अध्याय 2 — गुरुकुल के दिन और मित्रता की पहली परीक्षा
गुरुकुल में कृष्ण और सुदामा की मित्रता दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही थी।
अब ऐसा शायद ही कोई दिन गुजरता, जब दोनों एक साथ न दिखाई दें। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना हो, नदी से जल भरकर लाना हो, आश्रम की सफाई करनी हो या गुरु सांदीपनि के सामने बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी हो—दोनों हर काम साथ करते थे।
हालाँकि दोनों के स्वभाव बिल्कुल अलग थे।
सुदामा शांत और गंभीर था। वह हर बात को सोच-समझकर करता था। उसे नियमों का पालन करना पसंद था। दूसरी ओर कृष्ण हर काम में मुस्कान ढूँढ लेते थे। उनके भीतर एक अलग ही चंचलता थी। लेकिन जब बात किसी अपने की आती, तो वही चंचल कृष्ण सबसे अधिक गंभीर हो जाते थे।
एक सुबह सुदामा नदी से जल भरकर लौट रहा था। उसके हाथ में मिट्टी का घड़ा था। रास्ता थोड़ा फिसलन भरा था। अचानक उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह संभलते-संभलते जमीन पर गिर गया।
घड़ा उसके हाथ से छूटकर टूट गया।
सुदामा कुछ क्षण वहीं बैठा रह गया।
उसे घड़े के टूटने का दुख कम था, लेकिन उसे डर था कि अब उसे आश्रम लौटकर क्या कहना होगा।
तभी पीछे से कृष्ण की आवाज आई।
“सुदामा!”
सुदामा ने मुड़कर देखा। कृष्ण दौड़ते हुए उसके पास आ रहे थे।
“तुम ठीक तो हो?”
सुदामा ने धीरे से कहा, “हाँ, मैं ठीक हूँ।”
कृष्ण ने टूटे हुए घड़े की ओर देखा।
“और यह?”
“यह ठीक नहीं है,” सुदामा ने उदास होकर कहा।
कृष्ण हँस पड़े।
सुदामा ने उन्हें घूरकर देखा।
“तुम्हें हँसी आ रही है?”
कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं, मुझे तुम्हारा चेहरा देखकर हँसी आ रही है। तुम ऐसे परेशान हो जैसे पूरे आश्रम का जल समाप्त हो गया हो।”
सुदामा ने कहा, “गुरु माता ने मुझे घड़ा संभालकर लाने को कहा था।”
कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“तो चलो, नया घड़ा लेते हैं।”
“लेकिन…”
“लेकिन क्या?”
“अगर किसी ने पूछा कि पुराना घड़ा कैसे टूटा?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तो सच बता देना।”
सुदामा ने सिर झुका लिया।
“कभी-कभी सच बोलना आसान नहीं होता।”
कृष्ण का चेहरा शांत हो गया।
उन्होंने कहा, “सुदामा, सच बोलने के बाद मिलने वाली डाँट कुछ समय के लिए होती है, लेकिन झूठ बोलने का बोझ मन पर बहुत समय तक रहता है।”
सुदामा ने उनकी ओर देखा।
उसे लगा जैसे कृष्ण उससे उम्र में छोटे नहीं, बल्कि बहुत अधिक समझदार हों।
दोनों वापस आश्रम आए और गुरु माता को सब बता दिया।
गुरु माता ने पहले सुदामा को ध्यान से देखा, फिर कृष्ण को।
“तुम दोनों ने सच बताया, इसलिए मैं नाराज़ नहीं हूँ। अगली बार सावधान रहना।”
सुदामा ने राहत की साँस ली।
आश्रम से बाहर आते ही कृष्ण ने कहा, “देखा? मैंने कहा था ना, सच बोलने से मन हल्का हो जाता है।”
सुदामा मुस्कुराया।
“लेकिन तुमने मुझे पहले ही डराना क्यों शुरू कर दिया था?”
कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “मैंने कब डराया?”
“तुम्हारी बातें सुनकर लगता है जैसे तुम सब कुछ पहले से जानते हो।”
कृष्ण मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।
“अगर मैं सब कुछ जानता होता, तो तुम्हारा घड़ा टूटने से पहले तुम्हें रोक देता।”
दोनों हँस पड़े।
उस दिन के बाद सुदामा ने महसूस किया कि कृष्ण केवल उसके मित्र नहीं थे। वह उसके जीवन में एक ऐसे साथी बनते जा रहे थे, जिनसे वह अपनी हर बात कह सकता था।
लेकिन गुरुकुल का जीवन केवल हँसी और खेल का नाम नहीं था।
वहाँ हर दिन कुछ नया सीखना पड़ता था।
एक दिन गुरु सांदीपनि सभी शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे।
उन्होंने कहा, “मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका धन, शक्ति या परिवार नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी पहचान उसके कर्म होते हैं।”
एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, अगर कोई व्यक्ति बहुत गरीब हो, तो क्या लोग उसे हमेशा छोटा समझेंगे?”
