🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

टैग: #रहस्मयी

  • एक मिस्ट्री जो सुलझी नहीं

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक मिस्ट्री जो सुलझी नहीं

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुरानी हवेली थी। लोग उसे “नीली हवेली” कहते थे। दिन में भी वह जगह कुछ अजीब लगती थी, लेकिन रात होते ही उसके बारे में तरह-तरह की बातें होने लगती थीं।

     

    कहा जाता था कि करीब बीस साल पहले उस हवेली में रहने वाला एक परिवार अचानक गायब हो गया था। घर में सामान तक वैसा ही पड़ा मिला था, जैसे लोग बस कुछ देर के लिए बाहर गए हों। मगर वे कभी वापस नहीं आए।

     

    सबसे अजीब बात यह थी कि उस घर की सबसे छोटी बच्ची की एक तस्वीर हवेली में मिली थी, लेकिन उसके बाद उस बच्ची का कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।

     

    बीस साल बाद मीरा उस हवेली के सामने खड़ी थी।

     

    मीरा बीस साल की एक शांत लेकिन जिज्ञासु लड़की थी। उसके हाथ में एक पुरानी भूरी डायरी थी, जो उसे अपनी नानी के पुराने सामान में मिली थी। डायरी के पहले ही पन्ने पर वही निशान बना था, जो नीली हवेली की दीवार पर भी बना हुआ था।

     

    मीरा ने धीरे से कहा,

    “आखिर इस निशान का राज क्या है?”

     

    तभी उसके पीछे से आवाज आई।

     

    “अगर तुम सच जानना चाहती हो, तो अंदर मत जाना।”

     

    मीरा पलटी। सामने एक रहस्यमयी युवक खड़ा था।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    युवक ने कुछ देर उसे देखा और बोला,

    “मुझे नाम से ज्यादा उस घर की कहानी पता है।”

     

    “तो फिर मुझे बताओ।”

     

    “हर कहानी बताने के लिए नहीं होती।”

     

    मीरा ने डायरी कसकर पकड़ ली।

     

    “लेकिन मैं जानना चाहती हूं कि इस निशान का मेरी जिंदगी से क्या संबंध है।”

     

    युवक का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि इसका तुम्हारी जिंदगी से संबंध है?”

     

    मीरा ने डायरी खोलकर उसे निशान दिखाया।

     

    “क्योंकि यही निशान मुझे बचपन से सपनों में दिखाई देता है।”

     

    युवक कुछ नहीं बोला।

     

    दोनों हवेली के अंदर चले गए।

     

    अंदर धूल से ढकी पुरानी मेजें, बंद खिड़कियां और दीवारों पर लगे धुंधले चित्र थे। मीरा धीरे-धीरे एक कमरे में पहुंची। वहां लकड़ी की एक पुरानी मेज रखी थी।

     

    मेज की दराज में उसे एक दूसरी डायरी मिली।

     

    डायरी खोलते ही मीरा के हाथ कांपने लगे।

     

    एक पन्ने पर एक छोटी बच्ची की तस्वीर चिपकी थी।

     

    मीरा तस्वीर को देखते ही चुप हो गई।

     

    वह बच्ची बिल्कुल उसी जैसी दिख रही थी।

     

    “ये… मैं हूं।”

     

    युवक ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    “नहीं। यह संभव नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह तस्वीर बीस साल पुरानी है।”

     

    मीरा की आंखों में सवाल थे।

     

    “तो फिर मैं इस तस्वीर में कैसे हो सकती हूं?”

     

    युवक ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहां वही रहस्यमयी निशान बना था और उसके नीचे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जब वह लौटेगी, सच फिर से जाग जाएगा।”

     

    मीरा ने पूछा,

    “वह कौन?”

     

    युवक ने जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक कमरे के बाहर कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    दोनों बाहर आए, लेकिन गलियारा खाली था।

     

    मीरा ने देखा कि दीवार पर लगा एक पुराना चित्र थोड़ा टेढ़ा था। उसने उसे सीधा किया तो पीछे एक छोटा सा कागज मिला।

     

    कागज पर लिखा था—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रही हो, वह तुम्हारे सबसे करीब है।”

     

    मीरा ने युवक की तरफ देखा।

     

    “क्या तुम जानते हो कि यहां क्या हुआ था?”

     

    वह कुछ देर चुप रहा।

     

    “मेरे पिता इस हवेली की देखभाल करते थे। उस रात उन्होंने मुझे घर से बाहर भेज दिया था। सुबह जब मैं वापस आया, तो पूरा परिवार गायब था।”

     

    “और तुम्हारे पिता?”

     

    “वह भी।”

     

    “फिर तुम इतने सालों से इस घर में क्यों आते रहे?”

     

    युवक ने धीमे स्वर में कहा,

    “क्योंकि मेरे पिता ने जाते वक्त मुझे एक बात कही थी।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर कभी वह लड़की वापस आए, तो उसे डायरी दे देना।”

     

    मीरा की सांस जैसे रुक गई।

     

    “कौन-सी लड़की?”

     

    युवक ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों बिल्कुल शांत रहे।

     

    मीरा ने डायरी का आखिरी पन्ना खोला। वहां एक नक्शा बना था। नक्शे में हवेली के नीचे बने किसी पुराने कमरे का रास्ता दिखाया गया था।

     

    दोनों उस रास्ते को ढूंढते हुए तहखाने तक पहुंचे।

     

    वहां एक लोहे का दरवाजा था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था।

     

    मीरा ने कांपते हाथ से निशान को छुआ।

     

    दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था। कमरे के बीच में लकड़ी की कुर्सी और उसके सामने एक पुराना आईना रखा था।

     

    आईने के नीचे एक कागज पड़ा था।

     

    मीरा ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “सच जानने से पहले यह तय कर लो कि तुम उसे सह पाओगी या नहीं।”

     

    मीरा ने युवक से कहा,

    “मैं पीछे नहीं हटूंगी।”

     

    वह धीरे से बोला,

    “तो फिर आईने के पीछे देखो।”

     

    मीरा ने आईना हटाया।

     

    पीछे दीवार पर दर्जनों तस्वीरें थीं।

     

    उन सभी तस्वीरों में वही बच्ची थी।

     

    कभी हवेली में।

     

    कभी किसी गांव में।

     

    कभी एक अनजान आदमी के साथ।

     

    लेकिन सबसे आखिरी तस्वीर देखकर मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उस तस्वीर में वही बच्ची एक महिला के साथ खड़ी थी।

     

    वह महिला मीरा की मां जैसी दिख रही थी।

     

    मीरा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी मां… यहां क्यों थी?”

     

    युवक ने तस्वीर हाथ में ली।

     

    “शायद तुम्हारी मां इस राज को जानती थीं।”

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं बताया।”

     

    तभी डायरी का एक छिपा हुआ पन्ना नीचे गिरा।

     

    उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

     

    “वह जिंदा है।”

     

    मीरा ने घबराकर पूछा,

    “कौन?”

     

    लेकिन इस बार युवक भी जवाब नहीं दे पाया।

     

    तभी बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    दोनों दौड़कर बाहर आए।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    मगर वहां कोई नहीं था।

     

    बस फर्श पर एक नया कागज पड़ा था।

     

    मीरा ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर तुम यहां तक पहुंच गई हो, तो समझो कहानी खत्म नहीं हुई… असली रहस्य अब शुरू हुआ है।”

     

    मीरा ने युवक की तरफ देखा।

     

    “इसका मतलब जिसने यह सब लिखा, वह अभी भी जिंदा है?”

     

    युवक ने धीमे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    “और मेरी मां?”

     

    “शायद वह भी इस राज का हिस्सा थीं।”

     

    “और वह बच्ची?”

     

    युवक ने मीरा की तरफ देखा।

     

    “शायद वह तुम थीं… या शायद किसी ने तुम्हें यह विश्वास दिलाया कि तुम वही बच्ची हो।”

     

    मीरा कुछ बोल नहीं पाई।

     

    अगले दिन पुलिस को हवेली बिल्कुल खाली मिली।

     

    मेज पर सिर्फ दो डायरी थीं।

     

    मीरा और वह रहस्यमयी युवक कहीं नहीं थे।

     

    आज बीस साल बाद भी नीली हवेली बंद है।

     

    लोग कहते हैं कि कभी-कभी रात में उसके अंदर से पन्ने पलटने की आवाज आती है।

     

    कभी किसी लड़की की धीमी आवाज सुनाई देती है—

     

    “सच आखिर है क्या?”

