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  • मेरी राखी की लाज

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    अमन देखने में बहुत अच्छा लड़का था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत ने उसके पूरे परिवार को परेशान कर रखा था—उसे शराब और नशे की लत थी।

     

    उसकी छोटी बहन नेहा उससे बहुत प्यार करती थी। बचपन में दोनों साथ खेलते थे। अमन अपनी बहन को स्कूल छोड़ने जाता और उसकी छोटी-छोटी फरमाइशें पूरी करता।

     

    लेकिन कॉलेज के बाद अमन गलत दोस्तों के संपर्क में आ गया।

     

    धीरे-धीरे नशा उसकी जिंदगी बन गया।

     

    मां कई बार समझाती।

     

    “बेटा, अपनी जिंदगी बर्बाद मत कर।”

     

    अमन कहता, “मुझे पता है मुझे क्या करना है।”

     

    नेहा कुछ नहीं कहती थी। वह सिर्फ अपने भाई को बदलते हुए देखती रहती।

     

    एक दिन अमन नशे में घर आया और गुस्से में अपनी मां पर चिल्लाने लगा।

     

    नेहा ने पहली बार अपने भाई को रोकते हुए कहा, “बस भैया!”

     

    अमन चौंक गया।

     

    नेहा बोली, “आपको पता है मां आपसे डरती हैं?”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    “और मैं भी।”

     

    यह सुनकर अमन की आंखें भर आईं, लेकिन वह कुछ बोला नहीं।

     

    कुछ महीनों बाद रक्षाबंधन आया।

     

    नेहा ने सुबह से तैयारी की थी।

     

    अमन घर आया तो नेहा ने राखी की थाली उसके सामने रख दी।

     

    “बैठिए।”

     

    अमन बैठ गया।

     

    नेहा ने राखी उठाई, लेकिन बांधी नहीं।

     

    अमन ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    नेहा बोली, “पहले मेरी एक बात माननी होगी।”

     

    “क्या?”

     

    “आप मुझे कोई महंगा तोहफा मत देना।”

     

    अमन मुस्कुराया, “तो क्या चाहिए?”

     

    नेहा ने कहा, “मुझे सिर्फ एक अच्छा भाई चाहिए।”

     

    अमन की मुस्कान गायब हो गई।

     

    नेहा बोली, “भैया, मैं आपसे अपनी रक्षा का वादा नहीं चाहती। मैं चाहती हूं कि आप खुद को उस रास्ते से बचाएं जिस पर आप चल रहे हैं।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    नेहा ने कहा, “अगर आप सच में मेरी राखी की लाज रखना चाहते हैं तो शराब छोड़ दीजिए। नशा छोड़ दीजिए। गुस्सा छोड़ दीजिए। और किसी भी लड़की को कभी गलत नजर से मत देखिए।”

     

    अमन ने धीरे से पूछा, “क्या तुम मुझसे इतना सब चाहती हो?”

     

    नेहा बोली, “हां। क्योंकि मुझे सिर्फ अपना भाई नहीं चाहिए। मुझे ऐसा भाई चाहिए जिस पर हर लड़की भरोसा कर सके।”

     

    उस दिन अमन ने अपनी जिंदगी बदलने का फैसला किया।

     

    उसने नशा छोड़ने के लिए मदद ली। पुराने दोस्तों से दूरी बनाई। कुछ महीने उसके लिए बेहद कठिन रहे।

     

    कई बार उसका मन करता कि वह वापस नशे की ओर चला जाए।

     

    लेकिन हर बार उसे अपनी कलाई पर बंधी राखी दिखाई देती।

     

    वह खुद से कहता—

     

    “मुझे अपनी बहन की राखी की लाज रखनी है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    अमन अब काम करने लगा था। उसकी मां के चेहरे पर फिर से मुस्कान लौट आई थी।

     

    एक दिन वह बस स्टैंड पर खड़ा था। वहां उसने देखा कि एक लड़की का मोबाइल एक युवक छीनकर भागने की कोशिश कर रहा है।

     

    लड़की मदद के लिए चिल्लाई।

     

    अमन ने तुरंत आसपास के लोगों को बुलाया और पुलिस को सूचना दी। उसने बिना जोखिम बढ़ाए लड़की की मदद की और आरोपी को पकड़ने में लोगों की सहायता की।

     

    लड़की ने कहा, “भैया, अगर आप नहीं आते तो पता नहीं क्या होता।”

     

    अमन ने कहा, “बहन, डरना मत। गलती तुम्हारी नहीं थी।”

     

    यह शब्द सुनकर अमन को अपनी बहन याद आ गई।

     

    कुछ साल बाद अमन ने युवाओं के साथ मिलकर एक अभियान शुरू किया।

     

    उसका उद्देश्य था—नशे से दूर रहना और महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना पैदा करना।

     

    एक कार्यक्रम में नेहा भी मौजूद थी।

     

    मंच से अमन ने कहा, “कभी मेरी बहन ने मुझे एक राखी बांधी थी। उस राखी ने मुझे सिखाया कि बहन की रक्षा करने से पहले इंसान को अपनी बुरी आदतों से लड़ना पड़ता है।”

     

    नीचे बैठी नेहा की आंखों में आंसू थे।

     

    कार्यक्रम खत्म होने के बाद उसने भाई की कलाई पर हाथ रखा।

     

    “अब मुझे आप पर गर्व है।”

     

    अमन ने कहा, “ये सब तुम्हारी वजह से हुआ।”

     

    नेहा मुस्कुराई।

     

    “नहीं भैया। मैंने सिर्फ रास्ता दिखाया था। चलना आपने खुद सीखा।”

     

    सीख:

    बहन की राखी सिर्फ एक धागा नहीं, बल्कि विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक है। सच्चा भाई वही है जो अपनी बुरी आदतों को छोड़कर ऐसा इंसान बने, जिसके सामने किसी भी लड़की को डर महसूस न हो।

  • उस राखी ने भाई को बदल दिया

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    सूरज एक छोटे से कस्बे में अपनी बहन पूजा और मां के साथ रहता था। पिता के जाने के बाद घर की सारी उम्मीदें सूरज पर थीं।

     

    लेकिन सूरज अपनी जिम्मेदारियों से दूर भाग रहा था।

     

    उसे शराब और नशे की आदत लग चुकी थी। उसकी कमाई का बड़ा हिस्सा नशे में चला जाता।

     

    पूजा कई बार उसे समझाती।

     

    “भैया, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?”

     

    सूरज हमेशा कहता, “मुझे अकेला छोड़ दो।”

     

    मां चुपचाप रोती रहती।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    पूजा ने सोचा कि इस बार वह भाई को कोई ऐसी राखी देगी जो सिर्फ उसकी कलाई पर नहीं, उसके दिल पर बंधे।

     

    रक्षाबंधन की सुबह सूरज देर से घर आया।

     

    पूजा ने उसके सामने राखी रखी।

     

    “भैया, बैठिए।”

     

    सूरज बैठ गया।

     

    पूजा ने राखी बांधते हुए कहा, “इस बार मुझे आपसे कुछ चाहिए।”

     

    सूरज ने पूछा, “क्या?”

     

    “आप अपनी जिंदगी वापस दे दीजिए।”

     

    सूरज चौंक गया।

     

    पूजा बोली, “आपने खुद को नशे में खो दिया है। मां ने अपना बेटा खो दिया। मैंने अपना भाई खो दिया। लेकिन मैं आपको वापस पाना चाहती हूं।”

     

    सूरज की आंखें भर आईं।

     

    पूजा ने कहा, “मुझे वादा करो कि आज के बाद तुम शराब को हाथ नहीं लगाओगे।”

     

    सूरज ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं कोशिश करूंगा।”

     

    पूजा बोली, “नहीं भैया। कोशिश नहीं। फैसला।”

     

    सूरज ने अपनी बहन की आंखों में देखा।

     

    “ठीक है। आज से फैसला।”

     

    उसने उसी दिन नशा छोड़ने के लिए इलाज और परामर्श लेना शुरू किया।

     

    शुरुआत में उसे बहुत परेशानी हुई।

     

    लेकिन पूजा और मां उसके साथ खड़ी रहीं।

     

    कुछ महीनों बाद सूरज काफी बदल चुका था।

     

    उसने काम शुरू किया। घर की जिम्मेदारियां उठाने लगा।

     

    एक दिन वह बाजार जा रहा था। उसने देखा कि एक लड़की अकेली सड़क पर रो रही है।

     

    सूरज ने दूरी बनाकर पूछा, “बहन, कोई मदद चाहिए?”

     

    लड़की ने बताया कि कुछ लड़कों ने उसका पीछा किया था।

     

    सूरज ने तुरंत आसपास के दुकानदारों से मदद ली और पुलिस को सूचना दी।

     

    मामला शांत होने के बाद लड़की ने कहा, “आज अगर कोई मेरी मदद नहीं करता तो मैं बहुत डर जाती।”

     

    सूरज ने कहा, “डरने की जरूरत नहीं। तुम्हारी गलती नहीं है।”

     

    उस दिन उसे एहसास हुआ कि उसकी बहन ने उससे कितनी बड़ी बात कही थी।

     

    उसने सोचा—

     

    “अगर मैं अपनी बहन की रक्षा चाहता हूं, तो मुझे हर लड़की को सम्मान देना सीखना होगा।”

     

    धीरे-धीरे सूरज ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर नशे के खिलाफ अभियान शुरू किया।

     

    वह स्कूलों में जाकर युवाओं को नशे के नुकसान के बारे में बताता।

     

    वह कहता—

     

    “मैं खुद इस रास्ते पर चल चुका हूं। नशा आपको मजबूत नहीं बनाता। यह आपके परिवार को आपसे दूर कर देता है।”

     

    कुछ वर्षों में सूरज की पहचान बदल गई।

     

    जो लोग पहले उसे नशेड़ी कहते थे, अब उसे सम्मान से बुलाते थे।

     

    एक दिन रक्षाबंधन पर पूजा ने उसे राखी बांधी।

     

    सूरज ने कहा, “आज मुझे समझ आया कि उस दिन तुमने मुझसे सिर्फ नशा छोड़ने का वादा नहीं लिया था।”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    “फिर क्या लिया था?”

