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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 47

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 47

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 47 : मां सामने थी, फिर भी एक रहस्य बाकी था

    “राजवीर… क्या तुम अब भी मुझसे डरते हो?”

    बाहर से आई उस आवाज ने जैसे पूरे कमरे की सांसें रोक दीं।

    राजवीर के हाथ से बंदूक नीचे गिर गई।

    विहान की आंखें फैल गईं।

    “मां…?”

    वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    लेकिन आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “रुको।”

    विहान ने बेचैनी से कहा—

    “भाई, वो मां हैं!”

    आरव ने कहा—

    “हमें पक्का यकीन नहीं है।”

    तभी बाहर से वही आवाज आई—

    “विहान… इतने सालों बाद भी तुम मुझे पहचान नहीं पाए?”

    विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “मुझे अपनी मां की आवाज कैसे भूल सकती है?”

    वह आरव का हाथ छुड़ाकर दरवाजे तक पहुंच गया।

    देवेंद्र ने भी उसे रोकना चाहा, लेकिन विहान ने कहा—

    “अगर ये मेरी मां हैं और मैं फिर उनसे दूर हो गया… तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।”

    उसने दरवाजा खोल दिया।


    नैना सामने थी

    दरवाजा खुलते ही सामने एक महिला खड़ी थी।

    सफेद साड़ी।

    चेहरे पर उम्र के निशान।

    आंखों में आंसू।

    लेकिन वही चेहरा…

    वही आंखें…

    वही आवाज।

    विहान उसे देखते ही कुछ पल के लिए जम गया।

    महिला ने धीरे से कहा—

    “विहान…”

    विहान के होंठ कांपे।

    “मां…”

    और अगले ही पल वह दौड़कर उनसे लिपट गया।

    “मां!”

    महिला ने उसे कसकर गले लगा लिया।

    उसकी आंखों से भी आंसू बहने लगे।

    “मेरा बच्चा…”

    विहान फूट-फूटकर रोने लगा।

    “आप कहां चली गई थीं मां?”

    “मैंने आपको कितना ढूंढा।”

    “मुझे लगा आप मर गईं।”

    नैना ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

    “मैं मरना चाहती तो भी नहीं मर सकती थी।”

    “क्यों?”

    नैना ने धीरे से कहा—

    “क्योंकि मुझे अपने बच्चों के पास वापस आना था।”

    विहान ने पीछे मुड़कर आरव और अमन को देखा।

    “मां… ये आरव है।”

    नैना की नजर आरव पर गई।

    उनकी आंखें भर आईं।

    “मेरा गुड्डू…”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    उसे बचपन की वही आवाज याद आई—

    “गुड्डू, इतना मत रो… मां यहीं है।”

    आरव धीरे-धीरे उनके पास गया।

    “आप… सच में मेरी मां हैं?”

    नैना ने अपने हाथ आगे बढ़ाए।

    “आओ।”

    आरव उनके गले लग गया।

    नैना ने उसे कसकर पकड़ लिया।

    “मेरा बच्चा… मैंने तुम्हें बहुत याद किया।”

    आरव की आंखें बंद थीं।

    उसके अंदर बरसों से खाली पड़ा एक कोना जैसे पहली बार भर गया था।


    अमन की बारी

    अमन कुछ दूर खड़ा सब देख रहा था।

    नैना ने उसे देखा।

    उनकी आंखों में फिर आंसू आ गए।

    “अमन…”

    अमन की आंखें भर आईं।

    “आपको मेरा नाम भी याद है?”

    नैना ने कहा—

    “मां अपने बच्चे का नाम कैसे भूल सकती है?”

    अमन उनके पास गया।

    नैना ने उसे भी गले लगा लिया।

    तीनों भाई पहली बार अपनी जन्मदात्री मां के साथ खड़े थे।

    माधवी यह दृश्य देखकर रो रही थीं।

    आरव ने उन्हें देखा।

    “मां…”

    नैना ने भी माधवी की तरफ देखा।

    दोनों बहनों की आंखें मिलीं।

    कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।

    फिर नैना ने आगे बढ़कर माधवी को गले लगा लिया।

    “दीदी…”

    माधवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।

    “मुझे लगा था तुम मर गई।”

    नैना ने कहा—

    “मैं भी यही चाहती थी कि तुम मुझे मरा हुआ समझो।”

    माधवी ने हैरानी से पूछा—

    “क्यों?”

    नैना ने पीछे खड़े राजवीर की तरफ देखा।

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चलता कि मैं जिंदा हूं… तो राजवीर तुम्हें भी नहीं छोड़ता।”


    राजवीर का डर

    राजवीर अब भी वहीं खड़ा था।

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

    “इतने सालों बाद भी तुम वही हो।”

    राजवीर ने धीरे से कहा—

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हारी यही सबसे बड़ी गलती थी।”

    “तुमने मुझे कमजोर समझा।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “मैंने तुम्हें खत्म कर दिया था!”

    नैना ने कहा—

    “नहीं।”

    “तुमने सिर्फ मुझे दुनिया की नजरों में खत्म किया था।”

    “लेकिन मैं जिंदा थी।”

    राजवीर पीछे हट गया।

    “तुम्हें किसने बचाया?”

    नैना ने जवाब नहीं दिया।

    राजवीर ने चारों तरफ देखा।

    “किसने?”

    नैना ने कहा—

    “उस आदमी ने, जिसे तुमने सबसे पहले अपना दुश्मन समझा था।”

    राजवीर का चेहरा बदल गया।

    “देवेंद्र?”

    देवेंद्र आगे आया।

    “हां।”

    राजवीर हंस पड़ा।

    “तुम दोनों ने मुझे इतने साल धोखा दिया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “नहीं। हमने तुम्हारी चाल को तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल किया।”


    उस रात क्या हुआ था?

    आरव ने पूछा—

    “मां, उस रात आखिर हुआ क्या था?”

    नैना कुछ पल चुप रहीं।

    फिर बोलीं—

    “मुझे राजवीर के लोग उठा ले गए थे।”

    “मुझे गोली लगी थी।”

    “लेकिन मैं मरी नहीं।”

    “देवेंद्र मुझे वहां से निकालकर ले गया।”

    देवेंद्र ने कहा—

    “मैं तुम्हें अस्पताल ले जाना चाहता था।”

    नैना ने कहा—

    “लेकिन तब तक राजवीर को पता चल चुका था कि मैं जिंदा हूं।”

    “इसलिए मुझे एक गुप्त जगह पर रखा गया।”

    आरव ने पूछा—

    “इतने साल?”

    “हां।”

    “आप हमसे मिलने क्यों नहीं आईं?”

    नैना की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण तुम तीनों की जान खतरे में पड़े।”

    अमन ने पूछा—

    “लेकिन आपने हमें अकेला छोड़ दिया।”

    नैना ने कहा—

    “मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था।”

    “मैं हर साल तुम्हारी खबर लेती थी।”

    विहान ने कहा—

    “तो आपने मुझे देखा था?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हें शायद याद भी नहीं होगा।”

    “जब तुम छोटे थे, मैं दूर खड़ी होकर तुम्हें स्कूल जाते देखती थी।”

    विहान की आंखों से आंसू निकल आए।

    “मां…”


    एक और बड़ा सच

    आरव ने पूछा—

    “मां, फिर आपने हमें एक-दूसरे से दूर क्यों रखा?”

    नैना ने कहा—

    “क्योंकि राजवीर तुम्हें ढूंढ रहा था।”

    “उसे पता था कि तुम तीनों के पास मेरी संपत्ति और मेरे सबूतों की चाबी है।”

    आरव ने अपनी जेब से वही चाबी निकाली।

    “ये?”

    नैना ने चाबी देखते ही कहा—

    “हां।”

    “इसे मैंने तुम्हारे लिए छोड़ा था।”

    अमन ने पूछा—

    “इससे क्या खुलेगा?”

    नैना ने कहा—

    “एक ऐसी जगह जहां तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए सब कुछ छुपाकर रखा है।”

    आरव चौंका।

    “पिता?”

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    “तुम्हारे पिता की असली वसीयत।”

    विहान ने पूछा—

    “और उसमें क्या है?”

    नैना ने कहा—

    “सिर्फ संपत्ति नहीं।”

    “राजवीर के खिलाफ सबूत भी।”

    राजवीर ने तुरंत कहा—

    “नैना, तुम नहीं जानती कि तुम क्या कर रही हो।”

    नैना उसकी तरफ मुड़ीं।

    “इस बार मैं सब जानती हूं।”


    राजवीर की आखिरी चाल

    राजवीर ने अचानक अपनी जेब से एक छोटा रिमोट निकाला।

    देवेंद्र की नजर उस पर पड़ गई।

    “राजवीर!”

    राजवीर मुस्कुराया।

    “अगर मैं ये बटन दबा दूं…”

    आरव ने पूछा—

    “क्या होगा?”

    राजवीर ने कहा—

    “पूरी हवेली उड़ जाएगी।”

    सबके चेहरे पर डर छा गया।

    आरोही आरव के पास आ गई।

    “आरव…”

    देवेंद्र ने कहा—

    “राजवीर, ऐसा मत करना।”

    राजवीर हंसा।

    “मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है।”

    नैना आगे बढ़ीं।

    “राजवीर, तुम्हें लगता है मैं इस बार भी डर जाऊंगी?”

    “मैं मरने से नहीं डरती।”

    राजवीर ने रिमोट का बटन दबाने के लिए उंगली बढ़ाई।

    तभी पीछे से एक गोली चली।

    धांय!

    रिमोट उसके हाथ से गिर गया।

    सबने पीछे देखा।

    रुद्र खड़ा था।

    उसके कंधे पर अभी भी चोट थी।

    अमन ने हैरानी से कहा—

    “रुद्र!”

    रुद्र ने कहा—

    “इस बार सही पक्ष में हूं।”

    राजवीर ने गुस्से में उसे देखा।

    “तू!”

    रुद्र ने कहा—

    “तुमने मुझे बहुत साल इस्तेमाल किया।”

    “अब हिसाब बराबर होगा।”


    राजवीर गिरफ्तार?

    बाहर से पुलिस की गाड़ियों की आवाज आने लगी।

    राजवीर चौंक गया।

    “पुलिस?”

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    राजवीर ने उनकी तरफ देखा।

    “तुमने पुलिस को बुलाया?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “नहीं।”

    फिर उन्होंने रुद्र की तरफ देखा।

    “उसने।”

    रुद्र ने कहा—

    “मेरे पास तुम्हारे खिलाफ सारे सबूत हैं।”

    राजवीर पीछे हटने लगा।

    “तुम लोग मुझे नहीं पकड़ सकते।”

    तभी शेखर ने अपने बंधे हाथों के बावजूद राजवीर को धक्का दिया।

    राजवीर जमीन पर गिर पड़ा।

    शेखर ने कहा—

    “बहुत कर लिया।”

    पुलिस अंदर घुस आई।

    राजवीर को गिरफ्तार कर लिया गया।

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा।

    “तुम सोचते हो खेल खत्म हो गया?”

    आरव ने कहा—

    “हां।”

    राजवीर मुस्कुराया।

    “नहीं… असली खेल तो अब शुरू होगा।”


    मां के साथ पहली रात

    राजवीर के जाने के बाद हवेली में पहली बार शांति थी।

    तीनों भाई अपनी मां के आसपास बैठे थे।

    विहान ने नैना का हाथ पकड़ा हुआ था।

    अमन उनके पास बैठा था।

    आरव थोड़ा दूर खड़ा था।

    नैना ने उसे देखा।

    “गुड्डू।”

    आरव उनकी तरफ आया।

    “जी?”

    नैना ने कहा—

    “तुम मुझसे नाराज हो?”

    आरव की आंखें भर आईं।

    “नहीं।”

    “तुमने मुझे छोड़ दिया था।”

    “लेकिन मुझे पता है क्यों।”

    नैना ने उसका चेहरा छूते हुए कहा—

    “मुझे माफ कर दो।”

    आरव ने सिर उनकी गोद में रख दिया।

    “मां को माफी नहीं मांगनी चाहिए।”

    नैना रो पड़ीं।

    अमन और विहान भी उनके पास आ गए।

    चारों एक-दूसरे से लिपट गए।

    आरोही दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।

    लेकिन तभी माधवी उसके पास आईं।

    उन्होंने धीरे से कहा—

    “तुम आरव से बहुत प्यार करती हो।”

    आरोही ने शर्म से सिर झुका लिया।

    “जी।”

    माधवी मुस्कुराईं।

    “तो एक बात याद रखना।”

    “क्या?”

    माधवी ने कहा—

    “आरव की जिंदगी अब सिर्फ प्यार की कहानी नहीं है… उसके अतीत का एक ऐसा राज बाकी है, जो उसे तुमसे भी दूर कर सकता है।”

    आरोही चौंक गई।

    “क्या मतलब?”

    माधवी कुछ कहतीं, उससे पहले नैना ने उन्हें रोक दिया।

    “माधवी… अभी नहीं।”

    आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

    “क्या हुआ?”

    नैना और माधवी एक-दूसरे को देखने लगीं।

    नैना ने धीमे से कहा—

    “आरव को अभी ये सच नहीं पता चलना चाहिए।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन-सा सच?”

    दोनों चुप रहीं।

    तभी देवेंद्र के फोन पर एक मैसेज आया।

    उसने मैसेज पढ़ा और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

    आरव ने पूछा—

    “क्या हुआ?”

    देवेंद्र ने फोन छुपाने की कोशिश की।

    लेकिन आरव ने फोन ले लिया।

    मैसेज में सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

    “राजवीर गिरफ्तार हो गया है, लेकिन जिसने उसे आदेश दिए थे… वह अभी आजाद है।”

    आरव की आंखें फैल गईं।

    और नीचे एक नाम लिखा था—

    “अभय।”

    आरव के हाथ कांपने लगे।

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 46

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 46

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 46 : असली दुश्मन कौन है?

    “बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे पहचानने में।”

    आवाज सुनते ही आरव, अमन और विहान ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा।

    अंधेरे में एक परछाई खड़ी थी।

    हाथ में बंदूक थी।

    चेहरा अभी भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

    राजवीर भी उस आवाज को सुनकर कुछ पल के लिए जम गया।

    आरव ने तुरंत पूछा—

    “कौन हो तुम?”

    परछाई धीरे-धीरे रोशनी में आई।

    और जैसे ही चेहरा सामने आया, तीनों भाइयों के होश उड़ गए।

    वो कोई अनजान इंसान नहीं था।

    वो था…

    रुद्र।

    अमन की आंखें फैल गईं।

    “रुद्र?”

    विहान पीछे हट गया।

    “तुम…?”

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

    “ये क्या हो रहा है?”

    रुद्र के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

    वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा।

    “हां… मैं।”

    आरव ने अविश्वास से पूछा—

    “तुमने हमें धोखा दिया?”

