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  • ” बस एक सनम चाहिए “…💖💖

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शाम का वक्त था। हल्की-हल्की ठंडी हवा बह रही थी, और आसमान में ढलता हुआ सूरज जैसे किसी अधूरी कहानी का आख़िरी पन्ना लिख रहा हो। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, उस पुराने पार्क की एक बेंच पर आरव चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी खालीपन था—जैसे बहुत कुछ खो चुका हो, या शायद अभी तक कुछ पाया ही न हो।

    आरव हमेशा से ही थोड़ा अलग था। उसे भीड़ में रहना पसंद नहीं था, पर अकेलापन भी उसे खा जाता था। वह अक्सर सोचता था—क्या ज़िंदगी में सच में किसी “एक” इंसान की ज़रूरत होती है? कोई ऐसा, जो सिर्फ तुम्हारा हो… जो बिना कहे सब समझ जाए।

    उसी सोच में डूबा हुआ वह आसमान को देख रहा था कि तभी पास से एक मधुर आवाज़ आई—

    “क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”

    आरव ने चौंक कर देखा। सामने एक लड़की खड़ी थी—सफेद सूट में, बालों को हल्के से बांधे हुए, और आँखों में एक अजीब-सी चमक। वह मुस्कुरा रही थी।

    “हाँ… हाँ, बिल्कुल,” आरव ने थोड़ा झिझकते हुए कहा।

    लड़की उसके पास बैठ गई। कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर उसने कहा,

    “आप रोज़ यहाँ आते हैं, ना?”

    आरव ने हैरानी से पूछा, “आपको कैसे पता?”

    “मैं भी रोज़ आती हूँ,” उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “बस… आप शायद ध्यान नहीं देते।”

    आरव को थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अच्छा भी। “मैं आरव हूँ,” उसने कहा।

    “मीरा,” उसने जवाब दिया।

    उस दिन के बाद से दोनों की मुलाकातें रोज़ होने लगीं। पहले छोटी-छोटी बातें होती थीं—मौसम, किताबें, पसंद-नापसंद। फिर धीरे-धीरे बातों का दायरा बढ़ता गया। अब वे अपने सपनों, डर, और बीते हुए दर्द तक की बातें करने लगे थे।

    मीरा बहुत अलग थी। वह हर छोटी चीज़ में खुशी ढूंढ लेती थी—गिरते हुए पत्ते, उड़ते हुए परिंदे, या फिर बारिश की पहली बूंद। आरव को उसके साथ समय बिताना अच्छा लगने लगा था। उसकी ज़िंदगी में जैसे रंग वापस आने लगे थे।

    एक दिन मीरा ने पूछा,

    “तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज़ की कमी महसूस होती है?”

    आरव कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,

    “एक ऐसा इंसान… जो बिना शर्त प्यार करे। जो मुझे जैसे हूँ वैसे ही अपनाए। बस… एक सनम चाहिए।”

    मीरा ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में कुछ अलग था उस दिन।

    “अगर वो मिल जाए, तो क्या करोगे?” उसने धीरे से पूछा।

    “उसे कभी जाने नहीं दूंगा,” आरव ने तुरंत जवाब दिया।

    मीरा मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में हल्की-सी उदासी थी।

    “हर किसी की किस्मत में वो नहीं होता, आरव।”

    दिन बीतते गए। अब आरव को मीरा का इंतज़ार रहने लगा था। अगर वह एक दिन भी नहीं आती, तो उसे बेचैनी होने लगती। उसे एहसास हो रहा था कि वो मीरा से प्यार करने लगा है।

    एक शाम, जब हल्की बारिश हो रही थी, आरव ने हिम्मत जुटाई।

    “मीरा, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”

    “हम्म?” मीरा ने उसकी तरफ देखा।

    “मुझे लगता है… नहीं, मैं यकीन से कह सकता हूँ… कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

    बारिश की बूंदें तेज़ हो गई थीं। मीरा चुप थी। उसकी आँखें नम हो गई थीं।

    “कुछ तो कहो, मीरा…” आरव ने घबराते हुए कहा।

    मीरा ने गहरी सांस ली।

    “काश… तुम ये बात पहले कहते।”

    “क्या मतलब?” आरव का दिल धड़कने लगा।

    “मतलब ये कि… अब बहुत देर हो चुकी है,” मीरा की आवाज़ कांप रही थी।

    “देर? क्यों? क्या हुआ?” आरव ने बेचैनी से पूछा।

    मीरा ने अपने बैग से एक लिफाफा निकाला और उसे दे दिया।

    “ये पढ़ लेना… सब समझ आ जाएगा।”

    इतना कहकर वह उठी और धीरे-धीरे बारिश में भीगती हुई वहाँ से चली गई। आरव उसे रोक भी नहीं पाया।

    कंपकंपाते हाथों से उसने लिफाफा खोला। उसमें एक चिट्ठी थी—

    “प्रिय आरव,

    जब तुम ये चिट्ठी पढ़ रहे होगे, तब शायद मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी होऊँगी।

    मुझे तुमसे पहली मुलाकात में ही लग गया था कि तुम वही इंसान हो, जिसकी मुझे तलाश थी। लेकिन मेरी ज़िंदगी में एक सच्चाई थी, जिसे मैं तुम्हें बताने से डरती रही।

    मुझे एक गंभीर बीमारी है… डॉक्टरों ने कहा है कि मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है।

    मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझसे प्यार करो, क्योंकि मैं तुम्हें अधूरा छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। लेकिन मैं खुद को तुमसे दूर भी नहीं रख पाई।

    तुम्हारे साथ बिताया हर पल मेरे लिए जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा रहा है।

    तुम कहते थे ना—‘बस एक सनम चाहिए’?

    काश… मैं वही बन पाती, हमेशा के लिए।

    लेकिन अब मुझे जाना होगा।

    एक वादा करना—मेरे जाने के बाद भी तुम जीना मत छोड़ना। किसी और को अपनी जिंदगी में आने देना। क्योंकि तुम प्यार के लायक हो… पूरा, सच्चा और हमेशा रहने वाला प्यार।

    तुम्हारी,

    मीरा”

    चिट्ठी पढ़ते ही आरव की दुनिया जैसे रुक गई। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह उसी बेंच पर बैठा रहा, घंटों तक… जैसे समय थम गया हो।

    अगले दिन वह अस्पतालों में, सड़कों पर, हर जगह मीरा को ढूंढता रहा। लेकिन वह कहीं नहीं मिली। जैसे वो कभी थी ही नहीं—सिर्फ एक खूबसूरत सपना।

    महीने बीत गए। आरव फिर उसी पार्क में जाने लगा, उसी बेंच पर बैठने लगा। लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं था। उसके चेहरे पर एक दर्द था, लेकिन साथ ही एक सुकून भी—क्योंकि उसने सच्चा प्यार महसूस किया था, भले ही थोड़े समय के लिए।

    एक दिन, जब वह बेंच पर बैठा था, एक छोटी-सी लड़की उसके पास आई।

    “भैया, ये आपके लिए है,” उसने एक छोटा सा फूल देते हुए कहा।

    “किसने भेजा?” आरव ने पूछा।

    लड़की ने मुस्कुराकर आसमान की तरफ इशारा किया और दौड़ती हुई चली गई।

    आरव ने फूल को देखा और हल्के से मुस्कुरा दिया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वो दर्द के नहीं, बल्कि यादों के थे।

    उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—

    “तुमने कहा था ना, मुझे जीना होगा… मैं जी रहा हूँ, मीरा। लेकिन तुम्हें कभी भूल नहीं पाऊँगा।”

    हवा फिर से बहने लगी थी। पेड़ के पत्ते सरसराने लगे थे, जैसे कोई धीमे से गुनगुना रहा हो—

    “बस एक सनम चाहिए…”

    और उस दिन आरव को समझ आया—

    कभी-कभी ज़िंदगी हमें वो नहीं देती जो हम चाहते हैं…

    लेकिन वो हमें वो एहसास ज़रूर देती है, जो हमें हमेशा के लिए बदल देता है।

    मीरा उसकी ज़िंदगी में आई, थोड़े समय के लिए…

    लेकिन उसने उसे सिखा दिया कि सच्चा प्यार वक्त का मोहताज नहीं होता।

    आरव अब भी उस पार्क में जाता है। कभी-कभी मुस्कुराता है, कभी आँखें नम हो जाती हैं।

    लेकिन अब वह अकेला नहीं है—

    क्योंकि उसके दिल में एक कहानी बस गई है…

    एक अधूरी, लेकिन बेहद खूबसूरत कहानी—

    जिसमें उसे सच में “बस एक सनम” मिला 

  • मेरी पहली कुकिंग

    मेरी पहली कुकिंग

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रविवार की सुबह थी। घर में बड़ा ही शांत माहौल था। मम्मी मंदिर गई हुई थीं, पापा अखबार पढ़ते-पढ़ते सोफे पर ही खर्राटे मार रहे थे, और छोटा भाई सोनू मोबाइल में गेम खेलते-खेलते दुनिया से बेखबर था।

    मैं किचन के दरवाजे पर खड़ी होकर सबको देख रही थी। अचानक मेरे दिमाग में एक खतरनाक… नहीं-नहीं… “महान” आइडिया आया।

    “आज मैं खाना बनाऊंगी ओर सब को खुश कर दुगी!”

    बस फिर क्या था… मेरे इस फैसले से मुझे तो बहुत खुशी हो रही थी, लेकिन मुझे नहीं पता था कि कुछ ही घंटों बाद घर वालों की हालत ऐसी होने वाली है कि वे भगवान से प्रार्थना करेंगे, “हे प्रभु, इसे दोबारा किचन में मत भेजना!”

    मैंने पूरे आत्मविश्वास से एक थाली ओर चम्मच लेकर पीटते हुए ऐलान किया “सुनो सब लोग! आज का खाना मैं बनाऊंगी।”

    पापा ने आधी नींद में ही पूछा “कौन… खाना बनाएगा…?”