     

    सूरज ने कहा, “एक बेहतर इंसान बनने का।”

     

    पूजा की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    सूरज ने अपनी कलाई की राखी को देखा और कहा—

     

    “अब यह धागा मुझे हर दिन याद दिलाता है कि मेरी बहन की तरह दुनिया की हर लड़की भी सम्मान की हकदार है।”

     

    पूजा ने भाई को गले लगा लिया।

     

    मां दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।

     

    उस दिन घर में कोई महंगा उपहार नहीं था। लेकिन उस घर को उससे कहीं बड़ी चीज मिल गई थी—एक सुधरा हुआ बेटा और एक जिम्मेदार भाई।

     

    सीख:

    इंसान कितना भी गलत रास्ते पर चला जाए, अगर वह सच्चे मन से बदलना चाहे तो नई शुरुआत कर सकता है। नशे से दूर रहना और महिलाओं का सम्मान करना सिर्फ त्योहार के दिन का वादा नहीं, बल्कि जीवनभर की जिम्मेदारी है।

  • एक राखी, हजार बहनों की दुआ

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    विकास बचपन में अपनी बहन काव्या से बहुत प्यार करता था। दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रहते थे।

     

    लेकिन बड़े होते-होते विकास गलत संगत में पड़ गया।

     

    शराब और नशे ने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी।

     

    वह घर से पैसे चुराने लगा। मां से झूठ बोलता और काव्या से भी अक्सर झगड़ता।

     

    काव्या अपने भाई को देखकर रोती थी।

     

    एक रात विकास नशे में घर आया। उसने देखा कि काव्या अपने कमरे में बैठकर रो रही है।

     

    उसने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    विकास ने फिर पूछा, “बोलो।”

     

    काव्या ने कहा, “भैया, मुझे आपसे डर लगने लगा है।”

     

    ये शब्द विकास के दिल में उतर गए।

     

    अगली सुबह वह देर तक सोचता रहा।

     

    कुछ दिन बाद रक्षाबंधन था।

     

    काव्या ने राखी की थाली तैयार की।

     

    विकास उसके सामने बैठा।

     

    काव्या ने राखी उठाई और कहा—

     

    “आज मैं आपसे तीन वादे लूंगी।”

     

    विकास ने कहा, “बोलो।”

     

    “पहला—नशा छोड़ोगे।”

     

    “दूसरा—मां को कभी दुख नहीं दोगे।”

     

    “तीसरा—किसी भी लड़की को कभी कमजोर समझकर उसका फायदा नहीं उठाओगे।”

     

    विकास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    काव्या बोली, “भैया, मेरी रक्षा करने की जरूरत नहीं है। मैं चाहती हूं कि आप ऐसा समाज बनाएं जहां किसी लड़की को डरकर घर से निकलना न पड़े।”

     

    विकास ने बहन की ओर देखा।

     

    “मैं वादा करता हूं।”

     

    उस दिन से विकास ने अपनी जिंदगी बदलनी शुरू कर दी।

     

    नशा छोड़ने के लिए उसने इलाज और विशेषज्ञों की मदद ली। पुराने दोस्तों को छोड़ा और काम पर ध्यान दिया।

     

    एक साल बाद विकास पूरी तरह बदल चुका था।

     

    लेकिन उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब एक दिन उसने सड़क पर एक लड़की को परेशान होते देखा।

     

    कुछ लड़के उसका पीछा कर रहे थे।

     

    विकास ने तुरंत आसपास के लोगों को बुलाया और पुलिस को सूचना दी।

     

    लड़की सुरक्षित घर पहुंच गई।

     

    उसने जाते समय कहा—

     

    “भैया, भगवान आपको खुश रखे।”

     

    विकास ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “बस हमेशा सुरक्षित रहना।”

     

    धीरे-धीरे ऐसी घटनाओं में मदद करने के कारण लोग विकास को पहचानने लगे।

     

    लेकिन विकास सिर्फ सड़क पर मदद करने तक सीमित नहीं रहा।

     

    उसने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक संस्था बनाई, जहां लड़कियों और महिलाओं को सुरक्षा, कानून और आत्मविश्वास से जुड़ी जानकारी दी जाती थी।

     

    वह युवाओं को भी समझाता था कि बहादुरी का मतलब लड़ाई करना नहीं है।

     

    वह कहता—

     

    “किसी लड़की की मदद करने का सबसे सही तरीका है उसकी बात सुनना, उसकी सहमति का सम्मान करना और जरूरत पड़ने पर सही लोगों और कानून की मदद लेना।”

     

    समय बीतता गया।

     

    एक दिन उनकी संस्था में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ।

     

    वहां शहर की सैकड़ों लड़कियां मौजूद थीं।

     

    मंच पर विकास को सम्मानित किया गया।

     

    कार्यक्रम के बाद काव्या मंच पर आई।

     

    उसने विकास की कलाई पर राखी बांधी।

     

    फिर बोली—

     

    “कुछ साल पहले मैंने अपने भाई से एक वादा लिया था। आज मुझे खुशी है कि मेरा भाई सिर्फ मेरा भाई नहीं रहा। आज वह उन हजारों बहनों के भरोसे की वजह बन गया है।”

     

    विकास की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने कहा—

     

    “काव्या, उस दिन तुमने मेरी कलाई पर राखी बांधी थी। मुझे नहीं पता था कि एक दिन यही राखी मुझे हजारों बहनों की दुआ दिलाएगी।”

     

    पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।

     

    काव्या ने कहा—

     

    “भैया, आज मुझे आपकी रक्षा की जरूरत नहीं है। आज मुझे आप पर गर्व है।”

     

    विकास ने अपनी बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “और मुझे गर्व है कि तुमने मुझे भाई बनने का असली मतलब सिखाया।”

     

    उस दिन विकास समझ चुका था कि राखी सिर्फ एक बहन और भाई का रिश्ता नहीं है।

     

    यह एक जिम्मेदारी है।

     

    एक ऐसा वादा जिसमें प्यार है, सम्मान है और इंसानियत है।

     

    और उस एक राखी ने सच में एक भाई को बदलकर ऐसा इंसान बना दिया था, जिसकी दुआ में सिर्फ उसकी बहन नहीं, बल्कि हजारों बहनों की सुरक्षा शामिल थी।

     

    सीख:

    सच्ची मर्दानगी किसी कमजोर को डराने में नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित और सम्मानित महसूस कराने में है। अपनी बहन की रक्षा करना अच्छी बात है, लेकिन हर लड़की को इंसान समझकर उसका सम्मान करना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। एक अच्छा बदलाव सिर्फ एक परिवार नहीं, पूरी समाज की सोच बदल सकता है।

  • रक्षाबंधन पर लौट आया भाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    गाँव के एक छोटे-से घर में कमला अपनी बेटी आरती के साथ रहती थी। घर की हालत बहुत खराब थी। मिट्टी की दीवारों में जगह-जगह दरारें थीं और बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था।

     

    कमला के पति की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी थी। उनकी दो संतानें थीं—बड़ी बेटी आरती और छोटा बेटा रवि।

     

    पिता के जाने के बाद रवि ने बहुत छोटी उम्र में ही घर छोड़ दिया था।

     

    उसने जाते समय अपनी बहन से कहा था—

     

    “आरती, मैं शहर जा रहा हूँ। खूब मेहनत करूँगा और एक दिन इतना पैसा कमाऊँगा कि तुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं होगी।”

     

    आरती उस समय सिर्फ दस साल की थी।

     

    उसने रोते हुए पूछा—

     

    “भैया, कब वापस आओगे?”

     

    रवि ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अगले रक्षाबंधन पर।”

     

    लेकिन वह रक्षाबंधन कभी नहीं आया।

     

    एक साल बीता।

     

    फिर दूसरा।

     

    फिर तीसरा।

     

    हर रक्षाबंधन आरती एक राखी खरीदती और दरवाजे पर बैठकर भाई का इंतजार करती।

     

    माँ कहती—

     

    “बेटी, शायद इस बार नहीं आ पाएगा।”

     

    आरती कहती—

     

    “माँ, भैया ने वादा किया है।”

     

    धीरे-धीरे गाँव वालों ने कहना शुरू कर दिया—

     

    “रवि शहर जाकर बदल गया।”

     

    “शायद उसे अपना गाँव याद ही नहीं।”

     

    लेकिन आरती को विश्वास था कि उसका भाई उसे भूला नहीं होगा।

     

    एक रक्षाबंधन पर उसने पूरे दिन इंतजार किया।

     

    शाम हो गई।

     

    कोई नहीं आया।

     

    उसने राखी को अपनी मुट्ठी में दबाया और रोते हुए बोली—

     

    “भैया, आपने अपना वादा क्यों तोड़ दिया?”

     

    माँ ने उसे सीने से लगा लिया।

     

    अगले साल भी यही हुआ।

     

    रवि नहीं आया।

     

    फिर कई साल गुजर गए।

     

    आरती बड़ी हो गई।

     

    उसकी शादी हो गई।

     

    वह माँ के साथ उसी गाँव में रहने लगी।

     

    लेकिन हर रक्षाबंधन पर वह अपने भाई के लिए राखी जरूर रखती।

     

    एक दिन डाकिया एक पत्र लेकर आया।

     

    पत्र पर लिखा था—

     

    “आरती के नाम।”

     

    आरती के हाथ काँपने लगे।

     

    उसने पत्र खोला।

     

    अंदर लिखा था—

     

    “मेरी प्यारी बहन,

     

    मुझे नहीं पता कि तू मुझे याद करती है या नहीं। लेकिन मैं हर दिन तुझे याद करता हूँ।

     

    जिस दिन मैं गाँव से निकला था, उसी दिन मैंने तय किया था कि मैं वापस तभी लौटूँगा जब तेरे लिए कुछ बन पाऊँगा।

     

    शहर में मुझे एक होटल में काम मिला। बहुत कम पैसे मिलते थे। फिर एक दिन होटल बंद हो गया।

     

    मैं सड़क पर आ गया।

     

    कुछ लोगों ने मदद की। मुझे एक गोदाम में काम मिल गया।

     

    वहाँ से जिंदगी धीरे-धीरे सुधरने लगी।

     

    लेकिन एक दिन दुर्घटना में मेरा पैर बुरी तरह घायल हो गया।

     

    डॉक्टरों ने कहा कि मैं पहले की तरह काम नहीं कर पाऊँगा।

     

    मैं बहुत टूट गया।

     

    मैंने सोचा कि अगर मैं खाली हाथ घर लौटूँगा तो तू मुझे क्या समझेगी?

