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श्रेणी: श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता 🏆

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

     

    (भाग 15 — वृंदावन की मधुर बाल-लीलाओं का भावपूर्ण समापन)

     

     

     

    वृंदावन में एक ऐसी सुबह हुई, जैसी पहले कभी नहीं हुई थी।

     

    आकाश साफ था।

     

    यमुना का जल शांत था।

     

    कदंब के वृक्षों पर पक्षी मधुर स्वर में चहचहा रहे थे।

     

    गायें अपने बछड़ों के पास खड़ी थीं और उनके गले में बँधी घंटियाँ हवा के साथ धीरे-धीरे बज रही थीं।

     

    वृंदावन की गलियाँ वही थीं।

     

    नंद बाबा का भवन वही था।

     

    यशोदा मैया का आँगन वही था।

     

    गोवर्धन पर्वत भी उसी प्रकार खड़ा था।

     

    लेकिन फिर भी…

     

    सब कुछ जैसे बदल गया था।

     

    क्योंकि उन गलियों में आज कृष्ण की शरारती हँसी पहले जैसी नहीं गूँज रही थी।

     

    वही कन्हैया, जो कभी सुबह होते ही घर से बाहर भाग जाते थे, आज कुछ अधिक शांत दिखाई दे रहे थे।

     

    यशोदा मैया उन्हें देखतीं तो उनका हृदय भर आता।

     

    उन्हें याद आता—

     

    जब कृष्ण बहुत छोटे थे, तब वह उनकी उँगली पकड़कर चलते थे।

     

    कभी लड़खड़ाते हुए गिर जाते।

     

    फिर उठकर मैया की ओर देखते और हँस देते।

     

    मैया उन्हें गोद में उठा लेतीं।

     

    “मेरा लाल!”

     

    और कृष्ण उनकी गोद में सिर रखकर मुस्कुरा देते।

     

    समय कितनी जल्दी बीत गया था।

     

    कल तक जो बालक माखन की मटकी के लिए घर-घर घूमता था, वही अब बड़ा होने लगा था।

     

    यशोदा मैया को अपनी हर पुरानी बात याद आने लगी।

     

    कभी कृष्ण माखन चुराकर भागते थे।

     

    कभी गोपियाँ शिकायत लेकर आती थीं।

     

    “मैया! तुम्हारा कन्हैया हमारे घर का सारा माखन खा गया।”

     

    यशोदा मैया कृष्ण को बुलातीं—

     

    “कन्हैया!”

     

    कृष्ण दूर खड़े होकर मासूम चेहरा बना लेते।

     

    “मैया, मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    मैया कहतीं,

     

    “तो फिर माखन कहाँ गया?”

     

    कृष्ण कहते,

     

    “बिल्ली खा गई होगी।”

     

    गोपियाँ हँसने लगतीं।

     

    कृष्ण भी मुस्कुराते।

     

    वही नटखटपन…

     

    वही मुस्कान…

     

    वही बड़ी-बड़ी आँखें…

     

    सब कुछ जैसे कल की ही बात हो।

     

    फिर यशोदा मैया को वह दिन याद आया जब उन्होंने कृष्ण को रस्सी से बाँधने का प्रयास किया था।

     

    कितनी रस्सियाँ जोड़ ली थीं, फिर भी वह छोटी पड़ जाती थीं।

     

    लेकिन जब कृष्ण ने स्वयं अपने भक्त के प्रेम को स्वीकार किया, तब वही अनंत भगवान एक छोटी-सी रस्सी से बँध गए।

     

    यशोदा मैया की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा—

     

    “मेरे लाल, तुम कितने बड़े हो, यह मैं कभी समझ नहीं पाई। मेरे लिए तो तुम हमेशा मेरे बच्चे ही रहे।”

     

    वह मुस्कुराईं।

     

    “और शायद यही मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

     

    उधर कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ बैठे थे।

     

    सुदामा, श्रीदामा और दूसरे सखा उन्हें घेरकर बैठे थे।

     

    एक बालक बोला,

     

    “कन्हैया, याद है जब हम सब जंगल में खो गए थे?”

     

    दूसरा बोला,

     

    “और याद है जब तुमने हमें इतना हँसाया था कि हमारे पेट में दर्द होने लगा था?”

     

    तीसरा हँसते हुए बोला,

     

    “और जब तुमने मेरा भोजन चुरा लिया था?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “मैंने कब चुराया था?”

     

    सब एक साथ बोले,

     

    “तुम हमेशा यही कहते हो!”

     

    चारों ओर हँसी गूँज उठी।

     

    लेकिन उस हँसी के भीतर एक हल्की-सी उदासी भी थी।

     

    सब जानते थे कि बचपन हमेशा नहीं रहता।

     

    दिन बदलते हैं।

     

    ऋतुएँ बदलती हैं।

     

    समय आगे बढ़ता है।

     

    और बचपन की स्मृतियाँ धीरे-धीरे कहानी बन जाती हैं।

     

    लेकिन कृष्ण की बाल-लीलाएँ साधारण स्मृतियाँ नहीं थीं।

     

    वह तो वृंदावन के जीवन का प्राण बन चुकी थीं।

     

    एक गाय कृष्ण को देखकर रंभाने लगी।

     

    कृष्ण उसके पास गए।

     

    उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    गाय ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    मानो वह कह रही हो—

     

    “कन्हैया, हमें छोड़कर मत जाना।”

     

    कृष्ण ने उसके माथे को सहलाया।

     

    उनकी आँखों में भी प्रेम था।

     

    वृंदावन की गायें कृष्ण से कितना प्रेम करती थीं, यह कोई शब्दों में नहीं बता सकता।

     

    जब कृष्ण वन में जाते, गायें उनके पीछे चल पड़तीं।

     

    जब कृष्ण बाँसुरी बजाते, तो वे चरना भूलकर उनकी ओर देखने लगतीं।

     

    जब कृष्ण देर से लौटते, तो उनके आने तक जैसे पूरा वन प्रतीक्षा करता रहता।

     

    यमुना भी कृष्ण से कम प्रेम नहीं करती थी।

     

    उसके तट पर कृष्ण ने कितने ही दिन बिताए थे।

     

    कभी सखाओं के साथ खेलते।

     

    कभी पानी में उतर जाते।

     

    कभी कदंब वृक्ष पर चढ़ते।

     

    और कभी अपनी बाँसुरी बजाकर वातावरण को ऐसा मधुर बना देते कि पक्षी तक चुप हो जाते।

     

    यमुना की लहरें आज भी उनके चरणों को याद करती थीं।

     

    कालिय नाग का विष भी जिस यमुना को दूषित कर चुका था, उसी यमुना को कृष्ण ने अपने स्पर्श से फिर निर्मल किया था।

     

    और फिर गोवर्धन…

     

    वह पर्वत तो कृष्ण की बाल-लीला का साक्षी बन चुका था।

     

    जब इंद्र के क्रोध से वृंदावन पर भयंकर वर्षा हुई थी, तब नंदलाल ने अपनी छोटी-सी उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया था।

     

    उस दिन वृंदावनवासियों ने देखा था कि प्रेम के लिए ईश्वर किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।

     

    कृष्ण ने उन्हें केवल वर्षा से नहीं बचाया था।

     

    उन्होंने उनके मन से भय भी निकाल दिया था।

     

    यही कृष्ण थे।

     

    जो संकट में रक्षा करते थे।

     

    जो दुख में मुस्कान देते थे।

     

    जो रोते हुए को हँसा देते थे।

     

    जो अहंकार को झुका देते थे।

     

    जो शत्रु को भी सुधारने का अवसर देते थे।

     

    और जो अपने भक्तों के लिए स्वयं बालक बन जाते थे।

     

    यशोदा मैया धीरे-धीरे बाहर आईं।

     

    कृष्ण को देखकर कुछ पल उन्हें निहारती रहीं।

     

    फिर उन्होंने पुकारा,

     

    “कन्हैया!”

     

    कृष्ण तुरंत उनकी ओर मुड़े।

     

    “जी मैया?”

     

    यशोदा ने कहा,

     

    “इधर आओ।”

     

    कृष्ण उनके पास गए।

     

    मैया ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया।

     

    कृष्ण शांत रहे।

     

    यशोदा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “लाला… तू चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, मेरे लिए हमेशा वही छोटा-सा कन्हैया रहेगा।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “मैया, मैं कहीं नहीं जाऊँगा।”

     

    यशोदा ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।

     

    लेकिन समय अपनी गति से चलता रहा।

     

    कृष्ण को वृंदावन से आगे जाना था।

     

    उनकी लीला का अगला अध्याय उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

     

    लेकिन वृंदावन के लिए यह विदाई केवल किसी बालक की विदाई नहीं थी।

     

    यह उनके हृदय के एक हिस्से की विदाई थी।

     

    ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर खड़े थे।

     

    श्रीदामा की आँखें नम थीं।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “कन्हैया, क्या तुम हमें भूल जाओगे?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अपने सखा को कोई भूल सकता है क्या?”

     

    एक अन्य बालक बोला,

     

    “फिर हमारे साथ खेलने कौन आएगा?”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “जब भी तुम मुझे याद करोगे, मैं तुम्हारे पास रहूँगा।”

     

    बालक ने पूछा,

     

    “सच?”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “बिल्कुल सच।”

     

    उसने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    वृंदावन के पेड़ जैसे मौन होकर यह दृश्य देख रहे थे।

     

    हवा धीरे-धीरे चल रही थी।

     

    यमुना की लहरें किनारे से टकरा रही थीं।

     

    ऐसा लग रहा था मानो पूरा वृंदावन कृष्ण को रोकना चाहता हो।

     

    लेकिन लीला को आगे बढ़ना था।

     

    कृष्ण ने एक बार पीछे मुड़कर वृंदावन को देखा।

     

    उनकी आँखों के सामने सब कुछ था—

     

    नंद बाबा का घर।

     

    यशोदा मैया का आँगन।

     

    गोपियों की गलियाँ।

     

    गायों के झुंड।

     

    ग्वाल-बालों की हँसी।

     

    यमुना का तट।

     

    गोवर्धन पर्वत।

     

    कदंब के वृक्ष।

     

    माखन की मटकी।

     

    और उनके बचपन की अनगिनत स्मृतियाँ।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    फिर उन्होंने अपनी बाँसुरी उठाई।

     

    बाँसुरी के होंठों से लगते ही एक मधुर धुन निकली।

     

    वह धुन इतनी करुण और मधुर थी कि जैसे पूरा वृंदावन कुछ क्षण के लिए स्थिर हो गया।

     

    गायें रुक गईं।

     

    पक्षी चुप हो गए।

     

    हवा थम-सी गई।

     

    यमुना की लहरें भी जैसे उस संगीत को सुनने लगीं।

     

    यशोदा मैया ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उनके कानों में वही स्वर गूँज रहा था।

     

    उनके हृदय में वही बालक बस रहा था।

     

    नंद बाबा की आँखों में भी आँसू थे।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा—

     

    “लाला, तू जहाँ भी रहे, सुखी रहे।”

     

    कृष्ण की बाँसुरी की धुन धीरे-धीरे दूर होती गई।

     

    लेकिन वह धुन वृंदावन से कभी गई नहीं।

     

    क्योंकि कुछ ध्वनियाँ कानों से नहीं, हृदय से सुनी जाती हैं।

     

    कृष्ण की बाल-लीलाएँ भी ऐसी ही थीं।

     

    वे केवल एक समय की घटनाएँ नहीं थीं।

     

    वे प्रेम की ऐसी कथाएँ थीं जो युगों-युगों तक मनुष्य के हृदय को छूती रहेंगी।

     

    जब कोई माँ अपने बच्चे को प्यार से गले लगाएगी, उसमें यशोदा का वात्सल्य दिखाई देगा।

     

    जब कोई मित्र अपने मित्र के लिए सब कुछ छोड़ देगा, उसमें कृष्ण और ग्वाल-बालों की मित्रता दिखाई देगी।

     

    जब कोई प्रकृति का सम्मान करेगा, उसमें गोवर्धन पूजा का संदेश दिखाई देगा।

     

    जब कोई अहंकार छोड़कर प्रेम को अपनाएगा, उसमें इंद्र की सीख दिखाई देगी।

     

    जब कोई संकट में किसी की रक्षा करेगा, उसमें गोवर्धन धारण करने वाले कृष्ण की झलक दिखाई देगी।

     

    और जब कोई अपने हृदय में भगवान को प्रेम से पुकारेगा…

     

    तो शायद उसे भी वही बाँसुरी सुनाई देगी।

     

    वह बाँसुरी जो कहती है—

     

    “मैं तुम्हारे पास हूँ।”

     

    वृंदावन की मिट्टी में कृष्ण के चरणों के निशान जैसे हमेशा के लिए अंकित हो गए।

     

    कदंब के वृक्ष उनकी प्रतीक्षा करते रहे।

     

    यमुना उनकी स्मृति सँजोए बहती रही।

     

    गायें उनकी राह देखती रहीं।

     

    ग्वाल-बाल उनकी बातें करते रहे।

     

    और यशोदा मैया…

     

    वह तो हर सुबह अपने आँगन में जैसे आज भी अपने कन्हैया को खोजती थीं।

     

    कभी माखन की मटकी देखतीं तो मुस्कुरा देतीं।

     

    कभी आँगन में किसी बच्चे की हँसी सुनतीं तो पलटकर देखतीं।

     

    कभी किसी को “कन्हैया” पुकारते सुनतीं तो उनका हृदय धड़क उठता।

     

    क्योंकि माँ का प्रेम समय से बँधा नहीं होता।

     

    बच्चा दूर चला जाए, फिर भी माँ की गोद में उसकी जगह खाली नहीं होती।

     

    कृष्ण भी वृंदावन से दूर गए होंगे…

     

    लेकिन वृंदावन कभी कृष्ण से दूर नहीं हुआ।

     

    कृष्ण के लिए वृंदावन केवल एक स्थान नहीं था।

     

    वह प्रेम था।

     

    वह माँ का आँचल था।

     

    वह मित्रों की हँसी थी।

     

    वह गायों की ममता थी।

     

    वह यमुना की लहरें थीं।

     

    वह गोवर्धन की छाया थी।

     

    वह बालपन था।

     

    और शायद इसी कारण आज भी जब कोई प्रेम से कृष्ण का नाम लेता है, तो उसके साथ “वृंदावन” का नाम अपने आप जुड़ जाता है।

     

    राधे-कृष्ण।

     

    दो नाम।

     

    एक प्रेम।

     

    एक अनंत कथा।

     

    और इस कथा का सबसे सुंदर रहस्य यही है कि भगवान को पाने के लिए हमेशा बड़े-बड़े यज्ञ, तप या कठिन साधना ही आवश्यक नहीं।

     

    कभी-कभी एक माँ का निष्कलंक प्रेम ही पर्याप्त होता है।

     

    एक मित्र की सच्ची मित्रता ही पर्याप्त होती है।

     

    एक भक्त की सरल पुकार ही पर्याप्त होती है।

     

    कृष्ण ने अपने बचपन की लीलाओं से यही तो सिखाया—

     

    ईश्वर को पाने का सबसे सरल मार्ग प्रेम है।

     

    जहाँ प्रेम है, वहाँ कृष्ण हैं।

     

    जहाँ करुणा है, वहाँ कृष्ण हैं।

     

    जहाँ सच्ची मित्रता है, वहाँ कृष्ण हैं।

     

    जहाँ किसी के आँसू पोंछने वाला हृदय है, वहाँ कृष्ण हैं।

     

    और जहाँ कोई पूरे विश्वास से कहता है—

     

    “हे नंदलाल, मेरे साथ रहना…”

     

    वहाँ कृष्ण कभी दूर नहीं जाते।

     

    वृंदावन की कथा समाप्त नहीं होती।

     

    क्योंकि कृष्ण की कथा कभी समाप्त हो ही नहीं सकती।

     

    उनकी बाल-लीलाएँ समाप्त हो सकती हैं, लेकिन उनका प्रेम नहीं।

     

    उनका बचपन बीत सकता है, लेकिन उनकी मुस्कान नहीं।

     

    उनकी बाँसुरी की धुन दूर जा सकती है, लेकिन उसकी गूँज भक्त के हृदय से कभी नहीं जाती।

     

    आज भी जब भोर के समय वृंदावन की गलियों में हवा चलती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई धीरे से पुकार रहा हो—

     

    “कन्हैया…”

     

    और शायद उसी क्षण किसी को दूर से बाँसुरी की बहुत हल्की-सी धुन सुनाई देती है।

     

    यमुना की लहरें जैसे कहती हैं—

     

    “वह यहीं है।”

     

    गोवर्धन जैसे कहता है—

     

    “वह यहीं है।”

     

    वृंदावन की धूल जैसे कहती है—

     

    “वह यहीं है।”

     

    और प्रेम से भरा हर हृदय कहता है—

     

    “हाँ… मेरा नंदलाल आज भी यहीं है।”

     

    यही थी हमारे नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाओं की यात्रा।

     

    एक नन्हे बालक के रूप में गोकुल में आगमन से लेकर…

     

    यशोदा मैया की गोद तक…

     

    पूतना के उद्धार से लेकर…

     

    शकटासुर और तृणावर्त के अंत तक…

     

    माखन चोरी और मटकी फोड़ने की शरारतों से लेकर…

     

    यशोदा मैया के प्रेम में बँधने तक…

     

    यमलार्जुन वृक्षों के उद्धार से लेकर…

     

    ग्वाल-बालों के साथ हँसी-खेल तक…

     

    माटी के छोटे-से कण में पूरा ब्रह्मांड दिखाने से लेकर…

     

    ब्रह्मा जी के मोह को दूर करने तक…

     

    कालिय नाग के विष को समाप्त करने से लेकर…

     

    गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी-सी उँगली पर धारण करने तक…

     

    हर लीला हमें एक ही बात सिखाती है—

     

    कृष्ण को समझना कठिन है,

    लेकिन कृष्ण को प्रेम करना बहुत सरल है।

     

    इसलिए जब भी जीवन में कोई कठिनाई आए…

     

    जब मन उदास हो…

     

    जब रास्ता समझ न आए…

     

    बस आँखें बंद करके अपने मन से कहना—

     

    “हे नंदलाल, जैसे आपने वृंदावन की रक्षा की थी, वैसे ही मेरे हृदय की भी रक्षा करना।

    मेरे भीतर का भय दूर करना।

    मेरे भीतर का अहंकार मिटाना।

    और मेरे हृदय में अपने प्रेम की थोड़ी-सी जगह बना लेना।”

     

    शायद तब…

     

    कहीं बहुत दूर से…

     

    यमुना की लहरों के पार…

     

    कदंब के वृक्षों के बीच…

     

    गोवर्धन की छाया में…

     

    आपको भी एक मधुर बाँसुरी सुनाई दे—

     

    “मैं यहीं हूँ…”

     

    और तब समझ लेना—

     

    नंदलाल की बाल-लीलाएँ समाप्त नहीं हुईं।

    वे आज भी उस हर हृदय में चल रही हैं,

    जहाँ कृष्ण के लिए सच्चा प्रेम है।

     

    जय श्रीकृष्ण।❤️❤️

     

    जय नंदलाल।❤️❤️

     

    🙏||राधे राधे||❤️❤️

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

     

     

     

    (भाग 14 — गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला)

     

     

     

     

    वृंदावन में शरद ऋतु का सुहावना समय था। आकाश निर्मल था। यमुना की लहरें चाँदनी में चमकती थीं और गोवर्धन पर्वत के आसपास हरी-हरी घास की चादर बिछी हुई थी।

     

     

    गायों के झुंड उस घास को चरते हुए दूर तक फैल जाते और उनके गले में बँधी घंटियों की मधुर ध्वनि पूरे वन में गूँजती। वृंदावन का जीवन प्रकृति के साथ बहुत गहराई से जुड़ा था। गायें थीं, दूध था, दही था, माखन था। वन था, पर्वत था, यमुना थी। और इन सबके बीच नंदलाल थे, जिनकी मुस्कान से पूरा वृंदावन जैसे जीवित हो उठता था। उसी समय नंद बाबा के घर में एक विशेष तैयारी शुरू हो गई। आँगन में स्त्रियाँ तरह-तरह के पकवान बनाने लगीं। कहीं खीर बन रही थी। कहीं पूरियाँ तली जा रही थीं। कहीं दही मथा जा रहा था। कहीं माखन निकाला जा रहा था। बड़े-बड़े पात्रों में दूध रखा गया था। वृंदावन के लोग उत्साह से एक-दूसरे के घर जा रहे थे। कृष्ण ने यह सब देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने नंद बाबा के पास जाकर पूछा, “बाबा, आज हमारे घर में इतनी सारी तैयारियाँ क्यों हो रही हैं?” नंद बाबा ने कहा, “लाला, आज हम देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे हैं।”

     

     

    कृष्ण ने भोलेपन से पूछा, “इंद्र की पूजा क्यों?” नंद बाबा बोले, “बेटा, इंद्र देव वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से वर्षा होती है। वर्षा से खेतों में अन्न उगता है, घास उगती है और हमारी गायों को भोजन मिलता है। इसलिए हम हर वर्ष उनकी पूजा करते हैं।” कृष्ण कुछ क्षण सोचते रहे। फिर उन्होंने पूछा, “लेकिन बाबा, हमारी गायें कहाँ चरती हैं?” “गोवर्धन पर्वत के पास।”

     

     

    “उन्हें घास कौन देता है?” “गोवर्धन।” “उन्हें जल कहाँ मिलता है?” “गोवर्धन के आसपास की धाराओं और यमुना से।” कृष्ण फिर बोले, “तो फिर बाबा, हमें गोवर्धन पर्वत का धन्यवाद नहीं करना चाहिए?”