सुदामा अचानक चुप हो गया।
उसे लगा जैसे यह प्रश्न उसके अपने मन का हो।
गुरु सांदीपनि ने उत्तर दिया, “गरीबी किसी मनुष्य को छोटा नहीं बनाती। छोटा मनुष्य तब बनता है, जब उसके विचार छोटे हो जाते हैं।”
कृष्ण ने धीरे से सुदामा की ओर देखा।
सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।
पाठ समाप्त होने के बाद कृष्ण उसके पास आए।
“तुम कुछ सोच रहे हो?”
“नहीं।”
“तुम जब भी दुखी होते हो, यही कहते हो।”
सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “कृष्ण, क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि हम दोनों बहुत अलग हैं?”
कृष्ण ने पूछा, “किस बात में?”
सुदामा ने कहा, “तुम्हारे पास सब कुछ है। तुम्हारा परिवार बड़ा है। लोग तुम्हें प्रेम करते हैं। और मैं…”
वह रुक गया।
कृष्ण ने कहा, “और तुम मेरे मित्र हो।”
सुदामा ने उनकी ओर देखा।
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में कौन बड़ा और कौन छोटा होता है?”
सुदामा कुछ नहीं बोला।
कृष्ण आगे बोले, “अगर तुम्हारे पास धन नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है। तुम्हारे पास एक सच्चा मन है, ज्ञान पाने की इच्छा है और अपने मित्र के लिए प्रेम है। क्या यह कम है?”
सुदामा की आँखें नम हो गईं।
उसने धीरे से कहा, “तुम्हारी बातें सुनकर सब आसान लगने लगता है।”
कृष्ण ने तुरंत कहा, “तो फिर तुम रोज मुझसे बातें किया करो।”
दोनों फिर हँस पड़े।
कुछ दिन बाद गुरु माता ने कृष्ण और सुदामा को अपने पास बुलाया।
उनके चेहरे पर चिंता थी।
“आश्रम के लिए कुछ सूखी लकड़ियों की आवश्यकता है। जंगल से लकड़ियाँ लानी होंगी।”
कृष्ण ने तुरंत कहा, “हम दोनों जाएँगे।”
सुदामा ने भी सिर हिला दिया।
गुरु माता ने कहा, “जंगल थोड़ा दूर है। समय पर लौट आना।”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “चिंता मत कीजिए, माता।”
सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।
उसे पता था कि जब भी कृष्ण कहते हैं कि चिंता मत कीजिए, तब कुछ न कुछ जरूर होने वाला होता है।
दोनों सुबह-सुबह जंगल की ओर निकल पड़े।
रास्ते भर कृष्ण बातें करते रहे।
कभी किसी पक्षी की आवाज की नकल करते, कभी पेड़ पर लगे फलों को देखकर अनुमान लगाते कि कौन सा फल मीठा होगा।
सुदामा ने कहा, “कृष्ण, हम लकड़ियाँ लेने जा रहे हैं या घूमने?”
कृष्ण ने कहा, “दोनों काम साथ-साथ हो सकते हैं।”
“लेकिन गुरु माता ने कहा था कि जल्दी लौटना है।”
“तो जल्दी लौटेंगे।”
“तुम्हारे लिए जल्दी का मतलब क्या है?”
कृष्ण मुस्कुराए।
“जब तुम परेशान होने लगो।”
सुदामा ने सिर पकड़ लिया।
जंगल पहुँचने के बाद दोनों सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।
कुछ ही समय में उनके पास काफी लकड़ियाँ हो गईं।
सुदामा ने कहा, “अब चलें?”
कृष्ण ने कहा, “बस थोड़ी और।”
सुदामा ने कहा, “तुमने यही बात आधा समय पहले भी कही थी।”
कृष्ण हँस पड़े।
लेकिन तभी आसमान में अचानक काले बादल छा गए।
तेज हवा चलने लगी।
सुदामा ने ऊपर देखा।
“कृष्ण, मुझे लगता है बारिश आने वाली है।”
कुछ ही क्षणों में तेज बारिश शुरू हो गई।
दोनों ने लकड़ियों को एक साथ बाँधा और पेड़ों के बीच सुरक्षित जगह ढूँढने लगे।
लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि रास्ता दिखाई देना मुश्किल हो गया।
कुछ समय बाद दोनों को एहसास हुआ कि वे आश्रम का रास्ता भूल चुके हैं।
सुदामा घबरा गया।
“अब क्या होगा?”