     

    इसी शर्म ने मुझे तुमसे दूर रखा।

     

    लेकिन एक बात सच है।

     

    हर रक्षाबंधन मैं अपनी कलाई पर तेरी राखी महसूस करता रहा।

     

    मुझे माफ कर देना।

     

    तुम्हारा भाई—रवि।”

     

    पत्र पढ़ते-पढ़ते आरती की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या लिखा है?”

     

    आरती ने पत्र माँ को दे दिया।

     

    माँ ने पढ़ते ही आँखें बंद कर लीं।

     

    “मेरा बेटा जिंदा है।”

     

    कुछ दिनों बाद रवि का दूसरा पत्र आया।

     

    इस बार उसमें शहर का पता था।

     

    आरती तुरंत अपनी माँ के साथ शहर चली गई।

     

    वे एक छोटी-सी बस्ती में पहुँचीं।

     

    वहाँ एक कमरे के बाहर एक आदमी लकड़ी के सहारे बैठा था।

     

    उसका एक पैर कमजोर था।

     

    बाल बिखरे हुए थे।

     

    चेहरा बहुत दुबला था।

     

    आरती उसे देखकर कुछ पल रुक गई।

     

    फिर धीरे से बोली—

     

    “भैया…”

     

    रवि ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों में आँसू भर आए।

     

    “आरती…”

     

    आरती दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    रवि रोते हुए बोला—

     

    “मुझे माफ कर दे।”

     

    आरती ने कहा—

     

    “किस बात की माफी?”

     

    “मैं इतने साल तुझे राखी बाँधने नहीं आया।”

     

    आरती ने उसका चेहरा दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “मैंने हर साल तुम्हारी कलाई के लिए राखी खरीदी है।”

     

    रवि रो पड़ा।

     

    “तूने मुझे भुलाया नहीं?”

     

    आरती बोली—

     

    “भाई को कोई बहन भूल सकती है क्या?”

     

    रवि ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं गरीब हो गया था।”

     

    आरती ने कहा—

     

    “तो क्या हुआ?”

     

    “मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं था।”

     

    आरती ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “मुझे तुमसे कभी कुछ चाहिए ही नहीं था। मुझे सिर्फ मेरा भाई चाहिए था।”

     

    रवि ने अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “लेकिन मैंने तुझे बहुत इंतजार करवाया।”

     

    आरती मुस्कुराई।

     

    “वो इंतजार भी मेरे लिए प्यार था।”

     

    अगले दिन रक्षाबंधन था।

     

    आरती ने अपने बैग से एक राखी निकाली।

     

    वह बहुत साधारण थी।

     

    रवि ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    आरती ने राखी बाँधते हुए कहा—

     

    “इस बार सात साल की राखी एक साथ बाँध रही हूँ।”

     

    रवि की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसने बहन के हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा रखा।

     

    आरती ने खोला।

     

    अंदर एक पुरानी, टूटी हुई चूड़ी थी।

     

    “ये क्या है?”

     

    रवि बोला—

     

    “तूने बचपन में मुझे अपनी चूड़ी का एक टुकड़ा दिया था और कहा था कि इसे संभालकर रखना। मैंने इसे आज तक रखा है।”

     

    आरती उस चूड़ी के टुकड़े को सीने से लगाकर रोने लगी।

     

    रवि बोला—

     

    “मैं तुझे महंगा तोहफा नहीं दे सकता।”

     

    आरती ने कहा—

     

    “ये मेरे लिए दुनिया का सबसे कीमती तोहफा है।”

     

    कुछ समय बाद आरती ने अपने पति और माँ की मदद से रवि को गाँव वापस ले आने का फैसला किया।

     

    गाँव लौटते समय रवि की आँखों में आँसू थे।

     

    उसे डर था कि लोग उसका मजाक उड़ाएँगे।

     

    लेकिन गाँव पहुँचते ही बूढ़ी माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मेरा बेटा वापस आ गया।”

     

    रवि माँ के पैरों में गिर पड़ा।

     

    गाँव के लोग भी उसे देखकर भावुक हो गए।

     

    जिस भाई के बारे में लोग कहते थे कि वह बदल गया है, वह असल में अपनी गरीबी और मजबूरी से लड़ रहा था।

     

    आरती ने घर के पास एक छोटी-सी दुकान शुरू करवाई, जिसे रवि बैठकर चला सके।

     

    धीरे-धीरे उसका जीवन फिर से संभलने लगा।

     

    अब हर साल रक्षाबंधन पर रवि अपनी बहन के घर सबसे पहले पहुँचता।

     

    एक दिन आरती ने हँसकर पूछा—

     

    “अब तो हर साल आओगे ना?”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    “अब अगर भगवान भी मुझे कहीं भेजेंगे ना, तो मैं पहले तुझसे पूछकर जाऊँगा।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    फिर रवि ने बहन की कलाई पर एक छोटी-सी चाँदी की राखी बाँधी।

     

    “आज भाई की तरफ से भी राखी।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “भाई बहन को राखी बाँधता है?”

     

    रवि बोला—

     

    “जब बहन भाई का इंतजार करके भी रिश्ता नहीं छोड़ती, तो भाई भी उसका साथ निभाने का वादा कर सकता है।”

     

    आरती की आँखों में आँसू आ गए।

     

    दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    सीख:

     

    मुश्किल परिस्थितियाँ इंसान को अपनों से दूर कर सकती हैं, लेकिन सच्चा रिश्ता दिल से कभी दूर नहीं होता। कभी किसी अपने को उसकी गरीबी, असफलता या मजबूरी के कारण गलत मत समझिए। हो सकता है वह आपसे दूर होकर भी हर पल आपको याद कर रहा हो। रिश्तों में सबसे जरूरी चीज पैसा नहीं, बल्कि विश्वास, इंतजार और अपनापन है।

  • बहन की फीस और भाई की कलाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    एक छोटे से गाँव में राजेश और उसकी छोटी बहन पूजा रहते थे। उनका घर मिट्टी का था और घर के सामने एक पुराना नीम का पेड़ था। पिता की मृत्यु के बाद माँ ही किसी तरह दोनों बच्चों का पालन-पोषण कर रही थीं।

     

    माँ गाँव के लोगों के खेतों में मजदूरी करती थीं। राजेश भी स्कूल के बाद खेतों में काम करने चला जाता था।

     

    पूजा पढ़ाई में बहुत तेज थी। उसकी इच्छा थी कि वह बड़ी होकर अध्यापिका बने और गाँव के गरीब बच्चों को पढ़ाए।

     

    राजेश हमेशा उसकी पढ़ाई को लेकर बहुत गंभीर रहता था।

     

    एक दिन स्कूल से लौटकर पूजा चुपचाप बैठी थी।

     

    राजेश ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    पूजा ने अपनी किताब बंद कर दी।

     

    “भैया, स्कूल की फीस जमा करनी है।”

     

    “तो कर देंगे।”

     

    “कब?”

     

    राजेश कुछ पल चुप रहा।

     

    उसकी जेब में सिर्फ तीस रुपये थे।

     

    फीस दो सौ रुपये थी।

     

    पूजा बोली—

     

    “अगर पैसे नहीं हैं तो मैं अगले महीने से स्कूल नहीं जाऊँगी।”

     

    राजेश ने उसकी बात सुनते ही कहा—

     

    “तू स्कूल जाएगी। चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।”

     

    अगले दिन से राजेश ने खेतों के साथ-साथ रात में भी मजदूरी शुरू कर दी।

     

    दिनभर खेत में काम करने के बाद वह गाँव की अनाज मंडी में बोरे उठाता।

     

    उसका शरीर थक जाता, लेकिन जब वह पूजा की किताबें देखता तो उसकी सारी थकान गायब हो जाती।

     

    कुछ दिनों बाद फीस जमा हो गई।

     

    पूजा को पता चला कि भैया ने रात-रात भर काम किया है।

     

    उसने कहा—

     

    “भैया, मैं इतनी पढ़ाई नहीं करूँगी कि आपको इतना काम करना पड़े।”

     

    राजेश ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू जितना पढ़ना चाहती है, उतना पढ़। मेरे लिए इससे बड़ी खुशी कोई नहीं।”

     

    समय बीतता गया।

     

    पूजा दसवीं में पहुँची।

     

    उसकी परीक्षा में पूरे जिले में बहुत अच्छे अंक आए।

     

    स्कूल के प्रधानाचार्य ने कहा—

     

    “इस बच्ची में बहुत प्रतिभा है। इसे शहर में पढ़ाना चाहिए।”

     

    लेकिन शहर की पढ़ाई के लिए बहुत पैसे चाहिए थे।

     

    पूजा ने डरते हुए राजेश से कहा—

     

    “भैया, मैं गाँव में ही पढ़ लूँगी।”

     

    राजेश ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं।”

     

    राजेश मुस्कुराया।

     

    “पैसों की चिंता तू मत कर।”

     

    उसने यह बात तो कह दी, लेकिन रातभर सोचता रहा कि इतने पैसे आएँगे कहाँ से?

