रक्षाबंधन का दिन था।
घर में सुबह से ही हलचल थी। माँ रसोई में मिठाई तैयार कर रही थीं और रिया अपने कमरे में बैठी राखी की थाली सजा रही थी।
लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।
उसकी सहेली ने सुबह ही उसे अपनी राखी का गिफ्ट दिखाया था।
महंगा फोन।
नई घड़ी।
कपड़े।
और भी बहुत कुछ।
रिया ने बस मुस्कुराकर कहा था,
“बहुत अच्छा है।”
लेकिन उसके मन में एक पुरानी बात फिर से आ गई।
उसके भाई आरव ने उसे कभी राखी पर कोई गिफ्ट नहीं दिया था।
कभी चॉकलेट नहीं।
कभी कोई कपड़ा नहीं।
कभी कोई खास चीज नहीं।
रिया बचपन से हर साल उसे राखी बांधती थी और आरव बस इतना कहता था,
“धन्यवाद, छोटी।”
फिर चला जाता।
रिया को यह बात हमेशा चुभती थी।
वह सोचती थी,
“शायद भैया को मेरी उतनी परवाह नहीं है।”
उस दिन भी आरव सुबह से घर पर नहीं था।
रिया ने माँ से पूछा,
“भैया कहां गए हैं?”
माँ ने कहा,
“काम से बाहर गए हैं।”
रिया ने नाराज़ होकर कहा,
“आज के दिन भी?”
माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया।
दोपहर हो गई।
रिया की सहेलियों ने अपनी तस्वीरें भेजनी शुरू कर दीं।
किसी ने लिखा—
“मेरे भाई ने मुझे सरप्राइज दिया!”
किसी ने लिखा—
“बेस्ट भाई!”
रिया ने मोबाइल बंद कर दिया।
उसकी आंखें नम हो गईं।
वह धीरे से बोली,
“सबके भाई ऐसे होते हैं… बस मेरे नहीं।”
माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।
उन्होंने सुन लिया।
“ऐसा क्यों कह रही है?”
रिया ने कहा,
“क्योंकि सच है।”
माँ उसके पास बैठ गईं।
“तेरे भैया तुझसे बहुत प्यार करते हैं।”
रिया हंस पड़ी।
“कैसा प्यार, माँ?”
माँ चुप रहीं।
रिया ने कहा,
“उन्होंने कभी मुझे महसूस ही नहीं होने दिया।”
“हर कोई प्यार एक जैसा नहीं दिखाता बेटा।”
रिया ने नाराज़ होकर कहा,
“लेकिन कभी तो दिखाना चाहिए।”
शाम होने लगी।
आरव अभी तक घर नहीं आया था।
रिया ने राखी की थाली एक तरफ रख दी।
“अब नहीं बांधूंगी।”
माँ ने पूछा,
“क्यों?”
“जब उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता तो मुझे क्यों पड़े?”
तभी दरवाजे की घंटी बजी।
रिया तेजी से बाहर आई।
सामने आरव खड़ा था।
उसके कपड़े धूल से भरे थे।
चेहरे पर थकान थी।
हाथ में कोई गिफ्ट नहीं था।
रिया ने उसे देखकर मुंह फेर लिया।
आरव ने पूछा,
“राखी नहीं बांधेगी?”
रिया ने कहा,
“आपको क्या फर्क पड़ता है?”
आरव कुछ सेकंड चुप रहा।
“फर्क पड़ता है।”
रिया ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“कब?”
आरव ने जवाब नहीं दिया।
रिया ने गुस्से में कहा,
“आपको कभी कुछ देना नहीं होता। कभी कोई गिफ्ट नहीं। कभी कोई सरप्राइज नहीं।”
आरव शांत खड़ा रहा।
रिया की आवाज भर आई।
“मैं आपकी बहन हूं या बस राखी बांधने वाली कोई लड़की?”
