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एक मिस्ट्री जो सुलझी नहीं

पढ़ने का समय : 6 मिनट

एक मिस्ट्री जो सुलझी नहीं

 

शहर से थोड़ा दूर एक पुरानी हवेली थी। लोग उसे “नीली हवेली” कहते थे। दिन में भी वह जगह कुछ अजीब लगती थी, लेकिन रात होते ही उसके बारे में तरह-तरह की बातें होने लगती थीं।

 

कहा जाता था कि करीब बीस साल पहले उस हवेली में रहने वाला एक परिवार अचानक गायब हो गया था। घर में सामान तक वैसा ही पड़ा मिला था, जैसे लोग बस कुछ देर के लिए बाहर गए हों। मगर वे कभी वापस नहीं आए।

 

सबसे अजीब बात यह थी कि उस घर की सबसे छोटी बच्ची की एक तस्वीर हवेली में मिली थी, लेकिन उसके बाद उस बच्ची का कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।

 

बीस साल बाद मीरा उस हवेली के सामने खड़ी थी।

 

मीरा बीस साल की एक शांत लेकिन जिज्ञासु लड़की थी। उसके हाथ में एक पुरानी भूरी डायरी थी, जो उसे अपनी नानी के पुराने सामान में मिली थी। डायरी के पहले ही पन्ने पर वही निशान बना था, जो नीली हवेली की दीवार पर भी बना हुआ था।

 

मीरा ने धीरे से कहा,

“आखिर इस निशान का राज क्या है?”

 

तभी उसके पीछे से आवाज आई।

 

“अगर तुम सच जानना चाहती हो, तो अंदर मत जाना।”

 

मीरा पलटी। सामने एक रहस्यमयी युवक खड़ा था।

 

“तुम कौन हो?”

 

युवक ने कुछ देर उसे देखा और बोला,

“मुझे नाम से ज्यादा उस घर की कहानी पता है।”

 

“तो फिर मुझे बताओ।”

 

“हर कहानी बताने के लिए नहीं होती।”

 

मीरा ने डायरी कसकर पकड़ ली।

 

“लेकिन मैं जानना चाहती हूं कि इस निशान का मेरी जिंदगी से क्या संबंध है।”

 

युवक का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

 

“तुम्हें कैसे पता कि इसका तुम्हारी जिंदगी से संबंध है?”

 

मीरा ने डायरी खोलकर उसे निशान दिखाया।

 

“क्योंकि यही निशान मुझे बचपन से सपनों में दिखाई देता है।”

 

युवक कुछ नहीं बोला।

 

दोनों हवेली के अंदर चले गए।

 

अंदर धूल से ढकी पुरानी मेजें, बंद खिड़कियां और दीवारों पर लगे धुंधले चित्र थे। मीरा धीरे-धीरे एक कमरे में पहुंची। वहां लकड़ी की एक पुरानी मेज रखी थी।

 

मेज की दराज में उसे एक दूसरी डायरी मिली।

 

डायरी खोलते ही मीरा के हाथ कांपने लगे।

 

एक पन्ने पर एक छोटी बच्ची की तस्वीर चिपकी थी।

 

मीरा तस्वीर को देखते ही चुप हो गई।

 

वह बच्ची बिल्कुल उसी जैसी दिख रही थी।

 

“ये… मैं हूं।”

 

युवक ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

 

“नहीं। यह संभव नहीं है।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि यह तस्वीर बीस साल पुरानी है।”

 

मीरा की आंखों में सवाल थे।

 

“तो फिर मैं इस तस्वीर में कैसे हो सकती हूं?”

 

युवक ने अगला पन्ना पलटा।

 

वहां वही रहस्यमयी निशान बना था और उसके नीचे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“जब वह लौटेगी, सच फिर से जाग जाएगा।”

 

मीरा ने पूछा,

“वह कौन?”

 

युवक ने जवाब नहीं दिया।

 

अचानक कमरे के बाहर कुछ गिरने की आवाज आई।

 

दोनों बाहर आए, लेकिन गलियारा खाली था।

 

मीरा ने देखा कि दीवार पर लगा एक पुराना चित्र थोड़ा टेढ़ा था। उसने उसे सीधा किया तो पीछे एक छोटा सा कागज मिला।

 

कागज पर लिखा था—

 

“जिसे तुम ढूंढ रही हो, वह तुम्हारे सबसे करीब है।”

 

मीरा ने युवक की तरफ देखा।

 

“क्या तुम जानते हो कि यहां क्या हुआ था?”

 

वह कुछ देर चुप रहा।

 

“मेरे पिता इस हवेली की देखभाल करते थे। उस रात उन्होंने मुझे घर से बाहर भेज दिया था। सुबह जब मैं वापस आया, तो पूरा परिवार गायब था।”

 

“और तुम्हारे पिता?”

 

“वह भी।”

 

“फिर तुम इतने सालों से इस घर में क्यों आते रहे?”