     

    अगले दिन उसने अपनी सबसे कीमती चीज बेचने का फैसला किया।

     

    वह चीज थी उसके पिता की पुरानी साइकिल।

     

    वही साइकिल जिसे उसके पिता ने मरने से कुछ महीने पहले राजेश को दी थी।

     

    राजेश उस साइकिल से बहुत जुड़ा हुआ था।

     

    लेकिन उसने उसे बेच दिया।

     

    साइकिल बेचकर मिले पैसों से पूजा की शहर की फीस जमा कर दी।

     

    जब पूजा को पता चला तो वह रो पड़ी।

     

    “भैया, आपने पिताजी की आखिरी निशानी भी बेच दी?”

     

    राजेश ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तेरी पढ़ाई से बड़ी कोई निशानी नहीं है।”

     

    पूजा शहर चली गई।

     

    राजेश गाँव में रहकर मजदूरी करता रहा।

     

    हर महीने वह अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा पूजा को भेज देता।

     

    कई बार उसके पास खुद खाने के पैसे नहीं होते, फिर भी वह बहन को कभी नहीं बताता।

     

    एक बार पूजा ने फोन किया—

     

    “भैया, मेरे कॉलेज में किताबों के लिए पैसे चाहिए।”

     

    राजेश ने कहा—

     

    “कल भेज दूँगा।”

     

    उस रात उसने अपना मोबाइल तक बेच दिया।

     

    अगले दिन पैसे पूजा के खाते में पहुँच गए।

     

    पूजा ने पूछा—

     

    “पैसे कहाँ से आए?”

     

    राजेश ने झूठ बोला—

     

    “कुछ ज्यादा मजदूरी मिल गई थी।”

     

    पूजा को कुछ पता नहीं था।

     

    फिर रक्षाबंधन आ गया।

     

    पूजा ने कहा—

     

    “भैया, इस बार मैं घर आ रही हूँ।”

     

    राजेश बहुत खुश हुआ।

     

    उसने बहन के लिए मिठाई खरीदने के लिए पैसे बचाने शुरू कर दिए।

     

    लेकिन रक्षाबंधन से दो दिन पहले राजेश काम करते हुए गिर गया।

     

    उसकी कमर में गंभीर चोट लगी।

     

    डॉक्टर ने आराम करने को कहा।

     

    पूजा को खबर मिली तो वह तुरंत गाँव आई।

     

    उसने भाई को चारपाई पर पड़े देखा तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “भैया…”

     

    राजेश मुस्कुराया।

     

    “तू आ गई?”

     

    “हाँ।”

     

    “पढ़ाई छोड़कर तो नहीं आई?”

     

    पूजा ने रोते हुए कहा—

     

    “आपको मेरी पढ़ाई की चिंता है और मैं आपको यहाँ छोड़कर शहर में बैठी थी।”

     

    राजेश ने कहा—

     

    “तेरी पढ़ाई मेरी जिम्मेदारी है।”

     

    पूजा उसके पास बैठ गई।

     

    उसने भाई की कलाई अपने हाथ में ली।

     

    “आज मैं आपको राखी बाँधूँगी।”

     

    राजेश मुस्कुराया।

     

    “इसमें रोने वाली क्या बात है?”

     

    पूजा ने राखी बाँधते हुए कहा—

     

    “क्योंकि आज मुझे पता चला कि मेरी हर किताब के पीछे आपकी मेहनत थी।”

     

    राजेश चुप हो गया।

     

    पूजा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपने मेरे लिए क्या-क्या नहीं किया।”

     

    राजेश बोला—

     

    “मैंने कुछ नहीं किया। तूने बस मेरे सपने को बड़ा कर दिया।”

     

    “कौन-सा सपना?”

     

    “मैं चाहता हूँ कि हमारे गाँव का कोई बच्चा सिर्फ गरीबी की वजह से पढ़ाई न छोड़े।”

     

    पूजा की आँखों में चमक आ गई।

     

    उसने कहा—

     

    “भैया, मैं आपका यह सपना जरूर पूरा करूँगी।”

     

    कुछ साल बाद पूजा सरकारी स्कूल में अध्यापिका बन गई।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आई।

     

    उसने राजेश के हाथ में एक लिफाफा रखा।

     

    राजेश ने पूछा—

     

    “क्या है?”

     

    पूजा बोली—

     

    “हमारे गाँव में गरीब बच्चों के लिए शाम की मुफ्त पाठशाला शुरू करने के लिए पैसे।”

     

    राजेश की आँखें भर आईं।

     

    “तूने मेरा सपना सच कर दिया।”

     

    पूजा मुस्कुराई।

     

    “नहीं भैया, आपने मेरी जिंदगी बदलकर मेरा सपना बनाया था। मैंने तो बस आपका सपना आगे बढ़ाया है।”

     

    उस दिन गाँव के नीम के पेड़ के नीचे पहली बार बच्चों की मुफ्त कक्षा लगी।

     

    राजेश दूर बैठा अपनी बहन को बच्चों को पढ़ाते हुए देख रहा था।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    पूजा ने बच्चों से कहा—

     

    “बच्चों, याद रखना… गरीबी पढ़ाई रोक सकती है, लेकिन मेहनत और हिम्मत के सामने ज्यादा देर नहीं टिक सकती।”

     

    फिर उसने दूर बैठे भाई की ओर देखा।

     

    राजेश मुस्कुरा रहा था।

     

    अगले रक्षाबंधन पर पूजा ने भाई की कलाई पर राखी बाँधी।

     

    इस बार उसने कोई महंगा उपहार नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ एक कागज राजेश के हाथ में रखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरे भाई के नाम—

    आपने मेरी फीस भरकर सिर्फ मेरी पढ़ाई नहीं बचाई थी, आपने मेरा भविष्य बचाया था।”

     

    राजेश ने कागज को सीने से लगा लिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    सीख:

     

    सच्चा प्यार वही है जिसमें इंसान अपने प्रिय के भविष्य के लिए अपनी वर्तमान खुशियों का त्याग कर दे। भाई का त्याग तभी सार्थक होता है जब बहन उसकी मेहनत की कद्र करे और आगे बढ़कर दूसरों के जीवन में भी रोशनी फैलाए। गरीबी रास्ता कठिन कर सकती है, लेकिन सपनों को खत्म नहीं कर सकती।

  • जिस भाई ने कभी राखी नहीं बँधवाई

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में सिया अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहती थी। उसके पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।

     

    सिया लोगों के घरों में काम करके माँ का पेट पालती थी।

     

    उसका एक छोटा भाई था—राजू।

     

    राजू बचपन से ही बहुत चंचल था। अपनी बहन से बहुत प्यार करता था। जब भी सिया काम से लौटती, राजू दौड़कर उसके हाथ से सामान ले लेता और कहता—

     

    “दीदी, आज बहुत थक गई होगी।”

     

    सिया हँसकर कहती—

     

    “तू इतना बड़ा कब हो गया?”

     

    राजू मुस्कुराता—

     

    “जब से पिताजी नहीं हैं, तब से।”

     

    सिया की आँखें नम हो जातीं।

     

    वह राजू को अपने सीने से लगा लेती।

     

    रक्षाबंधन के दिन दोनों के घर में ज्यादा कुछ नहीं होता था।

     

    सिया एक साधारण-सी राखी खरीदती और राजू की कलाई पर बाँध देती।

     

    राजू बदले में उसे कभी टॉफी देता, कभी फूल।

     

    एक साल रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले राजू ने कहा—

     

    “दीदी, इस बार मैं आपको बहुत बड़ा तोहफा दूँगा।”

     

    सिया हँस पड़ी।

     

    “मेरे लिए तू ही सबसे बड़ा तोहफा है।”

     

    लेकिन कुछ दिनों बाद राजू अचानक घर से गायब हो गया।

     

    सिया ने पूरे गाँव में उसे खोजा।

     

    किसी ने कहा, “शायद शहर चला गया।”

     

    किसी ने कहा, “किसी के साथ काम करने गया होगा।”

     

    लेकिन किसी को सही पता नहीं था।

     

    सिया रोती हुई थाने पहुँची।

     

    वहाँ भी कोई मदद नहीं मिली।

     

    दिन बीतते गए।

     

    रक्षाबंधन आ गया।

     

    सिया ने एक राखी खरीदी और राजू की पुरानी तस्वीर के सामने रख दी।

     

    उसने तस्वीर से कहा—

     

    “तू जहाँ भी है, आज मैं तेरी कलाई पर राखी बाँध रही हूँ।”

     

    उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।

     

    उस दिन के बाद हर रक्षाबंधन पर सिया एक राखी खरीदती।

     

    लेकिन वह राखी कभी किसी भाई की कलाई तक नहीं पहुँचती।

     

    साल गुजरते गए।

     

    सिया की शादी हो गई।

     

    वह दूसरे गाँव चली गई।

     

    फिर भी हर रक्षाबंधन पर वह राजू को याद करती।

     

    उसने कभी उसे मृत नहीं माना।

     

    उसे विश्वास था कि उसका भाई कहीं न कहीं जरूर जीवित है।

     

    एक दिन उसे डाक से एक पत्र मिला।

     

    पत्र पर नाम लिखा था—

     

    “सिया दीदी के नाम।”

     

    सिया के हाथ काँपने लगे।

     

    पत्र के अंदर लिखा था—

     

    “दीदी, मुझे माफ कर देना।”

     

    सिया की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    पत्र राजू का था।

     

    उसने लिखा था कि जिस साल वह घर से गया था, उस साल माँ की बीमारी बहुत बढ़ गई थी।

     

    राजू ने सोचा कि अगर वह शहर जाकर पैसे कमाएगा तो माँ का इलाज हो सकेगा।

     

    वह एक फैक्ट्री में काम करने चला गया था।

     

    लेकिन वहाँ उसके साथ धोखा हुआ।

     

    उसे कई महीनों तक मजदूरी नहीं मिली।

     

    फिर एक दुर्घटना में उसका हाथ घायल हो गया।

     

    उसने घर लौटने की बहुत कोशिश की, लेकिन शर्म के कारण नहीं आ पाया।

     

    उसे लगता था कि वह अपनी बहन और माँ के लिए कुछ नहीं कर पाया।

     

    पत्र के अंत में उसने लिखा था—

     

    “दीदी, मैं हर रक्षाबंधन पर अपनी कलाई देखता हूँ। मुझे लगता है जैसे आपकी राखी अभी भी बंधी हुई है।”

     

    सिया फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसने तुरंत राजू को खोजने की कोशिश शुरू की।

     

    कई महीनों की तलाश के बाद उसे शहर के एक छोटे-से कारखाने में राजू के बारे में पता चला।

     

    राजू वहीं मजदूरी कर रहा था।

     

    सिया उसे देखकर पहचान नहीं पाई।

     

    वह बहुत दुबला हो गया था।

     

    बाल सफेद होने लगे थे।

     

    एक हाथ पर चोट का निशान था।

     

    लेकिन जैसे ही उसने कहा—

     

    “राजू…”

     

    वह तुरंत पलट गया।

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर राजू दौड़कर बहन के पैरों में गिर पड़ा।

     

    “दीदी, मुझे माफ कर दो।”

     

    सिया ने उसे उठाकर गले लगा लिया।

     

    “पागल… भाई अपनी बहन से माफी माँगता है?”

     

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

     

    सिया ने अपने बैग से एक राखी निकाली।

     

    वह वही राखी थी जो उसने पिछले रक्षाबंधन पर राजू की तस्वीर के सामने रखी थी।

     

    उसने राजू की कलाई पकड़ ली।

     

    “इस बार ये राखी सच में तेरी कलाई पर बाँधूँगी।”

     

    राजू रोते हुए बोला—

     

    “दीदी, मुझे लगा था कि आप मुझे भूल गई होंगी।”

     

    सिया ने कहा—

     

    “माँ अपने बच्चे को भूल सकती है क्या? तू मेरा भाई है।”

     

    राजू ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं बहुत गरीब हो गया हूँ दीदी।”

     

    सिया ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “पैसा गरीब बनाता है, रिश्ता नहीं।”

     

    उस दिन सिया उसे अपने घर ले आई।

     

    दोनों ने मिलकर माँ की पुरानी तस्वीर के सामने दीपक जलाया।

     

    माँ अब इस दुनिया में नहीं थीं।

     

    लेकिन सिया को लगा जैसे माँ उन्हें देखकर मुस्कुरा रही हों।

     

    राजू ने अपनी बहन से कहा—

     

    “दीदी, मैंने इतने साल आपसे दूर रहकर एक बात समझी है।”

     

    “क्या?”

     

    “दुनिया में पैसा कमाना आसान है, लेकिन अपना इंसान खो देना सबसे बड़ा नुकसान है।”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    राजू ने बहन का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “अब जिंदगी भर आपकी राखी मेरी कलाई पर रहेगी।”

     

    उसके बाद हर रक्षाबंधन पर सिया अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती।

     

    राखी साधारण होती।

     

    मिठाई भी कभी-कभी कम होती।

     

    लेकिन दोनों के चेहरों पर ऐसी खुशी होती जैसे उन्हें दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो।

     

    सीख:

     

    कभी-कभी इंसान गरीबी या परिस्थितियों से हारकर अपनों से दूर चला जाता है, लेकिन सच्चे रिश्ते दूरी से खत्म नहीं होते। भाई-बहन का प्यार वह रिश्ता है जो वर्षों की दूरी के बाद भी दिल में जिंदा रहता है। इसलिए मुश्किल समय में अपनों से दूर भागने के बजाय उनसे अपनी परेशानी साझा करनी चाहिए। अपने लोग हमारी कमजोरी नहीं, हमारी सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

  • फटी हुई राखी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    नंदिनी और उसका बड़ा भाई दीपक शहर की एक झुग्गी बस्ती में रहते थे। उनके पिता रिक्शा चलाते थे, लेकिन एक दुर्घटना के बाद उनका पैर खराब हो गया था। माँ घरों में काम करती थीं।

     

    घर में पैसे इतने कम थे कि कई बार रात का खाना भी नहीं बनता था।

     

    दीपक सिर्फ सत्रह साल का था, लेकिन उसने पढ़ाई छोड़कर एक गैराज में काम करना शुरू कर दिया था।

     

    नंदिनी अभी स्कूल में पढ़ती थी।

     

    दीपक का सपना था कि उसकी बहन खूब पढ़े और एक दिन अपने पैरों पर खड़ी हो।

     

    वह रोज गैराज में घंटों काम करता।

     

    हाथों पर तेल लगा रहता।

     

    कपड़े हमेशा मैले रहते।

     

    लेकिन जब वह घर आता और नंदिनी को किताब लेकर बैठा देखता, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।

     

    एक दिन नंदिनी ने कहा—

     

    “भैया, आपकी तबीयत खराब है। आज काम पर मत जाइए।”

     

    दीपक हँसा।

     

    “अगर मैं नहीं जाऊँगा तो तेरी किताबें कौन खरीदेगा?”

     

    नंदिनी चुप हो गई।

     

    उसने भाई के हाथों को देखा।

     

    हाथों पर जगह-जगह कटे के निशान थे।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “भैया, मैं पढ़ाई छोड़ देती हूँ।”

     

    दीपक ने तुरंत उसकी किताब बंद कर दी।

     

    “ये बात दोबारा मत कहना।”

     

    “लेकिन…”

     

    “तू पढ़ेगी। मेरी जिंदगी में अगर कोई सपना बचा है तो वह तू है।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    उसके पास राखी खरीदने के पैसे नहीं थे।

     

    उसने माँ से कहा—

     

    “माँ, मुझे थोड़े पैसे दे दो।”

     

    माँ ने खाली डिब्बा दिखा दिया।

     

    “बेटी, इस बार घर में कुछ नहीं है।”

     

    नंदिनी उदास हो गई।

     

    अगले दिन उसने अपनी पुरानी स्कूल ड्रेस का लाल धागा निकाला।

     

    उसने एक छोटे कपड़े के टुकड़े को मोड़कर राखी बना ली।

     

    बीच में उसने अपनी पुरानी पेंसिल की लाल रबर का छोटा टुकड़ा लगा दिया।

     

    राखी थोड़ी टेढ़ी थी।

     

    धागा भी जगह-जगह से उधड़ा हुआ था।

     

    लेकिन नंदिनी के लिए वह दुनिया की सबसे सुंदर राखी थी।

     

    रक्षाबंधन की सुबह दीपक काम पर जाने लगा।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “आज काम पर मत जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “आज मेरी राखी है।”

     

    दीपक मुस्कुराया।

     

    “अच्छा! तो जल्दी बाँध।”

     

    नंदिनी ने राखी बाँधी।

     

    दीपक ने अपनी जेब टटोली।

     

    उसके पास सिर्फ बीस रुपये थे।

     

    उसने बीस रुपये बहन के हाथ में रख दिए।

     

    नंदिनी ने तुरंत वापस कर दिए।

     

    “मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

     

    “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस एक वादा।”

     

    “बोल।”

     

    “आप कभी मुझे अकेला मत छोड़ना।”

     

    दीपक की आँखें भर आईं।

     

    उसने कहा—

     

    “जब तक मेरी साँस है, तू अकेली नहीं है।”

     

    कुछ दिनों बाद गैराज में काम करते हुए दीपक का हाथ मशीन में फँस गया।

     

    उसे अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने कहा कि हाथ में गंभीर चोट है और कुछ समय तक वह काम नहीं कर पाएगा।

     

    घर की आमदनी बंद हो गई।

     

    नंदिनी ने स्कूल के बाद घरों में काम करना शुरू कर दिया।

     

    दीपक को बहुत दुख हुआ।

     

    “मैंने तुझे पढ़ाने का वादा किया था।”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “आपने वादा तोड़ा नहीं है भैया। बस अब मैं भी आपका हाथ बँटा रही हूँ।”

     

    धीरे-धीरे दीपक ठीक होने लगा।

     

    लेकिन उसके हाथ में पहले जैसी ताकत नहीं रही।

     

    गैराज के मालिक ने उसे काम से निकाल दिया।

     

    दीपक टूट गया।

     

    एक रात उसने नंदिनी से कहा—

     

    “शायद अब मैं तुझे पढ़ा नहीं पाऊँगा।”

     

    नंदिनी ने उसकी हथेली पकड़ ली।

     

    “भैया, आपने मुझे किताबें नहीं दीं। आपने मुझे हिम्मत दी है। मैं खुद पढ़ूँगी।”

     

    उस दिन से नंदिनी ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

     

    वह स्कूल जाती, शाम को काम करती और रात में पढ़ाई करती।

     

    कई साल बाद उसने प्रतियोगी परीक्षा पास कर ली।

     

    उसे सरकारी नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह लेकर वह घर आई।

     

    उसने दीपक के सामने एक डिब्बा रखा।

     

    दीपक ने खोला।

     

    अंदर एक सुंदर घड़ी थी।

     

    “ये क्या है?”

     

    नंदिनी बोली—

     

    “आपके लिए।”

     

    दीपक ने घड़ी पहनने से मना कर दिया।

     

    “इतना महंगा सामान क्यों खरीदा?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि आपने मेरी जिंदगी का समय बदल दिया।”

     

    दीपक की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसी समय नंदिनी ने अपनी अलमारी से एक पुरानी चीज निकाली।

     

    वह वही फटी हुई राखी थी।

     

    दीपक ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    “तूने इसे संभालकर रखा?”

