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  • आखिरी ट्रेन का यात्री (भाग 1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर के बाहर एक पुराना रेलवे स्टेशन था—देवगढ़ स्टेशन।

     

    कभी इस स्टेशन पर दिन-रात यात्रियों की भीड़ रहती थी। लेकिन पिछले दस वर्षों से यहाँ सिर्फ कुछ गिनी-चुनी ट्रेनें रुकती थीं। रात होते ही स्टेशन लगभग सुनसान हो जाता था।

     

    स्टेशन की सबसे अजीब बात थी प्लेटफॉर्म नंबर 3।

     

    वहाँ अब कोई ट्रेन नहीं रुकती थी।

     

    रेलवे रिकॉर्ड के मुताबिक उस प्लेटफॉर्म की पटरी कई साल पहले बंद कर दी गई थी। उसके आगे की रेलवे लाइन भी टूट चुकी थी।

     

    फिर भी गाँव के लोग कहते थे कि हर रात ठीक 12:15 बजे प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर एक ट्रेन आती है।

     

    एक ऐसी ट्रेन, जिसका कोई नंबर नहीं था।

     

    कोई टाइमटेबल नहीं था।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    उस ट्रेन में बैठने वाला कोई भी यात्री फिर कभी वापस नहीं आता था।

     

    लोग इसे अफवाह मानते थे।

     

    लेकिन कबीर अफवाहों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    कबीर 27 साल का एक स्वतंत्र पत्रकार था। उसे अजीब घटनाओं की सच्चाई पता लगाने का शौक था। कुछ दिनों पहले उसे देवगढ़ स्टेशन के बारे में एक ईमेल मिला था।

     

    ईमेल में सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर हिम्मत है तो 15 अगस्त की रात 12:15 बजे देवगढ़ स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर आना।”

     

    नीचे कोई नाम नहीं था।

     

    कबीर ने पहले इसे मज़ाक समझा।

     

    फिर उसे उसी ईमेल के साथ एक तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर में एक पुरानी ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ी थी।

     

    तस्वीर धुंधली थी, लेकिन ट्रेन की खिड़की के पास एक आदमी साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह आदमी सीधे कैमरे की ओर देख रहा था।

     

    कबीर को तस्वीर में कुछ अजीब लगा।

     

    उस आदमी का चेहरा बिल्कुल वैसा था जैसे कोई कई दिनों से सोया न हो।

     

    आँखें पूरी तरह काली।

     

    और उसके होंठों पर हल्की मुस्कान।

     

    कबीर ने तस्वीर ज़ूम की।

     

    ट्रेन के शीशे पर किसी ने उंगली से लिखा था—

     

    “अगला यात्री तुम हो।”

     

    उस रात कबीर देवगढ़ स्टेशन पहुँच गया।

     

    समय था रात के 11:40।

     

    पूरा स्टेशन सुनसान था।

     

    टिकट खिड़की बंद थी।

     

    चाय की दुकान बंद थी।

     

    स्टेशन मास्टर का कमरा भी अंधेरे में डूबा हुआ था।

     

    कबीर प्लेटफॉर्म नंबर 3 की तरफ बढ़ा।

     

    वहाँ पहुँचते ही उसे अजीब ठंड महसूस हुई।

     

    अगस्त की गर्म रात थी, लेकिन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर हवा बर्फ जैसी ठंडी थी।

     

    कबीर ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क गायब था।

     

    उसने घड़ी देखी।

     

    11:52।

     

    अचानक पीछे से आवाज़ आई—

     

    “आप भी ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं?”

     

    कबीर ने तुरंत पीछे देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी बेंच पर बैठा था।

     

    उसने काला कोट पहन रखा था।

     

    कबीर ने पूछा, “आप यहाँ इतनी रात को?”

     

    बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ सामने पटरी की ओर देखा।

     

    “पहली बार आए हो?”

     

    “हाँ।”

     

    बूढ़ा धीरे से मुस्कुराया।

     

    “तो एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जब ट्रेन आए, तो उसमें मत बैठना।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “आप भी उस ट्रेन की कहानी जानते हैं?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कहानी नहीं है।”

     

    उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

     

    “मैं उस ट्रेन में जा चुका हूँ।”

     

    कबीर की हँसी रुक गई।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बूढ़े ने अपनी आस्तीन ऊपर की।

     

    उसकी कलाई पर एक काला निशान था।

     

    निशान किसी टिकट की मुहर जैसा दिखाई दे रहा था।

     

    “मैं पच्चीस साल पहले उस ट्रेन में बैठा था।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़े ने स्टेशन की घड़ी की ओर देखा।

     

    12:03।

     

    “फिर मैं वापस आया।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    “तो फिर डर किस बात का?”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मेरे हिसाब से मैं सिर्फ तीन मिनट के लिए गया था।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    बूढ़े ने आगे कहा—

     

    “लेकिन जब मैं वापस आया, तब यहाँ पच्चीस साल बीत चुके थे।”

     

    कबीर के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “यह कैसे संभव है?”

     

    बूढ़ा कुछ कहने ही वाला था कि अचानक प्लेटफॉर्म की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    अंधेरा।

     

    पूरे स्टेशन पर ऐसा सन्नाटा छा गया कि कबीर को अपनी साँसें सुनाई देने लगीं।

     

    फिर दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर ने पटरी की ओर देखा।

     

    दूर अंधेरे में एक छोटी-सी पीली रोशनी दिखाई दी।

     

    धीरे-धीरे वह रोशनी बड़ी होने लगी।

     

    ट्रेन आ रही थी।

     

    लेकिन उसकी आवाज़ अजीब थी।

     

    पहिए पटरी पर चलने की आवाज़ नहीं कर रहे थे।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत भारी चीज़ जमीन पर घसीटी जा रही हो।

     

    ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।

     

    दरवाज़े अपने आप खुल गए।

     

    कबीर ने ट्रेन के ऊपर देखा।

     

    वहाँ कोई नंबर नहीं था।

     

    कोई नाम नहीं।

     

    सिर्फ काले रंग में एक शब्द लिखा था—

     

    “अंतिम।”

     

    कबीर ने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    बूढ़ा वहाँ नहीं था।

     

    बेंच खाली थी।

     

    कबीर घबरा गया।

     

    “बाबा?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर ट्रेन के अंदर से आवाज़ आई—

     

    “कबीर…”

     

    कबीर जम गया।

     

    उसने किसी को अपना नाम नहीं बताया था।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “कबीर… अंदर आओ।”

     

    आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी।

     

    बिल्कुल उसी बूढ़े की।

     

    कबीर ने ट्रेन की खिड़की से अंदर देखा।

     

    अंदर लगभग दस यात्री बैठे थे।

     

    सभी बिल्कुल शांत।

     

    कोई मोबाइल नहीं चला रहा था।

     

    कोई बात नहीं कर रहा था।

     

    सभी की नजरें नीचे थीं।

     

    कबीर ने देखा कि हर यात्री के हाथ में एक पुराना टिकट था।

     

    फिर उसकी नजर सबसे आखिरी सीट पर गई।

     

    वहाँ वही आदमी बैठा था जो उसे उस ईमेल वाली तस्वीर में दिखाई दिया था।

     

    काली आँखें।

     

    हल्की मुस्कान।

     

    वह धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगा।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    तभी उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।

     

    “ट्रेन में मत बैठना।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही सेकंड दूसरा मैसेज आया।

     

    “क्योंकि अगर तुम नहीं बैठे… तो वह खुद उतर जाएगी।”

     

    कबीर का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    ट्रेन की सीटी फिर बजी।

     

    फूँऽऽऽऽ!

     

    दरवाज़ा बंद होने लगा।

     

    तभी अंदर बैठे सभी यात्रियों ने एक साथ अपना सिर उठाया।

     

    सभी की आँखें काली थीं।

     

    और सभी कबीर को देख रहे थे।

     

    फिर आखिरी सीट पर बैठा आदमी मुस्कुराया।

     

    उसने अपना टिकट खिड़की से बाहर फेंक दिया।

     

    टिकट कबीर के पैरों के पास आकर गिरा।

     

    कबीर ने काँपते हाथों से टिकट उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    यात्री: कबीर शर्मा

     

    सीट: 13

     

    गंतव्य: देवगढ़

     

    कबीर ने घबराकर ट्रेन की तरफ देखा।

     

    ट्रेन चलने लगी थी।

     

    लेकिन दरवाज़े के पास कोई खड़ा था।

     

    वही बूढ़ा आदमी।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ उठाया और इशारा किया—

     

    अंदर आ जाओ।

     

    और तभी कबीर ने देखा कि बूढ़े के पीछे ट्रेन के दरवाज़े पर एक और आदमी खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल कबीर जैसा दिखता था।

     

    उसी चेहरे के साथ।

     

    उसी कपड़ों में।

     

    लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह मुस्कुराया और होंठ हिलाए—

     

    “तुम देर कर चुके हो।”

     

    ट्रेन अंधेरे में गायब हो गई।

     

    और प्लेटफॉर्म नंबर 3 की घड़ी रुक गई।

     

    12:15।

  • आख़िरी तस्वीर — भाग 3 (अंतिम भाग)” 👻

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    हरिदास उस कमरे के बीचों-बीच खड़ा था।उसके हाथ में तस्वीर थी और सामने आरव खड़ा था।

     

    लेकिन वह आरव जैसा दिखते हुए भी आरव नहीं लग रहा था।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था। आंखें खुली थीं, मगर उनमें कोई चमक नहीं थी। उसके पीछे आठ काली परछाइयां खड़ी थीं।

     

    हरिदास ने कांपती आवाज़ में पूछा, “आरव… तुम जिंदा हो?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना हाथ उठाया और दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    हरिदास ने पीछे देखा।

     

    दीवार पर एक नई तस्वीर लगी थी।

     

    उसमें देवेंद्र दिखाई दे रहा था।

     

    वह उसी कमरे में खड़ा था।

     

    लेकिन तस्वीर के अंदर।

     

    हरिदास की सांस रुक गई।

     

    “देवेंद्र!”

     

    तभी तस्वीर के अंदर देवेंद्र ने अपना सिर उठाया।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    “हरिदास… तस्वीर मत खींचना।”

     

    अचानक तस्वीर के अंदर से चीख सुनाई दी।

     

    और तस्वीर काली हो गई।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    आरव पहली बार बोला।

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    हरिदास ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “मैं वही हूं जिसे तुम ढूंढने आए थे।”

     

    “आरव कहां है?”

     

    आरव ने धीरे से अपनी गर्दन घुमाई।

     

    “वह अभी भी तस्वीर के अंदर है।”

     

    हरिदास के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    “तो तुम कौन हो?”

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “मैं वह हूं जो हर तस्वीर के बाद पैदा होता है।”

     

    कमरे की दीवारें अचानक कांपने लगीं।

     

    पुरानी तस्वीरें फर्श पर गिरने लगीं।

     

    हर तस्वीर में मौजूद लोग अब कमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    उनमें रघुवीर था।

     

    मीरा थी।

     

    तारा थी।

     

    और कई अनजान चेहरे थे।

     

    हरिदास ने समझ लिया कि ये सभी वही लोग थे जो वर्षों से इस घर की तस्वीरों में कैद थे।

     

    लेकिन एक तस्वीर देखकर उसकी नजर जम गई।

     

    उसमें उसकी पत्नी थी।

     

    वही चेहरा।

     

    वही साड़ी।

     

    वही मुस्कान।

     

    हरिदास की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “सरिता…”

     

    तस्वीर के अंदर उसकी पत्नी ने हाथ उठाया।

     

    जैसे उसे बुला रही हो।

     

    फिर तस्वीर के नीचे शब्द उभरने लगे—

     

    “एक तस्वीर लो और उसे वापस ले जाओ।”

     

    हरिदास ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया।

     

    आरव ने उसे रोकना चाहा।

     

    “ऐसा मत करना।”

     

    हरिदास ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर मैं तस्वीर खींच लूं तो मेरी पत्नी वापस आ जाएगी?”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    हरिदास समझ गया।

     

    “झूठ बोल रहे हो।”

     

    अचानक कमरे में एक और आवाज गूंजी।

     

    “नहीं…”

     

    आवाज़ उसकी पत्नी की थी।

     

    “मैं सच कह रही हूं।”

     

    हरिदास ने तस्वीर की तरफ देखा।

     

    सरिता रो रही थी।

     

    “बस एक तस्वीर…”

     

    हरिदास कैमरा लेकर उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    उसकी उंगली शटर पर थी।

     

    तभी उसे कुछ याद आया।

     

    1998 की तस्वीर।

     

    उसमें पांचवीं परछाई थी।

     

    फिर आरव की तस्वीर में सात परछाइयां थीं।

     

    फिर आठ।

     

    आखिर हर तस्वीर के साथ परछाइयां बढ़ क्यों रही थीं?