 

युवक ने धीमे स्वर में कहा,

“क्योंकि मेरे पिता ने जाते वक्त मुझे एक बात कही थी।”

 

“क्या?”

 

“अगर कभी वह लड़की वापस आए, तो उसे डायरी दे देना।”

 

मीरा की सांस जैसे रुक गई।

 

“कौन-सी लड़की?”

 

युवक ने उसकी ओर देखा।

 

“तुम।”

 

कुछ पल के लिए दोनों बिल्कुल शांत रहे।

 

मीरा ने डायरी का आखिरी पन्ना खोला। वहां एक नक्शा बना था। नक्शे में हवेली के नीचे बने किसी पुराने कमरे का रास्ता दिखाया गया था।

 

दोनों उस रास्ते को ढूंढते हुए तहखाने तक पहुंचे।

 

वहां एक लोहे का दरवाजा था।

 

दरवाजे पर वही निशान बना था।

 

मीरा ने कांपते हाथ से निशान को छुआ।

 

दरवाजा अपने आप खुल गया।

 

अंदर एक छोटा कमरा था। कमरे के बीच में लकड़ी की कुर्सी और उसके सामने एक पुराना आईना रखा था।

 

आईने के नीचे एक कागज पड़ा था।

 

मीरा ने उसे उठाया।

 

उस पर लिखा था—

 

“सच जानने से पहले यह तय कर लो कि तुम उसे सह पाओगी या नहीं।”

 

मीरा ने युवक से कहा,

“मैं पीछे नहीं हटूंगी।”

 

वह धीरे से बोला,

“तो फिर आईने के पीछे देखो।”

 

मीरा ने आईना हटाया।

 

पीछे दीवार पर दर्जनों तस्वीरें थीं।

 

उन सभी तस्वीरों में वही बच्ची थी।

 

कभी हवेली में।

 

कभी किसी गांव में।

 

कभी एक अनजान आदमी के साथ।

 

लेकिन सबसे आखिरी तस्वीर देखकर मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

उस तस्वीर में वही बच्ची एक महिला के साथ खड़ी थी।

 

वह महिला मीरा की मां जैसी दिख रही थी।

 

मीरा की आंखों में आंसू आ गए।

 

“मेरी मां… यहां क्यों थी?”

 

युवक ने तस्वीर हाथ में ली।

 

“शायद तुम्हारी मां इस राज को जानती थीं।”

 

“लेकिन उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं बताया।”

 

तभी डायरी का एक छिपा हुआ पन्ना नीचे गिरा।

 

उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

 

“वह जिंदा है।”

 

मीरा ने घबराकर पूछा,

“कौन?”

 

लेकिन इस बार युवक भी जवाब नहीं दे पाया।

 

तभी बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

 

दोनों दौड़कर बाहर आए।

 

हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

 

मगर वहां कोई नहीं था।

 

बस फर्श पर एक नया कागज पड़ा था।

 

मीरा ने उसे उठाया।

 

उस पर लिखा था—

 

“अगर तुम यहां तक पहुंच गई हो, तो समझो कहानी खत्म नहीं हुई… असली रहस्य अब शुरू हुआ है।”

 

मीरा ने युवक की तरफ देखा।

 

“इसका मतलब जिसने यह सब लिखा, वह अभी भी जिंदा है?”

 

युवक ने धीमे से कहा,

 

“शायद।”

 

“और मेरी मां?”

 

“शायद वह भी इस राज का हिस्सा थीं।”

 

“और वह बच्ची?”

 

युवक ने मीरा की तरफ देखा।

 

“शायद वह तुम थीं… या शायद किसी ने तुम्हें यह विश्वास दिलाया कि तुम वही बच्ची हो।”

 

मीरा कुछ बोल नहीं पाई।

 

अगले दिन पुलिस को हवेली बिल्कुल खाली मिली।

 

मेज पर सिर्फ दो डायरी थीं।

 

मीरा और वह रहस्यमयी युवक कहीं नहीं थे।

 

आज बीस साल बाद भी नीली हवेली बंद है।

 

लोग कहते हैं कि कभी-कभी रात में उसके अंदर से पन्ने पलटने की आवाज आती है।

 

कभी किसी लड़की की धीमी आवाज सुनाई देती है—

 

“सच आखिर है क्या?”

 

और हवेली की दीवार पर बना वह रहस्यमयी निशान आज भी वैसा ही है।

 

किसी को नहीं पता कि मीरा कहां गई।

 

किसी को यह भी नहीं पता कि उस तस्वीर वाली बच्ची वास्तव में कौन थी।

 

और सबसे बड़ा सवाल…

 

क्या मीरा उस रहस्य को सुलझाने गई थी, या वह खुद उस रहस्य का सबसे बड़ा हिस्सा थी?

 

आज तक इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला।

 

यह एक ऐसी मिस्ट्री है… जो शुरू तो हुई, लेकिन कभी सुलझी नहीं।

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