    “मैं!” खुशी से ताली बजाते ही कहा,  इतना सुनते ही पापा की नींद ऐसे गायब हुई जैसे मोबाइल से बैटरी।

    मम्मी भी तभी मंदिर से लौट आई थीं। उन्होंने जैसे ही मेरी बात सुनी, उनके हाथ से प्रसाद की थाली लगभग गिर ही गई।

    “क्या कहा तुमने?”

    मैं खुशी से मम्मी के पास जाके कहा, “मम्मी… आज मैं खाना बनाऊंगी। आपको आराम दूंगी।”

    मम्मी ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं कोई बहुत बड़ा मजाक कर रही हूं।

    “बेटा… तुम्हें पता है किचन में गैस कैसे जलाते हैं?”

    मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा, “यूट्यूब है ना मम्मी! और chatgtp गुरु भी तो है”

    अब तो घर में सन्नाटा छा गया।

    सोनू धीरे से बोला, “मम्मी… आज हम लोग बाहर खाना खा लें क्या?”

    लेकिन अब तो मैं ठान चुकी थी। मैं सीधे किचन में घुस गई। सबसे पहले मैंने सोचा, क्या बनाऊं?

    बहुत सोचने के बाद मैंने chatgtp  पूछा , पर उसकी आधी बातें मेरे दिमाग से निकल गई फिर मैने खुद ही फैसला किया, आलू की सब्जी और रोटी,

    वैसे मेरा मन तो था सही पनीर और पलाऊ, लेकिन फिर सोचा अरे अरे रुक जा पहले दिन ही इतना अच्छा खिलाओगी तो सब को हार्डटेक ही ना आ जाए।

    इसलिए आलू की सब्जी और रोटी बनाने का फैसला किया।  मैंने मोबाइल निकाला और यूट्यूब पर वीडियो चालू किया “5 मिनट में स्वादिष्ट आलू की सब्जी कैसे बनाएं।”

    वीडियो देखकर मुझे लगा, “बस इतना सा काम है?” वो तो में यू चुटकी बजाते ही कर लूंगी। लेकिन असली फिल्म तो अब शुरू होने वाली थी।

    मैंने गैस जलाई… पहले ही कोशिश में “फूsss…” की आवाज आई और मैं डरकर दो कदम पीछे कूद गई।

    बाहर से पापा की आवाज आई , “सब ठीक है ना?”

    मैं बोली “हां हां सब… कंट्रोल में है!”

    हालांकि कंट्रोल में कुछ भी नहीं था। फिर मैंने कड़ाही चढ़ाई और उसमें तेल डाला। अब वीडियो में कहा गया —

    “तेल गर्म होने दें।”

    मैंने इंतजार किया… लेकिन मुझे लगा तेल तो बहुत देर से गर्म हो रहा है, तो मैंने गैस पूरी तेज कर दी।

    बस फिर क्या था… तेल इतना गर्म हो गया कि जैसे ही मैंने जीरा डाला —

    छन्न्न्न्न!!!!

    तेल उछल कर बाहर आने लगा। मैं घबरा गई और चिल्लाई, “मम्म्म्म्म्मी!” मम्मी दौड़कर आईं। “क्या हुआ?”

    मैं बोली, “ये तेल मुझ पर हमला कर रहा है!”

    मम्मी ने माथा पकड़ लिया। “अरे गैस कम कर!”

    मैंने जल्दी से गैस कम की और फिर किसी तरह आलू डाल दिए। अब अगला स्टेप था मसाले डालना।

    लेकिन यहाँ से कहानी और मजेदार होने वाली थी।वीडियो में बोला गया, “एक चम्मच नमक डालें।”

    मैंने नमक का डिब्बा उठाया… लेकिन पता नहीं कैसे मेरा हाथ फिसला और पूरा नमक कड़ाही में गिर गया।

    मैंने सोचा “कोई बात नहीं… पानी डाल देंगे।” मैंने आधा जग पानी डाल दिया।

    अब आलू की सब्जी नहीं… आलू का सूप बन गया था।

    तभी सोनू किचन में आया। “दीदी… क्या बना रही हो?”

    मैंने गर्व से कहा, “आलू की सब्जी।”

    वह कड़ाही में देखकर बोला, “ये तो लग रहा है आलू तैरने की प्रैक्टिस कर रहे हैं।”

    मैंने उसे घूरकर देख कर बोली “बाहर जा!”

    अब बारी थी रोटी बनाने की। मैंने आटा निकाला और गूंधना शुरू किया। लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि आटे में पानी कितना डालना होता है।

    मैंने थोड़ा पानी डाला… फिर लगा सूखा है… और पानी डाल दिया… फिर लगा अभी भी सूखा है… और पानी डाल दिया। कुछ ही देर में आटा नहीं… आटे का दलदल बन गया। मेरा हाथ उसमें फंस गया था।

    सोनू फिर आया और बोला “दीदी… ये रोटी बनेगी या दीवार की पेंट?”

    मैंने गुस्से में कहा “अगर और एक शब्द बोला ना… तो तुझे ही बेल कर तवे पर डाल दूंगी। और उसे भी नहीं सुधरा तो दीवार समझ के इसी आटे से पेंट कर दुगी”

    सोनू डर कर भाग गया मैंने किसी तरह आटा संभाला और रोटी बेलने लगी।

    पहली रोटी बनी… लेकिन वह गोल नहीं थी। वह भारत के नक्शे जैसी लग रही थी।

    दूसरी रोटी… वह ऑस्ट्रेलिया जैसी लग रही थी।

    तीसरी रोटी… वह तो पता नहीं किस ग्रह का नक्शा थी।

    मम्मी चुपचाप दरवाजे से देख रही थीं।

    उन्होंने पापा से धीरे से कहा “आज भूखे रहना पड़ेगा।”

    आखिरकार खाना तैयार हो गया।

    मैंने गर्व से सबको टेबल पर बुलाया। “आइए… आज का स्पेशल खाना तैयार है!”

    पापा, मम्मी और सोनू ऐसे बैठ गए जैसे कोई परीक्षा देने जा रहे हों। सबसे पहले पापा ने सब्जी चखी।

    जैसे ही उन्होंने पहला निवाला खाया… उनका चेहरा अचानक बदल गया। आंखें बड़ी हो गईं। पसीना आने लगा।

    मैंने पूछा, “कैसी है?”

    पापा बोले, “बेटा… नमक थोड़ा… ज्यादा है।” सोनू ने चखा और तुरंत पानी पीने लगा। “दीदी… ये सब्जी नहीं… नमक का समंदर है!”

    अब मम्मी ने रोटी उठाई। उन्होंने तोड़ने की कोशिश की…

    लेकिन रोटी इतनी सख्त थी कि वह टूटी ही नहीं।

    पापा बोले, “ये रोटी है या ढाल?”

    सोनू बोला,“अगर चोर घर में आ जाए तो इससे मार सकते हैं।”

    मैं गुस्से में बोली, “इतनी भी खराब नहीं है!”फिर मैंने खुद खाया… और अगले ही सेकंड पानी के लिए ऐसे भागी जैसे मेरे 10th  का एग्जाम हो। “अरे इस में तो सच में बहुत नमकीन है!”

    घर में सब हंसने लगे।पापा बोले “बेटा… आज का अनुभव बहुत अच्छा था… लेकिन अगली बार हम सब पहले से अस्पताल का नंबर तैयार रखेंगे।”मम्मी मुस्कुराते हुए बोलीं, “कोई बात नहीं… पहली कुकिंग ऐसी ही होती है सब की।”

    सोनू बोला, “दीदी… एक बात बोलूं?”

    “क्या?”

    “आप कविता और कहानी ही लिखो… खाना मत बनाओ।”बस फिर क्या था… पूरे घर में हंसी गूंजने लगी। उस दिन हमने आखिर में क्या किया? सबने मिलकर बाहर से पिज्जा ऑर्डर कर लिया।और मैंने मन ही मन फैसला किया “अगली बार कुकिंग करने से पहले… मम्मी से ट्रेनिंग जरूर लूंगी।”लेकिन आज भी जब घर में कोई बहुत ज्यादा नमक डाल देता है… तो पापा तुरंत कहते हैं —“लगता है आज फिर तुम्हारी पहली कुकिंग वाली रेसिपी याद आ गई!” और फिर पूरे घर में हंसी शुरू हो जाती है।

    Lakshmi Kumari……

  • 💞💞 प्यार का नशा 💞💞

    💞💞 प्यार का नशा 💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    ## जुहू बिच ( मुंबई ) ##

    समुद्र के किनारे जुहू बीच पर, मुंबई की एक सुबह , सूरज की पहली किरणें समुद्र से निकलती हुई लग रही थीं।

          “” रिशाल अग्निहोत्री, जो एक अमीर बिजनेसमैन है, की कार आकर उस जुहू बिच के किनारे लगती है और फिर रिशाल अग्निहोत्री , अपनी कार से उतरते हुए, जुहू बीच की ओर चल देता है । वो यहाँ एक इम्पोर्टेन्ट मीटिंग के लिए आया हूआ था, जो उसके बिजनेस के फ्यूचर को बदल सकती थी।

    जैसे ही वह बीच पर एंट्री लेता है सबही उसकी तरफ देखने लगते है, आखिर रिशाल अग्निहोत्री था ही इतना डेसिंग और चार्म बिलकुल किसी हीरो के तरह उसकी चेहरे पर पैसे का रोव जो होता है, वो साफ नजर आ रहा था, थोड़ा खड़ूस ओर थोड़ा अड़ियल सा रिशाल अग्निहोत्री ,

    वही दूसरी और एक मासूम सी भोली भाली लड़की अमानत , जो अपने भाई के साथ समुद्र के किनारे घूमने आई हुई थी, छोटी छोटी खुशियों को इक्क्ठा करने वाली हमारी अमानत, जो अपने भाई के साथ अपने जन्मदिन की शाम मनाने आई थी, अपने भाई के चेहरे पर खुशियाँ लाने आई थी, आखिर था ही कौन उसका इस जहा मे उसकी छोटे भाई व्योम के अलावे ।

    एक तरफ RA अपनी मीटिंग की तैयारी में था, की तभी उसकी कान मे एक आवाज़ आई और उसने अपनी नजर उठा कर उस आवाज़ के तरफ देखा, वह उसकी मासूमियत और सुंदरता से आकर्षित हो गया। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाता, अमानत उसके साथ आकर गलती से टकरा गई।

    अमानत के हाथ से उसका फोन और पर्स गिर गए, और रिशाल ने जल्दी से अमानत को पकड़ लिया पर इन सब मे रिशाल आमनात को ले उस बिच के किनारे गिर जाता है जहा अंदर रिशाल और ऊपर अमानत दोनों उस बिच की मिट्टी मे लोट पोत हो जाते है,दोनों एक दूसरे के आँखों मे कुछ पल देखते है, रिशाल के आँखों मे जहा एक जूनून और गुस्सा था वही अमानत के आँखों मे डर साफ नजर आ रहा था, तभी जल्दी से अमानत खरी हो जाती है और रिशाल से माफ़ी मांगती है, रिशाल का चेहरा जो काफ़ी गुस्से से भर चूका था |” 

     रिशाल को नहीं पता था कि यह छोटी सी मुलाकात उसकी जिंदगी को कैसे बदल देगी…

    रिशाल से टकराते ही, अमानत को लगा कि वह गुस्से में आ जाएगा। लेकिन उसने नहीं सोचा था कि रिशाल का गुस्सा इतना ज्यादा होगा।

    रिशाल ने अमानत को देखा और उसकी आँखें गुस्से से भर गईं। “तुम्हारी इतनी हिम्मत ?

    तुम्हें देखकर नहीं चलना आता है क्या?” रिशाल ने अमानत से कहा।

    अमानत ने माफी मांगी और कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, मैं अनजाने में आपके साथ टकरा गई।”वो में अपने भाई के साथ खेल रही थी तो अनजाने में ये सब हो गया… सॉरी मे आपकी ड्रेस अभी साफ कर देती हु ये कहते हुए अमानत अपने दुपट्टे से रिशाल का ड्रेस साफ करने लगती है जहा वो साफ होने के बजाय और गन्दा ही हो जाता है, अब तो अमानत की सांस हलक मे थी उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था |” 

    इधर रिशाल का गुस्सा कम नहीं हुआ। “तुम्हें पता नहीं है कि मैं कौन हूँ?

     मैं रिशाल अग्निहोत्री हूँ, और मेरे पास बहुत इम्पोर्टेन्ट काम है। तुम्हारी इस लापरवाही से मेरा कितना समय बर्बाद हो गया पता भी है तुम्हे?”और ये क्या किया तुमने?” 

    •  

    … to be continue…

  • जिस्म की तड़प

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    नीम अँधेरी रात थी। शहर की गलियों में पसरा सन्नाटा जैसे किसी अनकहे डर की गवाही दे रहा था। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ उस सन्नाटे को और गहरा कर रही थी। इसी शहर के एक कोने में, एक टूटी-फूटी झोपड़ी के भीतर, राधा अपनी 16 साल की बेटी पायल के साथ बैठी थी। उनके घर की दीवारें जैसे उनकी गरीबी और मजबूरी की कहानी खुद कह रही थीं।

    राधा की आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह बार-बार दरवाज़े की तरफ देखती, फिर पायल की तरफ। पायल चुपचाप बैठी थी, जैसे उसने चुप रहना ही सीख लिया हो। उसकी आँखों में मासूमियत तो थी, लेकिन उसके पीछे छिपा डर साफ दिखाई देता था।

    “माँ… वो आदमी फिर आएगा क्या आज?” पायल ने धीमी आवाज़ में पूछा।

    राधा का गला सूख गया। उसने जवाब देने की कोशिश की, पर शब्द जैसे उसके होंठों तक आकर रुक गए। कुछ पल की खामोशी के बाद उसने बस इतना कहा, “पता नहीं बेटा… भगवान करे ना आए।”

    लेकिन दोनों जानती थीं—वो आएगा।

    कुछ ही देर बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई। वह दस्तक नहीं, जैसे किसी तूफान की शुरुआत थी। राधा के हाथ काँपने लगे। उसने धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला। सामने वही आदमी खड़ा था—शहर का एक रसूखदार नेता, जो बाहर से समाजसेवी कहलाता था, लेकिन अंदर से एक दरिंदा था।

    “क्यों राधा, आज बहुत देर कर दी?” उसने मुस्कुराते हुए कहा, लेकिन उसकी मुस्कान में दरिंदगी साफ झलक रही थी।

    राधा ने सिर झुका लिया। “साहब… आज रहने दीजिए, मेरी बेटी की तबीयत ठीक नहीं है…”

    वह आदमी जोर से हंसा। “तबीयत ठीक नहीं है या तू बहाना बना रही है? याद है ना, तेरे पति का कर्ज़ अभी बाकी है?”

    राधा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसका पति शराबी था और मरने से पहले उस नेता से कर्ज़ लेकर गया था। वही कर्ज़ अब उनकी ज़िंदगी का अभिशाप बन चुका था।

    “साहब, मैं काम कर लूंगी, मजदूरी कर लूंगी… लेकिन मेरी बेटी को छोड़ दीजिए…” राधा ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

    उस आदमी की आँखों में हवस की आग भड़क उठी। “मुझे तेरी मेहनत नहीं चाहिए राधा… मुझे चाहिए वो, जो मैं चाहता हूँ।”

    पायल यह सब सुन रही थी। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह डर से काँप रही थी, लेकिन उसकी आँखों में अब एक अजीब सा गुस्सा भी था।

    राधा ने पायल को पीछे छिपाने की कोशिश की, लेकिन उस आदमी ने उसे धक्का देकर अलग कर दिया।

    “आज तो मैं इसे लेकर जाऊंगा,” उसने पायल की तरफ बढ़ते हुए कहा।

    पायल पीछे हटने लगी। “नहीं… मुझे मत छुओ…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

    लेकिन उस दरिंदे के कानों पर कोई असर नहीं हुआ।

    उस रात, उस झोपड़ी के भीतर जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने के लिए काफी था। पायल की चीखें उस सन्नाटे को चीर रही थीं, लेकिन बाहर की दुनिया सो रही थी—या यूँ कहिए, सोने का नाटक कर रही थी।

    अगली सुबह, सूरज तो उगा, लेकिन पायल की जिंदगी में अंधेरा ही अंधेरा था। वह एक कोने में चुपचाप बैठी थी, उसकी आँखें सूनी हो चुकी थीं। राधा उसके पास बैठी थी, खुद को कोसती हुई।

    “मैं कैसी माँ हूँ… जो अपनी बेटी को बचा नहीं सकी…” वह रोते हुए कह रही थी।

    दिन बीतते गए, लेकिन वह आदमी बार-बार आता रहा। हर बार पायल की आत्मा को थोड़ा-थोड़ा मारता रहा। समाज के लोग सब जानते थे, लेकिन कोई कुछ नहीं करता था। क्योंकि वह आदमी ताकतवर था।

    एक दिन पायल ने फैसला कर लिया।

    उस रात जब वह आदमी फिर आया, तो पायल चुपचाप उसके सामने खड़ी हो गई।

    “आज मैं खुद चलूँगी,” उसने कहा।

    राधा चौंक गई। “पायल, तू क्या कर रही है?”

    पायल ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था, सिर्फ आग थी।

    वह आदमी मुस्कुराया। “अच्छा है, अब समझदारी आ गई है।”

    लेकिन उसे क्या पता था, आज कहानी बदलने वाली है।

    पायल उसके साथ चली गई, लेकिन इस बार वह शिकार नहीं थी—वह शिकारी बनने जा रही थी।

    कुछ घंटों बाद, शहर में हड़कंप मच गया। खबर फैली कि उस नेता की लाश उसके ही फार्महाउस में मिली है। उसके शरीर पर कई चाकू के निशान थे।

    पुलिस आई, जांच शुरू हुई। और कुछ ही देर में पायल खुद पुलिस स्टेशन पहुंच गई।

    “मैंने मारा है उसे,” उसने शांत आवाज़ में कहा।

    पूरे शहर में सनसनी फैल गई। लोग बातें करने लगे—कोई उसे अपराधी कह रहा था, तो कोई उसे न्याय की देवी।

    कोर्ट में केस चला। पायल ने हर सच सबके सामने रखा। उसकी हर बात समाज के चेहरे पर एक तमाचा थी।

    “जब मेरी इज्जत लूटी जा रही थी, तब कोई नहीं आया। आज जब मैंने अपनी इज्जत के लिए लड़ाई लड़ी, तो सब मुझे अपराधी कह रहे हैं?” उसकी आवाज़ कोर्ट में गूंज उठी।

    कोर्ट में सन्नाटा छा गया।

    जज के पास भी शब्द नहीं थे।

    यह सिर्फ एक केस नहीं था—यह उस घिनौने समाज का आईना था, जो कमजोरों की चीखें नहीं सुनता, लेकिन जब वो कमजोर खुद खड़े होते हैं, तो उन्हें दोषी ठहराता है।

    आखिरकार फैसला आया।

    पायल को सजा तो मिली, लेकिन उसकी कहानी ने पूरे शहर को हिला दिया। लोग अब सवाल पूछने लगे थे—खुद से, समाज से, और उस व्यवस्था से, जिसने एक मासूम लड़की को दरिंदा बनने पर मजबूर कर दिया।

    जेल की सलाखों के पीछे बैठी पायल अब भी शांत थी। लेकिन उसकी आँखों में अब डर नहीं था।

    राधा उससे मिलने आई।

    “मुझे माफ कर दे बेटा…” वह रोते हुए बोली।

    पायल ने उसका हाथ थाम लिया। “माँ, गलती तेरी नहीं थी… गलती इस समाज की है।”

    उसकी यह बात जैसे हर उस इंसान के दिल में उतर गई, जो अब तक चुप था।

    कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

    क्योंकि हर शहर में, हर गली में, कहीं ना कहीं एक और पायल है… जो अपनी चीखों को दबाए बैठी है।

    और सवाल अब भी वही है—

    क्या हम उसकी आवाज़ सुनेंगे, या अगली कहानी का इंतजार करेंगे?