     

    हरिदास ने अचानक कैमरे की स्क्रीन देखी।

     

    स्क्रीन पर वही पुरानी तस्वीर खुली थी।

     

    उसने ज़ूम किया।

     

    पहली बार उसने तस्वीर के पीछे की दीवार देखी।

     

    वहां एक छोटा-सा आईना लगा था।

     

    आईने में उस काली परछाई का चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन वह चेहरा किसी और का नहीं था।

     

    वह तारा का था।

     

    दस साल की बच्ची।

     

    हरिदास ने देवेंद्र की बात याद की।

     

    “तारा की मौत कमरे में हुई थी।”

     

    उसने अचानक समझ लिया।

     

    “तारा ही वो साया है!”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हां। लेकिन वह अकेली नहीं है।”

     

    “तो बाकी लोग?”

     

    “वे लोग उसके साथ फंस गए।”

     

    हरिदास ने पूछा, “उन्हें आज़ाद कैसे करें?”

     

    आरव ने दीवार की तरफ देखा।

     

    “आख़िरी तस्वीर मिटानी होगी।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “वह तस्वीर जो पहली तस्वीर से पहले खींची गई थी।”

     

    हरिदास समझ नहीं पाया।

     

    “पहली तस्वीर से पहले?”

     

    आरव ने कमरे के फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    वहां एक लकड़ी का पुराना संदूक पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे खोला।

     

    अंदर पुराने कैमरे, निगेटिव और सैकड़ों तस्वीरें थीं।

     

    सबसे नीचे एक काला लिफाफा रखा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तारा की आख़िरी तस्वीर।”

     

    हरिदास ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक तस्वीर थी।

     

    तारा अकेली खड़ी थी।

     

    लेकिन उसके पीछे कोई परछाई नहीं थी।

     

    हरिदास ने गौर से देखा।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “मैंने इसे नहीं बुलाया था। उसने मुझे बुलाया था।”

     

    नीचे एक नाम लिखा था।

     

    मीरा।

     

    हरिदास चौंक गया।

     

    “मीरा?”

     

    आरव ने कहा, “तारा की मां।”

     

    अचानक कमरे में तेज हवा चलने लगी।

     

    दीवारों पर लगी सभी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    औरत की चीख सुनाई दी।

     

    फिर एक बच्ची रोने लगी।

     

    “मां… तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    हरिदास को सब समझ आने लगा।

     

    मीरा ने किसी पुराने तांत्रिक से मदद लेकर अपनी बेटी को मौत से वापस लाने की कोशिश की थी।

     

    लेकिन जो वापस आया था, वह तारा नहीं था।

     

    वह एक ऐसी शक्ति थी जिसने तस्वीरों के जरिए लोगों की आत्माओं को कैद करना शुरू कर दिया।

     

    और हर नई तस्वीर उसे और शक्तिशाली बनाती गई।

     

    हरिदास ने तारा की तस्वीर कैमरे के सामने रखी।

     

    आरव चिल्लाया—

     

    “जल्दी करो!”

     

    हरिदास ने कैमरा उठाया।

     

    तभी काली परछाई उसके सामने आ गई।

     

    उसका चेहरा बदलने लगा।

     

    पहले तारा।

     

    फिर सरिता।

     

    फिर आरव।

     

    फिर हरिदास का अपना चेहरा।

     

    उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते।”

     

    हरिदास ने कैमरे का फ्लैश ऑन किया।

     

    “शायद नहीं…”

     

    उसने तस्वीर कैमरे के सामने रखी।

     

    “…लेकिन तुम्हें तस्वीर में कैद तो कर सकता हूं।”

     

    क्लिक!

     

    एक तेज फ्लैश हुआ।

     

    पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

     

    सभी परछाइयां चीखने लगीं।

     

    दीवारों पर लगी तस्वीरें एक-एक करके फटने लगीं।

     

    आरव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    देवेंद्र की तस्वीर टूटकर फर्श पर आ गिरी।

     

    फिर आख़िरी चीख सुनाई दी।

     

    तारा की।

     

    “मुझे घर जाना है…”

     

    और सब शांत हो गया।

     

    कुछ देर बाद हरिदास ने आंखें खोलीं।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    न आरव।

     

    न परछाइयां।

     

    न तस्वीरें।

     

    सिर्फ एक कैमरा फर्श पर पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे उठाया।

     

    उसमें सिर्फ एक तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर देखी।

     

    उसमें तारा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    उसके पीछे कोई परछाई नहीं थी।

     

    तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—

     

    17 अगस्त 2026

     

    और समय—

     

    3:08 PM.

     

    हरिदास ने राहत की सांस ली।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “काका…”

     

    हरिदास जम गया।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने कैमरे की स्क्रीन देखी।

     

    स्क्रीन पर एक नई तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    उस तस्वीर में हरिदास खुद कमरे में खड़ा था।

     

    और उसके पीछे…

     

    एक छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    हरिदास ने डरते हुए तस्वीर को ज़ूम किया।

     

    वह तारा नहीं थी।

     

    वह कोई और लड़की थी।

     

    नीचे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “कहानी अभी खत्म नहीं हुई…”

     

    अगली सुबह पुलिस को पुराने घर में हरिदास मिला।

     

    वह जिंदा था।

     

    लेकिन उसे कुछ याद नहीं था।

     

    आरव का कोई पता नहीं चला।

     

    देवेंद्र भी गायब था।

     

    पुराना घर कुछ दिनों बाद तोड़ दिया गया।

     

    मजदूरों ने मलबा हटाते समय एक पुराना कैमरा पाया।

     

    पुलिस ने उसे सबूत समझकर थाने में रख दिया।

     

    तीन दिन बाद एक पुलिसकर्मी ने कैमरा चालू किया।

     

    उसमें सिर्फ एक तस्वीर थी।

     

    एक खाली सड़क की।

     

    सड़क के बीच एक आदमी खड़ा था।

     

    आरव।

     

    उसके हाथ में कैमरा था।

     

    और उसके पीछे…

     

    सैकड़ों परछाइयां खड़ी थीं।

     

    तस्वीर के नीचे तारीख थी—

     

    18 अगस्त 2026।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि तस्वीर पुलिस स्टेशन के अंदर से खींची गई थी।

     

    और कैमरा…

     

    पुलिस स्टेशन की अलमारी के अंदर बंद था।

     

    उस दिन के बाद वह कैमरा हमेशा के लिए गायब कर दिया गया।

     

    लेकिन कहते हैं, आज भी अगर कोई उस पुराने घर की जगह पर रात के ठीक 3:07 बजे तस्वीर खींचता है…

     

    तो तस्वीर में उसके पीछे एक छोटी बच्ची दिखाई देती है।

     

    वह मुस्कुराती है।

     

    और तस्वीर के पीछे सिर्फ एक सवाल लिखा होता है—

     

    “क्या तुम मेरी आख़िरी तस्वीर बनोगे?”

     

    End

  • आख़िरी तस्वीर — भाग 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    सुबह के करीब सात बजे मकान मालिक हरिदास उस पुराने घर के सामने खड़ा था। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    दरवाज़ा खुला था।

     

    अंदर अजीब-सी खामोशी थी।

     

    “आरव!” उसने आवाज लगाई।

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर गया। फर्श पर आरव का कैमरा पड़ा था। उसके पास मोबाइल भी था, जिसकी स्क्रीन टूट चुकी थी।

     

    हरिदास ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया।

     

    कैमरे में सिर्फ एक आख़िरी तस्वीर थी।

     

    उस तस्वीर को देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    तस्वीर में आरव कमरे के बीचों-बीच खड़ा था।

     

    उसके पीछे सात परछाइयां थीं।

     

    हरिदास ने कैमरा तुरंत बंद कर दिया।

     

    वह जानता था कि अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    पच्चीस साल पहले भी ऐसा ही हुआ था।

     

    लेकिन इस बार फर्क था।

     

    पहली बार उस घर ने किसी बाहरी आदमी को नहीं, बल्कि आरव को चुना था।

     

    हरिदास कैमरा लेकर सीधे घर से बाहर निकल गया।

     

    उसे आरव को ढूंढना था।

     

    लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी था उस तस्वीर का सच पता लगाना।

     

    वह शहर के पुराने हिस्से में रहने वाले एक बुजुर्ग आदमी के पास गया, जिसका नाम देवेंद्र था। देवेंद्र पहले उस घर के मालिक के परिवार के लिए काम करता था।

     

    हरिदास ने कैमरा उसके सामने रख दिया।

     

    देवेंद्र ने तस्वीर देखी।

     

    कुछ सेकंड तक वह बिल्कुल चुप रहा।

     

    फिर उसने पूछा, “उसने ऊपर वाला कमरा खोल दिया था?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। कमरा बाहर से बंद था। लेकिन उसने तस्वीर खींच ली थी।”

     

    देवेंद्र ने लंबी सांस ली।

     

    “तो फिर वही हुआ जिसका डर था।”

     

    हरिदास ने बेचैनी से पूछा, “आप मुझे सब कुछ बताइए।”

     

    देवेंद्र कुर्सी पर बैठ गया।

     

    “1998 में उस घर में एक परिवार रहता था। घर का मालिक था रघुवीर। उसके साथ उसकी पत्नी मीरा, बेटा निखिल और दस साल की बेटी तारा रहती थी।”

     

    हरिदास ध्यान से सुनता रहा।

     

    “एक रात परिवार ने घर में एक तस्वीर खिंचवाई। उस तस्वीर में चार लोग थे। लेकिन तस्वीर निकलने के बाद उसमें पांचवां साया दिखाई दिया।”

     

    “वही औरत?” हरिदास ने पूछा।

     

    देवेंद्र ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “फिर?”

     

    “उस रात तारा गायब हो गई।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “अगली सुबह उसका शरीर घर के ऊपर वाले कमरे में मिला। लेकिन कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था।”

     

    हरिदास ने पूछा, “पुलिस?”

     

    “पुलिस आई थी। मगर उन्हें कुछ समझ नहीं आया।”

     

    देवेंद्र कुछ पल रुका।

     

    “उसके बाद रघुवीर ने उस तस्वीर को जला दिया।”

     

    “तो फिर यह तस्वीर?”

     

    “तस्वीर जली थी… लेकिन खत्म नहीं हुई।”

     

    हरिदास की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

     

    देवेंद्र ने आगे कहा, “जिसने भी उस तस्वीर को दोबारा कैमरे में कैद किया, उसके साथ कुछ न कुछ हुआ।”

     

    हरिदास ने कैमरा कसकर पकड़ लिया।

     

    “आरव कहां है?”

     

    देवेंद्र ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “जहां बाकी लोग हैं।”

     

    “कहां?”

     

    देवेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय कैमरे की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

     

    दोनों चौंक गए।

     

    स्क्रीन पर नई तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव।

     

    वह एक लंबे अंधेरे गलियारे में खड़ा था।

     

    हरिदास ने घबराकर कहा, “यह तो उस घर में नहीं है।”

     

    देवेंद्र तस्वीर के करीब गया।

     

    “यह घर के अंदर ही है।”

     

    “लेकिन ऐसा कोई गलियारा वहां नहीं है!”

     

    देवेंद्र ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    फिर उसकी नजर तस्वीर के कोने पर पड़ी।

     

    वहां दीवार पर एक पुरानी घड़ी थी।

     

    घड़ी में समय था—

     

    3:07.

     

    देवेंद्र अचानक खड़ा हो गया।

     

    “हमें तुरंत वहां जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि 3:07 वह समय है जब वह दरवाज़ा खुलता है।”

     

    हरिदास ने घड़ी की तरफ देखा।

     

    अभी सुबह के आठ बज रहे थे।

     

    “तो हमारे पास समय है।”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उसने कैमरे की स्क्रीन दिखाई।

     

    तस्वीर में घड़ी की सुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

     

    3:03…

     

    3:04…

     

    3:05…

     

    जैसे तस्वीर के अंदर समय चल रहा हो।

     

    हरिदास की सांस अटक गई।

     

    “यह कैसे संभव है?”

