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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 52 : नाना जिंदा थे, लेकिन कैद में क्यों?

    स्क्रीन पर दिखाई दे रहे उस चेहरे को देखकर आरव की आंखें जम गईं।

    वो चेहरा…

    जिसे उसने सिर्फ पुरानी तस्वीरों में देखा था।

    जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था कि उसकी मौत कई साल पहले हो चुकी है।

    उसके नाना।

    लेकिन आज वो सामने थे।

    जिंदा।

    और किसी अनजान जगह पर कैद।

    नैना की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

    “पापा…”

    स्क्रीन पर बैठे बूढ़े आदमी ने अपनी बेटी की आवाज सुनकर आंखें बंद कर लीं।

    फिर धीरे से कहा—

    “नैना… मेरी बच्ची।”

    नैना अपने आंसू रोक नहीं पाईं।

    “आपने हमें इतने साल क्यों नहीं बताया कि आप जिंदा हैं?”

    वो कुछ पल चुप रहे।

    फिर बोले—

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता… तो तुम सबको बचाना मुश्किल हो जाता।”

    आरव आगे बढ़ा।

    “नाना… आपको किसने कैद किया है?”

    स्क्रीन के पीछे खड़ा विक्रम मुस्कुराया।

    “अभी इतनी जल्दी क्यों?”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “विक्रम!”

    “उन्हें छोड़ दो।”

    विक्रम ने कहा—

    “तुम मुझे आदेश देने की स्थिति में नहीं हो।”

    “तुम्हारे नाना के पास वो आखिरी राज है, जिसकी तलाश में तुम लोग पिछले पच्चीस साल से भटक रहे हो।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन-सा राज?”

    विक्रम ने मुस्कुराकर कहा—

    “तुम्हारे जन्म का।”


    नाना ने बताई सच्चाई

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “नाना, क्या ये सच कह रहा है?”

    नाना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

    “हां।”

    तीनों भाइयों के चेहरे पर सवाल थे।

    नाना ने कहा—

    “तुम तीनों का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था।”

    “लेकिन तुम्हारे जन्म के कुछ ही समय बाद मुझे पता चला कि हमारे परिवार के खिलाफ एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है।”

    विहान ने पूछा—

    “किसका?”

    “विक्रम का।”

    विक्रम हंसा।

    “अधूरी कहानी मत सुनाओ।”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “आज मैं पूरी कहानी बताऊंगा।”

    विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया।


    पच्चीस साल पुराना राज

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता अभय और समर एक ही काम पर थे।”

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के गैरकानूनी कारोबार के सबूत जुटाए थे।”

    आरव ने पूछा—

    “फिर?”

    “विक्रम को इसका पता चल गया।”

    “उसने पहले समर को निशाना बनाया।”

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

    “मेरे पापा…”

    नाना ने कहा—

    “समर ने अपनी बेटी को बचाने के लिए सबूत तुम्हारे पास रखे।”

    “लेकिन विक्रम ने उसे ढूंढ लिया।”

    आरोही ने पूछा—

    “तो पापा ने मेरे लॉकेट में चाबी क्यों छुपाई?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि वो जानता था कि अगर उसे कुछ हो गया… तो एक दिन तुम बड़ी होकर उस सच तक पहुंचोगी।”

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।


    अभय की बारी

    नाना आगे बोले—

    “जब विक्रम ने अभय को खत्म करने की कोशिश की, तब अभय ने अपनी मौत का नाटक किया।”

    अभय ने सिर झुका लिया।

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “पापा…”

    अभय ने कहा—

    “मुझे तुम्हें सच बताना चाहिए था।”

    आरव की आवाज भर्रा गई।

    “आपने इतने साल हमसे दूरी क्यों रखी?”

    अभय ने कहा—

    “क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

    “मुझे डर था कि अगर विक्रम को पता चला कि तुम मेरे बच्चे हो… तो वो तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा।”

    आरव ने कहा—

    “लेकिन मैं आपका बेटा हूं।”

    “मुझे आपकी जरूरत थी।”

    अभय की आंखें भर आईं।

    “मुझे भी तुम्हारी जरूरत थी, बेटा।”

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ खामोशी थी।

    फिर आरव ने आगे बढ़कर अपने पिता को गले लगा लिया।

    अभय ने उसे कसकर पकड़ लिया।


    नाना की असली योजना

    अमन ने पूछा—

    “अगर आप सब जानते थे तो हमें तीन अलग-अलग चाबियां क्यों दी गईं?”

    नाना मुस्कुराए।

    “क्योंकि मैंने जानबूझकर ऐसा किया।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि मैं जानता था कि अगर एक व्यक्ति के पास पूरा राज होगा, तो विक्रम उसे खत्म कर देगा।”

    “इसलिए मैंने राज को तीन हिस्सों में बांट दिया।”

    विहान ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।

    “और ये तीसरी चाबी?”

    नाना ने कहा—

    “हां।”

    “तीनों चाबियां मिलकर एक दरवाजा खोलती हैं।”

    आरव ने पूछा—

    “कहां का?”