     

    और हवेली की दीवार पर बना वह रहस्यमयी निशान आज भी वैसा ही है।

     

    किसी को नहीं पता कि मीरा कहां गई।

     

    किसी को यह भी नहीं पता कि उस तस्वीर वाली बच्ची वास्तव में कौन थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल…

     

    क्या मीरा उस रहस्य को सुलझाने गई थी, या वह खुद उस रहस्य का सबसे बड़ा हिस्सा थी?

     

    आज तक इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला।

     

    यह एक ऐसी मिस्ट्री है… जो शुरू तो हुई, लेकिन कभी सुलझी नहीं।

  • बंद कमरे का राज

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 2: बंद कमरे का राज

     

    अंदर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनकर शौर्य कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “भाई… अंदर कोई है।”

     

    शौर्य ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “मुझे भी यही लग रहा है।”

     

    अनाया ने उसका हाथ रोकते हुए कहा, “दरवाजा मत खोलो।”

     

    शौर्य बोला, “लेकिन अगर अंदर कोई फंसा हुआ है तो?”

     

    कबीर ने माथा पीट लिया।

     

    “तू सुधरने वाला नहीं है।”

     

    शौर्य ने धीरे से दरवाजा खोल दिया।

     

    दरवाजा खुलते ही तीनों की नजर कमरे के अंदर गई।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    अंदर पुरानी अलमारी, एक मेज और कुछ लकड़ी के बक्से रखे थे। खिड़की आधी खुली हुई थी और हवा के कारण पर्दा हिल रहा था।

     

    कबीर ने तुरंत कहा, “मैंने कहा था ना, यहां कुछ गड़बड़ है।”

     

    शौर्य खिड़की के पास गया।

     

    “शायद हवा से कोई चीज हिली होगी।”

     

    कबीर बोला, “और दरवाजा किसने खटखटाया?”

     

    शौर्य ने मजाक करते हुए कहा, “शायद इस घर का चौकीदार भूत होगा।”

     

    “भाई!”

     

    अनाया ने दोनों को चुप कराया।

     

    “मजाक बंद करो। हमें यहां कुछ ढूंढना है।”

     

    वह धीरे-धीरे कमरे में आगे बढ़ी। तभी उसकी नजर मेज पर रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

     

    डायरी के ऊपर उसके पिता का नाम लिखा था।

     

    अनाया ने डायरी उठा ली।

     

    उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    शौर्य उसके पास आकर बोला, “खोलो।”

     

    अनाया ने पहला पन्ना खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर यह डायरी मेरी बेटी के हाथ लगे, तो उसे सच जरूर बताना।”

     

    अनाया की आंखें भर आईं।

     

    “ये मेरे पापा की लिखावट है।”

     

    शौर्य चुपचाप उसके पास खड़ा रहा।

     

    डायरी के अगले पन्नों में कई साल पुरानी बातें लिखी थीं। उसके पिता और शौर्य के पिता बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों ने मिलकर एक छोटा कारोबार शुरू किया था। शुरुआत में सब ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ साल बाद अचानक कारोबार में बड़ा नुकसान हो गया।

     

    सारा दोष दोनों दोस्तों पर लगाया गया।

     

    अनाया के पिता ने खुद को दोषी समझ लिया और परिवार से दूर चले गए।

     

    लेकिन डायरी में आगे लिखा था कि उन्हें बाद में पता चला था कि कारोबार में असली गड़बड़ी किसी तीसरे आदमी ने की थी।

     

    अनाया ने पन्ना पलटा।

     

    एक जगह लिखा था—

     

    “गलती मेरी नहीं थी। असली धोखा उस आदमी ने दिया था जिस पर हमने सबसे ज्यादा भरोसा किया।”

     

    शौर्य ने पूछा, “कौन आदमी?”