     

    देवेंद्र ने कहा, “क्योंकि तस्वीर के अंदर भी समय चलता है।”

     

    दोनों तुरंत घर की ओर लौटे।

     

    ऊपर वाला कमरा अभी भी बंद था।

     

    लेकिन अब दरवाज़े के नीचे से हल्की नीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    हरिदास ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

     

    अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    देवेंद्र ने फुसफुसाकर कहा, “आवाज़ का जवाब मत देना।”

     

    फिर रोने की आवाज तेज हो गई।

     

    “काका… मुझे बाहर निकालो…”

     

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तारा…”

     

    हरिदास ने उसे रोकना चाहा।

     

    लेकिन देवेंद्र ने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    कमरा खाली था।

     

    वहां सिर्फ एक पुरानी लकड़ी की मेज थी।

     

    मेज पर कई तस्वीरें रखी थीं।

     

    हर तस्वीर में अलग-अलग लोग थे।

     

    कुछ लोग परिवार के थे।

     

    कुछ अनजान।

     

    लेकिन हर तस्वीर में एक चीज समान थी।

     

    पीछे वही काली परछाई।

     

    हरिदास ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसमें आरव था।

     

    वह एक अंधेरे कमरे में बैठा था।

     

    उसकी आंखें बंद थीं।

     

    उसके सामने एक लड़की खड़ी थी।

     

    दस साल की।

     

    पीली फ्रॉक पहने हुए।

     

    देवेंद्र ने तस्वीर देखते ही कहा—

     

    “तारा।”

     

    अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कमरे की खिड़कियां अपने आप बंद हो गईं।

     

    हरिदास ने दरवाज़ा खींचा।

     

    “खुलो!”

     

    कोई फायदा नहीं हुआ।

     

    तभी मेज पर रखी तस्वीरों में हलचल होने लगी।

     

    एक-एक करके तस्वीरों के अंदर मौजूद लोग अपना सिर घुमाने लगे।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    “ये… ये जिंदा हैं।”

     

    देवेंद्र ने कहा, “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    “ये इंतजार कर रहे हैं।”

     

    अचानक एक तस्वीर फर्श पर गिर गई।

     

    उसमें आरव दिखाई दे रहा था।

     

    इस बार उसकी आंखें खुली थीं।

     

    वह सीधे कैमरे की तरफ देख रहा था।

     

    और उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    हरिदास ने तस्वीर कान के पास कर ली।

     

    बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “मुझे यहां से निकालो।”

     

    हरिदास ने घबराकर कहा, “आरव!”

     

    देवेंद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उसकी आवाज पर भरोसा मत करो।”

     

    “लेकिन वह आरव है!”

     

    “हो सकता है।”

     

    देवेंद्र ने तस्वीर को उलट दिया।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “एक को बाहर निकालोगे, तो एक को अंदर जाना होगा।”

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    तभी कमरे की दीवार पर एक नई तस्वीर दिखाई देने लगी।

     

    जैसे किसी अदृश्य हाथ ने दीवार पर तस्वीर चिपका दी हो।

     

    तस्वीर में हरिदास और देवेंद्र खड़े थे।

     

    उनके बीच आरव था।

     

    लेकिन आरव के चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    हरिदास ने कांपते हुए कहा, “यह तस्वीर अभी खींची गई है?”

     

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    क्योंकि तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी।

     

    17 अगस्त 2026।

     

    और समय था—

     

    3:07 PM.

     

    हरिदास ने अपनी घड़ी देखी।

     

    3:06 PM.

     

    सिर्फ एक मिनट बाकी था।

     

    तभी कमरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “किसे अंदर भेजोगे?”

     

    हरिदास और देवेंद्र दोनों ने पीछे देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “हरिदास…”

     

    हरिदास जम गया।

     

    आवाज़ उसकी मृत पत्नी की थी।

     

    “हरिदास… मुझे बहुत साल हो गए हैं।”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    देवेंद्र ने उसे पकड़ लिया।

     

    “मत सुनो!”

     

    लेकिन आवाज अब बिल्कुल उसके कान के पास थी।

     

    “बस एक तस्वीर खिंचवा दो…”

     

    3:07.

     

    अचानक कैमरा अपने आप उठ गया।

     

    फ्लैश चमका।

     

    कमरा पूरी तरह सफेद रोशनी में डूब गया।

     

    जब रोशनी गायब हुई, देवेंद्र वहां नहीं था।

     

    हरिदास अकेला खड़ा था।

     

    मेज पर एक नई तस्वीर पड़ी थी।

     

    उसने कांपते हाथों से तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में वह खुद खड़ा था।

     

    उसके पीछे देवेंद्र था।

     

    और उनके बीच…

     

    आरव मुस्कुरा रहा था।

     

    हरिदास ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अब तीसरी तस्वीर तुम्हें खींचनी है।”

     

    उसी क्षण कमरे के कोने से कैमरे की क्लिक की आवाज आई।

     

    हरिदास ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

     

    वहां आरव खड़ा था।

     

    लेकिन उसके पीछे सात नहीं…

     

    आठ परछाइयां थीं।

     

    और उनमें से एक परछाई धीरे-धीरे हरिदास की तरफ बढ़ रही थी।

  • भाग 1 — आख़िरी तस्वीर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। शहर के पुराने हिस्से में बारिश लगातार हो रही थी। सड़कें सुनसान थीं और बिजली बार-बार चमक रही थी। उसी रात आरव अपने नए किराए के घर में पहली बार अकेला था।

     

    घर बहुत पुराना था। दीवारों पर नमी के निशान थे, लकड़ी के दरवाज़े जगह-जगह से उखड़े हुए थे और ऊपर की मंज़िल पर एक छोटा-सा कमरा था, जिसे मकान मालिक ने साफ़ करने से मना किया था।

     

    आरव को यह बात अजीब लगी थी।

     

    जब उसने पूछा था, “वह कमरा बंद क्यों है?”

     

    मकान मालिक ने बस इतना कहा था, “पुराना सामान है। आपको उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।”

     

    आरव ने ज्यादा सवाल नहीं किए।

     

    वह पेशे से फोटोग्राफर था। पुराने घरों और सुनसान जगहों की तस्वीरें लेना उसका शौक था। इसलिए घर की अजीब हालत देखकर डरने के बजाय वह उत्साहित था।

     

    रात को खाना खाने के बाद उसने अपना कैमरा निकाला और घर की तस्वीरें लेने लगा।

     

    सीढ़ियां…

     

    खिड़की…

     

    पुरानी घड़ी…

     

    फिर उसकी नजर सामने की दीवार पर पड़ी।

     

    वहां एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में चार लोग खड़े थे—एक बुजुर्ग आदमी, एक औरत, करीब दस साल की बच्ची और एक जवान लड़का। सभी कैमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि तस्वीर के पीछे की तारीख साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “17 अगस्त 1998.”

     

    आरव ने तस्वीर उतारी और अपने कैमरे से उसकी फोटो खींच ली।

     

    तभी ऊपर से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव चौंक गया।

     

    उसने ऊपर देखा।

     

    आवाज़ उसी बंद कमरे की तरफ से आई थी।

     

    कुछ सेकंड तक वह सीढ़ियों के पास खड़ा रहा। फिर उसने खुद को समझाया कि शायद कोई पुरानी चीज गिर गई होगी।

     

    वह ऊपर गया।

     

    कमरे का दरवाज़ा बंद था।

     

    आरव ने हैंडल घुमाया।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    अंदर से हल्की-सी खरोंचने की आवाज आ रही थी।

     

    खर्र… खर्र…

     

    आरव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “कोई है?” उसने धीरे से पूछा।

     

    आवाज़ तुरंत बंद हो गई।

     

    कुछ पल बाद उसने नीचे लौटने का फैसला किया।

     

    कमरे में वापस आकर उसने कैमरे की तस्वीरें लैपटॉप में डालनी शुरू कीं।

     

    एक-एक करके तस्वीरें सामने आने लगीं।

     

    लेकिन जब उसने उस पुरानी तस्वीर वाली फोटो खोली, तो उसकी सांस रुक गई।

     

    तस्वीर में अब चार लोग नहीं थे।

     

    उनके पीछे एक पांचवीं परछाई खड़ी थी।

     

    एक औरत।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आरव ने आंखें मलकर स्क्रीन को देखा।

     

    उसे लगा शायद कैमरे की रोशनी के कारण ऐसा दिख रहा है।

     

    उसने फोटो को ज़ूम किया।

     

    परछाई बिल्कुल साफ थी।

     

    काले कपड़े।

     

    लंबे बाल।

     

    और चेहरा पूरी तरह नीचे झुका हुआ।

     

    आरव ने तस्वीर सेव की और कैमरा बंद कर दिया।

     

    तभी कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    तेज़ हवा अंदर आई।

     

    लाइट चली गई।

     

    पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    खिड़की से लेकर उसके कैमरे तक।

     

    आरव धीरे-धीरे कैमरे के पास गया।

     

    कैमरा अभी बंद था।

     

    फिर भी उसकी स्क्रीन जल उठी।

     

    स्क्रीन पर एक तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव ने उसे देखा और उसके हाथ कांपने लगे।

     

    वह तस्वीर उसी कमरे की थी।

     

    लेकिन उसमें आरव खुद खड़ा था।

     

    और उसके पीछे वही काले कपड़ों वाली औरत खड़ी थी।

     

    आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह घबराकर कमरे से बाहर निकला।

     

    नीचे पहुंचकर उसने मकान मालिक को फोन किया।

     

    “आपने मुझे इस घर के बारे में सब कुछ नहीं बताया,” आरव ने गुस्से में कहा।

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक चुप्पी रही।

     

    फिर मकान मालिक ने पूछा, “आपने ऊपर वाले कमरे की तस्वीर देख ली?”

     

    आरव चौंका।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    मकान मालिक की आवाज अचानक धीमी हो गई।

     

    “क्योंकि उस घर में जो भी उस तस्वीर को कैमरे में कैद करता है… वह ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहता।”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    मकान मालिक ने जवाब नहीं दिया।

     

    फोन कट गया।

     

    उसी समय ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    धीरे-धीरे।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    जैसे कोई सीढ़ियों से नीचे उतर रहा हो।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी सीढ़ियों पर डाली।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    लेकिन आवाज जारी रही।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    फिर अचानक उसके फोन पर एक नई तस्वीर आई।

     

    अज्ञात नंबर से।

     

    आरव ने तस्वीर खोली।

     

    उसमें वही पुरानी तस्वीर थी।

     

    चार लोग…

     

    और पीछे खड़ी पांचवीं परछाई।

     

    लेकिन इस बार परछाई का चेहरा थोड़ा ऊपर उठा हुआ था।

     

    आरव ने तस्वीर को ज़ूम किया।

     

    उसका खून जम गया।

     

    चेहरा किसी औरत का नहीं था।

     

    वह चेहरा आरव की अपनी मां का था।

     

    उसकी मां की मौत छह साल पहले हो चुकी थी।

     

    तभी फोन पर एक मैसेज आया।

     

    “मुझे ढूंढना मत।”

     

    आरव ने कांपते हुए लिखा—

     

    “आप कौन हैं?”

     

    कुछ सेकंड बाद जवाब आया।

     

    “मैं वो हूं… जिसकी आख़िरी तस्वीर तुमने खींची है।”

     

    आरव ने तुरंत घर छोड़ने का फैसला किया।

     

    उसने बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन मुख्य दरवाज़ा बंद था।

     

    उसने चाबी घुमाई।

     

    चाबी घूम रही थी, मगर दरवाज़ा नहीं खुल रहा था।

     

    पीछे से किसी के हंसने की आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    बहुत करीब।

     

    आरव धीरे-धीरे मुड़ा।

     

    सीढ़ियों के नीचे वही काले कपड़ों वाली औरत खड़ी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    औरत ने अपना सिर उठाया।

     

    चेहरा अब साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह उसकी मां थी।

     

    लेकिन उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बेटा… एक तस्वीर और ले लो।”

     

    आरव का कैमरा अपने आप चालू हो गया।

     

    स्क्रीन पर लिखा आया—

     

    “आख़िरी तस्वीर — 17 अगस्त 2026.”

     

    और कैमरे ने खुद ही तस्वीर खींच ली।

     

    फ्लैश चमका।

     

    उस एक पल में आरव ने देखा कि उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े थे।

     

    सबके चेहरे पहचान में नहीं आ रहे थे।

     

    और सबसे आगे वही चार लोग खड़े थे, जो पुरानी तस्वीर में थे।

     

    फिर अंधेरा छा गया।

     

    सुबह जब मकान मालिक घर पहुंचा, तो दरवाज़ा खुला था।

     

    आरव कहीं नहीं था।

     

    सिर्फ उसका कैमरा फर्श पर पड़ा था।

     

    कैमरे में आख़िरी तस्वीर मौजूद थी।

     

    उस तस्वीर में आरव अकेला खड़ा था।

     

    लेकिन उसके पीछे एक नहीं…

     

    सात परछाइयां थीं।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 25

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 25

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 25 : जिसे देखकर विराज भी डर गया

     

    समुद्र किनारे उस सुनसान जगह पर एक पल के लिए सब कुछ थम गया था।

     

    शेखर जमीन पर पड़े थे।

     

    आरव उनके पास घुटनों के बल बैठा हुआ था।

     

    उनकी सफेद शर्ट पर खून फैलता जा रहा था।

     

    “पापा…!”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “आंखें खोलिए… पापा, मेरी तरफ देखिए।”

     

    शेखर ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    “हां पापा, मैं यहीं हूं।”

     

    “तुम… यहां से चले जाओ।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    तभी पीछे से बंदूक पकड़े वह आदमी आगे आया।

     

    उसके चेहरे पर ठंडी मुस्कान थी।

     

    विराज उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    “तुम…?”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां, विराज। मैं।”

     

    अभय ने भी उसे पहचान लिया।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “ये यहां कैसे…?”