    नाना ने कहा—

    “पुराने महल के नीचे बने गुप्त तहखाने का।”

    देवेंद्र अचानक बोल पड़ा—

    “वही तहखाना?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “हां, देवेंद्र।”

    देवेंद्र का चेहरा गंभीर हो गया।

    आरव ने पूछा—

    “आप उस जगह के बारे में जानते हैं?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “हां।”

    “लेकिन मैंने सोचा था वो जगह हमेशा के लिए बंद हो चुकी है।”

    नाना ने कहा—

    “वो कभी बंद नहीं हुई।”

    “वो सिर्फ सही लोगों का इंतजार कर रही थी।”


    विक्रम क्यों डरा हुआ था?

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “अगर उस तहखाने में इतना बड़ा राज है, तो विक्रम हमें वहां जाने क्यों नहीं दे रहा?”

    विक्रम ने तुरंत कहा—

    “क्योंकि वहां कुछ ऐसा है जिसे बाहर आना नहीं चाहिए।”

    आरव मुस्कुराया।

    “मतलब वहां हमारे खिलाफ कुछ नहीं… तुम्हारे खिलाफ है।”

    विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।

    नाना ने कहा—

    “बिल्कुल।”

    “वहां विक्रम के पूरे साम्राज्य के सबूत हैं।”

    “नाम।”

    “हिसाब।”

    “कागजात।”

    “और उन सभी लोगों के वीडियो, जिन्हें उसने रास्ते से हटाया।”

    अमन ने कहा—

    “तो फिर पुलिस को दे देते हैं।”

    नाना ने कहा—

    “अगर हम उस तहखाने तक पहुंच गए तो।”


    विक्रम का आखिरी दांव

    विक्रम ने कैमरे के सामने कदम बढ़ाया।

    “तुम लोग बहुत खुश हो रहे हो।”

    “लेकिन तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे नाना अभी मेरे कब्जे में हैं।”

    नैना ने गुस्से में कहा—

    “उन्हें छोड़ दो।”

    “तुम्हें जो चाहिए, मैं दूंगी।”

    विक्रम हंसा।

    “मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।”

    “मुझे सिर्फ आरव चाहिए।”

    नैना चौंक गईं।

    “आरव?”

    विक्रम ने कहा—

    “हां।”

    “क्योंकि उस तहखाने का आखिरी ताला वही खोल सकता है।”

    आरव ने पूछा—

    “मैं?”

    नाना ने आंखें बंद कर लीं।

    “मुझे डर था कि ये दिन आएगा।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैंने उस ताले में तुम्हारा खून इस्तेमाल किया था।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।


    आरव की विरासत

    आरव ने अविश्वास से पूछा—

    “मेरे खून का?”

    “हां।”

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम्हारे पिता की संपत्ति का असली वारिस तुम हो।”

    अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

    आरव ने कहा—

    “लेकिन हम तीनों भाई हैं।”

    “हां।”

    “तो सिर्फ मैं क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम सबसे बड़े हो।”

    “तुम्हारे पिता ने कानूनी वारिस के रूप में तुम्हारा नाम रखा था।”

    “लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारे भाइयों का कोई हक नहीं।”

    “तुम तीनों मिलकर ही उस विरासत को पूरा कर सकते हो।”

    अमन ने कहा—

    “तो हम तीनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”

    नाना मुस्कुराए।

    “यही बात तुम्हें सबसे ताकतवर बनाती है।”


    आरोही का सच

    अचानक नाना की नजर आरोही पर गई।

    “और तुम।”

    आरोही चौंक गई।

    “जी?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता ने अपनी बेटी को सिर्फ एक चाबी नहीं दी थी।”

    “उन्होंने तुम्हें इस परिवार से जोड़ने वाला एक सबूत भी दिया था।”

    आरोही ने पूछा—

    “क्या?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता समर और अभय सिर्फ दोस्त नहीं थे।”

    आरव ने चौंककर पूछा—

    “तो?”

    “वे दोनों एक ही मिशन पर काम कर रहे थे।”

    “और उन्होंने फैसला किया था कि अगर उन्हें कुछ हो गया…”

    “तो उनके बच्चे एक-दूसरे की रक्षा करेंगे।”

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

    नाना ने मुस्कुराकर कहा—

    “शायद इसी वजह से तुम दोनों इतने करीब आए।”

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “चाहे अतीत कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं हूं।”

    आरोही ने धीरे से कहा—

    “मैं भी नहीं।”


    तहखाने का रास्ता

    नाना ने कहा—

    “अब मेरी बात ध्यान से सुनो।”

    “पुराने महल के पीछे एक सूखा कुआं है।”

    “उसके नीचे एक लोहे का दरवाजा है।”

    “वहीं से तहखाने का रास्ता शुरू होता है।”

    आरव ने पूछा—

    “और तीन चाबियां?”

    “पहली चाबी तुम्हारे पास।”

    “दूसरी अमन के पास।”

    “तीसरी आरोही के लॉकेट में।”

    विहान चौंका।

    “लेकिन मेरी चाबी?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हारी चाबी चाबी नहीं है।”

    “वो उस दरवाजे का कोड है।”

    विहान ने अपने लॉकेट को देखा।

    उसमें कुछ अंक खुदे हुए थे।

    1-7-2-5

    देवेंद्र ने कहा—

    “ये वही नंबर है!”

    आरव ने पूछा—

    “क्या?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “अभय की पुरानी फाइल में यही नंबर था।”


    नाना की आखिरी चेतावनी

    नाना ने गंभीर होकर कहा—

    “लेकिन ध्यान रखना।”

    “तहखाने में सिर्फ सबूत नहीं हैं।”

    “वहां एक इंसान भी है।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने कहा—

    “वो व्यक्ति जिसने पच्चीस साल पहले मुझे धोखा दिया था।”

    नैना चौंक गईं।

    “पापा!”