     

     

     

    नंद बाबा चुप हो गए। कृष्ण ने आगे कहा, “हमारा जीवन गायों से है। गायों का जीवन घास और जल से है। गोवर्धन हमें घास देता है, वन देता है, जल देता है और हमारी गायों को आश्रय देता है। फिर हम उस गोवर्धन की पूजा क्यों न करें?” वृंदावन के कुछ बड़े-बुजुर्ग भी वहाँ आ गए। किसी ने कहा, “कन्हैया की बात में तो तर्क है।” किसी ने कहा, “लेकिन इंद्र की पूजा तो हमारे पूर्वजों से चली आ रही है।” कृष्ण मुस्कुराए।

     

     

    “बाबा, मेरा कहना है कि हम प्रकृति और अपने कर्म का सम्मान करें। हम गोवर्धन की पूजा करें, गायों की सेवा करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। यही हमारे जीवन का आधार है।”

     

     

     

    नंद बाबा अपने पुत्र को देखते रहे। कृष्ण की बातें एक छोटे बालक की बातें थीं, लेकिन उनमें गहरा सत्य छिपा था। अंततः नंद बाबा ने कहा, “ठीक है लाला। इस बार हम गोवर्धन पूजा करेंगे।” और फिर पूरा वृंदावन गोवर्धन पूजा की तैयारी में लग गया। अनेक प्रकार के पकवान बनाए गए। दूध, दही, घी, माखन, मिठाइयाँ, फल और अनगिनत व्यंजन सजाए गए। गायों को स्नान कराया गया। उनके सींगों पर रंग लगाया गया। उनके गले में सुंदर मालाएँ पहनाई गईं। बच्चे खुशी से इधर-उधर दौड़ रहे थे। कृष्ण के चेहरे पर अद्भुत प्रसन्नता थी। वृंदावन के लोग गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने पर्वत की पूजा की। भोग अर्पित किया।

     

     

    और कृष्ण ने सबको प्रेम से समझाया, “प्रकृति का सम्मान करो। गायों की सेवा करो। धरती को माँ मानो।” लेकिन दूसरी ओर देवराज इंद्र को जब यह पता चला कि वृंदावनवासियों ने उनकी पूजा नहीं की, तो उनका अहंकार भड़क उठा। उन्होंने क्रोध से कहा, “इन लोगों ने मेरी पूजा छोड़ दी?” इंद्र को लगा कि वृंदावनवासियों ने उनका अपमान किया है।

     

     

    उनके भीतर क्रोध बढ़ता गया। उन्होंने आदेश दिया, “ऐसे बादलों को भेजो जो प्रलयंकारी वर्षा कर सकें।” आकाश में अचानक घने बादल छाने लगे। वृंदावन के लोगों को कुछ समझ नहीं आया। सुबह तक जो आकाश साफ था, वह देखते ही देखते काले बादलों से भर गया।

     

     

    बिजलियाँ चमकने लगीं। बादल भयंकर गर्जना करने लगे। फिर वर्षा शुरू हुई। पहले बूंदें पड़ीं। फिर पानी तेज हुआ। और देखते ही देखते ऐसी मूसलाधार वर्षा होने लगी कि धरती जल में डूबने लगी। वृंदावन के रास्तों पर पानी भर गया। गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं। बछड़े अपनी माताओं से चिपक गए। छोटे बच्चे रोने लगे। यशोदा मैया ने कृष्ण को अपने पास बुलाया। “कन्हैया! यह कैसी वर्षा है?” कृष्ण ने बाहर देखा। उनके चेहरे पर चिंता नहीं थी। वह शांत थे। नंद बाबा घबराकर बोले, “लोगों को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना होगा।”

     

     

     

    लेकिन चारों ओर जल ही जल था। कहीं आश्रय नहीं। कहीं सुरक्षा नहीं। वर्षा और तेज होती जा रही थी। हवा इतनी तीव्र थी कि बड़े-बड़े वृक्ष झुकने लगे। गायें रंभाने लगीं। वृंदावनवासी कृष्ण के पास आने लगे। “कन्हैया! अब हमारी रक्षा कौन करेगा?” यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी बाँहों में भरना चाहा। लेकिन कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मैया, चिंता मत करो।” “सबकी रक्षा होगी।” कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की ओर देखा।

     

     

     

    फिर उन्होंने धीरे से कहा, “जब पर्वत हमारी रक्षा करता है, तो आज पर्वत ही हमारी ढाल बनेगा।” और देखते ही देखते कृष्ण गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने अपना छोटा-सा बायाँ हाथ उठाया। और फिर… जिसे देखकर सभी की साँसें थम गईं— कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी-सी कनिष्ठिका उँगली पर उठा लिया! पूरा पर्वत उनके हाथ पर ऐसे टिक गया जैसे कोई हल्की-सी वस्तु हो। वृंदावनवासी स्तब्ध रह गए। किसी के मुँह से शब्द नहीं निकल रहा था।

     

     

    फिर कृष्ण ने पुकारा, “आओ!

     

     

    सब लोग गोवर्धन के नीचे आ जाओ।” नंद बाबा बोले, “लाला… यह तुमने क्या कर दिया?” कृष्ण हँसकर बोले, “बाबा, आप सब चिंता मत कीजिए।” लोग धीरे-धीरे पर्वत के नीचे आने लगे। गायें आईं। बछड़े आए।

     

     

    बच्चे आए। वृद्ध आए। स्त्रियाँ आईं। पूरा वृंदावन गोवर्धन पर्वत के नीचे आ गया। कृष्ण एक हाथ से पर्वत उठाए खड़े थे। उनका दूसरा हाथ कमर पर था। चेहरे पर वही मधुर मुस्कान। यशोदा मैया बार-बार उन्हें देख रही थीं। उनके मन में चिंता थी— “मेरा छोटा-सा लाल इतनी देर तक पर्वत कैसे उठाए रखेगा?” उन्होंने धीरे से कहा, “कन्हैया, थक तो नहीं गए?” कृष्ण हँसे। “नहीं मैया।” बलराम जी मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “मैया, कन्हैया को कुछ नहीं होगा।” वृंदावन के लोग आश्चर्य से कृष्ण को देखते रहे। किसी ने कहा, “यह तो स्वयं भगवान हैं।”

     

     

     

    किसी ने कहा, “हमारा कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं।” किसी ने हाथ जोड़ लिए। कोई कृष्ण की जय-जयकार करने लगा। सात दिन तक वर्षा होती रही। सात दिन तक कृष्ण गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े रहे। न उन्हें भूख लगी। न प्यास। न थकान। ग्वाल-बालों को तो यह भी चिंता होने लगी कि कहीं कृष्ण का हाथ दुख न जाए। एक बालक बोला, “कन्हैया, हम भी पर्वत को सहारा देते हैं।” उसने अपनी छोटी-सी लकड़ी उठाई और पर्वत की ओर कर दी। दूसरे बालकों ने भी ऐसा ही किया।

     

     

    कृष्ण हँस पड़े। “हाँ-हाँ, तुम सब भी सहारा दो।” अब सभी बच्चे अपनी-अपनी लकड़ियों से गोवर्धन को सहारा देने लगे। वृंदावन के लोग इस दृश्य को देखकर मुस्कुराने लगे। कृष्ण ने किसी को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अकेले सबकी रक्षा कर रहे हैं। वह सबको अपने साथ जोड़ रहे थे। उधर देवराज इंद्र का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगा। उन्होंने देखा कि उनकी सारी शक्ति भी कृष्ण के सामने व्यर्थ हो गई। वर्षा रुक नहीं रही थी, लेकिन वृंदावन सुरक्षित था। इंद्र को समझ आने लगा कि जिसे वह एक साधारण बालक समझ रहे थे, वह कोई सामान्य शक्ति नहीं है।

     

     

     

    उनका अहंकार टूटने लगा। उन्होंने बादलों को वर्षा रोकने का आदेश दिया। धीरे-धीरे आकाश साफ होने लगा। बादल हटने लगे। सूर्य की किरणें धरती पर उतर आईं। यमुना फिर चमकने लगी। पक्षियों ने फिर से उड़ना शुरू किया। वृंदावनवासियों ने बाहर देखा। वर्षा समाप्त हो चुकी थी। कृष्ण ने धीरे से गोवर्धन पर्वत को उसी स्थान पर रख दिया। सभी लोग बाहर आए। गायें आनंद से रंभाने लगीं।

     

     

     

    ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर इकट्ठे हो गए। यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया। “मेरा लाल!” नंद बाबा की आँखें भी भर आईं। उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ रखा। “लाला, तुमने आज पूरे वृंदावन की रक्षा कर दी।” कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “बाबा, मैंने कुछ नहीं किया। गोवर्धन ने सबकी रक्षा की।” लेकिन सब जानते थे कि गोवर्धन को उठाने वाला कौन था। कुछ ही समय बाद देवराज इंद्र स्वयं कृष्ण के सामने आए। उनका सिर झुका हुआ था। उनके भीतर का अहंकार समाप्त हो चुका था। उन्होंने कृष्ण से कहा, “प्रभु, मुझे क्षमा कीजिए।

     

     

    मैंने अपने पद और शक्ति का अभिमान किया। मैं यह भूल गया कि संसार की सारी शक्तियाँ भी आपकी ही इच्छा से चलती हैं।” कृष्ण ने उन्हें क्षमा कर दिया। इंद्र ने कृष्ण को प्रणाम किया। और उस दिन से वृंदावन में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व हो गया। लोग समझ गए कि प्रकृति की रक्षा करना, गायों की सेवा करना और धरती के प्रति कृतज्ञ रहना भी ईश्वर की उपासना का ही एक रूप है। संध्या होने लगी।

     

     

     

    आकाश में हल्की लालिमा छा गई। गोवर्धन पर्वत सूर्य की अंतिम किरणों में चमक रहा था। कृष्ण अपने ग्वाल-बालों के साथ बैठे थे। एक बालक बोला, “कन्हैया, तुमने तो सच में पहाड़ उठा लिया!” कृष्ण हँसते हुए बोले, “अच्छा? तुम लोग तो लकड़ी से उसे सहारा दे रहे थे।” सब हँस पड़े। यशोदा मैया दूर से अपने लाल को देख रही थीं। उनके लिए कृष्ण आज भी वही नन्हा बालक था, जो कभी माखन चुराता था, कभी मटकी फोड़ता था और कभी उनकी गोद में सिर रखकर सो जाता था। लेकिन वृंदावन जान चुका था कि नंदलाल की लीलाएँ साधारण नहीं थीं। उनकी हर शरारत के पीछे प्रेम था। हर संकट के पीछे कोई संदेश था। और हर लीला में भक्तों के लिए कोई गहरा रहस्य छिपा था।

     

     

     

    समय बीतता गया। कृष्ण की बाल-लीलाएँ बढ़ती गईं। कभी वह ग्वाल-बालों के साथ वन में खेलते। कभी गायों के पीछे दौड़ते। कभी यमुना के तट पर बैठकर बाँसुरी बजाते। कभी माखन के लिए मैया से रूठते। कभी गोपियों को अपनी शरारतों से परेशान करते। वृंदावन का हर दिन कृष्ण के कारण उत्सव बन गया था। लेकिन बाल्यकाल का समय भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। वह नन्हा कन्हैया, जिसकी उँगली पकड़कर यशोदा मैया चलना सिखाती थीं, अब वृंदावन की सीमाओं से बाहर जाने वाली एक बड़ी लीला की ओर बढ़ रहा था।

     

     

    ग्वाल-बालों की हँसी… यशोदा की पुकार… नंद बाबा का वात्सल्य… गायों की घंटियाँ… यमुना की लहरें… गोवर्धन की छाया… और कृष्ण की मधुर मुस्कान— इन सबमें एक ऐसी स्मृति बसने वाली थी, जिसे वृंदावन कभी भूल नहीं पाएगा। क्योंकि बाल-लीलाओं का यह सुंदर अध्याय अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा था। आने वाले समय में नंदलाल की बाल-छवि धीरे-धीरे किशोर कृष्ण के रूप में बदलने लगेगी।

     

     

    लेकिन क्या वृंदावन उन्हें कभी भूल पाएगा? क्या यशोदा मैया उस नटखट बालक के बिना रह पाएँगी? क्या ग्वाल-बाल उस सखा की शरारतों को भूल पाएँगे? और क्या वृंदावन की गलियाँ कभी फिर वैसी ही रहेंगी, जब उनमें कृष्ण की पायल की रुनझुन सुनाई नहीं देगी? इन प्रश्नों के उत्तर हमारी इस श्रृंखला के अंतिम भाग में छिपे हैं। जहाँ हम फिर लौटेंगे उन्हीं गलियों में… जहाँ नंदलाल की हँसी गूँजती थी। उसी यमुना तट पर… जहाँ वह अपने सखाओं के साथ खेलते थे। उसी नंद भवन में… जहाँ यशोदा मैया उन्हें पुकारती थीं।

     

    और उसी वृंदावन में… जहाँ हर कण आज भी जैसे यही कहता है— “कृष्ण केवल यहाँ रहे नहीं थे…

     

    कृष्ण ने तो पूरे वृंदावन को अपने प्रेम में बसा लिया था।”

     

    लेकिन अभी एक आखिरी कथा शेष है। एक ऐसा भावपूर्ण समापन, जिसमें न कोई राक्षस होगा, न कोई युद्ध… बस होगा नंदलाल का प्रेम।

     

     

     

    माँ यशोदा का वात्सल्य… ग्वाल-बालों की मित्रता… गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम… गायों की ममता… यमुना की लहरों का स्नेह… और वृंदावन की मिट्टी में हमेशा के लिए बस जाने वाली कृष्ण की स्मृतियाँ।

     

     

     

    अगले और अंतिम भाग में हम जानेंगे—

     

    “वृंदावन की मधुर बाल-लीलाओं का भावपूर्ण समापन” और शायद उस अंतिम कथा के बाद जब आप आँखें बंद करेंगे… तो आपको भी कहीं दूर से एक मधुर बाँसुरी सुनाई दे…

     

    “राधे… राधे…”

     

    Be Continue….

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • कृष्ण ने बिना कहे समझ लिया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अध्याय 9 — कृष्ण ने बिना कहे समझ लिया

     

    सुदामा कृष्ण के सामने चुपचाप खड़े थे।

     

    कृष्ण उनकी तरफ देख रहे थे। उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी, जो सुदामा ने गुरुकुल के दिनों में न जाने कितनी बार देखी थी।

     

    लेकिन आज सुदामा के चेहरे पर खुशी के साथ झिझक भी थी।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “सुदामा… इतने साल बाद मेरे पास आए हो और फिर भी मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”

     

    सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।

     

    “नहीं कृष्ण, ऐसी कोई बात नहीं है।”

     

    कृष्ण हल्के से मुस्कुराए।

     

    “तुम्हें मैं आज का कृष्ण लग रहा हूँ क्या?”

     

    सुदामा ने उनकी तरफ देखा।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मैं वही हूँ जो गुरुकुल में तुम्हारे साथ बैठकर खाना खाता था। वही जो तुम्हारे हिस्से की रोटी भी चुपके से खा जाता था।”

     

    सुदामा हँस पड़े।

     

    “और फिर जब गुरुजी पूछते थे कि खाना किसने खाया, तो तुम बड़ी मासूम शक्ल बना लेते थे।”

     

    कृष्ण भी हँस पड़े।

     

    “अरे, तुम भी तो मेरा नाम नहीं लेते थे।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों पुराने दिनों में खो गए।

     

    लेकिन फिर सुदामा की मुस्कान गायब हो गई।

     

    कृष्ण ने यह देख लिया।

     

    उन्होंने पास जाकर सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    “सुदामा, मुझे सच बताओ। घर पर सब ठीक है?”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोले।

     

    कृष्ण ने फिर पूछा,

     

    “भाभी कैसी हैं?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “ठीक हैं।”

     

    “बच्चे?”

     

    “ठीक हैं।”

     

    कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा।

     

    “और तुम?”

     

    यह सवाल सुनते ही सुदामा चुप हो गए।

     

    काफी देर तक उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।

     

    कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने बस सुदामा के कंधे पर हाथ रख दिया।

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “कृष्ण…”

     

    “हाँ, बोलो।”

     

    “मैं तुमसे कुछ माँगने नहीं आया था।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “मैं बस तुमसे मिलने आया था।”

     

    “ये भी मुझे पता है।”

     

    सुदामा ने हैरानी से पूछा,

     

    “फिर तुम बार-बार पूछ क्यों रहे हो?”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “क्योंकि दोस्ती में कुछ बातें पूछनी नहीं पड़तीं, बस महसूस करनी पड़ती हैं।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे कपड़े बहुत कुछ बता रहे हैं सुदामा। तुम्हारा चेहरा भी। तुम्हारी आवाज भी।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मैंने बहुत कोशिश की कृष्ण।”

     

    “किस बात की?”

     

    “अपने परिवार को खुश रखने की।”

     

    सुदामा कुछ देर रुके।

     

    “मैंने बच्चों को पढ़ाया। जो मिला, उसमें घर चलाया। कभी किसी से शिकायत नहीं की। लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि घर में खाने तक की परेशानी हो गई।”

     

    कृष्ण चुपचाप सुनते रहे।

     

    सुदामा बोले,

     

    “मेरी पत्नी ने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा। बच्चों ने भी कभी जिद नहीं की। लेकिन उनकी आँखों में सब दिखता था।”

     

    कृष्ण की आँखें भी नम हो गईं।

     

    “तो तुम इतने सालों तक अकेले यह सब सहते रहे?”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “तुम्हारी दोस्ती की याद थी ना।”

     

    कृष्ण ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “और तुमने सोचा कि मुझे कुछ नहीं बताओगे?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम द्वारका के राजा हो कृष्ण। तुम्हारे पास कितने काम होंगे। मैं अपनी परेशानी लेकर तुम्हारे पास कैसे आता?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा,

     

    “राजा?”

