🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

Blog

  • कान्हा और पेड़ की अटकी पतंग

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    — कान्हा और पेड़ पर अटकी पतंग

     

    अगली सुबह कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँचे। आज सबके हाथों में रंग-बिरंगी पतंगें थीं। किसी की पतंग लाल थी, किसी की पीली, तो किसी की नीली।

     

    कान्हा के हाथ में पीले रंग की एक सुंदर पतंग थी।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम्हारी पतंग सबसे ऊपर जाएगी?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “सबसे ऊपर!”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “पहले उड़ाकर तो देखो।”

     

    कान्हा ने डोर पकड़ी और दोस्त ने पतंग हवा में छोड़ दी।

     

    हवा तेज थी, इसलिए पतंग तुरंत ऊपर उठने लगी।

     

    “छोड़ो!”

     

    कान्हा ने डोर खींची।

     

    पतंग आसमान में ऊपर जाने लगी।

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए—

     

    “उड़ गई!”

     

    कान्हा बहुत खुश थे।

     

    वह कभी पतंग को ऊपर करते, कभी नीचे लाते।

     

    तभी एक तेज हवा का झोंका आया।

     

    पतंग अचानक दूसरी दिशा में मुड़ गई।

     

    कान्हा ने डोर संभालने की कोशिश की।

     

    “अरे! इधर आओ!”

     

    लेकिन पतंग तेजी से एक बड़े पेड़ की तरफ जाने लगी।

     

    एक दोस्त चिल्लाया—

     

    “कान्हा! पेड़!”

     

    कान्हा ने डोर खींची।

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    फटाक!

     

    पतंग पेड़ की ऊँची शाखाओं में फँस गई।

     

    सभी बच्चे कुछ पल चुप रहे।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    उनकी प्यारी पतंग एक शाखा पर अटकी हुई थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब गई पतंग।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं। मैं इसे वापस लाऊँगा।”

     

    दोस्त ने पेड़ को देखा।

     

    “लेकिन ये बहुत ऊँची है।”

     

    कान्हा ने पेड़ के तने को छुआ।

     

    “इतनी भी ऊँची नहीं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुम चढ़ोगे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ।”

     

    वह पेड़ पर चढ़ने ही वाले थे कि पीछे से आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा रुक गए।

     

    वहाँ नंद बाबा खड़े थे।

     

    “क्या करने वाले हो?”

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “मेरी पतंग फँस गई है।”

     

    नंद बाबा ने पेड़ की तरफ देखा।

     

    “पतंग के लिए पेड़ पर मत चढ़ो। गिर सकते हो।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “लेकिन बाबा, मेरी पतंग…”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “पतंग फिर मिल जाएगी। तुम्हारी सुरक्षा ज्यादा जरूरी है।”

     

    कान्हा थोड़ा उदास हो गए।

     

    “लेकिन ये मेरी पसंदीदा पतंग है।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “चलो, पहले सोचते हैं कि इसे बिना चढ़े कैसे निकाला जाए।”

     

    सभी बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “हम लंबी लकड़ी से इसे नीचे कर सकते हैं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लेकिन लकड़ी इतनी लंबी नहीं है।”

     

    तीसरा बोला—

     

    “हम पत्थर फेंककर डोर गिरा सकते हैं।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं! पत्थर से किसी को चोट लग सकती है।”

     

    सब चुप हो गए।

     

    कान्हा ने पेड़ को ध्यान से देखा।

     

    एक लंबी सूखी डाल नीचे पड़ी थी।

     

    उन्होंने उसे उठाया।

     

    “अगर इसे बाँस के साथ बाँध दें तो शायद ऊपर तक पहुँच जाए।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “अच्छा विचार है। लेकिन सावधानी से।”

     

    कुछ बड़े बच्चों ने बाँस और लकड़ी को जोड़ दिया।

     

    कान्हा नीचे खड़े होकर उसे धीरे-धीरे ऊपर करने लगे।

     

    पहली बार लकड़ी पतंग तक नहीं पहुँची।

     

    दूसरी बार भी नहीं।

     

    तीसरी बार लकड़ी पतंग की डोर से टकराई।

     

    छपाक!

     

    पतंग थोड़ा हिली, लेकिन नीचे नहीं आई।

     

    कान्हा बोले—

     

    “थोड़ा और ऊपर!”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “धीरे!”

     

    कान्हा ने फिर कोशिश की।

     

    इस बार डोर लकड़ी में उलझ गई।

     

    कान्हा ने धीरे से उसे खींचा।

     

    पतंग शाखा से निकलकर नीचे गिरने लगी।

     

    “मिल गई!”

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए।

     

    कान्हा ने पतंग पकड़ ली।

     

    लेकिन पतंग का एक कोना फट गया था।

     

    कान्हा उसे देखकर थोड़ा उदास हुए।

     

    “मेरी पतंग टूट गई।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कोई बात नहीं। इसे ठीक कर लेंगे।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “हाँ, हमारे पास कागज है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “चलो, घर जाकर इसे ठीक करते हैं।”

     

    कान्हा ने पतंग को सीने से लगा लिया।

     

    “मैं इसे खुद ठीक करूँगा।”

     

    वापस लौटते समय कान्हा चुपचाप चल रहे थे।

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “सोच रहा हूँ, हवा पतंग को इतनी दूर क्यों ले गई?”

     

    दोस्त हँसा।

     

    “क्योंकि हवा को भी शरारत करनी थी।”

     

    कान्हा भी हँस पड़े।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “पतंग की तरह मन भी होता है। कभी-कभी बहुत दूर जाने लगता है। उसे संभालने के लिए समझदारी की डोर चाहिए।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “और अगर डोर टूट जाए?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो उसे फिर से जोड़ना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “जैसे मेरी पतंग की डोर?”

     

    “बिल्कुल।”

     

    घर पहुँचकर कान्हा सीधे यशोदा मैया के पास गए।

     

    “मैया देखो!”

     

    उन्होंने फटी हुई पतंग दिखाई।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “ये कैसे फटी?”

     

    कान्हा ने पूरी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने राहत की साँस ली।

     

    “अच्छा हुआ तुम पेड़ पर नहीं चढ़े।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “पहले तो मैं चढ़ने वाला था।”

     

    यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “लेकिन बाबा ने रोक दिया।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें पता है, छोटी सी लापरवाही से चोट लग सकती थी।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “अब नहीं चढ़ूँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “अच्छा बच्चा।”

     

    फिर उन्होंने पतंग उठाई।

     

    “इसे हम दोनों मिलकर ठीक करेंगे।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा ने रंगीन कागज निकाला।

     

    कान्हा ने पतंग का फटा हिस्सा पकड़ा और मैया ने धीरे-धीरे उसे ठीक करना शुरू किया।

     

    कान्हा बहुत ध्यान से देखते रहे।

     

    “मैया, अब ये पहले जैसी हो जाएगी?”

     

    “थोड़ी अलग होगी।”

     

    “तो क्या ये खराब हो गई?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “नहीं। कभी-कभी टूटने के बाद चीजें पहले से भी सुंदर लगती हैं।”

     

    कान्हा ने पतंग को देखा।

     

    उस पर अब नीले रंग का छोटा सा कागज लगा था।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब तो ये और अच्छी लग रही है।”

     

    शाम को कान्हा फिर दोस्तों के साथ बाहर गए।

     

    उन्होंने पतंग हाथ में ली।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “आज फिर उड़ाएँगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन आज पेड़ से दूर।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    कान्हा ने पतंग आसमान में छोड़ी।

     

    इस बार हवा शांत थी।

     

    पतंग धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी।

     

    कान्हा डोर संभालते हुए बोले—

     

    “धीरे… धीरे…”

     

    पतंग ऊँची जाती गई।

     

    कान्हा के चेहरे पर खुशी थी।

     

    तभी उन्हें कल की बात याद आई।

     

    उन्होंने डोर को थोड़ा ढीला किया।

     

    पतंग हवा के साथ चलने लगी।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम डोर ढीली क्यों कर रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हर चीज को अपनी मर्जी से खींचना जरूरी नहीं। कभी-कभी उसे हवा के साथ चलने देना चाहिए।”

     

    दोस्त उसकी बात सुनकर चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद पतंग आसमान में बहुत ऊँची दिखाई देने लगी।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “देखो! मेरी पतंग सबसे ऊपर है!”

     

    सभी बच्चे तालियाँ बजाने लगे।

     

    दूर खड़ी यशोदा मैया उन्हें देख रही थीं।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    उन्हें लगा जैसे उनका नन्हा कान्हा हर छोटी शरारत से कोई न कोई नई बात सीख रहा है।

     

    रात को कान्हा अपनी पतंग लेकर सोने की जिद करने लगे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “पतंग लेकर सोओगे तो वो फिर फट जाएगी।”

     

    कान्हा ने तुरंत उसे सुरक्षित जगह रख दिया।

     

    “ठीक है। इसे कल फिर उड़ाएँगे।”

     

    वह सोने लगे।

     

    तभी बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

     

    एक दोस्त घबराया हुआ नंद भवन के आँगन में आया।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा उठकर बैठ गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    दोस्त ने हाँफते हुए कहा—

     

    “यमुना किनारे एक छोटी नाव बहकर दूर चली गई है… और उसमें हमारी गेंद पड़ी है!”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “गेंद?”

     

    दोस्त ने सिर हिलाया।

     

    कान्हा तुरंत उठ खड़े हुए।

     

    “चलो!”

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था कि यमुना किनारे इस बार उनका सामना एक बहुत तेज बहाव से होने वाला था।

  • मक्खन की रहस्यमई चोरी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     — मक्खन की रहस्यमयी चोरी

     

    वृंदावन की उस सुबह नंद भवन के आँगन में बच्चों की टोली जमा थी। कल तक सबकी चर्चा छोटू और चंदू के जंगल में चले जाने की थी, लेकिन आज गाँव में एक नई बात फैल गई थी।

     

    गाँव की कई गोपियाँ परेशान थीं।

     

    उनकी मटकी में रखा मक्खन हर दिन थोड़ा-थोड़ा कम हो रहा था।

     

    सबसे ज्यादा परेशान थीं रोहिणी चाची की पड़ोसन गोपी, जो सुबह-सुबह नंद भवन पहुँच गई थीं।

     

    उन्होंने यशोदा मैया से कहा—

     

    “बहन, समझ नहीं आता मेरे घर से मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुमने किसी को देखा?”

     

    गोपी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। लेकिन आज सुबह मटकी का ढक्कन खुला मिला।”

     

    पास खड़े कान्हा ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

     

    उनके दोस्त भी वहीं थे।

     

    एक दोस्त ने धीरे से कान्हा के कान में कहा—

     

    “मुझे तो पता है मक्खन कौन खाता है।”

     

    कान्हा ने उसे आँख दिखाई।

     

    “चुप!”

     

    गोपी ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “क्यों कान्हा? तुम्हें कुछ पता है?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—

     

    “मुझे? नहीं।”

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    उन्हें कान्हा का यह चेहरा देखकर समझ आ गया कि उसके मन में जरूर कुछ चल रहा है।

     

    गोपी बोलीं—

     

    “मैं आज पता लगाकर रहूँगी कि मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “हम भी मदद करेंगे।”

     

    गोपी ने पूछा—

     

    “तुम?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा के दोस्त एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उन्हें पता था कि अगर कान्हा जाँच में शामिल हुए तो मक्खन की कहानी और भी मजेदार होने वाली है।

     

    कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों को लेकर बाहर आए।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने गंभीर चेहरा बनाया।

     

    “सबसे पहले सुराग ढूँढ़ेंगे।”

     

    दूसरे ने पूछा—

     

    “सुराग क्या होता है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “जिससे हमें पता चले कि मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    वे उस गोपी के घर पहुँचे।

     

    मटकी वहीं रखी थी।

     

    कान्हा ने जमीन देखी।

     

    उन्हें मिट्टी पर छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    “देखो!”