     

    नंदिनी बोली—

     

    “ये राखी नहीं है भैया। इसमें मेरा पूरा बचपन बंधा है।”

     

    दीपक ने काँपते हाथों से राखी को छुआ।

     

    उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    “मैंने तो सोचा था कि मैं तेरा भविष्य नहीं बना पाया।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “आपने बनाया है भैया। अगर उस दिन आप मुझे पढ़ने के लिए मजबूर नहीं करते, तो मैं आज यहाँ नहीं होती।”

     

    अगले रक्षाबंधन पर नंदिनी ने फिर भाई की कलाई पर राखी बाँधी।

     

    इस बार राखी बहुत सुंदर थी।

     

    लेकिन दीपक की नजर उसी पुरानी फटी राखी पर थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरे लिए सबसे कीमती राखी यही है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    दीपक ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि इसी ने मुझे याद दिलाया था कि गरीब आदमी के पास पैसा कम हो सकता है, लेकिन प्यार कभी कम नहीं होना चाहिए।”

     

    दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगे।

     

    उनकी झुग्गी वही थी।

     

    गरीबी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।

     

    लेकिन उस छोटे-से घर में अब उम्मीद बहुत बड़ी थी।

     

    सीख:

     

    रिश्तों की कीमत उनकी चमक से नहीं होती। एक फटी हुई राखी भी करोड़ों की दौलत से ज्यादा कीमती हो सकती है, अगर उसमें सच्चा प्यार और त्याग बंधा हो। जिंदगी में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने प्रियजनों का साथ और हिम्मत कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

  • दो रोटियाँ और एक राखी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    गाँव के आखिरी छोर पर एक टूटी-सी झोपड़ी थी। बरसात में जिसकी छत टपकती थी और गर्मियों में जिसके अंदर बैठना भी मुश्किल हो जाता था। उसी झोपड़ी में सोलह साल की मीरा और उसका छोटा भाई सोनू रहते थे।

     

    माँ-बाप दोनों को गुजरे कई साल हो चुके थे। रिश्तेदारों ने कुछ दिनों तक सहारा दिया, फिर सब अपने-अपने घर चले गए।

     

    मीरा ने तभी तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपने भाई को कभी अकेला नहीं छोड़ेगी।

     

    सुबह होते ही मीरा गाँव के बड़े घरों में बर्तन माँजने निकल जाती। बदले में कभी उसे पैसे मिलते, कभी बची हुई रोटियाँ।

     

    सोनू भी खाली नहीं बैठता था। वह गाँव की सब्जी मंडी में बोरे उठाता और जो थोड़े पैसे मिलते, उन्हें अपनी बहन के हाथ पर रख देता।

     

    एक दिन मीरा ने कहा—

     

    “सोनू, तू अभी छोटा है। इतना काम मत किया कर।”

     

    सोनू हँसकर बोला—

     

    “और आप अकेले काम करेंगी तो मुझे अच्छा लगेगा?”

     

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू बस पढ़ाई कर। मैं चाहती हूँ तू बड़ा आदमी बने।”

     

    सोनू बोला—

     

    “मैं बड़ा आदमी नहीं बनना चाहता।”

     

    “तो क्या बनना चाहता है?”

     

    “आपका सहारा।”

     

    मीरा कुछ नहीं बोल पाई।

     

    उसने सोनू को सीने से लगा लिया।

     

    उनके पास गरीबी बहुत थी, लेकिन प्यार की कोई कमी नहीं थी।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    गाँव के बाजार में राखियों की दुकानें सज गई थीं।

     

    सोनू अपनी बहन के लिए राखी खरीदना चाहता था।

     

    उसने कई दिनों तक पैसे बचाए थे।

     

    एक दिन वह बाजार गया।

     

    एक सुंदर-सी राखी उसे पसंद आई।

     

    दुकानदार ने कहा—

     

    “दस रुपये की है।”

     

    सोनू ने अपनी जेब टटोली।

     

    उसके पास सिर्फ आठ रुपये थे।

     

    वह उदास होकर दुकान से लौट आया।

     

    घर पहुँचकर मीरा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “मुझसे झूठ मत बोल।”

     

    सोनू ने धीरे से कहा—

     

    “आपके लिए राखी खरीदना चाहता था, लेकिन पैसे कम पड़ गए।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “मेरे लिए राखी की जरूरत नहीं है।”

     

    सोनू बोला—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तू मेरे लिए ही तो सबसे कीमती है।”

     

    सोनू ने कहा—

     

    “लेकिन राखी तो बाँधनी पड़ेगी।”

     

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा—

     

    “ठीक है, इस बार मैं खुद बना लूँगी।”

     

    उस रात मीरा ने अपनी पुरानी लाल चुनरी का एक टुकड़ा निकाला।

     

    उसने उसे धागे में बाँधा और बीच में गेहूँ का एक छोटा-सा दाना चिपका दिया।

     

    सोनू ने देखा तो हँस पड़ा।

     

    “ये कैसी राखी है?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “गरीबों की राखी।”

     

    सोनू ने राखी को हाथ में लिया।

     

    “नहीं दीदी, ये सबसे अमीर राखी है।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    लेकिन अगले दिन घर में खाने के लिए कुछ नहीं था।

     

    दोनों सुबह से भूखे थे।

     

    शाम को मीरा को एक घर से दो रोटियाँ मिलीं।

     

    वह रोटियाँ लेकर झोपड़ी में आई।

     

    सोनू की आँखें चमक उठीं।

     

    “दीदी, आज तो दावत है।”

     

    मीरा हँस पड़ी।

     

    “हाँ, आज दावत है।”

     

    उसने एक रोटी सोनू को दी और दूसरी खुद रख ली।

     

    सोनू ने अपनी रोटी का आधा हिस्सा तोड़कर मीरा की तरफ बढ़ाया।

     

    “आप भी खाओ।”

     

    “नहीं, मुझे भूख नहीं है।”

     

    “झूठ।”

     

    “सच कह रही हूँ।”

     

    सोनू बोला—

     

    “आप हमेशा झूठ बोलती हो जब खाना कम होता है।”

     

    मीरा चुप हो गई।

     

    उसकी आँखें भर आईं।

     

    सोनू ने रोटी का आधा टुकड़ा उसकी हथेली पर रख दिया।

     

    “आपने मुझे माँ की तरह पाला है। अब मुझे भी आपका ख्याल रखने दो।”

     

    मीरा रोते हुए रोटी खाने लगी।

     

    उस रात दोनों ने पहली बार महसूस किया कि गरीबी पेट को भूखा रख सकती है, लेकिन दिल को गरीब नहीं बना सकती।

     

    रक्षाबंधन का दिन आ गया।

     

    सुबह मीरा ने सोनू को नहलाया।

     

    घर में मिठाई नहीं थी।

     

    उसने गुड़ का छोटा-सा टुकड़ा पानी में घोलकर उसे मीठा पानी पिला दिया।

     

    फिर सोनू के सामने बैठकर उसकी कलाई पर वही राखी बाँध दी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “भगवान से बस यही चाहती हूँ कि तू हमेशा खुश रहे।”

     

    सोनू ने पूछा—

     

    “और आप?”

     

    “मेरी खुशी तो तू है।”

     

    सोनू ने बहन के पैर छुए।

     

    फिर अपनी जेब से कुछ निकाला।

     

    वह पाँच रुपये थे।

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “ये क्या है?”

     

    “आपके लिए।”

     

    “मेरे पास तो सब कुछ है।”

     

    “क्या?”

     

    “तू।”

     

    सोनू मुस्कुराया।

     

    दोनों गले लग गए।

     

    कुछ महीने बाद गाँव में भयंकर बाढ़ आ गई।

     

    नदी का पानी धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ने लगा।

     

    लोग अपने घर छोड़कर ऊँची जगहों पर जाने लगे।

     

    मीरा ने सोनू का हाथ पकड़ा और बोली—

     

    “चल, हमें भी निकलना होगा।”

     

    लेकिन सोनू का पैर कीचड़ में फिसल गया।

     

    वह पानी में गिर पड़ा।

     

    मीरा बिना सोचे पानी में कूद गई।

     

    उसने सोनू को पकड़ लिया।

     

    पानी का बहाव बहुत तेज था।

     

    मीरा ने पूरी ताकत लगाकर भाई को किनारे की ओर धकेला।

     

    “सोनू! भाग!”

     

    सोनू रोते हुए बोला—

     

    “दीदी, आप भी चलो!”

     

    मीरा ने उसे धक्का देकर सुरक्षित जगह पहुँचा दिया।

     

    लेकिन खुद पानी के तेज बहाव में बह गई।

     

    “दीदी!”

     

    सोनू चीखता रहा।

     

    गाँव के लोगों ने मीरा को खोजने की बहुत कोशिश की।

     

    कई घंटे बाद उसे नदी के किनारे बेहोश हालत में पाया गया।

     

    सोनू उसके पास बैठकर लगातार रो रहा था।

     

    “दीदी, आँखें खोलो…”

     

    कुछ देर बाद मीरा ने आँखें खोलीं।

     

    सोनू ने उसे गले लगा लिया।

     

    “आप मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    मीरा ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “पगले, तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँगी?”

     

    उस दिन सोनू ने मन ही मन फैसला किया कि अब वह अपनी बहन को कभी दुखी नहीं होने देगा।

     

    समय बीतता गया।

     

    सोनू ने पढ़ाई के साथ मेहनत भी की।

     

    वह बड़ा हुआ और शहर में नौकरी करने लगा।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आया।

     

    मीरा झोपड़ी के बाहर बैठी थी।

     

    सोनू ने उसके सामने एक नया घर बनाने के कागज रख दिए।

     

    मीरा हैरान रह गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    सोनू मुस्कुराया।

     

    “हमारा नया घर।”

     

    मीरा की आँखें भर आईं।

     

    “लेकिन इतने पैसे?”

     

    “आपने मुझे बचपन में दो रोटियाँ देकर बड़ा किया था। आज मेरी बारी है आपका पेट भरने की।”

     

    अगले रक्षाबंधन पर सोनू ने अपनी बहन के सामने एक बड़ी-सी मिठाई की दुकान से खरीदी हुई राखी रखी।

     

    मीरा ने उसे देखा और मुस्कुराकर पूछा—

     

    “इतनी महंगी राखी?”