    रुद्र ने कहा—

    “मैंने कभी तुम्हारा दोस्त होने का दावा नहीं किया था।”

    आरव का चेहरा कठोर हो गया।

    “लेकिन तुमने इतने साल मेरे साथ काम किया।”

    “क्योंकि मुझे तुम्हारे पास रहना था।”

    अमन ने गुस्से में बंदूक उठा ली।

    “किसके कहने पर?”

    रुद्र ने जवाब दिया—

    “राजवीर के।”

    राजवीर ने उसकी तरफ देखा।

    “रुद्र!”

    रुद्र ने उसकी तरफ मुड़कर कहा—

    “अब चुप रहो।”

    राजवीर पहली बार असहाय नजर आया।


    राजवीर भी हैरान था

    आरव ने तुरंत समझ लिया कि मामला सिर्फ रुद्र और राजवीर के बीच का नहीं है।

    “तुमने अभी राजवीर को भी चुप करा दिया।”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “क्योंकि अब खेल मेरे हाथ में है।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “तुम भूल रहे हो कि तुम्हें मैंने बनाया है।”

    रुद्र ने कहा—

    “और तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे सारे राज मेरे पास हैं।”

    राजवीर कुछ नहीं बोला।

    आरव ने पूछा—

    “तुम दोनों के बीच आखिर रिश्ता क्या है?”

    रुद्र ने कहा—

    “राजवीर मेरा मालिक था।”

    “था?”

    “अब नहीं।”

    विहान ने कहा—

    “तो फिर तुम चाहते क्या हो?”

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम तीनों।”

    आरव आगे आया।

    “क्यों?”

    रुद्र ने कहा—

    “क्योंकि तुम तीनों के बिना नैना की आखिरी वसीयत पूरी नहीं हो सकती।”

    अमन ने पूछा—

    “वसीयत?”

    रुद्र ने सिर हिलाया।

    “तुम्हारी मां ने अपनी पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम की थी।”

    “लेकिन उसके साथ एक शर्त थी।”

    आरव ने पूछा—

    “क्या?”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “तीनों भाइयों को एक साथ होना होगा।”


    नैना की डायरी

    आरव ने हाथ में पकड़ी डायरी को देखा।

    “इसमें क्या है?”

    रुद्र ने कहा—

    “तुम्हारी मां की आखिरी सच्चाई।”

    आरव ने डायरी खोलने की कोशिश की।

    लेकिन पन्ने आपस में चिपके हुए थे।

    विहान ने कहा—

    “शायद कोई गुप्त तरीका है।”

    अमन ने डायरी को ध्यान से देखा।

    “यहां कुछ लिखा है।”

    एक पन्ने पर तीन छोटे निशान बने थे।

    एक पर आरव का नाम।

    दूसरे पर अमन।

    तीसरे पर विहान।

    तीनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा।

    रुद्र ने कहा—

    “अपने हाथ उन निशानों पर रखो।”

    आरव ने हाथ रखा।

    अमन ने भी।

    विहान ने तीसरे निशान पर हाथ रखा।

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

    फिर…

    टक!

    डायरी के बीच से एक छोटा हिस्सा बाहर निकला।

    उसमें एक फोटो थी।

    फोटो देखते ही आरव के हाथ कांपने लगे।

    फोटो में नैना थी।

    उसकी गोद में तीन छोटे बच्चे थे।

    और उनके पीछे खड़ी थी…

    माधवी।

    लेकिन तस्वीर में एक और आदमी था।

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

    “ये कौन है?”

    राजवीर ने फोटो देखते ही नजरें फेर लीं।

    देवेंद्र ने भी कुछ नहीं कहा।

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

    आरव ने पूछा—

    “मां… आप इस आदमी को जानती हैं?”

    माधवी ने धीरे से कहा—

    “हां।”

    “कौन है?”

    माधवी ने जवाब देने से पहले बहुत देर तक चुप्पी साधे रखी।

    फिर बोलीं—

    “ये तुम्हारा नाना है।”

    तीनों भाई स्तब्ध रह गए।


    नाना की कहानी

    अमन ने पूछा—

    “हमारे नाना?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “हां।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन हमें कभी उनके बारे में क्यों नहीं बताया गया?”

    माधवी की आंखों में दर्द था।

    “क्योंकि उनकी मौत के पीछे भी राजवीर का हाथ था।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “माधवी!”

    “चुप रहो!”

    माधवी ने पहली बार राजवीर पर जोर से आवाज उठाई।

    “पच्चीस साल तक तुमने हम सबको डराया।”

    “अब नहीं।”

    राजवीर कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

    धांय!

    सबने नीचे झुककर अपनी जान बचाई।

    रुद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

    “कोई और भी आया है।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    रुद्र ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    अमन ने कहा—

    “क्या तुम्हें हर बात पता नहीं होती?”

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

    “कुछ चीजें ऐसी हैं जो मुझे भी नहीं पता।”

    आरव ने पूछा—

    “जैसे?”

    रुद्र ने जवाब दिया—

    “नैना अभी जिंदा हैं या नहीं।”


    क्या नैना सच में जिंदा हैं?

    विहान की आंखों में उम्मीद की चमक आ गई।

    “अगर मेरी मां जिंदा हैं… तो मैं उन्हें ढूंढूंगा।”

    राजवीर ने तुरंत कहा—

    “वो जिंदा नहीं है।”

    विहान ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हें कैसे पता?”

    राजवीर चुप रहा।

    विहान आगे बढ़ा।

    “तुमने उसकी लाश देखी थी?”

    राजवीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

    “तुमने खुद उसे मारा था?”

    राजवीर की आंखें बदल गईं।

    विहान ने कहा—

    “जवाब दो!”

    राजवीर ने आखिरकार कहा—

    “नहीं।”

    “तो फिर?”

    राजवीर ने सिर झुका लिया।

    “मैंने उसे मरते हुए देखा था।”

    विहान ने कहा—

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

    “नहीं।”

    राजवीर की आवाज पहली बार कमजोर थी।

    “नैना को गोली लगी थी।”

    “लेकिन उसके बाद…”

    “उसके बाद क्या?”

    राजवीर चुप हो गया।

    रुद्र ने कहा—

    “उसे कोई वहां से ले गया था।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    रुद्र ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”


    एक और चौंकाने वाला सच

    अचानक माधवी ने कहा—

    “मुझे पता है।”

    सबकी नजर उनकी तरफ गई।

    आरव ने पूछा—

    “कौन ले गया था?”

    माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

    “मैं।”

    विहान स्तब्ध रह गया।

    “आप?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “नैना को गोली लगने के बाद मैं उसे वहां से लेकर गई थी।”

    “लेकिन फिर?”

    “वो बेहोश थी।”

    “मैं उसे अस्पताल ले गई।”

    आरव ने पूछा—

    “फिर?”

    माधवी ने कहा—

    “अस्पताल पहुंचने से पहले ही हमें रोक लिया गया।”

    अमन ने पूछा—

    “किसने?”

    माधवी ने कहा—

    “शेखर के आदमियों ने।”

    राजवीर ने कहा—

    “झूठ।”

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हें सब पता था।”

    “लेकिन तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि नैना को बचाया जा चुका था।”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    “तो नैना बच गई थीं?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “हां।”

    विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “मेरी मां जिंदा हैं?”

    माधवी ने धीरे से कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि उसके बाद मुझे कभी नैना नहीं मिली।”


    देवेंद्र की चुप्पी

    आरव ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    “आपको पता था?”

    देवेंद्र चुप रहा।

    आरव ने फिर पूछा—

    “आपको पता था कि नैना बच गई थीं?”

    देवेंद्र ने नजरें झुका लीं।

    “हां।”

    आरव का गुस्सा बढ़ गया।

    “फिर आपने हमें क्यों बताया कि वो मर चुकी हैं?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “क्योंकि हमें लगा राजवीर उसे ढूंढ लेगा।”

    “और अगर वो जिंदा थीं तो?”

    “मैं उन्हें ढूंढ नहीं पाया।”

    विहान ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    “आपने मेरी मां को ढूंढने की कोशिश की?”

    “हर दिन।”

    विहान की आंखों में आंसू थे।

    “फिर मुझे क्यों नहीं बताया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “क्योंकि तुम्हें बचाना जरूरी था।”


    आरव और आरोही

    इस पूरे रहस्य के बीच आरोही चुप थी।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ा।

    “तुम कुछ सोच रही हो।”

    आरोही ने कहा—

    “हां।”

    “क्या?”

    “अगर नैना जिंदा थीं और किसी ने उन्हें छुपाया… तो वो अभी भी कहीं हो सकती हैं।”

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “और हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

    आरोही मुस्कुराई।

    “मैंने यही सोचा।”

    आरव ने धीरे से कहा—

    “तुम मेरे साथ चलोगी?”

    आरोही ने बिना किसी झिझक के कहा—

    “जहां तुम जाओगे, मैं वहां रहूंगी।”

    आरव ने उसके माथे को हल्के से चूम लिया।

    अमन ने पीछे से कहा—

    “भाई, इस वक्त भी रोमांस?”

    आरव हंस पड़ा।

    “तू चुप कर।”

    विहान ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

    इतने दर्द के बीच भी तीनों भाइयों के बीच का रिश्ता और मजबूत हो रहा था।


    बाहर कौन आया था?

    अचानक बाहर फिर गोली चली।

    रुद्र ने कहा—

    “सब नीचे रहो!”

    वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    अचानक एक गोली आकर उसके कंधे में लगी।

    “आह!”

    आरव दौड़कर उसके पास गया।

    “रुद्र!”

    रुद्र जमीन पर गिर पड़ा।

    अमन ने कहा—

    “बाहर कोई स्नाइपर है।”

    राजवीर ने तुरंत अपने आदमियों को पीछे हटने का इशारा किया।

    “सब हथियार नीचे रखो।”

    आरव ने आश्चर्य से पूछा—

    “क्यों?”

    राजवीर ने कहा—

    “क्योंकि जो बाहर है… वो मेरे आदमी नहीं हैं।”

    अमन ने पूछा—

    “तो किसके हैं?”

    राजवीर ने पहली बार डरते हुए कहा—

    “नैना के।”

    सबकी सांस रुक गई।

    विहान ने पूछा—

    “क्या?”

    राजवीर ने कहा—

    “अगर नैना सच में जिंदा है…”

    वह खिड़की की तरफ देखने लगा।

    “तो आज रात वो यहां जरूर आएगी।”

    तभी बाहर से एक महिला की आवाज गूंजी—

    “विहान!”

    विहान का शरीर जैसे जम गया।

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

    “ये आवाज…”

    माधवी ने भी सांस रोक ली।

    आरव ने कहा—

    “विहान?”

    विहान कांपते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    “ये मेरी मां की आवाज है।”

    राजवीर पीछे हट गया।

    और बाहर से वही आवाज फिर आई—

    “मेरे बच्चे… दरवाजा खोलो।”

    विहान की आंखों से आंसू बह रहे थे।

    उसने दरवाजे की कुंडी पर हाथ रखा।

    लेकिन तभी आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “रुको।”

    “क्यों?”

    आरव ने गंभीर आवाज में कहा—

    “क्योंकि हमें नहीं पता… बाहर सच में नैना हैं या कोई हमें जाल में फंसा रहा है।”

    और तभी बाहर से महिला ने कहा—

    “आरव… अगर तुम सच में मेरे बेटे हो, तो तुम्हें याद होगा कि बचपन में मैं तुम्हें किस नाम से बुलाती थी।”

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

    उसकी आंखों के सामने बचपन की एक धुंधली तस्वीर उभरी।

    और उसके होंठों से खुद-ब-खुद एक नाम निकला—

    “गुड्डू…”

    बाहर कुछ पल सन्नाटा रहा।

    फिर महिला की आवाज आई—

    “हां बेटा… गुड्डू।”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    विहान ने दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

    लेकिन उसी क्षण राजवीर चिल्लाया—

    “दरवाजा मत खोलना! वो नैना नहीं है!”

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

    राजवीर के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

    और तभी बाहर खड़ी महिला ने धीमी आवाज में कहा—

    “राजवीर… क्या तुम अब भी मुझसे डरते हो?”

    राजवीर के हाथ से बंदूक गिर गई।

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 45 :

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 45 :

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 45 : नैना की आखिरी निशानी

     

    “मैंने कभी तुमसे ये नहीं बताया कि तुम्हारे जन्म से पहले… देवेंद्र और मेरा भी एक रिश्ता था।”

     

    माधवी की बात सुनकर आरव कुछ पल तक उन्हें देखता रह गया।

     

    उसके मन में जैसे हजारों सवाल एक साथ उठ खड़े हुए थे।

     

    आरोही ने भी देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    बाहर राजवीर की आवाज फिर गूंजी—

     

    “माधवी! अब सच बोल दो… वरना मैं वो राज सबके सामने खोल दूंगा, जिसे तुमने पच्चीस साल से छुपा रखा है।”

     

    माधवी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “वो राज… सिर्फ मेरा नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो किसका है?”

     

    माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “हम दोनों का।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से कहा—

     

    “माधवी, अब समय आ गया है।”

     

    “हां।”

     

    माधवी ने गहरी सांस ली।

     

    “आरव, तुम्हें जो बताने जा रही हूं, उसे सुनने के बाद शायद तुम मुझसे नाराज हो जाओ।”

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपने मुझे पाला है मां। चाहे जो सच हो, मेरा रिश्ता आपसे नहीं बदलेगा।”

     

    माधवी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “काश, सब इतना आसान होता।”

     

     

     

    माधवी और देवेंद्र का रिश्ता

     

    माधवी ने कहना शुरू किया—

     

    “पच्चीस साल पहले देवेंद्र और मैं एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    आरव शांत खड़ा सुनता रहा।

     

    “हम शादी करना चाहते थे। लेकिन उसी समय मेरी बहन नैना की जिंदगी में बहुत बड़ा तूफान आ गया।”

     

    देवेंद्र ने आगे कहा—

     

    “नैना को पता चल चुका था कि राजवीर और शेखर गैरकानूनी कारोबार में शामिल थे।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “और अभय?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “अभय उस समय शेखर के साथ था। लेकिन जब उसे नैना की सच्चाई पता चली, तो उसने शेखर का साथ छोड़ दिया।”

     

    विहान ने धीरे से पूछा—

     

    “और मेरी मां?”

     

    “नैना ने अभय पर भरोसा किया।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “लेकिन आपने कहा कि आप मेरे पिता हैं।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे जन्मदाता मैं हूं।”

     

    विहान के चेहरे पर हैरानी थी।

     

    “लेकिन फिर अभय?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “अभय ने तुम्हें अपना बेटा माना। उसने कभी तुम्हें सच्चाई नहीं बताई, क्योंकि नैना ने उससे ऐसा करने को कहा था।”

     

    विहान ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी उलझन अब धीरे-धीरे सुलझ रही थी।

     

     

     

    तीन बच्चों का जन्म

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और हम तीनों?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम तीनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन क्या हम तीनों सच में भाई हैं?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “एक ही पिता के?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और मां?”

