एपिसोड – 44 : वो कौन था?
“क्योंकि मैं तुम्हारा असली पिता हूं।”
उस आवाज ने जैसे पूरे रास्ते की हवा रोक दी।
आरव, अमन और विहान तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।
आरोही भी हैरान खड़ी थी।
सामने अंधेरे में एक आदमी खड़ा था। उसके चेहरे का आधा हिस्सा अंधेरे में छिपा हुआ था, लेकिन उसकी आवाज में ऐसा अपनापन था, जैसे वह उन तीनों को बरसों से जानता हो।
आरव ने आगे बढ़ते हुए पूछा—
“सामने आओ।”
वह आदमी धीरे-धीरे रोशनी में आया।
उसके बालों में सफेदी थी। चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लेकिन आंखों में अजीब-सी गहराई थी।
विहान उसे देखते ही पीछे हट गया।
“आप…”
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
“हां, विहान।”
“आप वही हैं जो मुझे सपनों में दिखाई देते थे।”
उस आदमी की आंखें नम हो गईं।
“क्योंकि वो सपने नहीं थे।”
विहान की सांस अटक गई।
“तो क्या था?”
आदमी ने कहा—
“तुम्हारी बचपन की यादें।”
अमन ने गुस्से से पूछा—
“आपने अभी कहा कि आप हमारे असली पिता हैं। इसका मतलब क्या है?”
आदमी ने आरव और अमन की तरफ देखा।
“मैं तुम तीनों का पिता हूं।”
आरव का चेहरा सख्त हो गया।
“झूठ।”
“नहीं।”
“मेरे पिता अभय थे।”
“अभय तुम्हारा पिता था।”
“तो आप कौन हैं?”
आदमी कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“मेरा नाम देवेंद्र है।”
—
देवेंद्र का सच
आरोही ने पूछा—
“अगर आप इनके पिता हैं, तो इतने साल कहां थे?”
देवेंद्र की आंखें झुक गईं।
“छिपा हुआ था।”
आरव ने तीखी आवाज में पूछा—
“किससे?”
“शेखर से।”
अमन ने कहा—
“और राजवीर से?”
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
“सबसे।”
विहान आगे आया।
“मेरी मां नैना आपको जानती थीं?”
देवेंद्र की आंखों में दर्द उतर आया।
“नैना मेरी जिंदगी थी।”
विहान की आंखें भर आईं।
“तो फिर उन्होंने आपसे शादी क्यों नहीं की?”
देवेंद्र ने कुछ नहीं कहा।
आरव ने पूछा—
“क्या आप और नैना…?”
“हां।”
देवेंद्र ने धीरे से कहा—
“हम एक-दूसरे से प्यार करते थे।”
विहान ने कांपती आवाज में पूछा—
“तो मैं…”
देवेंद्र ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“तुम मेरे बेटे हो।”
विहान की आंखों से आंसू निकल पड़े।
“फिर मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”
देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।
“क्योंकि मुझे मजबूर किया गया था।”
—
पच्चीस साल पुराना समझौता
देवेंद्र ने कहा—
“जब नैना को पता चला कि वह मां बनने वाली है, तब राजवीर को भी इसकी खबर मिल गई।”
आरव ने पूछा—
“राजवीर को क्यों फर्क पड़ता था?”
“क्योंकि उसे पता था कि नैना के पास शेखर के खिलाफ सारे सबूत हैं।”
अमन ने पूछा—
“और हम?”
देवेंद्र ने कहा—
“तुम दोनों का जन्म उसी समय हुआ था।”
आरव चौंक गया।
“तो क्या हम सच में तीनों एक ही मां के बच्चे हैं?”
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
“हां।”
अमन ने पूछा—
“लेकिन हमें अलग-अलग परिवारों में क्यों रखा गया?”
देवेंद्र ने कहा—
“क्योंकि नैना जानती थी कि अगर राजवीर को पता चल गया कि उसके तीन बच्चे हैं, तो वह तीनों को खत्म कर देगा।”
विहान ने पूछा—
“फिर मेरी परवरिश किसने की?”
“शेखर ने।”
विहान का चेहरा सख्त हो गया।
“वो मुझे अपना बेटा कहता था, लेकिन कैद करके रखता था।”
देवेंद्र ने कहा—
“क्योंकि वह तुम्हें बचा रहा था।”
विहान ने गुस्से में कहा—
“कैद करके?”
