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नन्हे बच्चे की परछाई

पढ़ने का समय : 5 मिनट

नन्हे बच्चे की परछाई

 

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। गांव के आखिरी छोर पर बना एक पुराना घर कई सालों से बंद पड़ा था। लोग उसे “परछाई वाला घर” कहते थे। उनका कहना था कि रात के समय उस घर की खिड़की पर एक छोटे बच्चे की परछाई दिखाई देती है।

 

गांव के लोग उस घर के पास जाने से भी डरते थे।

 

एक दिन शहर से आरव अपनी मां और छोटी बहन के साथ उसी गांव में अपने नाना के पुराने घर में रहने आया। आरव की उम्र चौदह साल थी। उसे भूत-प्रेत की बातें मजाक लगती थीं।

 

पहली ही शाम उसने गांव के कुछ बच्चों से उस पुराने घर के बारे में सुना।

 

एक बच्चा बोला, “वहां रात में मत जाना। एक नन्हे बच्चे की परछाई आती है।”

 

आरव हंस पड़ा।

 

“परछाई तो हर इंसान की होती है। इसमें डरने वाली क्या बात है?”

 

बच्चे चुप हो गए।

 

उस रात आरव अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था। अचानक उसकी नजर दूर उस पुराने घर पर पड़ी।

 

घर की ऊपरी खिड़की पर हल्की-सी रोशनी थी।

 

आरव ने आंखें सिकोड़कर देखा।

 

खिड़की के सामने एक छोटे बच्चे जैसी परछाई खड़ी थी।

 

आरव के चेहरे की हंसी गायब हो गई।

 

परछाई कुछ पल वहीं खड़ी रही। फिर धीरे-धीरे उसने अपना हाथ उठाया और खिड़की के शीशे पर तीन बार दस्तक दी।

 

ठक… ठक… ठक…

 

आरव घबरा गया।

 

उसी समय पीछे से उसकी मां की आवाज आई, “आरव, क्या हुआ?”

 

आरव ने तुरंत पीछे देखा।

 

“कुछ नहीं मां।”

 

जब उसने दोबारा खिड़की की तरफ देखा तो वहां कोई परछाई नहीं थी।

 

अगली सुबह आरव ने गांव के बूढ़े चौकीदार हरिया काका से उस घर के बारे में पूछा।

 

हरिया काका कुछ देर चुप रहे।

 

फिर बोले, “बहुत साल पहले उस घर में मोहन नाम का एक छोटा बच्चा रहता था। बहुत मासूम था। उसकी उम्र शायद सात साल रही होगी।”

 

“फिर क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

 

हरिया काका ने लंबी सांस ली।

 

“एक रात घर में आग लग गई। उसके माता-पिता तो बाहर निकल आए, लेकिन बच्चा अंदर रह गया। उसके बाद से वह घर बंद कर दिया गया।”

 

आरव के मन में उस परछाई का ख्याल घूमने लगा।

 

“क्या लोग कहते हैं कि वही बच्चा दिखाई देता है?”

 

हरिया काका ने सिर हिला दिया।

 

“हां। लेकिन एक बात समझ नहीं आई आज तक… वह परछाई किसी को डराती नहीं। बस खिड़की पर खड़ी होती है और जैसे किसी का इंतजार करती है।”

 

उस रात आरव सो नहीं पाया।

 

करीब बारह बजे फिर वही ठक… ठक… ठक… की आवाज सुनाई दी।

 

आरव ने खिड़की खोली।

 

दूर पुराने घर की खिड़की में वही नन्ही परछाई दिखाई दे रही थी।

 

इस बार वह हाथ से इशारा कर रही थी।

 

जैसे आरव को बुला रही हो।

 

आरव का डर धीरे-धीरे जिज्ञासा में बदल गया।

 

अगली शाम वह चुपचाप पुराने घर के पास पहुंच गया।

 

दरवाजा आधा खुला था।

 

अंदर धूल जमी हुई थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। सीढ़ियों के पास एक टूटा हुआ लकड़ी का खिलौना पड़ा था।