     

    वह थोड़ा मुस्कुराए।

     

    “मेरे लिए तुम अभी भी वही सुदामा हो जो मेरे साथ गुरुकुल में पेड़ के नीचे बैठता था।”

     

    सुदामा की आँखों में आँसू थे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “तुमने मुझे अपना दोस्त समझकर आने में भी इतना समय लगा दिया।”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोल पाए।

     

    तभी कृष्ण ने देखा कि सुदामा के पैर यात्रा की वजह से थके हुए थे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “पहले बैठो।”

     

    “नहीं कृष्ण, मैं ठीक हूँ।”

     

    “तुम्हारी ये ‘मैं ठीक हूँ’ वाली आदत अभी तक नहीं गई?”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    कृष्ण ने अपने सेवकों से पानी मंगवाया और खुद सुदामा के पास बैठ गए।

     

    सुदामा घबरा गए।

     

    “कृष्ण, तुम ये क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज मुझे अपने दोस्त की सेवा करने दो।”

     

    “लेकिन तुम राजा हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और तुम मेरे दोस्त हो। आज मेरे लिए यही सबसे बड़ी बात है।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    कृष्ण ने उनके थके हुए पैरों को पानी से धोया।

     

    सुदामा बार-बार उन्हें रोकने की कोशिश करते रहे।

     

    “कृष्ण, ऐसा मत करो।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “जब मैं गुरुकुल में गलती करता था और तुम मेरा काम अपने ऊपर ले लेते थे, तब तो तुमने मुझे कभी रोका नहीं।”

     

    सुदामा कुछ बोल नहीं पाए।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज मेरी बारी है।”

     

    कुछ देर बाद दोनों साथ बैठ गए।

     

    कृष्ण ने फिर वही छोटा-सा पोटली उठाई जो सुदामा अपने साथ लाए थे।

     

    “वैसे एक बात बताओ।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम मेरे लिए क्या लाए हो?”

     

    सुदामा झेंप गए।

     

    “कुछ खास नहीं।”

     

    कृष्ण ने पोटली खोल ली।

     

    उसमें थोड़ा-सा चिवड़ा था।

     

    कृष्ण के चेहरे पर ऐसी खुशी आई जैसे उन्हें कोई बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो।

     

    उन्होंने थोड़ा चिवड़ा उठाया और खाने लगे।

     

    “अरे वाह! यही तो चाहिए था।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “कृष्ण, ये बहुत साधारण है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “साधारण?”

     

    उन्होंने मुस्कुराकर सुदामा की तरफ देखा।

     

    “जिसमें दोस्त का प्यार हो, वह साधारण कैसे हो सकता है?”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    कृष्ण ने उन्हें देखकर कहा,

     

    “आज तुम मेरे पास खाली हाथ नहीं आए सुदामा। तुम अपने साथ हमारी दोस्ती की वही खुशबू लेकर आए हो, जो गुरुकुल में थी।”

     

    सुदामा ने सिर उठाकर कृष्ण को देखा।

     

    उन्हें लगा जैसे इतने सालों का सारा दुख धीरे-धीरे हल्का हो रहा हो।

     

    लेकिन कृष्ण के मन में कुछ और था।

     

    वह अपने दोस्त को बिना माँगे ही सब कुछ देना चाहते थे।

     

    सुदामा ने कुछ नहीं माँगा।

     

    उन्होंने अपने दुख की पूरी बात भी नहीं कही।

     

    लेकिन कृष्ण सब समझ चुके थे।

     

    रात काफी हो चुकी थी।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “सुदामा, आज तुम यहीं आराम करो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “नहीं कृष्ण, सुबह मुझे वापस जाना है।”

     

    कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “ठीक है। लेकिन जाने से पहले मुझे एक वादा करना होगा।”

     

    “कैसा वादा?”

     

    “अब कभी अपने दोस्त से मिलने में इतनी देर मत करना।”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    “वादा।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    कभी गुरुकुल में साथ रहने वाले दो दोस्त आज अलग-अलग दुनिया में खड़े थे।

     

    लेकिन उनके बीच की दोस्ती वैसी ही थी।

     

    अगली सुबह सुदामा जब द्वारका से अपने घर लौटने के लिए निकले, तो उनके मन में एक ही सवाल था—

     

    कृष्ण ने मुझे इतना प्यार तो दिया… लेकिन क्या मेरे घर की हालत भी बदलेगी?

     

    उन्हें अभी नहीं पता था कि कृष्ण ने उनके लिए क्या सोच रखा था।

     

    और जब सुदामा अपने गाँव के पास पहुँचे…

     

    तो उन्हें दूर से कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर वह अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं कर पाए।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

    (भाग 13 — कालिय नाग का दमन)

     

     

    वृंदावन की धरती पर उस दिन सुबह कुछ उदास-सी थी।सूरज आकाश में चमक रहा था, पेड़ों पर पक्षी भी चहचहा रहे थे, गायें अपने बछड़ों के साथ वन की ओर जा रही थीं, फिर भी वातावरण में एक अनजाना भय पसरा हुआ था।

     

    उस भय का कारण था—यमुना।

     

    वही यमुना, जिसके किनारे बैठकर कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ हँसते-खेलते थे।

     

    वही यमुना, जिसके जल में कभी वृंदावन के बच्चे खेला करते थे।

     

    वही यमुना, जिसकी लहरें कृष्ण के चरणों को छूकर स्वयं को धन्य समझती थीं।

     

    लेकिन अब यमुना का एक बड़ा भाग विष से भर चुका था।

     

    उस स्थान के आसपास की हवा तक भारी हो गई थी।

     

    कहा जाता था कि यमुना के उस हिस्से में एक विशाल नाग रहता है—कालिय।

     

    उसके शरीर से निकलने वाला विष इतना भयंकर था कि जल में रहने वाले जीव मरने लगे थे। वृक्ष सूख गए थे। पक्षी उस स्थान के ऊपर से उड़ते तो विषैली वायु के कारण नीचे गिर पड़ते।

     

    वृंदावन के लोग उस ओर जाने से भी डरते थे।

     

    नंद बाबा ने कई बार ग्वाल-बालों को समझाया था,

     

    “बच्चो, उस ओर मत जाना। यमुना के उस हिस्से के पास जाना सुरक्षित नहीं है।”

     

    यशोदा मैया भी कृष्ण को बार-बार समझाती थीं,

     

    “लाला, तुम अपने सखाओं के साथ वन में खेलो, लेकिन यमुना के उस विषैले स्थान के पास मत जाना।”

     

    कृष्ण हर बार मुस्कुराकर कहते,

     

    “हाँ मैया, मैं नहीं जाऊँगा।”

     

    लेकिन कृष्ण की आँखों में एक ऐसी चमक होती, जिसे यशोदा मैया पढ़ नहीं पाती थीं।

     

    उन्हें क्या पता था कि कृष्ण के मन में कुछ और ही चल रहा है।

     

    एक दिन कृष्ण अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ वन में खेल रहे थे।

     

    किसी के हाथ में गेंद थी, कोई बाँस की छोटी-सी छड़ी लेकर खेल रहा था और कोई पेड़ से गिरे फलों को इकट्ठा कर रहा था।

     

    बलराम जी भी उनके साथ थे।

     

    खेलते-खेलते उनकी गेंद उछलकर दूर चली गई।

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “कन्हैया! गेंद उधर चली गई।”

     

    कृष्ण ने उस दिशा में देखा।

     

    गेंद धीरे-धीरे लुढ़कती हुई उसी ओर चली गई जहाँ यमुना का विषैला क्षेत्र था।

     

    कुछ बालक डरकर रुक गए।

     

    “वहाँ मत जाना।”

     

    दूसरा बोला,

     

    “नंद बाबा ने मना किया है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    उनकी दृष्टि यमुना के उस काले पड़ चुके जल पर टिक गई।

     

    लहरें शांत थीं।

     

    लेकिन उस शांति के भीतर एक भयंकर विष छिपा था।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “यह यमुना तो सबकी माँ जैसी है। इसका जल इतना विषैला क्यों हो गया?”

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “कन्हैया, इसी में कालिय नाग रहता है। कहते हैं वह बहुत बड़ा और भयंकर है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो फिर उससे मिलना चाहिए।”

     

    ग्वाल-बाल घबरा गए।

     

    “नहीं कन्हैया!”

     

    “तुम वहाँ नहीं जाओगे।”

     

    “नंद बाबा हमें बहुत डाँटेंगे।”

     

    बलराम जी कृष्ण को समझाने लगे,

     

    “कन्हैया, अभी लौट चलो।”

     

    कृष्ण ने दाऊ की ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में दृढ़ता थी।

     

    “दाऊ, इस विष के कारण कितने जीव परेशान हैं। यमुना का जल सबके लिए है। यदि कोई इसे विषैला बना दे तो क्या हमें चुप रहना चाहिए?”

     

    बलराम कृष्ण को देखते रहे।

     

    वह जानते थे कि कृष्ण जो ठान लेते हैं, उसे कोई आसानी से रोक नहीं सकता।

     

    कृष्ण आगे बढ़े।

     

    यमुना के तट पर एक विशाल कदंब का वृक्ष था।

     

    कृष्ण उस वृक्ष पर चढ़ गए।

     

    ग्वाल-बाल नीचे खड़े होकर उन्हें देखते रहे।

     

    “कन्हैया! नीचे आ जाओ!”

     

    लेकिन कृष्ण मुस्कुराते रहे।

     

    उन्होंने ऊपर से यमुना के जल को देखा।

     

    फिर अचानक—

     

    उन्होंने कदंब के वृक्ष से यमुना में छलाँग लगा दी।

     

    “छपाक!”

     

    यमुना का जल चारों ओर उछल पड़ा।

     

    ग्वाल-बाल भय से चिल्ला उठे।

     

    “कृष्ण!”

     

    “कन्हैया!”

     

    “अरे! कृष्ण यमुना में कूद गए!”

     

    यमुना का शांत जल अचानक भयंकर रूप से हिलने लगा।

     

    लहरें उठने लगीं।

     

    मानो यमुना के भीतर कोई विशाल शक्ति जाग गई हो।

     

    जल के भीतर कालिय नाग ने कृष्ण की उपस्थिति अनुभव कर ली थी।

     

    वह क्रोधित होकर बाहर आया।

     

    उसका शरीर विशाल था।

     

    उसके अनेक फन थे।

     

    उसकी आँखों से क्रोध की ज्वाला निकल रही थी।

     

    उसके फनों से विष की भयंकर लपटें उठ रही थीं।

     

    जैसे ही उसने कृष्ण को देखा, वह फुफकारा।

     

    यमुना का जल काँप उठा।

     

    ग्वाल-बाल भयभीत होकर पीछे हट गए।

     

    लेकिन कृष्ण शांत थे।

     

    उन्होंने कालिय को देखकर कहा,

     

    “कालिय! तुमने इस पवित्र यमुना को विषैला क्यों बना दिया?”

     

    कालिय ने भयंकर फुफकार भरते हुए कृष्ण को अपनी पूँछ से घेर लिया।

     

    उसने कृष्ण को अपने विशाल शरीर में जकड़ लिया।

     

    ग्वाल-बालों ने यह दृश्य देखा तो उनके प्राण सूख गए।

     

    एक बालक रोते हुए बोला,

     

    “कन्हैया को नाग ने पकड़ लिया!”

     

    दूसरा दौड़ते हुए बोला,

     

    “चलो! नंद बाबा को बताते हैं!”

     

    कुछ ही देर में यह समाचार पूरे वृंदावन में फैल गया।

     

    “कृष्ण यमुना में चले गए!”

     

    “कालिय नाग ने उन्हें पकड़ लिया!”

     

    “कृष्ण संकट में हैं!”

     

    यशोदा मैया ने जैसे ही यह सुना, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह दौड़ पड़ीं।

     

    “मेरा कन्हैया!”

     

    नंद बाबा भी उनके पीछे दौड़े।

     

    वृंदावन के स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बालक सब यमुना की ओर चल पड़े।

     

    यशोदा रोते हुए कह रही थीं,

     

    “मेरे लाल को कुछ नहीं होना चाहिए।”

     

    उनकी आँखों के सामने वही दृश्य था—

     

    कृष्ण कालिय नाग के विशाल शरीर में जकड़े हुए थे।

     

    मैया का हृदय फटने लगा।

     

    वह यमुना में उतरने लगीं।

     

    “मैं अपने लाल को लेकर आऊँगी!”

     

    नंद बाबा ने उन्हें रोक लिया।

     

    “यशोदा! रुको!”

     

    लेकिन एक माँ को कौन रोक सकता था?

     

    उधर बलराम जी शांत खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर चिंता नहीं थी।

     

    वह जानते थे कि यह लीला क्या है।

     

    उन्होंने नंद बाबा और यशोदा मैया से कहा,

     

    “चिंता मत करो। कृष्ण को कुछ नहीं होगा।”

     

    यशोदा ने आँसुओं से भरी आँखों से बलराम को देखा।

     

    “दाऊ! तुम कैसे कह सकते हो?”

     

    बलराम मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि कन्हैया को कोई हरा नहीं सकता।”

     

    उधर कालिय ने कृष्ण को और कसकर जकड़ लिया।

     

    वह सोच रहा था कि अब यह बालक बच नहीं सकता।

     

    लेकिन अचानक कृष्ण का शरीर भारी होने लगा।

     

    इतना भारी कि कालिय के लिए उन्हें पकड़े रखना कठिन हो गया।

     

    कृष्ण ने अपना शरीर विस्तृत कर लिया।

     

    कालिय का बंधन ढीला पड़ने लगा।

     

    और अगले ही क्षण कृष्ण उसके फनों से निकलकर उसके ऊपर जा खड़े हुए।

     

    कालिय क्रोध से भर उठा।

     

    उसने एक के बाद एक अनेक फन उठाए।

     

    कृष्ण ने उसके एक फन पर अपना पैर रखा।

     

    फिर दूसरे पर।

     

    फिर तीसरे पर।

     

    और देखते ही देखते वह उसके सभी फनों पर नृत्य करने लगे।

     

    कृष्ण के चरण जैसे ही कालिय के फनों पर पड़ते, उसका विष कम होने लगता।

     

    कालिय जितना फन उठाता, कृष्ण उतनी ही सहजता से दूसरे फन पर पहुँच जाते।

     

    यमुना की लहरें ताल देने लगीं।

     

    देवताओं ने आकाश से यह दृश्य देखा तो आश्चर्यचकित हो उठे।

     

    गंधर्वों के वाद्य बजने लगे।

     

    देवताओं ने पुष्पों की वर्षा आरंभ कर दी।

     

    वृंदावन के लोग यह अद्भुत दृश्य देखकर स्तब्ध थे।

     

    जिस कालिय से पूरा क्षेत्र काँपता था, आज वही कृष्ण के चरणों के नीचे विवश पड़ा था।

     

    कृष्ण के मुख पर मुस्कान थी।

     

    उनका नृत्य ऐसा लग रहा था मानो स्वयं यमुना की लहरें उनके चरणों के साथ नृत्य कर रही हों।

     

    कालिय के फन एक-एक करके झुकने लगे।

     

    उसकी शक्ति समाप्त होने लगी।

     

    अब उसके भीतर क्रोध नहीं, भय था।

     

    वह समझ गया—

     

    “यह कोई साधारण बालक नहीं है।”

     

    उसकी पत्नियाँ, जिन्हें नाग-पत्नियाँ कहा जाता था, हाथ जोड़कर कृष्ण के सामने आईं।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे।

     

    उन्होंने प्रार्थना की,

     

    “प्रभु! हमारे पति से भूल हुई है। वह अपने विष और अहंकार में अंधा हो गया था। कृपा करके उसे क्षमा कर दीजिए।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर उन्होंने कालिय की ओर देखा।

     

    “कालिय, तुम्हारा यहाँ रहना उचित नहीं है। तुम्हारे विष से यमुना और उसके आसपास का जीवन नष्ट हो रहा है।”

     

    कालिय ने सिर झुका दिया।

     

    कृष्ण बोले,

     

    “तुम यहाँ से चले जाओ। समुद्र की ओर चले जाओ। वहाँ जाकर रहो।”

     

    कालिय ने धीरे से अपना सिर झुका दिया।

     

    अब उसके भीतर कोई विरोध नहीं था।

     

    कृष्ण ने उसके फन से अपना चरण हटा लिया।

     

    कालिय ने पहली बार राहत की साँस ली।

     

    उसने हाथ जोड़कर कृष्ण को प्रणाम किया।

     

    कृष्ण ने उसे आशीर्वाद दिया।

     

    और कालिय अपनी पत्नियों तथा परिवार के साथ यमुना छोड़कर चला गया।

     

    जैसे ही कालिय वहाँ से गया, यमुना का जल धीरे-धीरे निर्मल होने लगा।

     

    विष का प्रभाव कम होने लगा।

     

    जल में फिर से जीवन लौटने लगा।

     

    पक्षी वापस आने लगे।

     

    हवा में फिर से सुगंध भर गई।

     

    वृक्षों पर हरियाली लौटने लगी।

     

    और यमुना जैसे स्वयं मुस्कुराकर कृष्ण के चरणों को धन्यवाद देने लगी।

     

    तट पर खड़ी यशोदा मैया अपने लाल को देखते ही दौड़ पड़ीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया।

     

    “कन्हैया!”

     

    उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से मैया की ओर देखा।

     

    “मैया… मैंने तो यमुना को साफ किया।”

     

    यशोदा मैया उन्हें सीने से लगाकर रोती रहीं।

     

    “तुम मुझे एक दिन बहुत रुलाओगे।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    नंद बाबा भी कृष्ण को देखकर प्रसन्न हो गए।

     

    वृंदावन के सभी लोग जय-जयकार करने लगे।

     

    “कृष्ण कन्हैया लाल की जय!”

     

    “नंदलाल की जय!”

     

    “यशोदा मैया के लाल की जय!”

     

    चारों ओर आनंद छा गया।

     

    लेकिन इस लीला का अर्थ केवल इतना नहीं था कि कृष्ण ने एक नाग का दमन किया।

     

    कालिय केवल एक नाग नहीं था।

     

    उसका विष अहंकार का प्रतीक था।

     

    जिस प्रकार कालिय ने यमुना को अपने विष से भर दिया था, उसी प्रकार मनुष्य का अहंकार उसके हृदय को विषैला बना देता है।

     

    लेकिन जब हृदय में कृष्ण के चरण पड़ते हैं, तब वह विष भी समाप्त होने लगता है।

     

    कृष्ण ने कालिय को नष्ट नहीं किया।

     

    उन्होंने उसके अहंकार को नष्ट किया।

     

    उसे जीवन का एक नया अवसर दिया।

     

    यही तो कृष्ण हैं—

     

    दुष्टता का अंत करते हैं, लेकिन प्रायश्चित करने वाले को क्षमा भी देते हैं।

     

    उस शाम वृंदावन में दीप जलाए गए।

     

    यमुना का जल फिर से चमक रहा था।

     

    कृष्ण अपने सखाओं के साथ बैठे थे।

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “कन्हैया, आज तो तुम सचमुच बहुत बड़े वीर निकले!”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “अच्छा? तो कल कौन वीर बनेगा?”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    बलराम ने कृष्ण की ओर देखा और मुस्कुराए।

     

    वृंदावन में फिर वही आनंद लौट आया था।

     

    लेकिन कृष्ण की लीलाओं का प्रवाह अभी रुकने वाला नहीं था।

     

    कुछ ही समय बाद वृंदावन के लोगों के जीवन में एक ऐसी घटना आने वाली थी, जिसे कोई भूल नहीं पाएगा।

     

    हर वर्ष की तरह उस समय वृंदावन के लोग देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी करने लगे थे।

     

    बड़े-बड़े पकवान बनने लगे।

     

    दूध, दही, घी और माखन के भोग सजाए जाने लगे।

     

    सबको विश्वास था कि इंद्र प्रसन्न होंगे तो वर्षा होगी और उनकी गायों तथा खेतों को जीवन मिलेगा।

     

    लेकिन नंदलाल ने इस पर एक प्रश्न उठाया—

     

    “क्या हमें इंद्र की पूजा करनी चाहिए, या उस गोवर्धन पर्वत की, जो हमारी गायों को घास देता है, जल देता है और हमारी रक्षा करता है?”

     

    कृष्ण के इस प्रश्न से पूरा वृंदावन सोच में पड़ गया।

     

    किसी को नहीं पता था कि नंदलाल की यह छोटी-सी बात आगे चलकर देवराज इंद्र के अहंकार को चुनौती देगी।

     

    फिर आकाश में घने बादल छा जाएँगे…

     

    बिजलियाँ गरजेंगी…

     

    वृंदावन पर भयंकर वर्षा टूट पड़ेगी…

     

    और तब सबकी रक्षा के लिए नंदलाल अपने नन्हे हाथ की एक उँगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लेंगे।

     

    लेकिन प्रश्न यह था—

     

    क्या सचमुच एक छोटा-सा बालक पूरे पर्वत को अपनी उँगली पर उठा सकता है?