     

    सोनू बोला—

     

    “नहीं दीदी। महंगी तो वह राखी थी जो आपने मेरी कलाई पर उस दिन बाँधी थी।”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “वह?”

     

    सोनू ने अपनी जेब से वही पुरानी, सूखी और थोड़ी-सी टूटी राखी निकाली।

     

    “मैंने इसे आज तक संभालकर रखा है।”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    सोनू बोला—

     

    “उस राखी में आपका प्यार बंधा था। और वही प्यार मुझे आज यहाँ तक लेकर आया।”

     

    मीरा ने भाई की कलाई पर नई राखी बाँधी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।

     

    उस दिन उनके घर में बहुत सारी मिठाई थी।

     

    लेकिन दोनों ने सबसे पहले दो रोटियाँ बनाई।

     

    एक मीरा ने खाई।

     

    एक सोनू ने।

     

    क्योंकि उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत आज भी वही दो रोटियाँ थीं, जिनमें एक-दूसरे के लिए बचाया हुआ प्यार था।

     

    सीख:

     

    गरीबी इंसान से बहुत कुछ छीन सकती है, लेकिन सच्चा प्यार नहीं छीन सकती। भाई-बहन का रिश्ता तब और मजबूत हो जाता है जब दोनों अपनी जरूरत से पहले एक-दूसरे की जरूरत के बारे में सोचते हैं। जीवन में पैसा कम हो सकता है, लेकिन अगर घर में प्रेम और अपनापन है, तो इंसान कभी सच में गरीब नहीं होता।

  • बहन की राखी और भाई का अधूरा सपना

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    शहर से बहुत दूर एक छोटा-सा गाँव था, जहाँ कच्ची गलियों और मिट्टी के घरों के बीच एक गरीब परिवार रहता था। उस परिवार में सिर्फ दो भाई-बहन थे—अमन और उसकी छोटी बहन गुड़िया।

     

    अमन गुड़िया से पाँच साल बड़ा था। पिता के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी अमन के कंधों पर आ गई थी। माँ पहले ही बीमारी के कारण बिस्तर पर रहती थीं। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।

     

    अमन ने पढ़ाई छोड़ दी और गाँव के पास एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करने लगा।

     

    हर सुबह वह अँधेरे में उठता, सूखी रोटी पानी में भिगोकर खाता और काम पर निकल जाता।

     

    गुड़िया अक्सर दरवाजे पर खड़ी होकर उसे जाते हुए देखती।

     

    वह पूछती, “भैया, आप स्कूल क्यों नहीं जाते?”

     

    अमन मुस्कुराकर कहता, “मेरा स्कूल तो अब यही है।”

     

    गुड़िया समझ नहीं पाती थी।

     

    एक दिन उसने फिर पूछा, “आप बड़े होकर क्या बनना चाहते थे?”

     

    अमन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा, “डॉक्टर।”

     

    गुड़िया की आँखें चमक उठीं।

     

    “तो बनो ना भैया।”

     

    अमन ने उसकी ओर देखा और धीरे से बोला—

     

    “अब तू पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना। मेरा सपना तू पूरा करना।”

     

    गुड़िया ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके मन में भाई की बात बस गई।

     

    वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    स्कूल की फीस बहुत कम थी, फिर भी उनके लिए वह रकम बड़ी थी।

     

    कई बार अमन के पास घर का राशन खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे, लेकिन वह गुड़िया की फीस किसी न किसी तरह जमा कर देता।

     

    एक दिन गुड़िया ने देखा कि अमन के पैरों में चप्पल नहीं थी।

     

    उसने पूछा, “भैया, आपकी चप्पल कहाँ है?”

     

    अमन हँसकर बोला, “टूट गई थी।”

     

    “नई क्यों नहीं लेते?”

     

    “ले लूँगा।”

     

    लेकिन वह “ले लूँगा” कभी नहीं आया।

     

    अमन हर बार अपनी जरूरत से पहले गुड़िया की जरूरत पूरी करता।

     

    सर्दियों की रात में जब गुड़िया के पास गर्म कपड़े नहीं होते, अमन अपनी पुरानी चादर उसे दे देता।

     

    जब गुड़िया बीमार पड़ती, वह पूरी रात उसके सिरहाने बैठा रहता।

     

    और जब भी गुड़िया कहती—

     

    “भैया, आप बहुत अच्छे हो।”

     

    अमन बस इतना कहता—

     

    “तू खुश रह, बस यही मेरी कमाई है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    गुड़िया दसवीं कक्षा में पहुँच गई।

     

    स्कूल में उसका नाम जिले के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में आने लगा।

     

    अमन को उस पर बहुत गर्व था।

     

    लेकिन उसके मन में एक चिंता भी थी।

     

    गुड़िया की आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना जरूरी था।

     

    शहर में रहने, किताबों और कॉलेज की फीस के लिए बहुत पैसे चाहिए थे।

     

    एक शाम गुड़िया ने डरते हुए कहा—

     

    “भैया, अगर पैसे नहीं हैं तो मैं आगे नहीं पढ़ूँगी।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ऐसा दोबारा मत कहना।”

     

    “लेकिन भैया…”

     

    “तू पढ़ेगी। चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।”

     

    उस रात अमन देर तक घर नहीं आया।

     

    अगले दिन गुड़िया ने देखा कि अमन की आँखों के नीचे काले निशान थे।

     

    वह बोली, “भैया, आप रात में सोए नहीं?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “थोड़ा काम ज्यादा था।”

     

    असलियत यह थी कि अमन ने रात में भी मजदूरी शुरू कर दी थी।

     

    दिन में ईंट-भट्ठा और रात में ट्रक से सामान उतारने का काम।

     

    उसका शरीर टूट जाता, लेकिन बहन की पढ़ाई नहीं टूटने देता।

     

    कुछ महीनों बाद गुड़िया को शहर के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया।

     

    वह बहुत खुश थी।

     

    लेकिन उसी दिन उसने देखा कि अमन अपनी पुरानी साइकिल बेचकर उसके लिए किताबें खरीद रहा है।

     

    गुड़िया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “भैया, मेरी वजह से आपने अपनी साइकिल भी बेच दी?”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “साइकिल तो फिर आ जाएगी। तेरी जिंदगी में मौका बार-बार नहीं आएगा।”

     

    रक्षाबंधन नजदीक था।

     

    गुड़िया शहर में थी और अमन गाँव में।

     

    गुड़िया ने फोन किया—

     

    “भैया, मैं इस बार राखी बाँधने जरूर आऊँगी।”

     

    अमन बोला—

     

    “नहीं, तू अपनी पढ़ाई कर। मैं समझ जाऊँगा।”

     

    “नहीं भैया। राखी तो मैं आपके हाथ पर ही बाँधूँगी।”

     

    लेकिन रक्षाबंधन से एक दिन पहले गुड़िया के कॉलेज में परीक्षा थी।

     

    वह चाहकर भी घर नहीं आ सकी।

     

    उसने फोन किया।

     

    “भैया, मुझे माफ कर दो। मैं इस बार नहीं आ पाऊँगी।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “पगली, परीक्षा ज्यादा जरूरी है। मेरी राखी अगले साल बाँध देना।”

     

    गुड़िया रोने लगी।

     

    “आप नाराज तो नहीं हो?”

     

    “तुझसे कभी नाराज हो सकता हूँ क्या?”

     

    फोन कट गया।

     

    अमन ने अपनी आँखें पोंछ लीं।

     

    उस रात उसने अकेले चूल्हा जलाया।

     

    एक सूखी रोटी बनाई और सामने रखी अपनी बहन की पुरानी तस्वीर देखकर बोला—

     

    “तू बस पढ़ती रह गुड़िया। मेरा सपना पूरा कर देना।”

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    गुड़िया ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया।

     

    वह डॉक्टर बनने की राह पर थी।

     

    अमन के चेहरे पर गर्व था।

     

    लेकिन उसका शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा था।

     

    लगातार मेहनत ने उसकी सेहत खराब कर दी थी।

     

    एक दिन काम करते समय वह बेहोश होकर गिर पड़ा।

     

    उसे अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने बताया कि उसे आराम की सख्त जरूरत है।

     

    गुड़िया को खबर मिली तो वह तुरंत गाँव आई।

     

    अपने भाई को अस्पताल के बिस्तर पर देखकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “भैया…”

     

    अमन ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “तू आ गई?”

     

    “हाँ।”

     

    “पढ़ाई छोड़कर तो नहीं आई?”