     

    डायरी में नाम नहीं था।

     

    अनाया ने अगले पन्ने पलटे, लेकिन कई पन्ने फाड़े हुए थे।

     

    शौर्य बोला, “किसी ने जानबूझकर ये पन्ने निकाले हैं।”

     

    तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    कबीर ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “कोई बाहर है।”

     

    शौर्य ने इशारे से उसे शांत रहने को कहा।

     

    वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया और बाहर झांका।

     

    गलियारा खाली था।

     

    शौर्य वापस कमरे में आया।

     

    “कोई नहीं है।”

     

    कबीर बोला, “अभी मैंने साफ कदमों की आवाज सुनी थी।”

     

    अनाया ने डायरी बंद करते हुए कहा, “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

     

    शौर्य ने कहा, “पहले देखते हैं कि इस कमरे में और क्या है।”

     

    वह पुराने बक्से खोलने लगा।

     

    पहले बक्से में पुराने कपड़े थे।

     

    दूसरे में कुछ तस्वीरें।

     

    तीसरे बक्से में एक लिफाफा था।

     

    शौर्य ने लिफाफा उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “शौर्य के पिता के लिए।”

     

    शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पुराना कागज था।

     

    उसमें लिखा था कि अगर कभी सच्चाई सामने लानी पड़े तो कुछ खास दस्तावेज एक पुराने पुल के पास छिपाए गए हैं।

     

    कबीर ने पूछा, “पुराना पुल?”

     

    शौर्य ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    तभी नीचे से अचानक किसी ने आवाज लगाई।

     

    “शौर्य!”

     

    शौर्य चौंक गया।

     

    “ये मां की आवाज है।”

     

    वह जल्दी से नीचे भागा।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर उसकी मां नहीं थीं।

     

    बल्कि एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।

     

    उसने शौर्य को देखते ही कहा, “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

     

    शौर्य ने पूछा, “आप कौन हैं?”

     

    आदमी ने अपना नाम रघुवीर बताया।

     

    “मैं तुम्हारे पिता का पुराना दोस्त हूं।”

     

    शौर्य ने तुरंत पूछा, “आप मेरे पापा को जानते थे?”

     

    रघुवीर ने नजरें झुका लीं।

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    अनाया भी नीचे आ गई।

     

    रघुवीर उसे देखते ही चौंक गया।

     

    “तुम…?”

     

    अनाया ने कहा, “मैं अपने पिता का सच जानने आई हूं।”

     

    रघुवीर कुछ देर तक चुप रहा।

     

    उसके चेहरे से लग रहा था कि वह कुछ ऐसा जानता है जो इतने सालों से किसी से छिपा रहा था।

     

    आखिर उसने धीमी आवाज में कहा, “तुम्हारे पिता बुरे आदमी नहीं थे।”

     

    “फिर उन्होंने घर क्यों छोड़ा?”

     

    रघुवीर ने लंबी सांस ली।

     

    “क्योंकि उन्हें फंसाया गया था।”

     

    शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “किसने?”

     

    रघुवीर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

     

    उसने पहले कमरे की तरफ देखा, फिर खिड़की के बाहर।

     

    “यह बात यहां नहीं होनी चाहिए।”

     

    शौर्य ने पूछा, “क्यों?”

     

    रघुवीर बोला, “क्योंकि जिस आदमी ने तुम्हारे परिवार को तोड़ा था, उसे पता चल चुका है कि तुम इस घर में आए हो।”

     

    कबीर घबरा गया।

     

    “लेकिन उसे कैसे पता चला?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि इस घर पर इतने सालों से नजर रखी जा रही है।”

     

    शौर्य ने हैरानी से पूछा, “किसकी?”

     

    रघुवीर कुछ बोलता, उससे पहले बाहर एक गाड़ी आकर रुकी।

     

    रघुवीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसका चेहरा अचानक घबरा गया।

     

    “तुम दोनों को यहां से जाना होगा।”

     

    शौर्य ने मना कर दिया।

     

    “नहीं। इस बार मैं भागूंगा नहीं।”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता भी यही कहते थे।”

     

    शौर्य चुप हो गया।

     

    रघुवीर ने जेब से एक छोटी सी चाबी निकाली और शौर्य को देते हुए कहा, “इसे संभालकर रखना। इसमें तुम्हारे पिता के सच तक पहुंचने का रास्ता है।”

     

    शौर्य ने चाबी को देखा।

     

    “ये किसकी है?”