     

    और यदि उठा सकता है…

     

    तो सात दिनों तक वृंदावनवासियों की रक्षा कैसे करेगा नंदलाल?

     

    यही जानने के लिए अगली लीला की प्रतीक्षा कीजिए—

     

    भाग 14 — गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

    (भाग 12 — ब्रह्मा जी का मोह और कृष्ण की अद्भुत लीला)

     

     

     

    वृंदावन में उस दिन भी वही चहल-पहल थी।सूरज की सुनहरी किरणें वन के हरे-भरे पत्तों पर पड़ रही थीं। यमुना की लहरें मंद-मंद बह रही थीं। कदंब के वृक्षों पर बैठे पक्षी मधुर स्वर में चहचहा रहे थे। हवा में फूलों की सुगंध घुली हुई थी।

     

    और वृंदावन के एक खुले मैदान में नंदलाल अपने ग्वाल-बाल मित्रों और बछड़ों के साथ खेल रहे थे।

     

    कृष्ण के हाथ में आज बाँसुरी नहीं थी। वह कभी किसी मित्र के कंधे पर हाथ रख देते, कभी किसी बछड़े को पुकारते और कभी अचानक दौड़कर किसी को पकड़ लेते।

     

    उनके चारों ओर आनंद ही आनंद था।

     

    किसी के हाथ में दही की पोटली थी, किसी के पास फल थे और कोई अपनी छोटी-सी गठरी खोलकर सबको भोजन बाँट रहा था।

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “देखो, आज हम सब अपना भोजन साथ-साथ करेंगे।”

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “लेकिन कन्हैया, तुम फिर मेरा माखन मत चुराना।”

     

    कृष्ण ने तुरंत भोला चेहरा बनाकर कहा,

     

    “मैं? मैं तो कभी किसी का माखन नहीं चुराता।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    “झूठे कन्हैया!”

     

    कृष्ण भी हँसने लगे।

     

    वृंदावन का यह दृश्य जितना सरल था, उतना ही दिव्य भी।

     

    क्योंकि उन साधारण-से दिखने वाले बालकों के बीच स्वयं परम सत्ता बालक बनकर बैठी थी।

     

    उधर, बहुत दूर ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी अपने दिव्य आसन पर विराजमान थे।

     

    सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने अनेक लोकों को देखा था। उन्होंने असंख्य जीवों की उत्पत्ति देखी थी। देवताओं, ऋषियों और महान योगियों को देखा था।

     

    लेकिन इन दिनों उनका मन बार-बार वृंदावन की ओर जा रहा था।

     

    उनके सामने एक प्रश्न था।

     

    “वह छोटा-सा कृष्ण आखिर कौन है?”

     

    देवताओं से उन्हें उसके अद्भुत कार्यों का समाचार मिल चुका था।

     

    कभी उसने पूतना जैसी भयानक राक्षसी का अंत कर दिया।

     

    कभी शकटासुर का उद्धार किया।

     

    कभी तृणावर्त के भयंकर तूफान से भी नहीं डरा।

     

    और अब तो ऐसी बात भी सुनने में आई थी कि उस बालक के मुख के भीतर पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया था।

     

    ब्रह्मा जी सोचने लगे—

     

    “क्या यह सचमुच कोई साधारण बालक है?”

     

    उनके मन में जिज्ञासा बढ़ती गई।

     

    लेकिन उसी जिज्ञासा के साथ एक सूक्ष्म-सा अहंकार भी उनके भीतर जन्म लेने लगा।

     

    “मैं सृष्टि का रचयिता हूँ। मैं वेदों का ज्ञाता हूँ। मैंने अनेक दिव्य शक्तियों को देखा है। यदि यह बालक वास्तव में परम शक्ति है, तो मुझे इसकी लीला को समझने में कठिनाई क्यों होनी चाहिए?”

     

    यही विचार धीरे-धीरे उनके मन में घर करने लगा।

     

    और फिर ब्रह्मा जी ने निश्चय किया कि वह स्वयं कृष्ण की लीला को परखेंगे।

     

    इधर वृंदावन में दोपहर हो चुकी थी।

     

    ग्वाल-बाल और कृष्ण यमुना के किनारे बैठकर भोजन करने लगे।

     

    किसी के पास रोटी थी, किसी के पास दही, किसी के पास फल और किसी के पास थोड़ा-सा माखन।

     

    कृष्ण बीच में बैठे थे।

     

    वह कभी किसी की रोटी का टुकड़ा उठा लेते, कभी किसी को अपने हाथ से माखन खिला देते।

     

    एक बालक बोला,

     

    “कन्हैया, तुम मेरे फल मत लेना।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे पास बस यही एक है।”

     

    कृष्ण ने अपना फल उसकी ओर बढ़ा दिया।

     

    “तो तुम मेरा ले लो।”

     

    बालक की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ, बिल्कुल।”

     

    कृष्ण का प्रेम ऐसा ही था।

     

    वह बाँटने में आनंद पाते थे।

     

    तभी अचानक कुछ बछड़े वहाँ से दूर जाने लगे।

     

    एक ग्वाल-बाल ने कहा,

     

    “अरे! बछड़े उधर चले गए।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “तुम लोग भोजन करो। मैं उन्हें लेकर आता हूँ।”

     

    कृष्ण उठे और बछड़ों के पीछे चल पड़े।

     

    उसी क्षण ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य शक्ति से एक अद्भुत लीला रची।

     

    उन्होंने सभी बछड़ों को एक स्थान पर ले जाकर अदृश्य कर दिया।

     

    फिर कुछ ही समय बाद उन्होंने ग्वाल-बालों को भी उसी प्रकार अपनी माया से छिपा दिया।

     

    अब मैदान खाली था।

     

    न बछड़े थे।

     

    न ग्वाल-बाल।

     

    केवल कृष्ण वहाँ खड़े थे।

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    उनके मुख पर हल्की मुस्कान थी।

     

    वह समझ गए।

     

    “तो ब्रह्मा जी मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं।”

     

    कृष्ण ने आकाश की ओर देखा।

     

    उनकी मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “ठीक है।”

     

    उन्होंने मन ही मन कहा—

     

    “यदि यही आपकी इच्छा है, तो आपकी लीला भी पूरी हो जाए।”

     

    कृष्ण ने उसी क्षण स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट कर लिया।

     

    हर बछड़ा पहले जैसा हो गया।

     

    हर ग्वाल-बाल भी पहले जैसा दिखाई देने लगा।

     

    किसी के चेहरे पर वही मुस्कान थी।

     

    किसी के हाथ में वही भोजन था।

     

    किसी की आवाज वही थी।

     

    किसी की चाल वही थी।

     

    यहाँ तक कि उनके माता-पिता को भी तनिक संदेह नहीं हुआ।

     

    वृंदावन में किसी को पता ही नहीं चला कि असली बछड़े और ग्वाल-बाल तो ब्रह्मा जी की माया में छिपे हुए हैं।

     

    कृष्ण ने स्वयं हर बछड़े का रूप धारण कर लिया।

     

    स्वयं हर ग्वाल-बाल का रूप धारण कर लिया।

     

    वह हर घर में पुत्र बनकर पहुँच गए।

     

    हर माँ ने अपने बच्चे को पहले की तरह गले लगाया।

     

    लेकिन उस दिन एक अद्भुत परिवर्तन हुआ।

     

    वृंदावन की माताओं का अपने बच्चों के प्रति प्रेम अचानक पहले से भी अधिक बढ़ गया।

     

    वे अपने पुत्रों को देखकर बार-बार उन्हें गले लगातीं।

     

    उन्हें लगता—

     

    “आज न जाने क्यों मेरा लाल पहले से भी अधिक प्यारा लग रहा है।”

     

    गायें भी अपने बछड़ों को देखकर असाधारण प्रेम से भर उठीं।

     

    वे उन्हें चाटतीं, पुकारतीं और बार-बार अपने पास बुलातीं।

     

    क्योंकि अब वे केवल बछड़े नहीं थे।

     

    वे स्वयं कृष्ण थे।

     

    समय बीतता गया।

     

    ब्रह्मा जी को लगा कि उनकी योजना सफल हो गई है।

     

    वह कुछ समय बाद यह देखने के लिए लौटे कि कृष्ण क्या कर रहे हैं।

     

    लेकिन जैसे ही उन्होंने वृंदावन की ओर देखा, उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।

     

    “यह क्या?”

     

    उन्होंने देखा—

     

    सभी ग्वाल-बाल पहले की तरह कृष्ण के साथ खेल रहे हैं।

     

    सभी बछड़े भी वहीं हैं।

     

    कृष्ण के साथ भोजन कर रहे हैं।

     

    दौड़ रहे हैं।

     

    हँस रहे हैं।

     

    ब्रह्मा जी चकित रह गए।

     

    “लेकिन मैंने तो इन्हें छिपा दिया था!”

     

    उन्होंने तुरंत उस स्थान की ओर देखा जहाँ उन्होंने असली ग्वाल-बालों और बछड़ों को रखा था।

     

    वहाँ वे सभी वैसे ही मौजूद थे।

     

    ब्रह्मा जी स्तब्ध रह गए।

     

    एक ओर वे ग्वाल-बाल और बछड़े, जिन्हें उन्होंने छिपाया था।

     

    दूसरी ओर वृंदावन में वही ग्वाल-बाल और बछड़े कृष्ण के साथ खेल रहे थे।

     

    “यह कैसे संभव है?”

     

    ब्रह्मा जी की बुद्धि चकराने लगी।

     

    उन्होंने ध्यान से देखा।

     

    तभी उन्हें एक और अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।

     

    वृंदावन में जितने भी ग्वाल-बाल और बछड़े थे, उनके भीतर उन्हें दिव्य प्रकाश दिखाई देने लगा।

     

    एक-एक करके हर बालक का रूप बदलने लगा।

     

    हर बछड़े का रूप बदलने लगा।

     

    और देखते ही देखते उन्हें हर रूप में वही चार भुजाओं वाले भगवान दिखाई देने लगे।

     

    हर दिशा में वही दिव्य स्वरूप।

     

    हर बालक में वही परम सत्ता।

     

    हर बछड़े में वही अनंत भगवान।

     

    ब्रह्मा जी की आँखें खुली की खुली रह गईं।

     

    उनके भीतर का अहंकार जैसे टूटने लगा।

     

    जिस कृष्ण को वह एक छोटा-सा बालक समझ रहे थे, वही अनंत रूपों में उनके सामने उपस्थित था।

     

    जिस शक्ति को वे अपनी बुद्धि से समझना चाहते थे, वही शक्ति उनके सामने अनगिनत रूपों में खेल रही थी।

     

    ब्रह्मा जी के पास अब कोई शब्द नहीं था।

     

    उन्होंने समझ लिया—

     

    “यह मेरी परीक्षा नहीं है। यह तो मेरी ही परीक्षा हो रही थी।”

     

    कृष्ण की माया के सामने सृष्टि का रचयिता भी स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा था।

     

    ब्रह्मा जी का सिर झुक गया।

     

    उनका अभिमान समाप्त हो चुका था।

     

    वह धीरे-धीरे कृष्ण के पास पहुँचे।

     

    अब कृष्ण फिर वही छोटे-से बालक के रूप में खड़े थे।

     

    हाथ में भोजन का कौर।

     

    चेहरे पर वही मधुर मुस्कान।

     

    आँखों में वही बालपन।

     

    जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    ब्रह्मा जी ने कृष्ण के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “प्रभु… मुझे क्षमा कीजिए।”

     

    कृष्ण शांत भाव से उन्हें देखते रहे।

     

    ब्रह्मा जी बोले,

     

    “मैंने अपने ज्ञान पर अभिमान किया। मैंने सोचा कि मैं आपकी लीला को समझ सकता हूँ। मैंने आपकी परीक्षा लेने का प्रयास किया। लेकिन मैं भूल गया कि जिस शक्ति से यह पूरा ब्रह्मांड बना है, उसे मेरी बुद्धि कैसे समझ सकती है?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    उन्होंने कोई कठोर शब्द नहीं कहा।

     

    यही तो उनकी करुणा थी।

     

    वह भक्त की भूल देखते थे, लेकिन उसके हृदय का पश्चात्ताप भी देखते थे।

     

    ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “प्रभु, आप सचमुच अद्भुत हैं। आप बालक बनकर खेलते हैं, फिर भी आपके भीतर अनंत लोक समाए हुए हैं। आप अपने भक्तों के लिए स्वयं को छोटा कर लेते हैं, लेकिन आपके स्वरूप की कोई सीमा नहीं।”

     

    कृष्ण ने उन्हें अपनी करुणामयी दृष्टि से देखा।

     

    और तभी ब्रह्मा जी की माया समाप्त हो गई।

     

    ग्वाल-बाल और बछड़े अपने वास्तविक समय में लौट आए।

     

    उनके लिए तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।

     

    उन्हें पता तक नहीं चला कि उनके साथ क्या हुआ।

     

    वे उसी प्रकार कृष्ण के साथ खेलते रहे।

     

    कृष्ण ने एक ग्वाल-बाल से कहा,

     

    “चलो, अब घर चलें। मैया इंतजार कर रही होंगी।”

     

    बालक बोला,

     

    “हाँ कन्हैया, लेकिन पहले तुम मेरे साथ दौड़ लगाओ।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “अच्छा, चलो!”

     

    और दोनों दौड़ पड़े।

     

    ब्रह्मा जी दूर खड़े इस दृश्य को देखते रहे।

     

    उनके लिए यह दृश्य अब पहले जैसा नहीं था।

     

    उन्हें अब उस बालक में केवल बालक नहीं दिखाई दे रहा था।

     

    उन्हें उसमें वह अनंत सत्ता दिखाई दे रही थी, जो कभी यशोदा की गोद में खेलती है, कभी ग्वाल-बालों के साथ भोजन करती है और कभी पूरी सृष्टि को अपनी लीला में समेट लेती है।

     

    ब्रह्मा जी ने मन ही मन प्रणाम किया और अपने लोक की ओर लौट गए।

     

    वृंदावन में शाम उतरने लगी।

     

    गायों के झुंड धीरे-धीरे वापस लौट रहे थे।

     

    उनके पीछे-पीछे ग्वाल-बाल आ रहे थे।

     

    सबसे आगे कृष्ण थे।

     

    उनके होंठों पर मधुर मुस्कान थी।

     

    यमुना की लहरें जैसे उनके चरणों का स्वागत कर रही थीं।

     

    लेकिन वृंदावन की कथा में अब एक नया अध्याय आने वाला था।

     

    कृष्ण की बाल-लीलाएँ अब केवल ग्वाल-बालों और बछड़ों तक सीमित नहीं रहने वाली थीं।

     

    यमुना के जल में एक भयंकर संकट छिपा हुआ था।

     

    उस जल में रहने वाला एक विशाल और विषैला नाग पूरे क्षेत्र को भयभीत कर रहा था।

     

    उसका नाम था—

     

    कालिय।

     

    उसके विष से यमुना का जल दूषित हो चुका था।

     

    पक्षी उसके ऊपर से उड़ते-उड़ते गिर पड़ते।

     

    पशु उस जल के पास जाने से डरते।

     

    वृंदावन के लोगों के मन में भय था।

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस दिन नंदलाल की दृष्टि उस विषैले जल पर पड़ेगी, उस दिन स्वयं कालिय नाग का अहंकार चूर होने वाला है।

     

    और फिर वृंदावन देखेगा एक ऐसी लीला…

     

    जिसमें नन्हा-सा कृष्ण यमुना में छलाँग लगाएगा…

     

    विशाल कालिय नाग से सामना करेगा…

     

    और उसके फनों पर नृत्य करके पूरे संसार को यह संदेश देगा कि—

     

    जहाँ कृष्ण के चरण पड़ जाते हैं, वहाँ विष भी अमृत बन जाता है।

     

    आने वाले भाग में कथा पहुँचेगी यमुना के उसी विषैले तट पर…

     

    जहाँ नंदलाल करेंगे—

     

    “कालिय नाग का दमन।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    (भाग 11 — कृष्ण ने माटी खाई और दिखाया अद्भुत संसार)

     

     

     

    वृंदावन की वह सुबह कुछ अलग ही थी।आकाश पर हल्के-हल्के बादल तैर रहे थे। यमुना का जल सूर्य की सुनहरी किरणों को अपने भीतर समेटकर ऐसा चमक रहा था, मानो किसी ने नीले आकाश पर चाँदी की चादर बिछा दी हो। वन में खिले कदंब और तमाल के फूलों की सुगंध हवा में घुली हुई थी। कहीं कोयल कू-कू कर रही थी, तो कहीं रंग-बिरंगे पक्षी वृक्षों की डालियों पर बैठकर अपनी मधुर बोली से वातावरण को आनंदित कर रहे थे।

     

    और उसी मनोहर वृंदावन में नंदलाल अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ खेल रहे थे।

     

    कन्हैया के चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी, जिसे देखकर कोई भी अपना मन हार बैठे।

     

    आज उनके हाथ में न कोई माखन की मटकी थी, न कोई बाँसुरी। आज तो बस खेल ही खेल था।

     

    बलराम जी और दूसरे ग्वाल-बाल कभी दौड़ लगाते, कभी एक-दूसरे को पकड़ने का प्रयास करते और कभी पेड़ों के पीछे छिपकर कृष्ण को ढूँढ़ने का नाटक करते।

     

    कृष्ण कभी किसी को पकड़ लेते तो कभी जान-बूझकर उसके हाथ से निकल जाते।

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “कन्हैया! आज तुम हमसे बच नहीं पाओगे। आज तो हम तुम्हें पकड़कर ही रहेंगे।”

     

    कृष्ण ने आँखों में शरारत भरकर कहा,

     

    “अच्छा! तो पहले पकड़कर तो दिखाओ।”

     

    इतना कहकर कृष्ण दौड़ पड़े।

     

    सारे ग्वाल-बाल उनके पीछे भागे।

     

    कभी कृष्ण आगे होते, कभी पीछे मुड़कर सबको चिढ़ाते।

     

    “आओ-आओ! पकड़ो मुझे!”

     

    ग्वाल-बाल हँसते हुए उनके पीछे दौड़ते रहे।

     

    दौड़ते-दौड़ते सब वृंदावन के एक ऐसे स्थान पर पहुँच गए जहाँ मिट्टी कुछ नरम थी। वहाँ वर्षा के कारण धरती पर हल्की नमी थी और कुछ जगहों पर मिट्टी के छोटे-छोटे ढेले बने हुए थे।

     

    कृष्ण अचानक वहीं रुक गए।

     

    उनकी दृष्टि उस मिट्टी पर पड़ी।

     

    कन्हैया के मन में न जाने क्या आया।

     

    उन्होंने नीचे झुककर मिट्टी का एक छोटा-सा टुकड़ा उठा लिया।

     

    एक ग्वाल-बाल ने उन्हें देख लिया।

     

    वह चिल्लाया,

     

    “अरे! कन्हैया मिट्टी खा रहा है!”

     

    बस फिर क्या था।

     

    सभी ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर इकट्ठे हो गए।

     

    “कृष्ण ने मिट्टी खाई!”

     

    “हाँ, मैंने अपनी आँखों से देखा है!”

     

    “चलो, मैया को बताते हैं!”

     

    कृष्ण ने तुरंत मासूम चेहरा बना लिया।

     

    “मैंने मिट्टी नहीं खाई।”

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “झूठ बोल रहे हो कन्हैया! हमने देखा है।”

     

    कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें फैलाकर कहा,

     

    “तुम लोगों ने गलत देखा होगा।”

     

    बलराम जी भी वहाँ खड़े मुस्कुरा रहे थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “मैया से पूछ लेना, फिर पता चल जाएगा।”

     

    कृष्ण ने बलराम की ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में जैसे विनती थी—

     

    “दाऊ, तुम तो मेरे भाई हो!”