कृष्ण ने कहा, “कुछ नहीं होगा।”
“लेकिन हमें रास्ता नहीं पता।”
“तो रास्ता ढूँढेंगे।”
“और अगर रात हो गई?”
“तो सुबह होने तक इंतजार करेंगे।”
“और अगर कोई जंगली जानवर आ गया?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम एक ही बार में इतनी सारी चिंताएँ कहाँ से ढूँढ लेते हो?”
सुदामा ने कहा, “क्योंकि तुम बिल्कुल चिंता नहीं करते।”
कृष्ण कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले, “सुदामा, चिंता और सावधानी में अंतर होता है। सावधान रहना जरूरी है, लेकिन हर समय डरते रहना हमें कमजोर कर देता है।”
बारिश लगातार हो रही थी।
दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।
ठंडी हवा चल रही थी।
सुदामा काँपने लगा।
कृष्ण ने अपनी ओर का कपड़ा उसके कंधों पर रख दिया।
सुदामा ने कहा, “नहीं, तुम्हें ठंड लगेगी।”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में हिसाब नहीं रखा जाता।”
सुदामा कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली और उनके ऊपर की कुछ सूखी शाखाएँ टूटकर नीचे गिर गईं।
दोनों पीछे हट गए।
अब जंगल और भी डरावना लगने लगा।
सुदामा ने धीरे से कहा, “कृष्ण, मुझे डर लग रहा है।”
कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तो मेरा हाथ मत छोड़ना।”
सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।
धीरे-धीरे शाम होने लगी।
आसमान अंधेरा हो गया।
आश्रम में गुरु सांदीपनि और गुरु माता दोनों चिंतित थे।
“दोनों अभी तक लौटे नहीं,” गुरु माता ने कहा।
गुरु सांदीपनि ने कुछ शिष्यों को बुलाया।
“तुम लोग उन्हें खोजने जाओ।”
उधर जंगल में कृष्ण और सुदामा एक पेड़ के नीचे बैठे थे।
सुदामा ने अपना सिर पेड़ से टिकाया।
“अगर हम आज वापस नहीं पहुँचे तो?”
कृष्ण ने कहा, “हम पहुँचेंगे।”
“तुम्हें इतना विश्वास कैसे है?”
कृष्ण ने उसकी ओर देखा।
“क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ। तुम मेरे साथ हो।”
सुदामा की आँखों में हल्की मुस्कान आ गई।
कुछ देर बाद उसने कहा, “और मैं इसलिए नहीं डर रहा क्योंकि तुम मेरे साथ हो।”
कृष्ण ने कहा, “तो फिर हम दोनों ठीक हैं।”
रात बीतती रही।
दोनों ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।
सुबह होने के कुछ समय बाद आश्रम के शिष्यों की आवाज सुनाई दी।
“कृष्ण! सुदामा!”
सुदामा तुरंत खड़ा हो गया।
“वे हमें ढूँढ रहे हैं!”
कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि स्वयं वहाँ पहुँच गए।
उन्होंने दोनों को देखा।
“तुम दोनों ठीक हो?”
कृष्ण और सुदामा ने एक साथ सिर हिलाया।
गुरु सांदीपनि ने उन्हें अपने पास बुलाया।
“तुम दोनों पूरी रात यहाँ रहे?”
सुदामा ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”
गुरु ने पूछा, “डर नहीं लगा?”
सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।
फिर मुस्कुराकर कहा, “लगा था… लेकिन मैं अकेला नहीं था।”
कृष्ण ने भी सुदामा की ओर देखा।
गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।
उस दिन आश्रम लौटते समय सुदामा के मन में एक बात हमेशा के लिए बस गई।
जीवन में कितनी भी कठिन राह क्यों न हो…
अगर साथ में एक सच्चा मित्र हो, तो डर आधा हो जाता है।
लेकिन सुदामा नहीं जानता था कि आने वाले दिनों में उसकी और कृष्ण की मित्रता को एक और बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।
एक ऐसी घटना…
जिसे वर्षों बाद भी सुदामा भूल नहीं पाएगा।
और शायद वही घटना उनके बीच की मित्रता को हमेशा के लिए अमर कर देगी।
क्रमशः…