     

    रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

     

    ठक… ठक…

     

    रघुवीर फुसफुसाया, “पीछे के रास्ते से निकलो।”

     

    शौर्य ने पूछा, “और आप?”

     

    “मैं संभाल लूंगा।”

     

    शौर्य जाना नहीं चाहता था, लेकिन रघुवीर ने उसे धक्का देकर पीछे वाले रास्ते की तरफ भेज दिया।

     

    तीनों किसी तरह घर से बाहर निकल गए।

     

    कुछ दूर जाकर शौर्य ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    पुराना घर बिल्कुल शांत खड़ा था।

     

    लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि कोई खिड़की से उन्हें देख रहा है।

     

    रात को शौर्य घर लौटा तो उसकी मां दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    “कहां था?”

     

    शौर्य ने पहली बार अपनी मां से सब कुछ पूछने की ठानी।

     

    “मां, पापा और अनाया के पिता के बीच क्या हुआ था?”

     

    मां का चेहरा उतर गया।

     

    कुछ देर तक वह चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारे पापा ने हमेशा कहा था कि उस मामले को दोबारा मत छेड़ना।”

     

    “क्यों?”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा को डर था कि अगर सच बाहर आया, तो तुम्हारी जान खतरे में पड़ सकती है।”

     

    शौर्य सन्न रह गया।

     

    “मां, क्या आपको पता है कि असली गुनहगार कौन था?”

     

    मां ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर बोलीं, “नाम तो नहीं बता सकती… लेकिन एक आदमी था जिस पर तुम्हारे पापा आंख बंद करके भरोसा करते थे।”

     

    शौर्य को तुरंत रघुवीर की बात याद आई।

     

    उसने पूछा, “क्या वो आदमी अब भी हमारे आसपास है?”

     

    मां ने जवाब देने के बजाय कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “शौर्य, अब इस मामले से दूर रहो।”

     

    शौर्य ने कहा, “मां, मैं अब पीछे नहीं हट सकता।”

     

    उसी रात उसके फोन पर एक संदेश आया।

     

    “अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

     

    शौर्य ने संदेश पढ़ा।

     

    कबीर ने पूछा, “किसका मैसेज है?”

     

    शौर्य ने फोन बंद कर दिया।

     

    “पता नहीं।”

     

    लेकिन उसके चेहरे से साफ था कि वह जानता था—ये उसी राज से जुड़ा था।

     

    उसने खिड़की से बाहर देखा और मन ही मन कहा—

     

    “अब चाहे कुछ भी हो जाए, मैं पापा का नाम साफ करके रहूंगा।”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले दिन पुराने पुल पर उसका सामना उस इंसान से होने वाला था, जिसका नाम उसकी पूरी जिंदगी बदल देने वाला था।

  • खन खन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    खन-खन की मनाही

     

    पहाड़ों और घने जंगलों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव था “चंद्रपुर” देखने में वह गांव किसी जन्नत से कम नहीं था। चारों ओर हरियाली, खेतों में लहलहाती फसलें और नदी का मीठा पानी। लेकिन उस गांव का एक अजीब नियम था।

     

    उस गांव की कोई भी औरत अपने पैरों में पायल नहीं पहनती थी।

     

    यहां तक कि शादी के दिन भी दुल्हन के पैरों में पायल नहीं बांधी जाती थी। गांव की बूढ़ी दादियां हमेशा अपनी बेटियों और बहुओं से कहती थीं,

     

    “बेटी, चाहे सोने के गहने पहन लेना, लेकिन भूलकर भी पायल मत पहनना। उसकी खन-खन पूरे गांव पर मौत बनकर टूट सकती है।”

     

    नई पीढ़ी इस बात पर यकीन नहीं करती थी। उन्हें लगता था कि यह सिर्फ पुरानी सोच है।

     