“हां।”
“ये कैसी सुरक्षा थी?”
देवेंद्र चुप हो गया।
—
आरव की उलझन
आरव अब तक कुछ नहीं बोला था।
आरोही ने उसका हाथ पकड़ रखा था।
“आरव?”
आरव ने धीरे से कहा—
“अगर नैना मेरी मां थीं… तो माधवी मां कौन हैं?”
देवेंद्र ने कहा—
“माधवी तुम्हारी मां की बहन थीं।”
आरव की आंखों में आंसू आ गए।
“लेकिन उन्होंने मुझे पाला।”
“हां।”
“उन्होंने मुझे कभी ये महसूस नहीं होने दिया कि मैं उनका बेटा नहीं हूं।”
देवेंद्र ने कहा—
“क्योंकि उनके लिए तुम सिर्फ भांजे नहीं थे।”
आरव ने पूछा—
“फिर?”
“तुम उनका बेटा थे।”
आरव ने आंखें बंद कर लीं।
उसके मन में माधवी की सारी बातें घूमने लगीं।
बचपन में उसका माथा सहलाना…
बीमार होने पर पूरी रात उसके पास बैठना…
उसके स्कूल के पहले दिन रोना…
हर मुश्किल में उसका साथ देना।
आरव की आंखों से आंसू बह निकले।
“मां ने मुझे कभी झूठे प्यार से नहीं पाला।”
आरोही ने धीरे से कहा—
“क्योंकि मां वही होती है जो आपको जन्म देने के साथ-साथ आपको प्यार भी दे।”
आरव ने आरोही की तरफ देखा।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“तुम हर मुश्किल वक्त में मेरे साथ क्यों खड़ी रहती हो?”
आरोही ने कहा—
“क्योंकि मैंने तुमसे प्यार किया है।”
आरव ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
—
अचानक गोली की आवाज
धांय!
गोली दीवार से टकराई।
देवेंद्र तुरंत सबको नीचे झुकने का इशारा करता है।
“राजवीर ने रास्ता ढूंढ लिया!”
आरव ने पूछा—
“वो यहां तक कैसे पहुंचा?”
देवेंद्र ने कहा—
“उसके पास इस हवेली का नक्शा है।”
अमन ने बंदूक निकाल ली।
“तो फिर उसे यहां आने से रोकते हैं।”
देवेंद्र ने कहा—
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि राजवीर अकेला नहीं है।”
दूर से कदमों की आवाज सुनाई दी।
एक…
दो…
तीन…
फिर दर्जनों कदम।
विहान घबरा गया।
“वो आ गए।”
देवेंद्र ने सामने की दीवार की तरफ इशारा किया।
“उस दरवाजे के पीछे एक और रास्ता है।”
आरव ने पूछा—
“कहां जाता है?”
“नैना के आखिरी कमरे में।”
अमन ने कहा—
“हमें वहां क्या मिलेगा?”
देवेंद्र ने कहा—
“तुम्हारी मां की आखिरी रिकॉर्डिंग।”
—
नैना की आखिरी रिकॉर्डिंग
दरवाजा खोलते ही एक छोटा कमरा दिखाई दिया।
कमरे में पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था।
उसके पास एक चिट्ठी थी।
देवेंद्र ने उसे उठाया।
चिट्ठी पर लिखा था—
“मेरे बच्चों के लिए।”
विहान ने कांपते हाथों से रिकॉर्डर चालू किया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।
फिर एक महिला की आवाज आई—
“अगर मेरे बच्चे ये आवाज सुन रहे हैं, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं हूं।”
विहान की आंखों से आंसू निकलने लगे।
“मां…”
आवाज आगे बोली—
“मैं चाहती हूं कि मेरे तीनों बच्चे एक दिन एक साथ खड़े हों।”
आरव ने आंखें बंद कर लीं।
“मैंने तुम तीनों को अलग इसलिए किया क्योंकि मुझे डर था कि मेरे दुश्मन तुम्हें नुकसान पहुंचाएंगे।”
अमन की आंखों से भी आंसू बहने लगे।
नैना की आवाज कांप रही थी।
“तुम तीनों के पिता अलग नहीं हैं…”
तीनों भाई एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।
“तुम्हारे पिता देवेंद्र हैं।”
देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।
“लेकिन तुम्हारी परवरिश अलग-अलग लोगों ने की, ताकि कोई तुम्हें पहचान न सके।”
रिकॉर्डिंग में कुछ सेकंड का सन्नाटा आया।
फिर नैना ने कहा—
“और एक बात…”
आवाज अचानक गंभीर हो गई।
“अगर राजवीर तुम्हें ढूंढ ले, तो उस पर कभी भरोसा मत करना।”
आरव चौंक गया।
“क्यों?”