     

    बलराम हँस पड़े।

     

    “मैं क्या करूँ कन्हैया? सच तो सच है।”

     

    अब ग्वाल-बालों ने निश्चय कर लिया कि वे यशोदा मैया के पास जाकर सारी बात बताएँगे।

     

    कुछ ही देर में वे दौड़ते हुए नंद भवन पहुँचे।

     

    यशोदा मैया उस समय घर के काम में लगी थीं। उनके हाथों में माखन लगा हुआ था और पास ही दही की मटकी रखी थी।

     

    तभी ग्वाल-बालों की आवाज सुनाई दी—

     

    “मैया! मैया!”

     

    यशोदा ने पलटकर देखा।

     

    सारे बच्चे एक साथ खड़े थे।

     

    मैया ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ लाला? ऐसे क्यों दौड़ते हुए आए हो?”

     

    एक ग्वाल-बाल ने तुरंत शिकायत कर दी—

     

    “मैया! कन्हैया ने मिट्टी खाई है!”

     

    दूसरा बोला,

     

    “हाँ मैया, हमने देखा है।”

     

    तीसरा बोला,

     

    “बहुत सारी मिट्टी खाई है!”

     

    यशोदा मैया का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “कन्हैया ने मिट्टी खाई?”

     

    सबने एक साथ सिर हिला दिया।

     

    “हाँ मैया!”

     

    यशोदा मैया ने गहरी साँस ली।

     

    “अच्छा, तो आज अपने नटखट लाल की खबर लेनी पड़ेगी।”

     

    वह तुरंत कृष्ण को ढूँढ़ने चल पड़ीं।

     

    थोड़ी दूर पर कृष्ण अपने मित्रों के साथ खड़े थे।

     

    जैसे ही उन्होंने मैया को आते देखा, उनकी शरारती आँखों में एक पल के लिए चिंता झलक गई।

     

    यशोदा मैया ने पास आकर कहा,

     

    “कन्हैया!”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से कहा,

     

    “जी मैया?”

     

    “तुमने मिट्टी खाई है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “इन सबने झूठ बोला है?”

     

    कृष्ण ने अपने मित्रों की ओर देखा।

     

    फिर बोले,

     

    “हाँ मैया। ये सब मुझे परेशान कर रहे हैं।”

     

    यशोदा ने बलराम की ओर देखा।

     

    “दाऊ, तुम बताओ। क्या कन्हैया ने मिट्टी खाई?”

     

    बलराम कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मैया… कन्हैया ने मिट्टी उठाई तो थी।”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    “तो फिर?”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “मैया, मैंने मिट्टी नहीं खाई। मैंने तो बस उसे देखा था।”

     

    ग्वाल-बाल हँस पड़े।

     

    एक बोला,

     

    “मैया! कन्हैया झूठ बोल रहे हैं।”

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अच्छा! बहुत हो गई तुम्हारी शरारत। मुँह खोलो।”

     

    कृष्ण पीछे हटने लगे।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “मुँह खोलो!”

     

    “मैया, मैंने सच में मिट्टी नहीं खाई।”

     

    “तो फिर डर किस बात का है?”

     

    कृष्ण चुप हो गए।

     

    यशोदा मैया ने थोड़ा कठोर स्वर में कहा,

     

    “कन्हैया, मुँह खोलो।”

     

    कृष्ण ने धीरे-धीरे अपना मुँह खोल दिया।

     

    और फिर…

     

    जो दृश्य यशोदा मैया ने देखा, उसे देखकर उनकी आँखें स्थिर हो गईं।

     

    कृष्ण के छोटे-से मुख के भीतर उन्हें मिट्टी का कोई कण दिखाई नहीं दिया।

     

    वहाँ तो कुछ और ही था।

     

    कुछ ऐसा, जिसकी कल्पना कोई साधारण मनुष्य नहीं कर सकता।

     

    यशोदा मैया ने देखा—

     

    मानो कृष्ण के मुख के भीतर पूरा आकाश समाया हुआ हो।

     

    सूर्य दिखाई दे रहा था।

     

    चंद्रमा दिखाई दे रहा था।

     

    असंख्य तारे चमक रहे थे।

     

    पर्वत थे।

     

    नदियाँ थीं।

     

    समुद्र थे।

     

    वन थे।

     

    नगर थे।

     

    गाँव थे।

     

    पृथ्वी थी।

     

    और उस पृथ्वी पर असंख्य जीव-जंतु दिखाई दे रहे थे।

     

    उन्होंने यमुना को भी देखा।

     

    वृंदावन को भी देखा।

     

    नंद भवन को भी देखा।

     

    और…

     

    उन्होंने स्वयं को भी देखा।

     

    वही यशोदा मैया कृष्ण के सामने खड़ी थीं।

     

    और उनके सामने कृष्ण खड़े थे।

     

    लेकिन उस कृष्ण के मुख के भीतर फिर वही संसार दिखाई दे रहा था।

     

    एक और वृंदावन।

     

    एक और यशोदा।

     

    एक और कृष्ण।

     

    और उस दूसरे कृष्ण के मुख में फिर वही संसार!

     

    यशोदा मैया का हृदय जैसे थम गया।

     

    उनकी आँखें फैल गईं।

     

    वह कुछ समझ नहीं पा रही थीं।

     

    “यह… यह क्या है?”

     

    उनके मन में अनेक प्रश्न उठने लगे।

     

    “क्या मैं स्वप्न देख रही हूँ?”

     

    उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल बाद फिर खोलीं।

     

    दृश्य वही था।

     

    कृष्ण का मुख खुला था और उसमें पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ था।

     

    यशोदा मैया के मन में अचानक एक विचार आया—

     

    “क्या मेरा यह नन्हा-सा लाल वही परम शक्ति है, जिसकी चर्चा ऋषि-मुनि करते हैं?”

     

    लेकिन अगले ही क्षण उनके हृदय ने उस विचार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

     

    “नहीं… यह मेरा कन्हैया है।”

     

    वही कन्हैया जो सुबह उठते ही मेरे आँचल को पकड़ लेता है।

     

    वही कन्हैया जो भूख लगने पर मुझे पुकारता है।

     

    वही कन्हैया जो माखन चुराकर भागता है।

     

    वही कन्हैया जो मेरी डाँट सुनकर मासूम चेहरा बना लेता है।

     

    भला वह स्वयं भगवान कैसे हो सकता है?

     

    यशोदा की आँखों में आँसू भर आए।

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में अब शरारत नहीं थी।

     

    बस वही निश्छल बालपन था।

     

    “मैया…”

     

    यशोदा जैसे नींद से जागीं।

     

    उन्होंने तुरंत कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    उनके हृदय में उमड़ते प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया।

     

    “मेरा लाल…”

     

    कृष्ण ने अपनी छोटी-सी बाँहें मैया के गले में डाल दीं।

     

    उस क्षण यशोदा को न ब्रह्मांड दिखाई दिया, न अनंत आकाश, न कोई दिव्य शक्ति।

     

    उन्हें केवल अपना पुत्र दिखाई दिया।

     

    उनका नंदलाल।

     

    उनका लाड़ला।

     

    उनकी आँखों का तारा।

     

    और यही तो उस लीला की सबसे अद्भुत बात थी।

     

    जिस परम सत्ता को बड़े-बड़े योगी ध्यान में खोजते हैं, जिसे पाने के लिए ऋषि-मुनि वर्षों तक तप करते हैं, वही अनंत सत्ता यशोदा की गोद में एक छोटे बालक की तरह बैठी थी।

     

    परंतु कृष्ण की माया भी अद्भुत थी।

     

    कुछ ही क्षणों में यशोदा मैया का मन फिर सामान्य होने लगा।

     

    उन्हें लगा जैसे अभी जो कुछ उन्होंने देखा, वह शायद किसी दिव्य भ्रम के समान था।

     

    उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “चलो, अब घर चलो। बहुत शरारत हो गई।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैया, मुझे भूख लगी है।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी तो मिट्टी खाई थी, अब भूख भी लग गई?”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से कहा,

     

    “मैंने मिट्टी कहाँ खाई थी मैया?”

     

    ग्वाल-बाल एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    फिर सब खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    यशोदा भी मुस्कुरा दीं।

     

    उन्हें क्या पता था कि अभी-अभी जिस बालक के मुख में उन्होंने अनंत ब्रह्मांड देखा था, वही कुछ ही देर में फिर किसी नई शरारत के लिए तैयार होने वाला है।

     

    वृंदावन में दिन ढलने लगा।

     

    सूर्य पश्चिम दिशा की ओर बढ़ चला।

     

    गायों के गले में बँधी घंटियाँ मधुर स्वर में बजने लगीं।

     

    ग्वाल-बाल अपने-अपने घर लौटने लगे।

     

    कृष्ण भी मैया की उँगली पकड़कर नंद भवन की ओर चल पड़े।

     

    लेकिन उस दिन के बाद वृंदावन की हवा में जैसे कोई अनकहा रहस्य तैरने लगा।

     

    कन्हैया केवल नंद-यशोदा के पुत्र नहीं थे।

     

    उनके छोटे-से शरीर में अनंत संसार छिपा था।

     

    उनकी बाल मुस्कान में ऐसी शक्ति थी, जिसे कोई समझ नहीं सकता था।

     

    और उनकी हर शरारत के पीछे कोई न कोई दिव्य रहस्य छिपा हुआ था।

     

    परंतु यह रहस्य केवल यशोदा मैया तक सीमित नहीं रहने वाला था।

     

    दूर ब्रह्मलोक में एक महान देवता भी कृष्ण की इन अद्भुत लीलाओं को देखकर आश्चर्यचकित हो रहे थे।

     

    ब्रह्मा जी के मन में एक प्रश्न उठने लगा—

     

    “क्या वास्तव में यह वही परम तत्व है, जिसे वेद खोजते हैं?”

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “यदि यह बालक सचमुच स्वयं परमेश्वर है, तो इसकी लीला की सीमा क्या है?”

     

    और यही प्रश्न आगे चलकर एक ऐसी अद्भुत घटना का कारण बनने वाला था, जिसमें स्वयं ब्रह्मा जी भी कृष्ण की माया के सामने चकित हो जाएँगे।

     

    वह कृष्ण की ऐसी लीला होगी, जिसमें समय ठहर जाएगा…

     

    ग्वाल-बालों का रूप बदल जाएगा…

     

    बछड़ों का रूप बदल जाएगा…

     

    और स्वयं ब्रह्मा जी को अपनी भूल का एहसास होगा।

     

    लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह होगा—

     

    जब स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी कृष्ण की परीक्षा लेने का प्रयास करेंगे, तब नंदलाल उन्हें क्या उत्तर देंगे?

     

    वृंदावन की धूल में छिपा वह रहस्य अब ब्रह्मलोक तक पहुँच चुका था…

     

    और अगले भाग में आरंभ होगी—

     

    “ब्रह्मा जी का मोह और कृष्ण की अद्भुत लीला”।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

    (भाग 10 — ग्वाल-बालों के साथ कृष्ण की क्रीड़ाएँ)

     

     

     

     

    यमलार्जुन वृक्षों के उद्धार की अद्भुत घटना को कुछ दिन बीत चुके थे।गोकुल में अभी भी उस दिन की चर्चा होती थी। कोई कहता कि नंदलाल ने अपनी छोटी-सी शक्ति से इतने विशाल वृक्ष गिरा दिए, तो कोई कहता कि उन वृक्षों में कोई दिव्य रहस्य छिपा था।

     

    लेकिन कृष्ण को इन बातों से कोई मतलब नहीं था।

     

    उनके लिए जीवन का हर दिन एक नया खेल था।

     

    सुबह होते ही उनकी आँखों में शरारत की चमक आ जाती।

     

    गायों की घंटियाँ सुनते ही वे आँगन की ओर दौड़ते।

     

    अपने सखाओं की आवाज सुनते ही खेल के लिए निकल पड़ते।

     

    और जब उनकी मधुर हँसी गोकुल की गलियों में गूँजती, तो लगता जैसे स्वयं आनंद ने बालक का रूप धारण कर लिया हो।

     

    उस दिन भी सुबह कुछ ऐसा ही हुआ।

     

    वन जाने की तैयारी

     

    सूरज अभी पूरी तरह ऊपर नहीं आया था।

     

    आकाश पर हल्की सुनहरी आभा थी।

     

    नंदभवन के बाहर गायें और बछड़े खड़े थे।

     

    ग्वाल-बाल एक-एक करके वहाँ इकट्ठे होने लगे।

     

    श्रीदामा ने आवाज लगाई,

     

    “कान्हा! जल्दी आओ!”

     

    सुभल भी बोला,

     

    “आज बहुत दूर तक जाएँगे।”

     

    कृष्ण घर के भीतर से दौड़ते हुए बाहर आए।

     

    उनके हाथ में छोटी-सी बाँसुरी थी।

     

    कमर पर पीतांबर बँधा था।

     

    बालों में मोरपंख सजा था।

     

    चेहरे पर वही प्यारी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें देखते ही कहा,

     

    “कान्हा, इतनी सुबह कहाँ जाने की तैयारी है?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मैया, हम गायों को चराने वन में जाएँगे।”

     

    यशोदा मैया ने थोड़ा चिंतित होकर कहा,

     

    “बहुत दूर मत जाना।”

     

    “नहीं जाऊँगा।”

     

    “अपने सखाओं से दूर मत होना।”

     

    “नहीं होऊँगा।”

     

    “और किसी शरारत में मत पड़ना।”

     

    कृष्ण ने तुरंत मैया की ओर देखकर कहा,

     

    “मैया, मैं तो कभी शरारत करता ही नहीं।”

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अब तुम मुझे भी अपनी बातों से बहकाने लगे?”

     

    कृष्ण दौड़कर मैया से लिपट गए।

     

    मैया ने उनके माथे पर हाथ फेरा।

     

    “सावधान रहना बेटा।”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    फिर अपने सखाओं के साथ चल पड़े।

     

    गोकुल से वृंदावन की ओर

     

    ग्वाल-बालों का छोटा-सा समूह गायों और बछड़ों के साथ आगे बढ़ रहा था।

     

    किसी के हाथ में बाँसुरी थी।

     

    किसी के हाथ में छोटी लकड़ी।

     

    कोई रास्ते में पत्थर उछाल रहा था।

     

    कोई गायों को नाम लेकर पुकार रहा था।

     

    और सबसे आगे कृष्ण चल रहे थे।

     

    उनके पीछे-पीछे उनकी गायें चल रही थीं।

     

    कृष्ण कभी पीछे मुड़कर देखते और कहते,

     

    “सब साथ चलो!”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा, आज हम नदी के पास चलेंगे।”

     

    सुभल बोला,

     

    “नदी के पास जाकर खेलेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “हाँ! और फिर देखते हैं कौन सबसे तेज दौड़ सकता है।”

     

    एक बालक बोला,

     

    “मैं तुमसे तेज दौड़ूँगा।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “पहले पकड़कर तो दिखाओ।”

     

    और बस!

     

    दौड़ शुरू हो गई।

     

    कुछ बच्चे आगे।

     

    कुछ पीछे।

     

    गायें इधर-उधर।

     

    बछड़े उछलते-कूदते।

     

    और कृष्ण सबके बीच हँसते हुए दौड़ रहे थे।

     

    वन की सुंदरता

     

    कुछ दूर जाकर वे एक सुंदर वन में पहुँचे।

     

    चारों ओर हरियाली थी।

     

    ऊँचे-ऊँचे वृक्ष।

     

    लताओं से ढकी डालियाँ।

     

    रंग-बिरंगे फूल।

     

    भौरों की गुनगुनाहट।

     

    पक्षियों का मधुर कलरव।

     

    ठंडी हवा।

     

    और पास ही बहती यमुना की निर्मल धारा।

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में प्रसन्नता भर गई।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “देखो सखाओं! कितना सुंदर है हमारा वन।”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “हाँ कान्हा! यहाँ तो मन करता है कि हम रोज आएँ।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो रोज आना।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    खेलों की शुरुआत

     

    गायें घास चरने लगीं।

     

    बछड़े इधर-उधर दौड़ने लगे।

     

    ग्वाल-बालों ने अपना खेल शुरू कर दिया।

     

    कभी वे एक-दूसरे के पीछे दौड़ते।

     

    कभी पेड़ की छाया में बैठकर बातें करते।

     

    कभी गेंद की तरह मिट्टी का गोला बनाकर खेलते।

     

    कभी कोई अपनी बाँसुरी बजाता और बाकी बच्चे उसकी नकल करते।

     

    कृष्ण सबके साथ ऐसे घुल-मिल जाते जैसे वे उनके मित्र ही नहीं, बल्कि उनके बीच के सबसे साधारण बालक हों।

     

    एक दिन श्रीदामा ने कहा,

     

    “कान्हा, आज हम देखते हैं कि कौन सबसे ऊँचे पेड़ तक चढ़ सकता है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    सब बच्चे पेड़ की ओर दौड़े।

     

    कोई एक शाखा तक पहुँचा।

     

    कोई दूसरी तक।

     

    कृष्ण तो देखते ही देखते ऊपर पहुँच गए।

     

    श्रीदामा ने नीचे से कहा,

     

    “कान्हा! तुम तो बहुत तेज हो।”

     

    कृष्ण हँसे।

     

    “अभी तो खेल शुरू हुआ है।”

     

    वे ऊपर से कुछ पत्ते तोड़कर नीचे फेंकने लगे।

     

    सभी बच्चे उन्हें पकड़ने लगे।

     

    फिर किसी ने कहा,

     

    “अब देखते हैं कौन सबसे पहले नीचे उतरता है!”

     

    सब नीचे उतरने लगे।

     

    कुछ फिसले।

     

    कुछ हँसे।

     

    और कुछ गिरते-गिरते बच गए।

     

    कृष्ण सबसे पहले नीचे पहुँच गए।

     

    सभी बोले,

     

    “कान्हा जीत गए!”

     

    कृष्ण हँसकर बोले,

     

    “जीत तो हम सबकी हुई।”

     

    भोजन का समय

     

    दोपहर होने लगी।

     

    सूरज थोड़ा तेज हो गया।

     

    गायें छाया में बैठ गईं।

     

    ग्वाल-बाल भी एक बड़े वृक्ष के नीचे बैठ गए।

     

    सब अपने-अपने घर से लाया हुआ भोजन निकालने लगे।

     

    किसी के पास रोटी थी।

     

    किसी के पास दही।

     

    किसी के पास फल।

     

    किसी के पास गुड़।

     

    कृष्ण ने अपना भोजन खोला।

     

    उनके पास मैया ने प्रेम से माखन और रोटी रखी थी।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “कान्हा, तुम्हारे पास क्या है?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “माखन।”

     

    सभी बच्चे तुरंत कृष्ण के पास आ गए।

     

    “हमें भी दो।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “सबको मिलेगा।”

     

    उन्होंने माखन सबमें बाँटना शुरू कर दिया।

     

    किसी को थोड़ा अधिक।

     

    किसी को थोड़ा कम।

     

    एक बालक बोला,

     

    “कान्हा, मुझे ज्यादा दो।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं सबसे ज्यादा भूखा हूँ।”

     

    कृष्ण ने उसे थोड़ा और दे दिया।

     

    दूसरा बोला,

     

    “मुझे भी!”

     

    फिर तीसरा।

     

    कुछ ही देर में कृष्ण का अपना माखन लगभग समाप्त हो गया।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “अब तुम क्या खाओगे?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तुम सबके साथ खाऊँगा।”

     

    उन्होंने सबके भोजन में से थोड़ा-थोड़ा लेकर खाना शुरू कर दिया।

     

    सभी मित्र हँसने लगे।

     

    बाँसुरी की मधुर धुन

     

    भोजन के बाद सभी बच्चे कुछ देर विश्राम करने लगे।

     

    गायें भी शांत थीं।

     

    हवा धीरे-धीरे बह रही थी।

     

    कृष्ण ने अपनी बाँसुरी निकाली।

     

    उन्होंने आँखें बंद कीं।

     

    और बाँसुरी पर एक मधुर धुन छेड़ दी।

     

    मधुर… मधुर…

     

    जैसे ही बाँसुरी की धुन वन में फैली, वातावरण बदल गया।

     

    पक्षी चुप हो गए।

     

    जैसे वे भी उस धुन को सुनना चाहते हों।

     

    हवा मानो कुछ क्षणों के लिए ठहर गई।

     

    गायों ने अपना चरना रोक दिया।

     

    बछड़े कृष्ण की ओर देखने लगे।

     

    ग्वाल-बाल मंत्रमुग्ध होकर कृष्ण को देखने लगे।

     

    श्रीदामा ने धीरे से कहा,

     

    “कान्हा, तुम्हारी बाँसुरी में ऐसा क्या है?”