 

आरव ने उसे उठाया।

 

तभी ऊपर से बच्चे के हंसने जैसी बहुत धीमी आवाज आई।

 

आरव ने ऊपर देखा।

 

सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक छोटी-सी परछाई खड़ी थी।

 

वह कुछ पल आरव को देखती रही।

 

फिर मुड़ी और कमरे के अंदर चली गई।

 

आरव भी उसके पीछे चला गया।

 

कमरे में पहुंचकर उसे कुछ दिखाई नहीं दिया।

 

लेकिन सामने की दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

 

तस्वीर में एक छोटा बच्चा मुस्कुरा रहा था।

 

आरव समझ गया।

 

“मोहन…”

 

अचानक कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

 

ठंडी हवा अंदर आई।

 

दीवार पर फिर वही परछाई दिखाई दी।

 

इस बार उसने जमीन की तरफ इशारा किया।

 

आरव ने नीचे देखा।

 

फर्श के एक हिस्से पर लकड़ी का पुराना पट्टा लगा था।

 

उसने उसे हटाया तो नीचे एक छोटी-सी लोहे की पेटी मिली।

 

पेटी के अंदर कुछ पुराने कागज और एक डायरी थी।

 

डायरी मोहन के पिता की थी।

 

आरव ने कांपते हाथों से पन्ने पलटे।

 

एक जगह लिखा था—

 

“अगर कभी मेरे बेटे को कुछ हो जाए, तो दुनिया को सच जरूर बताना। उस रात घर में आग अपने आप नहीं लगी थी।”

 

आरव की आंखें फैल गईं।

 

आगे लिखा था कि घर में रखी जमीन के कागजों को हड़पने के लिए किसी ने आग लगाई थी। लेकिन उसके पिता उस व्यक्ति का नाम लिख पाते, उससे पहले डायरी का आखिरी पन्ना फट चुका था।

 

आरव समझ गया कि मोहन की परछाई किसी को डराने नहीं, बल्कि सच सामने लाने के लिए दिखाई देती थी।

 

वह डायरी लेकर गांव के लोगों के पास गया।

 

हरिया काका ने डायरी देखी तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।

 

“मैं जानता था… मोहन की आत्मा बेवजह नहीं भटक रही।”

 

गांव के पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए। आखिरकार पता चला कि उस समय जमीन पर कब्जा करने वाला व्यक्ति गांव का ही एक प्रभावशाली आदमी था। सबूत मिलने पर वर्षों पुराना सच सामने आ गया।

 

कुछ दिनों बाद उस पुराने घर को ठीक करने का फैसला हुआ।

 

लेकिन काम शुरू होने से पहले आरव आखिरी बार उस घर में गया।

 

वही कमरा।

 

वही खिड़की।

 

वही सन्नाटा।

 

आरव ने धीरे से कहा, “मोहन… तुम्हारा सच सबको पता चल गया।”

 

कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ।

 

फिर खिड़की पर हल्की रोशनी पड़ी।

 

दीवार पर एक छोटी-सी परछाई दिखाई दी।

 

इस बार वह डरी हुई नहीं थी।

 

वह मुस्कुराती हुई लग रही थी।

 

उसने धीरे से हाथ हिलाया।

 

और फिर…

 

परछाई हमेशा के लिए गायब हो गई।

 

आरव की आंखों में आंसू आ गए।

 

उस दिन उसे समझ आया कि हर परछाई डराने नहीं आती।

 

कुछ परछाइयां अपना अधूरा सच पूरा करवाने आती हैं।

 

कई साल बाद भी गांव के बुजुर्ग उस घर की कहानी सुनाते थे।लेकिन अब कोई उसे “परछाई वाला घर” नहीं कहता था।

 

लोग उसे “मोहन का घर” कहते थे।

 

और कहते थे—

 

“जिस बच्चे की परछाई कभी सबको डराती थी, वही परछाई आखिर में पूरे गांव को एक बड़ा सच दिखाकर चली गई।”

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