    “आपने मुझे कभी नहीं बताया।”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम उस सच से दूर रहो।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन है वो?”

    नाना ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “तुम उसे जानते हो।”

    “बहुत करीब से।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने सिर्फ इतना कहा—

    “देवेंद्र।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    सभी की नजर देवेंद्र पर टिक गई।

    देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।

    नैना ने अविश्वास से कहा—

    “देवेंद्र?”

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

    आरव ने बंदूक निकाल ली।

    “पापा के दोस्त…”

    “क्या आप गद्दार हैं?”

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

    “आरव… बात वैसी नहीं है जैसी दिख रही है।”

    अभय भी चौंक गया।

    “देवेंद्र?”

    नाना ने कहा—

    “उसने मुझे धोखा दिया था।”

    देवेंद्र ने कांपती आवाज में कहा—

    “मैंने धोखा नहीं दिया था।”

    “मैंने किसी को बचाने के लिए झूठ बोला था।”

    आरव ने पूछा—

    “किसे?”

    देवेंद्र ने धीरे से नैना की तरफ देखा।

    नैना की आंखें फैल गईं।

    देवेंद्र ने कहा—

    “नैना को।”

    नैना स्तब्ध रह गईं।

    और तभी स्क्रीन अचानक बंद हो गई।

    विक्रम की आखिरी आवाज गूंजी—

    “अब समझे, आरव? इस परिवार में कोई भी वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है।”

    स्क्रीन काली हो गई।

    आरव की नजर देवेंद्र और नैना के बीच घूम रही थी।

    उसे पहली बार लगा—

    शायद उसके परिवार का सबसे बड़ा राज अभी खुलना बाकी है।

    जारी रहेगा…

  • मुसीबत से शिकायत

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मुसीबत से शिकायत

     

    ए मुसीबत, अब तो छोड़ दे हमें,

    अपनों की तरह क्यों चिपक गई है तू हमसे?

    जहाँ जाएँ, तू पीछे-पीछे चली आती है,

    हर खुशी के दरवाज़े पर दस्तक दे जाती है।

    हमने भी अब तुझसे लड़ना सीख लिया है,

    हर आँसू को हँसकर सहना सीख लिया है।

    एक दिन ये वक्त भी बदल जाएगा,

    और तू नहीं, हमारी खुशी हमारे साथ रह जाएगी।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part 7

     

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

     

    अग्नि ने मैसेज पढ़ा और फोन वापिस टेबल पर रख दिया और अपने लिए ड्रिंक बनाने लगा। लेकिन वो शायद कुछ सोच भी रहा था। 

     

    शुभम ने उसकी हरकत नोटिस कर ली। “क्या हुआ?”

     

    अग्नि, “कुछ नहीं।”

     

    शुभम ने पूछा, “किसका मैसेज था?”

     

    अग्नि बोला, “ऑफिस का।”

     

    शुभम ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ देखा। “वेदा का?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “तुझे उसका नाम कैसे पता?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “भाई, मैं तेरा दोस्त हूँ। तेरी सेक्रेटरी के बारे में इतना तो जानता ही हूँ कि वो पिछले तीन साल से तेरे साथ काम कर रही है।”

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया। शुभम ने मुस्कुराकर पूछा, “वैसे कैसी है?”

     

    अग्नि ने सामान्य स्वर में कहा, “कौन?”

     

    शुभम कूल अंदाज में, “वेदा।”

     

    अग्नि ने कंधे उचकाए, “मुझे क्या पता?”

     

    “अच्छा?” शुभम ने शरारत से कहा, “अभी दो मिनट पहले तक तू बता रहा था कि तुझे एक समझदार, सादगी पसंद लड़की चाहिए…”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम।”

     

    शुभम, “हाँ भाई?”

     

    अग्नि बोला, “अपनी बकवास बंद कर।” क्योंकि वो समझ गया था कि शुभम कहना क्या चाह रहा है,लेकिन उसे शुभम की बात बुरी भी नहीं लगी। 

     

    शुभम हँस पड़ा। लेकिन अग्नि के मन में पहली बार एक विचार आया। 

    एक ऐसा विचार जिसे उसने तुरंत अपने दिमाग से निकालने की कोशिश की।

     

    वेदा शर्मा।

     

    अग्नि ने गिलास में ड्रिंक डाली और उसे धीरे-धीरे घुमाने लगा।

     

    शुभम अब भी उसे ही देख रहा था। “क्या सोच रहा है?”

     

    अग्नि ने गिलास होंठों तक ले जाते हुए कहा, “कुछ नहीं।” लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी सहजता नहीं थी।

     

    शुभम ने भौंहें उठाईं। “तू जब ‘कुछ नहीं’ बोलता है ना, तब समझ आता है कि दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “तू मेरा दिमाग पढ़ना कब से सीख गया?”

     

    “जब से तू मेरा दोस्त बना है।” शुभम ने आराम से सोफे की पीठ से सिर टिकाया। “वैसे एक बात बता… तेरी सेक्रेटरी शादीशुदा तो नहीं है?”