     

    कृष्ण ने हँसकर पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “इसे सुनते ही सब शांत हो जाते हैं।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “शायद बाँसुरी सबको मित्र बनाना जानती है।”

     

    सुभल बोला,

     

    “नहीं कान्हा। बात बाँसुरी की नहीं, तुम्हारी है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    एक नया खेल

     

    थोड़ी देर बाद कृष्ण ने कहा,

     

    “चलो, अब एक खेल खेलते हैं।”

     

    सब तैयार हो गए।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “हम दो दल बनाएँगे।”

     

    एक दल का नेतृत्व श्रीदामा करेगा।

     

    दूसरे का मैं करूँगा।

     

    फिर दोनों दलों के बीच दौड़ की प्रतियोगिता होगी।

     

    सभी बच्चे उत्साहित हो गए।

     

    “हाँ!”

     

    “चलो!”

     

    “आज देखते हैं कौन जीतता है।”

     

    दौड़ शुरू हुई।

     

    एक ओर श्रीदामा।

     

    दूसरी ओर कृष्ण।

     

    बच्चे उनके पीछे।

     

    कभी कोई आगे निकलता।

     

    कभी कोई पीछे।

     

    कृष्ण जानबूझकर थोड़ा धीमे हो जाते ताकि उनके मित्र आगे निकल जाएँ।

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा! तुम जानबूझकर हार रहे हो!”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “हारना भी तो एक खेल है।”

     

    अंत में सभी बच्चे एक साथ लक्ष्य तक पहुँचे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “देखा! कोई हारा नहीं।”

     

    गायों के साथ कान्हा

     

    खेलते-खेलते कृष्ण को अपनी गायों की चिंता हुई।

     

    वे उठे और उन्हें ढूँढ़ने लगे।

     

    “सुभल, देखो हमारी गायें कहाँ हैं।”

     

    सुभल ने दूर इशारा किया।

     

    “वहाँ हैं।”

     

    कृष्ण उनके पास गए।

     

    एक गाय कृष्ण को देखते ही उनके पास आ गई।

     

    कृष्ण ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम यहाँ हो?”

     

    गाय ने जैसे प्रेम से उनकी ओर देखा।

     

    कृष्ण ने उसके गले को सहलाया।

     

    गाय के बछड़े भी कृष्ण के पास आ गए।

     

    कृष्ण उन्हें पुचकारने लगे।

     

    ग्वाल-बाल यह दृश्य देखकर मुस्कुराने लगे।

     

    श्रीदामा ने कहा,

     

    “कान्हा, तुम्हें गायें बहुत पसंद हैं।”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “गायें हमें प्रेम देती हैं। हमें भी उनका ध्यान रखना चाहिए।”

     

    उन्होंने सभी बछड़ों को एक साथ किया।

     

    फिर सबको धीरे-धीरे आगे ले जाने लगे।

     

    वन में अचानक एक विचित्र आवाज

     

    दिन धीरे-धीरे ढलने लगा था।

     

    सूरज पश्चिम की ओर झुकने लगा।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “अब हमें वापस चलना चाहिए।”

     

    सभी बालक अपनी गायों को इकट्ठा करने लगे।

     

    तभी दूर से एक अजीब-सी आवाज सुनाई दी।

     

    गूँऽऽऽ…

     

    सभी बच्चे रुक गए।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “यह कैसी आवाज है?”

     

    सुभल बोला,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कृष्ण ने भी ध्यान से उस दिशा में देखा।

     

    फिर दूसरी आवाज आई।

     

    इस बार कुछ अधिक भारी।

     

    घुर्रर्र…

     

    ग्वाल-बालों के चेहरे पर चिंता आ गई।

     

    एक बालक बोला,

     

    “कहीं कोई जंगली जानवर तो नहीं?”

     

    दूसरा बोला,

     

    “चलो यहाँ से।”

     

    लेकिन कृष्ण शांत थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “डरो मत। सब मेरे पास रहो।”

     

    सभी बच्चे कृष्ण के पास आ गए।

     

    गायें भी कुछ बेचैन होने लगीं।

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा।

     

    “डरो मत।”

     

    उनकी आवाज में ऐसा विश्वास था कि बच्चों का डर थोड़ा कम हो गया।

     

    लेकिन तभी झाड़ियों के पीछे कुछ हिला।

     

    पत्तियाँ जोर-जोर से काँपने लगीं।

     

    कृष्ण ने अपने सखाओं को पीछे रहने का संकेत किया।

     

    कुछ क्षणों तक सब शांत रहा।

     

    फिर अचानक झाड़ियों से एक विशाल आकृति बाहर आई।

     

    ग्वाल-बालों की आँखें फैल गईं।

     

    कुछ बच्चे डरकर पीछे हट गए।

     

    किसी ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा,

     

    “मैं हूँ। डरो मत।”

     

    लेकिन वह आकृति धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी।

     

    उसका रूप भयावह था।

     

    गायें पीछे हटने लगीं।

     

    पक्षी उड़ गए।

     

    वन का वातावरण अचानक बदल गया।

     

    जहाँ कुछ क्षण पहले हँसी गूँज रही थी, वहाँ अब भय का सन्नाटा था।

     

    कृष्ण ने अपने सखाओं की ओर देखा।

     

    “सब यहीं रहो।”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा, तुम अकेले मत जाना!”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं अकेला कहाँ हूँ? तुम सबका प्रेम मेरे साथ है।”

     

    यह कहकर कृष्ण उस रहस्यमयी आकृति की ओर बढ़ने लगे।

     

    उनके कदम छोटे थे।

     

    लेकिन उनके चेहरे पर तनिक भी भय नहीं था।

     

    सभी ग्वाल-बाल साँस रोककर उन्हें देखते रहे।

     

    और तभी…

     

    उस रहस्यमयी जीव ने अपना विशाल मुँह खोल दिया।

     

    ग्वाल-बाल भय से चिल्ला उठे—

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण उस विशाल आकृति के सामने खड़े थे।

     

    लेकिन किसी को पता नहीं था कि वह कौन था और क्यों उनके मार्ग में आया था।

     

    उस दिन की बाल-क्रीड़ा अब एक ऐसी घटना में बदलने वाली थी, जिसमें कृष्ण की अद्भुत शक्ति फिर से प्रकट होने वाली थी।

     

    अगली कड़ी में—

     

    भाग 11 — कृष्ण ने माटी खाई और दिखाया अद्भुत संसार

     

    कान्हा की बाल-लीलाओं का एक और अद्भुत प्रसंग सामने आएगा। एक दिन खेलते-खेलते कृष्ण के सखाओं ने यशोदा मैया से शिकायत कर दी कि कान्हा ने माटी खा ली है।

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण से पूछा—

     

    “कान्हा, तुमने माटी खाई है?”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से मना कर दिया।

     

    लेकिन जब मैया ने कहा—

     

    “अच्छा, अपना मुँह खोलो।”

     

    तब जो दृश्य यशोदा मैया की आँखों के सामने प्रकट हुआ, उसे देखकर उनका पूरा संसार जैसे थम गया।

     

    आखिर कृष्ण के छोटे-से मुँह के भीतर ऐसा क्या दिखाई दिया था?

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

     

    (भाग 9 — यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार)

     

     

     

    गोकुल में उस दिन की सुबह अब धीरे-धीरे दोपहर की ओर बढ़ रही थी।नंदभवन के आँगन में यशोदा मैया अपने काम में व्यस्त थीं। कुछ देर पहले तक उनके नन्हे कान्हा की शरारतों से पूरा घर गूँज रहा था। मटकी टूट चुकी थी, दही आँगन में फैल चुका था और अंत में यशोदा मैया ने अपने नटखट लाल को एक भारी लकड़ी की ओखली से बाँध दिया था।

     

    मैया को लगा था कि अब कान्हा कुछ देर शांत बैठेंगे।

     

    लेकिन वे यह भूल गई थीं कि उनका कान्हा साधारण बालक नहीं था।

     

    वह तो ऐसा बालक था, जिसके लिए पूरा संसार भी खेल का मैदान था।

     

    कृष्ण ओखली से बँधे हुए चुपचाप बैठे थे।

     

    उनकी छोटी-छोटी आँखें कभी मैया की ओर जातीं, कभी आँगन की ओर और कभी सामने खड़े दो विशाल वृक्षों पर टिक जातीं।

     

    वे दोनों वृक्ष बहुत पुराने थे।

     

    इतने विशाल कि उनकी शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं।

     

    गोकुल के बच्चों के लिए वे दोनों वृक्ष किसी पहाड़ से कम नहीं थे।

     

    उनके नीचे अक्सर पक्षी बैठते।

     

    गोपियाँ वहाँ से गुजरतीं।

     

    ग्वाल-बाल कभी उनके आसपास खेलते।

     

    लेकिन आज उन वृक्षों के सामने स्वयं नंदलाल खड़े थे।

     

    रस्सी से बँधे हुए।

     

    ओखली पीछे।

     

    और आँखों में शरारत की चमक।

     

    कान्हा ने मन में कुछ ठाना

     

    कृष्ण ने धीरे से ओखली को देखा।

     

    उन्होंने एक बार उसे खींचा।

     

    ओखली थोड़ी-सी आगे सरकी।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    उन्होंने फिर जोर लगाया।

     

    ओखली कुछ और आगे बढ़ी।

     

    अब कृष्ण की आँखों में उत्साह था।

     

    उन्होंने अपने छोटे-छोटे पैरों को जमीन पर जमाया और पूरी शक्ति से आगे बढ़ने लगे।

     

    ओखली उनके पीछे घिसटती जा रही थी।

     

    घुर्र… घुर्र…

     

    मिट्टी पर ओखली के घिसटने की आवाज आने लगी।

     

    पास खेल रहे कुछ बालकों ने यह देखा तो वे दौड़कर कृष्ण के पास आ गए।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “कान्हा, तुम कहाँ जा रहे हो?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “वहाँ।”

     

    उन्होंने दोनों वृक्षों की ओर इशारा किया।

     

    सुभल ने आश्चर्य से कहा,

     

    “लेकिन तुम तो बँधे हुए हो!”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “बँधा हूँ… लेकिन चल तो सकता हूँ।”

     

    सभी बालक हँस पड़े।

     

    एक बालक बोला,

     

    “यशोदा मैया ने कहा है कि तुम कहीं मत जाना।”

     

    कृष्ण ने मासूम चेहरा बनाकर कहा,

     

    “मैं कहाँ जा रहा हूँ? मैं तो बस खेल रहा हूँ।”

     

    सभी सखा कृष्ण के पीछे-पीछे चलने लगे।

     

    दो विशाल वृक्ष

     

    कृष्ण अब उन दोनों वृक्षों के बिल्कुल पास पहुँच चुके थे।

     

    दोनों वृक्ष इतने पास-पास खड़े थे कि उनके बीच से एक बालक निकल सकता था, लेकिन ओखली थोड़ी चौड़ी थी।

     

    कृष्ण ने वृक्षों को देखा।

     

    फिर ओखली को।

     

    फिर वृक्षों के बीच की जगह को।

     

    उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आई।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “अगर मैं यहाँ से निकल जाऊँ तो?”

     

    कृष्ण धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    ओखली वृक्षों के बीच फँस गई।

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    ओखली अटक चुकी थी।

     

    सुभल बोला,

     

    “कान्हा! अब क्या करोगे?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “अब इसे निकालेंगे।”

     

    उन्होंने रस्सी को पकड़ा।

     

    फिर जोर लगाया।

     

    ओखली नहीं हिली।

     

    कृष्ण ने फिर जोर लगाया।

     

    पेड़ों की जड़ें जैसे हिलने लगीं।

     

    ग्वाल-बालों की आँखें बड़ी हो गईं।

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा! धीरे!”

     

    लेकिन कृष्ण ने जैसे कुछ और ही ठान लिया था।

     

    उन्होंने फिर अपने छोटे-से शरीर में पूरी शक्ति लगाई।

     

    और तभी—

     

    चर्रर्र…!

     

    एक अजीब-सी आवाज हुई।

     

    वृक्षों की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    पत्ते तेज़ी से काँपने लगे।

     

    पक्षी घबराकर उड़ गए।

     

    ग्वाल-बाल पीछे हट गए।

     

    कृष्ण ने रस्सी खींची।

     

    और अगले ही क्षण—

     

    धड़ाम!!!

     

    दोनों विशाल वृक्ष धरती पर गिर पड़े।

     

    गोकुल की धरती काँप उठी।

     

    धूल का बादल चारों ओर फैल गया।

     

    पक्षी आकाश में उड़ने लगे।

     

    बच्चे डरकर इधर-उधर भागे।

     

    और कुछ ही क्षणों में वहाँ एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।

     

    जहाँ अभी दो विशाल वृक्ष खड़े थे, वहाँ अब धरती पर उनके तने पड़े थे।

     

    कृष्ण अपनी ओखली के साथ उनके बीच खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर वही प्यारी-सी मुस्कान थी।

     

    गोकुल में मची हलचल

     

    वृक्षों के गिरने की आवाज इतनी तेज थी कि नंदभवन तक पहुँच गई।

     

    यशोदा मैया घबरा गईं।

     

    उन्होंने तुरंत बाहर आकर पूछा,

     

    “यह कैसी आवाज हुई?”

     

    एक गोपी दौड़ती हुई आई।

     

    “मैया! मैया! जल्दी चलिए!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कान्हा…!”

     

    कृष्ण का नाम सुनते ही यशोदा मैया का हृदय धड़क उठा।

     

    “क्या हुआ मेरे कान्हा को?”

     

    गोपी ने कहा,

     

    “वे उन बड़े वृक्षों के पास थे।”

     

    यशोदा मैया बिना कुछ सोचे दौड़ पड़ीं।

     

    उनके पीछे कई गोपियाँ और गोकुलवासी भी चल पड़े।

     

    जब वे वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने देखा—

     

    दोनों विशाल वृक्ष धरती पर पड़े थे।

     

    और उनके बीच उनका कान्हा ओखली से बँधा हुआ बैठा था।

     

    यशोदा मैया दौड़कर कृष्ण के पास पहुँचीं।

     

    “कान्हा!”

     

    उन्होंने तुरंत उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

     

    “बेटा, तुम्हें चोट तो नहीं लगी?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    यशोदा मैया ने उन्हें चारों ओर से देखा।

     

    उनके हाथ देखे।

     

    पैर देखे।

     

    चेहरा देखा।

     

    कहीं कोई चोट नहीं थी।

     

    उन्होंने राहत की साँस ली।

     

    फिर बोलीं,

     

    “तुम यहाँ कैसे आए?”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से कहा,

     

    “मैया, मैं तो यहीं बैठा था।”

     

    एक गोपी हँसते हुए बोली,

     

    “मैया, आपका कान्हा यहीं बैठा था… लेकिन वृक्ष स्वयं चलकर गिर गए!”

     

    सब लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या था।

     

    रहस्य गहरा था

     

    गोकुल के बड़े-बुजुर्ग उन वृक्षों को देखकर हैरान थे।

     

    इतने विशाल वृक्ष…

     

    एक साथ कैसे गिर सकते थे?

     

    वह भी बिना किसी आँधी या तूफान के?

     

    नंदबाबा भी वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने वृक्षों को देखा।

     

    फिर कृष्ण को देखा।

     

    फिर पूछा,

     

    “यह कैसे हुआ?”

     

    किसी के पास उत्तर नहीं था।

     

    श्रीदामा आगे आया।

     

    उसने कहा,

     

    “बाबा, कान्हा ओखली खींचते हुए वृक्षों के बीच चला गया था।”

     

    नंदबाबा ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “फिर ओखली अटक गई।”

     

    “और?”

     

    “फिर कान्हा ने उसे खींचा।”

     

    “फिर?”

     

    श्रीदामा ने दोनों हाथ फैलाकर कहा,

     

    “फिर दोनों पेड़ गिर गए!”

     

    गोकुलवासी आश्चर्य से कृष्ण को देखने लगे।

     

    इतना छोटा बालक…

     

    और इतने विशाल वृक्ष?

     

    लेकिन कृष्ण तो बिल्कुल सामान्य बालक की तरह यशोदा मैया की गोद में बैठे थे।

     

    उनके हाथ में अभी भी माखन का थोड़ा-सा निशान लगा था।

     

    उनके बाल बिखरे हुए थे।

     

    चेहरे पर भोली मुस्कान थी।

     

    उन्हें देखकर कोई विश्वास ही नहीं कर सकता था कि कुछ क्षण पहले उनके कारण दो विशाल वृक्ष धरती पर गिर पड़े थे।

     

    वृक्षों से निकले दो दिव्य पुरुष

     

    लेकिन असली रहस्य अभी सामने आना बाकी था।

     

    अचानक वहाँ एक दिव्य प्रकाश फैलने लगा।

     

    गोकुलवासियों ने देखा कि गिरे हुए दोनों वृक्षों के स्थान से दो अत्यंत तेजस्वी पुरुष प्रकट हो रहे हैं।

     

    उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था।

     

    वे साधारण मनुष्य नहीं लग रहे थे।

     

    उनके वस्त्र चमक रहे थे।

     

    उनके चेहरे पर तेज था।

     

    सभी गोकुलवासी आश्चर्य से पीछे हट गए।

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण को और कसकर अपनी गोद में पकड़ लिया।

     

    लेकिन कृष्ण शांत थे।

     

    दोनों दिव्य पुरुष सीधे कृष्ण के सामने आए।

     

    उन्होंने हाथ जोड़ लिए।

     

    उनकी आँखों में भक्ति और कृतज्ञता थी।

     

    गोकुलवासियों को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

     

    वे सोच रहे थे—

     

    “ये कौन हैं?”

     

    तभी उनमें से एक ने कृष्ण के चरणों की ओर झुककर प्रणाम किया।

     

    और बोला,

     

    “प्रभु! आपकी कृपा से आज हमारा उद्धार हुआ।”

     

    यशोदा मैया यह सुनकर और भी आश्चर्यचकित हो गईं।

     

    “प्रभु?”

     

    उन्होंने अपने कान्हा की ओर देखा।

     

    कृष्ण तो उनकी गोद में बैठे थे।

     

    उनके पैरों में धूल लगी थी।

     

    लेकिन वे दिव्य पुरुष उन्हें भगवान कहकर प्रणाम कर रहे थे।

     

    नलकूबर और मणिग्रीव की कथा

     

    वे दोनों दिव्य पुरुष वास्तव में कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे।

     

    कभी वे अत्यंत धनवान और शक्तिशाली थे।

     

    धन और ऐश्वर्य के कारण उनके भीतर अहंकार आ गया था।

     

    एक बार वे अपनी शक्ति और संपत्ति के मद में इतने डूब गए कि उन्होंने महान ऋषि नारद का भी सम्मान नहीं किया।

     

    ऋषि नारद ने उनके भीतर छिपे अहंकार को देखा।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “इनका अहंकार इनके लिए ही विनाश का कारण बनेगा। इन्हें ऐसा जीवन मिलना चाहिए जिसमें इन्हें अपने कर्मों पर विचार करने का अवसर मिले।”

     

    ऋषि ने उन्हें वृक्ष बनने का शाप दिया।

     

    लेकिन वह शाप वास्तव में उनके लिए वरदान बन गया।

     

    क्योंकि ऋषि नारद ने यह भी कहा था कि जब स्वयं भगवान कृष्ण उन्हें स्पर्श करेंगे, तब उनका उद्धार होगा।

     

    इसलिए वे दोनों लंबे समय तक वृक्ष के रूप में खड़े रहे।

     

    ऋतुएँ बदलती रहीं।

     

    वर्षा आई।

     

    गर्मी आई।

     

    सर्दी आई।

     

    पक्षियों ने उनके ऊपर घोंसले बनाए।

     

    गोकुल के बच्चे उनके नीचे खेलते रहे।

     

    लेकिन वे दोनों प्रतीक्षा करते रहे—

     

    उस क्षण की प्रतीक्षा, जब नंदलाल उनके पास आएँगे।

     

    और आज वह क्षण आ चुका था।

     

    प्रभु के सामने पश्चाताप

     

    नलकूबर ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “हे प्रभु! हमें अपने धन और शक्ति का इतना अहंकार हो गया था कि हम धर्म और विनम्रता को भूल गए थे।”

     

    मणिग्रीव ने कहा,

     

    “ऋषि नारद का शाप हमारे लिए दंड नहीं, कृपा बन गया। उनके कारण हमें आपके दर्शन प्राप्त हुए।”

     

    दोनों ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “हे नंदलाल! आपने हमें इस वृक्ष रूपी बंधन से मुक्त कर दिया। हम आपकी कृपा को कभी नहीं भूलेंगे।”

     

    कृष्ण उन्हें देखकर मुस्कुराए।

     

    उनके छोटे-से चेहरे पर ऐसी करुणा थी, जैसे वे सब कुछ पहले से जानते हों।

     

    फिर दोनों दिव्य पुरुषों ने कृष्ण को प्रणाम किया।

     

    और देखते ही देखते उनका दिव्य प्रकाश आकाश की ओर उठने लगा।

     

    कुछ ही क्षणों में वे दोनों वहाँ से अदृश्य हो गए।

     

    गोकुलवासी स्तब्ध थे

     

    कुछ समय तक कोई कुछ नहीं बोला।

     

    सबके मन में एक ही प्रश्न था—

     

    “हमारे कान्हा आखिर हैं कौन?”

