गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में सिया अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहती थी। उसके पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।
सिया लोगों के घरों में काम करके माँ का पेट पालती थी।
उसका एक छोटा भाई था—राजू।
राजू बचपन से ही बहुत चंचल था। अपनी बहन से बहुत प्यार करता था। जब भी सिया काम से लौटती, राजू दौड़कर उसके हाथ से सामान ले लेता और कहता—
“दीदी, आज बहुत थक गई होगी।”
सिया हँसकर कहती—
“तू इतना बड़ा कब हो गया?”
राजू मुस्कुराता—
“जब से पिताजी नहीं हैं, तब से।”
सिया की आँखें नम हो जातीं।
वह राजू को अपने सीने से लगा लेती।
रक्षाबंधन के दिन दोनों के घर में ज्यादा कुछ नहीं होता था।
सिया एक साधारण-सी राखी खरीदती और राजू की कलाई पर बाँध देती।
राजू बदले में उसे कभी टॉफी देता, कभी फूल।
एक साल रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले राजू ने कहा—
“दीदी, इस बार मैं आपको बहुत बड़ा तोहफा दूँगा।”
सिया हँस पड़ी।
“मेरे लिए तू ही सबसे बड़ा तोहफा है।”
लेकिन कुछ दिनों बाद राजू अचानक घर से गायब हो गया।
सिया ने पूरे गाँव में उसे खोजा।
किसी ने कहा, “शायद शहर चला गया।”
किसी ने कहा, “किसी के साथ काम करने गया होगा।”
लेकिन किसी को सही पता नहीं था।
सिया रोती हुई थाने पहुँची।
वहाँ भी कोई मदद नहीं मिली।
दिन बीतते गए।
रक्षाबंधन आ गया।
सिया ने एक राखी खरीदी और राजू की पुरानी तस्वीर के सामने रख दी।
उसने तस्वीर से कहा—
“तू जहाँ भी है, आज मैं तेरी कलाई पर राखी बाँध रही हूँ।”
उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।
उस दिन के बाद हर रक्षाबंधन पर सिया एक राखी खरीदती।
लेकिन वह राखी कभी किसी भाई की कलाई तक नहीं पहुँचती।
साल गुजरते गए।
सिया की शादी हो गई।
वह दूसरे गाँव चली गई।
फिर भी हर रक्षाबंधन पर वह राजू को याद करती।
उसने कभी उसे मृत नहीं माना।
उसे विश्वास था कि उसका भाई कहीं न कहीं जरूर जीवित है।
एक दिन उसे डाक से एक पत्र मिला।
पत्र पर नाम लिखा था—
“सिया दीदी के नाम।”
सिया के हाथ काँपने लगे।
पत्र के अंदर लिखा था—
“दीदी, मुझे माफ कर देना।”
सिया की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
पत्र राजू का था।
उसने लिखा था कि जिस साल वह घर से गया था, उस साल माँ की बीमारी बहुत बढ़ गई थी।
राजू ने सोचा कि अगर वह शहर जाकर पैसे कमाएगा तो माँ का इलाज हो सकेगा।
वह एक फैक्ट्री में काम करने चला गया था।
लेकिन वहाँ उसके साथ धोखा हुआ।
उसे कई महीनों तक मजदूरी नहीं मिली।
फिर एक दुर्घटना में उसका हाथ घायल हो गया।
उसने घर लौटने की बहुत कोशिश की, लेकिन शर्म के कारण नहीं आ पाया।
उसे लगता था कि वह अपनी बहन और माँ के लिए कुछ नहीं कर पाया।
पत्र के अंत में उसने लिखा था—
“दीदी, मैं हर रक्षाबंधन पर अपनी कलाई देखता हूँ। मुझे लगता है जैसे आपकी राखी अभी भी बंधी हुई है।”
सिया फूट-फूटकर रोने लगी।
उसने तुरंत राजू को खोजने की कोशिश शुरू की।
कई महीनों की तलाश के बाद उसे शहर के एक छोटे-से कारखाने में राजू के बारे में पता चला।
राजू वहीं मजदूरी कर रहा था।
सिया उसे देखकर पहचान नहीं पाई।
वह बहुत दुबला हो गया था।
बाल सफेद होने लगे थे।
एक हाथ पर चोट का निशान था।
लेकिन जैसे ही उसने कहा—
“राजू…”
वह तुरंत पलट गया।
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर राजू दौड़कर बहन के पैरों में गिर पड़ा।
“दीदी, मुझे माफ कर दो।”
सिया ने उसे उठाकर गले लगा लिया।
“पागल… भाई अपनी बहन से माफी माँगता है?”
दोनों बहुत देर तक रोते रहे।
सिया ने अपने बैग से एक राखी निकाली।
वह वही राखी थी जो उसने पिछले रक्षाबंधन पर राजू की तस्वीर के सामने रखी थी।
उसने राजू की कलाई पकड़ ली।
“इस बार ये राखी सच में तेरी कलाई पर बाँधूँगी।”
राजू रोते हुए बोला—
“दीदी, मुझे लगा था कि आप मुझे भूल गई होंगी।”
सिया ने कहा—
“माँ अपने बच्चे को भूल सकती है क्या? तू मेरा भाई है।”
राजू ने सिर झुका लिया।
“मैं बहुत गरीब हो गया हूँ दीदी।”
सिया ने उसके आँसू पोंछे।
“पैसा गरीब बनाता है, रिश्ता नहीं।”
उस दिन सिया उसे अपने घर ले आई।
दोनों ने मिलकर माँ की पुरानी तस्वीर के सामने दीपक जलाया।
माँ अब इस दुनिया में नहीं थीं।
लेकिन सिया को लगा जैसे माँ उन्हें देखकर मुस्कुरा रही हों।
राजू ने अपनी बहन से कहा—
“दीदी, मैंने इतने साल आपसे दूर रहकर एक बात समझी है।”
“क्या?”
“दुनिया में पैसा कमाना आसान है, लेकिन अपना इंसान खो देना सबसे बड़ा नुकसान है।”
सिया मुस्कुराई।
“अब कहीं मत जाना।”
राजू ने बहन का हाथ पकड़कर कहा—
“अब जिंदगी भर आपकी राखी मेरी कलाई पर रहेगी।”
उसके बाद हर रक्षाबंधन पर सिया अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती।
राखी साधारण होती।
मिठाई भी कभी-कभी कम होती।
लेकिन दोनों के चेहरों पर ऐसी खुशी होती जैसे उन्हें दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो।
सीख:
कभी-कभी इंसान गरीबी या परिस्थितियों से हारकर अपनों से दूर चला जाता है, लेकिन सच्चे रिश्ते दूरी से खत्म नहीं होते। भाई-बहन का प्यार वह रिश्ता है जो वर्षों की दूरी के बाद भी दिल में जिंदा रहता है। इसलिए मुश्किल समय में अपनों से दूर भागने के बजाय उनसे अपनी परेशानी साझा करनी चाहिए। अपने लोग हमारी कमजोरी नहीं, हमारी सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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