     

    अग्नि ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “नहीं।” जवाब इतना जल्दी आया कि शुभम के चेहरे पर शरारती मुस्कान और गहरी हो गई।

    “ओहो… तो जानकारी पूरी है।”

     

    अग्नि ने गिलास टेबल पर रख दिया। “शुभम।”

     

    शुभम, “अरे मैं तो बस पूछ रहा था।”

     

    अग्नि, “और मैं बस जवाब दे रहा हूँ।” 

     

    शुभम, “ चल तू अब ज्यादा मत सोच, मैं कुछ करता हूँ।”

     

    अग्नि में हां में सिर हिलाया और बोला, “ बस इसी जवाब की उम्मीद थी।”

     

     

    अगली सुबह… राजावत ग्रुप।

    सुबह के ठीक नौ बजे।

     

    अग्नि हमेशा की तरह अपने ऑफिस पहुँच चुका था।

    उसका केबिन पूरी तरह व्यवस्थित था।

    टेबल पर जरूरी फाइलें रखी थीं। कॉफी उसके सामने थी।

     

    लेकिन आज पहली बार… उसकी नजर बार-बार दरवाजे की तरफ जा रही थी।

     

    तभी डोर नॉक हुआ।

    अग्नि, “ come in!”

     

    निशांत अंदर आया। “Good morning, sir.”

     

    अग्नि, “Morning.” निशांत ने फाइल आगे बढ़ाई।

    “आज दस बजे की बोर्ड मीटिंग है। ग्यारह बजे मल्होत्रा ग्रुप के साथ मीटिंग और दोपहर में…”

     

    अग्नि, “निशांत।”

     

    निशांत, “जी, सर?”

     

    अग्नि ने बिना किसी रिएक्शन के पूछा, “वेदा आई?”

     

    निशांत कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बोला, “अभी तक नहीं, सर।”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी देखी। नौ बजकर दस मिनट।

    “आते ही उसे मेरे केबिन में भेजना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया, “जी सर।”

     

    निशांत जाने लगा। फिर अग्नि ने उसे रोक लिया। “और निशांत…”

     

    निशांत रूककर पीछे मुड़ा, “जी?”

     

    “अगर वो आज भी ऑफिस नहीं आ पाए तो…” अग्नि कुछ पल रुका। “पहले मुझसे बात करना।”

     

    निशांत ने सिर हिलाया। “जी सर।”

     

    दरवाजा बंद हो गया। अग्नि कुर्सी पर पीछे टिक गया।

    उसने खुद से सवाल किया, वो आखिर वेदा का इंतजार क्यों कर रहा था?

     

    उसे अपनी ही बेचैनी अजीब लग रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    अग्नि की नजर दरवाजे पर गई। “Come in.”

     

    दरवाजा खुला। और सामने… वेदा खड़ी थी।

    आज भी उसकी आँखों के नीचे नींद की कमी साफ दिखाई दे रही थी। बाल जल्दी में बाँधे हुए थे।

    चेहरा थका हुआ था।

    लेकिन हाथ में हमेशा की तरह ऑफिस की फाइलें थीं।

    “Good morning, sir.”

     

    अग्नि कुछ सेकंड उसे देखता रहा। फिर बोला, “Sit.”

     

    वेदा चुपचाप सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।

    अग्नि ने अपने सामने रखी फाइल बंद कर दी।

    कुछ पल तक वो उसे देखता रहा।

    फिर धीमे स्वर में बोला, “वेदा…”

     

    वेदा ने हैरानी से अग्नि की तरफ देखा, क्योंकि ये शायद पहली बार था जब वो उसे इस तरह से पुकार रहा था। “जी, सर?”

     

    “मुझे तुमसे ऑफिस के काम के अलावा…”

    वो एक पल के लिए रुका। “…एक बेहद निजी बात करनी है।”

     

    वेदा की भौंहें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आया कि अग्नि आखिर उससे क्या पूछने वाला है।

     

    और अग्नि…

    वो भी शायद पहली बार अपने जीवन का सबसे असामान्य प्रस्ताव किसी के

    सामने रखने जा रहा था।

     

    क्रमशः…

     

    💕 No Love Clause

    कभी-कभी जिंदगी सबसे बड़ा सौदा वहीं रखती है, जहाँ इंसान सबसे ज्यादा मजबूर होता है।

     

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part 6

    राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार की पिछली सीट पर आकर बैठ गया। कार का दरवाजा बंद होते ही बाहर की दुनिया की आवाजें जैसे अचानक उससे दूर हो गईं।

     

    ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर, विला चलें?”

     

    अग्नि कुछ नहीं बोला।

     

    उसकी नजर कार की खिड़की से बाहर टिकी थी। मुंबई की सड़कें हमेशा की तरह अपनी रफ्तार से भाग रही थीं। कहीं ट्रैफिक में फँसी गाड़ियाँ थीं, कहीं सड़क किनारे भागते लोग, कहीं चमचमाती इमारतें और कहीं फुटपाथ पर अपनी जिंदगी समेटे बैठे लोग।

     

    लेकिन अग्नि का ध्यान इनमें से किसी पर नहीं था।

    उसके दिमाग में सिर्फ एक शब्द घूम रहा था।

    शादी।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं। उसे दादाजी की आवाज़ याद आ रही थी। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

    फिर उनकी दूसरी बात…

    “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

    आखिर ऐसा क्या था जिसे दादा जी उससे छिपा रहे थे?