     

    माधवी कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं—

     

    “तुम तीनों की जन्मदात्री नैना थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    विहान की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तो मेरी मां…”

     

    “नैना।”

     

    “और आरव?”

     

    माधवी ने आरव का चेहरा अपने हाथों में लिया।

     

    “तुम भी उसी मां के बेटे हो।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “फिर आपने मुझे क्यों पाला?”

     

    माधवी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोलीं—

     

    “क्योंकि नैना ने तुम तीनों को मेरे भरोसे छोड़ा था।”

     

     

     

    नैना का आखिरी फैसला

     

    माधवी ने बताया—

     

    “उस रात नैना को पता चल गया था कि राजवीर उसके पीछे है।”

     

    “उसने मुझे बुलाया।”

     

    “जब मैं वहां पहुंची, तो नैना के पास तुम तीनों थे।”

     

    “तुम बहुत छोटे थे।”

     

    “उसने मुझे देखकर कहा था—”

     

    माधवी की आवाज भर्रा गई।

     

    “दीदी, अगर मैं बची नहीं तो मेरे बच्चों को बचा लेना।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे अचानक किसी महिला की आवाज याद आने लगी।

     

    “मेरे बच्चों को कभी अलग मत होने देना।”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    आरोही तुरंत उसके पास आई।

     

    “आरव?”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “मुझे उसकी आवाज याद आ रही है।”

     

    “किसकी?”

     

    “नैना की।”

     

    विहान उसकी तरफ देखने लगा।

     

    “तुम्हें मां याद आ रही हैं?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “थोड़ा-सा।”

     

     

     

    वो रात

     

    माधवी ने आगे कहा—

     

    “उस रात हमने तीनों बच्चों को अलग-अलग जगह छिपाने का फैसला किया।”

     

    “विहान को अभय के पास भेजा गया।”

     

    “अमन को सिया के साथ।”

     

    “और आरव को मैंने अपने पास रखा।”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इसीलिए हम एक-दूसरे को याद नहीं करते थे।”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम्हारी यादें जानबूझकर दबाई गई थीं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “मैंने डॉक्टर से कहा था।”

     

    आरव ने उसे घूरकर देखा।

     

    “आपने?”

     

    “हां।”

     

    “आपने मेरी यादें मुझसे छीन लीं।”

     

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने तुम्हारी जिंदगी बचाने के लिए ऐसा किया था।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा था।

     

    “लेकिन मेरी मां की याद?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “वो भी वापस आनी थी।”

     

    “कब?”

     

    “जब तुम तीनों फिर एक साथ खड़े होते।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

     

     

    राजवीर का प्रवेश

     

    तभी दरवाजा जोर से खुला।

     

    राजवीर अंदर आ गया।

     

    उसके साथ कई आदमी थे।

     

    “बहुत अच्छी कहानी चल रही है।”

     

    शेखर भी उसके पीछे खड़ा था।

     

    लेकिन शेखर के हाथ बंधे हुए थे।

     

    आरव ने चौंककर पूछा—

     

    “शेखर?”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा तथाकथित पिता अब मेरी कैद में है।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “आरव, उसकी बात मत मानना।”

     

    राजवीर ने उसके पेट में बंदूक का कुंदा मारा।

     

    “चुप!”

     

    विहान गुस्से में आगे बढ़ा।

     

    “उसे हाथ मत लगाना!”

     

    राजवीर ने विहान को देखा।

     

    “तुम्हें अपनी मां की बहुत चिंता है ना?”

     

    विहान रुक गया।

     

    “मेरी मां मर चुकी हैं।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “क्या सच में?”

     

    विहान की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या मतलब?”

     

    राजवीर ने जेब से एक पुराना लॉकेट निकाला।

     

    लॉकेट देखकर माधवी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये…”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ मां?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा—

     

    “ये नैना का लॉकेट है।”

     

    राजवीर ने लॉकेट हवा में उछालकर पकड़ा।

     

    “हां।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “ये तुम्हारे पास कैसे आया?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “क्योंकि नैना की आखिरी रात मैं उसके बहुत करीब था।”

     

     

     

    नैना जिंदा थी?

     

    विहान का चेहरा बदल गया।

     

    “तुमने उसे मारा?”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “मैंने उसे मरते हुए देखा।”

     

    “मतलब?”

     

    “लेकिन मैंने उसकी लाश कभी नहीं देखी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो क्या नैना जिंदा थी?”

     

    राजवीर ने सीधे जवाब नहीं दिया।

     

    उसने लॉकेट खोल दिया।

     

    अंदर एक छोटी सी तस्वीर थी।

     

    नैना की।

     

    और उसके पीछे कुछ लिखा था।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    “जहां तीनों भाई पहली बार मिले थे, वहीं सच दफन है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हम पहली बार कहां मिले थे?”

     

    आरव अचानक बोला—

     

    “पुराना अनाथालय।”

     

    विहान ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें याद है?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों के सामने एक दृश्य आया।

     

    तीन छोटे बच्चे एक ही कमरे में थे।

     

    एक लड़की उन्हें देख रही थी।

     

    उसने तीनों के हाथ एक साथ रखे थे।

     

    और कह रही थी—

     

    “एक दिन तुम तीनों भाई फिर मिलोगे।”

     

    आरव ने आंखें खोलीं।

     

    “वह लड़की…”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मुझे उसका चेहरा याद नहीं… लेकिन उसने हमारे हाथों में ये लॉकेट रखा था।”

     

    राजवीर अचानक गंभीर हो गया।

     

    “तुम्हें वो याद आ गई?”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम उसे जानते हो?”

     

    राजवीर चुप रहा।

     

    आरव ने जोर से कहा—

     

    “कौन थी वो?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “नैना की सबसे बड़ी गलती।”

     

     

     

    अनाथालय की ओर

     

    राजवीर ने अपने आदमियों को आदेश दिया—

     

    “इन सबको गाड़ी में बैठाओ।”

     

    अमन ने विरोध किया।

     

    “हम कहीं नहीं जाएंगे।”

     

    राजवीर ने बंदूक शेखर की कनपटी पर रख दी।

     

    “तो फिर ये मरेगा।”

     

    आरव ने शेखर को देखा।

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “मेरी चिंता मत करो।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “आपको मरने नहीं दूंगा।”

     

    राजवीर हंसा।

     

    “तुम्हें अपने परिवार को बचाना है तो मेरे साथ चलो।”

     

    कुछ देर बाद सभी को गाड़ियों में बैठा दिया गया।

     

    आरोही आरव के साथ बैठी थी।

     

    उसने धीरे से पूछा—

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “लेकिन?”

     

    “अब मुझे अपनी मां की सच्चाई जाननी है।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर इस लड़ाई में मुझे सब कुछ खोना पड़ा तो?”

     

    आरोही ने बिना झिझके कहा—

     

    “तो मैं तुम्हारे साथ सब कुछ खो दूंगी।”

     

    आरव ने उसका हाथ चूम लिया।

     

    “मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझे पता है।”

     

     

     

    पुराना अनाथालय

     

    कुछ घंटों बाद गाड़ियां एक सुनसान जगह पर रुकीं।

     

    सामने वही पुराना अनाथालय था।

     

    जिसे सालों पहले बंद कर दिया गया था।

     

    राजवीर सबसे पहले अंदर गया।

     

    दीवारों पर धूल थी।

     

    पुराने खिलौने टूटे पड़े थे।

     

    आरव ने एक कोना देखा।

     

    उसकी सांस रुक गई।

     

    “यहीं।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    आरव ने फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    “यहीं हम तीनों बैठे थे।”

     

    विहान भी आगे आया।

     

    “मुझे भी याद आ रहा है।”

     

    अमन ने आंखें बंद कीं।

     

    “एक औरत थी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हां।”

     

    तीनों भाइयों को एक साथ कुछ याद आने लगा।

     

    एक महिला उनके सामने खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर घूंघट था।

     

    उसने तीनों के माथे पर किस किया था।

     

    और कहा था—

     

    “जब तक तुम एक-दूसरे को पहचान नहीं लेते, किसी पर भरोसा मत करना।”

     

    आरव ने अचानक जमीन पर पैर मारा।

     

    “यहां कुछ है।”

     

    रुद्र ने जमीन हटानी शुरू की।

     

    कुछ देर बाद लोहे का एक छोटा संदूक दिखाई दिया।

     

    राजवीर आगे बढ़ा।

     

    “इसे मैं खोलूंगा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    उसने अपनी जेब से नैना का लॉकेट निकाला।

     

    लॉकेट को संदूक के ऊपर रखा।

     

    टक!

     

    संदूक अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक पुरानी डायरी थी।

     

    एक फोटो थी।

     

    और एक पत्र।

     

    आरव ने पत्र उठाया।

     

    ऊपर लिखा था—

     

    “मेरे तीनों बेटों के लिए।”

     

    विहान की सांस थम गई।

     

    अमन ने कहा—

     

    “नैना!”

     

    आरव ने कांपते हाथों से पत्र खोला।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “नैना जिंदा थीं…”

     

    राजवीर का चेहरा भी बदल गया।

     

    “ये असंभव है।”

     

    आरव ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    और उसकी आंखें फैल गईं।

     

    पत्र में लिखा था—

     

    “अगर ये पत्र मेरे बेटों तक पहुंचा है, तो समझो मैं अभी जिंदा हूं… और मेरे बच्चों, तुम जिस आदमी को अपना दुश्मन समझ रहे हो, असली दुश्मन वो नहीं है।”

     

    आरव ने राजवीर की तरफ देखा।

     

    राजवीर के चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी थी।

     

    पत्र की आखिरी लाइन पढ़ते ही सबके पैरों तले जमीन खिसक गई—

     

    “तुम्हारा असली दुश्मन तुम्हारे बीच ही मौजूद है।”

     

    तीनों भाइयों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    और तभी पीछे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    कोई अंधेरे में खड़ा था।

     

    फिर वही आवाज सुनाई दी—

     

    “बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे पहचानने में।”

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 44

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 44

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 44 : वो कौन था?

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारा असली पिता हूं।”

     

    उस आवाज ने जैसे पूरे रास्ते की हवा रोक दी।

     

    आरव, अमन और विहान तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरोही भी हैरान खड़ी थी।

     

    सामने अंधेरे में एक आदमी खड़ा था। उसके चेहरे का आधा हिस्सा अंधेरे में छिपा हुआ था, लेकिन उसकी आवाज में ऐसा अपनापन था, जैसे वह उन तीनों को बरसों से जानता हो।

     

    आरव ने आगे बढ़ते हुए पूछा—

     

    “सामने आओ।”

     

    वह आदमी धीरे-धीरे रोशनी में आया।

     

    उसके बालों में सफेदी थी। चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लेकिन आंखों में अजीब-सी गहराई थी।

     

    विहान उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    “आप…”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां, विहान।”

     

    “आप वही हैं जो मुझे सपनों में दिखाई देते थे।”

     

    उस आदमी की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्योंकि वो सपने नहीं थे।”

     

    विहान की सांस अटक गई।

     

    “तो क्या था?”

     

    आदमी ने कहा—

     

    “तुम्हारी बचपन की यादें।”

     

    अमन ने गुस्से से पूछा—

     

    “आपने अभी कहा कि आप हमारे असली पिता हैं। इसका मतलब क्या है?”

     

    आदमी ने आरव और अमन की तरफ देखा।

     

    “मैं तुम तीनों का पिता हूं।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “झूठ।”

     

    “नहीं।”

     

    “मेरे पिता अभय थे।”

     

    “अभय तुम्हारा पिता था।”

     

    “तो आप कौन हैं?”

     

    आदमी कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मेरा नाम देवेंद्र है।”

     

     

     

    देवेंद्र का सच

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “अगर आप इनके पिता हैं, तो इतने साल कहां थे?”

     

    देवेंद्र की आंखें झुक गईं।

     

    “छिपा हुआ था।”

     

    आरव ने तीखी आवाज में पूछा—

     

    “किससे?”

     

    “शेखर से।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और राजवीर से?”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “सबसे।”

     

    विहान आगे आया।

     

    “मेरी मां नैना आपको जानती थीं?”

     

    देवेंद्र की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “नैना मेरी जिंदगी थी।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “तो फिर उन्होंने आपसे शादी क्यों नहीं की?”

     

    देवेंद्र ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या आप और नैना…?”

     

    “हां।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से कहा—

     

    “हम एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    विहान ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “तो मैं…”

     

    देवेंद्र ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम मेरे बेटे हो।”

     

    विहान की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “फिर मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “क्योंकि मुझे मजबूर किया गया था।”

     

     

     

    पच्चीस साल पुराना समझौता

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “जब नैना को पता चला कि वह मां बनने वाली है, तब राजवीर को भी इसकी खबर मिल गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “राजवीर को क्यों फर्क पड़ता था?”

     

    “क्योंकि उसे पता था कि नैना के पास शेखर के खिलाफ सारे सबूत हैं।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “और हम?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम दोनों का जन्म उसी समय हुआ था।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तो क्या हम सच में तीनों एक ही मां के बच्चे हैं?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन हमें अलग-अलग परिवारों में क्यों रखा गया?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि नैना जानती थी कि अगर राजवीर को पता चल गया कि उसके तीन बच्चे हैं, तो वह तीनों को खत्म कर देगा।”

     

    विहान ने पूछा—

     

    “फिर मेरी परवरिश किसने की?”

     

    “शेखर ने।”

     

    विहान का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “वो मुझे अपना बेटा कहता था, लेकिन कैद करके रखता था।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि वह तुम्हें बचा रहा था।”

     

    विहान ने गुस्से में कहा—

     

    “कैद करके?”

     

    “हां।”

     

    “ये कैसी सुरक्षा थी?”

     

    देवेंद्र चुप हो गया।

     

     

     

    आरव की उलझन

     

    आरव अब तक कुछ नहीं बोला था।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ रखा था।

     

    “आरव?”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “अगर नैना मेरी मां थीं… तो माधवी मां कौन हैं?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “माधवी तुम्हारी मां की बहन थीं।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे पाला।”

     

    “हां।”

     

    “उन्होंने मुझे कभी ये महसूस नहीं होने दिया कि मैं उनका बेटा नहीं हूं।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि उनके लिए तुम सिर्फ भांजे नहीं थे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “तुम उनका बेटा थे।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके मन में माधवी की सारी बातें घूमने लगीं।

     

    बचपन में उसका माथा सहलाना…

     

    बीमार होने पर पूरी रात उसके पास बैठना…

     

    उसके स्कूल के पहले दिन रोना…

     

    हर मुश्किल में उसका साथ देना।

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मां ने मुझे कभी झूठे प्यार से नहीं पाला।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि मां वही होती है जो आपको जन्म देने के साथ-साथ आपको प्यार भी दे।”

     

    आरव ने आरोही की तरफ देखा।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “तुम हर मुश्किल वक्त में मेरे साथ क्यों खड़ी रहती हो?”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “क्योंकि मैंने तुमसे प्यार किया है।”

     

    आरव ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

     

     

    अचानक गोली की आवाज

     

    धांय!