रिकॉर्डिंग में नैना ने कहा—
“क्योंकि राजवीर सिर्फ तुम्हारे परिवार का दुश्मन नहीं है…”
रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।
विहान ने मशीन को झकझोर दिया।
“आगे बोलो मां!”
लेकिन रिकॉर्डिंग बंद थी।
अमन ने कहा—
“शायद यही पूरी रिकॉर्डिंग थी।”
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्या?”
“ये रिकॉर्डिंग अधूरी है।”
आरव ने पूछा—
“बाकी हिस्सा कहां है?”
देवेंद्र ने कमरे की दीवार की तरफ देखा।
“यहीं।”
—
दीवार के पीछे छुपा रहस्य
देवेंद्र ने दीवार पर तीन बार दस्तक दी।
टक… टक… टक…
फिर उसने एक पत्थर हटाया।
अंदर से छोटी सी मेमोरी चिप निकली।
आरोही ने कहा—
“ये क्या है?”
देवेंद्र ने कहा—
“नैना की पूरी रिकॉर्डिंग।”
आरव ने पूछा—
“इसे अभी क्यों नहीं सुनते?”
देवेंद्र ने कहा—
“क्योंकि अगर ये रिकॉर्डिंग राजवीर के हाथ लग गई, तो वो हम सबको खत्म कर देगा।”
अमन ने कहा—
“तो सुनते हैं।”
देवेंद्र ने चिप रिकॉर्डर में लगा दी।
कुछ सेकंड बाद नैना की आवाज फिर सुनाई दी—
“अगर तुम ये हिस्सा सुन रहे हो तो समझो राजवीर तुम्हारे बहुत करीब है।”
आरव ने चारों तरफ देखा।
नैना की आवाज आगे आई—
“और सबसे बड़ा सच ये है कि राजवीर अकेला काम नहीं करता था।”
अमन ने पूछा—
“उसके साथ कौन था?”
रिकॉर्डिंग में नैना बोली—
“उसका साथी… तुम्हारे बहुत करीब है।”
रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।
सब स्तब्ध रह गए।
विहान ने पूछा—
“हमारे बहुत करीब?”
देवेंद्र ने कहा—
“हां।”
आरव ने पूछा—
“कौन?”
तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।
देवेंद्र ने तुरंत रिकॉर्डर बंद किया।
सबने हथियार संभाल लिए।
दरवाजा धीरे-धीरे खुला।
सामने…
माधवी खड़ी थीं।
आरव दौड़कर उनके पास गया।
“मां!”
माधवी ने उसे गले लगा लिया।
लेकिन उनकी नजर देवेंद्र पर पड़ी।
उनका चेहरा अचानक बदल गया।
देवेंद्र भी उन्हें देखकर चुप हो गया।
आरोही ने गौर किया कि दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे उनके बीच कोई बहुत पुराना रिश्ता हो।
आरव ने पूछा—
“मां, आप देवेंद्र को जानती हैं?”
माधवी ने कोई जवाब नहीं दिया।
देवेंद्र ने भी नजरें झुका लीं।
आरव ने फिर पूछा—
“मां?”
माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।
उन्होंने धीरे से कहा—
“हां… मैं देवेंद्र को सिर्फ जानती नहीं हूं।”
वह कुछ पल रुकीं।
फिर बोलीं—
“मैंने कभी तुमसे ये नहीं बताया कि तुम्हारे जन्म से पहले… देवेंद्र और मेरा भी एक रिश्ता था।”
आरव स्तब्ध रह गया।
आरोही ने देवेंद्र की तरफ देखा।
और उसी वक्त बाहर से राजवीर की आवाज आई—
“माधवी! अब झूठ बोलना बंद करो… क्योंकि तुम्हारा सबसे बड़ा राज मेरे पास है।”
माधवी का चेहरा सफेद पड़ गया।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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