     

    कहानी अच्छी लगी हो तो प्यारा सा कमेंट जरूर कीजिएगा।🙏

  • हवेली की भूतनी

    हवेली की भूतनी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    डर की दस्तक

    गाँव का नाम था सहरपुर, जो अपनी शांति और सुंदरता के लिए जाना जाता था। यह गाँव चारों ओर हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा हुआ था। यहाँ के लोग मेहनती और मिलनसार थे। लेकिन, गाँव के बाहर एक पुरानी खंडहर वाली हवेली थी, जिसे कोई भी पास नहीं जाता था। लोग कहते थे कि यह हवेली भूतिया है। वहाँ रात में अजीबो-गरीब आवाजें सुनाई देती थीं।

    गाँव के बच्चों को इस हवेली के बारे में कई डरावनी कहानियाँ सुनाई गई थीं। कहा जाता था कि हवेली में एक महिला रहती थी, जिसकी आत्मा उस जगह पर रोड़ी थी। कुछ साल पहले, गाँव के एक युवक ने बहादुरी दिखाई और हवेली में दाखिल हो गया। लेकिन, वह कभी वापस नहीं लौटा। इस घटना ने गाँव में एक अजीब सा खौफ फैला दिया।

    इस हवेली के बारे में सुनकर गाँव के सबसे साहसी लड़के, अर्जुन ने उसका सामना करना तय किया। वह हमेशा से साहसी और निडर था, और अपने दोस्तों के बीच उसे सबसे बड़ा बहादुर माना जाता था। उसने अपने दोस्तों राधिका, संजय, और मीना को अपने साथ चलने के लिए मनाया।

    “चलो, हम सब मिलकर उस हवेली का सच जानते हैं,” अर्जुन ने कहा। उसके दोस्तों ने थोड़ी चिंता जताई, लेकिन अंततः उन्होंने अर्जुन के जोश में आकर उसके साथ जाने का फैसला किया।

    एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, चारों दोस्त हवेली की ओर बढ़ने लगे। हवेली की दीवारें घास और काई से ढकी हुई थीं, और वहाँ की खिड़कियाँ टूट चुकी थीं। जैसे ही वे हवेली के दरवाजे तक पहुँचे, एक ठंडी हवा का झोंका आया, जिससे सबके मन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।

    “क्या तुम सब डर गए हो?” अर्जुन ने हंसते हुए कहा।

    “नहीं!” सबने एक साथ कहा, हालाँकि उनकी आवाज़ में थोड़ी थरथराहट थी।

    उन्होंने दरवाजा धीरे से खोला, और अंधेरे में कदम रखा। कमरे में धूल और जाले का गुड़ बन चुका था। उन्हें अंधेरे में चलने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी। अर्जुन ने अपनी टॉर्च जलाकर चारों ओर देखा। कमरे के हर कोने में पुरानी किताबें पड़ी थीं, और दीवारों पर अजीब चित्र बने हुए थे।

    “क्या तुमने ये चित्र देखे?” मीना ने कहा। “ये बहुत ही डरावने हैं।”

    “चिंता मत करो। यहाँ कुछ नहीं है,” अर्जुन ने हिम्मत बंधाई।

    इसी बीच, अचानक एक चीख सुनाई दी। सब चौंके और देखे की राधिका अलमारी के पास खड़ी थी। “क्या वो… वो वहाँ कोई है?” उसने कहा, उसकी आँखों में भय की चमक थी।

    अर्जुन ने टॉर्च को उस दिशा में घुमाया, लेकिन वहाँ कुछ नहीं था। सबने राहत की साँस ली, लेकिन राधिका अभी भी डर रही थी। उन्होंने फैसला किया कि उन्हें हवेली के ऊपर वाले कमरे में जाना चाहिए, जहाँ सबसे पहले युवक गायब हुआ था।

    वे धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़े। सीढ़ियों पर धूल भरी और दरवाजों की पीली होती लकड़ी उनके कदमों के नीचे चरमराती गई। जैसे ही वे कमरे के दरवाजे के पास पहुँचे, अर्जुन ने दरवाजा खोला।

    कमरा अंधेरे में डूबा हुआ था। अर्जुन ने टॉर्च जलाया और सबने देखा कि कमरे के बीच में एक पुराना बिस्तर था। बिस्तर पर एक पुराना कंबल रखा था। अचानक, कंबल के नीचे से एक साया बाहर निकला, और

    साया बाहर निकलते ही चारों की चीखें निकल गईं। वह एक भयानक, डरावनी महिला थी, जिसके आँखों में एक अद्भुत तेज था और चेहरे पर एक खालीपन। उसकी खूबसूरत समेत खौफनाक उपस्थिति ने सबको जड़वत कर दिया।

    “क्या तुम यहाँ आये हो?” महिला की आवाज़ गहरी और डरावनी थी, जैसे वह समय के पार से आई हो। “क्या तुम अपने अंधेरों को सामने लेकर आए हो?”

    अर्जुन, जो पहले से ही खौफ का सामना कर रहा था, हिम्मत एकत्रित करते हुए बोला, “हम सिर्फ सच जानना चाहते थे। हम सुनते आए हैं कि यह जगह भूतिया है, और हम यहाँ आते ही देखना चाहते थे कि क्या यह सच है।”

    महिला ने एक हंसती हुई मुस्कान दी, लेकिन उसकी आँखों में कोई भावना नहीं थी। “सच है या झूठ, यह तुम पर निर्भर करता है। लेकिन अगर तुमने यहाँ मेरे साथ आया है, तो तुम्हें यहाँ रहना पड़ेगा।”

    सभी दोस्त एक-दूसरे को देखने लगे, उनकी आँखों में डर और घबराहट थी। संजय ने कहा, “हमें यहाँ से भागना चाहिए।” लेकिन जैसे ही उन्होंने मुड़ने की कोशिश की, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    महिला ने एक कदम और बढ़ाया। “तुम्हें मेरे साथ रहना ही होगा।” उसके शब्दों में जैसे एक गहरी शक्ति थी, जो सबको और भी डराने लगी।

    “नहीं! हमें यहाँ से जाना है!” मीना ने दर्द से चिल्लाया। लेकिन उसकी आवाज़ हवेली के अंधेरों में गुम हो गई।

    महिला ने पास आते हुए कहा, “मैं तुम्हें तब तक नहीं छोड़ सकती जब तक तुम यहाँ के राज का सामना नहीं करते।” एक पल के लिए सब कुछ शांत हो गया।

    तभी एक भयानक आवाज सुनाई दी, और कमरा अजीब सी धुंध में ढकने लगा। अर्जुन ने अपनी टॉर्च की रोशनी को यहाँ-वहाँ घुमाया, लेकिन धुंध धीरे-धीरे बढ़ती गई।

    “हम क्या करें?” राधिका ने कहा। “हमें यहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं दिखता।”

    अर्जुन ने हिम्मत करके कहा, “हम इस महिला का सामना करेंगे और देखेंगे कि वह क्या चाहती है। हम सच्चाई जानने नहीं आए हैं तो फिर हम डरने क्यों लगे?”

    “तु…तुम सही हो,” संजय ने कहा। “हमें इसकी चुनौती स्वीकार करनी चाहिए।”

    महिला ने हल्की मुस्कान दी, और अचानक उस धुंध में कुछ काले साये उभरने लगे।

    “यहाँ की सच्चाई जानने के लिए तुम्हें एक सवाल का सामना करना होगा। जवाब सही हुआ तो तुम जा सकते हो, नहीं तो तुम यहाँ फँस जाओगे,” महिला ने कहा।

    अर्जुन ने अपने दोस्तों की ओर देखा, और फिर महिला से पूछा, “क्या सवाल है?”

    महिला ने अपनी आँखें बंद कीं और बोली, “एक प्रश्न है जो सदियों से अनुत्तरित रहा है: ‘क्या मृत्यु एक अंत है, या एक नया आरंभ?’”

    चारों दोस्तों ने एक-दूसरे की ओर देखा। यह सवाल उन्हें हैरान कर गया।

    “मृत्यु एक अंत नहीं है,” मीना ने कहा। “यह एक नया आरंभ है। यह केवल एक दरवाजा है, जो दूसरी दुनिया में खुलता है।”

    महिला ने अपनी आँखें खोलीं, और उन पर एक गहरी नज़र डाली। फिर उसने कहा, “तुम्हारा उत्तर आधा सच है, लेकिन तुम्हें इसके निहितार्थ को समझना होगा।”

    एक पल के लिए सब कुछ थम गया। फिर, बिस्तर की ओर एक पुराना आइना चमकने लगा। जैसे ही वे सब उसकी ओर देखे, उन्हें अपनी परछाईं नजर आई।

    “यहाँ रहना तुम्हारे डर का सामना करने के लिए है,” महिला ने कहा। “देखो, तुम्हारी परछाइयाँ क्या कहती हैं।”

    अर्जुन, राधिका, संजय और मीना ने आइने में अपनी परछाइयों को देखा। लेकिन उनकी परछाइयाँ उनसे अलग थीं; वह अंधेरे में लिपटी हुई और भयभीत दिख रहीं थीं।

    “ये हमारी परछाइयाँ हैं,” संजय ने कहा। “लेकिन ये डर और अनिश्चितता का प्रतीक हैं।”

    महिला ने कहा, “ये परछाइयाँ आपके अतीत के गुनाह हैं। वह डर, वह दर्द, और वह आत्म-संदेह, सब कुछ आपके भीतर का है। तुम्हें खुद से लड़ना होगा। अगर तुम अपने अंधेरों से भागोगे, तो तुम हमेशा यहाँ फँसे रहोगे।”

    अर्जुन ने सोचा, “सच में, हम हमेशा अपने भीतर के डर से भागते रहे हैं। लेकिन अब हमें उनका सामना करना होगा।” उसने गहरी सांस ली और अपने दोस्तों की ओर देखा।

    “हमें अपने डर का सामना करना होगा। हमें समझना होगा कि हम अकेले नहीं हैं।” उसने सभी को प्रोत्साहित किया।

    सभी ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और अपनी परछाइयों की ओर बढ़े। अचानक, अंधकार में एक चमक दिखी और उन्होंने देखा कि उनकी परछाइयाँ अब उनकी तरह दिखने लगीं, लेकिन उनमें आत्मविश्वास और शक्ति का आभास था।

    महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब तुम तैयारी कर चुके हो। अपने डर से लड़ो, और अपनी सच्चाई को पहचानो।”

    जैसे ही उन्होंने अपनी परछाइयों से संपर्क किया, एक शक्ति का अनुभव हुआ। डर और घबराहट ने उन्हें छोड़ दिया। उनकी परछाइयाँ अब उनके साथ थीं, न कि खिलाफ।

    महिला की आवाज़ अब और नरम हो गई, “तुमने अपने डर का सामना किया है। अब तुम्हें यहाँ से जाने की अनुमति है। लेकिन याद रखो, सच केवल तुम्हारे डर के पार है।”

    अर्जुन, राधिका, संजय और मीना ने एक साथ कहा, “हम यहाँ से जाने के लिए तैयार हैं!”