     

    सभी बच्चे नीचे झुक गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये तो पैरों के निशान हैं।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    उन्होंने उन निशानों को ध्यान से देखा।

     

    “लेकिन ये इंसान के नहीं लग रहे।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तो किसके हैं?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अभी पता लगाएँगे।”

     

    निशान रसोई से बाहर निकलकर पिछवाड़े की तरफ जा रहे थे।

     

    बच्चे उनके पीछे चल पड़े।

     

    वहाँ उन्हें कुछ गिरे हुए मक्खन के छोटे-छोटे निशान मिले।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “मक्खन यहाँ तक आया है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसका मतलब चोर मक्खन लेकर इधर गया।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    निशान एक पुराने पेड़ के पास जाकर खत्म हो गए।

     

    कान्हा ने पेड़ के नीचे देखा।

     

    वहाँ एक टूटी हुई पत्तों की टोकरी पड़ी थी।

     

    उसमें मक्खन के कुछ छोटे टुकड़े चिपके हुए थे।

     

    कान्हा ने टोकरी उठाई।

     

    “हमें सुराग मिल गया!”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “किसका?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पता नहीं।”

     

    सभी हँस पड़े।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अभी जाँच बाकी है।”

     

    तभी पेड़ के पीछे से हल्की सी आवाज आई।

     

    म्याऊँ…

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “शांत!”

     

    उन्होंने पेड़ के पीछे देखा।

     

    वहाँ एक छोटी सी बिल्ली बैठी थी।

     

    उसके मुँह के पास मक्खन लगा हुआ था।

     

    एक दोस्त खुशी से चिल्लाया—

     

    “चोर मिल गया!”

     

    बिल्ली डरकर भागने लगी।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़े।

     

    “रुको!”

     

    बिल्ली एक झाड़ी के पीछे जाकर छिप गई।

     

    कान्हा धीरे से उसके पास बैठे।

     

    “डरो मत।”

     

    बिल्ली ने उन्हें देखा।

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    बिल्ली धीरे-धीरे बाहर आई।

     

    कान्हा ने देखा कि उसके पास दो छोटे बच्चे भी थे।

     

    वे बहुत कमजोर लग रहे थे।

     

    कान्हा समझ गए।

     

    “तुम अपने बच्चों के लिए मक्खन ले जा रही थी?”

     

    बिल्ली चुपचाप बैठी रही।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे चोर मत कहो।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “लेकिन ये मक्खन तो ले जा रही थी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ, लेकिन शायद इसके बच्चे भूखे थे।”

     

    कान्हा ने बिल्ली के बच्चों को देखा।

     

    फिर गोपी को बुलाया।

     

    गोपी भी वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने बिल्ली को देखा और बोलीं—

     

    “अरे, तो ये मक्खन ले जाती थी?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ। लेकिन देखो, इसके बच्चे कितने छोटे हैं।”

     

    गोपी कुछ पल चुप रहीं।

     

    उनका गुस्सा धीरे-धीरे कम हो गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “बेचारी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आप रोज थोड़ा सा मक्खन इनके लिए अलग रख सकती हैं?”

     

    गोपी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ। इतना तो कर सकती हूँ।”

     

    बिल्ली जैसे कान्हा की बात समझ रही थी।

     

    उसने धीरे से आवाज की।

     

    म्याऊँ…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “देखो, धन्यवाद भी बोल रही है।”

     

    सभी बच्चे मुस्कुराने लगे।

     

    गोपी ने कान्हा के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुमने आज मुझे भी एक बात सिखाई।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “हर गलती के पीछे बुरी नीयत हो, यह जरूरी नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    फिर उनके दोस्तों में से एक ने धीरे से कहा—

     

    “लेकिन कान्हा…”

     

    “क्या?”

     

    “अगर ये मक्खन नहीं ले जाती, तो बाकी मक्खन कहाँ गया?”

     

    कान्हा अचानक चुप हो गए।

     

    सभी बच्चों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    गोपी भी सोच में पड़ गईं।

     

    “सच!”

     

    उन्होंने कहा—

     

    “मेरे घर से तो बहुत ज्यादा मक्खन कम हुआ है।”

     

    कान्हा ने जमीन पर फिर निशान देखे।

     

    बिल्ली के पैरों के निशान बहुत छोटे थे।

     

    लेकिन मक्खन की मात्रा ज्यादा थी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसने कुछ मक्खन लिया होगा, लेकिन सारा नहीं।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “तो दूसरा कौन है?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “हमें दूसरी जगह देखना होगा।”

     

    वे वापस घर की ओर गए।

     

    रास्ते में कान्हा ने एक दीवार पर सफेद सा निशान देखा।

     

    उन्होंने उंगली लगाई।

     

    “ये मक्खन है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “मक्खन दीवार पर कैसे आया?”

     

    कान्हा ने निशान को ऊपर तक देखा।

     

    वह दीवार के किनारे से आगे जा रहा था।

     

    वे उसी रास्ते पर चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाकर उन्हें एक छोटा सा खाली कमरा मिला।

     

    कमरे के दरवाजे के पास मक्खन के निशान थे।

     

    कान्हा ने धीरे से दरवाजा खोला।

     

    अंदर अँधेरा था।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “सब धीरे से चलना।”

     

    अंदर जाकर उन्होंने देखा कि एक कोने में कुछ मिट्टी के छोटे बर्तन रखे थे।

     

    एक बर्तन के अंदर मक्खन था।

     

    दूसरे में दही।

     

    तीसरा खाली था।

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “ये किसका घर है?”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “यह कमरा तो कई दिनों से खाली है।”

     

    तभी अंदर से आवाज आई—

     

    “छीं!”

     

    सब चौंक गए।

     

    एक बच्चा कान्हा के पीछे छिप गया।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “छीं!”

     

    कान्हा ने दरवाजे के पीछे देखा।

     

    वहाँ एक छोटा लड़का बैठा था।

     

    उसके कपड़े पुराने थे और चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    लड़का चुप रहा।

     

    गोपी गुस्से में बोलीं—

     

    “तो मक्खन तुम ले जाते थे?”

     

    लड़के ने सिर झुका लिया।

     

    कान्हा ने उसे डाँटा नहीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “तुम ऐसा क्यों करते थे?”

     

    लड़के की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा—

     

    “मेरी छोटी बहन भूखी रहती है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने माँगा क्यों नहीं?”

     

    लड़के ने कहा—

     

    “डर लगता था।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने गोपी की तरफ देखा।

     

    “इसे चोरी करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।”

     

    गोपी की आँखें भी नम हो गईं।

     

    उन्होंने लड़के से कहा—

     

    “तुम्हें भूख लगे तो मेरे घर आना। लेकिन बिना पूछे चीज मत लेना।”

     

    लड़के ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब हम सब मिलकर तुम्हारी बहन के लिए खाना ले जाएँगे।”

     

    दोस्तों ने भी हामी भर दी।

     

    उस दिन गोपी ने मक्खन, रोटी और दूध दिया।

     

    कान्हा खुद वह खाना लेकर उस लड़के के घर गए।

     

    लड़के की छोटी बहन ने खाना देखा तो उसके चेहरे पर खुशी आ गई।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब भूखे नहीं रहना।”

     

    वापस आते समय एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, आज हमने चोर पकड़ा या दोस्त बनाया?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “दोस्त बनाया।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “लेकिन चोरी तो गलत है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, चोरी गलत है। लेकिन गलती करने वाले को समझाकर सही रास्ता दिखाना भी जरूरी है।”

     

    शाम को यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बता दी।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुमने अच्छा किया। लेकिन याद रखना, किसी की मदद करते समय उसकी गलती को सही नहीं मानना चाहिए।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं समझ गया मैया।”

     

    उस रात कान्हा सोने लगे तो बाहर से बिल्ली की आवाज आई—

     

    म्याऊँ…

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब तुम्हें चोरी नहीं करनी पड़ेगी।”

     

    और पास ही रखी छोटी कटोरी में थोड़ा दूध देखकर उन्हें संतोष हुआ।

     

    लेकिन अगले दिन वृंदावन में एक नई शरारत होने वाली थी।

     

    कान्हा के दोस्तों ने तय किया कि इस बार वे यमुना किनारे पतंग उड़ाएँगे।

     

    और कान्हा को क्या पता था कि पतंग उड़ाते-उड़ाते उनकी डोर सीधे एक पेड़ की सबसे ऊँची डाल में फँसने वाली है।

    •  
  • कान्हा और जंगल में खोए दोस्त

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    कान्हा और जंगल में खोए छोटे दोस्त

     

    सुबह का समय था। वृंदावन की गलियों में अभी पूरी तरह चहल-पहल शुरू भी नहीं हुई थी, लेकिन कान्हा के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    वह गायों के बीच बार-बार छोटू और चंदू को ढूँढ़ रहे थे।

     

    “छोटू!”

     

    उन्होंने आवाज लगाई।

     

    फिर बोले—

     

    “चंदू!”

     

    लेकिन दोनों की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।

     

    नंद बाबा भी आसपास देखने लगे।

     

    “अभी थोड़ी देर पहले तो दोनों यहीं थे।”

     

    कान्हा ने जमीन की तरफ देखा। मिट्टी पर छोटे-छोटे खुरों के निशान बने थे।

     

    उन्होंने उन निशानों को ध्यान से देखा।

     

    “बाबा, देखो!”

     

    नंद बाबा उनके पास आए।

     

    “ये निशान जंगल की तरफ जा रहे हैं।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “हमें उन्हें ढूँढ़ना होगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन अकेले नहीं जाना।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “हम सब साथ चलेंगे।”

     

    नंद बाबा ने कुछ बड़े लड़कों को भी उनके साथ भेज दिया।

     

    कान्हा रास्ते भर छोटे-छोटे निशान देखते जा रहे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें सच में समझ आ रहा है कि ये किसके निशान हैं?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “छोटू के निशान छोटे हैं और चंदू के थोड़ा गोल।”

     

    दोस्त हैरान होकर बोला—

     

    “तुम्हें ये सब कैसे पता?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “दोस्तों को पहचानने के लिए हमेशा नाम की जरूरत नहीं होती।”

     

    सब बच्चे मुस्कुरा दिए।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें झाड़ियों के पास घास टूटी हुई दिखाई दी।

     

    कान्हा नीचे बैठ गए।

     

    उन्होंने घास को देखा।

     

    “यहाँ दोनों रुके थे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “फिर कहाँ गए?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    तभी दूर से बहुत हल्की आवाज आई।

     

    टन…

     

    कान्हा खड़े हो गए।

     

    “घंटी!”

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कुछ पल बाद फिर आवाज आई।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा उस दिशा में दौड़ पड़े।

     

    “छोटू!”

     

    लेकिन वहाँ पहुँचने पर कोई नहीं मिला।

     

    सिर्फ एक पेड़ की शाखा पर घंटी की आवाज जैसी हल्की टकराहट हो रही थी।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद हवा से आवाज आई थी।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मुझे लगा जैसे कोई हिला था।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    जंगल का रास्ता थोड़ा घना हो गया था।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “सब साथ रहना। कोई अकेला आगे मत जाना।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद उन्हें मिट्टी पर ताजे खुरों के निशान दिखाई दिए।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “ये वही हैं!”

     

    वे निशानों के पीछे चलने लगे।

     

    अचानक सामने एक छोटी सी ढलान आई।

     

    नीचे घनी घास थी।

     

    वहीं से आवाज आई—

     

    “माँ…”

     

    कान्हा चौंक गए।

     

    “ये तो छोटू की आवाज है!”

     

    उन्होंने नीचे देखा।

     

    छोटू एक झाड़ी के पास खड़ा था।

     

    वह सुरक्षित था, लेकिन उसके आगे एक छोटी लकड़ी रास्ते में पड़ी थी और वह आगे नहीं जा पा रहा था।

     

    कान्हा नीचे उतर गए।

     

    “अरे छोटू! तुम यहाँ क्यों आ गए?”

     

    छोटू कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुमने हमें कितना परेशान किया।”

     

    छोटू ने धीरे से घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अब क्या सफाई दे रहे हो?”

     

    उन्होंने आसपास देखा।

     

    “लेकिन चंदू कहाँ है?”

     

    छोटू की तरफ देखते ही कान्हा समझ गए कि वह किसी दूसरी दिशा में देख रहा है।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “क्या चंदू उधर गया है?”

     

    छोटू आगे बढ़ा।

     

    कान्हा उसके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ ही दूरी पर उन्हें एक अजीब सी आवाज सुनाई दी।

     

    “माँ… माँ…”

     

    इस बार आवाज थोड़ी घबराई हुई थी।

     

    कान्हा तेज कदमों से आगे बढ़े।

     

    एक बड़े पेड़ के पीछे चंदू खड़ा था।

     

    उसके सामने जमीन पर गिरी हुई बेलें थीं। शायद वह खेलते-खेलते वहाँ पहुँच गया था और रास्ता उलझा हुआ देखकर रुक गया था।

     

    कान्हा उसके पास पहुँचे।

     

    “चंदू!”