     

    राघव ने घबराकर पूछा,

     

    “कौन है ये?”

     

    किसी के मुंह से जवाब नहीं निकला।

     

    वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    “मेरा नाम सुनने के बाद शायद तुम्हें अपने पुराने पाप याद आ जाएंगे।”

     

    आरव ने गुस्से में उसकी तरफ बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे पिता को गोली मारी है।”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “और अगली गोली तुम्हारे लिए है।”

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “उसे गोली मत मारना!”

     

    आदमी ने आरोही को देखा।

     

    कुछ पल तक वह उसे घूरता रहा।

     

    फिर उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तुम…”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    उस आदमी ने धीरे से कहा—

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”

     

    नंदिनी की आंखें फैल गईं।

     

    “नहीं…”

     

    अभय ने गुस्से में पूछा,

     

    “तुम जिंदा कैसे हो?”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें लगा था कि तुमने मुझे खत्म कर दिया?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

     

    आदमी हंसा।

     

    “इस परिवार के लोगों ने मुझे कई बार मारने की कोशिश की।”

     

    फिर उसने अपनी बंदूक आरव की तरफ कर दी।

     

    “लेकिन मैं हर बार वापस आया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नाम बताओ अपना।”

     

    आदमी ने कहा,

     

    “तुम्हें मेरा नाम जानकर क्या मिलेगा?”

     

    “सच।”

     

    “सच?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुम सच सुनने के लिए तैयार नहीं हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं सब सुनूंगा।”

     

    उस आदमी ने कहा—

     

    “मेरा नाम रुद्र है।”

     

    माधवी के हाथ कांपने लगे।

     

    राघव ने उन्हें संभाला।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आप मुझे मेरी मां जैसा क्यों कह रहे थे?”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां…”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्योंकि मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता था।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “रुद्र, मेरी बेटी से दूर रहो।”

     

    रुद्र हंसा।

     

    “अब भी डरती हो?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “क्योंकि मैं जानती हूं तुम क्या कर सकते हो।

     

    आरव ने शेखर के घाव पर हाथ दबाया।

     

    “किसी को डॉक्टर बुलाना होगा।”

     

    कबीर ने तुरंत फोन निकाला।

     

    “मैं एंबुलेंस बुलाता हूं।”

     

    शेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्यों?”

     

    “अस्पताल मत ले जाना।”

     

    “लेकिन गोली लगी है।”

     

    शेखर ने धीमे से कहा,

     

    “वहां… उनके लोग हैं।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “तो फिर हम आपको सुरक्षित जगह ले जाएंगे।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “मेरे पास एक पुराना फार्महाउस है।”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “वहीं चलो।”

     

    राघव और कबीर ने शेखर को उठाया।

     

    लेकिन तभी रुद्र ने बंदूक उठाई।

     

    “कोई कहीं नहीं जाएगा।”

     

    आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “तुम्हें पहले मुझसे गुजरना होगा।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “यही तो चाहता हूं।”

     

    आरव ने बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे पिता को गोली मारी है।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वो तुम्हारे पिता हैं?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर तुम्हें भी मरना होगा।”

     

    आरोही चिल्लाई,

     

    “नहीं!”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत आओ।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मैं आरव को कुछ नहीं होने दूंगी।”

     

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तुम्हें पता है तुम किसे बचा रही हो?”

     

    “आरव को।”

     

    “वही आरव जिसने तुम्हारे परिवार की पूरी विरासत अपने नाम कर रखी है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मुझे उसकी संपत्ति नहीं चाहिए।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “फिर भी तुम उसके साथ हो।”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मैं उससे प्यार करती हूं।”

     

    चारों तरफ खामोशी छा गई।

     

    आरव ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने पहली बार सबके सामने अपने दिल की बात कह दी थी।

     

    रुद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “यही प्यार तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “और यही हमारा सबसे बड़ा हथियार भी है।”

     

    विराज ने अचानक रुद्र से कहा,

     

    “तुम्हारा असली मकसद क्या है?”

     

    रुद्र उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम्हें पता होना चाहिए।”

     

    “नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “मैं सच कह रहा हूं।”

     

    रुद्र ने बंदूक नीचे की।

     

    “तुम्हें याद है वो रात?”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सी रात?”

     

    “अस्पताल वाली।”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “जिस रात दो बच्चों का जन्म हुआ था।”

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “उस रात तुमने आदेश दिया था कि दोनों बच्चों को खत्म कर दिया जाए।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या?”

     

    विराज चिल्लाया,

     

    “झूठ!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लेकिन नंदिनी ने एक बच्चे को बचा लिया।”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने दोनों को बचाने की कोशिश की थी।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां माधवी आरव को लेकर भाग गई थी।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां।”

     

    “और नंदिनी आरोही को लेकर।”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन तीसरा आदमी कौन था?”

     

    सब चौंक गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तीसरा?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उस रात वहां एक और बच्चा था।”

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “ये झूठ है।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “तुम जानते हो कि मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तीसरा बच्चा कौन था?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वही बच्चा जिसकी वजह से आज तुम दोनों की जिंदगी उलझी हुई है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सीधे-सीधे बताओ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उस बच्चे की पहचान कभी सामने नहीं आई।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसके रिकॉर्ड बदल दिए गए थे।”

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने विराज की तरफ देखा।

     

    विराज चुप रहा।

     

    रुद्र बोला,

     

    “विराज ने।”

     

    आरोही ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मैंने किसी बच्चे को नहीं छुआ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुमने आदेश दिया था।”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने कहा,

     

    “उस बच्चे का क्या हुआ?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वो बच्चा…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे सामने खड़ा है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें हमेशा बताया गया कि तुम माधवी के बेटे हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “लेकिन तुम्हारा जन्म रिकॉर्ड नकली है।”

     

    माधवी रो पड़ीं।

     

    “नहीं!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “माधवी ने तुम्हें पाला जरूर है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो मेरी असली मां कौन है?”

     

    रुद्र ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरोही ने हैरानी से अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा,

     

    “आरव…”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “आप…?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मैं तुम्हें सच बताना चाहती थी।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “क्या आप मेरी मां हैं?”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरोही जैसे पत्थर बन गई।

     

    “तो…”

     

    उसकी नजर आरव पर गई।

     

    “आरव मेरे भाई हैं?”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रुद्र हंस पड़ा।

     

    “अब समझ आया?”

    आरोही धीरे-धीरे आरव से दूर होने लगी।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो।”

     

    “नहीं!”

     

    “हम दोनों के बीच…”

     

    उसकी आवाज रुक गई।

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “तुम दोनों भाई-बहन नहीं हो।”

     

    आरव ने चौंककर उनकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन आपने कहा कि आप मेरी मां हैं।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हारी जैविक मां नहीं हूं।”

     

    रुद्र चुप हो गया।

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो फिर?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा,

     

    “मैंने तुम्हें सिर्फ उस रात बचाया था।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “तो मेरी असली मां कौन है?”

     

    नंदिनी ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी रो रही थीं।

     

    “माधवी ही तुम्हारी मां है।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन रुद्र हंस पड़ा।

     

    “अभी कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा,

     

    “अब क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें सच में लगता है कि मैं यहां सिर्फ तुम्हें डराने आया हूं?”

     

    उसने अपनी जेब से एक पुराना लॉकेट निकाला।

     

    लॉकेट देखकर माधवी अचानक चौंक गईं।

     

    “ये…”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “पहचानती हो?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “ये मेरे बेटे का था।”

     

    आरव ने लॉकेट की तरफ देखा।

     

    “मेरे पास भी बिल्कुल ऐसा ही लॉकेट था।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि ये तुम्हारा था।”

     

    आरव ने लॉकेट अपने हाथ में लिया।

     

    उसके पीछे एक छोटा सा निशान बना था।

     

    ‘A.R.’

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “इसका मतलब?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “आरव राजवंशी।”

     

    रुद्र ने अचानक बंदूक नीचे कर दी।

     

    “मैं तुम्हें मारने नहीं आया।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “तो?”

     

    “मैं तुम्हें सच बताने आया हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे साथ भी धोखा किया था।”

     

    शेखर ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “रुद्र…”

     

    रुद्र उनकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम चुप रहो।”

     

    “तुम्हें पूरी सच्चाई नहीं पता।”

     

    “मुझे सब पता है।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    रुद्र चिल्लाया,

     

    “तो बताओ!”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारी बहन की मौत… मेरी वजह से नहीं हुई थी।”

     

    रुद्र के चेहरे पर गुस्सा जम गया।

     

    “क्या?”

     

    “उसकी हत्या विराज ने नहीं की थी।”

     

    विराज ने भी हैरानी से शेखर की तरफ देखा।

     

    “तो किसने?”

     

    शेखर ने कांपते हुए कहा “तुमने खुद।”

     

    रुद्र की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हें याद नहीं… लेकिन उस रात तुम नशे में थे।”

     

    रुद्र पीछे हट गया।

     

    “झूठ!”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “और तुम्हें सच बताने के लिए मैंने तुम्हारी याददाश्त से जुड़े सारे दस्तावेज छुपाए थे।”

     

    रुद्र का हाथ कांपने लगा।

     

    “नहीं…”

     

    अचानक दूर से पुलिस सायरन की आवाज सुनाई दी।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुलिस आ रही है।”

     

    रुद्र ने चारों तरफ देखा।

     

    “नहीं…”

     

    विराज ने तुरंत अपने आदमियों को पीछे हटने का इशारा किया।

     

    अभय ने मौका देखकर नंदिनी और माधवी को दूसरी तरफ भेज दिया।

     

    आरव ने शेखर को संभाला।

     

    “चलो पापा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “आरव… लाल फाइल।”

     

    “वो कहां है?”

     

    शेखर ने अपनी जेब से एक छोटी चाबी निकाली।

     

    “नीलगिरी हवेली… कमरा नंबर 17।”

     

    “उसमें क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारी जिंदगी का आखिरी राज।”

     

    आरव ने चाबी ले ली।

     

    तभी रुद्र ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    “आरव!”

     

    आरव पलटा।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “अगर कमरा नंबर 17 खोला…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    “तो तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे जन्म के समय तुम्हारी जिंदगी में सबसे बड़ा धोखा किसने दिया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां…?”

     

    माधवी कुछ नहीं बोलीं।

     

    आरव की आंखों में शक उतर आया।

     

    और उसी समय…

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “जो भी सच होगा… हम साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर सच ने हमें अलग कर दिया तो?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “तो मैं उस सच को ही गलत साबित कर दूंगी।”

     

    दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गए।

     

    पीछे समुद्र की लहरें जोर-जोर से चट्टानों से टकरा रही थीं।

     

    और नीलगिरी हवेली के अंदर…

     

    कमरा नंबर 17 का दरवाजा पहली बार खुलने वाला था।

     

    लेकिन उस कमरे के अंदर क्या था?

     

    एक तस्वीर… एक खून से लिखा खत… और ऐसा राज, जो आरव और आरोही के पूरे रिश्ते को बदलने वाला था।

     

    जारी रहेगा…

  • चांदनी रात का अंधियारा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 1

     

    गांव से थोड़ी दूर एक पुरानी हवेली थी। दिन में वह हवेली जितनी शांत और साधारण दिखाई देती, रात होते ही उतनी ही रहस्यमयी लगने लगती थी। गांव के लोग शाम ढलने के बाद उस रास्ते पर जाना पसंद नहीं करते थे।

     

    कहते थे कि हर पूर्णिमा की रात हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक दीपक अपने आप जल उठता था।

     

    किसी ने उस दीपक को जलाते हुए कभी नहीं देखा था।

     

    गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते थे, “उस हवेली से दूर रहना ही अच्छा है।”

     

    लेकिन गांव की अठारह साल की चांदनी इन बातों को सिर्फ पुरानी कहानियां मानती थी।

     

    चांदनी का असली नाम चांदनी ही था। उसके पिता बचपन से उसे इसी नाम से पुकारते थे, क्योंकि उसके जन्म की रात आसमान में बहुत बड़ा चांद निकला था।

     

    वह हंसमुख और थोड़ी जिद्दी लड़की थी।

     

    एक शाम उसकी मां ने उससे कहा, “चांदनी, सूरज ढलने वाला है। जल्दी घर आ जाना।”

     

    चांदनी ने हंसकर कहा, “मां, मैं बस कुएं तक जा रही हूं।”

     

    “कुएं तक ठीक है, लेकिन हवेली की तरफ मत जाना।”

     

    चांदनी रुक गई।

     

    “आपको अभी भी उस हवेली से डर लगता है?”

     

    मां ने गंभीर होकर कहा, “डर की बात नहीं है। बस वहां जाना ठीक नहीं है।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    मां ने जवाब नहीं दिया।

     

    चांदनी ने फिर पूछा, “मां, आखिर वहां हुआ क्या था?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    “तुम्हें जितना पता है, उतना ही रहने दो।”

     

    चांदनी को यह जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

     

    वह कुएं की तरफ चली गई, लेकिन उसके दिमाग में हवेली की बात घूमती रही।

     

    रास्ते में उसकी मुलाकात उसकी सहेली गौरी से हुई।

     

    गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    चांदनी बोली, “तुम्हें हवेली के बारे में कुछ पता है?”

     

    गौरी का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “उसका नाम मत लो।”

     

    “क्यों?”

     

    “मेरी दादी कहती हैं कि पूर्णिमा की रात वहां कोई खिड़की से बाहर देखता है।”

     

    चांदनी हंस पड़ी।

     

    “कोई इंसान?”

     

    गौरी ने धीरे से कहा, “पता नहीं।”

     

    चांदनी ने मजाक किया, “तो आज रात चलकर देख लेते हैं।”

     

    गौरी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पागल हो गई हो क्या?”

     

    चांदनी हंसती हुई बोली, “मैं मजाक कर रही हूं।”

     

    लेकिन उसके मन में अब वही बात बैठ गई थी।

     

    उस रात पूर्णिमा थी।

     

    आसमान बिल्कुल साफ था और चांद की रोशनी पूरे गांव में फैली हुई थी।

     

    चांदनी अपनी छत पर बैठी थी।

     

    अचानक उसकी नजर दूर हवेली की तरफ गई।

     

    वहां ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    चांदनी खड़ी हो गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    उसने ध्यान से देखा।

     

    रोशनी सच में थी।

     

    उसे अपनी मां की बात याद आई।

     

    फिर उसे गौरी की दादी की कहानी याद आई।

     

    चांदनी ने खुद को समझाया।

     

    “कोई दीपक जलाकर गया होगा।”

     

    वह वापस बैठ गई।

     

    लेकिन कुछ मिनट बाद रोशनी गायब हो गई।

     

    चांदनी फिर खड़ी हुई।

     

    “अजीब है।”

     

    अगली सुबह उसने अपनी मां से पूछा, “मां, क्या हवेली में कोई रहता है?”

     

    मां ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम ये क्यों पूछ रही हो?”

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    मां ने कहा, “नहीं। वहां कोई नहीं रहता।”

     

    चांदनी ने पूछा, “फिर रात को वहां रोशनी क्यों थी?”

     

    मां के हाथ से गिलास लगभग छूट गया।

     

    “तुमने क्या देखा?”

     

    “ऊपर की खिड़की में दीपक जल रहा था।”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “आज के बाद उस हवेली की तरफ मत देखना।”

     

    चांदनी को अब यकीन हो गया था कि उसकी मां कुछ छिपा रही हैं।

     

    उसी दिन दोपहर में वह अपनी दादी के पास गई।

     

    दादी आंगन में बैठी थीं।

     

    चांदनी उनके पास बैठ गई।

     

    “दादी, आप मुझे हवेली के बारे में सच-सच बताइए।”

     

    दादी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “किसने कहा तुम्हें उसके बारे में पूछने को?”

     

    “किसी ने नहीं। मैंने खुद देखा।”

     

    दादी की आंखों में चिंता आ गई।

     

    “क्या देखा?”

     

    “पूर्णिमा की रात खिड़की में दीपक।”

     

    दादी ने लंबी सांस ली।

     

    “बहुत साल पहले उस हवेली में एक परिवार रहता था। घर के मालिक की एक बेटी थी। उसका नाम भी चांदनी था।”

     

    चांदनी हैरान रह गई।

     

    “मेरे जैसा?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हां। वह लड़की बहुत शांत थी। उसे रात में छत पर बैठकर चांद देखना पसंद था।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    दादी ने धीरे से कहा, “एक पूर्णिमा की रात वह अचानक गायब हो गई।”

     

    “कहां गई?”

     

    “किसी को नहीं पता।”

     

    “उसके परिवार ने उसे ढूंढा?”

     

    “बहुत ढूंढा। लेकिन उसका कोई पता नहीं चला।”

     

    चांदनी ने पूछा, “फिर हवेली बंद क्यों हो गई?”

     

    दादी बोलीं, “उसके बाद हवेली में अजीब घटनाएं होने लगीं। कभी दरवाजे अपने आप खुल जाते, कभी ऊपर की खिड़की में दीपक जलता दिखाई देता।”

     

    चांदनी कुछ देर चुप रही।

     

    “लेकिन दादी, इसका मतलब यह नहीं कि वहां कुछ डरावना है।”

     

    दादी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “बेटी, हर रहस्य को जानना जरूरी नहीं होता।”

     

    चांदनी ने कुछ जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल लगातार घूमता रहा—

     

    अगर वह लड़की सालों पहले गायब हो गई थी, तो हर पूर्णिमा की रात दीपक कौन जलाता था?

     

    उस रात चांदनी देर तक सो नहीं सकी।

     

    आधी रात के करीब उसे बाहर से हल्की-सी आवाज सुनाई दी।

     

    “चांदनी…”

     

    वह तुरंत उठकर बैठ गई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने सोचा शायद उसका भ्रम होगा।

     

    फिर आवाज आई।

     

    “चांदनी…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    वह खिड़की के पास गई।

     

    बाहर पूरा आंगन चांदनी से भरा हुआ था।

     

    उसने दूर हवेली की तरफ देखा।

     

    ऊपर वही खिड़की दिखाई दे रही थी।

     

    और इस बार वहां दीपक जल रहा था।

     

    चांदनी के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    तभी खिड़की के पास एक परछाईं दिखाई दी।

     

    एक लड़की जैसी परछाईं।

     

    चांदनी ने आंखें मलीं।

     

    परछाईं गायब हो चुकी थी।

     

    अगली सुबह उसने गौरी को सब बताया।

     

    गौरी ने कहा, “तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए।”

     

    चांदनी बोली, “मुझे लगता है वहां कोई रहस्य है।”

     

    “तो क्या करोगी?”

     

    चांदनी ने दृढ़ होकर कहा, “आज रात हवेली जाऊंगी।”

     

    गौरी ने डरते हुए पूछा, “अकेली?”

     

    चांदनी ने कहा, “तुम साथ चलोगी।”

     

    “बिल्कुल नहीं!”

     

    चांदनी हंस पड़ी।

     

    “ठीक है, मैं अकेली चली जाऊंगी।”

     

    गौरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं! मैं भी चलूंगी।”

     

    रात होते ही दोनों चुपचाप गांव से बाहर निकल पड़ीं।

     

    चांदनी के हाथ में एक छोटी टॉर्च थी।

     

    हवेली का रास्ता चांद की रोशनी में साफ दिखाई दे रहा था।

     

    जैसे-जैसे वे हवेली के करीब पहुंचीं, हवा ठंडी होती गई।

     

    गौरी ने धीमे से कहा, “मुझे अच्छा नहीं लग रहा।”

     

    चांदनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “डर मत। मैं हूं।”

     

    दोनों हवेली के बड़े दरवाजे के सामने पहुंचीं।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    चांदनी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

     

    किर्रर्र…

     

    दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    गौरी पीछे हट गई।

     

    “चांदनी… हमने इसे खोला नहीं।”

     

    चांदनी ने धीरे से अंदर देखा।

     

    अंदर पूरा अंधेरा था।

     

    लेकिन सीढ़ियों के ऊपर से हल्की चांदनी आ रही थी।

     

    तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    चांदनी ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी छोर पर एक लड़की खड़ी थी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

     

    चेहरा चांदनी को साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लड़की ने धीरे से अपना हाथ उठाया और ऊपर की खिड़की की तरफ इशारा किया।

     

    फिर अचानक गायब हो गई।

     

    गौरी ने कांपते हुए कहा, “चलो यहां से!”

     

    लेकिन चांदनी ने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    चांदनी ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मुझे लगता है… वो हमें डराने नहीं, कुछ बताने आई थी।”

     

    दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगीं।

     

    ऊपर पहुंचकर उन्हें एक पुराना कमरा दिखाई दिया।

     

    दरवाजा आधा खुला था।

     

    चांदनी ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के बीच एक पुरानी मेज थी।

     

    मेज पर एक तस्वीर रखी थी।

     

    चांदनी ने टॉर्च की रोशनी तस्वीर पर डाली।

     

    तस्वीर देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    तस्वीर में वही लड़की थी जिसे उन्होंने सीढ़ियों पर देखा था।

     

    और तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “चांदनी — इस घर की आखिरी बेटी।”

     

    चांदनी कुछ समझ पाती, उससे पहले कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    गौरी चीख पड़ी।

     

    और उसी पल कमरे के अंधेरे में किसी लड़की की धीमी आवाज गूंजी—

     

    “तुम… आखिर आ ही गईं।”

     

    चांदनी ने कांपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    अंधेरे से जवाब आया—

     

    “तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”

     

    और कमरे में रखा पुराना दीपक अचानक जल उठा।

  • अनुसूइया और भंवरा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अनुसूइया और एक भंवरा

     

    एक छोटे से गांव के किनारे एक सुंदर-सा बगीचा था। उस बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले रहते थे। सुबह होते ही वहां तितलियां मंडराने लगतीं और भंवरे फूलों के आसपास गुनगुनाते रहते। उसी गांव में अनुसूइया नाम की एक सरल और दयालु लड़की रहती थी। उसे पेड़-पौधों और फूलों से बहुत प्यार था।

     

    अनुसूइया रोज सुबह उठकर अपने छोटे से बगीचे में पानी डालती और पौधों से बातें करती।

     

    एक दिन उसने देखा कि एक काला-सा भंवरा बार-बार एक ही फूल के आसपास मंडरा रहा है।

     

    अनुसूइया मुस्कुराकर बोली, “तुम रोज इसी फूल के पास क्यों आते हो?”

     

    भंवरा कुछ देर फूल पर बैठा, फिर उड़कर उसके सिर के ऊपर चक्कर लगाने लगा।

     

    अनुसूइया हंस पड़ी।

     

    “अच्छा! तो तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते हो?”

     

    भंवरा फिर उसके पास आकर मंडराने लगा।

     

    उस दिन के बाद वह भंवरा रोज अनुसूइया के बगीचे में आने लगा। अनुसूइया ने उसका नाम रख दिया—भौंरा।

     

    वह जब भी बगीचे में आती, भौंरा उसके आसपास गुनगुनाता रहता।

     

    एक दिन अनुसूइया ने कहा, “भौंरा, तुम सिर्फ मेरे बगीचे में ही क्यों आते हो? पूरे गांव में इतने फूल हैं।”

     

    जैसे ही उसने यह कहा, भौंरा उड़कर एक सूखे पौधे के पास चला गया।

     

    अनुसूइया उसके पीछे गई।

     

    वहां उसने देखा कि उस पौधे पर एक भी फूल नहीं था।

     

    अनुसूइया बोली, “इस पौधे पर तो कुछ भी नहीं है।”

     

    भौंरा उसी पौधे के पास मंडराता रहा।

     

    अनुसूइया को कुछ समझ नहीं आया।

     

    उसने उस पौधे को ध्यान से देखा। मिट्टी बहुत सूखी थी।

     

    “ओह! तुम मुझे बता रहे हो कि इसे पानी चाहिए?”

     

    उसने तुरंत पौधे में पानी डाल दिया।

     

    कुछ दिनों तक वह रोज उस पौधे की देखभाल करने लगी।

     

    एक सप्ताह बाद उस पर छोटी-सी कली निकल आई।

     

    अनुसूइया बहुत खुश हुई।

     

    “भौंरा! देखो, तुम्हारा पौधा फिर से खिलने वाला है।”

     

    भौंरा उसके चारों तरफ खुशी से उड़ने लगा।

     

    धीरे-धीरे वह पौधा फूलों से भर गया।

     

    अनुसूइया को अब यकीन हो गया था कि भौंरा सिर्फ फूलों का रस लेने नहीं आता था। जैसे उसे भी इस बगीचे की चिंता थी।

     

    लेकिन एक दिन गांव में तेज आंधी आई।

     

    आसमान अचानक काला हो गया।

     

    अनुसूइया ने जल्दी-जल्दी बगीचे के छोटे पौधों को बचाने की कोशिश की।

     

    “हे भगवान! मेरे सारे फूल खराब न हो जाएं।”

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएं हिलने लगीं।

     

    अनुसूइया एक पौधे को सहारा दे ही रही थी कि उसे भौंरे की आवाज सुनाई दी।

     

    वह चारों तरफ देखने लगी।

     

    “भौंरा? तुम कहां हो?”