    आइना प्रकाश की एक चमक में बदल गया, और अचानक कमरे में रोशनी फैलने लगी। दरवाजे का लॉक अपने आप खुल गया। चारों दोस्त एकजुट होकर बाहर की ओर दौड़ पड़े।

    उनकी आँखों के सामने हवेली के चारों ओर की काली रात ने एक नई उषा का रंग ले लिया। जैसे ही वे हवा में सांस लेते हुए गाँव की ओर बढ़े, सब कुछ पहले से अधिक स्पष्ट लग रहा था।

    वे गाँव में लौट आए और अपनी कहानी साझा की। बाकी गाँव वालों ने उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपनी परछाई में सुरक्षा की भावना महसूस की।

    गाँव से दूर उनकी एक अलग पहचान बन गई थी। अर्जुन और उसके दोस्त अब छोटे बच्चों को साहस और आत्म-विश्वास की कहानियाँ सुनाते थे। उन्होंने सीखा कि डर केवल एक भावना है, जिसे हमें समझने और स्वीकार करने की जरूरत है।

    गाँव के बच्चे अब कभी भी उस भूतिया हवेली से डरते नहीं थे। उन्होंने समझ लिया था कि डर का सामना करना ही असली साहस है।

    अर्जुन ने एक दिन कहा, “हमने अपनी सबसे बड़ी चुनौती का सामना किया। डर और अंधकार के पार जाकर हमने अपनी शक्ति को पहचाना। अब, हम कभी वापस नहीं लौटेंगे उस डर की ओर।”

    और इस तरह, सहरपुर गाँव में बसने वाले चार दोस्तों ने अपनी कहानी को अपने अगले पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा, ताकि वे भी अपने डर का सामना कर सकें।

    Lakshmi Kumari

     

     

     

  • ❤️” तेरा मेरा साथ “❤️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    1.  

     

    तेरा मेरा साथ कुछ ऐसा हो,

    जैसे चाँद का हो रात से रिश्ता,

    खामोशी में भी बातें हों,

    और हर लम्हा लगे अपना सा किस्सा।

     

    तू पास हो तो डर कैसा,

    हर राह लगे आसान,

    तेरी हँसी में छुपा है जैसे,

    मेरी दुनिया, मेरा जहान।

     

    तेरा मेरा साथ यूँ ही रहे,

    जैसे धड़कन में बसी हो जान,

    तू रूठे तो मैं मना लूँ,

    मैं टूटूँ तो तू बन जाए मेरी पहचान।

     

    आंधियाँ चाहे जितनी आएँ,

    हम ना छोड़ें एक-दूजे का हाथ,

    तू साया बन साथ चले,

    मैं बन जाऊँ तेरी हर बात।

     

    तेरी आँखों में जो सपने हैं,

    मैं उन्हें हकीकत बना दूँ,

    तू बस मुझ पर यकीन रख,

    मैं हर मुश्किल से तुझे बचा लूँ।

     

    तेरा मेरा साथ ऐसा हो,

    जहाँ ना कोई दूरी हो,

    बस प्यार ही प्यार बहे,

    और हर सुबह नई पूरी हो।

     

    कभी मैं तेरे लिए लिखूँ,

    कभी तू मेरे लिए गाए,

    इस प्यार की कहानी को,

    वक्त भी कभी ना मिटा पाए।

     

    तेरा मेरा साथ आख़िर तक,

    बस इतनी-सी है दुआ,

    तू मेरी हर खुशी बने,

    और मैं तेरा हर जज़्बा।

     

    क्योंकि सच तो ये है…

    ना तुझसे पहले कोई था,

    ना तेरे बाद कोई होगा,

    तेरा मेरा साथ ही मेरी दुनिया है,

    और यही मेरा सबसे खूबसूरत सपना होगा।

  • ” तुम मेरी हो..”❤️

    ” तुम मेरी हो..”❤️

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    बारिश की हल्की-हल्की बूंदें हवेली की छत पर गिर रही थीं। शाम ढल चुकी थी और आसमान में गहरे बादल किसी अनकहे राज़ को छिपाए बैठे थे। हवेली के बड़े से आँगन में खड़ा आरव दूर आसमान की ओर देख रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जैसे कोई अधूरी कहानी उसे हर पल पुकार रही हो।

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई—

    “तुम फिर वही ख्यालों में खो गए?”

     

    आरव ने पलटकर देखा। सामने वही थी—मीरा। वही मासूम चेहरा, लेकिन अब आँखों में एक अजनबीपन था।

     

    “तुम यहाँ क्यों आई हो?” आरव ने थोड़ी सख्ती से पूछा।

     

    मीरा ने हल्की मुस्कान दी, “ये मेरा घर है, भूल गए क्या?”

     

    आरव कुछ कह नहीं पाया। सच ही तो था। ये घर, ये आँगन… सब कभी उनका हुआ करता था।

     

     

    बचपन का रिश्ता

     

    जब मीरा और आरव छोटे थे, तब ही मीरा के बाबा ने आरव से कहा था—

    “आरव बेटा, मीरा का हमेशा साथ देना… चाहे जो हो जाए।”

     

    उस दिन आरव ने मासूमियत से सिर हिलाया था—

    “मैं हमेशा उसका ख्याल रखूँगा, बाबा।”

     

    तभी से दोनों का रिश्ता तय हो गया था। सब कहते थे—

    “ये दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।”

     

    बचपन में मीरा भी यही मानती थी। वह आरव के पीछे-पीछे घूमती रहती थी—

    “आरव, तुम मेरे हो… कहीं मत जाना।”

     

    और आरव हँसकर कहता—

    “और तुम मेरी हो… हमेशा।”

     

     

    दूरी और बदलता दिल

     

    समय बीता। मीरा पढ़ाई के लिए शहर चली गई। नई दुनिया, नए लोग… और वहीं उसकी मुलाकात हुई कबीर से।

     

    कबीर स्मार्ट था, बातों में जादू था। धीरे-धीरे मीरा को उससे प्यार हो गया।

     

    “आई लव यू, कबीर…” एक दिन उसने कहा।

     

    कबीर मुस्कुराया—

    “मैं भी… मीरा।”

     

    लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक सच्चाई छिपी थी, जिसे मीरा समझ नहीं पाई।

     

     

    वापसी और टकराव

     

    कई साल बाद मीरा वापस हवेली आई। आरव वही था—सीधा, सादा, हर वक्त उसकी परवाह करने वाला।

     

    लेकिन अब मीरा बदल चुकी थी।

     

    “तुम हर वक्त मेरे पीछे क्यों रहते हो?” उसने झुंझलाकर कहा।

     

    आरव शांत रहा—

    “क्योंकि ये मेरा वादा है।”

     

    “किससे?!” मीरा चिल्लाई।

     

    “तुम्हारे बाबा से… और खुद से भी।”

     

    मीरा हँस पड़ी—

    “ये बचपन की बातें हैं, आरव। मैं अब बड़ी हो चुकी हूँ। और… मैं किसी और से प्यार करती हूँ।”

     

    ये सुनकर आरव का दिल जैसे टूट गया, लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा—

    “अगर वो तुम्हें खुश रखता है… तो मुझे कोई शिकायत नहीं।”

     

     

    सच का सामना

     

    कुछ दिन बाद मीरा ने कबीर को हवेली बुलाया।

     

    “कबीर, हम शादी कब करेंगे?” मीरा ने पूछा।

     

    कबीर ने थोड़ा हिचकते हुए कहा—

    “जल्दी… बस कुछ कागज़ी काम बाकी है।”

     

    “कैसा काम?”

     

    कबीर ने सीधा जवाब दिया—

    “तुम्हारी प्रॉपर्टी मेरे नाम हो जाए, फिर सब आसान हो जाएगा।”

     

    मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तो तुम मुझसे नहीं… मेरी दौलत से प्यार करते हो?”

     

    कबीर हँस पड़ा—

    “अब समझी?”

     

    मीरा गुस्से में वहाँ से जाने लगी, लेकिन कबीर ने उसे रोक लिया।

     

    “अब तुम कहीं नहीं जाओगी।”

     

     

     

     

    कबीर ने मीरा को अपने फार्महाउस में बंद कर दिया। एक अंधेरा कमरा, लोहे की सलाखें… और चारों तरफ खामोशी।

     

    मीरा रोते हुए बोली—

    “मुझे जाने दो… प्लीज़…”

     

    कबीर ने ठंडी आवाज़ में कहा—

    “जब तक तुम साइन नहीं करोगी, तुम यहीं रहोगी।”

     

     

     

    उधर हवेली में जब मीरा का पता नहीं चला, तो आरव को कुछ गड़बड़ लगा।

     

    “मीरा खतरे में है…” उसने खुद से कहा।

     

    वह बिना वक्त गंवाए उसे ढूंढने निकल पड़ा। कई घंटों की तलाश के बाद उसे कबीर का ठिकाना मिल गया।

     

    रात का अंधेरा था। आरव चुपचाप फार्महाउस में घुसा। गार्ड्स को चकमा देकर वह उस कमरे तक पहुँचा जहाँ मीरा कैद थी।

     

    “मीरा…” उसने धीरे से पुकारा।

     

    मीरा ने सिर उठाया—

    “आरव?!”