     

    चंदू कान्हा को देखकर तुरंत उनकी तरफ आया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम भी यहीं थे!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “दोनों हमें बहुत दूर तक ले आए।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “लेकिन मिल तो गए।”

     

    उन्होंने दोनों बछड़ों को अपने पास खड़ा किया।

     

    “अब कोई कहीं नहीं जाएगा।”

     

    दोनों बछड़े जैसे कान्हा की बात समझ गए।

     

    वापस लौटते समय अचानक आसमान में बादल घिरने लगे।

     

    एक दोस्त ने ऊपर देखा।

     

    “फिर बारिश आने वाली है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हमें जल्दी चलना होगा।”

     

    सब बच्चे और बछड़े तेजी से लौटने लगे।

     

    लेकिन रास्ते में चंदू एक रंग-बिरंगे फूल के पास रुक गया।

     

    उसने फूल सूँघा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “चंदू, अभी फूल नहीं। घर चलो।”

     

    चंदू वहीं खड़ा रहा।

     

    कान्हा ने उसका सिर सहलाया।

     

    “अगर हम देर करेंगे तो मैया चिंता करेंगी।”

     

    चंदू ने आखिरकार कदम बढ़ाया।

     

    रास्ते में कान्हा ने छोटू और चंदू को बीच में रखा और दोस्तों को दोनों तरफ चलने को कहा।

     

    कुछ देर बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं।

     

    लेकिन इस बार सब सुरक्षित थे।

     

    जब वे गाँव पहुँचे तो यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    कान्हा को देखते ही उन्होंने राहत की साँस ली।

     

    “कहाँ चले गए थे तुम लोग?”

     

    कान्हा ने छोटू और चंदू की तरफ इशारा किया।

     

    “ये दोनों जंगल में चले गए थे।”

     

    यशोदा ने दोनों बछड़ों को देखा।

     

    “और तुम इनके पीछे चले गए?”

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा ने चिंता से पूछा—

     

    “तुम्हें पता है जंगल कितना बड़ा है?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “पता है मैया।”

     

    यशोदा ने उन्हें अपने पास बुलाया।

     

    “किसी की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन बिना बड़े को बताए ऐसी जगह नहीं जाना चाहिए। अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो?”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस आगे से ध्यान रखना।”

     

    नंद बाबा भी वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने छोटू और चंदू को देखकर कहा—

     

    “अब इन्हें कुछ दिन गाँव के पास ही रखना होगा।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बाबा, मैं इनकी देखभाल करूँगा।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम करोगे, लेकिन अकेले नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    शाम को बारिश रुक गई।

     

    कान्हा दोनों बछड़ों के साथ आँगन में बैठे थे।

     

    उन्होंने छोटू की घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    फिर चंदू की।

     

    टन…

     

    दोनों आवाजें अलग थीं।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब मैं दोनों को आँखें बंद करके भी पहचान सकता हूँ।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “अगर दोनों एक साथ भाग गए तो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं दोनों को पकड़ लूँगा।”

     

    दोस्त हँसने लगा।

     

    “तुम्हें अपने ऊपर बहुत भरोसा है।”

     

    कान्हा भी हँसे।

     

    “दोस्तों को छोड़ना नहीं चाहिए।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने मिट्टी पर दो छोटे-छोटे चित्र बनाए।

     

    एक छोटू का और दूसरा चंदू का।

     

    उन्होंने दोनों चित्रों के ऊपर फूल रख दिए।

     

    यशोदा ने दूर से पूछा—

     

    “ये क्या बना रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अपने दोस्तों का घर।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और इसमें तुम्हारा घर कहाँ है?”

     

    कान्हा ने चित्र के बीच में एक छोटा सा निशान बनाया।

     

    “यहाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं इनके बीच रहूँगा।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    रात को कान्हा सोने गए तो दोनों बछड़ों की घंटियों की आवाज अभी भी बाहर से सुनाई दे रही थी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा ने आँखें बंद करते हुए कहा—

     

    “अब तुम दोनों कहीं मत जाना।”

     

    बाहर से जैसे छोटू ने जवाब दिया।

     

    टन…

     

    कान्हा मुस्कुराते हुए सो गए।

     

    लेकिन अगले दिन वृंदावन में एक नई परेशानी आने वाली थी।

     

    सुबह-सुबह गाँव की एक गोपी दौड़ती हुई नंद भवन पहुँची।

     

    वह बहुत परेशान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “यशोदा! मेरी मटकी से रोज थोड़ा-थोड़ा मक्खन गायब हो रहा है। आज मैंने किसी को घर के पास देखा है।”

     

    कान्हा यह सुन रहे थे।

     

    उनके दोस्तों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “मुझे लगता है हमें पता लगाना चाहिए कि मक्खन कौन ले जा रहा है।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “नहीं। इस बार हम जासूस बनेंगे।”

     

    और इस तरह शुरू होने वाली थी वृंदावन की सबसे मजेदार मक्खन वाली पहेली।

     

     समाप्त। 🌸

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 29

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 29

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 29 : अपने ही पिता के खिलाफ

     

    पुराने रेलवे स्टेशन के बाहर दर्जनों गाड़ियों की हेडलाइट्स एक साथ जल उठीं।

     

    चारों तरफ हथियारबंद लोग खड़े थे।

     

    अंदर खड़े आरव, आरोही और अमन को घेर लिया गया था।

     

    बाहर से आवाज आई—

     

    “आरव! अमन को हमारे हवाले कर दो, वरना दस मिनट में ये पूरा स्टेशन मलबे में बदल जाएगा!”

     

    आरोही ने घबराकर आरव की तरफ देखा।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डरो मत।”

     

    “लेकिन बाहर इतने लोग हैं।”

     

    “हम निकल जाएंगे।”

     

    अमन जमीन पर बैठा हुआ था। उसके कंधे से अभी भी खून बह रहा था।

     

    उसने धीमे से कहा,

     

    “हम नहीं निकल पाएंगे।”

     

    आरव उसकी तरफ गया।

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “क्योंकि बाहर सिर्फ आदमी नहीं हैं।”

     

    “तो?”

     

    “वहां बम भी हैं।”

     

    आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    अमन ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “मुझे इन लोगों का तरीका पता है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे?”

     

    अमन हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं सालों से इनके बीच रहा हूं।”

     

    आरव ने पलटकर शेखर को देखा।

     

    “पापा…”

     

    शेखर चुप थे।

     

    आरव उनके पास गया।

     

    “आप इन लोगों को जानते हैं?”

     

    शेखर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “ये आपके आदमी हैं?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में अविश्वास था।

     

    “तो ये हमें मारने क्यों आए हैं?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “मैंने आपसे पूछा!”

     

    शेखर ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि अब मैं उनके लिए भी खतरा बन चुका हूं।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “मतलब?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “जिस संगठन को मैंने सालों पहले खत्म करने की कोशिश की थी… वो आज फिर खड़ा हो चुका है।”

     

    अर्जुन ने हैरानी से पूछा,

     

    “कौन-सा संगठन?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “ब्लैक क्राउन।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “एक ऐसा संगठन जो पैसे, राजनीति और अपराध के बीच काम करता है।”

     

    “और इसका मुखिया?”

     

    शेखर ने विराज की तरफ देखा।

     

    लेकिन विराज वहां नहीं था।

     

    “विराज?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर कौन?”

     

    शेखर की आंखों में डर उतर आया।

     

    “जिसका नाम मैंने पच्चीस साल से किसी के सामने नहीं लिया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नाम बताइए।”

     

    शेखर ने धीरे से कहा—

     

    “सम्राट।”

     

    अमन ने अचानक सिर उठाया।

     

    “सम्राट?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तो वो अभी भी जिंदा है?”

     

    आरव ने अमन की तरफ देखा।

     

    “तुम उसे जानते हो?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “वही आदमी जिसने मेरी मां की हत्या का आदेश दिया था।”

     

    अमन की मुट्ठियां कस गईं।

     

    “मैंने सालों तक विराज को दोषी समझा।”

     

    “लेकिन असली आदेश सम्राट ने दिया था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “तो आपने मुझे ये पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि तुम बदला लेने के पीछे भागते हुए मर जाते।”

     

    अमन हंस पड़ा।

     

    “और अब?”

     

    “अब तुम्हें सच पता है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “अब मैं सम्राट को ढूंढूंगा।”

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “पहले तुम्हारा इलाज होगा।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम सच में मुझे भाई मानते हो?”

     

    आरव ने बिना सोचे कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “तो फिर मुझे बचाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें मरने नहीं दूंगा।”

     

     

    फिर से बाहर से आवाज आई—

     

    “पांच मिनट बाकी हैं!”

     

    कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “हमें कोई रास्ता निकालना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “पीछे का रास्ता?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुरानी सुरंग है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कहां जाती है?”

     

    “रेलवे यार्ड तक।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “वह रास्ता बंद है।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “मैं कई बार यहां से भाग चुका हूं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो दूसरा रास्ता?”

     

    अमन ने कुछ पल सोचा।

     

    “एक रास्ता है।”

     

    “कहां?”

     

    “पुराने कंट्रोल रूम के नीचे।”

     

    शेखर अचानक बोले,

     

    “नहीं।”

     

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

     

    “वह रास्ता इस्तेमाल नहीं कर सकते।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि वहां…”

     

    वह रुक गए।

     

    “क्या?”

     

    “वहां ब्लैक क्राउन का पुराना हथियारघर है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मतलब?”

     

    “अगर वहां कोई गोली चली…”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “पूरा स्टेशन उड़ सकता है।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “तो हमें स्टेशन से बाहर नहीं जाना।”

     

    सब उसे देखने लगे।

     

    “हमें उन्हें स्टेशन के अंदर बुलाना होगा।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तुम पागल हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर हम बाहर गए तो वे हमें गोली मार देंगे।”

     

    “और अंदर बुलाए तो?”

     

    “तब उनके बम हमारे नियंत्रण में होंगे।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “लेकिन ये बहुत खतरनाक है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं जानता हूं।”

     

    “फिर भी?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मैं भी साथ हूं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें खतरे में नहीं डालना चाहता।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं तुम्हें अकेला छोड़ दूंगी?”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमने तय किया था ना… सच कितना भी खतरनाक हो, साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    कबीर ने अपनी बंदूक उठाई।

     

    “मैं बाहर जाऊंगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो मुझे अपना आदमी समझते हैं।”

     

    “और?”

     

    “मैं उन्हें गलत दिशा में भेज सकता हूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें खुद को खतरे में डालने की जरूरत नहीं।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “भाई के लिए इतना तो कर सकता हूं।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम सच में आरव के दोस्त हो?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “भाई से ज्यादा।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “तो जाओ।”

     

    कबीर बाहर जाने लगा।

     

    आरव ने पीछे से कहा,

     

    “कबीर!”

     

    कबीर रुका।

     

    “वापस आना।”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “जरूर।”

    कबीर ने स्टेशन का दरवाजा खोला और हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “गोली मत चलाना!”

     

    बाहर खड़े लोग उसकी तरफ दौड़े।

     

    एक आदमी ने पूछा,

     

    “बाकी लोग कहां हैं?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “अंदर।”

     

    “आरव?”

     

    “हां।”

     

    “अमन?”

     

    “वो भी।”

     

    “तुम्हें बाहर क्यों भेजा?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “समझौते के लिए।”

     

    वह आदमी हंसा।

     

    “समझौता अब नहीं होगा।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “अगर तुमने स्टेशन उड़ाया तो आरव भी मरेगा और अमन भी।”

     

    “हमें वही चाहिए।”

     

    कबीर चौंका।

     

    “दोनों?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि दोनों जिंदा रहे तो सम्राट की गद्दी खतरे में है।”

     

    कबीर को पहली बार समझ आया—

     

    सम्राट आरव और अमन दोनों से डरता था।

     

    इधर आरव और आरोही पुराने कंट्रोल रूम की तरफ बढ़ रहे थे।

     

    अमन भी उनके साथ था।

     

    शेखर पीछे से चिल्लाए,

     

    “आरव!”

     

    आरव पलटा।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “अगर तुम वहां जा रहे हो तो ये ले जाओ।”

     

    उन्होंने आरव को एक पुरानी चाबी दी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    “सम्राट के हथियारघर की चाबी।”

     

    आरव ने हैरानी से कहा,

     

    “आपके पास ये कब से है?”

     

    “पच्चीस साल से।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आपने इसे कभी इस्तेमाल क्यों नहीं किया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि एक दिन मेरे बच्चों के खिलाफ यही इस्तेमाल होगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब यही हमारी रक्षा करेगा।”

     

    तीनों सुरंग में उतर गए।

     

    अंधेरा बहुत गहरा था।

     

    आरोही आरव का हाथ पकड़े हुए थी।

     

    अमन आगे चल रहा था।

     

    अचानक उसने हाथ उठाकर सबको रोक दिया।

     

    “रुको।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अमन ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    “यहां कैमरा है।”

     

    कबीर की आवाज वायरलेस पर आई—

     

    “आरव, सुन रहे हो?”

     

    “हां।”

     

    “मैंने बाहर वालों को कुछ देर रोक लिया है।”

     

    “कितना समय?”

     

    “लगभग पांच मिनट।”

     

    “बहुत है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “हमारे पास सिर्फ दो मिनट हैं।”

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने दीवार के नीचे लगा लाल बल्ब दिखाया।

     

    “ये बम का संकेत है।”

     

    आरोही डर गई।

     

    “कितने बम हैं?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “पूरी सुरंग में।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उन्हें निष्क्रिय कैसे करेंगे?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “लेकिन मेरी मां जानती थी।”

     

     

    अमन ने अपनी जेब से एक छोटा कागज निकाला।

     

    “ये मुझे आज से दस साल पहले मिला था।”

     

    आरव ने उसे लिया।

     

    उस पर एक नक्शा बना था।

     

    नक्शे में सुरंग और एक छोटा कमरा दिखाया गया था।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “यहां!”

     

    “क्या?”

     

    “ये कमरा।”

     

    “हां।”

     

    “इसके नीचे कुछ लिखा है।”

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “जहां पहला सच दफन है, वहीं आखिरी रास्ता खुलेगा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “पहला सच?”

     

    आरव ने सोचा।

     

    “कमरा नंबर 17?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने अचानक कहा,

     

    “अस्पताल!”

     

    आरव उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “क्या?”

     

    “तुम दोनों का जन्म अस्पताल में हुआ था।”

     

    अमन की आंखें फैल गईं।

     

    “पुराना सिटी अस्पताल…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “वही जगह जहां सिया मरी थी।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “और जहां हमारे जन्म के रिकॉर्ड बदले गए थे।”

     

    तभी सुरंग में अचानक स्पीकर चालू हो गया।

     

    एक भारी आवाज गूंजी—

     

    “बहुत होशियार हो गए हो तुम लोग।”

     

    आरव रुक गया।

     

    “कौन?”

     

    आवाज आई—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

     

    आरोही ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “सम्राट?”

     

    आवाज में हंसी थी।

     

    “आखिरकार तुमने मेरा नाम तो लिया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सामने आओ।”

     

    “इतनी जल्दी क्या है?”

     

    “तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद की।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    आवाज शांत थी।

     

    “तुम्हारी जिंदगी मैंने नहीं… तुम्हारे पिता ने बर्बाद की।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    “हां।”

     

    शेखर की आवाज पीछे से आई—

     

    “सम्राट, चुप हो जाओ।”

     

    सम्राट हंसा।

     

    “शेखर, अब सच छुपाने का समय खत्म हो गया है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्या सच?”

     

    सम्राट बोला—

     

    “तुम्हारे पिता ने ही सिया को मरने के लिए छोड़ा था।”

     

    अमन का चेहरा बदल गया।

     

    “झूठ!”

     

    सम्राट ने कहा,

     

    “अगर यकीन नहीं है तो पुराने सिटी अस्पताल के तहखाने में जाना।”

     

    “वहां तुम्हें सिया की आखिरी रिकॉर्डिंग मिलेगी।”

     

    अमन कांपने लगा।

     

    “मेरी मां की?”

     

    “हां।”

     

    सम्राट ने कहा—

     

    “और उस रिकॉर्डिंग में सिया ने खुद बताया है कि उसकी मौत के लिए जिम्मेदार कौन था।”

     

    अमन ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव की आंखों में भी बेचैनी थी।

     

    तभी सम्राट की आवाज फिर आई—

     

    “और आरव… उस रिकॉर्डिंग में तुम्हारे बारे में भी एक ऐसा सच है, जिसे सुनने के बाद तुम खुद अपने पिता से नफरत करने लगोगे।”

     

    स्पीकर बंद हो गया।

     

    सुरंग में फिर सन्नाटा छा गया।

     

    अमन ने मुट्ठी कस ली।

     

    “हम अस्पताल जाएंगे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “लेकिन पहले ये बम?”

     

    अमन ने लाल बल्ब की तरफ देखा।

     

    “अगर हम दो मिनट में इसे नहीं रोक पाए…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो पुराने रेलवे स्टेशन के साथ हम सब भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे।”

     

    और उसी पल…

     

    घड़ी में सिर्फ 01:59 मिनट बाकी थे।

     

    जारी रहेगा…

  • दरवाजे पर कोई है

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दरवाजे पर कोई है

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। बाहर तेज बारिश हो रही थी। बिजली बार-बार चमकती और फिर पूरा घर अंधेरे में डूब जाता।

     

    सिया अपने कमरे में बैठी खिड़की से बारिश देख रही थी। उसके माता-पिता किसी रिश्तेदार के घर गए हुए थे और आज उसे घर में अकेले ही रहना था।

     

    अचानक—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सिया चौंक गई।

     

    उसने घड़ी की तरफ देखा।

     

    ग्यारह बजकर सात मिनट।

     

    इतनी रात को कौन आया होगा?

     

    उसने कुछ देर तक आवाज को नजरअंदाज किया।

     

    फिर वही आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार पहले से थोड़ी तेज।

     

    सिया धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकली।

     

    “कौन है?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    सिया कुछ पल दरवाजे के पास खड़ी रही।

     

    फिर उसने दोबारा पूछा, “कौन है दरवाजे पर?”

     

    सन्नाटा।

     

    सिर्फ बारिश की आवाज।

     

    सिया ने दरवाजे की झिरी से बाहर देखने की कोशिश की, लेकिन बाहर अंधेरा था।

     

    उसने फोन उठाया और अपने बड़े भाई आरव को कॉल किया।

     

    “भैया…”

     

    “हाँ सिया, क्या हुआ?”

     

    “दरवाजे पर कोई है।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    “तुमने दरवाजा तो नहीं खोला?”

     

    “नहीं।”

     

    “अच्छा किया। पहले देखो बाहर कौन है। अगर पहचान में नहीं आता तो दरवाजा मत खोलना।”

     

    सिया ने दरवाजे के पास लगी छोटी सी कैमरा स्क्रीन देखी।

     

    स्क्रीन पर कोई नहीं था।

     

    “भैया, बाहर कोई दिखाई नहीं दे रहा।”

     

    “फिर आवाज कहाँ से आ रही है?”

     

    सिया के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

     

    तभी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज दरवाजे से नहीं, बल्कि घर के पीछे वाले हिस्से से आई।

     

    सिया का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “भैया… आवाज पीछे से आई है।”

     

    “तुम अपने कमरे में जाओ। दरवाजा बंद करो। मैं अभी पड़ोसी को फोन करता हूँ।”

     

    सिया जल्दी से अपने कमरे में चली गई।

     

    उसने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गई।

     

    कुछ मिनट बीते।

     

    फिर फोन की घंटी बजी।

     

    आरव का कॉल था।

     

    “सिया, पड़ोसी शर्मा अंकल तुम्हारे घर के बाहर पहुँच रहे हैं।”

     

    “ठीक है भैया।”

     

    सिया ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन तभी उसके कमरे की खिड़की पर हल्की-सी दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

     

    सिया का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    वह खिड़की की तरफ देखने लगी।

     

    बाहर बारिश थी।

     

    और शीशे पर किसी की उँगलियों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    सिया पीछे हट गई।

     

    “भैया…”

     

    उसने फोन कान से लगाया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मेरी खिड़की पर भी किसी ने दस्तक दी है।”

     

    आरव की आवाज गंभीर हो गई।

     

    “खिड़की मत खोलना।”

     

    “मैं नहीं खोल रही।”

     

    तभी बाहर से एक धीमी आवाज आई।

     

    “सिया…”

     

    सिया के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    उस आवाज ने उसका नाम लिया था।

     

    “भैया… किसी ने मेरा नाम लिया।”

     

    “किसने?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    फिर वही आवाज आई।

     

    “सिया… दरवाजा खोलो।”

     

    सिया की आँखों में डर भर गया।

     

    लेकिन तभी उसे कुछ अजीब लगा।

     

    वह आवाज बाहर से नहीं, बल्कि घर के अंदर से आती हुई लग रही थी।

     

    सिया धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकली।

     

    “सिया, बाहर मत जाना!” आरव फोन पर चिल्लाया।

     

    लेकिन सिया रुक नहीं सकी।

     

    आवाज उसे नीचे वाले कमरे की तरफ ले जा रही थी।

     

    वहाँ एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी, जिसे उसके पिता हमेशा बंद रखते थे।

     

    अचानक अलमारी के अंदर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सिया कुछ कदम पीछे हट गई।

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आवाज अलमारी के अंदर से आ रही है।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “उस अलमारी को मत खोलना।”

     

    सिया ने पूछा, “लेकिन अंदर कोई है तो?”

     

    “शर्मा अंकल आने वाले हैं। उनके आने तक इंतजार करो।”

     

    तभी बाहर मुख्य दरवाजे पर तेज दस्तक हुई।

     

    धड़ाम! धड़ाम!

     

    सिया घबरा गई।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “सिया! दरवाजा खोलो!”

     

    सिया ने आवाज पहचानी।

     

    “शर्मा अंकल?”

     

    “हाँ बेटी, जल्दी दरवाजा खोलो।”

     

    सिया दरवाजे तक पहुँची, लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

     

    शर्मा अंकल हमेशा उसे “बेटी” कहते थे।

     

    लेकिन इस आवाज में कुछ अजीब था।

     

    “अंकल, आप अपना नाम बताइए।”

     

    बाहर कुछ देर सन्नाटा रहा।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मैं… शर्मा हूँ।”

     

    सिया और डर गई।

     

    “आपका पहला नाम?”

     

    फिर चुप्पी।

     

    सिया पीछे हट गई।

     

    “भैया, ये शर्मा अंकल नहीं हैं।”

     

    आरव ने तुरंत कहा, “दरवाजा बिल्कुल मत खोलना।”

     

    तभी बाहर से आवाज बदल गई।

     

    “सिया… तुम मुझे पहचानती नहीं?”

     

    सिया की आँखें फैल गईं।

     

    यह आवाज उसके पिता जैसी थी।

     

    वही आवाज।

     

    वही बोलने का तरीका।

     

    लेकिन उसके पिता को गुजरे तीन साल हो चुके थे।

     

    सिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “पापा…?”

     

    आरव ने फोन पर कहा, “सिया! उसकी बात मत सुनो।”

     

    बाहर से फिर आवाज आई—

     

    “बेटा, दरवाजा खोलो।”

     

    सिया कुछ पल के लिए भावुक हो गई।

     

    लेकिन तभी उसे पिता की एक बात याद आई।

     

    जब वह छोटी थी, पिता ने उसे समझाया था—

     

    “अगर कभी कोई अजनबी मेरी आवाज निकालकर तुम्हें बुलाए, तो उसकी बात पर विश्वास मत करना। पहले कोई ऐसी बात पूछना जो सिर्फ हम दोनों जानते हों।”

     

    सिया ने दरवाजे की तरफ देखकर पूछा—

     

    “पापा, आपने मुझे मेरी पहली बाँसुरी कब दी थी?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ सेकंड बाद आवाज आई—

     

    “जब तुम दस साल की थीं।”

     

    सिया की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    गलत जवाब।

     

    उसे बाँसुरी नौ साल की उम्र में मिली थी।

     

    उसे समझ आ गया कि बाहर जो भी था, वह उसके पिता नहीं थे।

     

    तभी दूर से किसी गाड़ी की आवाज सुनाई दी।

     

    शर्मा अंकल सच में आ गए थे।

     

    उन्होंने बाहर से आवाज लगाई—

     

    “सिया! मैं हूँ, शर्मा अंकल। पुलिस को भी फोन कर दिया है। दरवाजा मत खोलना, हम बाहर हैं।”

     

    कुछ ही देर में पुलिस भी पहुँच गई।

     

    बाहर खड़े व्यक्ति को पकड़ लिया गया।

     

    पूछताछ में पता चला कि वह घर में चोरी करने की कोशिश कर रहा था। उसे घर के बारे में कुछ जानकारी थी और उसने सिया को डराने के लिए अलग-अलग आवाजें निकालने की कोशिश की थी।

     

    सिया ने राहत की साँस ली।

     

    कुछ देर बाद आरव भी घर पहुँच गया।

     

    उसने सिया को गले लगाया।

     

    “तुमने बहुत समझदारी दिखाई।”

     

    सिया ने धीरे से कहा, “भैया… अगर पापा की वो बात मुझे याद नहीं आती तो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तो शायद आज कहानी कुछ और होती।”

     

    सुबह बारिश रुक चुकी थी।

     

    सूरज की हल्की किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं।

     

    सिया ने घर का दरवाजा खोला।

     

    बाहर सब शांत था।

     

    वह कुछ देर दरवाजे को देखती रही।

     

    फिर मुस्कुराकर बोली—

     

    “कल रात दरवाजे पर सच में कोई था…”

     

    आरव ने पूछा, “कौन?”