यह सुनकर माँ की आंखें भर आईं।
आरव ने धीरे से कहा,
“रिया, पहले राखी बांध दे।”
रिया ने कहा,
“नहीं।”
आरव पहली बार थोड़ा गंभीर हुआ।
“प्लीज।”
रिया चुप हो गई।
माँ ने थाली उसकी तरफ बढ़ाई।
रिया ने बिना कुछ बोले तिलक लगाया और राखी बांध दी।
आरव ने अपनी कलाई को कुछ देर देखा।
फिर अपनी जेब से एक पुराना-सा कागज निकाला।
रिया ने पूछा,
“ये क्या है?”
आरव ने वह कागज उसके हाथ में रख दिया।
रिया ने पढ़ा।
वह एक कोचिंग संस्थान की फीस की रसीद थी।
रिया हैरान हुई।
“ये मेरी कोचिंग की फीस है।”
आरव ने सिर हिलाया।
“हां।”
“लेकिन ये तो पापा ने दी थी।”
माँ ने धीरे से कहा,
“नहीं बेटा।”
रिया ने माँ की तरफ देखा।
आरव बोला,
“पापा की दुकान में उस समय बहुत परेशानी थी।”
रिया का चेहरा बदल गया।
“तो फीस किसने दी?”
आरव चुप रहा।
रिया ने रसीद पर नाम देखा।
आरव शर्मा।
रिया के हाथ कांपने लगे।
“आपने?”
आरव ने हल्की आवाज में कहा,
“हां।”
रिया को याद आया कि उस साल आरव ने नया फोन खरीदने की बहुत इच्छा जताई थी।
लेकिन उसने कभी नहीं खरीदा।
रिया ने पूछा,
“लेकिन आपने कहा था कि आपको फोन पसंद नहीं आया।”
आरव मुस्कुराया।
“झूठ बोला था।”
रिया की आंखों में आंसू आ गए।
आरव ने जेब से एक और कागज निकाला।
यह उसकी कॉलेज की फीस की रसीद थी।
फिर एक और।
उसकी किताबों की।
उसके प्रतियोगी फॉर्म की।
रिया अब कुछ बोल नहीं पा रही थी।
“ये सब… आपने किया?”
आरव ने कहा,
“तू पढ़ना चाहती थी।”
“लेकिन आप?”
“मैं काम कर रहा था।”
रिया की आंखों से आंसू निकल आए।
“आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”
आरव ने उसकी कलाई की तरफ देखा।
“क्योंकि मैं चाहता था कि तू ये कभी महसूस न करे कि तेरी पढ़ाई किसी पर बोझ है।”
रिया रो पड़ी।
उसे अचानक पिछले कई साल याद आने लगे।
हर बार जब उसे किसी चीज की जरूरत होती, माँ कहतीं—
“देखते हैं।”
और कुछ दिनों बाद वह चीज उसके पास होती।
रिया सोचती थी घर में सब सामान्य है।
उसे नहीं पता था कि उसका भाई उसके लिए अपनी जरूरतें पीछे करता रहा।
रिया ने रोते हुए कहा,
“लेकिन राखी पर आपने मुझे कभी गिफ्ट नहीं दिया।”
आरव ने पहली बार हल्के से हंसकर कहा,
“इसका जवाब मेरे पास है।”
वह अंदर गया।
कुछ देर बाद एक छोटा-सा डिब्बा लेकर आया।
रिया ने पूछा,
“ये क्या है?”
“खोल।”
रिया ने डिब्बा खोला।
अंदर बहुत सारी छोटी-छोटी चीजें थीं।
एक बचपन की तस्वीर।
उसकी टूटी हुई पेंसिल का छोटा हिस्सा।
एक पुराना हेयर क्लिप।
स्कूल की एक छोटी फोटो।
रिया की बनाई हुई राखियां।
हर साल की।
रिया हैरान होकर बैठ गई।
“आपने ये सब संभालकर रखा?”
आरव ने कहा,
“हां।”
“क्यों?”