     

    गोली दीवार से टकराई।

     

    देवेंद्र तुरंत सबको नीचे झुकने का इशारा करता है।

     

    “राजवीर ने रास्ता ढूंढ लिया!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “वो यहां तक कैसे पहुंचा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “उसके पास इस हवेली का नक्शा है।”

     

    अमन ने बंदूक निकाल ली।

     

    “तो फिर उसे यहां आने से रोकते हैं।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि राजवीर अकेला नहीं है।”

     

    दूर से कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    फिर दर्जनों कदम।

     

    विहान घबरा गया।

     

    “वो आ गए।”

     

    देवेंद्र ने सामने की दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “उस दरवाजे के पीछे एक और रास्ता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां जाता है?”

     

    “नैना के आखिरी कमरे में।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें वहां क्या मिलेगा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम्हारी मां की आखिरी रिकॉर्डिंग।”

     

     

     

    नैना की आखिरी रिकॉर्डिंग

     

    दरवाजा खोलते ही एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे में पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    उसके पास एक चिट्ठी थी।

     

    देवेंद्र ने उसे उठाया।

     

    चिट्ठी पर लिखा था—

     

    “मेरे बच्चों के लिए।”

     

    विहान ने कांपते हाथों से रिकॉर्डर चालू किया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।

     

    फिर एक महिला की आवाज आई—

     

    “अगर मेरे बच्चे ये आवाज सुन रहे हैं, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं हूं।”

     

    विहान की आंखों से आंसू निकलने लगे।

     

    “मां…”

     

    आवाज आगे बोली—

     

    “मैं चाहती हूं कि मेरे तीनों बच्चे एक दिन एक साथ खड़े हों।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैंने तुम तीनों को अलग इसलिए किया क्योंकि मुझे डर था कि मेरे दुश्मन तुम्हें नुकसान पहुंचाएंगे।”

     

    अमन की आंखों से भी आंसू बहने लगे।

     

    नैना की आवाज कांप रही थी।

     

    “तुम तीनों के पिता अलग नहीं हैं…”

     

    तीनों भाई एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

     

    “तुम्हारे पिता देवेंद्र हैं।”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “लेकिन तुम्हारी परवरिश अलग-अलग लोगों ने की, ताकि कोई तुम्हें पहचान न सके।”

     

    रिकॉर्डिंग में कुछ सेकंड का सन्नाटा आया।

     

    फिर नैना ने कहा—

     

    “और एक बात…”

     

    आवाज अचानक गंभीर हो गई।

     

    “अगर राजवीर तुम्हें ढूंढ ले, तो उस पर कभी भरोसा मत करना।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्यों?”

     

    रिकॉर्डिंग में नैना ने कहा—

     

    “क्योंकि राजवीर सिर्फ तुम्हारे परिवार का दुश्मन नहीं है…”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

     

    विहान ने मशीन को झकझोर दिया।

     

    “आगे बोलो मां!”

     

    लेकिन रिकॉर्डिंग बंद थी।

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद यही पूरी रिकॉर्डिंग थी।”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “ये रिकॉर्डिंग अधूरी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “बाकी हिस्सा कहां है?”

     

    देवेंद्र ने कमरे की दीवार की तरफ देखा।

     

    “यहीं।”

     

     

     

    दीवार के पीछे छुपा रहस्य

     

    देवेंद्र ने दीवार पर तीन बार दस्तक दी।

     

    टक… टक… टक…

     

    फिर उसने एक पत्थर हटाया।

     

    अंदर से छोटी सी मेमोरी चिप निकली।

     

    आरोही ने कहा—

     

    “ये क्या है?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नैना की पूरी रिकॉर्डिंग।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “इसे अभी क्यों नहीं सुनते?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर ये रिकॉर्डिंग राजवीर के हाथ लग गई, तो वो हम सबको खत्म कर देगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो सुनते हैं।”

     

    देवेंद्र ने चिप रिकॉर्डर में लगा दी।

     

    कुछ सेकंड बाद नैना की आवाज फिर सुनाई दी—

     

    “अगर तुम ये हिस्सा सुन रहे हो तो समझो राजवीर तुम्हारे बहुत करीब है।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    नैना की आवाज आगे आई—

     

    “और सबसे बड़ा सच ये है कि राजवीर अकेला काम नहीं करता था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “उसके साथ कौन था?”

     

    रिकॉर्डिंग में नैना बोली—

     

    “उसका साथी… तुम्हारे बहुत करीब है।”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

     

    सब स्तब्ध रह गए।

     

    विहान ने पूछा—

     

    “हमारे बहुत करीब?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    देवेंद्र ने तुरंत रिकॉर्डर बंद किया।

     

    सबने हथियार संभाल लिए।

     

    दरवाजा धीरे-धीरे खुला।

     

    सामने…

     

    माधवी खड़ी थीं।

     

    आरव दौड़कर उनके पास गया।

     

    “मां!”

     

    माधवी ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उनकी नजर देवेंद्र पर पड़ी।

     

    उनका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    देवेंद्र भी उन्हें देखकर चुप हो गया।

     

    आरोही ने गौर किया कि दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे उनके बीच कोई बहुत पुराना रिश्ता हो।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मां, आप देवेंद्र को जानती हैं?”

     

    माधवी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    देवेंद्र ने भी नजरें झुका लीं।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “मां?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “हां… मैं देवेंद्र को सिर्फ जानती नहीं हूं।”

     

    वह कुछ पल रुकीं।

     

    फिर बोलीं—

     

    “मैंने कभी तुमसे ये नहीं बताया कि तुम्हारे जन्म से पहले… देवेंद्र और मेरा भी एक रिश्ता था।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    आरोही ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    और उसी वक्त बाहर से राजवीर की आवाज आई—

     

    “माधवी! अब झूठ बोलना बंद करो… क्योंकि तुम्हारा सबसे बड़ा राज मेरे पास है।”

     

    माधवी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 43

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 43

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 43 : राजवीर की वापसी

     

    हवेली की सारी लाइटें बंद थीं।

     

    चारों तरफ घना अंधेरा था।

     

    सिर्फ बाहर खड़ी गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी खिड़कियों से अंदर आ रही थी।

     

    और उसी अंधेरे में एक आवाज गूंजी—

     

    “शेखर… अपने बेटों को मेरे हवाले कर दो।”

     

    आरव ने तुरंत अपने दोनों भाइयों की तरफ देखा।

     

    अमन ने बंदूक कसकर पकड़ रखी थी।

     

    विहान के चेहरे पर डर था, लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था।

     

    आरोही आरव के बिल्कुल पास खड़ी थी।

     

    रुद्र ने धीरे से कहा—

     

    “राजवीर ने पूरी हवेली को घेर लिया है।”

     

    शेखर खिड़की के पास गया और बाहर देखा।

     

    उसकी आंखों में पहली बार सचमुच डर दिखाई दिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    शेखर ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “ये आदमी जितना मैं सोच रहा था, उससे कहीं ज्यादा ताकतवर हो चुका है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “आपने ही तो कहा था कि राजवीर आपका सबसे पुराना दोस्त था।”

     

    शेखर ने कड़वी हंसी हंसी।

     

    “था।”

     

    “अब?”

     

    शेखर ने बाहर देखते हुए कहा—

     

    “अब वो मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

     

     

    राजवीर की पहली चाल

     

    अचानक हवेली के मुख्य दरवाजे पर जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    दरवाजा टूटकर जमीन पर गिर गया।

     

    कई हथियारबंद लोग अंदर घुस आए।

     

    रुद्र ने तुरंत गोली चलाई।

     

    अमन भी उनके सामने आ गया।

     

    आरव ने आरोही को पीछे किया।

     

    “तुम यहां से नहीं हटोगी।”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “मैंने कहा ना, जहां तुम हो वहीं मैं रहूंगी।”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी यही जिद मुझे डराती है।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “और तुम्हारा प्यार मुझे हिम्मत देता है।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    तभी अमन ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    “भाई! रोमांस बाद में करना, पहले इन लोगों को संभालो!”

     

    आरोही ने तुरंत नजरें हटा लीं।

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तू कभी नहीं सुधरेगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और तुम दोनों कभी सुधरोगे नहीं।”

     

    अचानक एक गोली उनकी तरफ आई।

     

    रुद्र ने तुरंत आरव को नीचे खींच लिया।

     

    गोली दीवार में जा लगी।

     

    “सावधान!”

     

     

     

    तीनों भाइयों की पहली लड़ाई

     

    अमन आगे बढ़ा और दो आदमियों को रोक लिया।

     

    विहान ने भी एक हमलावर को पीछे धकेला।

     

    आरव ने पहली बार अपने दोनों भाइयों को एक साथ लड़ते देखा।

     

    उसे अजीब-सा एहसास हुआ।

     

    जैसे यह दृश्य उसने पहले भी देखा हो।

     

    तीन छोटे बच्चे…

     

    एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए…

     

    और सामने खड़ा कोई दुश्मन।

     

    आरव के सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    “आह!”

     

    आरोही तुरंत उसके पास आई।

     

    “आरव!”

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

    “फिर सिर क्यों पकड़ रखा है?”

     

    “मुझे कुछ याद आ रहा है।”

     

    “क्या?”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    एक आवाज उसके कानों में गूंजी—

     

    “जब तीनों भाई एक साथ खड़े होंगे, तभी तिजोरी खुलेगी।”

     

    आरव ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    “तिजोरी!”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “कौन-सी तिजोरी?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “वही जिसका जिक्र मां की डायरी में था।”

     

     

     

    राजवीर सामने आया

     

    अचानक गोलीबारी रुक गई।

     

    हथियारबंद लोग पीछे हट गए।

     

    और दरवाजे से एक आदमी अंदर आया।

     

    काले सूट में।

     

    सफेद बाल।

     

    हाथ में चांदी की छड़ी।

     

    उसकी उंगली में वही काली अंगूठी थी, जिस पर सांप का निशान बना था।

     

    आरव की नजर उसकी अंगूठी पर टिक गई।

     

    “राजवीर।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार तुमने मुझे पहचान लिया।”

     

    शेखर उसके सामने आ गया।

     

    “तुम यहां से चले जाओ।”

     

    राजवीर हंसा।

     

    “इतने सालों बाद भी तुम मुझे आदेश दोगे?”

     

    “मैं तुम्हारा मालिक था।”

     

    “था।”

     

    राजवीर ने वही शब्द दोहराया।

     

    “अब नहीं।”

     

    शेखर ने बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे परिवार को बर्बाद किया।”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “तुम्हारा परिवार पहले ही टूट चुका था।”

     

    “तुमने मेरी पत्नी को मारा।”

     

    “कौन-सी पत्नी?”

     

    शेखर की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “नैना।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “नैना की मौत के लिए मुझे दोष मत दो।”

     

    विहान आगे आया।

     

    “झूठ!”

     

    राजवीर ने पहली बार उसे गौर से देखा।

     

    उसकी आंखों में अजीब-सा भाव आया।

     

    “तुम…”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मैं नैना का बेटा हूं।”

     

    राजवीर कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “तो तुम जिंदा हो।”

     

    विहान के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    आरव तुरंत उसकी तरफ आ गया।

     

    “तुम्हें पहले से पता था कि विहान जिंदा है?”

     

    राजवीर चुप रहा।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तुमने उसे क्यों ढूंढा?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “क्योंकि विहान के पास वो चीज है, जिसकी मुझे सबसे ज्यादा जरूरत है।”

     

    विहान ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “तुम्हारी मां की आखिरी याद।”

     

     

     

    विहान की याद

     

    विहान का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी मां की आखिरी याद?”

     

    “हां।”

     

    “मुझे कुछ याद नहीं।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें याद नहीं… लेकिन तुम्हारे दिमाग में वो सब मौजूद है।”

     

    डॉक्टर अचानक बेचैन हो गया।

     

    “राजवीर, उसे छोड़ दो।”

     

    राजवीर ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “तुम अब भी इनके लिए मरने को तैयार हो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    राजवीर हंसा।

     

    “तुमने पच्चीस साल पहले भी यही कहा था।”

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “आप दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते थे।”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आपने हमसे क्या छुपाया?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “तुम्हारे जन्म की पूरी कहानी।”

     

     

     

    असली जन्म का रहस्य

     

    राजवीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम तीनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये हम जानते हैं।”

     

    “नहीं।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “तुम सिर्फ इतना जानते हो कि तुम तीनों एक ही रात पैदा हुए।”

     

    “लेकिन तुम्हें ये नहीं पता कि तुम तीनों को एक ही अस्पताल में क्यों रखा गया था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “क्योंकि तीनों बच्चों को एक ही मां ने जन्म दिया था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    माधवी ने तुरंत कहा—

     

    “झूठ!”

     

    राजवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें लगता है सच छुपाने से वो बदल जाएगा?”

     

    आरव ने माधवी की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    माधवी की आंखों में डर था।

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “आरव, अमन और विहान… तीनों की जन्मदात्री एक ही औरत थी।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “कौन?”

     

    राजवीर ने धीरे से कहा—

     

    “नैना।”

     

    विहान स्तब्ध रह गया।

     

    “तो आरव और अमन भी…”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “लेकिन मेरी मां माधवी है।”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “माधवी ने तुम्हें पाला।”

     

    “लेकिन जन्म?”

     

    “नैना।”

     

    आरव की आंखें माधवी पर टिक गईं।

     

    “मां… क्या ये सच है?”

     

    माधवी रोने लगीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “आपने मुझसे झूठ बोला?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मेरी असली मां नैना थी?”

     

    माधवी ने धीरे से सिर झुका दिया।

     

    “हां।”

     

     

     

    सबसे बड़ा झटका

     

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव…”

     

    लेकिन आरव कुछ सुन नहीं रहा था।

     

    उसके दिमाग में बचपन की तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक महिला उसे गोद में उठाए हुए थी।

     

    एक औरत उसके माथे पर चूम रही थी।

     

    उसकी आवाज—

     

    “मेरे बच्चे…”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “वो… नैना थीं?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    आरव ने डॉक्टर को देखा।

     

    “फिर आपने मेरी यादें क्यों मिटाईं?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें नैना याद रहतीं, तो तुम राजवीर तक पहुंच जाते।”

     

    राजवीर हंस पड़ा।

     

    “और यही मैं नहीं चाहता था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तुम्हें हमसे क्या चाहिए?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “तुम तीनों की जरूरत है।”

     

    “किसलिए?”

     

    राजवीर ने अपनी छड़ी जमीन पर मारी।

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने मरने से पहले अपनी सारी संपत्ति और सबूत तुम्हारे नाम कर दिए थे।”

     

    शेखर चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “लेकिन नैना की सारी संपत्ति तो खत्म हो गई थी।”

     

    “तुम्हें ऐसा लगा।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “उसने सब कुछ एक गुप्त ट्रस्ट में रखा था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और उसकी चाबी?”

     

    राजवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पास है।”

     

    आरव ने अपनी जेब टटोली।

     

    वही छोटी चाबी।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

     

     

    चाबी किसकी थी?