     

    सिया ने बाहर देखते हुए कहा—

     

    “डर।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    सिया ने आगे कहा—

     

    “लेकिन मैंने दरवाजा नहीं खोला। इसलिए डर अंदर नहीं आ पाया।”

     

    उस दिन के बाद सिया ने एक बात हमेशा याद रखी—

     

    हर दस्तक का जवाब देना जरूरी नहीं होता।

     

    कभी-कभी समझदारी यही होती है कि दरवाजा बंद रखा जाए…

     

    क्योंकि बाहर कौन है, यह जानने से ज्यादा जरूरी है कि अंदर कौन सुरक्षित है।

  • एक मधुर धुन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक मधुर धुन

     

    शहर से बहुत दूर, पहाड़ों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—सुरमई। इस गाँव की सबसे खास बात थी वहाँ बहने वाली एक पतली-सी नदी, जिसका पानी पत्थरों से टकराकर ऐसी आवाज करता था जैसे कोई धीमी धुन बजा रहा हो। गाँव के लोग उसे प्यार से “मधुर नदी” कहते थे।

     

    उसी गाँव में सोलह साल की एक लड़की रहती थी—रागिनी। उसके नाम की तरह ही उसके मन में भी संगीत बसा था। वह जब भी उदास होती, नदी के किनारे जाकर बैठ जाती और घंटों पानी की आवाज सुनती रहती।

     

    रागिनी के पास एक पुरानी बाँसुरी थी। वह बाँसुरी उसके पिता की थी, जो कभी गाँव के सबसे अच्छे बाँसुरी वादक हुआ करते थे। कई साल पहले एक बीमारी के कारण उनका निधन हो गया था। जाते-जाते उन्होंने अपनी बाँसुरी रागिनी को देते हुए कहा था, “जब भी मन बहुत भारी हो जाए, इसे बजा लेना। संगीत मन की उन बातों को भी कह देता है, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।”

     

    रागिनी ने वह बात हमेशा याद रखी थी।

     

    लेकिन एक परेशानी थी—उसे बाँसुरी बजाना ठीक से नहीं आता था।

     

    वह रोज कोशिश करती। कभी सुर बिगड़ जाता, कभी आवाज इतनी तेज निकलती कि पास बैठे पक्षी उड़ जाते। गाँव के कुछ बच्चे उसका मजाक भी उड़ाते।

     

    “रागिनी, तुमसे बाँसुरी नहीं बजेगी,” एक दिन मोहन ने हँसते हुए कहा।

     

    रागिनी मुस्कुरा दी।

     

    “शायद अभी नहीं आती… लेकिन एक दिन जरूर आएगी।”

     

    मोहन ने कंधे उचकाए और चला गया।

     

    उस रात रागिनी नदी के किनारे बैठी थी। आसमान में चाँद साफ दिखाई दे रहा था। उसने बाँसुरी होंठों से लगाई और धीरे से फूँक मारी।

     

    इस बार आवाज अलग थी।

     

    बहुत हल्की… बहुत मीठी।

     

    रागिनी ने दोबारा बजाया।

     

    नदी की आवाज के साथ बाँसुरी का सुर जैसे मिल गया। कुछ पल के लिए उसे लगा जैसे आसपास की पूरी दुनिया शांत हो गई हो।

     

    तभी पीछे से आवाज आई, “यही सुर है।”

     

    रागिनी पलटकर देखती है।

     

    वहाँ गाँव के बूढ़े संगीतकार हरिदास बाबा खड़े थे।

     

    रागिनी ने उन्हें प्रणाम किया।

     

    “बाबा, आप कब आए?”

     

    “जब तुम्हारी बाँसुरी ने मुझे बुलाया।”

     

    रागिनी हँस पड़ी।

     

    “बाँसुरी भी किसी को बुलाती है क्या?”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “सच्चा संगीत बुलाता है। बस उसे सुनने वाला दिल चाहिए।”

     

    उस दिन के बाद हरिदास बाबा ने रागिनी को बाँसुरी सिखाना शुरू कर दिया।

     

    वह उसे रोज नदी के किनारे बुलाते और कहते, “सुर सिर्फ उँगलियों से नहीं निकलता, रागिनी। उसे दिल से निकालना पड़ता है।”

     

    रागिनी घंटों अभ्यास करती।

     

    धीरे-धीरे उसकी बाँसुरी में मिठास आने लगी।

     

    लेकिन तभी गाँव में एक बड़ी परेशानी आ गई।

     

    कई महीनों से बारिश नहीं हुई थी। खेत सूखने लगे थे। कुएँ का पानी कम हो गया था। गाँव के लोग परेशान थे। जिन खेतों में कभी हरी फसल लहराती थी, वहाँ अब सूखी मिट्टी दिखाई देती थी।

     

    गाँव के मुखिया ने सबको बुलाकर कहा, “अगर अगले कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई, तो हमें अपने परिवारों को लेकर शहर की ओर जाना पड़ेगा।”

     

    यह सुनकर रागिनी का मन उदास हो गया।

     

    वह उसी शाम नदी के पास गई।

     

    मधुर नदी भी पहले जैसी नहीं रही थी। पानी बहुत कम हो गया था।

     

    रागिनी ने बाँसुरी निकाली, लेकिन उसके हाथ रुक गए।

     

    “बाबा, क्या संगीत सच में किसी की मदद कर सकता है?”

     

    हरिदास बाबा पास ही बैठे थे।

     

    उन्होंने कहा, “संगीत बारिश नहीं ला सकता, लेकिन लोगों के दिलों में उम्मीद जरूर जगा सकता है।”

     

    रागिनी कुछ नहीं बोली।

     

    अगले दिन गाँव में एक घोषणा हुई। गाँव के पुराने मंदिर में एक बड़ा संगीत समारोह रखा जाएगा। जो भी चाहे, अपनी कला दिखा सकता था। मुखिया ने कहा कि समारोह से मिलने वाले पैसों से गाँव के लिए पानी की व्यवस्था की जाएगी।

     

    रागिनी ने भी अपना नाम लिखवा दिया।

     

    मोहन ने उसे देखकर कहा, “तुम बाँसुरी बजाओगी?”

     

    रागिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “अगर सबके सामने सुर बिगड़ गया तो?”

     

    रागिनी कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “तो मैं दोबारा कोशिश करूँगी।”

     

    समारोह की रात पूरा गाँव मंदिर के सामने इकट्ठा हुआ।

     

    किसी ने गीत गाया, किसी ने ढोल बजाया, किसी ने कविता सुनाई।

     

    आखिर में रागिनी का नाम पुकारा गया।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    उसके सामने सैकड़ों लोग बैठे थे।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे।

     

    उसे पिता याद आए।

     

    उसे हरिदास बाबा की बात याद आई।

     

    “सुर दिल से निकालना।”

     

    रागिनी ने आँखें बंद कीं और बाँसुरी होंठों से लगा ली।

     

    पहला सुर निकला।

     

    बहुत धीमा।

     

    फिर दूसरा सुर।

     

    उसके बाद बाँसुरी से ऐसी धुन निकली कि पूरा वातावरण शांत हो गया।

     

    नदी की धीमी आवाज, रात की ठंडी हवा और बाँसुरी का संगीत जैसे एक-दूसरे में घुल गए।

     

    लोग बिना हिले उसे सुनते रहे।

     

    मोहन की आँखें भी चमक उठीं।

     

    धुन खत्म हुई तो कुछ पल तक कोई आवाज नहीं हुई।

     

    फिर अचानक पूरा गाँव तालियों से गूँज उठा।

     

    रागिनी ने आँखें खोलीं।

     

    हरिदास बाबा की आँखों में आँसू थे।

     

    “आज तुम्हारे पिता बहुत खुश होते,” उन्होंने कहा।

     

    उस रात समारोह से अच्छी-खासी रकम जमा हुई। गाँव वालों ने उससे पानी के लिए एक पुराना कुआँ साफ करवाया और दूर पहाड़ी से पानी लाने की व्यवस्था शुरू की।

     

    कुछ दिनों बाद आसमान में बादल दिखाई दिए।

     

    पहली बारिश की बूंद रागिनी की हथेली पर गिरी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    फिर बारिश तेज हो गई।

     

    बच्चे खुशी से नाचने लगे। खेतों की मिट्टी भीग गई। सूखी नदी में धीरे-धीरे पानी बढ़ने लगा।

     

    रागिनी बारिश में खड़ी होकर हँस रही थी।

     

    मोहन उसके पास आया और बोला, “तुम्हारी बाँसुरी सच में कमाल की है।”

     

    रागिनी ने मुस्कुराकर कहा, “बाँसुरी की नहीं… उम्मीद की ताकत है।”

     

    हरिदास बाबा दूर खड़े उन्हें देख रहे थे।

     

    उन्होंने धीरे से कहा, “यही होती है मधुर धुन। जो कानों से सुनाई दे, वह संगीत है… लेकिन जो दिल में उम्मीद जगा दे, वही असली धुन है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    रागिनी ने संगीत सीखना जारी रखा। उसने गाँव के बच्चों को भी बाँसुरी और गीत सिखाने शुरू कर दिए।

     

    मधुर नदी फिर से बहने लगी थी।

     

    और हर शाम जब सूरज पहाड़ों के पीछे छिपता, गाँव की गलियों में एक मीठी बाँसुरी की आवाज गूँजती।

     

    लोग कहते थे कि वह सिर्फ एक धुन नहीं थी।

     

    वह रागिनी के पिता की याद थी।

     

    वह हरिदास बाबा की सीख थी।

     

    वह पूरे गाँव की उम्मीद थी।

     

    और शायद इसीलिए उसकी आवाज सुनते ही हर किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।

     

    क्योंकि कभी-कभी जिंदगी की सबसे बड़ी परेशानियों का हल किसी बड़े चमत्कार में नहीं होता।

     

    कभी वह बस एक छोटी-सी कोशिश में छिपा होता है…

     

    और कभी-कभी, किसी के दिल से निकली एक मधुर धुन में।

  • लगन लागी तुम से

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    लगन लगी तुमसे दिल की

     

    शहर के एक शांत से मोहल्ले में प्रिंस अपने परिवार के साथ रहता था। वह स्वभाव से थोड़ा शांत, लेकिन दिल का बहुत अच्छा लड़का था। उसके पिता का छोटा-सा कपड़ों का कारोबार था, जिसमें प्रिंस भी हाथ बंटाता था।

     

    उसी शहर में चारु नाम की लड़की रहती थी। चारु बहुत हंसमुख और समझदार थी। उसे किताबें पढ़ना और पुराने गीत सुनना पसंद था। दोनों एक-दूसरे को जानते तो थे, लेकिन कभी ठीक से बात नहीं हुई थी।

     

    एक दिन चारु अपनी मां के साथ प्रिंस की दुकान पर कपड़े खरीदने आई।

     

    चारु ने एक नीले रंग का सूट उठाया और अपनी मां से पूछा, “मां, ये कैसा है?”

     

    प्रिंस दूर खड़ा हिसाब कर रहा था। उसने अनजाने में उनकी बात सुन ली।

     

    वह बोला, “ये रंग आप पर अच्छा लगेगा।”

     

    चारु ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    प्रिंस थोड़ा झेंप गया।

     

    “बस… ऐसे ही लगा।”

     

    चारु मुस्कुरा दी।

     

    “अच्छा?”

     

    “जी।”

     

    उस छोटी-सी मुलाकात के बाद दोनों के बीच जैसे कोई अनजाना रिश्ता बन गया।

     

    चारु जब भी दुकान पर आती, प्रिंस की नजर अनजाने में उसकी तरफ चली जाती।

     

    और चारु भी अब दुकान पर आने का कोई न कोई बहाना ढूंढने लगी थी।

     

    एक दिन चारु ने मजाक में पूछा, “आप मुझे देखकर हमेशा चुप क्यों हो जाते हैं?”