     

    गुड़िया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी पढ़ाई से ज्यादा जरूरी आप हो।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “नहीं। तू डॉक्टर बनेगी। यही मेरा सपना है।”

     

    गुड़िया ने उसका हाथ अपने माथे से लगा लिया।

     

    उसने रोते हुए कहा—

     

    “भैया, मैं डॉक्टर बनूँगी। लेकिन सबसे पहले आपका इलाज करूँगी।”

     

    कुछ दिनों बाद अमन की हालत सुधरने लगी।

     

    गुड़िया वापस शहर चली गई।

     

    उसने दिन-रात मेहनत की।

     

    आखिरकार वह डॉक्टर बन गई।

     

    जब वह पहली बार डॉक्टर का सफेद कोट पहनकर गाँव लौटी, तो अमन दरवाजे पर खड़ा था।

     

    गुड़िया ने दूर से ही उसे देखा और दौड़कर गले लग गई।

     

    “भैया… आपका सपना पूरा हो गया।”

     

    अमन की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “नहीं गुड़िया… मेरा सपना नहीं। तू मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी बन गई।”

     

    फिर गुड़िया ने अपनी जेब से एक राखी निकाली।

     

    उसने अमन की कलाई पर राखी बाँधी और बोली—

     

    “ये सिर्फ राखी नहीं है भैया। ये उस भाई के लिए है जिसने अपना सपना छोड़कर मेरी जिंदगी बना दी।”

     

    अमन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब तू उन गरीब बच्चों का इलाज करना जिनके पास पैसे नहीं हैं।”

     

    गुड़िया ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “वादा है भैया।”

     

    उस दिन दोनों की आँखों में आँसू थे।

     

    लेकिन उन आँसुओं में दर्द नहीं था।

     

    उनमें वर्षों के संघर्ष की जीत थी।

     

    सीख:—-सच्चा भाई वही है जो अपनी खुशियों और सपनों का त्याग करके बहन के भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश करे। रिश्तों की सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि त्याग और विश्वास है। अगर किसी अपने का सपना पूरा करने के लिए हमें अपनी कुछ इच्छाएँ छोड़नी पड़ें, तो वह त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

  • भाई की कलाई पर आखिरी राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में मिट्टी की दीवारों वाला एक छोटा-सा घर था। घर इतना गरीब था कि बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था और गर्मियों में मिट्टी की दीवारें भी तपने लगती थीं। उस घर में बारह साल की राधा और उसका छोटा भाई मोहन रहते थे।

     

    माँ को गुजरे पाँच साल हो चुके थे और पिता भी बीमारी के कारण दुनिया छोड़ चुके थे। अब दोनों भाई-बहन ही एक-दूसरे का सहारा थे।

     

    मोहन उम्र में राधा से दो साल छोटा था, लेकिन अपनी बहन का ख्याल बिल्कुल एक बड़े भाई की तरह रखता था।

     

    राधा गाँव के घरों में काम करके किसी तरह दोनों के लिए खाना जुटाती थी। कभी उसे दो रोटियाँ मिलतीं, कभी आधी रोटी से ही गुजारा करना पड़ता।

     

    मोहन गाँव के पास एक चाय की दुकान पर काम करता था। सुबह से शाम तक गिलास धोता, चाय पहुँचाता और बदले में उसे थोड़े-से पैसे मिलते।

     

    उनकी गरीबी बहुत थी, लेकिन दोनों के बीच प्यार उससे भी बड़ा था।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    गाँव की सभी लड़कियाँ बाजार से रंग-बिरंगी राखियाँ खरीद रही थीं। किसी की राखी पर मोती लगे थे, किसी पर चमकदार फूल।

     

    राधा भी बाजार के सामने से गुजरी।

     

    उसकी नजर एक सुंदर-सी लाल राखी पर जाकर रुक गई।

     

    दुकानदार ने कहा, “ले लो बिटिया, बहुत सुंदर है। सिर्फ बीस रुपये की है।”

     

    राधा ने अपनी मुट्ठी में दबे सिक्के देखे।

     

    उसके पास सिर्फ सात रुपये थे।

     

    वह मुस्कुराई और बोली, “अगली बार ले लूँगी।”

     

    दुकानदार ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।

     

    राधा घर लौट आई।

     

    मोहन ने पूछा, “दीदी, बाजार गई थीं?”

     

    “हाँ।”

     

    “मेरे लिए राखी लाई?”

     

    राधा ने मुस्कुराकर कहा, “तुम्हें कैसी राखी चाहिए?”

     

    मोहन हँसते हुए बोला, “ऐसी राखी जिसमें सबसे ज्यादा प्यार हो।”

     

    राधा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “फिर तो मैं तुम्हारे लिए दुनिया की सबसे अच्छी राखी बनाऊँगी।”

     

    रात को मोहन सो गया।

     

    राधा ने घर के कोने में रखे पुराने कपड़ों को देखा। उसने अपनी माँ की पुरानी लाल साड़ी का एक छोटा टुकड़ा निकाला।

     

    उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसे माँ की याद आ गई।

     

    माँ हर रक्षाबंधन पर मोहन की कलाई में राखी बाँधते हुए कहती थीं—

     

    “मेरे बेटे, अपनी बहन का हमेशा ख्याल रखना।”

     

    राधा ने साड़ी के उस टुकड़े को धीरे-धीरे काटा और उससे राखी बनाने लगी।

     

    उसने एक पुराने धागे में लाल कपड़ा बाँधा और बीच में अपनी टूटी हुई चूड़ी का छोटा-सा टुकड़ा लगा दिया।

     

    राखी सुंदर नहीं थी।

     

    लेकिन उसमें माँ की याद, बहन का प्यार और पूरे घर की भावनाएँ बंधी थीं।

     

    रक्षाबंधन की सुबह राधा ने मोहन को नहलाया।

     

    घर में मिठाई नहीं थी।

     

    उसने चूल्हे पर थोड़ा-सा गुड़ गर्म किया और आटे की छोटी-सी मीठी रोटी बना दी।

     

    मोहन ने पूछा, “दीदी, आज इतना अच्छा खाना?”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    “आज रक्षाबंधन है ना।”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    उसने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाले।

     

    “ये लो।”

     

    राधा ने पूछा, “कहाँ से आए?”

     

    मोहन बोला, “कल दुकान मालिक ने दिए थे।”

     

    “लेकिन तुमने अपने लिए कुछ नहीं खरीदा?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    मोहन ने हँसकर कहा—

     

    “मुझे क्या चाहिए? मेरी दीदी मेरे पास है, वही काफी है।”

     

    राधा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसने मोहन को अपने सामने बैठाया।

     

    उसकी कलाई पर वही लाल राखी बाँधी जो उसने माँ की साड़ी से बनाई थी।

     

    राखी बाँधते हुए राधा बोली—

     

    “भगवान से मेरी बस एक ही प्रार्थना है कि अगले जन्म में भी तू ही मेरा भाई बने।”

     

    मोहन ने तुरंत कहा—

     

    “और मैं हर जन्म में तेरा भाई बनूँगा।”

     

    दोनों गले लगकर रोने लगे।

     

    लेकिन उस दिन मोहन ने राधा से एक बात छिपाई थी।

     

    वह पिछले कई दिनों से बहुत बीमार था।

     

    चाय की दुकान पर काम करते समय उसे कई बार चक्कर आते थे। दुकान मालिक ने उसे आराम करने को कहा, लेकिन मोहन जानता था कि अगर वह काम नहीं करेगा तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा।

     

    रक्षाबंधन के दो दिन बाद मोहन अचानक दुकान पर बेहोश होकर गिर पड़ा।

     

    दुकानदार उसे अस्पताल ले गया।

     

    डॉक्टर ने बताया कि मोहन को गंभीर बीमारी है और इलाज के लिए बहुत पैसे चाहिए।

     

    यह सुनकर राधा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने गाँव के लोगों से मदद माँगी।

     

    किसी ने पाँच रुपये दिए, किसी ने दस।

     

    लेकिन इलाज के लिए पैसे बहुत कम थे।

     

    राधा ने अपनी माँ की बची हुई आखिरी निशानी—एक छोटी-सी चाँदी की पायल—बेच दी।

     

    फिर भी पैसे पूरे नहीं हुए।

     

    एक रात मोहन ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “दीदी…”

     

    “हाँ भाई?”

     

    “अगर मैं ठीक न हो पाया तो रोना मत।”

     

    राधा चिल्लाई—

     

    “ऐसा मत बोल!”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “तूने मुझे हमेशा कहा है ना कि भगवान पर भरोसा रखना चाहिए।”

     

    राधा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तू ठीक होगा। मैं भगवान से लड़कर भी तुझे वापस लाऊँगी।”

     

    अगले दिन गाँव के स्कूल के शिक्षक को यह बात पता चली। उन्होंने गाँव वालों को इकट्ठा किया।

     

    सभी ने मिलकर मोहन के इलाज के लिए पैसे जमा किए।

     

    आखिरकार मोहन का इलाज शुरू हुआ।

     

    कई दिनों बाद उसकी हालत सुधरने लगी।

     

    राधा अस्पताल के बाहर बैठकर भगवान का धन्यवाद कर रही थी।

     

    उसने अपनी कलाई देखी।

     

    उसे याद आया कि मोहन ने रक्षाबंधन पर उससे कहा था—

     

    “हर जन्म में तेरा भाई बनूँगा।”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    उसने आसमान की ओर देखकर कहा—

     

    “भगवान, मेरा भाई मुझे दे दिया… अब मैं कुछ नहीं माँगती।”

     

    कुछ महीनों बाद मोहन पूरी तरह ठीक हो गया।

     

    वह फिर से चाय की दुकान पर जाने लगा।

     

    लेकिन इस बार गाँव के शिक्षक ने उसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी भी ले ली।

     

    राधा को भी सिलाई का काम मिल गया।

     

    धीरे-धीरे दोनों की जिंदगी बदलने लगी।

     

    कई साल बीत गए।

     

    मोहन बड़ा होकर शहर में नौकरी करने लगा।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आया।

     

    उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा था।

     

    राधा ने पूछा, “इसमें क्या है?”

     

    मोहन ने डिब्बा खोला।

     

    उसमें एक सुंदर चाँदी की राखी थी।

     

    मोहन ने वह राखी राधा के हाथ में रख दी।

     

    “दीदी, उस साल तूने माँ की पुरानी साड़ी से मुझे राखी बाँधी थी। आज मैं चाहता हूँ कि तू मेरी तरफ से यह राखी रख ले।”

     

    राधा की आँखें भर आईं।

     

    मोहन ने कहा—

     

    “उस दिन तूने मेरी कलाई पर सिर्फ राखी नहीं बाँधी थी। तूने मुझे जीने की वजह दी थी।”

     

    राधा ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।

     

    वे उस प्यार के आँसू थे जिसने गरीबी को हरा दिया था।

     

    (सीख)

     

    भाई-बहन का रिश्ता धन-दौलत से नहीं, बल्कि प्यार, त्याग और विश्वास से मजबूत होता है। महंगी राखी या बड़े उपहार रिश्ते की कीमत तय नहीं करते। सच्चा प्यार वह है जो मुश्किल समय में बिना किसी स्वार्थ के एक-दूसरे का हाथ थामे रखे।