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “वही चाबी मुझे दे दो।”

     

    आरव ने चाबी कसकर पकड़ ली।

     

    “नहीं।”

     

    “तो तुम्हारे भाइयों में से एक मर जाएगा।”

     

    अमन आगे बढ़ा।

     

    “पहले मुझे मार।”

     

    विहान भी उसके पास खड़ा हो गया।

     

    “और मुझे भी।”

     

    आरव ने दोनों को देखा।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हम तीनों साथ हैं।”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “और मैं भी।”

     

    राजवीर हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है प्यार और भाईचारा तुम्हें बचा लेगा?”

     

    आरव ने दृढ़ता से कहा—

     

    “हां।”

     

    राजवीर ने इशारा किया।

     

    उसके आदमी बंदूकें उठाने लगे।

     

    तभी अचानक हवेली की सारी खिड़कियां बंद हो गईं।

     

    रुद्र ने चौंककर कहा—

     

    “ये किसने किया?”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “मैंने।”

     

    राजवीर उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तुम भूल गए कि इस हवेली का गुप्त सिस्टम किसने बनाया था।”

     

    अचानक फर्श के नीचे से लोहे की आवाज आई।

     

    दीवारें खिसकने लगीं।

     

    एक गुप्त रास्ता खुल गया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तीनों भाई अंदर जाओ!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और आप?”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “मुझे अपना पुराना हिसाब चुकाना है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं!”

     

    लेकिन डॉक्टर ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    आरव, अमन, विहान और आरोही उस गुप्त रास्ते में चले गए।

     

    दरवाजा बंद होते ही बाहर से गोलियों की आवाज सुनाई देने लगी।

     

    धांय! धांय! धांय!

     

    विहान डर गया।

     

    “डॉक्टर!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हम उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकते।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन रास्ता बंद है।”

     

    तभी सामने एक लोहे का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उस पर तीन शब्द लिखे थे—

     

    “नैना के बच्चे।”

     

    आरव ने चाबी निकाली।

     

    लेकिन ताले में चाबी लगाने से पहले ही उसके पीछे से आरोही की आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    वह मुड़ी हुई दीवार की तरफ देख रही थी।

     

    वहां एक तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में नैना थी।

     

    उसकी गोद में तीन छोटे बच्चे थे।

     

    और उनके पीछे खड़ा था…

     

    अभय।

     

    लेकिन तस्वीर के कोने में एक और आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने उसे देखते ही कहा—

     

    “ये कौन है?”

     

    विहान ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    फिर उसके चेहरे पर डर छा गया।

     

    “मैं इसे जानता हूं।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    विहान ने कांपते हुए कहा—

     

    “ये आदमी… मुझे बचपन से सपनों में दिखाई देता था।”

     

    और उसी पल दरवाजे के पीछे से एक आवाज आई—

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारा असली पिता हूं।”

     

    तीनों भाई जम गए।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 42 :

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 42 :

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 42 : तीनों की असली मां कौन है?

     

    “अब आखिरी सच सामने आने का समय आ गया है।”

     

    डॉक्टर की बात सुनते ही कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे वक्त कुछ पल के लिए रुक गया हो।

     

    आरव की नजर अपनी मां माधवी पर थी।

     

    अमन और विहान भी उन्हें ही देख रहे थे।

     

    आरव ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “मां… आपने अभी क्या कहा?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैंने कहा… आरव मेरा बेटा है।”

     

    आरव का दिल टूटने लगा।

     

    “तो अमन और विहान?”

     

    माधवी ने दोनों की तरफ देखा।

     

    “तुम दोनों भी मेरे बच्चे हो… लेकिन मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया।”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “तो इतने साल आपने हमें अपना बेटा क्यों कहा?”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने मरते वक्त मुझे तुम दोनों की जिम्मेदारी सौंपी थी।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “मेरी मां कौन थी?”

     

    माधवी ने जवाब देने के लिए होंठ खोले, लेकिन आवाज नहीं निकली।

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, अब सच बता दीजिए।”

     

    माधवी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तुम्हारी मां का नाम…”

     

    वह रुक गईं।

     

    तभी शेखर ने कहा—

     

    “नैना।”

     

    विहान जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “नैना… मेरी मां?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    विहान की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो आपने मेरी मां को क्यों मारा?”

     

    शेखर ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैंने नहीं मारा।”

     

    विहान चौंक गया।

     

    “फिर कौन?”

     

    शेखर ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “इस सवाल का जवाब वही देगा।”

     

    सबकी नजर डॉक्टर पर टिक गई।

     

     

     

    डॉक्टर का सबसे बड़ा सच

     

    डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

     

    “नैना की मौत उस रात हुई थी जब उसने शेखर का सच जान लिया था।”

     

    विहान ने पूछा—

     

    “क्या सच?”

     

    “शेखर अकेला सम्राट नहीं था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो उसके साथ कौन था?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “एक ऐसा व्यक्ति, जिस पर शेखर आंख बंद करके भरोसा करता था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

     

    “अभय।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन अभय तो शेखर के खिलाफ था।”

     

    “बाद में।”

     

    “मतलब?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शुरुआत में अभय और शेखर साथ काम करते थे।”

     

    आरव को जैसे झटका लगा।

     

    “तो मेरे पिता भी…?”

     

    “हां।”

     

    “उन्होंने भी गलत काम किया था?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “कुछ समय तक।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर उन्होंने सब छोड़ क्यों दिया?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि उन्हें प्यार हो गया था।”

     

    “किससे?”

     

    डॉक्टर ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “अभय को माधवी से प्यार हो गया था।”

     

    शेखर ने पहली बार बीच में कहा—

     

    “और यही हमारी दुश्मनी की शुरुआत थी।”

     

     

     

    दो भाइयों के बीच का प्यार

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन इसका हमारी मां से क्या संबंध है?”

     

    माधवी ने धीरे से कहा—

     

    “सिया और नैना मेरी बहनें थीं।”

     

    तीनों की आंखें फैल गईं।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “हम तीन बहनें थीं।”

     

    “माधवी… सिया… और नैना।”

     

    विहान ने कांपते हुए पूछा—

     

    “तो मेरी मां आपकी बहन थीं?”

     

    “हां।”

     

    अमन की आवाज भी कांप गई।

     

    “और मेरी मां?”

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “सिया।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तो हम दोनों…”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम दोनों मेरे भांजे हो।”

     

    आरव ने दोनों भाइयों को देखा।

     

    कुछ पल कोई कुछ नहीं बोला।

     

    फिर आरव आगे बढ़ा और दोनों को गले लगा लिया।

     

    “रिश्ता चाहे जैसा हो… तुम दोनों मेरे भाई हो।”

     

    अमन ने उसे कसकर पकड़ लिया।

     

    “भाई से बढ़कर।”

     

    विहान ने भी दोनों को पकड़ लिया।

     

    “मैंने जिंदगी भर भाई को ढूंढा था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब कभी अकेले नहीं रहोगे।”

     

     

     

    लेकिन असली सवाल अभी बाकी था

     

    आरव ने माधवी से पूछा—

     

    “मां, अगर सिया और नैना आपकी बहनें थीं, तो आप तीनों अलग कैसे हुईं?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “शेखर की वजह से।”

     

    शेखर चुपचाप सुन रहा था।

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शेखर ने हमारे परिवार को बर्बाद कर दिया।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम सच नहीं जानती।”

     

    माधवी ने गुस्से से कहा—

     

    “मैंने सब अपनी आंखों से देखा है।”

     

    “नहीं।”

     

    “तो बताओ।”

     

    शेखर चुप हो गया।

     

    माधवी ने कहा—

     

    “सिया को तुम्हारे कारोबार का पता चला।”

     

    “नैना ने तुम्हारा विरोध किया।”

     

    “और अभय तुम्हें छोड़कर हमारे साथ खड़ा हो गया।”

     

    “तुमने एक-एक करके सबको खत्म करना शुरू कर दिया।”

     

    शेखर ने धीमे से कहा—

     

    “मैंने किसी को खत्म नहीं किया।”

     

    माधवी चौंकी।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मैंने सिर्फ उन्हें बचाने की कोशिश की थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

     

     

    शेखर की सफाई

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम लोग मुझे जितना बुरा समझते हो, मैं उतना बुरा नहीं हूं।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “मेरी मां मर गई।”

     

    विहान बोला—

     

    “मेरी मां भी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मेरे पिता भी।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मैंने किसी को नहीं मारा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो फिर कौन मारता रहा?”

     

    शेखर ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    डॉक्टर का चेहरा बदल गया।

     

    आरव समझ गया।

     

    “डॉक्टर?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “आपने हमारी मांओं को मारा?”

     

    डॉक्टर ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं!”

     

    “तो फिर?”

     

    डॉक्टर की आंखों में डर आ गया।

     

    “मैंने उन्हें मारने की कोशिश नहीं की।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “साफ-साफ बोलिए।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “मैंने उन्हें बचाने की कोशिश की थी।”

     

    “लेकिन वे मरी कैसे?”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि हमारे बीच एक और व्यक्ति था।”

     

     

     

    चौथा नाम

     

    रुद्र ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “वही व्यक्ति जिसने पच्चीस साल से सबको एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “राजवीर।”

     

    शेखर का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “राजवीर!”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “राजवीर कौन है?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मेरा सबसे पुराना दोस्त।”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “दोस्त नहीं।”

     

    फिर उनकी आंखों में नफरत भर गई।

     

    “वही आदमी जिसने मेरी दोनों बहनों को मारा।”

     

    विहान की सांस रुक गई।

     

    “मेरी मां को?”

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “और सिया को?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “उसे भी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन उसने ऐसा क्यों किया?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “क्योंकि वह शेखर का साम्राज्य चाहता था।”

     

    शेखर ने पहली बार सिर झुका लिया।

     

    “और मैंने उसे कभी नहीं पहचाना।”

     

     

     

    पुरानी डायरी का दूसरा पन्ना

     

    अमन ने सिया की डायरी फिर खोली।

     

    अचानक एक मुड़ा हुआ पन्ना नीचे गिरा।

     

    उस पर सिर्फ कुछ शब्द लिखे थे—

     

    “अगर मैं मर जाऊं तो राजवीर पर भरोसा मत करना।”

     

    अमन की आंखें फैल गईं।

     

    “मां को पता था!”

     

    आरव ने पन्ना लिया।

     

    नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    14 अगस्त।

     

    वही तारीख।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही रात।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    अचानक आरव को फिर अपनी बचपन की याद आने लगी।

     

    वह अस्पताल के कमरे में था।

     

    माधवी उसके पास थीं।

     

    सिया रो रही थीं।

     

    नैना किसी बच्चे को गोद में लिए हुए थी।

     

    और दरवाजे के बाहर एक आदमी खड़ा था।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसकी उंगली में एक बड़ी काली अंगूठी थी।

     

    आरव ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    “अंगूठी!”

     

    रुद्र ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “राजवीर की अंगूठी कैसी है?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “काली।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “उस पर सांप का निशान है?”

     

    शेखर चौंक गया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “वही आदमी उस रात अस्पताल में था।”

     

     

     

    सबसे बड़ा खतरा

     

    अचानक शेखर का फोन बजा।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    दूसरी तरफ से किसी ने सिर्फ एक बात कही—

     

    “तीनों बच्चे एक साथ हैं।”

     

    शेखर का चेहरा बदल गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    फोन कट गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन था?”

     

    शेखर ने फोन नीचे कर लिया।

     

    “राजवीर।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    विहान ने पूछा—

     

    “वो हमें क्यों ढूंढ रहा है?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “क्योंकि उसे पता चल गया है कि तुम तीनों एक साथ हो।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो?”

     

    शेखर ने गंभीर आवाज में कहा—

     

    “तो अब वो तुम्हें मारने आएगा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “उसे आने दो।”

     

    शेखर ने उसे देखा।

     

    “तुम नहीं जानते राजवीर कितना खतरनाक है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “हम तीनों भाई एक साथ हैं।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और हम पीछे नहीं हटेंगे।”

     

    विहान ने भी सिर हिलाया।

     

    “इस बार कोई हमें अलग नहीं कर सकता।”

     

    आरव ने तीनों भाइयों की तरफ देखा।

     

    फिर माधवी के पास जाकर उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, अब हम भागेंगे नहीं।”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम्हें लड़ना पड़ेगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किससे?”

     

    माधवी ने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “उस आदमी से, जिसने पच्चीस साल पहले तुम्हारे परिवार को तोड़ा था।”

     

    उसी वक्त बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।

     

    रुद्र ने खिड़की से देखा।

     

    उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “आरव…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    रुद्र ने कांपते हुए कहा—

     

    “राजवीर अकेला नहीं आया है।”

     

    “कितने लोग हैं?”

     

    “पूरी से कहती” 

     

    और उसी पल हवेली की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में एक आवाज गूंजी—

     

    “शेखर… अपने बेटों को मेरे हवाले कर दो।”

     

    शेखर ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

     

    आरव ने आरोही का हाथ थाम लिया।

     

    और तीनों भाई एक साथ खड़े हो गए।

     

    क्योंकि अब उनकी लड़ाई सिर्फ अपने परिवार के लिए नहीं… अपने प्यार और अपने भविष्य के लिए भी थी।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 41 :

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 41 :

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 41 : डॉक्टर का आखिरी सच

     

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    शेखर की आवाज तहखाने की दीवारों से टकराकर गूंज उठी।

     

    लेकिन आरव का ध्यान शेखर पर नहीं था।

     

    उसके कानों में सिर्फ एक आवाज गूंज रही थी—

     

    “आरव!”

     

    माधवी की चीख।

     

    आरव का चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।

     

    “मां!”

     

    वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा, लेकिन शेखर ने तुरंत उसके सामने बंदूक तान दी।

     

    “एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुम्हारी मां को खो दोगे।”

     

    आरव रुक गया।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव, पहले सोचो।”

     

    आरव ने शेखर को घूरते हुए कहा—

     

    “अगर मेरी मां को कुछ हुआ ना, तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

     

    शेखर ने ठंडी हंसी हंसी।

     

    “मुझे तुम्हारी माफी चाहिए भी नहीं।”

     

    अमन आगे आया।

     

    “मां को क्यों लाए हो?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम तीनों को एक साथ लाने के लिए मुझे किसी ऐसे इंसान की जरूरत थी, जिसे तुम तीनों दिल से अपना मानते हो।”

     

    विहान ने गुस्से में कहा—

     

    “आपने उन्हें हाथ भी लगाया तो…”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम अभी भी मुझे अपना पिता नहीं मानते?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “पिता वो होता है जो अपने बच्चों को बचाए, कैद नहीं करे।”

     

    शेखर के चेहरे पर कुछ पल के लिए दर्द आया।

     

    लेकिन उसने तुरंत अपना चेहरा कठोर कर लिया।

     

    “तुम्हें बहुत कुछ नहीं पता, विहान।”

     

     

     

    डॉक्टर का सच

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “आपने कहा था कि आपने धोखा दिया।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन शेखर के लिए नहीं।”

     

    “नहीं।”

     

    “तो किसके लिए?”