     

    उसकी आँखों में उम्मीद की चमक आ गई।

     

    आरव ने ताला तोड़ा—

    “चलो, यहाँ से निकलते हैं।”

     

     

     

    जैसे ही वे बाहर निकलने लगे, कबीर और उसके आदमी आ गए।

     

    “भाग कहाँ रहे हो?” कबीर ने हँसते हुए कहा।

     

    आरव ने मीरा को पीछे किया—

    “तुम मेरे पीछे रहो।”

     

    लड़ाई शुरू हो गई। आरव अकेला था, लेकिन हर वार में उसकी ताकत साफ दिख रही थी।

     

    मीरा डरते हुए बोली—

    “आरव… सावधान!”

     

    एक गुंडे ने पीछे से हमला किया, लेकिन आरव ने उसे गिरा दिया।

     

    “मैंने कहा था… मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।”

     

    आखिरकार, आरव ने सबको हरा दिया। कबीर जमीन पर गिरा पड़ा था।

     

     

    असली एहसास

     

    हवेली लौटते समय मीरा चुप थी।

     

    “तुम ठीक हो?” आरव ने पूछा।

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

    “तुम हमेशा मेरे साथ क्यों रहते हो… जबकि मैं तुम्हें बार-बार दूर करती हूँ?”

     

    आरव मुस्कुराया—

    “क्योंकि मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता… चाहे तुम मुझे कितनी भी नफरत करो।”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे—

    “मैं गलत थी, आरव… मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं।”

     

     

    प्यार का इज़हार

     

    अगली सुबह, वही आँगन… वही बारिश।

     

    मीरा आरव के पास आई।

     

    “आरव…”

     

    “हाँ?”

     

    मीरा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

    “तुमने कहा था ना… ‘तुम मेरी हो’?”

     

    आरव ने हल्की मुस्कान दी—

    “वो तो बचपन की बात थी…”

     

    मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया—

    “नहीं… वो आज भी सच है।”

     

    आरव चौंक गया—

    “क्या मतलब?”

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

    “मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ…”

     

    कुछ पल के लिए समय जैसे थम गया।

     

    “सच?” आरव ने पूछा।

     

    “हाँ… अब समझ आया कि सच्चा प्यार क्या होता है।”

     

     

    अंत

     

    बारिश तेज हो गई। दोनों एक-दूसरे के करीब खड़े थे।

     

    आरव ने धीरे से कहा—

    “अब कभी मुझे छोड़कर मत जाना…”

     

    मीरा मुस्कुराई—

    “अब कहीं नहीं जाऊँगी… क्योंकि मैं तुम्हारी हूँ।”

     

    आरव ने उसका हाथ थाम लिया—

    “और मैं… हमेशा तुम्हारा रहूँगा।”

     

    हवेली के आँगन में उस दिन सिर्फ बारिश नहीं हो रही थी… बल्कि दो दिलों का मिलन भी हो रहा था।

     

    एक अधूरी कहानी आखिरकार पूरी हो गई थी।

     

    “कभी-कभी सच्चा प्यार वही होता है, जो बचपन से हमारे साथ चलता है… बस हमें उसे पहचानने में देर लग जाती है।”

  • टूटा घमंड

    टूटा घमंड

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कमल राधा को भी बांध दिया था। उसके बाद जो कुछ भी हुआ था।ये बात तो आप लोग जानते हीं हैं की कैसे तीनो के बीच की बहस और लड़ाई इतनी बढ़ गई थी। जो कमल राधा को रेप करने तक की बात भी बोल दिया था। रेप की बात सुनकर राधा और रूपा बहुत घबरा गई थी। दोनो लड़की पसीने से पानी पानी हो गयी थी।
    रेप एक ऐसा शब्द है। जो ये  शब्द  जीस कसी के नाम के साथ जुड़ जाती है। तो उसकी जिंदगी, जीते जी नरक बन जाती है। ये समाज बालात्कार को समाजिक और कानूनी एक बहुत हीं जघन्य अपराध के श्रेणी में रखा है। इस अपराध को करने वाले के खीलाफ बहुत सख्त कानून बनाया गया है। और इसमें सख्त से सख्त सजा देने का प्रवधान भी किया गया है। इसके अंदर सजा आजीवन जेल में रहने से लेकर फांसी की सजा तक भी दी जा सकती है।
    आइए हमलोग अपनी कहानी के ओर बढ़ते हैं।
    कमल का हौसला अब ज्यादा बढ़ गया था। वो दोनो लड़की पर कंट्रोल जो कर लिया था। राधा और रूपा अपने उपर से रस्सियों के बंधन से छुटने के लिये हांथ पैर तो नही मार सकती थी। क्योंकी बंधे हुए थे। बस अपनी ताकत लगाकर कसमसाने से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही थी।
    ” देख तेरी ना करने की जिद्द ने तुम्हें कहां लाकर खड़ी कर दी है।तुम्हे शायद मालुम नही, मुझे ना सुनने की बिल्कुल भी आदत नहीं है। जब मैं अपनी मम्मी पापा के ना कहे को बर्दाश्त नहीं कर सकता हूं। तो तुम्हारा कैसे करूंगा?”
    ” कमल राधा के तरफ देखते हुए बोला था। राधा सिर्फ लाचारी से कमल को देखती रहती है। कमल के बात में सच्चाई थी। वो एक अमीर बाप का बेटा था। उसके मॉम डैड उसे बहुत प्यार करते थे ! वे उसके हर जायज नजायज जिद्द को पुरा कर रहे थे। कोई भी चीज का मांग अगर कमल करता था। तो वो उसे लाकर हर हाल में देते थे । कमल के मॉम डैड कमल के पालन पोसन में किसी भी प्रकार के कोई कमी नहीं होने दिये थे। इसी लार प्यार का नतीजा है। की आज उनका बेटा एक रेपिस्ट बनने जा रहा था।
    ” तुम अपनी सोच कमीने, यहां से तुम बचकर नही जाएगा जिन्दा।”
    रूपा कमल पर चिल्ला कर जोर से बोली थी ।
    ” तू इसी तरह फरफराती रह, तुम लोग कुछ नहीं बिगाड़ सकती हो मेरा। कुछ भी नहीं करोगी तुम लोग। “
    कमल रूपा से बोला और राधा के तरफ बढ़ा और उसकी गले में बांह डालकर अपने दुसरे हांथ से उसके गाल गर्दन को टच करते हुए हांथ नीचे के तरफ बढ़ा दिया था। ये देखकर रूपा को बहुत गुस्सा आ रही थी। वो कमल को कच्चा चबा जाना चाहती थी।
    रूपा सोच रही थी। अगर अभी वो बंधी नहीं होती, और उसके हांथ पांव खुले होते तो वो कमल को अच्छा खासा सबक सीखा सकती थी। बंधे होने से वो अपने आपको बहुत हीं लाचार और मजबूर फील कर रही थी। वो यहां से निकलने का मन में तड़किव सोच रही थी। रूपा को आभास हो गयी थी। की रूपा राधा कमल के अलावा भी कोई क्लास रूम में मौजुद है। मगर कौन,वो सोची कही कमल और लोगों को तो नहीं बुला रखा है। हम दोनो से अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए। वो क्लास रूम के चारो तरफ अपनी नजर घुमाके देखने लगी थी। रूपा फिर सोची अगर कमल किसी को बुलाया होता तो वो हम लोगों के सामने लाता हमसे बदला लेने के लिए। फीर मन हीं मन बोली, नही नही शायद यह हमारा वहम है।अगर कमल किसी को बुलाया हुआ होता तो वो उसे छुपने को थोड़ी बोलता।
    रूपा राधा के सामने थी। पर कुछ दूरी थी, और बीच में कमल था। अगर रूपा राधा को कुछ भी बताती की उसने क्या महसूस किया है।तो उस बात को कमल भी सुन सकता था। इस लिए रूपा कुछ नहीं बोली। और सोची कोई तो है पर कौन? रूपा अभी ये सब सोच हीं रही थी कि तभी कमल राधा को कस कर पकड़ कर अपने सीने से चिपका लेता है। और अपना चेहरा राधा के चेहरे के सामने ले जा कर राधा को चूमना चाहता है। कमल का मुंह राधा के मुंह से सटने हीं वाला था। की तभी एक साथ दो मुक्का कमल के दोनो जबड़े  पर आकर पड़ा। हमला अचानक हुआ था। मुक्के के थ्रो इतना जबरदस्त था। की कमल के बत्तीसी हिल गया था। उसके मुंह से खून बहने लगा था। वो समझ नहीं पा रहा था की उस पर हमला कौन किया था। जब की वो क्लास रूम के दरवाजे को लॉक कर के रखा था। तो बाहर से कोई कैसे आ सकता था। सवाल हीं नही पैदा हो सकता है की कोई बाहर से आ जाए, क्लास रूम के अन्दर।
    उसे अच्छे से याद था। कि जब वो दुबारा वापस क्लास रूम में आया था। तो दरवाजे को अच्छे से लॉक किया था। फीर ये कौन अंदर आगया था और कैसे? यही सवाल लिए कमल उपर की तरफ देखता है। देखकर कमल भौचक्का रह गया था। ये कैसे हो सकता है। ये दोनो अन्दर कैसे आ सकती हैं। दर्द तो बहुत हो रहा था कमल को पर इन सवालों के जबाव जानने के लिए। धीमी और रूआंसी आवाज में बोलता है।
    तुम, तुम यहां कैसे आई?”
    अब आप समझ हीं गये होंगे की वहां कौन आ गयी थी। कमल ये बोला हीं था की आठ दस लात सात आठ मुक्का कमल को और रसीद हो गया था। कमल दर्द से चीख उठा था। चांदनी और शीला कुछ भी बोल नही रही थी। बस उनके हांथ और पांव चल रहे थे।कमल को लग रहा था। कि जैसे अब उसके शरीर से जान नीकल हीं जायेगा। दोनो फाइटर बिल्कुल भी नहीं रूक रहे थे। ताबड़तोड़ लात और मुक्का बरसा रहे थे। मार मार के दोनो सहेली कमल का कचूमर बाहर कर दिया था। जब मार खा खा कर कमल बेहोशी से फर्श पर बेसुध हो गया था। तब दोनो दोस्त अपनी फाइट को विराम दी थी।
    ” तुम दोनो को डरने की कोई जरूरत नहीं है। हम आ गये हैं।
    चांदनी अपने दोनो हाथों को मोड़कर अपने सीने से चिपका कर बोली थी।
    ” हां तुम लोग डरो मत, तुम्हारी दीदी तुम लोगों को कुछ नही होने देगी।”
    शीला भी राधा और रूपा को देख कर बोली थी।
    थैंक्यू दीदी, जो आप लोग यहां आ गयी ।
    राधा को बोलते हुए आंसू बहने लगे थे।
    ” देखो, तुम्हे रोने की कोई जरूरत नही है। “
    चांदनी राधा के पास जाकर उसके आंख से आंसू पोछने लगती है।
    ” हां बहन, अब रोने की बारी उनकी है। जिन्होने तुम्हारे आंखों में आंसू दिए हैं। चुप हो जाओ राधा। “
    शीला बोलते हुए राधा के कंधे पर हाथ फेर रही थी। और शीला और चांदनी दोनो के बंधे रस्सी को खोलने लगती है।
    आगे कि कहानी पढिए अगले भाग में….