     

    वो फाइल… उसमें मौजूद वो अतिरिक्त हिस्सा…

    और फिर उनका इतना आसानी से उसकी शर्त मान लेना।

     

    अग्नि ने भौंहें सिकोड़ लीं। उसे आज अपने दादा जी का व्यवहार कुछ ठीक नहीं लग रहा था। वो उन्हें सालों से जानता और समझता था। दादा जी कभी किसी बात को इतनी आसानी से नहीं मानते थे।

     

    खासकर तब…

     

    जब बात राजावत परिवार और उसकी विरासत की हो।

    लेकिन आज उन्होंने उसकी हर शर्त बिना किसी सवाल के स्वीकार कर ली थी।

    “लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    अग्नि के अपने ही शब्द उसके कानों में गूँज गए।

    उसने आँखें खोलीं।

     

    “सर?” ड्राइवर की आवाज़ सुनकर उसका ध्यान टूटा।

     

    अग्नि, “बोलो!”

     

    ड्राइवर ने पूछा, “विला चलना है?”

     

    अग्नि कुछ सेकंड चुप रहा। फिर उसने बिना किसी भाव के कहा, “नहीं।” 

     

    ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर?”

     

    अग्नि ने अपनी घड़ी पर नजर डाली। शाम के करीब साढ़े आठ बज रहे थे। उसने धीमे स्वर में कहा, “कार क्लब ले चलो”

     

    ड्राइवर ने तुरंत सिर हिलाया। “जी सर।” कहकर उसने कार की दिशा बदल दी।

    वहीं अग्नि ने अपने फोन से अपने दोस्त शुभम को भी क्लब आने का मैसेज कर दिया। 

    क्योंकि उसे पता था उसके सामने जो दुविधा अभी है उसका हल शुभम में बेहतर कोई नहीं दे सकता। क्योंकि उसके पास हर बात का सॉल्यूशन होता है। 

     

    कुछ देर बाद…

     

    मुंबई के सबसे प्राइवेट और एलीट क्लबों में से एक के बाहर काली कार आकर रुकी। कार के रुकते ही एक स्टाफ मेंबर तुरंत आगे बढ़ा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    अग्नि कार से बाहर निकला। ब्लैक शर्ट, ब्लैक ट्राउजर और उसके ऊपर पहना डार्क ब्लेजर…

    उसके चेहरे पर वही ठंडा आत्मविश्वास था जिसके कारण राजावत ग्रुप में हर कोई उससे एक दूरी बनाकर रखता था।

     

    क्लब का स्टाफ उसे देखते ही सतर्क हो गया। “Good evening, Mr. Rajawat.”

     

    अग्नि ने सिर्फ़ हल्का-सा सिर हिलाया और अंदर चला गया। क्लब का माहौल हमेशा की तरह शांत लेकिन आलीशान था।

     

    हल्की रोशनी… धीमा म्यूजिक…

    बार के पीछे सजी महँगी शराब की बोतलें…

    और शहर के कुछ बेहद प्रभावशाली लोग अपने-अपने ग्रुप में बैठे हुए थे, तो वहीं कुछ लड़के लड़कियां फ्लोर पर डांस कर रहे थे। कही छोटे छोटे कपड़े पहने लड़कियां गेस्ट को ड्रिंक सर्व कर रहे थे। 

     

    अग्नि की नजर किसी पर नहीं गई। वह सीधे अपने हमेशा वाले प्राइवेट लाउंज की तरफ बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा खोला, “आ गया हमारा दूल्हा!” अंदर से आवाज आई।

     

    अग्नि के कदम वहीं रुक गए। उसने सामने देखा।

    शुभम उसका दोस्त सोफे पर आराम से बैठा हुआ था।

    उसके हाथ में ड्रिंक थी और चेहरे पर हमेशा वाली शरारती मुस्कान।

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “बकवास बंद कर।”

     

    शुभम ने मुस्कुराते हुए ग्लास उठाया।

    “ये बकवास… बहुत ही जल्द हकीकत में बदलने वाली है मेरे दोस्त…।”

     

    अग्नि अंदर आया और सामने वाले सोफे पर बैठ गया।

    “बकवास मत कर।”

     

    शुभम ने उसे गौर से देखा। “ कुछ बात है…?” अग्नि के फेस के रिएक्शन देखते ही वो समझ गया कि आज अग्नि के साथ कुछ तो अजीब है। 

     

    अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    शुभम ने अपना ग्लास टेबल पर रखा। “दादाजी से मिलने गया था ना?”

     

    अग्नि ने बस सिर हिलाया। 

     

    “और?”

     

    “वही शादी का मुद्दा।” अग्नि ने जवाब दिया। 

     

    शुभम ने गहरी साँस ली। “मुझे पता था।”

     

    कुछ पल चुप्पी रही। फिर शुभम ने पूछा, “तो इस बार भी मना कर दिया?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “नहीं।”

     

    शुभम की भौंहें ऊपर उठ गईं। “क्या?”

     

    अग्नि ने बिल्कुल सपाट स्वर में कहा, “मैं शादी करने के लिए तैयार हूँ।”

     

    शुभम के हाथ से ग्लास लगभग छूटते छूटते बचा। वो आँखें बड़ी किए अग्नि को देख रहा था। “तू?”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “हाँ, मैं।”

     

    शुभम, “तू सच में शादी करेगा?”

     

    अग्नि, “क्यों? मैं इंसान नहीं हूँ क्या?”

     

    शुभम हँस पड़ा। “नहीं… तू इंसान तो है। लेकिन पिछले पाँच सालों से तेरी बातें सुनकर मुझे शक होने लगा था।”

     

    अग्नि ने आँखें बंद कर लीं। “शुभम…”

     

    “ओके। ओके।” शुभम ने खुद को संभाला। “लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “दादा जी ने कुछ ऐसी बातें बताईं जिनके बाद मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।”

     

    शुभम की मुस्कान गायब हो गई। “क्या बात है?”

     

    “मैं अभी नहीं बता सकता।” अग्नि ने बताने से साफ इनकार कर दिया। 

     

    शुभम ने घूरा, “अग्नि…”

     

    अग्नि ने सख्त लहजे में कहा, “मैंने कहा ना, अभी नहीं।”

     

    शुभम ने उसकी आँखों में देखा। उसे समझ आ गया कि इस बार मामला सचमुच गंभीर है।

     

    उसने बात बदलते हुए पूछा, “ठीक है। लेकिन एक बात बता… लड़की कौन है?”

     

    अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “कोई लड़की नहीं है।”

     

    शुभम, “मतलब?”

     

    अग्नि, “मैंने अभी तक किसी को चुना ही नहीं।”

     

    शुभम ने हैरानी से कहा, “तो फिर शादी करेगा किससे?”

     

    अग्नि ने धीमे स्वर में कहा, “ इसलिए ही तो तुझे यहाँ बुलाया है?”

     

    शुभम उसकी बात समझने की कोशिश करने लगा। “मतलब? मेरा मैरिज breau नहीं है।”

     

    अग्नि आगे झुक गया। “ उसकी जरूरत भी नहीं। देख, मुझे प्यार नहीं चाहिए। मुझे कोई ऐसी लड़की नहीं चाहिए जो मेरे पैसे, मेरे नाम या राजावत परिवार की जिंदगी का हिस्सा बनने के सपने देखे।”

     

    “मुझे सिर्फ़ एक समझदार लड़की चाहिए। जो छह महीने के बाद अपनी जिंदगी में वापस चली जाए।”

     

    शुभम कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, “तू कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की बात कर रहा है?”

     

    अग्नि की आँखों में हल्की-सी ठंडक उतर आई। “Exactly.”

     

    शुभम कुछ सेकंड चुप रहा। फिर अचानक हँस पड़ा।

    “तू पागल हो गया है!”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “मुझे इसमें मजाक की कोई बात नहीं दिख रही।”

     

    “मुझे दिख रही है।” शुभम ने हँसी रोकते हुए कहा, “तू शादी से इतना नफरत करता था कि अब तूने शादी को बिजनेस डील बना दिया।”

     

    अग्नि ने बिना मुस्कुराए कहा, “मेरे लिए शादी हमेशा से एक डील ही थी।”

     

    शुभम उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया। उसे मालूम था कि अग्नि शादी को लेकर इतना कठोर क्यों था।

    उसने धीरे से पूछा, “और अगर वो लड़की तुझसे प्यार कर बैठी तो?”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं करेगी।”

     

    शुभम, “तुझे इतना यकीन कैसे है?”

     

    अग्नि कुछ पल शांत रहा। फिर बोला, “क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट में साफ लिखा होगा… छह महीने बाद कोई रिश्ता नहीं रहेगा।”

     

    शुभम ने सिर हिलाया। ” चल मान लिया उसे प्यार नहीं भी हुआ लेकिन अगर तू प्यार कर बैठा तो?”

     

    इस बार अग्नि चुप हो गया। कुछ सेकंड तक उसने कोई जवाब नहीं दिया।

    फिर उसकी आवाज़ बेहद ठंडी थी। “ऐसा नहीं होगा।”

     

    शुभम ने उसकी आँखों में देखा। “तुझे खुद पर इतना भरोसा है?”

     

    अग्नि ने बिना झिझके कहा, “हाँ।”

     

    शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”

     

    अग्नि ने उसकी बा

    त को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।

    फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।

    Veda Sharma.

    कहानी आगे जारी रहेगी.

  • ❤️ प्यार ❤️🫂

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

    प्यार वो नहीं जो लफ़्ज़ों में बयां हो जाए,

    प्यार वो है जो ख़ामोशी में भी समझ आ जाए।

     

    तेरी मुस्कान से रोशन मेरी हर शाम रहे,

    तेरा साथ मिले तो हर मौसम गुलज़ार रहे।

     

    तू पास हो तो दिल को सुकून मिलता है,

    तेरे बिना हर पल कुछ अधूरा सा लगता है।

     

    ना दौलत चाहिए, ना कोई संसार चाहिए,

    बस उम्र भर तेरा हाथ मेरे हाथ में चाहिए।

     

    अगर प्यार कोई खूबसूरत एहसास है,

    तो मेरी हर धड़कन में बस तेरा ही नाम खास है। ❤️🫂

  • बीता कल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कभी-कभी बीता कल दिल को बहुत सताता है,

    पर हर नया सवेरा नई राह दिखाता है।

    जो हुआ, उसे बदलना मेरे बस में नहीं,

    पर उससे आगे बढ़ना मुश्किल भी नहीं।

    यादों को धीरे-धीरे खुद से दूर कर दूँगी,

    एक दिन मुस्कुराकर कहूँगी …मैं फिर से जी लूँगी।

  • बस यूँ ही

    बस यूँ ही

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    बस यूँ ही

    कभी पुराने पन्ने खोल लेती हूँ,

    कुछ यादें पढ़ती हूँ,

    कुछ को बिना पढ़े ही बंद कर देती हूँ।

     

    बस यूँ ही

    कभी खुद से नाराज़ हो जाती हूँ,

    फिर खुद को ही समझाकर

    चुपचाप माफ़ कर देती हूँ।

     

    बस यूँ ही

    कुछ रातें जागकर काटी हैं,

    कुछ आँसू तकिए में छुपाए हैं,

    और कुछ दर्द मुस्कुराकर टाल दिए हैं।

     

    बस यूँ ही

    हर बार लगा, अब और नहीं,

    फिर न जाने कहाँ से

    थोड़ी-सी हिम्मत आ गई।

     

    बस यूँ ही

    मैंने बीते कल को छोड़ा नहीं,

    बस उसके साथ जीना सीख लिया।

     

    और बस यूँ ही,

    आज भी खुद को थोड़ा-थोड़ा

    फिर से लिख रही हूँ।

  • सावन में कांवड़ यात्रा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सावन की कावड़ यात्रा — भोलेनाथ का बुलावा

     

    सावन का महीना शुरू होते ही पूरा गांव जैसे भोलेनाथ की भक्ति में रंग गया था। हर तरफ “हर हर महादेव” और “बोल बम” के जयकारे सुनाई दे रहे थे। गांव के मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भीड़ लगी रहती थी।

     

    उसी गांव में प्रकाश नाम का एक साधारण लड़का रहता था। वह भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन महादेव के लिए उसके मन में बहुत श्रद्धा थी।

     

    एक दिन सुबह प्रकाश मंदिर में जल चढ़ाते हुए हाथ जोड़कर बोला,

     

    “भोलेनाथ, मेरी एक इच्छा है। इस सावन में मैं आपके लिए कावड़ लेकर हरिद्वार से गंगाजल लाना चाहता हूं। बस आप मेरा साथ देना।”

     

    प्रकाश के पिता ने उसकी बात सुनी तो बोले,

     

    “बेटा, रास्ता बहुत लंबा है। इतनी दूर पैदल चलना आसान नहीं होगा।”

     

    प्रकाश मुस्कुराया।

     

    “बाबा, जब साथ भोलेनाथ हों तो रास्ता कितना भी लंबा हो, डर नहीं लगता।”

     

    अगले दिन प्रकाश ने कावड़ यात्रा की तैयारी शुरू कर दी। उसने अपने दोस्तों के साथ कावड़ सजाई। कावड़ के दोनों तरफ छोटे-छोटे कलश बांधे और उन पर फूल लगाए।

     

    जब यात्रा का दिन आया तो गांव से कई लोग हरिद्वार जाने के लिए निकले। सभी के चेहरे पर उत्साह था।

     

    “बोल बम!”

     

    “हर हर महादेव!”

     

    जयकारों के बीच प्रकाश ने अपनी कावड़ उठाई और यात्रा शुरू कर दी।

     

    शुरुआत में सब कुछ आसान लग रहा था। रास्ते में जगह-जगह भक्तों के लिए भंडारे लगे थे। कोई पानी पिला रहा था, कोई फल बांट रहा था और कोई थके हुए कावड़ियों के पैर दबा रहा था।

     

    प्रकाश हर किसी को देखकर हाथ जोड़ता और कहता,

     

    “महादेव सबका भला करें।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद उसका दोस्त राकेश बोला,

     

    “प्रकाश, तू इतनी भारी कावड़ लेकर इतनी दूर कैसे चलेगा?”

     

    प्रकाश ने हंसते हुए कहा,

     

    “कावड़ मेरे कंधे पर है, लेकिन हिम्मत मेरे भोलेनाथ के हाथ में है।”

     

    दोनों आगे बढ़ते रहे।

     

    कई घंटे चलने के बाद रास्ता मुश्किल होने लगा। पैरों में दर्द होने लगा। धूप भी तेज थी। कुछ साथी आराम करने के लिए रुक गए, लेकिन प्रकाश आगे बढ़ता रहा।

     

    तभी उसे रास्ते के किनारे एक बुजुर्ग आदमी दिखाई दिया। वह बहुत थका हुआ था और उसके पास पानी भी नहीं था।

     

    प्रकाश तुरंत रुक गया।

     

    “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    बुजुर्ग ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “बेटा, बहुत प्यास लगी है।”

     

    प्रकाश ने बिना सोचे अपनी पानी की बोतल उन्हें दे दी।

     

    राकेश बोला,

     

    “प्रकाश, आगे रास्ता बहुत लंबा है। अपना पानी मत खत्म कर।”

     

    प्रकाश ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अगर किसी प्यासे को पानी न दे पाया तो मेरी कावड़ किस काम की?”

     

    बुजुर्ग ने पानी पीकर प्रकाश की ओर देखा।

     

    “बेटा, भगवान शिव तुम्हारा रास्ता आसान करें।”

     

    प्रकाश ने उनके पैर छुए और आगे बढ़ गया।

     

    कुछ देर बाद अचानक मौसम बदल गया। आसमान में काले बादल छा गए और तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    कावड़ियों ने अपनी कावड़ संभाली और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। रास्ता कीचड़ से भर गया था।

     

    राकेश घबराकर बोला,

     

    “प्रकाश, वापस चलें? बहुत मुश्किल हो रही है।”

     

    प्रकाश ने कावड़ को संभालते हुए कहा,

     

    “नहीं राकेश। मंजिल पास हो या दूर, हमें अपने भोलेनाथ तक पहुंचना है।”

     

    बारिश के बीच वे आगे बढ़ते रहे।

     

    कुछ दूर जाने पर प्रकाश का पैर फिसल गया। वह जमीन पर गिर पड़ा। कावड़ भी उसके हाथ से छूटते-छूटते बची।

     

    राकेश ने उसे उठाया।

     

    “प्रकाश! चोट लगी है?”

     

    प्रकाश ने अपने पैर को देखा और दर्द सहते हुए बोला,

     

    “थोड़ी लगी है… लेकिन कावड़ को कुछ नहीं हुआ।”

     

    राकेश ने कहा,

     

    “तू आराम कर ले।”

     

    प्रकाश बोला,

     

    “मेरी थकान से ज्यादा जरूरी मेरी श्रद्धा है।”

     

    वह फिर चल पड़ा।

     

    आखिरकार कई घंटों की कठिन यात्रा के बाद वे हरिद्वार पहुंचे। गंगा के किनारे पहुंचते ही प्रकाश की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ, मैं आ गया।”

     

    उसने गंगाजल भरा और कावड़ को अपने कंधे पर रख लिया।

     

    अब वापसी की यात्रा शुरू हुई।

     

    इस बार प्रकाश के मन में एक अलग ही शांति थी। रास्ता अभी भी लंबा था, लेकिन उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसके कदमों को आगे बढ़ा रही हो।

     

    कई दिनों की यात्रा के बाद वह अपने गांव पहुंचा।

     

    गांव वालों ने उसका स्वागत किया।

     

    मंदिर के सामने पहुंचकर प्रकाश ने कावड़ से गंगाजल उतारा और शिवलिंग पर जल चढ़ाया।

     

    “हर हर महादेव!”

     

    पूरा मंदिर जयकारों से गूंज उठा।

     

    प्रकाश ने आंखें बंद कीं।

     

    उसे अचानक वही बुजुर्ग याद आए, जिन्हें उसने रास्ते में पानी पिलाया था।

     

    तभी मंदिर के पुजारी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा,

     

    “बेटा, आज तूने सिर्फ कावड़ यात्रा पूरी नहीं की। तूने रास्ते में एक प्यासे इंसान की मदद करके सच्ची शिवभक्ति भी की है।”

     

    प्रकाश ने हैरानी से पूछा,

     

    “पंडित जी, आपको उस बुजुर्ग के बारे में कैसे पता?”

     

    पुजारी मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि वह कोई साधारण बुजुर्ग नहीं था। कई साल पहले इस मंदिर में एक साधु आया करते थे। लोग कहते थे कि वह स्वयं महादेव के बहुत बड़े भक्त थे। आज सुबह गांव के बाहर किसी ने उन्हें देखा था… लेकिन उसके बाद वह कहीं दिखाई नहीं दिए।”

     

    प्रकाश कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने शिवलिंग की ओर देखा और धीरे से कहा,

     

    “भोलेनाथ… क्या आप ही थे?”

     

    मंदिर में उसी समय घंटियां बजने लगीं।

     

    प्रकाश के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उसे अपने सवाल का जवाब मिल चुका था।

     

    उस दिन उसे समझ आया कि कावड़ सिर्फ कंधे पर उठाया हुआ गंगाजल नहीं है। असली कावड़ तो वह श्रद्धा है, जिसमें इंसान रास्ते की मुश्किलों के बावजूद दूसरों की मदद करना नहीं भूलता।

     

    प्रकाश ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “हे महादेव, मेरे कंधे की कावड़ भले ही आज उतर गई हो, लेकिन आपके प्रति मेरी भक्ति हमेशा मेरे दिल में रहेगी।”

     

    और पूरा गांव एक साथ बोल उठा

    “हर हर महादेव!”

     

    सावन की उस पावन यात्रा ने प्रकाश को सिर्फ मंदिर तक नहीं पहुंचाया था, बल्कि उसे भक्ति का असली अर्थ भी समझा दिया थाभगवान को पाने के लिए लंबा रास्ता तय करना जरूरी नहीं, किसी जरूरतमंद के लिए उठाया गया एक छोटा सा कदम भी सच्ची पूजा बन जाता है।

  • तेरी यादों में हर रात, चुपके से रो लेते हैं,

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तेरी यादों में हर रात, चुपके से रो लेते हैं,

    दर्द कितना भी हो दिल में, तेरा नाम लेकर सो लेते हैं।

    तू लौट आए तो शायद फिर से जीना सीख जाएँ,

    वरना तेरे बिना हम हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा खो लेते हैं। 

    ।

  • सही जावे ना जिदई सजना, तेरे बिन दिल नइयो लगना❤️🫂

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    सही जाए ना जुदाई, तेरे बिन दिल नहीं लगता,

    हर पल तेरा ही चेहरा, मेरी आँखों से नहीं हटता।

    तड़प इतनी है तुझसे मिलने की, क्या बताऊँ हाल-ए-दिल,

    तू पास नहीं होता तो, ये साँस लेना भी अच्छा नहीं लगता।