     

    भौंरा एक पेड़ के नीचे फंसा हुआ था।

     

    अनुसूइया दौड़कर वहां पहुंची।

     

    हवा बहुत तेज थी, लेकिन उसने सावधानी से एक सूखी टहनी हटाई।

     

    भौंरा बाहर निकल आया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    भौंरा कुछ देर उसके हाथ के पास मंडराता रहा।

     

    अनुसूइया मुस्कुराई।

     

    “डर गए थे ना?”

     

    बारिश शुरू हो गई।

     

    अनुसूइया भौंरे को एक पत्ते के नीचे सुरक्षित जगह पर ले गई।

     

    उस रात उसने बगीचे में ही काफी देर तक पौधों को संभाला।

     

    सुबह जब बारिश रुकी, तो बगीचे की हालत खराब थी।

     

    कई फूल टूट गए थे।

     

    कुछ पौधे जमीन पर गिर गए थे।

     

    अनुसूइया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इतनी मेहनत की थी… सब खराब हो गया।”

     

    तभी भौंरा उसके पास आया।

     

    वह एक फूल के ऊपर बैठा और फिर उड़कर दूसरे पौधे पर गया।

     

    अनुसूइया उसे देखते हुए बोली, “तुम कह रहे हो कि मुझे हार नहीं माननी चाहिए?”

     

    भौंरा उसके आसपास घूमने लगा।

     

    अनुसूइया ने आंसू पोंछे।

     

    “ठीक है। मैं फिर से शुरू करूंगी।”

     

    उसने अगले दिन से बगीचे को दोबारा ठीक करना शुरू किया।

     

    गांव के कुछ बच्चे भी उसकी मदद करने लगे।

     

    किसी ने पौधे लगाए, किसी ने मिट्टी ठीक की और किसी ने पानी दिया।

     

    कुछ ही दिनों में बगीचा फिर से हरा होने लगा।

     

    लेकिन उसी दौरान गांव में एक समस्या खड़ी हो गई।

     

    गांव के लोगों ने देखा कि इस साल फूलों और फलों की संख्या बहुत कम हो रही है।

     

    गांव के बुजुर्ग बोले, “लगता है मौसम ठीक नहीं है।”

     

    अनुसूइया ने अपने बगीचे में देखा।

     

    उसे याद आया कि जब भौंरे और तितलियां फूलों के पास आती हैं, तो कुछ समय बाद पौधों पर फल और बीज बनने लगते हैं।

     

    उसने गांव वालों से कहा, “हमें अपने बगीचों में ऐसे पौधे लगाने चाहिए जिन पर भंवरे और तितलियां आ सकें।”

     

    कुछ लोग उसकी बात पर हंसने लगे।

     

    “एक भंवरे से गांव की खेती चलेगी क्या?”

     

    अनुसूइया चुप रही।

     

    उसने किसी से बहस नहीं की।

     

    उसने अपने बगीचे में अलग-अलग फूल लगाने शुरू कर दिए।

     

    गेंदा, सूरजमुखी, चमेली और कई दूसरे फूल।

     

    कुछ समय बाद उसके बगीचे में फिर से भंवरे और तितलियां आने लगीं।

     

    धीरे-धीरे उसके पौधों पर फल और बीज भी आने लगे।

     

    गांव के लोगों ने यह देखा तो उन्हें अपनी गलती समझ आई।

     

    एक बुजुर्ग किसान अनुसूइया के पास आए।

     

    “बेटी, तुम सही कह रही थी।”

     

    अनुसूइया मुस्कुराई।

     

    “मैं नहीं, भौंरा सही था।”

     

    किसान हंस पड़े।

     

    “भौंरा?”

     

    अनुसूइया ने सिर हिलाया।

     

    “हां। उसी ने मुझे सिखाया कि छोटी-सी चीज भी बड़ी मदद कर सकती है।”

     

    उस दिन से गांव के लोगों ने अपने घरों के आसपास फूलों के पौधे लगाने शुरू कर दिए।

     

    कुछ महीनों बाद पूरा गांव फूलों से भर गया।

     

    भंवरे और तितलियां हर तरफ दिखाई देने लगे।

     

    अनुसूइया का छोटा-सा बगीचा अब गांव के लिए मिसाल बन चुका था।

     

    लेकिन एक सुबह भौंरा दिखाई नहीं दिया।

     

    अनुसूइया ने पूरा बगीचा देख लिया।

     

    “भौंरा… कहां हो तुम?”

     

    वह पेड़ों के पास गई, फूलों के पास गई, लेकिन भौंरा कहीं नहीं था।

     

    दो दिन बीत गए।

     

    अनुसूइया उदास रहने लगी।

     

    तीसरे दिन सुबह वह उसी पुराने पौधे के पास गई, जिसे उसने कभी भौंरे के कहने पर पानी दिया था।

     

    वह पौधा अब बहुत बड़ा हो चुका था।

     

    उस पर अनगिनत फूल खिले थे।

     

    अचानक उसे वही परिचित गुनगुनाहट सुनाई दी।

     

    “गुं… गुं…”

     

    अनुसूइया ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    भौंरा उसके सामने मंडरा रहा था।

     

    उसकी आंखों में खुशी आ गई।

     

    “तुम आ गए!”

     

    भौंरा एक फूल पर बैठा और फिर उड़कर उसके कंधे के पास आ गया।

     

    अनुसूइया हंसते हुए बोली, “तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकते।”

     

    भौंरा जैसे उसकी बात समझ रहा हो, फिर उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगा।

     

    अनुसूइया ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “कभी-कभी भगवान हमारी जिंदगी में किसी इंसान के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटी-सी निशानी के रूप में खुशी भेजते हैं।”

     

    उसके लिए वह भंवरा सिर्फ एक कीड़ा नहीं था।

     

    वह उसका छोटा-सा दोस्त था, जिसने उसे सिखाया था कि किसी चीज को छोटा समझकर उसकी अहमियत नहीं भूलनी चाहिए।

     

    उस दिन से अनुसूइया जब भी अपने बगीचे में आती, सबसे पहले उसकी नजर फूलों पर जाती और फिर वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “भौंरा, आज फिर कुछ नया सिखाने आए हो क्या?”

     

    और बगीचे में गूंजती उसकी प्यारी-सी गुनगुनाहट जैसे जवाब देती—

     

    “गुं… गुं…”

  • सच की जीत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 3: सच की जीत

     

    अगली सुबह शौर्य बहुत जल्दी उठ गया। रातभर उसके दिमाग में वही संदेश घूमता रहा था—

     

    “अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

     

    वह तैयार होकर चुपचाप घर से निकलने लगा।

     

    तभी पीछे से कबीर की आवाज आई, “इतनी सुबह कहां जा रहा है?”

     

    शौर्य पलटा।

     

    “तू यहां?”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था तू अकेला जाने की कोशिश करेगा।”

     

    शौर्य ने कहा, “मैसेज में साफ लिखा था कि अकेले आना है।”

     

    कबीर बोला, “और मैंने तय किया था कि इस बार तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    शौर्य ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन कबीर नहीं माना।

     

    दोनों पुराने पुल की तरफ चल पड़े।

     

    पुल के पास पहुंचकर शौर्य ने चारों तरफ देखा। वहां कोई नहीं था।

     

    “शायद जिसने मैसेज किया था, वो आया नहीं।”

     

    कबीर बोला, “या फिर हमें देख रहा है।”

     

    शौर्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डराने की जरूरत नहीं है।”

     

    “मैं डर नहीं रहा। बस तेरी नादानियों का अनुभव है।”

     

    दोनों कुछ देर इंतजार करते रहे।

     

    तभी पीछे से किसी ने आवाज लगाई।

     

    “शौर्य!”

     

    शौर्य पलटा।

     

    रघुवीर वहां खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी फाइल थी।

     

    शौर्य तुरंत उसके पास गया।

     

    “आपने मुझे यहां बुलाया था?”

     

    रघुवीर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    शौर्य ने पूछा, “कल आपने उस घर में मुझे वो चाबी क्यों दी थी?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि अब समय आ गया है कि तुम्हें पूरा सच पता चले।”

     

    कबीर ने पूछा, “आप इतने सालों से चुप क्यों थे?”

     

    रघुवीर कुछ पल शांत रहा।

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    शौर्य ने हैरानी से पूछा, “आप?”

     

    “हां। मैं भी उस समय तुम्हारे पिता के साथ था। लेकिन जब मुश्किल आई, तो मैंने उनका साथ छोड़ दिया।”

     

    रघुवीर ने फाइल शौर्य की तरफ बढ़ा दी।

     

    “इसमें सबूत हैं।”

     

    शौर्य ने फाइल खोली।

     

    अंदर कई पुराने कागज, रसीदें और कुछ तस्वीरें थीं।

     

    एक दस्तावेज पर उसके पिता के हस्ताक्षर थे।

     

    उसके पिता के नाम पर जिस रकम की हेराफेरी का आरोप लगाया गया था, वह रकम असल में किसी दूसरे खाते में भेजी गई थी।

     

    शौर्य की आंखें फैल गईं।

     

    “तो पापा ने पैसे नहीं चुराए थे?”

     

    “नहीं।”

     

    अनाया भी वहां पहुंच गई।

     

    “मेरे पिता भी निर्दोष थे?”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां। तुम्हारे पिता ने जब सच्चाई पता करने की कोशिश की, तो उन्हें धमकाया गया।”

     

    अनाया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “उन्होंने हमें कुछ क्यों नहीं बताया?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि उन्हें डर था कि सच की कीमत तुम्हारे परिवार को चुकानी पड़ेगी।”

     

    शौर्य ने फाइल के आखिरी पन्ने पर एक नाम देखा।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “ये… विक्रम?”

     

    रघुवीर ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    शौर्य को सब याद आने लगा।

     

    विक्रम उसके पिता का पुराना बिजनेस पार्टनर था। बचपन में वह कई बार उनके घर आता था। शौर्य उसे हमेशा अपने पिता का बहुत अच्छा दोस्त समझता था।

     

    “लेकिन वो तो हमारे परिवार के साथ हमेशा अच्छा रहा।”

     

    रघुवीर ने कहा, “यही तो उसकी सबसे बड़ी चाल थी।”

     

    उसी समय पीछे से ताली बजने की आवाज आई।

     

    ताली…

     

    ताली…

     

    तीनों ने पीछे देखा।

     

    विक्रम वहां खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    “बहुत अच्छा। आखिरकार तुम लोगों ने सच ढूंढ ही लिया।”

     

    शौर्य उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “आपने मेरे पापा को फंसाया।”

     

    विक्रम ने कहा, “तुम्हारे पिता बहुत भरोसा करते थे। और भरोसा करने वाले लोग अक्सर सबसे आसानी से धोखा खा जाते हैं।”

     

    शौर्य गुस्से में था, लेकिन उसने खुद को संभाला।

     

    “आपने अनाया के पिता की जिंदगी भी बर्बाद कर दी।”

     

    “मुझे अपना फायदा देखना था।”

     

    कबीर ने गुस्से से कहा, “आपको शर्म नहीं आती?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “शर्म से पैसा नहीं मिलता।”

     

    शौर्य ने फाइल उठाकर कहा, “लेकिन अब आपका सच सबके सामने आएगा।”

     

    विक्रम ने कहा, “तुम्हारे पास सबूत हैं, लेकिन क्या तुम साबित कर पाओगे?”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “इस बार मैंने नादानी नहीं की।”

     

    रघुवीर ने अपने फोन में रिकॉर्डिंग दिखाई।

     

    उसने विक्रम की पूरी बात रिकॉर्ड कर ली थी।

     

    विक्रम का चेहरा उतर गया।

     

    “तुमने ये सब रिकॉर्ड किया?”