     

    लेकिन यशोदा मैया के लिए उस समय ये प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं था।

     

    उनके लिए तो उनका कान्हा केवल उनका बेटा था।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया और बोलीं,

     

    “बस बहुत हो गया! आज के बाद तुम मेरी नजरों से दूर नहीं जाओगे।”

     

    कृष्ण मैया के गले से लग गए।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “मैया, अब रस्सी खोलोगी?”

     

    यशोदा मैया ने उनके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “हाँ बेटा।”

     

    उन्होंने रस्सी खोल दी।

     

    कृष्ण आज़ाद हो गए।

     

    लेकिन जैसे ही वे जमीन पर उतरे, उनके चेहरे पर फिर वही शरारती मुस्कान लौट आई।

     

    श्रीदामा ने धीरे से कहा,

     

    “कान्हा, आज तो तुमने दो पेड़ गिरा दिए।”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा,

     

    “मैंने नहीं गिराए।”

     

    “तो किसने गिराए?”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें घुमाईं।

     

    “शायद हवा ने।”

     

    सभी ग्वाल-बाल हँस पड़े।

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण को फिर अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “बस! अब कोई और शरारत नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    लेकिन उनके मन में तो अगली लीला पहले ही जन्म ले चुकी थी।

     

    लीला का रहस्य

     

    उस दिन गोकुल में देर तक इसी घटना की चर्चा होती रही।

     

    कोई कहता,

     

    “कृष्ण ने पेड़ गिराए।”

     

    कोई कहता,

     

    “यह कोई दिव्य घटना थी।”

     

    कोई कहता,

     

    “इन वृक्षों में कोई रहस्य जरूर था।”

     

    लेकिन कृष्ण?

     

    वे तो शाम होते-होते अपने सखाओं के साथ फिर खेलने निकल गए।

     

    जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    उनके लिए यह सब खेल था।

     

    लेकिन भक्तों के लिए यह संदेश था—

     

    अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, भगवान की कृपा उसे मिटा सकती है।

     

    और प्रेम की बात तो सबसे अद्भुत थी।

     

    जिस कृष्ण को यशोदा मैया ने रस्सी से बाँध दिया था, वही कृष्ण दो विशाल वृक्षों में बँधी दिव्य आत्माओं को मुक्त करने वाले बन गए।

     

    एक ओर वे अपनी मैया के लिए नन्हे बालक थे।

     

    दूसरी ओर वे समस्त संसार के लिए उद्धारकर्ता।

     

    यही तो नंदलाल की बाल-लीला की अद्भुतता थी।

     

    शाम का समय

     

    सूरज धीरे-धीरे अस्त होने लगा।

     

    गोकुल के आकाश में लालिमा फैल गई।

     

    गायें चरकर वापस लौट रही थीं।

     

    गोपियाँ अपने घरों के बाहर दीप जलाने लगीं।

     

    कृष्ण अपने सखाओं के साथ खेलकर लौटे।

     

    यशोदा मैया द्वार पर खड़ी उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।

     

    कृष्ण दौड़कर मैया के पास आए।

     

    “मैया!”

     

    यशोदा मैया ने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “आ गए मेरे लाल?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    मैया ने पूछा,

     

    “आज फिर कोई शरारत तो नहीं की?”

     

    कृष्ण ने बड़ी मासूमियत से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    मैया ने उनकी आँखों में देखा।

     

    फिर मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारी आँखें बता रही हैं कि तुम कुछ सोच रहे हो।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “मैया, कल बताऊँगा।”

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    बस मैया के कंधे पर सिर रख दिया।

     

    लेकिन उस रात गोकुल को क्या पता था कि अगले दिन कृष्ण अपने ग्वाल-बाल सखाओं के साथ ऐसी क्रीड़ा करने वाले हैं, जिसमें उनकी हँसी, उनकी बाँसुरी, गायों की घंटियाँ और वृंदावन की हरियाली एक साथ मिलकर ऐसा मधुर दृश्य बनाएँगी, जिसे देखकर देवता भी मोहित हो जाएँगे।

     

    और इसी के साथ नंदलाल की बाल-लीलाएँ एक नए रंग में प्रवेश करने वाली थीं।

     

    अगली कड़ी में—

     

    भाग 10 — ग्वाल-बालों के साथ कृष्ण की क्रीड़ाएँ

     

    जहाँ कान्हा अपने सखाओं के साथ गायों और बछड़ों को लेकर वन की ओर जाएँगे। वहाँ खेल, हँसी, दौड़ और बाल-सुलभ शरारतों के बीच कृष्ण अपने मित्रों के साथ ऐसी मधुर लीला करेंगे कि पूरा वृंदावन आनंद से भर उठेगा।

     

    लेकिन उस वन में एक ऐसी घटना भी होने वाली थी, जो कृष्ण के सखाओं को कुछ समय के लिए भयभीत कर देगी…

     

    आखिर वन में ऐसा क्या होने वाला था?

     

    Be Continue ✍️✍️

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

    (भाग 8 — यशोदा मैया ने कृष्ण को बाँधा)

     

     

     

     

    गोकुल में उस दिन सुबह से ही एक अलग-सी चहल-पहल थी।सूरज की सुनहरी किरणें नंदभवन के आँगन में फैल रही थीं। गायों की घंटियों की मधुर आवाज वातावरण में गूँज रही थी। बछड़े अपनी माताओं के पास उछल-कूद कर रहे थे और गोकुल की गलियों में गोपियाँ अपने-अपने घरों के काम में व्यस्त थीं।

     

    लेकिन नंदभवन के भीतर यशोदा मैया एक विशेष काम में लगी हुई थीं।

     

    वे स्वयं अपने हाथों से दही मथ रही थीं।

     

    मटकी में दही घूम रहा था और मथनी की आवाज पूरे आँगन में मधुर लय पैदा कर रही थी।

     

    यशोदा मैया के होंठों पर धीरे-धीरे एक गीत था।

     

    वह गीत किसी देवता के लिए नहीं था।

     

    वह गीत उनके अपने लाल के लिए था।

     

    उनका मन बार-बार उसी नन्हे कान्हा की ओर जा रहा था।

     

    वे सोच रही थीं—

     

    “मेरा लाल अब कितना बड़ा हो गया है। दिनभर गोकुल में दौड़ता रहता है। कभी किसी के घर से माखन चुरा लाता है, कभी मटकी फोड़ देता है, कभी बंदरों को माखन खिला देता है। न जाने कब सुधरेगा मेरा कान्हा!”

     

    यह सोचते-सोचते उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उन्हें क्या पता था कि उनका वही नटखट लाल आज फिर ऐसी लीला करने वाला है, जिसे देखकर पूरा गोकुल हँसेगा और स्वयं यशोदा मैया को उसके पीछे दौड़ना पड़ेगा।

     

    कान्हा को भी चाहिए था मैया का प्रेम

     

    कृष्ण उस समय आँगन में खेल रहे थे।

     

    कभी मिट्टी में अपनी छोटी-सी लकड़ी घुमाते।

     

    कभी किसी बछड़े के पीछे भागते।

     

    कभी अपने सखाओं को आवाज लगाते।

     

    लेकिन थोड़ी ही देर में उन्हें अपनी मैया की याद आने लगी।

     

    वे धीरे-धीरे चलकर यशोदा मैया के पास पहुँचे।

     

    मैया दही मथने में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

     

    फिर मटकी की ओर देखा।

     

    फिर मैया की गोद की ओर।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “मैया!”

     

    यशोदा मैया ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ मेरे लाल?”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “गोद में लो।”

     

    यशोदा मैया ने मथनी रोक दी।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    कान्हा मैया के गले से लग गए।

     

    यशोदा मैया ने उनके बालों को सहलाते हुए पूछा,

     

    “क्या हुआ? आज इतनी जल्दी मैया की याद आ गई?”

     

    कृष्ण कुछ नहीं बोले।

     

    बस मैया से लिपटे रहे।

     

    यशोदा मैया ने उनके माथे को चूमा।

     

    फिर बोलीं,

     

    “अच्छा, बताओ क्या चाहिए?”

     

    कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मैया की ओर देखा।

     

    “माखन।”

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    “अभी तो दही मथ रही हूँ।”

     

    “मुझे अभी चाहिए।”

     

    “थोड़ा इंतजार करो।”

     

    कृष्ण ने मुँह फुला लिया।

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “कान्हा, तुम बहुत जिद्दी हो गए हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आप मुझे माखन दे दो, मैं जिद नहीं करूँगा।”

     

    मैया बोलीं,

     

    “अच्छा, पहले बैठो।”

     

    कृष्ण मैया की गोद में बैठ गए।

     

    लेकिन तभी बाहर से किसी बछड़े की आवाज आई।

     

    कृष्ण ने उस ओर देखा।

     

    फिर मैया की गोद से उतरने लगे।

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “कहाँ जा रहे हो?”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “बाहर।”

     

    “पहले माखन तो खा लो।”

     

    कृष्ण फिर बैठ गए।

     

    यशोदा मैया ने माखन निकाला और अपने हाथ से कृष्ण को खिलाने लगीं।

     

    कृष्ण बड़े आनंद से माखन खाने लगे।

     

    लेकिन तभी…

     

    चूल्हे पर रखा दूध उबलने लगा।

     

    यशोदा मैया ने आवाज सुनी।

     

    उन्होंने कृष्ण को नीचे बैठाया और कहा,

     

    “बेटा, तुम यहीं बैठो। मैया अभी आती है।”

     

    और वे दूध बचाने के लिए रसोई की ओर चली गईं।

     

    कान्हा का रूठना

     

    कृष्ण ने मैया को जाते हुए देखा।

     

    उनके हाथ में अभी माखन लगा था।

     

    वे कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर उनके चेहरे पर हल्की-सी नाराजगी दिखाई दी।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “मैया मुझे छोड़कर दूध बचाने चली गईं!”

     

    उनका नन्हा-सा मन अपनी माँ का पूरा ध्यान चाहता था।

     

    उन्होंने पास रखी मटकी की ओर देखा।

     

    फिर एक छोटी-सी लकड़ी उठाई।

     

    और मटकी पर हल्के से प्रहार किया।

     

    ठक!

     

    मटकी में दरार आ गई।

     

    फिर एक और प्रहार।

     

    ठक!

     

    और मटकी टूट गई।

     

    दही और माखन नीचे गिरने लगा।

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    फिर मुस्कुराए।

     

    उन्होंने माखन उठाया और खाने लगे।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने अपने सखाओं को भी बुला लिया।

     

    बंदर भी आ गए।

     

    अब आँगन में फिर वही पुरानी शरारत शुरू हो गई।

     

    यशोदा मैया ने देखा

     

    कुछ देर बाद यशोदा मैया वापस आईं।

     

    उन्होंने देखा कि जिस मटकी को उन्होंने बड़े प्रेम से तैयार किया था, वह टूटी पड़ी है।

     

    दही पूरे फर्श पर फैला हुआ है।

     

    और उनका कान्हा?

     

    वह पास ही बैठा माखन खा रहा है।

     

    यशोदा मैया ने पहले कुछ क्षणों तक उसे देखा।

     

    फिर उनकी आँखों में हल्का क्रोध आ गया।

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    मैया को देखते ही समझ गए कि आज स्थिति गंभीर है।

     

    उन्होंने तुरंत उठकर भागना शुरू कर दिया।

     

    यशोदा मैया बोलीं,

     

    “रुको!”

     

    लेकिन कृष्ण कहाँ रुकने वाले थे?

     

    वे आँगन से बाहर भागे।

     

    माँ और पुत्र की दौड़

     

    कृष्ण आगे।

     

    यशोदा मैया पीछे।

     

    कृष्ण कभी दाएँ जाते, कभी बाएँ।

     

    कभी किसी खंभे के पीछे छिप जाते।

     

    कभी किसी गाय के पीछे।

     

    कभी अचानक मुड़कर मैया की ओर देखते और हँस देते।

     

    यशोदा मैया उन्हें पकड़ने की कोशिश करतीं, लेकिन कृष्ण फिसलकर निकल जाते।

     

    उनके पैरों में बंधी छोटी-छोटी पायल छन-छन कर रही थीं।

     

    उनके घुँघराले बाल माथे पर आ गए थे।

     

    वे हँसते हुए भाग रहे थे।

     

    यशोदा मैया भी दौड़ते-दौड़ते थकने लगीं।

     

    लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

     

    आखिरकार एक क्षण ऐसा आया जब कृष्ण पीछे हटते-हटते एक कोने में पहुँच गए।

     

    अब आगे जाने का रास्ता नहीं था।

     

    यशोदा मैया धीरे-धीरे उनके पास पहुँचीं।

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में अब थोड़ी चिंता थी।

     

    मैया ने कहा,

     

    “क्यों रे नटखट! बहुत दौड़ा लिया अपनी मैया को?”

     

    कृष्ण ने धीरे से सिर झुका लिया।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें पकड़ लिया।

     

    कृष्ण अब मैया की बाँहों में थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “मैया, अब नहीं करूँगा।”

     

    मैया बोलीं,

     

    “हर बार यही कहते हो।”

     

    कृष्ण चुप।

     

    “फिर वही शरारत करते हो।”

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

     

    “गलती हो गई।”

     

    यशोदा मैया का मन पिघलने लगा।

     

    लेकिन आज वे केवल प्यार करके छोड़ देना नहीं चाहती थीं।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “इसे थोड़ा अनुशासन भी सिखाना होगा।”

     

    कृष्ण को बाँधने का विचार

     

    आँगन में एक बड़ी-सी लकड़ी की ओखली रखी थी।

     

    यशोदा मैया ने सोचा कि कृष्ण को कुछ देर इसी के पास बैठा देती हैं, ताकि वह फिर कोई शरारत न करे।

     

    उन्होंने एक रस्सी उठाई।

     

    कृष्ण ने रस्सी देखी तो उनकी आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “मैया, यह क्या है?”

     

    “तुम्हें बाँधूँगी।”

     

    कृष्ण ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “मुझे?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम बहुत शरारत करते हो।”

     

    कृष्ण ने तुरंत दोनों हाथ जोड़ दिए।

     

    “मैया, नहीं।”

     

    यशोदा मैया बोलीं,

     

    “आज नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कृष्ण मैया की ओर देखकर मुस्कुराने लगे।

     

    मैया ने रस्सी से उन्हें ओखली के पास बाँधने का प्रयास किया।

     

    लेकिन जैसे ही उन्होंने रस्सी बाँधी—

     

    वह छोटी पड़ गई।

     

    यशोदा मैया ने सोचा—

     

    “अरे! यह रस्सी तो छोटी है।”

     

    उन्होंने दूसरी रस्सी जोड़ दी।

     

    फिर बाँधने लगीं।

     

    लेकिन फिर भी रस्सी थोड़ी छोटी पड़ गई।

     

    मैया ने तीसरी रस्सी जोड़ी।

     

    फिर भी वही स्थिति।

     

    यशोदा मैया आश्चर्य में पड़ गईं।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “यह कैसे हो रहा है?”

     

    कृष्ण चुपचाप मैया को देखते रहे।

     

    उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    गोपियाँ भी आ गईं

     

    इतने में पास की कुछ गोपियाँ वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने देखा कि यशोदा मैया अपने कान्हा को बाँधने की कोशिश कर रही हैं।

     

    एक गोपी ने हँसते हुए कहा,

     

    “मैया, हमने तो पहले ही कहा था कि आपका कान्हा बहुत नटखट है।”

     

    दूसरी बोली,

     

    “लेकिन आज तो लगता है रस्सी भी हार गई।”

     

    तीसरी बोली,

     

    “कान्हा को बाँधना इतना आसान नहीं है।”

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “तुम लोग हँसो मत। जरा मेरी सहायता करो।”

     

    गोपियों ने दूसरी रस्सी ला दी।

     

    मैया ने उसे जोड़ दिया।

     

    फिर कोशिश की।

     

    फिर भी रस्सी छोटी।

     

    अब यशोदा मैया को थोड़ा आश्चर्य होने लगा।

     

    उन्होंने कृष्ण की ओर देखा।

     

    “कान्हा, तुम इतने बड़े कब हो गए?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    मैया ने फिर प्रयास किया।

     

    एक और रस्सी जोड़ी।

     

    अब भी वही स्थिति।

     

    गोपियाँ आश्चर्य से एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    किसी ने कहा,

     

    “मैया, यह तो बड़ी अद्भुत बात है।”

     

    यशोदा मैया बोलीं,

     

    “अद्भुत-वद्भुत कुछ नहीं। मेरा बच्चा है। बस रस्सी छोटी पड़ रही है।”

     

    उन्होंने फिर रस्सी बढ़ाई।

     

    लेकिन हर बार रस्सी बाँधने पर दो अंगुल की कमी रह जाती।

     

    मैया के माथे पर पसीना आने लगा।

     

    वे थक चुकी थीं।

     

    लेकिन उनके मन में अपने लाल के लिए दृढ़ता थी।

     

    वात्सल्य के आगे झुक गए भगवान

     

    कृष्ण अपनी मैया को देख रहे थे।

     

    वे देख रहे थे कि मैया कितनी मेहनत कर रही हैं।

     

    उनके माथे पर पसीने की बूँदें थीं।

     

    बाल थोड़े बिखर गए थे।

     

    लेकिन वे अपने पुत्र को बाँधने के लिए लगातार प्रयास कर रही थीं।

     

    कृष्ण के हृदय में अपनी मैया के प्रति प्रेम उमड़ आया।

     

    वे तो स्वयं अनंत थे।

     

    जिन्हें कोई बाँध नहीं सकता।

     

    लेकिन आज एक माँ का प्रेम उन्हें बाँधने के लिए तैयार था।

     

    कृष्ण ने सोचा—

     

    “मेरी मैया थक गई हैं। उनका प्रेम ही मेरे लिए सबसे बड़ा बंधन है।”

     

    और तभी…

     

    जब यशोदा मैया ने फिर से रस्सी बाँधी—

     

    इस बार रस्सी पूरी हो गई।

     

    मैया ने आश्चर्य से देखा।

     

    कृष्ण अब ओखली से बँधे थे।

     

    गोपियाँ प्रसन्न हो गईं।

     

    यशोदा मैया ने राहत की साँस ली।

     

    उन्होंने कृष्ण के माथे से पसीना पोंछा।

     

    और बोलीं,

     

    “अब बैठो यहाँ। थोड़ी देर शांति से रहो।”

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

     

    उनके चेहरे पर कोई क्रोध नहीं था।

     

    बल्कि एक प्यारी-सी मुस्कान थी।

     

    जैसे वे कह रहे हों—

     

    “मैया, तुम्हारे प्रेम ने मुझे बाँध लिया।”

     

    नाम पड़ा — दामोदर

     

    कृष्ण का पेट रस्सी से बँधा था।

     

    इसी कारण आगे चलकर उन्हें दामोदर नाम से भी पुकारा गया।

     

    लेकिन यह केवल रस्सी का बंधन नहीं था।

     

    यह एक माँ के प्रेम का बंधन था।

     

    ऐसा प्रेम, जिसके सामने स्वयं भगवान भी अपने अनंत स्वरूप को भूलकर बालक बन जाते हैं।

     

    यशोदा मैया अपने काम में वापस चली गईं।

     

    उन्हें लगा कि अब कान्हा कुछ देर शांति से बैठेंगे।

     

    लेकिन…

     

    क्या सचमुच कान्हा इतनी आसानी से शांत बैठने वाले थे?

