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तुम्हें लिखूं

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मैं हर दिन सिर्फ तुम्हारे

नाम से जीतीं हूं ,

हर लम्हा तुम्हें सोचती हूं  ,

मैं इस कदर पागल हूं

इश्क में तुम्हारे ,

तुम्हीं बोलो मैं तुम्हें छोड़कर

क्या लिखूं  , मैं लिखूं तुम्हें

अपने हृदय में जीवंत ख्वाबों को

साकार करते हुए  ,या लिखूं

तुम्हारी मधुर मुस्कान को,

चंचल मन की लालायित रचना

या लिखूं तुम्हारी आंखों की

चमकती हुई उज्जवला,

बताओं तुम ही मेरे साथी

मैं क्या लिखूं ??? ,

चित्त की पवित्रता या

लिखूं तुम्हारी मन की विहवलता,

तुम बिन सजन अधूरी मेरी

जिंदगी की रचना है,

तुम्हें देखूं तुमसे बात करूं

या लिखूं तुम्हारी लिखी गई रचनाओं को ,

नहीं! मैं लिखूंगी तुम्हें अपने जीवन में ,

एक दूसरे की खुशी और संतोष में ,

मैं लिखूंगी तुम्हें अपने प्रेम में ,

मैं लिखूंगी तुम्हें अपने हृदय की वेदना में ,

जिसे समझ कर तुम दूर मुझसे ना जा पाओ .,

हां! मैं लिखूंगी तुम्हें किसी सुरक्षित

स्थान में ,जहां कोई ना हो तुम्हारे साथ मेरे बिना,

लिखूं मैं और तुम मुझे समझ जाओ

ऐसा मुमकिन एहसास लिखूंगी 

मैं अपने कतरे कतरे से …!!

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