“पता नहीं।”
रिया की आंखों से आंसू बहने लगे।
आरव ने धीरे से कहा,
“मैं गिफ्ट खरीदने में अच्छा नहीं हूं।”
रिया हल्का-सा हंस पड़ी।
“तो?”
“लेकिन चीजें संभालकर रखने में अच्छा हूं।”
रिया ने डिब्बे में रखी राखियों को छुआ।
हर साल की राखी।
किसी का धागा टूट चुका था।
किसी का रंग फीका पड़ गया था।
लेकिन आरव ने एक भी नहीं फेंकी थी।
रिया ने पूछा,
“भैया, आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं कि आप ये सब रखते हो?”
आरव ने कहा,
“तूने कभी पूछा नहीं।”
रिया ने उसकी तरफ देखा।
“मैंने पूछा था… कि आप मुझसे प्यार करते हो या नहीं।”
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला,
“तब मैं क्या बोला था?”
रिया को याद आया।
वह शायद दस साल की थी।
उसने गुस्से में पूछा था,
“भैया, आप मुझे प्यार करते हो?”
आरव ने जवाब दिया था—
“बहुत सवाल करती है।”
उस समय रिया रो पड़ी थी।
आज आरव ने कहा,
“मुझे उस समय कहना चाहिए था।”
रिया की आंखें भर आईं।
“तो आज कहो।”
आरव उसकी तरफ देखने लगा।
रिया ने फिर कहा,
“आज साफ-साफ कहो।”
आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“हां रिया।”
उसकी आवाज धीमी थी।
“मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं।”
रिया फूटकर रो पड़ी।
वह अपने भाई के गले लग गई।
आरव ने उसके सिर पर हाथ रखा।
रिया रोते हुए बोली,
“आप बहुत बुरे हो।”
आरव हंस पड़ा।
“अब क्या कर दिया?”
“पहले क्यों नहीं बताया?”
“तूने फिर पूछा नहीं।”
रिया ने पीछे हटकर कहा,
“अब पूछूंगी भी नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब पता है।”
आरव मुस्कुराया।
रिया ने उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा रखा।
“ये आपके लिए।”
आरव ने खोला।
अंदर एक सुंदर-सी घड़ी थी।
आरव ने पूछा,
“क्यों?”
रिया ने कहा,
“क्योंकि हर रक्षाबंधन पर सिर्फ भाई ही नहीं देता।”
आरव चुप हो गया।
रिया ने कहा,
“इस बार मेरी बारी है।”
आरव की आंखें नम हो गईं।
रिया ने उसकी पुरानी राखियों वाले डिब्बे को देखते हुए कहा,
“भैया, आप गिफ्ट देना नहीं जानते थे…”
आरव ने पूछा,
“तो?”
रिया मुस्कुराई।
“आपने मुझे सबसे बड़ा गिफ्ट दिया है—बिना बताए हमेशा मेरे साथ रहना।”
उस दिन रिया को कोई महंगा फोन नहीं मिला।
न कोई चमकदार गिफ्ट।
लेकिन उसे एक ऐसा सच मिल गया, जो किसी भी तोहफे से ज्यादा कीमती था।
उसे समझ आ गया कि—
हर प्यार बोलकर नहीं दिखाया जाता।
कुछ लोग हमें “आई लव यू” नहीं कहते।
वे हमारी फीस भरते हैं।
हमारी जरूरतें पूरी करते हैं।
हमारी छोटी-छोटी बातें याद रखते हैं।
और हमारी बांधी हुई राखियां सालों तक संभालकर रखते हैं।
उस शाम रिया ने भाई की कलाई पर बंधी राखी को देखा और मुस्कुराई।
उसे आखिरकार अपना रक्षाबंधन का गिफ्ट मिल गया था।
एक ऐसा भाई, जिसने शायद कभी प्यार के बड़े-बड़े शब्द नहीं बोले… लेकिन अपनी हर छोटी-बड़ी चीज में बहन के लिए प्यार छिपाकर रखा।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे