उम्मीद थी।”

     

     

    अगली सुबह… राजावत ग्रुप।

    सुबह के ठीक नौ बजे।

     

    अग्नि हमेशा की तरह अपने ऑफिस पहुँच चुका था।

    उसका केबिन पूरी तरह व्यवस्थित था।

    टेबल पर जरूरी फाइलें रखी थीं। कॉफी उसके सामने थी।

     

    लेकिन आज पहली बार… उसकी नजर बार-बार दरवाजे की तरफ जा रही थी।

     

    तभी डोर नॉक हुआ।

    अग्नि, “ come in!”

     

    निशांत अंदर आया। “Good morning, sir.”

     

    अग्नि, “Morning.” निशांत ने फाइल आगे बढ़ाई।

    “आज दस बजे की बोर्ड मीटिंग है। ग्यारह बजे मल्होत्रा ग्रुप के साथ मीटिंग और दोपहर में…”

     

    अग्नि, “निशांत।”

     

    निशांत, “जी, सर?”

     

    अग्नि ने बिना किसी रिएक्शन के पूछा, “वेदा आई?”

     

    निशांत कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बोला, “अभी तक नहीं, सर।”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी देखी। नौ बजकर दस मिनट।

    “आते ही उसे मेरे केबिन में भेजना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया, “जी सर।”

     

    निशांत जाने लगा। फिर अग्नि ने उसे रोक लिया। “और निशांत…”

     

    निशांत रूककर पीछे मुड़ा, “जी?”

     

    “अगर वो आज भी ऑफिस नहीं आ पाए तो…” अग्नि कुछ पल रुका। “पहले मुझसे बात करना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया। “जी सर।”

     

    दरवाजा बंद हो गया। अग्नि कुर्सी पर पीछे टिक गया।

    उसने खुद से सवाल किया, वो आखिर वेदा का इंतजार क्यों कर रहा था?

     

    उसे अपनी ही बेचैनी अजीब लग रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    अग्नि की नजर दरवाजे पर गई। “Come in.”

     

    दरवाजा खुला। और सामने… वेदा खड़ी थी।

    आज भी उसकी आँखों के नीचे नींद की कमी साफ दिखाई दे रही थी। बाल जल्दी में बाँधे हुए थे।

    चेहरा थका हुआ था।

    लेकिन हाथ में हमेशा की तरह ऑफिस की फाइलें थीं।

    “Good morning, sir.”

     

    अग्नि कुछ सेकंड उसे देखता रहा। फिर बोला, “Sit.”

     

    वेदा चुपचाप सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।

    अग्नि ने अपने सामने रखी फाइल बंद कर दी।

    कुछ पल तक वो उसे देखता रहा।

    फिर धीमे स्वर में बोला, “वेदा…”

     

    वेदा ने हैरानी से अग्नि की तरफ देखा, क्योंकि ये शायद पहली बार था जब वो उसे इस तरह से पुकार रहा था। “जी, सर?”

     

    “मुझे तुमसे ऑफिस के काम के अलावा…”

    वो एक पल के लिए रुका। “…एक बेहद निजी बात करनी है।”

     

    वेदा की भौंहें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आया कि अग्नि आखिर उससे क्या पूछने वाला है।

     

    और अग्नि…

    वो भी शायद पहली बार अपने जीवन का सबसे असामान्य प्रस्ताव किसी के

    सामने रखने जा रहा था।

     

    क्रमशः…

     

    💕 No Love Clause

    कभी-कभी जिंदगी सबसे बड़ा सौदा वहीं रखती है, जहाँ इंसान सबसे ज्यादा मजबूर होता है।

     

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part 6

    राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार की पिछली सीट पर आकर बैठ गया। कार का दरवाजा बंद होते ही बाहर की दुनिया की आवाजें जैसे अचानक उससे दूर हो गईं।

     

    ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर, विला चलें?”

     

    अग्नि कुछ नहीं बोला।

     

    उसकी नजर कार की खिड़की से बाहर टिकी थी। मुंबई की सड़कें हमेशा की तरह अपनी रफ्तार से भाग रही थीं। कहीं ट्रैफिक में फँसी गाड़ियाँ थीं, कहीं सड़क किनारे भागते लोग, कहीं चमचमाती इमारतें और कहीं फुटपाथ पर अपनी जिंदगी समेटे बैठे लोग।

     

    लेकिन अग्नि का ध्यान इनमें से किसी पर नहीं था।

    उसके दिमाग में सिर्फ एक शब्द घूम रहा था।

    शादी।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं। उसे दादाजी की आवाज़ याद आ रही थी। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

    फिर उनकी दूसरी बात…

    “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

    आखिर ऐसा क्या था जिसे दादा जी उससे छिपा रहे थे?

     

    वो फाइल… उसमें मौजूद वो अतिरिक्त हिस्सा…

    और फिर उनका इतना आसानी से उसकी शर्त मान लेना।

     

    अग्नि ने भौंहें सिकोड़ लीं। उसे आज अपने दादा जी का व्यवहार कुछ ठीक नहीं लग रहा था। वो उन्हें सालों से जानता और समझता था। दादा जी कभी किसी बात को इतनी आसानी से नहीं मानते थे।

     

    खासकर तब…

     

    जब बात राजावत परिवार और उसकी विरासत की हो।

    लेकिन आज उन्होंने उसकी हर शर्त बिना किसी सवाल के स्वीकार कर ली थी।

    “लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    अग्नि के अपने ही शब्द उसके कानों में गूँज गए।

    उसने आँखें खोलीं।

     

    “सर?” ड्राइवर की आवाज़ सुनकर उसका ध्यान टूटा।

     

    अग्नि, “बोलो!”

     

    ड्राइवर ने पूछा, “विला चलना है?”

     

    अग्नि कुछ सेकंड चुप रहा। फिर उसने बिना किसी भाव के कहा, “नहीं।” 

     

    ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर?”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी पर नजर डाली। शाम के करीब साढ़े आठ बज रहे थे। उसने धीमे स्वर में कहा, “कार क्लब ले चलो”

     

    ड्राइवर ने तुरंत सिर हिलाया। “जी सर।” कहकर उसने कार की दिशा बदल दी।

    वहीं अग्नि ने अपने फोन से अपने दोस्त शुभम को भी क्लब आने का मैसेज कर दिया। 

    क्योंकि उसे पता था उसके सामने जो दुविधा अभी है उसका हल शुभम में बेहतर कोई नहीं दे सकता। क्योंकि उसके पास हर बात का सॉल्यूशन होता है। 

     

    कुछ देर बाद…

     

    मुंबई के सबसे प्राइवेट और एलीट क्लबों में से एक के बाहर काली कार आकर रुकी। कार के रुकते ही एक स्टाफ मेंबर तुरंत आगे बढ़ा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    अग्नि कार से बाहर निकला। ब्लैक शर्ट, ब्लैक ट्राउजर और उसके ऊपर पहना डार्क ब्लेजर…

    उसके चेहरे पर वही ठंडा आत्मविश्वास था जिसके कारण राजावत ग्रुप में हर कोई उससे एक दूरी बनाकर रखता था।

     

    क्लब का स्टाफ उसे देखते ही सतर्क हो गया। “Good evening, Mr. Rajawat.”

     

    अग्नि ने सिर्फ़ हल्का-सा सिर हिलाया और अंदर चला गया। क्लब का माहौल हमेशा की तरह शांत लेकिन आलीशान था।

     

    हल्की रोशनी… धीमा म्यूजिक…

    बार के पीछे सजी महँगी शराब की बोतलें…

    और शहर के कुछ बेहद प्रभावशाली लोग अपने-अपने ग्रुप में बैठे हुए थे, तो वहीं कुछ लड़के लड़कियां फ्लोर पर डांस कर रहे थे। कही छोटे छोटे कपड़े पहने लड़कियां गेस्ट को ड्रिंक सर्व कर रहे थे। 

     

    अग्नि की नजर किसी पर नहीं गई। वह सीधे अपने हमेशा वाले प्राइवेट लाउंज की तरफ बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा खोला, “आ गया हमारा दूल्हा!” अंदर से आवाज आई।

     

    अग्नि के कदम वहीं रुक गए। उसने सामने देखा।

    शुभम उसका दोस्त सोफे पर आराम से बैठा हुआ था।

    उसके हाथ में ड्रिंक थी और चेहरे पर हमेशा वाली शरारती मुस्कान।

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “बकवास बंद कर।”

     

    शुभम ने मुस्कुराते हुए ग्लास उठाया।

    “ये बकवास… बहुत ही जल्द हकीकत में बदलने वाली है मेरे दोस्त…।”

     

    अग्नि अंदर आया और सामने वाले सोफे पर बैठ गया।

    “बकवास मत कर।”

     

    शुभम ने उसे गौर से देखा। “ कुछ बात है…?” अग्नि के फेस के रिएक्शन देखते ही वो समझ गया कि आज अग्नि के साथ कुछ तो अजीब है। 

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    शुभम ने अपना ग्लास टेबल पर रखा। “दादाजी से मिलने गया था ना?”

     

    अग्नि ने बस सिर हिलाया। 

     

    “और?”

     

    “वही शादी का मुद्दा।” अग्नि ने जवाब दिया। 

     

    शुभम ने गहरी साँस ली। “मुझे पता था।”

     

    कुछ पल चुप्पी रही। फिर शुभम ने पूछा, “तो इस बार भी मना कर दिया?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “नहीं।”

     

    शुभम की भौंहें ऊपर उठ गईं। “क्या?”

     

    अग्नि ने बिल्कुल सपाट स्वर में कहा, “मैं शादी करने के लिए तैयार हूँ।”

     

    शुभम के हाथ से ग्लास लगभग छूटते छूटते बचा। वो आँखें बड़ी किए अग्नि को देख रहा था। “तू?”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “हाँ, मैं।”

     

    शुभम, “तू सच में शादी करेगा?”