     

    प्रिंस ने कहा, “क्योंकि जो बात दिल में होती है, उसे बोलने में वक्त लगता है।”

     

    चारु ने मुस्कुराकर पूछा, “और अगर बोल दी तो?”

     

    प्रिंस ने उसकी आंखों में देखकर कहा, “शायद फिर डर लगेगा कि सामने वाला क्या सोचता है।”

     

    चारु कुछ नहीं बोली।

     

    लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान बता रही थी कि वह उसकी बात समझ गई है।

     

    दिन गुजरते गए।

     

    दोनों की बातें बढ़ने लगीं।

     

    कभी फोन पर, कभी रास्ते में और कभी दुकान पर।

     

    प्रिंस को अब चारु की आदत-सी हो गई थी।

     

    सुबह उठते ही उसका ख्याल आता।

     

    दिन में काम करते हुए उसकी बातें याद आतीं।

     

    और रात को सोने से पहले उसकी आवाज कानों में गूंजती।

     

    एक रात प्रिंस ने चारु से कहा, “चारु, मुझे लगता है मेरे दिल को तुम्हारी आदत हो गई है।”

     

    चारु हंसकर बोली, “आदत और प्यार में फर्क होता है।”

     

    प्रिंस ने कहा, “मुझे नहीं पता फर्क क्या है। लेकिन इतना पता है कि तुमसे बात किए बिना दिन अधूरा लगता है।”

     

    चारु कुछ पल चुप रही।

     

    फिर धीरे से बोली, “शायद मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है।”

     

    उस रात दोनों देर तक बातें करते रहे।

     

    उनके बीच प्यार की शुरुआत हो चुकी थी।

     

    लेकिन हर प्रेम कहानी में एक परीक्षा जरूर आती है।

     

    कुछ दिनों बाद चारु के पिता को उसके रिश्ते के बारे में पता चल गया।

     

    उन्होंने चारु से कहा, “प्रिंस अच्छा लड़का है, लेकिन हमारी सोच और उनकी स्थिति अलग है। मैं तुम्हारी शादी वहां नहीं करूंगा।”

     

    चारु ने समझाने की कोशिश की।

     

    “पापा, प्रिंस बहुत अच्छा इंसान है।”

     

    पिता ने कहा, “अच्छा इंसान होना जरूरी है, लेकिन जिंदगी सिर्फ भावनाओं से नहीं चलती।”

     

    चारु की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने प्रिंस को फोन किया।

     

    “प्रिंस, पापा हमारी शादी के लिए तैयार नहीं हैं।”

     

    कुछ पल दोनों तरफ खामोशी रही।

     

    फिर प्रिंस ने पूछा, “तुम क्या चाहती हो?”

     

    चारु ने कहा, “मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं।”

     

    प्रिंस ने गहरी सांस ली।

     

    “तो फिर मैं तुम्हारे लिए लड़ूंगा। लेकिन तुम्हारे परिवार के खिलाफ जाकर नहीं।”

     

    चारु ने पूछा, “फिर?”

     

    “मैं तुम्हारे पिता को दिखाऊंगा कि मैं सिर्फ तुम्हें प्यार करने वाला लड़का नहीं हूं। मैं तुम्हारी जिम्मेदारी समझने वाला इंसान भी हूं।”

     

    अगले दिन से प्रिंस ने अपने पिता के कारोबार को और बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी।

     

    वह सुबह से रात तक मेहनत करता।

     

    नए ग्राहकों से मिलता।

     

    ऑनलाइन ऑर्डर शुरू करवाए।

     

    कुछ महीनों में कारोबार पहले से बेहतर चलने लगा।

     

    एक दिन प्रिंस चारु के पिता से मिलने गया।

     

    उन्होंने कठोर आवाज में पूछा, “क्या चाहिए तुम्हें?”

     

    प्रिंस ने शांत होकर कहा, “आपकी बेटी का हाथ। लेकिन आपकी मर्जी के बिना नहीं।”

     

    चारु के पिता ने कहा, “तुम मेरी बेटी को खुश रख पाओगे?”

     

    प्रिंस ने जवाब दिया, “मैं यह वादा नहीं करूंगा कि उसकी जिंदगी में कभी दुख नहीं आएगा। लेकिन मैं यह वादा जरूर करूंगा कि जब भी दुख आएगा, मैं उसके साथ खड़ा रहूंगा।”

     

    पिता चुप हो गए।

     

    उन्होंने फिर पूछा, “और अगर कल तुम्हारा कारोबार खराब हो गया?”

     

    प्रिंस ने कहा, “तो फिर से मेहनत करूंगा। लेकिन चारु का हाथ नहीं छोड़ूंगा।”

     

    चारु के पिता के चेहरे की कठोरता थोड़ी कम हुई।

     

    उन्होंने कहा, “मुझे सोचने का समय चाहिए।”

     

    प्रिंस ने सिर झुका दिया।

     

    “जितना समय चाहिए, ले लीजिए।”

     

    कुछ दिनों बाद चारु के पिता ने प्रिंस को अपने घर बुलाया।

     

    चारु भी वहां मौजूद थी।

     

    पिता ने कहा, “मैंने तुम्हें समझने की कोशिश की। तुमने मेरी बेटी को मुझसे दूर करने की कोशिश नहीं की। तुमने मेरे सामने अपनी बात रखी और मेरा सम्मान भी रखा।”

     

    फिर उन्होंने चारु की तरफ देखा।

     

    “अगर तुम सच में इसके साथ खुश हो तो मुझे मंजूर है।”

     

    चारु की आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

     

    वह प्रिंस की तरफ देखने लगी।

     

    प्रिंस भी मुस्कुरा रहा था।

     

    कुछ महीनों बाद दोनों की शादी हो गई।

     

    शादी के बाद एक शाम चारु छत पर बैठी थी।

     

    प्रिंस उसके पास आया और बोला, “चारु, याद है पहली बार तुम दुकान पर आई थीं?”

     

    चारु हंसते हुए बोली, “हां। तुमने कहा था कि नीला रंग मुझ पर अच्छा लगेगा।”

     

    प्रिंस ने कहा, “उस दिन मुझे नहीं पता था कि एक रंग पसंद करते-करते मुझे तुम्हारी पूरी जिंदगी पसंद आ जाएगी।”

     

    चारु ने मुस्कुराकर कहा, “और मुझे नहीं पता था कि तुम्हारी चुप्पी में इतना प्यार छिपा है।”

     

    प्रिंस ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “चारु, मेरी एक बात याद रखना। जिंदगी कितनी भी बदल जाए, मैं तुम्हें कभी अकेला महसूस नहीं होने दूंगा।”

     

    चारु ने कहा, “और मैं तुम्हारे साथ हर मुश्किल में खड़ी रहूंगी।”

     

    दोनों कुछ देर चुपचाप बैठे रहे।

     

    आसमान में चांद चमक रहा था।

     

    प्रिंस ने धीरे से कहा—

     

    “शायद इसी को कहते हैं दिल की लगन। किसी को पाने की चाह नहीं, बल्कि उसके साथ पूरी जिंदगी निभाने की चाह।”

     

    चारु मुस्कुराई।

     

    “और मेरी लगन तो तुमसे लग चुकी है। अब ये दिल कहीं और जाने वाला नहीं।”

     

    प्रिंस हंस पड़ा।

     

    उसने चारु की तरफ देखा और कहा—

     

    “फिर तो हमारी कहानी पूरी हो गई।”

     

    चारु ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं… अभी तो शुरू हुई है।”

     

    और सच में, उनकी प्रेम कहानी शादी पर खत्म नहीं हुई थी।

     

    वहां से उनकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत अध्याय शुरू हुआ था—एक-दूसरे के सपनों को समझने का, मुश्किलों में साथ देने का और हर दिन अपने रिश्ते को थोड़ा और मजबूत बनाने का।

     

    क्योंकि सच्ची लगन सिर्फ दिल मिलने का नाम नहीं है।

     

    सच्ची लगन वह है, जिसमें दो लोग एक-दूसरे का हाथ थामकर जिंदगी की हर राह पर साथ चलने का फैसला करते हैं।

  • नकली हंसी हंसते हैं वो

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नकली हंसी हंसते हैं वो

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में नंदिनी नाम की एक लड़की रहती थी। उम्र करीब तेईस साल थी। देखने वाले अक्सर कहते, “नंदिनी हमेशा कितनी खुश रहती है।”

     

    वह हर किसी से मुस्कुराकर मिलती। पड़ोसी पूछते तो हंसकर जवाब देती, “सब बढ़िया है।”

     

    कॉलेज में उसकी सहेलियां उसे मजाक में “हंसती हुई नंदिनी” कहती थीं।

     

    लेकिन कोई नहीं जानता था कि उसकी वह हंसी हमेशा सच्ची नहीं होती थी।

     

    नंदिनी के पिता कुछ साल पहले गुजर चुके थे। घर में उसकी मां और छोटा भाई था। पिता के जाने के बाद घर की जिम्मेदारी अचानक बढ़ गई थी।

     

    मां अक्सर बीमार रहती थीं और भाई अभी पढ़ाई कर रहा था।

     

    नंदिनी कॉलेज के साथ-साथ एक छोटी-सी नौकरी भी करती थी।

     

    सुबह घर का काम, फिर कॉलेज, उसके बाद नौकरी और रात को घर लौटकर मां की देखभाल।

     

    फिर भी जब कोई पूछता—

     

    “थक गई?”

     

    वह हंसकर कहती, “मैं इतनी जल्दी थकती नहीं हूं।”

     

    लेकिन रात को कमरे का दरवाजा बंद होते ही वही मुस्कान गायब हो जाती।

     

    वह चुपचाप बिस्तर पर बैठती और खिड़की से बाहर देखती रहती।

     

    कभी-कभी उसकी आंखों से आंसू निकल आते।

     

    वह उन्हें पोंछकर खुद से कहती, “नहीं नंदिनी, रोना नहीं है। मां को पता चल गया तो वह परेशान हो जाएंगी।”

     

    अगली सुबह फिर वही मुस्कान उसके चेहरे पर होती।

     

    कॉलेज में उसकी सबसे अच्छी दोस्त रिया थी।

     

    रिया अक्सर कहती, “तू कभी उदास क्यों नहीं होती?”

     

    नंदिनी हंसते हुए जवाब देती, “क्योंकि उदास होने से समस्या थोड़ी हल हो जाएगी।”

     

    रिया उसकी बात सुनकर हंस देती, लेकिन नंदिनी की आंखों में छिपी थकान उसे दिखाई नहीं देती थी।

     

    एक दिन कॉलेज में नंदिनी की फीस जमा करने की आखिरी तारीख थी। उसके पास पैसे कम थे।

     

    उसने अपने बैग में रखे नोट गिने।

     

    फिर मोबाइल देखा।

     

    मां का संदेश था—

     

    “बेटा, दवा खत्म हो गई है। लौटते समय लेते आना।”

     

    नंदिनी कुछ देर स्क्रीन को देखती रही।

     

    फीस जमा करे या मां की दवा खरीदे?

     

    उसने आंखें बंद कीं।

     

    फिर हल्की मुस्कान के साथ खुद से बोली, “पहले मां। फीस बाद में देख लेंगे।”

     

    उस दिन वह कॉलेज से सीधे मेडिकल स्टोर गई।

     

    दवा खरीदी और घर लौट आई।

     

    रास्ते में उसकी सहेली रिया मिल गई।

     

    रिया ने पूछा, “कहां जा रही है?”

     

    नंदिनी मुस्कुराकर बोली, “घर। मां की दवा लेनी है।”

     

    रिया ने पूछा, “तू ठीक है ना?”

     

    नंदिनी हंस दी।

     

    “मैं बिल्कुल ठीक हूं।”

     

    रिया ने उसकी आंखों को ध्यान से देखा।

     

    “तेरी मुस्कान आज कुछ अलग लग रही है।”

     

    नंदिनी ने तुरंत बात बदल दी।

     

    “चल, तू घर जा। मुझे देर हो रही है।”

     

    वह आगे बढ़ गई।

     

    कुछ दिनों बाद कॉलेज में एक कार्यक्रम था। सभी छात्र-छात्राएं खूब खुश थे।

     

    नंदिनी भी सबसे ज्यादा हंस रही थी।

     

    वह दोस्तों के साथ तस्वीरें खिंचवा रही थी।

     

    तभी कॉलेज का नया प्रोफेसर आदित्य वहां आया।

     

    उसने नंदिनी को कुछ देर देखा।

     

    फिर पास आकर बोला, “आप हमेशा इतनी खुश रहती हैं?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “जी।”

     

    आदित्य ने कहा, “अच्छी बात है।”

     

    लेकिन फिर उसने धीरे से पूछा, “लेकिन क्या हमेशा हंसना जरूरी है?”