    उसी गांव में चंदा नाम की एक 20 साल की लड़की रहती थी। वह बहुत सुंदर, समझदार और थोड़ा जिद्दी स्वभाव की थी। कुछ ही दिनों बाद उसकी शादी होने वाली थी।

     

    जब उसकी सहेलियां दूसरे गांव से लौटीं तो वे तरह-तरह की चांदी की पायलें लेकर आईं।

     

    “देख चंदा, कितनी सुंदर है ना?” एक सहेली बोली।

     

    चंदा ने पहली बार इतनी खूबसूरत पायल देखी। उसके मन में भी इच्छा हुई।

     

    घर आकर उसने अपनी दादी से पूछा,

    “दादी, आखिर पायल पहनने से ऐसा क्या हो जाएगा?”

     

    दादी का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    उन्होंने कहा,

    “ये कहानी आज से करीब दो सौ साल पुरानी है।”

     

    सभी लोग उनके आसपास बैठ गए।

     

    दादी बोलीं,

    “पहले हमारे गांव में हर लड़की पायल पहनती थी। पूरे गांव में दिन-रात उसकी मीठी खन-खन गूंजती रहती थी। लेकिन जंगल के उस पार एक भयानक राक्षस रहता था—घोरासुर। उसके कान इतने तेज थे कि वह कई कोस दूर की आवाज भी सुन लेता था।”

     

    “उसे सबसे ज्यादा पायल की आवाज पसंद थी। जहां भी खन-खन सुनाई देती, वह समझ जाता कि वहां इंसान रहते हैं। फिर वह रात के अंधेरे में आता और पूरे गांव को उजाड़ देता।”

     

    “एक रात उसने हमारे गांव पर हमला कर दिया। कई लोग मारे गए। गांव जल गया। तब एक साधु ने गांव वालों से कहा—’अगर जीना चाहते हो तो आज के बाद इस गांव की कोई भी स्त्री पायल नहीं पहनेगी। जब तक खन-खन नहीं होगी, राक्षस यहां का रास्ता भूल जाएगा।’”

     

    तभी से यह नियम बन गया।

     

    चंदा ने कहानी तो सुन ली, लेकिन उसके मन ने इसे सच नहीं माना।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी शादी का दिन आ गया।

     

    दूल्हा दूसरे गांव से आया था। वहां की परंपरा के अनुसार दुल्हन को चांदी की पायल पहनाई जाती थी।

     

    दूल्हे की मां ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “हमारी बहू बिना पायल के कैसी लगेगी?”

     

    चंदा की मां ने हाथ जोड़कर मना कर दिया।

     

    लेकिन रात को चंदा ने वही सुंदर पायल चुपके से निकाल ली।

     

    उसने सोचा,

    “बस थोड़ी देर पहनकर देखती हूं। किसी को क्या पता चलेगा?”

     

    उसने जैसे ही पायल पहनी…

     

    छन… छन… छन…

     

    कमरे में मीठी आवाज गूंज उठी।

     

    चंदा मुस्कुरा दी।

     

    उसे क्या पता था कि कई कोस दूर, काले पहाड़ के भीतर एक विशाल गुफा में सोया हुआ घोरासुर अचानक आंखें खोल चुका था।

     

    उसके कान फड़क उठे।

     

    वह धीरे-धीरे मुस्कुराया।

     

    “आखिर… इतने साल बाद फिर वही आवाज…”

     

    उसने हवा को सूंघा।

     

    “चंद्रपुर…”

     

    इतना कहकर वह बिजली की रफ्तार से जंगल की ओर दौड़ पड़ा।

     

    उधर गांव में अचानक कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे।

     

    पेड़ों पर बैठे पक्षी रात में ही उड़ने लगे।

     

    गांव के सबसे बूढ़े पुजारी ने यह सब देखा तो उनका चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उन्होंने चिल्लाकर कहा,

    “सब लोग घरों के अंदर चले जाओ। किसी ने पायल पहनी है!”