     

    डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

     

    “तुम तीनों के लिए।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा था।

     

    “आपने हमें सच से दूर रखा।”

     

    “क्योंकि सच तुम्हारी जान ले सकता था।”

     

    “और झूठ?”

     

    डॉक्टर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “झूठ ने तुम्हारी जिंदगी जरूर छीन ली… लेकिन तुम्हारी सांसें बचाए रखीं।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    डॉक्टर ने आगे कहा—

     

    “पच्चीस साल पहले शेखर को पता चल गया था कि उसकी तीनों संतानें उसके खिलाफ जा सकती हैं।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “इसलिए उसने हमें अलग कर दिया?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आपने हमारी यादें क्यों मिटाईं?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि शेखर के लोग तुम्हारे पीछे लगे थे। अगर तुम्हें सब याद रहता तो वे तुम्हें ढूंढ लेते।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आपने मेरी याददाश्त क्यों खत्म नहीं की?”

     

    डॉक्टर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “मैंने तुम्हारी सारी यादें नहीं मिटाईं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैंने सिर्फ कुछ खास यादों को दबाया।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि एक दिन तुम्हें उनकी जरूरत पड़ेगी।”

     

    डॉक्टर ने संदूक से छोटी चाबी उठाई।

     

    “और वो दिन आज है।”

     

     

     

    चाबी का रहस्य

     

    आरव ने चाबी को देखा।

     

    “ये किसकी है?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उस कमरे की, जिसे शेखर ने पच्चीस साल से बंद रखा है।”

     

    शेखर अचानक गरज उठा—

     

    “चुप रहो!”

     

    डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    शेखर ने बंदूक उठा ली।

     

    “तुम्हें पता है मैं क्या कर सकता हूं।”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “हां।”

     

    “तो डर नहीं लगता?”

     

    “अब नहीं।”

     

    शेखर ने गोली चलाने के लिए हाथ उठाया।

     

    लेकिन उसी वक्त रुद्र ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    धांय!

     

    गोली छत में जा लगी।

     

    रुद्र ने शेखर को धक्का दिया।

     

    “अब तुम अकेले नहीं हो।”

     

    शेखर लड़खड़ाकर गिरा।

     

    आरव ने तुरंत चाबी उठा ली।

     

    “हमें मां के पास जाना होगा।”

     

    अमन और विहान उसके साथ हो लिए।

     

    आरोही भी उनके पीछे चल पड़ी।

     

    लेकिन डॉक्टर ने उसे रोक लिया।

     

    “आरोही।”

     

    “जी?”

     

    “आरव को अकेला मत छोड़ना।”

     

    आरोही ने गंभीरता से कहा—

     

    “कभी नहीं।”

     

     

     

    माधवी कहां है?

     

    आरव ऊपर पहुंचा तो पूरा कमरा अस्त-व्यस्त था।

     

    मेज टूटी हुई थी।

     

    कुर्सी जमीन पर पड़ी थी।

     

    लेकिन माधवी वहां नहीं थीं।

     

    “मां!”

     

    आरव ने पूरी हवेली में आवाज लगाई।

     

    “मां!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद उन्हें कहीं और ले गए।”

     

    विहान ने फर्श पर कुछ देखा।

     

    “भैया!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

     

    फर्श पर माधवी का दुपट्टा पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “मां…”

     

    आरोही ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “हम उन्हें ढूंढ लेंगे।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैंने बचपन में मां का हाथ खोया था।”

     

    उसकी आवाज टूट गई।

     

    “अब दोबारा नहीं खोऊंगा।”

     

    आरोही ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “इस बार मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    दोनों की आंखों में एक-दूसरे के लिए वही भरोसा था, जो किसी वादे से कम नहीं था।

     

     

     

    बंद कमरा

     

    विहान ने अचानक कहा—

     

    “मुझे लगता है मां नीचे नहीं गईं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि शेखर ने उन्हें कहीं जाने नहीं दिया होगा।”

     

    “तो?”

     

    विहान ने हवेली की दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “इस घर में एक कमरा है, जिसका दरवाजा बाहर से नहीं खुलता।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “पुरानी लाइब्रेरी के पीछे।”

     

    सब लोग वहां पहुंचे।

     

    लाइब्रेरी में सैकड़ों पुरानी किताबें थीं।

     

    विहान ने एक किताब खींची।

     

    टक!

     

    दीवार का एक हिस्सा पीछे हट गया।

     

    एक संकरा रास्ता दिखाई दिया।

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये रास्ता मुझे याद क्यों नहीं?”

     

    डॉक्टर ने पीछे से कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी इसी जगह की याद मैंने दबाई थी।”

     

    आरव ने उसे देखा।

     

    “क्यों?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि यहां तुम्हारे पिता की मौत हुई थी।”

     

    आरव ठिठक गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “अभय?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

     

     

    अभय की आखिरी रात

     

    वे रास्ते से आगे बढ़े।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे की दीवार पर खून के पुराने निशान थे।

     

    आरव अचानक दीवार को छूते ही पीछे हट गया।

     

    उसके दिमाग में एक दृश्य कौंधा।

     

    एक आदमी जमीन पर गिरा हुआ था।

     

    एक महिला रो रही थी।

     

    एक छोटा बच्चा चिल्ला रहा था—

     

    “पापा उठो!”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “नहीं…”

     

    आरोही ने उसे संभाला।

     

    “आरव!”

     

    “मुझे सब दिख रहा है।”

     

    “क्या?”

     

    “पापा…”

     

    आरव की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “अभय यहां मरे थे।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “किसने मारा?”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    आरव ने चीखकर पूछा—

     

    “किसने?”

     

    पीछे से शेखर की आवाज आई—

     

    “मैंने।”

     

    सबने पीछे देखा।

     

    शेखर धीरे-धीरे कमरे में आ रहा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    आरव की आंखों में नफरत भर गई।

     

    “तुमने मेरे पिता को मारा?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    अमन आगे बढ़ा।

     

    “क्यों?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “क्योंकि वो मुझे खत्म करना चाहता था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “वो तुम्हें रोकना चाहता था।”

     

    “वो मेरे खिलाफ था।”

     

    “और इसलिए तुमने उसे मार दिया?”

     

    शेखर चुप रहा।

     

    आरव की मुट्ठियां कस गईं।

     

    “तुम इंसान नहीं हो।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद।”

     

    फिर उसने धीमे से कहा—

     

    “लेकिन उस रात मैंने सिर्फ अभय को नहीं मारा था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और किसे?”

     

    शेखर की आंखों में दर्द उभरा।

     

    “तुम्हारी मां माधवी वहीं थी।”

     

    आरव का दिल रुक-सा गया।

     

    “क्या?”

     

    “उसने सब देखा था।”

     

    “तो फिर वो जिंदा कैसे बचीं?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “क्योंकि अभय ने मरने से पहले मुझे एक बात बताई थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “उसने कहा था कि अगर मैंने माधवी को कुछ किया, तो मेरे तीनों बेटे मुझे कभी माफ नहीं करेंगे।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

     

     

    माधवी का ठिकाना

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मां कहां हैं?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरोही आगे बढ़ी।

     

    “अगर आप सच में उन्हें नहीं मारना चाहते थे तो उन्हें कहां रखा?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो जिंदा हैं।”

     

    आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

     

    “कहां?”

     

    शेखर ने दीवार के पीछे बने एक और रास्ते की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    आरव तुरंत उस तरफ दौड़ा।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    उसने जोर से धक्का दिया।

     

    “मां!”

     

    अंदर से धीमी आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मां!”

     

    उसने दरवाजा तोड़ दिया।

     

    अंदर माधवी बैठी थीं।

     

    कमजोर।

     

    आंखों में आंसू।

     

    लेकिन जिंदा।

     

    आरव उनके पास जाकर घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ लिया।

     

    “तू आ गया।”

     

    आरव उनके गले लग गया।

     

    “मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    माधवी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    फिर उनकी नजर अमन और विहान पर पड़ी।

     

    उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तुम तीनों…”

     

    विहान उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने उसका चेहरा छुआ।

     

    “मेरा बच्चा…”

     

    तीनों भाई माधवी से लिपट गए।

     

    कई सालों से बिखरा हुआ परिवार पहली बार एक साथ था।

     

    लेकिन तभी माधवी की नजर शेखर पर पड़ी।

     

    उनके चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “तुम…”

     

    शेखर चुप रहा।

     

    माधवी ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “तुमने इन्हें सच बता दिया?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “अब छुपाने को कुछ नहीं बचा।”

     

    माधवी ने तुरंत आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ मां?”

     

    माधवी ने डरते हुए कहा—

     

    “तुम्हें अभी भी एक बात नहीं पता।”

     

    “क्या?”

     

    माधवी ने शेखर की तरफ देखा।

     

    फिर बोलीं—

     

    “तुम तीनों में से एक बच्चा मेरा बेटा नहीं है।”

     

    तीनों भाई स्तब्ध रह गए।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    विहान पीछे हट गया।

     

    आरव ने माधवी की तरफ देखा।

     

    “मां, आप क्या कह रही हैं?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मुझे माफ कर देना।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसे आपने जन्म दिया?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा—

     

    “सिर्फ एक को।”

     

    “किसे?”

     

    माधवी ने आरव की तरफ देखा।

     

    फिर अमन की तरफ।

     

    फिर विहान की तरफ।

     

    और आखिर में उन्होंने कांपते हुए उंगली उठाई—

     

    “आरव मेरा बेटा है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    माधवी ने रोते हुए कहा—

     

    “लेकिन तुम दोनों की मां कौन है… ये सच मैंने पच्चीस साल से छुपा रखा है।”

     

    शेखर की आंखों में एक अजीब-सी मुस्कान आई।

     

    और तभी डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “अब आखिरी सच सामने आने का समय आ गया है।”

     

    जारी रहेगा…

     

     

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 40

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 40

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 40 : तीनों भाइयों का सबसे बड़ा राज

     

     

    “इस बार आपके सामने सिर्फ आपका बेटा नहीं, उसकी पत्नी भी खड़ी होगी।”

     

    आरोही की बात सुनकर शेखर कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    उसकी आंखों में गुस्सा था, लेकिन आरोही पीछे नहीं हटी।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरोही, मेरे पीछे रहो।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। अब जो होगा, हम साथ मिलकर देखेंगे।”

     

    अमन ने विहान का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    तीनों भाई नीचे जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    शेखर ने उन्हें रोकने के लिए हाथ उठाया, लेकिन तभी ऊपर से एक जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरी हवेली हिल गई।

     

    छत से धूल गिरने लगी।

     

    रुद्र चिल्लाया—

     

    “जल्दी करो! नीचे का हिस्सा कभी भी गिर सकता है!”

     

    आरव ने विहान से पूछा—

     

    “डायरी कहां है?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “नीचे पुराने तहखाने में।”

     

    “रास्ता?”

     

    “मुझे याद है।”

     

    तीनों भाई तेजी से सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

     

     

    तहखाने का बंद दरवाजा

     

    सीढ़ियों के आखिर में लोहे का एक बड़ा दरवाजा था।

     

    विहान उसके सामने रुक गया।

     

    “यही है।”

     

    अमन ने दरवाजा खींचा।

     

    “बंद है।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “इसका ताला चाबी से नहीं खुलेगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो कैसे?”

     

    विहान ने दीवार पर बने तीन निशानों की तरफ इशारा किया।

     

    वहां तीन हथेलियों के निशान बने थे।

     

    एक पर लिखा था—

     

    आर

     

    दूसरे पर—

     

     

    और तीसरे पर—

     

    वि

     

    आरव समझ गया।

     

    “तीनों को एक साथ हाथ रखना होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “क्यों?”

     

    विहान ने धीमे से कहा—

     

    “क्योंकि मां कहती थीं कि यह दरवाजा सिर्फ तीन भाइयों के लिए बनाया गया है।”

     

    आरव ने अपनी हथेली पहले निशान पर रखी।

     

    अमन ने दूसरे पर।

     

    विहान ने तीसरे पर।

     

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर अंदर से भारी आवाज आई—

     

    घर्ररर…

     

    दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    तीनों भाई एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

     

    आरव की आंखों में नमी थी।

     

    “मां ने सच में हमें अलग नहीं किया था।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “उन्होंने हमें वापस एक होने का रास्ता भी छोड़ दिया था।”

     

     

     

    सिया की डायरी

     

    तहखाने में एक छोटी मेज थी।

     

    उसके ऊपर कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    विहान उसे देखते ही आगे बढ़ा।

     

    “यही है।”

     

    अमन ने कांपते हाथों से डायरी उठाई।

     

    उसने कवर पर हाथ फेरा।

     

    “मां…”

     

    आरव उसके पास खड़ा हो गया।

     

    “खोलो।”

     

    अमन ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर मेरे तीनों बच्चे कभी एक साथ यह डायरी पढ़ें, तो समझना मेरा इंतजार खत्म हुआ।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    आरव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “आरव, अमन और विहान… तुम तीनों को अलग-अलग नाम मिले, लेकिन तुम्हारे बीच का रिश्ता कभी अलग नहीं हुआ।”

     

    विहान ने रोते हुए कहा—

     

    “मां हमें भाई मानती थीं।”

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम भाई हैं।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हमेशा रहेंगे।”

     

     

     

    नैना का सच

     

    अगले पन्ने पर नैना की तस्वीर लगी थी।

     

    आरव ने तस्वीर देखते हुए पूछा—

     

    “यही नैना थीं?”

     

    विहान ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    अमन ने डायरी पढ़नी शुरू की।

     

    सिया ने लिखा था—

     

    “नैना बहुत अच्छी औरत थी। लेकिन उसने शेखर से शादी करके अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा जोखिम लिया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “शेखर ने उसे क्यों मारा?”

     

    अमन ने अगली लाइन पढ़ी—

     

    “नैना को शेखर के असली कारोबार का पता चल गया था।”

     

    विहान की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी मां को इसलिए मारा गया?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    फिर उसने अगली लाइन पढ़ी।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने पूछा।

     

    अमन ने डायरी उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    आरव ने पढ़ा—

     

    “लेकिन नैना की मौत शेखर ने नहीं करवाई थी।”

     

    आरव चौंका।

     

    “तो किसने?”

     

    नीचे सिर्फ एक नाम था—

     

    “अभय।”

     

    विहान के हाथ कांपने लगे।

     

    “अभय?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    डॉक्टर, जो उनके पीछे खड़ा था, अचानक बोल पड़ा—

     

    “क्योंकि अभय नैना को बचाना चाहता था।”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

     

     

    डॉक्टर का नया सच

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “उस रात अभय नैना को शेखर के घर से निकालने आया था।”

     

    “लेकिन?”

     

    “शेखर के लोगों ने उसे घेर लिया।”

     

    “फिर?”