     

    नंदिनी चौंक गई।

     

    “मतलब?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    आदित्य चला गया।

     

    उस रात नंदिनी उस सवाल के बारे में सोचती रही।

     

    क्या हमेशा हंसना जरूरी है?

     

    अगले दिन आदित्य ने उसे कॉलेज की लाइब्रेरी में अकेले बैठे देखा।

     

    नंदिनी किताब खोलकर बैठी थी, लेकिन पढ़ नहीं रही थी।

     

    आदित्य ने पूछा, “सब ठीक है?”

     

    नंदिनी ने आदत के मुताबिक मुस्कुराते हुए कहा, “जी, सब बढ़िया।”

     

    आदित्य ने कहा, “आपको पता है, हर बार ‘सब बढ़िया’ कहना जरूरी नहीं होता।”

     

    नंदिनी पहली बार चुप हो गई।

     

    उसने नजरें झुका लीं।

     

    आदित्य ने आगे कुछ नहीं पूछा।

     

    कुछ दिनों तक वह बस इतना करता कि जब नंदिनी उदास दिखाई देती तो उसके पास बैठ जाता।

     

    कोई सवाल नहीं।

     

    कोई सलाह नहीं।

     

    बस चुपचाप।

     

    एक दिन नंदिनी का धैर्य टूट गया।

     

    उसकी मां की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी। अस्पताल का खर्च बढ़ता जा रहा था। भाई की फीस बाकी थी और उसकी अपनी पढ़ाई भी खतरे में थी।

     

    फिर भी कॉलेज में उसे एक समारोह में मंच पर जाकर मुस्कुराना था।

     

    वह मंच पर गई।

     

    सबने तालियां बजाईं।

     

    उसने मुस्कुराकर सबका अभिवादन किया।

     

    लेकिन मंच से उतरते ही उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह पीछे जाकर बैठ गई।

     

    आदित्य ने उसे देखा।

     

    इस बार नंदिनी मुस्कुराने की कोशिश नहीं कर पाई।

     

    वह बोली, “सर… मैं बहुत थक गई हूं।”

     

    आदित्य शांत रहा।

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “हर कोई सोचता है मैं बहुत खुश हूं। लेकिन मैं हर दिन डरती हूं। मां को कुछ हो गया तो? भाई की पढ़ाई रुक गई तो? मेरी पढ़ाई छूट गई तो?”

     

    आदित्य ने कहा, “रो लेने दीजिए खुद को। हर वक्त मजबूत रहना जरूरी नहीं है।”

     

    नंदिनी बहुत देर तक रोती रही।

     

    उस दिन पहली बार उसने अपनी नकली हंसी के पीछे छिपे सारे दुख को बाहर आने दिया।

     

    धीरे-धीरे हालात बदलने लगे।

     

    कॉलेज ने नंदिनी की फीस के लिए सहायता दी। रिया को भी जब पूरी सच्चाई पता चली तो उसने उसका साथ देना शुरू कर दिया।

     

    रिया ने एक दिन नंदिनी से कहा, “तूने मुझसे सब छिपाया क्यों?”

     

    नंदिनी बोली, “मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझे कमजोर समझे।”

     

    रिया ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “रोना कमजोरी नहीं है। हर समय मुस्कुराते रहना भी जरूरी नहीं।”

     

    नंदिनी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    इस बार उसने उन्हें छिपाया नहीं।

     

    कुछ महीनों बाद उसकी मां की तबीयत पहले से बेहतर होने लगी। भाई की पढ़ाई भी चलती रही।

     

    नंदिनी ने अपनी पढ़ाई पूरी की और एक अच्छी नौकरी हासिल कर ली।

     

    एक दिन वही रिया उससे मिलने आई।

     

    रिया ने पूछा, “अब तो सच में खुश है?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “हां।”

     

    रिया ने तुरंत कहा, “इस बार वाली मुस्कान नकली तो नहीं?”

     

    नंदिनी हंस पड़ी।

     

    “नहीं। अब मुझे समझ आ गया है कि असली खुशी का मतलब हर समय हंसना नहीं होता। कभी रो लेना, कभी थक जाना और कभी किसी के सामने अपना दुख कह देना भी जिंदगी का हिस्सा है।”

     

    रिया ने उसे गले लगा लिया।

     

    नंदिनी ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसे अपनी पुरानी जिंदगी याद आई।

     

    वह लड़की जो हर दुख को हंसी के पीछे छिपा देती थी।

     

    अब वह लड़की बदल चुकी थी।

     

    अब वह मुस्कुराती थी तो दिल से मुस्कुराती थी।

     

    और जब दुख होता था, तो उसे छिपाती नहीं थी।

     

    क्योंकि उसने जान लिया था—

     

    हर मुस्कुराता चेहरा खुश नहीं होता। कुछ लोग अपनी तकलीफ छिपाने के लिए भी हंसते हैं। इसलिए किसी की हंसी देखकर यह मत समझिए कि उसके जीवन में कोई दर्द नहीं है। कभी-कभी एक सच्चा सवाल—”तुम सच में ठीक हो?”—किसी की जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बन सकता है।

  • एक सच्चा आशिक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक सच्चा आशिक कभी झूठ नहीं बोलता

     

    शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी किताबों की दुकान थी। दुकान के मालिक का नाम राघव था। उम्र करीब पच्चीस साल और स्वभाव बहुत शांत। वह ज्यादा बोलता नहीं था, लेकिन जो भी कहता, साफ-साफ कहता था।

     

    उसी शहर में अनाया नाम की लड़की रहती थी। वह कॉलेज में पढ़ती थी और अक्सर राघव की दुकान से किताबें लेने आती थी।

     

    पहली बार जब अनाया दुकान पर आई, उसने पूछा, “आपके पास पुराने उपन्यास मिल जाएंगे?”

     

    राघव ने मुस्कुराकर कहा, “हां, लेकिन अगर पढ़ने के लिए चाहिए तो अच्छे वाले दूंगा। सिर्फ दिखावे के लिए चाहिए तो कोई भी दे दूंगा।”

     

    अनाया हंस पड़ी।

     

    “आप हर ग्राहक से ऐसे ही बात करते हैं?”

     

    “नहीं,” राघव ने कहा, “हर किसी से इतनी बात भी नहीं करता।”

     

    अनाया को उसकी बात अजीब लगी, लेकिन अच्छी भी लगी।

     

    धीरे-धीरे वह रोज दुकान पर आने लगी। कभी किताब खरीदती, कभी बस थोड़ी देर बैठकर बातें करती।

     

    एक दिन अनाया ने पूछा, “राघव, तुम्हें कभी किसी से प्यार हुआ है?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “हां।”

     

    अनाया ने मुस्कुराते हुए पूछा, “कौन है?”

     

    राघव ने उसकी आंखों में देखा और कहा, “तुम।”

     

    अनाया अचानक शांत हो गई।

     

    कुछ सेकंड तक दुकान में बिल्कुल सन्नाटा रहा।

     

    फिर उसने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम मजाक तो नहीं कर रहे?”

     

    “नहीं।”

     

    “अगर मैं मना कर दूं तो?”

     

    राघव ने सहजता से कहा, “तब भी मेरी बात झूठ नहीं हो जाएगी। प्यार करना मेरे हाथ में है, तुम्हारा जवाब नहीं।”

     

    अनाया के दिल में उसकी बात उतर गई।

     

    धीरे-धीरे दोनों के बीच एक खूबसूरत रिश्ता बन गया। वे घंटों बातें करते। भविष्य के सपने देखते। राघव हमेशा अनाया से एक बात कहता था—

     

    “मैं तुमसे कभी झूठ नहीं बोलूंगा।”

     

    अनाया हंसकर कहती, “इतना भरोसा?”

     

    राघव जवाब देता, “प्यार में अगर सच छिपाना पड़े तो वह प्यार कैसा?”

     

    सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन एक दिन राघव को अपने पिता की पुरानी बीमारी के बारे में पता चला। डॉक्टर ने बताया कि इलाज के लिए बहुत पैसे चाहिए।

     

    राघव ने दुकान बेचने का फैसला कर लिया।

     

    अनाया को जब पता चला तो उसने पूछा, “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    राघव ने कहा, “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम्हें मेरी परेशानी की वजह से अपने परिवार से लड़ना पड़े।”

     

    “लेकिन मैं तुम्हारी जिंदगी का हिस्सा हूं।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “इसीलिए तो तुम्हें झूठ नहीं बोल सकता।”

     

    कुछ ही दिनों बाद अनाया के घर में उसकी शादी की बात चलने लगी। उसके पिता ने एक बड़े कारोबारी परिवार के लड़के का रिश्ता बताया।

     

    अनाया ने साफ मना कर दिया।

     

    लेकिन उसके पिता ने कहा, “राघव के पास क्या है? न बड़ा घर, न पैसा, न कोई स्थिर भविष्य।”

     

    अनाया चुप रही।

     

    उस रात उसने राघव को फोन किया।

     

    “अगर मैं तुम्हारे साथ खड़ी रहूं तो क्या तुम मुझे कभी दुखी नहीं होने दोगे?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “मैं तुम्हें दुखी होने से बचाने का वादा नहीं कर सकता। जिंदगी में दुख आएंगे। लेकिन मैं यह वादा कर सकता हूं कि जब दुख आएगा, तब तुम्हारा हाथ छोड़कर भागूंगा नहीं।”

     

    अनाया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने कहा, “बस यही सुनना था।”

     

    लेकिन अगले ही दिन राघव को एक बड़ा झटका लगा।

     

    उसके पिता की हालत अचानक बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने तुरंत इलाज के लिए शहर से बाहर ले जाने को कहा।

     

    राघव के पास पैसे नहीं थे।

     

    उसने अपनी दुकान बेच दी।

     

    इलाज शुरू हुआ, लेकिन पिता को बचाया नहीं जा सका।

     

    राघव पूरी तरह टूट गया।

     

    इसी बीच अनाया के घरवालों ने उसे राघव से रिश्ता खत्म करने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया।

     

    एक दिन अनाया के पिता ने राघव को बुलाया।

     

    उन्होंने कहा, “तुम अच्छे लड़के हो, लेकिन मेरी बेटी की जिंदगी तुम्हारे साथ मुश्किल होगी। अगर सच में उससे प्यार करते हो तो उसे छोड़ दो।”

     

    राघव ने सिर झुका लिया।

     

    उस रात उसने अनाया को मिलने बुलाया।

     

    अनाया आते ही बोली, “क्या हुआ?”

     

    राघव ने धीरे से कहा, “अनाया, मैं चाहता हूं कि तुम मुझसे शादी मत करो।”

     

    अनाया का चेहरा उतर गया।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे पास अब कुछ नहीं है।”

     

    “मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन मैं तुम्हें झूठा सपना भी नहीं दिखाऊंगा।”

     

    अनाया की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “तो क्या तुम्हारा प्यार खत्म हो गया?”

     

    राघव ने तुरंत कहा, “नहीं।”

     

    “फिर मुझे छोड़ क्यों रहे हो?”

     

    राघव ने कहा, “क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूं। मैं तुम्हें अपनी मजबूरी में बांधना नहीं चाहता।”

     

    अनाया ने गुस्से में कहा, “तुम्हें लगता है मैं इतनी कमजोर हूं कि तुम्हारे साथ गरीबी में नहीं रह सकती?”

     

    राघव चुप रहा।

     

    अनाया ने कहा, “तुमने मुझे हमेशा सच बोलने का वादा किया था। आज सच बताओ—क्या तुम मुझे चाहते हो?”

     

    राघव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हर दिन। हर पल। लेकिन तुम्हारी खुशी भी चाहता हूं।”

     

    अनाया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो फिर मेरी खुशी का फैसला तुम क्यों कर रहे हो?”