  • मुश्किल में जान

    मुश्किल में जान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    ” जा चला जा अब क्यों पिटाई खा रहा है।”
    राधा कमल को बहर के  रास्ते के तरफ इशारा करते हुए बोली थी।
    ” अब ये नहीं जाएगा दीदी, इसको ऐसे जाने नहीं दुंगी ।”
    रूपा बात को आगे बढाते हुए फिर बोलती है।
    ” इसको ऐसा सबक सिखाऊंगी, की ये ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगा।”
    बोलकर रूपा फिर कमल के उपर अटैक करना चाहती है। पर राधा का इसारा पा कर रूक जाती है।
    कमल जो दोनो की बात सुन रहा था । वो एक दम से पिछे मुड़ता है, और गेट के तरफ बढ़ जाता है। दरवाजा खोलकर बाहर निकल जाता है। पर दरवाजे को बाहर से बंद कर देता है ! और आगे बढ़ जाता है। आपको क्या लगता है। की कमल चला गया? क्या वो फीर वापस आयेगा? चलिए कहानी के तरफ चलते हैं, और जनने की कोशिश करते हैं।
    राधा और रूपा एक दुसरे को आशचर्य से देखने लगती है।
    ” चलो बाहर चलते है “
    राधा बोलती है, और रूपा का हांथ पकड़ कर दरवाजे के तरफ जाने लगती है। दोनो चलकर दरवाजे पास आती है और दरवाजे के हेन्डल पकड़ कर अन्दर के तरफ खींचती है। उसे एहसास होती है की दरवाजा बाहर से लॉक है।
    ” दीदी कमल ने दरवाजा बाहर से बंद कर दिया है।”
    रूपा राधा के तरफ देखते हुए बोली थी। जब दोनो ने देखा की दरवाजा बाहर से बंद है। तो फिर दोनो के मन में डर और भी ज्यादा बढ़ गया था। दोनो यही सोच सोच कर परेशान हो रही थी, की अब क्या होगा। ना जाने कब उसका कमल जैसे आफत से छुटकारा मिलेगा।
    ” मोबाइल भी नहीं है, कि जिससे दीदी को कॉल करके बता देती।”
    रूपा ने खामोशी तोड़ते हुए बोली थी।
    ” हां दीदी भी परेशान होगी, वो भी क्या सोच रहीं होंगी की ये दोनो कहां रह गयी।”
    राधा रुआंसे स्वर में बोली थी ।
    इधर शीला और चांदनी के भी कदम तेजी से क्लास रूम के तरफ बढ़ रहे थे। उसे नहीं पता था की क्लास रूम में इतनी बड़ी लड़ाई चल रही थी। परेशानी दोनो के चेहरे पर साफ झलक रही थी।
    ” चांदनी, राधा और रूपा बहुत बड़ी मुसिबत में है। मेरा दिल बहुत घबरा रहा है।”
    शीला बोली और चांदनी के हांथ पकड़ कर खींचते हुए भागने लगी थी।
    ” हां, मुझे भी लगता है। की कुछ तो गड़बड़ है।”
    चांदनी शीला से बोली और ये भी शीला के साथ दौड़ने लगी थी।

    क्लास रूम का दरवाजा एक बार फीर से खुलता है। और कमल क्लास रूम में ऐन्टर करता है। इस बार कमल का हाव भाव चेहरे का एक्सप्रेशन बॉडी लोंगबेज पुरी तरह से बदल गया था। उसका चेहरा एक दम से डरावना हो गया था। लाल लाल आंख बिखरे बाल एक हांथ में डंडा तो दुसरे हांथ में फोल्ड किया हुआ मोटी मोटी दो रस्सी लिए कमल क्लास रूम में प्रवेश किया था।
    ” अब क्यों आये हो कमल, क्या लेने आये हो दुबारा। चलो हटो मेरे रास्ते से मुझे जाना है।”
    रूपा कमल के तरफ अपनी उंगली प्वाइंट ऑट करते हुए बोली थी।
    ” कमल रास्ता छोड़ो मेरा, मैं कह देती हूं। अच्छा नहीं होगा।”
    राधा भी कमल को गुस्से से बोली और रूपा के हांथ को मजबूती से पकड़ कर आगे बढ़ी।
    ” अरे रूक जा, इतनी भी जल्दी क्या है। तुम लोगों को जाने की।”
    बिना रूके कमल फीर बोला
    ” अभी तो तुम लोगों को बहुत सारा हिसाब देना है।”
    बोलकर कमल राधा और रूपा के तरफ लपका 
    राधा और रूपा अचानक हुए इस हमले से सम्भल नहीं पाई थी। इसी बात का कमल को फायदा मिला वो राधा और रूपा को पकड़ चुका था। वो बात अलग था कि उसके शरीर मे इतना ताकत नहीं था। की दोनो लड़कीयों से ये अकेला एक साथ मुकाबला कर सके, लेकिन इस बार कमल अपने लिए ज्यादा पॉजीटीव था।  शरीर को चुस्त दिमाग दुरुस्त कर के आया था। वो अपने दिमाग के घोड़े को तेज गती से दौड़ाने लगा था। वो मन हीं मन सोच लिया था की इन दोनो लड़कियों से एक साथ मुकाबला करना आसान नहीं है। इस लिए वो एक प्लान तैयार किया था कि,ये दोनो को किसी तरह अलग करना पड़ेगा। नहीं तो फिर इन दोनो के हाथों मार खाना पड़ सकता है।
    ” रूक जा शाली, मैं तुम दोनो को अभी बताता हूं।”
    बोलते हुए कमल राधा को एक जोरदार थप्पड़ मार देता है। थप्पड़ खा कर राधा सीधे फर्श पर जा गिरती है।राधा सम्भल पाये उस से पहले कमल के पैर राधा के कमर पर पड़ता है। चोट इतनी जोर की लगी की राधा की चीख निकल गई थी। रूपा का हांथ कमल नहीं छोड़ा था इसका भी कारण है। आपने देखा नहीं कि, थोड़ी देर पहले रूपा कैसे कमल की बैण्ड बजाई थी। यही कारण था कि कमल राधा पर अटैक कर रहा था। और रूपा पर कंट्रॉल बनाना चाह रहा था। दो चार लात और राधा को मारता है। राधा बेहोश हो जाती है।अब बारी थी रूपा की।
    ” शाली हरामजादी,तुने मुझे मारा था। अब रूक मैं तेरा क्या हाल करता हूं।”
    कमल अपना दांत पीस कर रूपा से बोला था।
    ” क्या करेगा तू मेरा,हां, इतना जल्दी भुल गया की मैं तेरा क्या हालत किया था।”
    रूपा कमल पर गुस्से से चिल्लाते हुए जोर से बोलती है।और कमल के घुटने के नीचे पैर पर एक जोरदार लात मार देती है। कमल दर्द के मारे कराह देता है।
    ‘ आ आ आ ह “
    रूपा इतना हीं पर नहीं रूकती है। कमल जो रूपा के दोनो हांथ पकड़े हुए था। रूपा तेज झटके के साथ अपना एक हांथ कमल के पकड़ से आजाद करा चुकी थी। आजाद हीं नहीं ताबड़ तोड़ छः सात चमाटे भी लगा चुकी थी। ऐसा लग रहा था अब सिचुएशन पुरी तरह से रूपा के कंट्रोल में आ गयी थी। राधा अभी भी फर्श पर बेहोश परी थी। रूपा सोच रही थी की, अगर हमें राधा दीदी को सेफ करना है। तो इस कमल रूपी रावण को एक अच्छा सा सबक सीखाना हीं पड़ेगा। वो दुबारा पैर से अटैक करना चाहती थी। जैसे हीं वो अपना पैर अटैक करने के लिए उठाई एक जोर दार मुक्का उसकी सीना पर आ कर लगी मुक्के का भार इतना जबर्दस्त था। रूपा हिल गई थी। दर्द इतना तेज हुआ की रूपा दर्द के मारे कांप गई थी। रूपा का शरीर थर थर कांपने लगा था। इसी वक्त का कमल फायदा उठाया। रूपा के कान के बगल में लगातार थप्पड़ मारा जिससे रूपा और लाचार हो गई थी। होती भी क्यों नहीं इतनी मार जब किसी लड़के को पर जाए तो वो हिल जाये फीर भी ये तो एक लड़की थी। वो भी 17 वर्ष की
    ‘ अब मैं तुझे बताउंगा कि मुझ पर हांथ उठाने का अंजाम क्या होता है।”
    कमल रूपा पर चिल्ला कर बोला था। रूपा को बहुत ज़ोर कि दर्द हो रही थी। वो कुछ बोली नहीं सिर्फ कमल को गुस्से से देखती रही।
    ” बहुत ज्यादा उर रही थी तब से, अब दिखा अपनी ताकत और स्टाइल “
    कमल बोलते हुए रस्सी हांथ में उठा लेता है। और रूपा के कमर में रस्सी लपेटा देता है। दोनो हांथ पीछे करके रूपा का हांथ रस्सी से बांध दिया था। और उसे बाल से खींचते हुए एक बैंच पर ले जाकर बिठा दिया था। इतने में राधा को होश आने  लगा था। उसके हांथ पैर हिलने लगे थे। राधा का आंख धीरे धीरे खुलता है। और राधा की नजर बंधी हुई रूपा पर पड़ती है। वो सहम जाती है। और वो मन में सोचने लगती है। की रूपा कितनी अच्छी है। उसने मेरे लिये अपनी जान की बाजी लगा दी है। शायद इस जगह मेरी अपनी सगी बहन भी होती तो शायद ये सब नहीं करती वो अपनी जान की परवाह किए बगैर हमारा साथ दे रहीं है। कमल से लड़ रही है। ये सब सोच सोच कर राधा रूपा पर प्राऊड फील कर रही थी। और उसके आंख में आंसू आ गई थी ! वो हिम्मत कर के उठ कर बैठती है।
    ” कमल ये क्या हरकत है तुम्हारा, तुमने रूपा को बांध क्यों रखे हो खोल,खोल, खोल कमीने मेरी बहन को।”
    राधा कमल को गुस्से से हुई अपनी लाल आंख दिखाते हुए बोली थी।
    ” अच्छा, तो तुम होश में आ गई हो। रूक मैं आता हूं। तेरी भी खबर लेने।”
    .बोलकर कमल राधा के पास आता है। राधा कुछ कर पाती उससे पहले कमल उसकी कमर में रस्सी लपेट चुका था । कमल राधा को एक हांथ खुला  छोड़ कर  बाकी कमर और एक हांथ को बांध दिया था। कहानी का अगला भाग और मजेदार होने वाली है। तो पढिए पुरी कहानी केवल , नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड डॉट कॉम पर।
     