     

    पूरा गांव घबरा गया।

     

    लोग मशालें लेकर दौड़ पड़े।

     

    तभी चंदा डर गई।

     

    उसने तुरंत पायल उतार दी।

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    धरती कांपने लगी।

     

    जंगल से ऐसी दहाड़ सुनाई दी कि बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।

     

    कुछ ही देर में पेड़ टूटने लगे।

     

    घोरासुर गांव के बाहर खड़ा था।

     

    उसकी लंबाई किसी पेड़ जितनी थी। लाल आंखें अंगारों जैसी जल रही थीं।

     

    वह गरजा,

    “मुझे पता है… तुम यहीं हो… जिसने पायल पहनी है।”

     

    गांव में सन्नाटा छा गया।

     

    चंदा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वह खुद आगे आ गई।

     

    “गलती मेरी है। किसी और को मत मारो।”

     

    गांव वाले उसे रोकने लगे, लेकिन वह नहीं रुकी।

     

    राक्षस उसकी ओर बढ़ने लगा।

     

    तभी गांव के मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी।

     

    वही साधु, जिनकी कहानी दादी ने सुनाई थी, जैसे अचानक वहां प्रकट हो गए। उनके हाथ में एक पुराना त्रिशूल था।

     

    उन्होंने कहा,

    “घोरासुर! तेरी ताकत आवाज में है। लेकिन आज तेरे अहंकार का अंत होगा।”

     

    राक्षस जोर से हंसा।

     

    “मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

     

    साधु ने त्रिशूल जमीन में गाड़ दिया।

     

    पूरा गांव तेज रोशनी से भर गया।

     

    घोरासुर आगे बढ़ना चाहता था, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में धंस गए।

     

    साधु बोले,

    “जिस आवाज के पीछे तू सदियों से भागता रहा, वही आज तेरे विनाश का कारण बनेगी।”

     

    उन्होंने चंदा से कहा,

    “बेटी, वह पायल फिर से पहन लो।”

     

    चंदा घबरा गई।

     

    “लेकिन… इससे तो ये और ताकतवर हो जाएगा।”

     

    साधु मुस्कुराए।

     

    “आज नहीं।”

     

    चंदा ने कांपते हाथों से पायल पहन ली।

     

    उसने धीरे से एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    छन… छन… छन…

     

    इस बार पायल की आवाज पूरे गांव में गूंज उठी।

     

    लेकिन इस बार वह साधारण आवाज नहीं थी।

     

    त्रिशूल से निकली दिव्य शक्ति उस खन-खन में मिल गई।

     

    घोरासुर दर्द से तड़पने लगा।

     

    वह अपने कान बंद करने लगा।

     

    “नहीं… ये क्या हो रहा है…!”

     

    जितनी बार पायल बजती, उसकी ताकत उतनी ही कम होती जाती।

     

    कुछ ही पलों में उसका विशाल शरीर पत्थर बनने लगा।

     

    उसने आखिरी बार गुस्से से दहाड़ लगाई।

     

    फिर पूरा शरीर पत्थर की मूर्ति बनकर वहीं खड़ा रह गया।

     

    अगले ही पल वह हजारों टुकड़ों में टूटकर धूल बन गया।

     

    गांव वाले खुशी से झूम उठे।

     

    सदियों पुराना डर आखिर खत्म हो चुका था।

     

    साधु मुस्कुराए और बोले,

    “डर हमें बचा सकता है, लेकिन हमेशा डर में जीना सही नहीं। समझदारी और साहस मिल जाएं तो सबसे बड़ा राक्षस भी हार जाता है।”

     

    इतना कहकर वे वहां से अदृश्य हो गए।

     

    कुछ महीनों बाद पूरे गांव में पहली बार एक नई परंपरा शुरू हुई।

     

    हर लड़की अपने पैरों में पायल पहनने लगी।

     

    अब वही खन-खन, जो कभी मौत की निशानी थी, गांव की खुशियों की पहचान बन गई।

     

    और आज भी जब चंद्रपुर की ग

    लियों में पायल की मधुर आवाज गूंजती है, तो बुजुर्ग मुस्कुराकर अपने बच्चों से कहते हैं,

     

    “ये सिर्फ पायल की खन-खन नहीं… ये उस साहस की आवाज है जिसने पूरे गांव को हमेशा के लिए भय से मुक्त कर दिया।”