     

    रघुवीर बोला, “हां। इतने साल डरने के बाद अब सच बोलने की हिम्मत आ गई है।”

     

    विक्रम पीछे हटने लगा।

     

    लेकिन शौर्य ने कहा, “अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”

     

    कुछ ही समय बाद पूरा मामला जांच के सामने पहुंचा।

     

    पुराने दस्तावेज और रिकॉर्डिंग ने सारी सच्चाई सामने ला दी।

     

    विक्रम के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई।

     

    शौर्य के पिता पर लगे सारे पुराने आरोप भी झूठे साबित हुए।

     

    जब शौर्य घर पहुंचा और अपनी मां को पूरी बात बताई, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम्हारे पापा आज होते तो तुम पर गर्व करते।”

     

    शौर्य ने मां को गले लगा लिया।

     

    “मां, मैंने बस उनका नाम साफ किया है।”

     

    मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू बदल गया है शौर्य।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “इतना भी नहीं।”

     

    तभी रिया बाहर से चिल्लाई—

     

    “मां! भैया ने फिर से रसोई में दूध गिरा दिया!”

     

    शौर्य ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कबीर जोर से हंसने लगा।

     

    “देखा? मैंने कहा था, नादानियां खत्म नहीं हुईं।”

     

    शौर्य ने कहा, “वो गलती से हुआ था।”

     

    रिया बोली, “भैया की हर गलती गलती से ही होती है।”

     

    पूरा घर हंसी से भर गया।

     

    कुछ दिनों बाद अनाया ने पुराने घर को दोबारा ठीक करवाने का फैसला किया।

     

    वह घर अब डरावना नहीं लगता था।

     

    वहीं एक छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू की गई, जहां आसपास के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाया जाने लगा।

     

    शौर्य भी रोज वहां मदद करने जाता।

     

    एक दिन अनाया ने उससे कहा, “अगर तुम उस दिन मेरी मदद करने नहीं आते, तो शायद मुझे अपने पिता का सच कभी नहीं पता चलता।”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस रास्ता दिखाने आया था।”

     

    अनाया बोली, “तुम हमेशा ऐसे ही कहते हो। पहले फूलदान तोड़ते हो, फिर साइकिल ठीक करते हो और आखिर में लोगों की जिंदगी का राज खोज निकालते हो।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “क्या करूं? मेरी नादानियां ही ऐसी हैं।”

     

    कबीर पास खड़ा सुन रहा था।

     

    उसने कहा, “एक बात माननी पड़ेगी। तेरी नादानियों ने इस बार बहुत अच्छा काम किया।”

     

    शौर्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अब मैं पहले जैसा नहीं रहूंगा।”

     

    कबीर ने पूछा, “मतलब?”

     

    “अब कोई भी काम करने से पहले दो बार सोचूंगा।”

     

    उसी वक्त रिया वहां पहुंची।

     

    “भैया, मां ने कहा है कि घर जाते समय सब्जियां लेते आना।”

     

    शौर्य बोला, “ठीक है।”

     

    रिया ने कहा, “और इस बार पैसे मत खो देना।”

     

    कबीर हंसने लगा।

     

    शौर्य ने झुंझलाकर कहा, “एक बार पैसे गिरे थे बस!”

     

    रिया बोली, “तीन बार।”

     

    शौर्य चुप हो गया।

     

    अनाया और कबीर दोनों हंस पड़े।

     

    शौर्य ने आसमान की तरफ देखा।

     

    उसकी जिंदगी में बहुत कुछ बदल चुका था।

     

    पहले वह अपनी नादानियों को सिर्फ अपनी कमजोरी समझता था। लेकिन अब उसे पता था कि गलती करना बुरा नहीं, गलती से सीखना जरूरी है।

     

    उसकी जल्दबाजी ने उसे कई बार मुसीबत में डाला था, लेकिन उसी ने उसे अनाया से मिलाया, पुराने राज तक पहुंचाया और उसके पिता का नाम साफ करने का मौका दिया।

     

    अब शौर्य पहले जैसा लापरवाह नहीं था।

     

    वह जिम्मेदारी समझने लगा था।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान और उसकी मासूम नादानियां अब भी उसके साथ थीं।

     

    शाम को घर लौटते समय उसने रास्ते में एक छोटे बच्चे को गिरा हुआ देखा।

     

    वह तुरंत उसकी मदद करने दौड़ा।

     

    कबीर ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    • “शौर्य! पहले देख लेना कि इस बार किसी मुसीबत में तो नहीं कूद रहा!”

     

    शौर्य हंसते हुए बोला—

     

    “मुसीबत हो या मदद… अगर किसी को मेरी जरूरत होगी, तो मैं जरूर जाऊंगा।”

     

    और वह बच्चे को उठाकर उसके घर की तरफ चल पड़ा।

     

    शौर्य की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई थी।

     

    क्योंकि उसकी नादानियां अभी बाकी थीं…

     

    समाप्त।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 24

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 24

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 24 : क्या विराज ही आरोही का असली पिता है?

     

    विराज की बात सुनकर समुद्र किनारे खड़े सभी लोगों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”

     

    आरोही की आंखें विराज के चेहरे पर जम गईं।

     

    उसके होंठ कांपने लगे।

     

    “नहीं…”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “हां, आरोही।”

     

    “आप झूठ बोल रहे हैं।”

     

    “मैं झूठ क्यों बोलूंगा?”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “मेरे पिता अर्जुन थे।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अर्जुन ने तुम्हें पाला था। लेकिन तुम्हें जन्म मैंने दिया।”

     

    अर्जुन अचानक आगे बढ़े।

     

    “विराज!”

     

    विराज ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्यों अर्जुन? अब सच सुनकर डर लग रहा है?”

     

    अर्जुन की आंखों में गुस्सा था।

     

    “तुम्हें पिता कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “खून का रिश्ता अधिकार नहीं मांगता।”

     

    आरव तुरंत आरोही के सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “बस।”

     

    विराज ने उसे देखा।

     

    “तुम बीच में क्यों आ रहे हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि वो अकेली नहीं है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “आरव… मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “जो भी सच होगा, हम साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    “मां, आप बताइए।”

     

    नंदिनी चुप रहीं।

     

    “क्या विराज सच बोल रहा है?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उन्होंने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    आरोही का दिल टूट गया।

     

    “मतलब…?”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “हां… विराज तुम्हारा जैविक पिता है।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन आरोही ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

     

    “मेरे पिता अर्जुन थे।”

     

    अर्जुन की आंखों में दर्द था।

     

    “और हमेशा रहेंगे।”

     

    विराज ने कड़वाहट से कहा,

     

    “तुम्हें क्या पता पिता होने का मतलब?”

     

    अर्जुन ने जवाब दिया,

     

    “उतना पता है जितना तुम्हें कभी नहीं होगा।”

     

    “तुमने मेरी बेटी को मुझसे दूर किया।”

     

    “क्योंकि तुम उसके लायक नहीं थे।”

     

    विराज की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “तुम्हारी वजह से मैंने उसे पच्चीस साल दूर से देखा।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “और मैंने पच्चीस साल उसे तुम्हारी सच्चाई से बचाया।”

     

    आरोही ने दोनों की तरफ देखा।

     

    उसका सिर चकराने लगा।

     

    “मुझे अकेला छोड़ दीजिए…”

     

    वह पीछे हटने लगी।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “आरोही।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    “मुझे थोड़ी देर अकेले रहना है।”

     

    आरव रुक गया।

     

    लेकिन उसकी नजर आरोही से नहीं हटी।

     

    विराज ने समुद्र की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं सिर्फ एक खलनायक हूं?”

     

    किसी ने जवाब नहीं दिया।

     

    “नंदिनी और मैं एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “फिर?”

     

    “फिर अर्जुन हमारे बीच आ गया।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “झूठ।”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा यही कहते रहे।”

     

    फिर वह आरोही की तरफ मुड़ा।

     

    “जब तुम्हारी मां को पता चला कि वो तुम्हारे साथ गर्भवती है, मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहता था।”

     

    नंदिनी बोलीं,

     

    “तुम मुझे अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे। तुम मुझे अपने कारोबार और ताकत का हिस्सा बनाना चाहते थे।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    नंदिनी आगे बोलीं,

     

    “तुम्हें सिर्फ अपना नाम चाहिए था।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लेकिन वो मेरी बेटी थी।”

     

    “तुम्हारी बेटी होने से ज्यादा उसे एक इंसान बनने का अधिकार था।”

     

    विराज की आंखों में कुछ पल के लिए दर्द दिखाई दिया।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “और मैंने वो अधिकार उसे कभी नहीं दिया?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने अर्जुन की तरफ देखा।

     

    “अगर आप मेरे पिता नहीं थे… तो आपने मुझे इतना प्यार क्यों किया?”

     

    अर्जुन की आंखें भर आईं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें पहली बार अपनी बाहों में लिया था।”

     

    “और?”

     

    “उस दिन मैंने तय कर लिया था कि चाहे दुनिया मुझे तुम्हारा पिता माने या न माने… मैं तुम्हारा पिता बनकर रहूंगा।”

     

    आरोही रोने लगी।

     

    “तो आपने मुझे कभी झूठ नहीं बताया?”

     

    अर्जुन चुप हो गए।

     

    आरोही ने फिर पूछा,

     

    “आपने मेरे पिता की सच्चाई मुझसे छुपाई।”

     

    अर्जुन ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि विराज तुम्हें ढूंढ लेगा।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “और उसने मुझे ढूंढने नहीं दिया।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम खतरनाक थे।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मैं आज भी हूं।”

     

    अचानक दूर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    सब चौंक गए।

     

    गोली पास की चट्टान से टकराई।

     

    अभय ने तुरंत सबको नीचे झुकाया।

     

    “सब नीचे!”

     

    विराज के साथ आए लोग चारों तरफ फैल गए।

     

    कबीर ने बंदूक निकाली।

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “पहले आरोही।”

     

    आरव ने तुरंत आरोही का हाथ पकड़ा।

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    आरोही इस बार उसके साथ चल पड़ी।

     

    दोनों एक चट्टान के पीछे छिप गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “मेरे पिता…”

     

    “अर्जुन तुम्हारे पिता हैं।”

     

    “लेकिन खून से?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “खून से क्या होता है?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे लिए?”

     

    “मेरे लिए जिसने मुझे पाला, वो मेरे पिता हैं।”

     

    “और अगर वो भी झूठ निकले?”

     

    आरव ने उसका चेहरा अपनी तरफ किया।

     

    “तो भी मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तुम हमेशा मेरे साथ क्यों रहते हो?”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि शायद मैं तुम्हें छोड़ना चाहता ही नहीं।”

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “अगर हमारे परिवारों की वजह से हमारा रिश्ता गलत साबित हुआ तो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो दुनिया से लड़ेंगे।”

     

    “और अगर हमारे परिवार हमें अलग करना चाहें?”

     

    “तो उनसे भी लड़ेंगे।”

     

    “अगर तुम्हारे पिता?”

     

    “उनसे भी।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “और अगर मैं खुद कहूं कि मुझसे दूर चले जाओ?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तब भी पहले पूछूंगा कि तुम सच में चाहती हो या डर की वजह से कह रही हो।”

     

    आरोही हल्का सा मुस्कुराई।

     

    “तुम बहुत जिद्दी हो।”

     

    “तुम्हारे मामले में हूं।”

     

    तभी एक गोली उनके पास से निकल गई।

     

    दोनों तुरंत नीचे झुक गए।

     

    आरव ने आरोही को अपनी बाहों में ढक लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    “चलो।”

     

    दूसरी तरफ विराज ने शेखर को घेर लिया था।

     

    “अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    “लाल फाइल।”

     

    शेखर चुप रहा।

     

    “मुझे पता है कि फाइल तुम्हारे पास है।”

     

    “नहीं।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तो फिर आरव को मार दूंगा।”

     

    शेखर ने पहली बार घबराकर उसकी तरफ देखा।

     

    “उसे हाथ मत लगाना।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “यही तो तुम्हारी कमजोरी है।”

     

    “आरव को इसमें मत घसीटो।”

     

    “वो पहले से इसमें है।”

     

    विराज ने बंदूक शेखर की तरफ कर दी।

     

    “फाइल कहां है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “मैं सच बोल रहा हूं।”

     

    विराज ने गोली चलाने के लिए उंगली ट्रिगर पर रखी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    विराज पलटा।

     

    आरव सामने खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    आरोही उसके पीछे थी।

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “तुम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “तुम मुझे गोली मारोगे?”

     

    “अगर जरूरत पड़ी तो।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अपने पिता के सामने?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पिता वो हैं जिन्होंने मुझे बचाया।”

     

    शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    शेखर ने आरव की तरफ देखा।

     

    “बंदूक नीचे कर दो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आज कोई आपको नुकसान नहीं पहुंचाएगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हें अपनी जिंदगी खतरे में नहीं डालनी चाहिए।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “आपने मेरी जिंदगी बचाने के लिए पच्चीस साल अकेले गुजारे। आज मेरी बारी है।”

     

    शेखर की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैंने आपको पिता मान लिया है।”

     

    विराज ने ताना मारा,

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “खून से नहीं… कर्म से।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “बहुत भावुक हो गए।”

     

    फिर उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “लेकिन तुम्हें एक बात नहीं पता।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लाल फाइल में सिर्फ तुम्हारे पिता का सच नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    “उसमें तुम्हारी मां की मौत का सच भी है।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “मेरी मां?”