  • दहेज की बेड़ियां

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शाम का समय था। सूरज ढल रहा था और आकाश में हल्की सुनहरी आभा बिखरी हुई थी। गाँव के उस छोटे से घर के आँगन में बैठी सावित्री अपनी बेटी नंदिनी के हाथों में मेहंदी लगा रही थी। घर में शादी की तैयारियाँ चल रही थीं, लेकिन उस चहल-पहल के बीच सावित्री के चेहरे पर एक अजीब सी चिंता भी साफ झलक रही थी।

     

    नंदिनी पढ़ी-लिखी, समझदार और आत्मनिर्भर लड़की थी। शहर के एक स्कूल में अध्यापिका थी और अपने माता-पिता का गर्व। उसकी शादी राहुल से तय हुई थी, जो एक अच्छे परिवार से था और शहर में इंजीनियर था। शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था। दोनों परिवार खुश थे, रिश्तेदारों में मिठाइयाँ बाँटी जा रही थीं।

     

    लेकिन धीरे-धीरे एक ऐसी बात सामने आई, जिसने सावित्री और उसके पति रामदास की नींद उड़ा दी।

     

    राहुल के पिता ने एक दिन रामदास को अलग बुलाकर कहा,

    “देखिए जी, हमने अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया है, अच्छी नौकरी लगवाई है। अब हमारी भी कुछ उम्मीदें हैं… शादी में कार और थोड़ा सा नकद तो बनता ही है।”

     

    रामदास के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनकी छोटी सी खेती थी, जिससे घर मुश्किल से चलता था। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा,

    “भाई साहब, हम गरीब लोग हैं… इतनी बड़ी मांग पूरी करना हमारे बस में नहीं है।”

     

    राहुल के पिता का चेहरा सख्त हो गया,

    “तो फिर रिश्ता यहीं खत्म समझिए। हमें अपने बेटे के लिए और भी अच्छे प्रस्ताव मिल सकते हैं।”

     

    यह सुनकर रामदास का दिल बैठ गया। वे चुपचाप घर लौट आए। उस रात उन्होंने खाना तक नहीं खाया। सावित्री ने जब पूछा तो उनकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “हमारी बेटी की खुशियों के लिए क्या हमें उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी?” उन्होंने भारी आवाज़ में कहा।

     

    सावित्री भी सन्न रह गई। दोनों के मन में एक ही सवाल था—क्या नंदिनी की शादी दहेज के बिना नहीं हो सकती?

     

    अगले दिन जब नंदिनी को यह बात पता चली, तो वह कुछ देर तक चुप रही। फिर उसने दृढ़ आवाज़ में कहा,

    “पिताजी, अगर मेरी शादी के लिए आपको अपनी इज्जत और आत्मसम्मान गिराना पड़े, तो ऐसी शादी मुझे नहीं करनी।”

     

    रामदास ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा,

    “बेटी, समाज क्या कहेगा? लोग हँसेंगे…”

     

    नंदिनी मुस्कुराई,

    “समाज वही कहेगा जो हम उसे कहने देंगे। अगर हम गलत के सामने झुकेंगे, तो वह और मजबूत होगा।”

     

    उसके शब्दों में आत्मविश्वास था, जिसने उसके माता-पिता के दिल में भी हिम्मत भर दी।

     

    इधर राहुल को जब इस बात का पता चला, तो वह भी परेशान हो गया। वह दहेज के सख्त खिलाफ था, लेकिन अपने पिता के सामने कुछ कह नहीं पाया था। उसने नंदिनी से मिलने का फैसला किया।

     

    दोनों एक पार्क में मिले। कुछ देर तक चुप्पी रही, फिर राहुल ने कहा,

    “मुझे माफ करना नंदिनी। मैं तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन अपने परिवार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।”

     

    नंदिनी ने शांत स्वर में कहा,

    “हिम्मत तो तुम्हें ही दिखानी होगी राहुल। अगर तुम आज चुप रहे, तो कल तुम्हारी बहन के साथ भी यही होगा।”

     

    राहुल के दिल में जैसे कोई बात गूंज उठी। उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी चुप्पी भी एक तरह का अपराध है।

     

    उस रात राहुल ने अपने पिता से साफ शब्दों में कहा,

    “पिताजी, अगर मेरी शादी होगी तो बिना दहेज के ही होगी। मैं अपनी पत्नी को खरीदकर नहीं लाना चाहता।”

     

    पिता गुस्से से तमतमा गए,

    “तुम हमें सिखाओगे? हमने तुम्हें इस दिन के लिए पाला था?”

     

    राहुल ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,

    “आपने मुझे सही और गलत में फर्क करना सिखाया है। और आज मैं वही कर रहा हूँ।”

     

    घर में तनाव बढ़ गया। कुछ दिनों तक बात बंद रही। लेकिन राहुल अपने फैसले पर अडिग रहा।

     

    आखिरकार, राहुल की माँ ने बीच में आकर स्थिति संभाली। उन्होंने अपने पति से कहा,

    “अगर बेटा ही खुश नहीं रहेगा, तो दहेज का क्या फायदा? हमें अपनी सोच बदलनी होगी।”

     

    धीरे-धीरे राहुल के पिता का गुस्सा भी ठंडा पड़ा। उन्होंने महसूस किया कि वे गलत थे। उन्होंने रामदास को फोन किया और कहा,

    “भाई साहब, हमें माफ कर दीजिए। हमें कोई दहेज नहीं चाहिए। हमें सिर्फ आपकी बेटी चाहिए।”

     

    यह सुनकर रामदास की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

     

    शादी का दिन आ गया। इस बार घर में सिर्फ खुशियाँ थीं, कोई चिंता नहीं। नंदिनी दुल्हन बनी तो सच में किसी रानी से कम नहीं लग रही थी। लेकिन उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती उसका आत्मसम्मान था।

     

    बारात आई, ढोल-नगाड़े बजे, और पूरे गाँव में एक नई मिसाल कायम हुई। बिना दहेज के हुई इस शादी की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी।

     

    विदाई के समय सावित्री ने नंदिनी को गले लगाकर कहा,

    “आज तूने सिर्फ अपनी नहीं, हजारों बेटियों की इज्जत बचाई है।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर गर्व की चमक थी।

     

    शादी के बाद नंदिनी और राहुल ने मिलकर एक छोटा सा अभियान शुरू किया। वे गाँव-गाँव जाकर लोगों को दहेज प्रथा के खिलाफ जागरूक करने लगे। उन्होंने लोगों को समझाया कि बेटी कोई बोझ नहीं, बल्कि सम्मान है।

     

    धीरे-धीरे उनके प्रयासों का असर दिखने लगा। कई परिवारों ने दहेज लेना-देना बंद कर दिया। समाज में बदलाव की एक नई लहर उठी।

     

    एक दिन, जब नंदिनी अपने स्कूल में बच्चों को पढ़ा रही थी, तो एक छोटी बच्ची ने पूछा,

    “मैडम, क्या मेरी शादी भी बिना दहेज के हो सकती है?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई और बोली,

    “बिलकुल हो सकती है, अगर तुम खुद पर विश्वास रखो और गलत के खिलाफ खड़ी हो जाओ।”

     

    कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यह तो बस एक शुरुआत थी—एक ऐसी शुरुआत, जो हर घर, हर समाज में बदलाव ला सकती है।

     

    क्योंकि जब एक लड़की अपने सम्मान के लिए खड़ी होती है, तो वह सिर्फ अपनी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच बदल देती है।

     

    1. अंत में बस इतना ही—दहेज से खरीदी गई खुशियाँ कभी सच्ची नहीं होतीं, लेकिन आत्मसम्मान से जीती गई जिंदगी हमेशा खूबसूरत होती है।