     

    “गोलियां चलीं।”

     

    विहान ने पूछा—

     

    “मेरी मां?”

     

    डॉक्टर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “नैना को गोली लगी।”

     

    विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “और अभय?”

     

    “उसने नैना को बचाने की कोशिश की।”

     

    “लेकिन वो बची नहीं?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    विहान ने दीवार पर हाथ मार दिया।

     

    “मैंने इतने साल गलत आदमी से नफरत की!”

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “तुम्हारी गलती नहीं थी।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मुझे हमेशा बताया गया कि अभय ने मेरी मां को मारा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हम सबको झूठ बताया गया।”

     

    आरव ने डायरी की तरफ देखा।

     

    “लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है।”

     

     

     

    लाल फाइल का असली पासवर्ड

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर एक अजीब निशान बना था।

     

    एक गोल घेरे के अंदर तीन अंक थे—

     

    1 – 4 – 0 – 8

     

    आरव उसे देखते ही ठिठक गया।

     

    “यही नंबर!”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तुम्हें याद था।”

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “इसका मतलब क्या है?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    विहान ने डायरी का अगला पन्ना खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “14 अगस्त को जो हुआ, उसका सच सिर्फ वह व्यक्ति जानता है जिसने तीनों बच्चों को जन्म लेते देखा।”

     

    तीनों भाई डॉक्टर की तरफ देखने लगे।

     

    डॉक्टर पीछे हट गया।

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “आरव…”

     

    “अब आप कहीं नहीं जाएंगे।”

     

    “तुम नहीं जानते कि उस रात क्या हुआ था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो बताइए।”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “तीनों बच्चों का जन्म किसने देखा था?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “मैंने।”

     

     

     

    जन्म की रात

     

    डॉक्टर ने कहना शुरू किया—

     

    “14 अगस्त की रात अस्पताल में तीन बच्चों का जन्म हुआ था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन रिकॉर्ड में तो सिर्फ दो बच्चों का नाम था।”

     

    “क्योंकि तीसरे बच्चे का रिकॉर्ड जानबूझकर मिटा दिया गया था।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मेरा?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि शेखर चाहता था कि दुनिया को सिर्फ दो बच्चों के बारे में पता चले।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि तीनों बच्चों के जन्म के साथ एक भविष्यवाणी जुड़ी थी।”

     

    अमन ने हैरानी से पूछा—

     

    “कैसी भविष्यवाणी?”

     

    डॉक्टर ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “तीनों में से जो बच्चा सबसे ज्यादा याद रखेगा, वही शेखर के साम्राज्य को खत्म करेगा।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “इसलिए मेरी याददाश्त?”

     

    “हां।”

     

    “शेखर ने मुझे इस्तेमाल किया क्योंकि उसे डर था कि मैं उसके खिलाफ जा सकता हूं।”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

     

     

    ऊपर शेखर का इंतजार

     

    उधर तहखाने के बाहर शेखर बेचैनी से टहल रहा था।

     

    विराज उसके पास खड़ा था।

     

    “वे नीचे क्या ढूंढ रहे हैं?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “सिया की डायरी।”

     

    “उसमें क्या है?”

     

    “मेरा अंत।”

     

    विराज ने चौंककर पूछा—

     

    “इतना बड़ा राज?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “उस डायरी में मेरे साम्राज्य की असली कुंजी है।”

     

    “कौन-सी?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरी मौत के बाद सब कुछ किसके नाम होगा।”

     

    विराज की आंखों में लालच चमक उठा।

     

    “किसके?”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “यही तो मुझे भी जानना है।”

     

     

     

    तहखाने में छुपा संदूक

     

    आरव ने डायरी के नीचे हाथ लगाया।

     

    वहां लकड़ी का एक छोटा हिस्सा उठा हुआ था।

     

    उसने उसे खींचा।

     

    नीचे एक छोटा संदूक दिखाई दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “इसे खोलो।”

     

    आरव ने संदूक खोला।

     

    अंदर तीन चीजें थीं।

     

    एक पुरानी अंगूठी।

     

    एक छोटी चाबी।

     

    और एक फोटो।

     

    फोटो देखकर तीनों भाई स्तब्ध रह गए।

     

    फोटो में उनकी तीनों माताएं साथ खड़ी थीं—

     

    माधवी, सिया और नैना।

     

    लेकिन उनके साथ एक चौथा व्यक्ति भी था।

     

    अभय।

     

    विहान ने फोटो उठाई।

     

    “ये चारों एक-दूसरे को जानते थे।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “सिर्फ जानते नहीं थे।”

     

    “तो?”

     

    “ये चारों मिलकर शेखर के खिलाफ काम कर रहे थे।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर सब बिखर क्यों गए?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि उनमें से किसी एक ने धोखा दिया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने जवाब देने के बजाय जमीन पर पड़ी अंगूठी की तरफ देखा।

     

    उस पर एक निशान बना था।

     

    रुद्र ने उसे देखते ही कहा—

     

    “ये निशान मैंने पहले भी देखा है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “विराज की अंगूठी पर।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “विराज?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो क्या विराज ही वो आदमी था जिसने सबको धोखा दिया?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शायद।”

     

    तभी ऊपर से शेखर की आवाज आई—

     

    “शायद नहीं, आरव।”

     

    सबने ऊपर देखा।

     

    शेखर सीढ़ियों पर खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    लेकिन इस बार उसके साथ कोई आदमी नहीं था।

     

    वह अकेला नीचे उतर रहा था।

     

    “सच जानना चाहते हो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हां।”

     

    शेखर धीरे-धीरे उनके सामने आया।

     

    उसकी नजर तीनों भाइयों पर गई।

     

    फिर बोला—

     

    “विराज ने किसी को धोखा नहीं दिया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो किसने?”

     

    शेखर ने डायरी की तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “धोखा देने वाला…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    फिर उसने डॉक्टर की तरफ इशारा किया।

     

    “यही आदमी था।”

     

    डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    अमन ने हैरानी से कहा—

     

    “डॉक्टर?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “इसीने तुम्हारी तीनों मांओं को एक-दूसरे के खिलाफ किया था।”

     

    डॉक्टर पीछे हटने लगा।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या ये सच है?”

     

    डॉक्टर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “हां… मैंने धोखा दिया था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    लेकिन डॉक्टर ने अगली बात कही—

     

    “लेकिन मैंने ये सब शेखर के लिए नहीं किया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो किसके लिए?”

     

    डॉक्टर ने संदूक से वह छोटी चाबी उठाई और कहा—

     

    “तुम्हें बचाने के लिए।”

     

    उसी समय ऊपर से माधवी की चीख सुनाई दी—

     

    “आरव!”

     

    आरव घबरा गया।

     

    “मां!”

     

    शेखर के चेहरे पर एक खतरनाक मुस्कान आ गई।

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 39 :

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 39 :

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 39 : विहान को बचाने की जंग

     

     

    हवेली के बाहर लगातार गोलियों की आवाज गूंज रही थी।

     

    धांय! धांय! धांय!

     

    खिड़कियों के शीशे टूटकर जमीन पर बिखरने लगे।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    “नीचे झुको!”

     

    अमन ने भी बंदूक संभाल ली।

     

    रुद्र खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगा।

     

    “हम चारों तरफ से घिरे हुए हैं।”

     

    डॉक्टर ने घबराकर पूछा—

     

    “कितने आदमी हैं?”

     

    रुद्र ने बाहर देखते हुए कहा—

     

    “कम से कम बीस।”

     

    शेखर वहीं खड़ा मुस्कुरा रहा था।

     

    आरव ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम्हें पहले से पता था।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “बिल्कुल।”

     

    “तुमने हमें यहां बुलाया ही इसलिए था?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    शेखर ने लाल फाइल उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि तुम अपने भाई को बचाने के लिए कुछ भी करोगे।”

     

    आरव ने फाइल नहीं ली।

     

    “विहान कहां है?”

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    “पहले उसे दिखाओ।”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “तुम अभी भी मुझ पर भरोसा नहीं करते।”

     

    आरव ने कड़वी हंसी हंसी।

     

    “जिस आदमी ने मेरी पूरी जिंदगी झूठ में रखी, उस पर भरोसा कैसे करूं?”

     

    शेखर की आंखों में दर्द की एक झलक आई।

     

    लेकिन अगले ही पल उसका चेहरा फिर कठोर हो गया।

     

    “तो फिर तुम्हारे पास सिर्फ एक रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “मुझे रोककर अपने भाई को ढूंढो।”

     

     

     

    अचानक हमला

     

    दरवाजा जोर से टूट गया।

     

    शेखर के आदमी अंदर घुस आए।

     

    रुद्र ने तुरंत गोली चलाई।

     

    एक आदमी जमीन पर गिर गया।

     

    “सब पीछे हटो!”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरे साथ रहना।”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “मैं कहीं नहीं जा रही।”

     

    अमन ने दो आदमियों को रोकते हुए कहा—

     

    “भाई, तुम आगे बढ़ो!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और तुम?”

     

    “मैं संभाल लूंगा।”

     

    “अमन!”

     

    “जाओ!”

     

    आरव, आरोही और डॉक्टर पीछे की तरफ भागे।

     

    लेकिन शेखर वहीं खड़ा रहा।

     

    विराज भी उसके पास था।

     

    विराज ने पूछा—

     

    “आपने इन्हें जाने क्यों दिया?”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि उन्हें लगता है कि वे भाग रहे हैं।”

     

    “लेकिन?”

     

    “असल में वे वहीं जा रहे हैं जहां मैं उन्हें भेजना चाहता हूं।”

     

    विराज का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “पुरानी हवेली?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

     

     

    गुप्त रास्ता

     

    आरव एक पुराने गलियारे से गुजर रहा था।

     

    उसे अचानक बचपन की याद आई।

     

    एक छोटा बच्चा उसके साथ दौड़ रहा था।

     

    “भैया! जल्दी करो!”

     

    आरव रुक गया।

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने आंखें बंद कीं।

     

    “ये रास्ता… मुझे याद है।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तुम पहले भी यहां आए हो।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैं और विहान यहां खेलते थे।”

     

    “विहान का कमरा कहां था?”

     

    आरव ने कुछ सेकंड सोचा।

     

    फिर दाईं तरफ मुड़ गया।

     

    “इधर।”

     

    आरोही उसके पीछे चली।

     

    डॉक्टर ने पूछा—

     

    “तुम्हें पक्का याद है?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हां।”

     

    कुछ दूर जाकर एक लकड़ी का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    आरव ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे में धूल जमा थी।

     

    दीवार पर बच्चों के बनाए हुए चित्र थे।

     

    एक चित्र में तीन बच्चे हाथ पकड़े हुए थे।

     

    आरव ने चित्र को छुआ।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हम तीनों…”

     

    आरोही ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हें विहान से बहुत प्यार था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “फिर उसे तुमसे अलग क्यों किया गया?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसे याद करने की कोशिश करते ही उसके सिर में तेज दर्द होने लगा।

     

    अचानक एक आवाज उसके दिमाग में गूंजी—

     

    “आरव, अगर कभी विहान को ढूंढना हो तो नीली दीवार के पीछे देखना।”

     

    आरव ने आंखें खोल दीं।

     

    “नीली दीवार!”

     

    डॉक्टर ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    आरव ने कमरे की दीवारों को देखा।

     

    एक दीवार बाकी दीवारों से थोड़ी अलग थी।

     

    उस पर नीले रंग की पुरानी पपड़ी जमी थी।

     

    आरव ने दीवार पर हाथ फेरा।

     

    टक!

     

    अंदर से खोखली आवाज आई।

     

    “यही है।”

     

     

     

    छुपा हुआ कमरा

     

    आरव ने दीवार पर जोर से हाथ मारा।

     

    लकड़ी का एक हिस्सा टूट गया।

     

    पीछे छोटा-सा रास्ता दिखाई दिया।

     

    तीनों अंदर चले गए।

     

    कुछ कदम बाद उन्हें एक कमरा मिला।

     

    कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी थी।

     

    और उस कुर्सी पर कोई बैठा था।

     

    उसके हाथ बंधे थे।

     

    चेहरा नीचे झुका हुआ था।

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “विहान?”

     

    वह आदमी धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाने लगा।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    सामने एक जवान लड़का था।

     

    चेहरा थका हुआ।

     

    आंखों में दर्द।

     

    लेकिन चेहरे की बनावट…

     

    आरव जैसी।

     

    अमन जैसी।

     

    वह लड़का उन्हें देखता रहा।

     

    फिर उसकी नजर आरव पर टिक गई।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “भैया…”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसके होंठ कांपने लगे।

     

    “विहान?”

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    “आप सच में आ गए।”

     

    आरव दौड़कर उसके पास गया।

     

    उसके हाथ खोले।

     

    फिर दोनों भाई एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    “मुझे पता था तुम मुझे लेने आओगे।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैं तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “आपने बहुत देर कर दी।”

     

    “माफ कर दो।”

     

    “आपकी गलती नहीं थी।”

     

    आरोही की आंखें भी भर आईं।

     

    डॉक्टर चुपचाप दोनों भाइयों को देख रहा था।

     

     

     

    विहान की कहानी

     

    अमन भी वहां पहुंच गया।

     

    विहान ने उसे देखा।

     

    कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर विहान धीरे से बोला—

     

    “भैया?”

     

    अमन ने उसे गले लगा लिया।

     

    “हां।”

     

    तीनों भाई एक-दूसरे को पकड़कर खड़े रहे।

     

    विहान ने कहा—

     

    “मुझे हमेशा बताया गया कि मेरे दोनों भाई मुझे छोड़कर चले गए।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हमने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तुम्हें यहां किसने रखा?”

     

    विहान की आंखों में डर आ गया।

     

    “शेखर।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “उसने तुम्हें क्यों कैद किया?”

     

    विहान बोला—

     

    “क्योंकि उसे लगता है कि मेरे पास उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या?”

     

    विहान ने धीरे से कहा—

     

    “उसकी पत्नी की डायरी।”

     

    डॉक्टर ने तुरंत पूछा—

     

    “कौन-सी डायरी?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “सिया की।”

     

    अमन की सांस रुक गई।

     

    “मेरी मां की डायरी?”

     

    विहान ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “वो तुम्हारे पास है?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मैंने उसे छुपा दिया था।”

     

     

     

    डायरी कहां है?