     

    विराज ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    “नंदिनी ने तुम्हें बताया कि वो तुमसे दूर क्यों हुई?”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    नंदिनी चुप थीं।

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि उसने तुम्हें बचाने के लिए नहीं…”

     

    वह थोड़ा रुका।

     

    “बल्कि क्योंकि उसने तुम्हारे जन्म की रात एक ऐसा काम किया था, जिसकी सजा उसे आज तक भुगतनी पड़ रही है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या काम?”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “आरोही…”

     

    “मां, सच बताइए।”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने उस रात…”

     

    वह आगे बोल नहीं पाईं।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “नंदिनी, अभी नहीं।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “नहीं! आज सब सच बताइए।”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा “तुम्हारे जन्म के कुछ मिनट बाद मैंने अस्पताल से एक और बच्चा उठाया था।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “दूसरा बच्चा?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसका?”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “आरव का।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “मेरा?”

     

    नंदिनी ने कहा “तुम्हें तुम्हारी मां से अलग करके मैंने ही दूसरी जगह पहुंचाया था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “नंदिनी… तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं “क्योंकि उस रात किसी ने मुझे मजबूर किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए विराज की तरफ देखा।

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अब सच सामने आ गया।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तुमने मेरी मां से मुझे छीन लिया?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    उसने धीरे से कहा “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    आरव ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

     

    और तभी…

     

    पीछे से एक और गोली चली।

     

    इस बार गोली…

     

    शेखर के सीने में जा लगी।

     

    “पापा!”

     

    आरव चीख उठा।

     

    शेखर जमीन पर गिर पड़े।

     

    आरोही ने भी चीख मार दी।

     

    नंदिनी रोने लगीं।

     

    विराज ने तुरंत पीछे देखा।

     

    लेकिन गोली चलाने वाला…

     

    विराज का आदमी नहीं था।

     

    वह आदमी अंधेरे से बाहर आया।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    और उसने कहा “अब अगला नंबर आरव का है।”

     

    आरव ने शेखर को संभालते हुए ऊपर देखा।

     

    उस आदमी का चेहरा देखकर…

     

    विराज भी स्तब्ध रह गया।

     

    “तुम…?”

     

    जारी रहेगा…

  • बंद कमरे का राज

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 2: बंद कमरे का राज

     

    अंदर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनकर शौर्य कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “भाई… अंदर कोई है।”

     

    शौर्य ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “मुझे भी यही लग रहा है।”

     

    अनाया ने उसका हाथ रोकते हुए कहा, “दरवाजा मत खोलो।”

     

    शौर्य बोला, “लेकिन अगर अंदर कोई फंसा हुआ है तो?”

     

    कबीर ने माथा पीट लिया।

     

    “तू सुधरने वाला नहीं है।”

     

    शौर्य ने धीरे से दरवाजा खोल दिया।

     

    दरवाजा खुलते ही तीनों की नजर कमरे के अंदर गई।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    अंदर पुरानी अलमारी, एक मेज और कुछ लकड़ी के बक्से रखे थे। खिड़की आधी खुली हुई थी और हवा के कारण पर्दा हिल रहा था।

     

    कबीर ने तुरंत कहा, “मैंने कहा था ना, यहां कुछ गड़बड़ है।”

     

    शौर्य खिड़की के पास गया।

     

    “शायद हवा से कोई चीज हिली होगी।”

     

    कबीर बोला, “और दरवाजा किसने खटखटाया?”

     

    शौर्य ने मजाक करते हुए कहा, “शायद इस घर का चौकीदार भूत होगा।”

     

    “भाई!”

     

    अनाया ने दोनों को चुप कराया।

     

    “मजाक बंद करो। हमें यहां कुछ ढूंढना है।”

     

    वह धीरे-धीरे कमरे में आगे बढ़ी। तभी उसकी नजर मेज पर रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

     

    डायरी के ऊपर उसके पिता का नाम लिखा था।

     

    अनाया ने डायरी उठा ली।

     

    उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    शौर्य उसके पास आकर बोला, “खोलो।”

     

    अनाया ने पहला पन्ना खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर यह डायरी मेरी बेटी के हाथ लगे, तो उसे सच जरूर बताना।”

     

    अनाया की आंखें भर आईं।

     

    “ये मेरे पापा की लिखावट है।”

     

    शौर्य चुपचाप उसके पास खड़ा रहा।

     

    डायरी के अगले पन्नों में कई साल पुरानी बातें लिखी थीं। उसके पिता और शौर्य के पिता बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों ने मिलकर एक छोटा कारोबार शुरू किया था। शुरुआत में सब ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ साल बाद अचानक कारोबार में बड़ा नुकसान हो गया।

     

    सारा दोष दोनों दोस्तों पर लगाया गया।

     

    अनाया के पिता ने खुद को दोषी समझ लिया और परिवार से दूर चले गए।

     

    लेकिन डायरी में आगे लिखा था कि उन्हें बाद में पता चला था कि कारोबार में असली गड़बड़ी किसी तीसरे आदमी ने की थी।

     

    अनाया ने पन्ना पलटा।

     

    एक जगह लिखा था—

     

    “गलती मेरी नहीं थी। असली धोखा उस आदमी ने दिया था जिस पर हमने सबसे ज्यादा भरोसा किया।”

     

    शौर्य ने पूछा, “कौन आदमी?”

     

    डायरी में नाम नहीं था।

     

    अनाया ने अगले पन्ने पलटे, लेकिन कई पन्ने फाड़े हुए थे।

     

    शौर्य बोला, “किसी ने जानबूझकर ये पन्ने निकाले हैं।”

     

    तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    कबीर ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “कोई बाहर है।”

     

    शौर्य ने इशारे से उसे शांत रहने को कहा।

     

    वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया और बाहर झांका।

     

    गलियारा खाली था।

     

    शौर्य वापस कमरे में आया।

     

    “कोई नहीं है।”

     

    कबीर बोला, “अभी मैंने साफ कदमों की आवाज सुनी थी।”

     

    अनाया ने डायरी बंद करते हुए कहा, “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

     

    शौर्य ने कहा, “पहले देखते हैं कि इस कमरे में और क्या है।”

     

    वह पुराने बक्से खोलने लगा।

     

    पहले बक्से में पुराने कपड़े थे।

     

    दूसरे में कुछ तस्वीरें।

     

    तीसरे बक्से में एक लिफाफा था।

     

    शौर्य ने लिफाफा उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “शौर्य के पिता के लिए।”

     

    शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पुराना कागज था।

     

    उसमें लिखा था कि अगर कभी सच्चाई सामने लानी पड़े तो कुछ खास दस्तावेज एक पुराने पुल के पास छिपाए गए हैं।

     

    कबीर ने पूछा, “पुराना पुल?”

     

    शौर्य ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    तभी नीचे से अचानक किसी ने आवाज लगाई।

     

    “शौर्य!”

     

    शौर्य चौंक गया।

     

    “ये मां की आवाज है।”

     

    वह जल्दी से नीचे भागा।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर उसकी मां नहीं थीं।

     

    बल्कि एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।

     

    उसने शौर्य को देखते ही कहा, “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

     

    शौर्य ने पूछा, “आप कौन हैं?”

     

    आदमी ने अपना नाम रघुवीर बताया।

     

    “मैं तुम्हारे पिता का पुराना दोस्त हूं।”

     

    शौर्य ने तुरंत पूछा, “आप मेरे पापा को जानते थे?”

     

    रघुवीर ने नजरें झुका लीं।

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    अनाया भी नीचे आ गई।

     

    रघुवीर उसे देखते ही चौंक गया।

     

    “तुम…?”

     

    अनाया ने कहा, “मैं अपने पिता का सच जानने आई हूं।”

     

    रघुवीर कुछ देर तक चुप रहा।

     

    उसके चेहरे से लग रहा था कि वह कुछ ऐसा जानता है जो इतने सालों से किसी से छिपा रहा था।

     

    आखिर उसने धीमी आवाज में कहा, “तुम्हारे पिता बुरे आदमी नहीं थे।”

     

    “फिर उन्होंने घर क्यों छोड़ा?”

     

    रघुवीर ने लंबी सांस ली।

     

    “क्योंकि उन्हें फंसाया गया था।”

     

    शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “किसने?”

     

    रघुवीर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

     

    उसने पहले कमरे की तरफ देखा, फिर खिड़की के बाहर।

     

    “यह बात यहां नहीं होनी चाहिए।”

     

    शौर्य ने पूछा, “क्यों?”

     

    रघुवीर बोला, “क्योंकि जिस आदमी ने तुम्हारे परिवार को तोड़ा था, उसे पता चल चुका है कि तुम इस घर में आए हो।”

     

    कबीर घबरा गया।

     

    “लेकिन उसे कैसे पता चला?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि इस घर पर इतने सालों से नजर रखी जा रही है।”

     

    शौर्य ने हैरानी से पूछा, “किसकी?”

     

    रघुवीर कुछ बोलता, उससे पहले बाहर एक गाड़ी आकर रुकी।

     

    रघुवीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसका चेहरा अचानक घबरा गया।

     

    “तुम दोनों को यहां से जाना होगा।”

     

    शौर्य ने मना कर दिया।

     

    “नहीं। इस बार मैं भागूंगा नहीं।”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता भी यही कहते थे।”

     

    शौर्य चुप हो गया।

     

    रघुवीर ने जेब से एक छोटी सी चाबी निकाली और शौर्य को देते हुए कहा, “इसे संभालकर रखना। इसमें तुम्हारे पिता के सच तक पहुंचने का रास्ता है।”

     

    शौर्य ने चाबी को देखा।

     

    “ये किसकी है?”

     

    रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

     

    ठक… ठक…

     

    रघुवीर फुसफुसाया, “पीछे के रास्ते से निकलो।”

     

    शौर्य ने पूछा, “और आप?”

     

    “मैं संभाल लूंगा।”

     

    शौर्य जाना नहीं चाहता था, लेकिन रघुवीर ने उसे धक्का देकर पीछे वाले रास्ते की तरफ भेज दिया।

     

    तीनों किसी तरह घर से बाहर निकल गए।

     

    कुछ दूर जाकर शौर्य ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    पुराना घर बिल्कुल शांत खड़ा था।

     

    लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि कोई खिड़की से उन्हें देख रहा है।

     

    रात को शौर्य घर लौटा तो उसकी मां दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    “कहां था?”

     

    शौर्य ने पहली बार अपनी मां से सब कुछ पूछने की ठानी।

     

    “मां, पापा और अनाया के पिता के बीच क्या हुआ था?”

     

    मां का चेहरा उतर गया।

     

    कुछ देर तक वह चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारे पापा ने हमेशा कहा था कि उस मामले को दोबारा मत छेड़ना।”

     

    “क्यों?”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा को डर था कि अगर सच बाहर आया, तो तुम्हारी जान खतरे में पड़ सकती है।”

     

    शौर्य सन्न रह गया।

     

    “मां, क्या आपको पता है कि असली गुनहगार कौन था?”

     

    मां ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर बोलीं, “नाम तो नहीं बता सकती… लेकिन एक आदमी था जिस पर तुम्हारे पापा आंख बंद करके भरोसा करते थे।”

     

    शौर्य को तुरंत रघुवीर की बात याद आई।

     

    उसने पूछा, “क्या वो आदमी अब भी हमारे आसपास है?”

     

    मां ने जवाब देने के बजाय कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “शौर्य, अब इस मामले से दूर रहो।”

     

    शौर्य ने कहा, “मां, मैं अब पीछे नहीं हट सकता।”

     

    उसी रात उसके फोन पर एक संदेश आया।

     

    “अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

     

    शौर्य ने संदेश पढ़ा।

     

    कबीर ने पूछा, “किसका मैसेज है?”

     

    शौर्य ने फोन बंद कर दिया।

     

    “पता नहीं।”

     

    लेकिन उसके चेहरे से साफ था कि वह जानता था—ये उसी राज से जुड़ा था।

     

    उसने खिड़की से बाहर देखा और मन ही मन कहा—

     

    “अब चाहे कुछ भी हो जाए, मैं पापा का नाम साफ करके रहूंगा।”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले दिन पुराने पुल पर उसका सामना उस इंसान से होने वाला था, जिसका नाम उसकी पूरी जिंदगी बदल देने वाला था।