     

    कृष्ण ने ओखली की ओर देखा।

     

    फिर सामने की ओर।

     

    थोड़ी दूरी पर दो बहुत बड़े वृक्ष खड़े थे।

     

    वे ऊँचे थे।

     

    बहुत पुराने थे।

     

    कृष्ण उन्हें कुछ देर तक देखते रहे।

     

    फिर उनकी आँखों में वही पुरानी शरारती चमक लौट आई।

     

    उन्होंने ओखली को देखा।

     

    फिर वृक्षों को।

     

    और धीरे से मुस्कुराए।

     

    उन्होंने अपने छोटे-छोटे हाथों से ओखली को खींचने की कोशिश की।

     

    ओखली थोड़ी-सी हिली।

     

    कृष्ण ने फिर खींचा।

     

    ओखली आगे बढ़ी।

     

    वे मुस्कुराए।

     

    फिर एक बार और जोर लगाया।

     

    ओखली घिसटती हुई वृक्षों की ओर बढ़ने लगी।

     

    गोकुल में किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यह नन्हा-सा बालक अब ऐसी लीला करने वाला है, जिसे देखकर सबकी आँखें आश्चर्य से खुली रह जाएँगी।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे उन दोनों विशाल वृक्षों के बीच पहुँचने लगे।

     

    ओखली पीछे से उनके साथ घिसट रही थी।

     

    फिर कृष्ण ने एक बार जोर लगाया।

     

    और…

     

    धरती काँप उठी।

     

    1. दोनों विशाल वृक्ष हिलने लगे।

     

    गोकुलवासियों को समझ ही नहीं आया कि अचानक यह कैसी आवाज हुई।

     

    यशोदा मैया भी चौंककर बाहर देखने लगीं।

     

    उनकी आँखों के सामने जो दृश्य था, उसे देखकर वे स्तब्ध रह गईं।

     

    आखिर उन दोनों विशाल वृक्षों के भीतर ऐसा क्या रहस्य छिपा था?

     

    और क्यों नन्हे कान्हा अपनी ओखली को लेकर उन्हीं वृक्षों के बीच जा रहे थे?

     

    अगली कड़ी में जानिए—

     

    भाग 9 — यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार……✍️✍️

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    (भाग 7 — मटकी फोड़ने की शरारत)

     

     

     

    गोकुल की सुबह हमेशा की तरह बहुत सुंदर थी।सूरज की हल्की सुनहरी किरणें नंदबाबा के आँगन में उतर रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियाँ मधुर स्वर में बज रही थीं। कहीं बछड़े अपनी माताओं के पास उछल-कूद कर रहे थे, तो कहीं गोपियाँ अपने घरों में दही मथ रही थीं।

     

    लेकिन उस सुबह नंदभवन में कुछ अलग ही होने वाला था।

     

    क्योंकि नंदलाल के मन में एक नई शरारत जन्म ले चुकी थी।

     

    पिछली कथा में आपने देखा था कि कृष्ण माखन चुराने के लिए गोकुल की गोपियों के घर-घर जाते थे। कभी वे अपने सखाओं की सहायता से ऊँची मटकी तक पहुँचते, कभी माखन बंदरों को खिला देते और कभी पकड़े जाने पर इतनी भोली मुस्कान देते कि शिकायत करने आई गोपियों का सारा क्रोध ही गायब हो जाता।

     

    लेकिन उस दिन यशोदा मैया ने मन में ठान लिया था—

     

    “आज मैं अपने कान्हा को माखन की मटकी के पास भी नहीं जाने दूँगी।”

     

    उन्होंने सुबह-सुबह ही घर की सारी मटकियाँ सँभालकर रख दी थीं।

     

    कुछ मटकियाँ ऊँची जगह पर रखीं।

     

    कुछ को कपड़े से ढक दिया।

     

    और एक बड़ी मटकी को उन्होंने अपने पास ही रख लिया।

     

    उसमें ताजा दही जमा था और ऊपर मलाई की मोटी परत तैर रही थी।

     

    कृष्ण की नजर उस मटकी पर पड़ते ही उनकी आँखों में चमक आ गई।

     

    वे कुछ देर तक चुपचाप मटकी को देखते रहे।

     

    फिर मैया की ओर देखा।

     

    मैया अपने काम में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर मन ही मन कहा—

     

    “आज तो इस मटकी का माखन मुझे ही खाना है।”

     

    कान्हा की योजना

     

    कृष्ण धीरे-धीरे अपने सखाओं के पास पहुँचे।

     

    श्रीदामा और सुभल पहले से ही आँगन के बाहर खेल रहे थे।

     

    कृष्ण ने उन्हें इशारे से बुलाया।

     

    “इधर आओ।”

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “क्या हुआ कान्हा?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “आज एक बहुत जरूरी काम है।”

     

    सुभल ने आँखें बड़ी करके पूछा,

     

    “कैसा काम?”

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर इशारा किया।

     

    “वह देख रहे हो?”

     

    दोनों ने मटकी की ओर देखा।

     

    श्रीदामा तुरंत समझ गया।

     

    “माखन?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

     

    सुभल बोला,

     

    “लेकिन कान्हा, यशोदा मैया तो यहीं हैं।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “इसीलिए तो योजना बनानी पड़ेगी।”

     

    तीनों कुछ देर सोचने लगे।

     

    फिर कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “पहले तुम दोनों मैया का ध्यान दूसरी ओर लगाओ।”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “और तुम?”

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर देखते हुए कहा,

     

    “मैं अपना काम करूँगा।”

     

    दोनों सखा हँस पड़े।

     

    मैया का ध्यान भटकाना

     

    श्रीदामा और सुभल यशोदा मैया के पास पहुँचे।

     

    श्रीदामा ने कहा,

     

    “मैया!”

     

    यशोदा मैया ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ बेटा?”

     

    “हमने बाहर एक बहुत सुंदर बछड़ा देखा है।”

     

    सुभल तुरंत बोला,

     

    “मैया, वह तो कान्हा के पीछे-पीछे आ रहा है।”

     

    यशोदा मैया ने बाहर देखने के लिए अपना ध्यान दूसरी ओर किया।

     

    बस!

     

    यही तो कृष्ण चाहते थे।

     

    उन्होंने तुरंत मटकी के पास जाकर उसे देखा।

     

    मटकी काफी भारी थी।

     

    कृष्ण ने पहले उसे उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन वे अभी छोटे थे।

     

    मटकी हिली तक नहीं।

     

    उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    फिर पास पड़ी एक छोटी-सी लकड़ी की चौकी को खींचकर मटकी के नीचे रखा।

     

    उसके ऊपर चढ़े।

     

    फिर भी मटकी तक हाथ पूरी तरह नहीं पहुँच रहा था।

     

    कृष्ण ने अपनी एड़ी पर खड़े होकर हाथ ऊपर किया।

     

    उँगलियाँ मटकी के किनारे तक पहुँचीं।

     

    उन्होंने उसे थोड़ा अपनी ओर खींचा।

     

    मटकी हल्के से हिली।

     

    कृष्ण के चेहरे पर खुशी छा गई।

     

    उन्होंने दोनों हाथों से उसे पकड़ लिया।

     

    लेकिन तभी—

     

    छन्न!

     

    मटकी थोड़ा और झुकी।

     

    कृष्ण ने उसे संभालने की कोशिश की।

     

    लेकिन मटकी भारी थी।

     

    और फिर—

     

    धड़ाम!

     

    मटकी नीचे गिर पड़ी।

     

    मटकी टूट गई।

     

    दही और माखन आँगन में फैल गया।

     

    कुछ क्षणों के लिए पूरा आँगन शांत हो गया।

     

    कृष्ण वहीं खड़े रहे।

     

    उनकी आँखें टूटे हुए बर्तन पर थीं।

     

    फिर उन्होंने अपने हाथों को देखा।

     

    फिर आँगन में फैले माखन को।

     

    उनके चेहरे पर पहले थोड़ी चिंता आई।

     

    लेकिन अगले ही क्षण उनके होंठों पर शरारती मुस्कान लौट आई।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “अब माखन छिपेगा कहाँ?”

     

    सखाओं की हँसी

     

    श्रीदामा और सुभल दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने टूटी मटकी देखी तो दोनों हँसने लगे।

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा! आज तो मैया तुम्हें जरूर डाँटेंगी।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “डाँटेंगी तो डाँटेंगी। पहले माखन खा लेते हैं।”

     

    सुभल ने पूछा,

     

    “इतना सारा?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “हमारे लिए, तुम्हारे लिए और बंदरों के लिए भी।”

     

    तीनों बालक माखन खाने लगे।

     

    कुछ माखन हाथों में।

     

    कुछ मुँह पर।

     

    कुछ कपड़ों पर।

     

    कृष्ण ने थोड़ा माखन उठाकर श्रीदामा के गाल पर लगा दिया।

     

    श्रीदामा ने भी बदले में कृष्ण के गाल पर माखन लगा दिया।

     

    अब दोनों एक-दूसरे को देखकर हँसने लगे।

     

    कृष्ण की हँसी पूरे आँगन में गूँजने लगी।

     

    लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उनकी यह हँसी अब ज्यादा देर तक छिपी नहीं रहने वाली थी।

     

    यशोदा मैया ने देखा दृश्य

     

    यशोदा मैया वापस आँगन में आईं।

     

    उन्होंने देखा—

     

    मटकी टूटी हुई।

     

    दही पूरे फर्श पर फैला हुआ।

     

    माखन इधर-उधर बिखरा हुआ।

     

    और बीच में उनका कान्हा!

     

    कृष्ण के गाल पर माखन लगा था।

     

    हाथ माखन से सने थे।

     

    और वे अपने सखाओं के साथ खिलखिलाकर हँस रहे थे।

     

    यशोदा मैया कुछ क्षणों तक उन्हें देखती रहीं।

     

    फिर उन्होंने थोड़ा कठोर स्वर बनाया।

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण की हँसी अचानक रुक गई।

     

    उन्होंने धीरे से मैया की ओर देखा।

     

    मैया के चेहरे पर हल्का-सा क्रोध था।

     

    कृष्ण समझ गए—

     

    अब मुसीबत आ गई है।

     

    वे धीरे-धीरे पीछे हटने लगे।

     

    यशोदा मैया बोलीं,

     

    “रुको!”

     

    कृष्ण रुक गए।

     

    “यह मटकी किसने तोड़ी?”

     

    कृष्ण ने नीचे देखा।

     

    फिर धीरे से बोले,

     

    “मैया…”

     

    “हाँ?”

     

    “मटकी स्वयं गिर गई।”

     

    यशोदा मैया ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “स्वयं?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो चौकी किसने रखी?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    “उसके ऊपर कौन चढ़ा था?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    “और माखन किसने खाया?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “बंदरों ने।”

     

    यशोदा मैया ने उनकी ओर देखा।

     

    फिर उनके मुँह पर लगा माखन देखा।

     

    उनके हाथों पर लगा माखन देखा।

     

    और फिर मुस्कुराकर बोलीं,

     

    “अच्छा! तो बंदर तुम्हारे मुँह में माखन लगा गए?”

     

    कृष्ण समझ गए कि अब कोई बहाना काम नहीं करेगा।

     

    वे धीरे-धीरे पीछे हटे।

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “कान्हा, आज तुम बच नहीं सकते।”

     

    कृष्ण ने एक पल मैया को देखा।

     

    फिर अचानक—

     

    दौड़ पड़े!

     

    शुरू हुई कान्हा की दौड़

     

    कृष्ण आँगन से बाहर भागे।

     

    यशोदा मैया भी उनके पीछे दौड़ीं।

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    कृष्ण हँसते हुए बोले,

     

    “मैया, पकड़ लो!”

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “आज तो पकड़कर ही रहूँगी!”

     

    कृष्ण कभी दाएँ भागते, कभी बाएँ।

     

    कभी किसी खंभे के पीछे छिप जाते।

     

    फिर अचानक दूसरी ओर निकल जाते।

     

    यशोदा मैया उन्हें पकड़ने की कोशिश करतीं, लेकिन कृष्ण उनकी पकड़ से निकल जाते।

     

    गोकुल की कुछ गोपियाँ यह दृश्य देख रही थीं।

     

    वे मुस्कुराने लगीं।

     

    एक गोपी ने दूसरी से कहा,

     

    “देखो, आज यशोदा मैया के हाथ भी कान्हा नहीं आ रहे।”

     

    दूसरी बोली,

     

    “हमने तो पहले ही कहा था, तुम्हारा कान्हा बहुत नटखट है।”

     

    तीसरी हँसते हुए बोली,

     

    “आज मटकी भी टूट गई और मैया का धैर्य भी।”

     

    यशोदा मैया ने उनकी बात सुन ली।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “आप लोग हँसिए मत! अगर पकड़ में आ गया तो आज इसकी सारी शरारत निकाल दूँगी।”

     

    लेकिन कृष्ण यह सुनते ही और तेज भागने लगे।

     

    नंदलाल की मुस्कान

     

    कृष्ण की पायल छन-छन करती हुई बज रही थी।

     

    उनके घुँघराले बाल हवा में उड़ रहे थे।

     

    माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें चमक रही थीं।

     

    लेकिन चेहरे पर वही प्यारी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया ने आखिर उन्हें एक कोने में घेर लिया।

     

    कृष्ण ने पीछे देखा।

     

    एक ओर दीवार।

     

    दूसरी ओर मैया।

     

    अब भागने का रास्ता नहीं था।

     

    यशोदा मैया धीरे-धीरे उनके पास आईं।

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “मैया…”

     

    “क्या?”

     

    “अब नहीं करूँगा।”

     

    “क्या नहीं करोगे?”

     

    कृष्ण ने थोड़ा सोचकर कहा,

     

    “मटकी नहीं तोड़ूँगा।”

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “माखन चुराओगे?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    मैया ने कहा,

     

    “बोलो!”

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

     

    “अगर आप अपने हाथ से खिलाएँगी तो नहीं चुराऊँगा।”

     

    यशोदा मैया के चेहरे का कठोर भाव फिर पिघल गया।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया।

     

    उनके गाल पर हाथ फेरा।

     

    “तुम मुझे बहुत परेशान करते हो, कान्हा।”

     

    कृष्ण ने मैया के गले से लगकर कहा,

     

    “लेकिन मैया, आप मुझे प्यार भी तो बहुत करती हो।”

     

    यशोदा मैया की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कृष्ण को चूम लिया।

     

    “हाँ बेटा… बहुत प्यार करती हूँ।”

     

    गोपियों की हँसी

     

    इतने में कुछ गोपियाँ वहाँ पहुँच गईं।

     

    एक गोपी बोली,

     

    “मैया, आज तो आपका कान्हा सचमुच पकड़ा गया।”

     

    दूसरी बोली,

     

    “और माखन भी गया, मटकी भी गई।”

     

    तीसरी ने हँसते हुए कहा,

     

    “अब देखना, कल फिर किसी के घर यही लीला होगी।”

     

    कृष्ण ने उनकी बात सुन ली।

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैंने कहा न, अब माखन नहीं चुराऊँगा।”

     

    गोपियाँ बोलीं,

     

    “सच?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    फिर धीरे से बोले,

     

    “लेकिन अगर आप लोग स्वयं बुलाएँगी तो?”

     

    सब गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    यशोदा मैया भी मुस्कुरा उठीं।

     

    गोकुल में फैल गया कान्हा का नाम

     

    उस दिन के बाद कृष्ण की मटकी फोड़ने वाली शरारत पूरे गोकुल में प्रसिद्ध हो गई।

     

    अब जब भी किसी घर में मटकी थोड़ी ऊँचाई पर रखी जाती, गोपी मुस्कुराकर कहती—

     

    “कहीं कान्हा आ न जाए।”

     

    कोई माखन छिपाता।

     

    कोई मटकी बाँधकर रखता।

     

    कोई दरवाजा बंद कर देता।

     

    लेकिन मन में सबकी यही इच्छा रहती—

     

    काश! कान्हा हमारे घर भी आए।

     

    क्योंकि कान्हा की शरारतों में भी प्रेम था।

     

    उनकी चोरी में भी अपनापन था।

     

    उनकी हँसी में ऐसा जादू था कि जिसे एक बार सुन लिया, वह उसे बार-बार सुनना चाहता था।

     

    गोकुल की गोपियाँ शिकायत तो करतीं, लेकिन जब कई दिनों तक कृष्ण उनके घर नहीं जाते, तो वे स्वयं कहने लगतीं—

     

    “आजकल हमारा कान्हा हमारे घर क्यों नहीं आता?”

     

    यही तो कृष्ण की बाल-लीला थी।

     

    वे माखन नहीं चुराते थे।

     

    वे तो अपने भक्तों के हृदय में बसे प्रेम को चुराते थे।

     

    लेकिन यशोदा मैया ने कुछ और सोच लिया था…

     

    उस शाम जब सब शांत हो गया, यशोदा मैया कृष्ण को अपने पास बैठाकर समझा रही थीं।

     

    “कान्हा, तुम अब बड़े हो रहे हो। इतनी शरारत करना अच्छी बात नहीं है।”

     

    कृष्ण मैया की ओर देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    “मैया, मैं तो छोटा हूँ।”

     

    “अच्छा? सुबह इतनी बड़ी मटकी कौन तोड़ रहा था?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    “गोपियों के घर माखन कौन चुराता है?”

     

    कृष्ण फिर चुप।

     

    “बंदरों को माखन कौन खिलाता है?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “मैं।”

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    लेकिन उस दिन उनके मन में एक विचार आया।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “यह बालक बहुत नटखट हो गया है। इसे थोड़ा अनुशासन भी सिखाना होगा।”

     

    उन्हें क्या पता था कि अगले दिन कृष्ण की एक और ऐसी शरारत सामने आने वाली है, जो आज की मटकी फोड़ने वाली लीला से भी अधिक अद्भुत होगी।

     

    अगली सुबह यशोदा मैया घर के काम में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण चुपचाप खेल रहे थे।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद घर से एक आवाज आई—

     

    छनन्…!

     

    फिर दूसरी आवाज—

     

    धड़ाम!

     

    यशोदा मैया ने चौंककर पीछे देखा।

     

    उनकी आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “कान्हा!”

     

    लेकिन इस बार कृष्ण केवल माखन की मटकी के पास नहीं थे।

     

    उन्होंने कुछ ऐसा कर दिया था कि यशोदा मैया को उन्हें रोकने के लिए स्वयं उनके पीछे दौड़ना पड़ा।

     

    और फिर…

     

    एक माँ अपने नटखट लाल को पकड़ने के लिए दौड़ रही थी, जबकि पूरा गोकुल उस अद्भुत दृश्य को देखकर मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन क्या यशोदा मैया इस बार कृष्ण को पकड़ पाएँगी?

     

    और यदि पकड़ लिया…

     

    तो क्या होगा उस नन्हे माखनचोर का?

     

    यही जानेंगे अगली कड़ी में।

     

    भाग 8 — यशोदा मैया ने कृष्ण को बाँधा

     

    जहाँ नटखट कान्हा की शरारत देखकर यशोदा मैया उन्हें पकड़ लेंगी और पहली बार उन्हें अनुशासन सिखाने का प्रयास करेंगी। लेकिन कृष्ण को बाँधने की उनकी कोशिश बार-बार क्यों असफल होगी?

     

    आखिर उस नन्हे बालक को एक साधारण-सी रस्सी बाँध क्यों नहीं पाएगी?

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।