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    विहान ने कमरे की छत की तरफ देखा।

     

    “इस हवेली के नीचे।”

     

    रुद्र अचानक कमरे में आ गया।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “हमें जल्दी निकलना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “शेखर खुद यहां आ रहा है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो आने दो।”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “तुम उसे नहीं जानते।”

     

    विहान ने घबराकर कहा—

     

    “वो मुझे वापस ले जाएगा।”

     

    आरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “अब कोई तुम्हें नहीं ले जाएगा।”

     

    अचानक बाहर कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    धीरे-धीरे…

     

    कोई दरवाजे के पास आ रहा था।

     

    टक… टक… टक…

     

    विहान डरकर पीछे हट गया।

     

    डॉक्टर ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वो आ गया।”

     

    दरवाजा खुला।

     

    सामने शेखर खड़ा था।

     

    उसके पीछे कई हथियारबंद लोग थे।

     

    शेखर ने तीनों भाइयों को एक साथ देखा।

     

    उसकी आंखें नम हो गईं।

     

    “आखिरकार… मेरे तीनों बच्चे एक साथ।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हम तुम्हारे बच्चे नहीं हैं।”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “तुम अभी भी यही सोचते हो?”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या मतलब?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “विहान से पूछो।”

     

    सभी की नजर विहान पर गई।

     

    विहान का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “विहान?”

     

    विहान कांपते हुए बोला—

     

    “मुझे… मुझे सब पता है।”

     

    “क्या?”

     

    विहान की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं अभय का बेटा नहीं हूं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “क्या?”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मेरे पिता का नाम अभय नहीं… शेखर है।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “लेकिन डॉक्टर ने कहा था—”

     

    शेखर ने बीच में कहा—

     

    “डॉक्टर ने बहुत कुछ झूठ बताया है।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या ये सच है?”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “डॉक्टर!”

     

    डॉक्टर ने आखिरकार कहा—

     

    “हां।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तो हम तीनों…”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तीनों मेरे बेटे हो।”

     

    अमन ने सिर पकड़ लिया।

     

    “लेकिन मां?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “सिया सिर्फ तुम्हारी मां थी।”

     

    “और आरव की मां?”

     

    “माधवी।”

     

    “विहान की?”

     

    शेखर चुप हो गया।

     

    विहान ने खुद कहा—

     

    “मेरी मां… कोई और थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    विहान ने जवाब देने से पहले शेखर की तरफ देखा।

     

    शेखर की आंखों में पहली बार डर था।

     

    विहान ने कहा—

     

    “जिसका नाम आज तक किसी ने नहीं लिया।”

     

    “कौन?”

     

    विहान ने धीरे से कहा—

     

    “नैना।”

     

    डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    रुद्र ने तुरंत पूछा—

     

    “नैना?”

     

    विहान ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन थी नैना?”

     

    डॉक्टर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “नैना… शेखर की पहली पत्नी थी।”

     

    शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    विहान आगे बोला—

     

    “और उसकी मौत के पीछे भी…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसका हाथ था?”

     

    विहान ने शेखर की तरफ देखा।

     

    शेखर ने नजरें झुका लीं।

     

    विहान ने कहा—

     

    “मेरे पिता का।”

     

    कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

     

    आरव की आंखें शेखर पर टिक गईं।

     

    शेखर ने कुछ नहीं कहा।

     

    और तभी हवेली के नीचे से जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरी जमीन हिल गई।

     

    रुद्र चिल्लाया—

     

    “नीचे बम लगाया गया है!”

     

    शेखर ने तुरंत कहा—

     

    “सब बाहर निकलो!”

     

    लेकिन आरव ने विहान का हाथ पकड़ लिया।

     

    “पहले डायरी।”

     

    विहान ने सिर हिलाया।

     

    “वो नीचे है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो चलो।”

     

    तीनों भाई नीचे जाने लगे।

     

    शेखर ने उन्हें रोकने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन उसी पल आरोही उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

     

    “अगर आपने उन्हें रोकने की कोशिश की…”

     

    शेखर ने पूछा—

     

    “तो?”

     

    आरोही ने दृढ़ता से कहा—

     

    “इस बार आपके सामने सिर्फ आपका बेटा नहीं, उसकी पत्नी भी खड़ी होगी।”

     

    शेखर उसे घूरता रहा।

     

    और पहली बार…

     

    उसे समझ आया कि आरव अकेला नहीं है।

     

    जारी रहेगा…

     

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 38

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 38

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 38 : गोली के सामने प्यार

     

     

    विराज ने जैसे ही बंदूक आरव की तरफ तानी, आरोही का दिल दहल उठा।

     

    “आरव!”

     

    वह तुरंत उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

     

    आरव ने हैरानी से उसे देखा।

     

    “आरोही, हटो!”

     

    “नहीं।”

     

    “वो गोली चला देगा।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “तो पहले मुझे लगेगी।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “तुम पागल हो गई हो?”

     

    आरोही हल्की मुस्कान के साथ बोली—

     

    “तुम्हारे प्यार में।”

     

    एक पल के लिए सब शांत हो गए।

     

    विराज ने बंदूक नीचे कर दी।

     

    शेखर ने उसे घूरकर देखा।

     

    “विराज, गोली चलाओ।”

     

    विराज ने आरव और आरोही को देखा।

     

    उसकी उंगली ट्रिगर पर थी।

     

    लेकिन वह गोली नहीं चला पाया।

     

    शेखर गरज उठा—

     

    “मैंने कहा गोली चलाओ!”

     

    विराज ने धीमे से कहा—

     

    “मैं नहीं कर सकता।”

     

    शेखर की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “क्या कहा?”

     

    “मैं आरोही को नहीं मार सकता।”

     

    शेखर ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा—

     

    “तुम्हें उससे प्यार है?”

     

    विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “विराज…”

     

    विराज ने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम नहीं समझोगे।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “प्यार समझने के लिए इंसान होना जरूरी है।”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और शायद मैं इंसान रह ही नहीं गया।”

     

     

     

    शेखर का गुस्सा

     

    शेखर ने विराज के हाथ से बंदूक छीन ली।

     

    “कमजोरी।”

     

    फिर उसने खुद बंदूक आरव की तरफ तान दी।

     

    “अब देखता हूं कौन बचाता है तुम्हें।”

     

    डॉक्टर ने आगे बढ़कर कहा—

     

    “शेखर, बस करो।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने बहुत साल मेरे खिलाफ खेल खेला है।”

     

    “मैंने बच्चों को बचाया था।”

     

    “तुमने मेरे वारिस को मुझसे दूर किया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैं तुम्हारा वारिस नहीं हूं।”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें लगता है कि तुम मुझसे नफरत करके मेरी दुनिया से बाहर निकल जाओगे?”

     

    “हां।”

     

    “तुम गलत हो।”

     

    शेखर ने लाल फाइल जमीन पर फेंक दी।

     

    “क्योंकि तुम्हारे खून में मेरा साम्राज्य है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मेरे खून में तुम्हारा नाम नहीं, मेरे मां-बाप की परवरिश है।”

     

    शेखर की आंखों में गुस्सा चमका।

     

    “मां-बाप?”

     

    वह हंसा।

     

    “तुम्हारी मां ने तुम्हें मुझसे बचाया था।”

     

    “हां।”

     

    “और बदले में क्या मिला उसे?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    शेखर ने कहा—

     

    “उसने अपनी पूरी जिंदगी झूठ में गुजार दी।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम्हारी वजह से।”

     

     

     

    लाल फाइल का राज

     

    अमन ने जमीन पर पड़ी फाइल उठा ली।

     

    शेखर ने तुरंत बंदूक उसकी तरफ कर दी।

     

    “फाइल नीचे रखो।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “अमन!”

     

    आरव ने उसे रोकना चाहा।

     

    लेकिन अमन ने फाइल खोल दी।

     

    पहले पन्ने पर वही नाम थे।

     

    आरव।

     

    अमन।

     

    अभय।

     

    माधवी।

     

    सिया।

     

    शेखर।

     

    अमन ने पन्ने पलटने शुरू किए।

     

    फिर अचानक एक फोटो उसके हाथ में आई।

     

    वह फोटो देखकर उसकी सांस रुक गई।

     

    “आरव…”

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    अमन ने फोटो उसे दे दी।

     

    फोटो में दो छोटे बच्चे थे।

     

    एक आरव।

     

    दूसरा अमन।

     

    लेकिन उनके साथ एक तीसरा बच्चा भी था।

     

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “ये कौन है?”

     

    डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “इसे फाइल में नहीं होना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन है ये?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तीसरा बच्चा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “उसका नाम?”

     

    डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया।

     

    शेखर अचानक चिल्लाया—

     

    “फाइल बंद करो!”

     

    आरव समझ गया।

     

    “यही राज है।”

     

    शेखर ने गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    गोली आरव के पास से निकलकर दीवार में जा लगी।

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने उसे पीछे किया।

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

     

     

    तीसरा बच्चा

     

    आरव ने फिर तस्वीर देखी।

     

    तीसरे बच्चे के चेहरे पर हाथ से काली स्याही लगाई गई थी।

     

    जैसे किसी ने जानबूझकर उसकी पहचान मिटाई हो।

     

    आरव ने डॉक्टर से पूछा—

     

    “इस बच्चे को क्यों छुपाया गया?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि वही सबसे बड़ा राज है।”

     

    “कौन था वो?”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    अमन ने कहा—

     

    “बोलिए!”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “वह शेखर का पहला बच्चा था।”

     

    शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “पहला बच्चा?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर उसका क्या हुआ?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “वह मर गया।”

     

    शेखर अचानक चिल्लाया—

     

    “झूठ!”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “तो वो जिंदा है?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “कौन है वो?”

     

    शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम नहीं जानते कि तुम किस दरवाजे को खोल रहे हो।”

     

     

     

    शेखर का दर्द

     

    पहली बार शेखर के चेहरे पर एक पिता का दर्द दिखाई दिया।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “वो मेरा बेटा था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां है?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “आपने उसे ढूंढा नहीं?”

     

    “ढूंढा था।”

     

    “फिर?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “जिस रात उसे अस्पताल से ले जाया गया, उसी रात सिया गायब हो गई थी।”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “सिया?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “मेरी मां?”

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तो मेरी मां उस बच्चे को लेकर गई थी?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो क्या सिया ने तीसरे बच्चे को बचाया?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “शायद।”

     

     

     

    विराज का रहस्य

     

    अचानक विराज आगे आया।

     

    “बस।”

     

    सबकी नजर उस पर गई।

     

    उसने कहा—

     

    “अब ये कहानी आगे नहीं जाएगी।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम इतना डर क्यों रहे हो?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने कहा—

     

    “तुम इस बच्चे को जानते हो।”

     

    विराज की आंखें बदल गईं।

     

    अमन ने तुरंत पूछा—

     

    “तुम जानते हो?”

     

    विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रुद्र ने अचानक कहा—

     

    “मुझे समझ आ गया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने विराज की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “तीसरा बच्चा मरा नहीं था।”

     

    विराज ने आंखें बंद कर लीं।

     

    रुद्र आगे बढ़ा।

     

    “उसे किसी ने बचाया था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने कहा—

     

    “विराज ने।”

     

    सब स्तब्ध रह गए।

     

    आरव ने विराज की तरफ देखा।

     

    “तुमने?”

     

    विराज ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    शेखर गरज उठा—

     

    “विराज!”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “उस रात मैंने उसे मरने से बचाया था।”

     

    “तुमने मेरे बेटे को मुझसे दूर किया!”

     

    “क्योंकि आप उसे भी अपनी तरह बनाना चाहते थे।”

     

    शेखर चुप हो गया।

     

     

     

    तीसरा बच्चा जिंदा है

     

    अमन ने पूछा—

     

    “वो बच्चा अब कहां है?”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में दर्द था।

     

    “बहुत दूर।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    विराज ने कहा—

     

    “जहां कोई उसे पहचानता नहीं।”

     

    “नाम?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने कहा—

     

    “नाम बताओ।”

     

    विराज ने धीरे से कहा—

     

    “विहान।”

     

    आरव के चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी हुई।

     

    “विहान?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    अचानक उसके दिमाग में एक बचपन की याद चमकी।

     

    एक छोटा लड़का…

     

    उसका हाथ पकड़कर कह रहा था—

     

    “भैया, मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “वो…”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या याद आया?”

     

    आरव ने कांपते हुए कहा—

     

    “विहान मेरा भाई था।”

     

    शेखर की आंखें फैल गईं।

     

    “तुम्हें याद आ गया?”

     

    आरव ने सिर उठाया।

     

    “हां।”

     

    “सब?”

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने अपनी कनपटी दबाई।

     

    “लेकिन इतना याद है कि विहान को किसी ने हमसे अलग किया था।”

     

    विराज ने कहा—

     

    “मैंने।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    विराज ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर वह तुम्हारे साथ रहता तो शेखर तुम तीनों को अपने साम्राज्य का हिस्सा बना देता।”

     

     

     

    आरोही का सवाल

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “विहान अभी कहां है?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    शेखर ने कहा—

     

    “वो मेरे पास है।”

     

    विराज तुरंत उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “क्या?”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें लगा मैंने उसे कभी ढूंढा नहीं?”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “आपने उसे ढूंढ लिया?”

     

    “बहुत पहले।”

     

    “तो फिर…”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “वो मेरे पास कैद है।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “कहां?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम्हारी मां की पुरानी हवेली में।”

     

    आरव ने तुरंत कहा—

     

    “हमें वहां ले चलो।”

     

    शेखर हंसा।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अगर उसे कुछ हुआ तो…”

     

    “तो?”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा था।

     

    “मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मुझे तुम्हारी माफी नहीं चाहिए।”

     

    फिर उसने विराज की तरफ देखा।

     

    “लेकिन तुम्हें एक बात जाननी चाहिए।”

     

    विराज चौंका।

     

    “क्या?”

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “विहान सिर्फ मेरा बेटा नहीं है।”

     

    विराज की सांस रुक गई।

     

    “तो?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “वो तुम्हारा भी बेटा है।”

     

    पूरा कमरा स्तब्ध रह गया।

     

    विराज की आंखें फैल गईं।

     

    “ये झूठ है।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “विराज का बेटा?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “ये सच हो सकता है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    डॉक्टर ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि पच्चीस साल पहले सिया ने जो राज छुपाया था…”

     

    वह रुक गया।

     

    “वो सिर्फ आरव और अमन से जुड़ा नहीं था।”

     

    सबकी नजर डॉक्टर पर टिक गई।

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “विहान की मां सिया थी।”

     

    अमन का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी मां?”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो विहान…”

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “हमारा भाई है।”

     

    अचानक बाहर से कई गाड़ियों के इंजन की आवाज आई।

     

    रुद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “हम घिर चुके हैं।”

     

    शेखर ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब फैसला तुम्हें करना है।”

     

    “क्या?”

     

    “मेरे साथ चलो…”

     

    उसने लाल फाइल आरव की तरफ बढ़ाई।

     

    “या फिर अपने भाई विहान को हमेशा के लिए खो दो।”

     

    आरव ने फाइल की तरफ देखा।

     

    फिर आरोही की तरफ।

     

    फिर अमन की तरफ।

     

    और आखिर में शेखर की आंखों में देखते हुए बोला—

     

    “मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूंगा।”

     

    शेखर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    आरव ने आगे कहा—

     

    “लेकिन मैं अपने भाई को लेने जरूर आऊंगा।”

     

    उसी पल हवेली के बाहर गोलियों की बौछार शुरू हो गई।

     

    जारी रहेगा…