     

    अग्नि, “क्यों? मैं इंसान नहीं हूँ क्या?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “नहीं… तू इंसान तो है। लेकिन पिछले पाँच सालों से तेरी बातें सुनकर मुझे शक होने लगा था।”

     

    अग्नि ने आँखें बंद कर लीं। “शुभम…”

     

    “ओके। ओके।” शुभम ने खुद को संभाला। “लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “दादा जी ने कुछ ऐसी बातें बताईं जिनके बाद मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।”

     

    शुभम की मुस्कान गायब हो गई। “क्या बात है?”

     

    “मैं अभी नहीं बता सकता।” अग्नि ने बताने से साफ इनकार कर दिया। 

     

    शुभम ने घूरा, “अग्नि…”

     

    अग्नि ने सख्त लहजे में कहा, “मैंने कहा ना, अभी नहीं।”

     

    शुभम ने उसकी आँखों में देखा। उसे समझ आ गया कि इस बार मामला सचमुच गंभीर है।

     

    उसने बात बदलते हुए पूछा, “ठीक है। लेकिन एक बात बता… लड़की कौन है?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “कोई लड़की नहीं है।”

     

    शुभम, “मतलब?”

     

    अग्नि, “मैंने अभी तक किसी को चुना ही नहीं।”

     

    शुभम ने हैरानी से कहा, “तो फिर शादी करेगा किससे?”

     

    अग्नि ने धीमे स्वर में कहा, “ इसलिए ही तो तुझे यहाँ बुलाया है?”

     

    शुभम उसकी बात समझने की कोशिश करने लगा। “मतलब? मेरा मैरिज breau नहीं है।”

     

    अग्नि आगे झुक गया। “ उसकी जरूरत भी नहीं। देख, मुझे प्यार नहीं चाहिए। मुझे कोई ऐसी लड़की नहीं चाहिए जो मेरे पैसे, मेरे नाम या राजावत परिवार की जिंदगी का हिस्सा बनने के सपने देखे।”

     

    “मुझे सिर्फ़ एक समझदार लड़की चाहिए। जो छह महीने के बाद अपनी जिंदगी में वापस चली जाए।”

     

    शुभम कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, “तू कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की बात कर रहा है?”

     

    अग्नि की आँखों में हल्की-सी ठंडक उतर आई। “Exactly.”

     

    शुभम कुछ सेकंड चुप रहा। फिर अचानक हँस पड़ा।

    “तू पागल हो गया है!”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “मुझे इसमें मजाक की कोई बात नहीं दिख रही।”

     

    “मुझे दिख रही है।” शुभम ने हँसी रोकते हुए कहा, “तू शादी से इतना नफरत करता था कि अब तूने शादी को बिजनेस डील बना दिया।”

     

    अग्नि ने बिना मुस्कुराए कहा, “मेरे लिए शादी हमेशा से एक डील ही थी।”

     

    शुभम उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया। उसे मालूम था कि अग्नि शादी को लेकर इतना कठोर क्यों था।

    उसने धीरे से पूछा, “और अगर वो लड़की तुझसे प्यार कर बैठी तो?”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं करेगी।”

     

    शुभम, “तुझे इतना यकीन कैसे है?”

     

    अग्नि कुछ पल शांत रहा। फिर बोला, “क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट में साफ लिखा होगा… छह महीने बाद कोई रिश्ता नहीं रहेगा।”

     

    शुभम ने सिर हिलाया। ” चल मान लिया उसे प्यार नहीं भी हुआ लेकिन अगर तू प्यार कर बैठा तो?”

     

    इस बार अग्नि चुप हो गया। कुछ सेकंड तक उसने कोई जवाब नहीं दिया।

    फिर उसकी आवाज़ बेहद ठंडी थी। “ऐसा नहीं होगा।”

     

    शुभम ने उसकी आँखों में देखा। “तुझे खुद पर इतना भरोसा है?”

     

    अग्नि ने बिना झिझके कहा, “हाँ।”

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बा

    त को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

    कहानी आगे जारी रहेगी.

  • ❤️ प्यार ❤️🫂

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

    प्यार वो नहीं जो लफ़्ज़ों में बयां हो जाए,

    प्यार वो है जो ख़ामोशी में भी समझ आ जाए।

     

    तेरी मुस्कान से रोशन मेरी हर शाम रहे,

    तेरा साथ मिले तो हर मौसम गुलज़ार रहे।

     

    तू पास हो तो दिल को सुकून मिलता है,

    तेरे बिना हर पल कुछ अधूरा सा लगता है।

     

    ना दौलत चाहिए, ना कोई संसार चाहिए,

    बस उम्र भर तेरा हाथ मेरे हाथ में चाहिए।

     

    अगर प्यार कोई खूबसूरत एहसास है,

    तो मेरी हर धड़कन में बस तेरा ही नाम खास है। ❤️🫂