     

    राघव के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    अनाया ने कहा, “मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं। अगर रास्ता मुश्किल होगा तो दोनों मिलकर चलेंगे। लेकिन मुझे यह मत कहो कि मेरे भले के लिए मुझे छोड़ रहे हो।”

     

    राघव की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने पहली बार अनाया को अपने करीब आने दिया।

     

    कुछ समय बाद दोनों ने अपने परिवारों को समझाने की कोशिश की।

     

    अनाया के पिता अब भी तैयार नहीं थे।

     

    राघव ने उनसे कहा, “मैं आपकी बेटी को बड़े-बड़े सपने दिखाने का झूठ नहीं बोलूंगा। मेरे पास आज बहुत कुछ नहीं है। लेकिन मैं मेहनत करूंगा। और अगर कभी मैं असफल हुआ तो भी उससे अपनी असफलता नहीं छिपाऊंगा।”

     

    उसकी सच्चाई ने अनाया के पिता को सोचने पर मजबूर कर दिया।

     

    उन्होंने पूछा, “अगर मेरी बेटी को कभी लगे कि उसने गलत फैसला किया है तो?”

     

    राघव ने जवाब दिया, “तब मैं उसे रोकूंगा नहीं। प्यार कैद नहीं होता।”

     

    कुछ महीनों बाद राघव ने एक नई छोटी-सी दुकान शुरू की। इस बार दुकान पहले से भी छोटी थी, लेकिन उसमें मेहनत और उम्मीद दोनों थीं।

     

    अनाया भी पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके साथ काम करने लगी।

     

    धीरे-धीरे दुकान चल निकली।

     

    एक शाम अनाया ने मुस्कुराकर पूछा, “राघव, याद है तुमने पहली बार कहा था कि तुम मुझसे प्यार करते हो?”

     

    राघव हंस पड़ा।

     

    “हां।”

     

    “तब तुम्हारे पास कुछ नहीं था।”

     

    “अब भी बहुत कुछ नहीं है।”

     

    अनाया ने उसकी ओर देखकर कहा, “गलत। अब तुम्हारे पास मैं हूं।”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “और मेरे पास तुम्हारा भरोसा है।”

     

    अनाया ने कहा, “एक बात बताओ, अगर उस दिन तुमने मुझसे झूठ बोला होता कि सब ठीक है, पैसे हैं, भविष्य सुरक्षित है, तो शायद मैं तुम्हारे साथ आ जाती।”

     

    राघव ने कहा, “लेकिन तब तुम्हें सच्चा राघव नहीं मिलता।”

     

    अनाया ने मुस्कुराकर उसका हाथ थाम लिया।

     

    “और मुझे खुशी है कि तुमने मुझे सच बताया।”

     

    कई साल बाद उनकी वही छोटी-सी किताबों की दुकान शहर की मशहूर दुकान बन गई।

     

    दुकान के बाहर एक छोटी-सी पंक्ति लिखी थी—

     

    “प्यार वह नहीं जो हर बात को खूबसूरत बनाकर बताए, प्यार वह है जो सच बताकर भी साथ निभाने का हौसला रखे।”

     

    राघव जब भी उस पंक्ति को देखता, अनाया की तरफ मुस्कुरा देता।

     

    क्योंकि उसने एक बात जिंदगी भर नहीं भूली थी—

     

    सच्चा आशिक अपने प्यार को खुश करने के लिए झूठ नहीं बोलता। वह सच बोलता है, चाहे सच कितना भी मुश्किल क्यों न हो। क्योंकि सच्चा प्यार भरोसे पर टिकता है, और भरोसा कभी झूठ की नींव पर खड़ा नहीं हो सकता।

  • बेजुबान भी समझता है

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेजुबान भी समझता है दुखी इंसान को

     

    शहर से थोड़ी दूर एक छोटा-सा गांव था—रामपुर। गांव के आखिरी छोर पर मिट्टी और ईंटों से बना एक छोटा-सा घर था, जिसमें मोहन नाम का एक आदमी रहता था। उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उसके चेहरे पर जिंदगी की थकान पचास साल की लगती थी।

     

    मोहन की पत्नी कुछ साल पहले बीमारी के कारण चल बसी थी। उसका एक छोटा बेटा था, जो अपनी मां के जाने के बाद मोहन का सहारा बन गया था। लेकिन एक दिन खेत से लौटते समय हुए हादसे में वह भी हमेशा के लिए उससे दूर चला गया।

     

    उस दिन के बाद मोहन जैसे अंदर से टूट गया था।

     

    वह किसी से ज्यादा बात नहीं करता। सुबह उठकर खेत पर चला जाता और शाम को चुपचाप घर लौट आता। घर में अब न बच्चे की आवाज थी, न पत्नी की मुस्कान।

     

    गांव वाले उससे हमदर्दी रखते थे, लेकिन धीरे-धीरे सब अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए।

     

    मोहन के पास बस एक पुरानी चारपाई, कुछ बर्तन और उसके बेटे की छोटी-सी लकड़ी की गाड़ी बची थी।

     

    एक शाम मोहन खेत से लौट रहा था। रास्ते में उसे सड़क किनारे एक दुबला-पतला कुत्ता दिखाई दिया। उसके शरीर पर धूल लगी थी और एक पैर में चोट थी। वह डरते-डरते मोहन की तरफ देख रहा था।

     

    मोहन कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने अपनी जेब से रोटी का एक टुकड़ा निकाला और कुत्ते के सामने रख दिया।

     

    कुत्ते ने पहले रोटी को देखा, फिर मोहन को।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और रोटी खाने लगा।

     

    मोहन बिना कुछ कहे वहां से चला गया।

     

    अगले दिन जब मोहन उसी रास्ते से वापस आया तो वही कुत्ता वहीं बैठा था।

     

    मोहन ने उसे देखा और हल्की आवाज में कहा, “फिर आ गया?”

     

    कुत्ते ने अपनी पूंछ हिलाई।

     

    मोहन के चेहरे पर कई दिनों बाद हल्की-सी मुस्कान आई।

     

    उस दिन से वह कुत्ता रोज मोहन का इंतजार करने लगा।

     

    मोहन ने उसका नाम रख दिया—कालू।

     

    धीरे-धीरे कालू की चोट ठीक होने लगी। अब वह मोहन के साथ खेत तक जाने लगा। मोहन काम करता तो कालू पास में बैठा रहता।

     

    एक दिन मोहन बहुत परेशान था। खेत में फसल खराब हो गई थी। ऊपर से साहूकार ने कर्ज चुकाने के लिए धमकी दी थी।

     

    मोहन शाम को खेत के किनारे बैठ गया और दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।

     

    वह बुदबुदाया, “अब क्या करूं? किसके लिए मेहनत करूं? किसके लिए ये सब बचाऊं?”

     

    कालू धीरे-धीरे उसके पास आया।

     

    उसने अपना सिर मोहन के घुटने पर रख दिया।

     

    मोहन ने सिर उठाया।

     

    “तू समझता है मेरी बात?”

     

    कालू चुपचाप उसकी तरफ देखता रहा।

     

    मोहन ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तू भी तो अकेला है ना?”

     

    कालू ने उसकी हथेली को अपनी नाक से छुआ।

     

    मोहन की आंखें फिर भर आईं।

     

    उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद वह पूरी तरह अकेला नहीं है।

     

    अब कालू हर दिन उसके साथ रहता। मोहन घर लौटता तो कालू दरवाजे पर उसका इंतजार करता। वह खेत जाता तो कालू पीछे-पीछे चलता।

     

    गांव वालों ने भी यह बदलाव देखा।

     

    एक बूढ़े आदमी ने एक दिन कहा, “मोहन, तेरे चेहरे पर फिर से थोड़ी जान दिखने लगी है।”

     

    मोहन मुस्कुराकर बोला, “कालू है ना मेरे साथ।”

     

    समय बीतता गया।

     

    एक रात गांव में बहुत तेज बारिश हुई। बिजली चमक रही थी और चारों तरफ पानी भर गया था। मोहन गहरी नींद में सो रहा था।

     

    अचानक कालू जोर-जोर से भौंकने लगा।

     

    मोहन की नींद खुली।

     

    “क्या हुआ कालू?”

     

    कालू दरवाजे की तरफ भागा और फिर वापस आकर मोहन को देखने लगा।

     

    मोहन ने दरवाजा खोला तो बाहर पानी तेजी से घर में घुस रहा था।

     

    मोहन घबरा गया।

     

    उसने तुरंत सामान उठाना शुरू किया।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर घर के कोने में रखी अपने बेटे की लकड़ी की गाड़ी पर पड़ी।

     

    वह कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    उसकी आंखों में पुराने दिन लौट आए।

     

    वह वहीं बैठ गया।

     

    “बेटा…”

     

    मोहन की आवाज टूट गई।

     

    कालू उसके पास आकर बैठ गया।

     

    उसने मोहन का हाथ अपने सिर पर रख दिया।

     

    मोहन ने उसे कसकर पकड़ लिया।

     

    “अगर तू नहीं होता ना कालू… तो शायद मैं भी कब का हार गया होता।”

     

    अगली सुबह बारिश रुक चुकी थी। गांव के कई घरों को नुकसान हुआ था। मोहन भी अपना घर ठीक करने लगा।

     

    इस बार गांव के कुछ लोग उसकी मदद के लिए आगे आए।

     

    जिस साहूकार से मोहन डरता था, गांव के लोगों ने मिलकर उससे भी बात की और मोहन को थोड़ा समय दिलवा दिया।

     

    मोहन ने पहली बार महसूस किया कि दुख इंसान को अकेला जरूर कर देता है, लेकिन कभी-कभी किसी छोटे से जीव का साथ भी इंसान को फिर से जीना सिखा सकता है।

     

    कुछ महीनों बाद मोहन ने अपने घर के बाहर एक छोटी-सी दुकान खोल ली।

     

    कालू दुकान के बाहर बैठा रहता।

     

    बच्चे उसे देखकर खुश होते और उसे रोटी खिलाते।

     

    मोहन भी अब पहले जैसा चुप नहीं रहता था।

     

    एक दिन गांव का एक छोटा बच्चा दुकान पर आया। उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    मोहन ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    बच्चा बोला, “मेरी मां मुझसे नाराज है।”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “चल, पहले बैठ। दुख बांटने से कम होता है।”

     

    कालू बच्चे के पास जाकर बैठ गया।

     

    बच्चे ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया और थोड़ी देर बाद मुस्कुराने लगा।

     

    मोहन यह देखकर चुपचाप मुस्कुराता रहा।

     

    उसे समझ आ गया था कि इंसान की भाषा सिर्फ शब्दों से नहीं होती।

     

    कभी किसी का हाथ पकड़ना, कभी पास बैठ जाना और कभी बिना कुछ कहे किसी की आंखों में देखना भी बहुत कुछ कह देता है।

     

    साल गुजरते गए।

     

    कालू बूढ़ा हो गया।

     

    अब वह पहले की तरह तेज नहीं दौड़ पाता था। ज्यादातर समय मोहन की चारपाई के पास पड़ा रहता।

     

    एक शाम मोहन उसके पास बैठा था।

     

    उसने कालू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तूने मुझे तब संभाला था जब मुझे लगता था कि मेरी दुनिया खत्म हो गई है।”

     

    कालू ने धीरे से आंखें खोलीं और मोहन की तरफ देखा।

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तू बोल नहीं सकता कालू… लेकिन तूने मेरी वो बातें समझीं, जो कोई इंसान नहीं समझ पाया।”

     

    कालू ने अपनी पूंछ हल्के से हिलाई।

     

    मोहन मुस्कुराया और उसके सिर को अपने सीने से लगा लिया।

     

    उस रात मोहन देर तक उसके पास बैठा रहा।

     

    कुछ दिनों बाद कालू हमेशा के लिए शांत हो गया।

     

    मोहन बहुत रोया।

     

    लेकिन इस बार उसके आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था। उनमें उस दोस्त के लिए कृतज्ञता भी थी, जिसने बिना एक शब्द बोले उसे जिंदगी से दोबारा जोड़ दिया था।

     

    मोहन ने कालू को अपने घर के पीछे उसी नीम के पेड़ के नीचे दफनाया, जहां वह अक्सर उसके साथ बैठा करता था।

     

    उसने वहां एक छोटी-सी पट्टी लगाई—

     

    “जिसने बिना बोले मेरा दुख समझा।”

     

    उस दिन से गांव में जब भी कोई दुखी होता, मोहन उसके पास बैठ जाता।

     

    वह कहता, “हर दुख का इलाज शब्द नहीं होते। कभी-कभी बस किसी का साथ चाहिए होता है।”

     

    और सच यही था।

     

    • क्योंकि इंसान अपनी बात शब्दों में कहता है, लेकिन सच्चा अपनापन शब्दों का मोहताज नहीं होता।

     

    कभी एक पशु की आंखें भी इंसान का दर्द पढ़ लेती हैं।

     

    कभी उसका सिर गोद में रख देना ही कह देता है—

     

    “तुम अकेले नहीं हो।”